Thursday, 19 October 2017

अयोध्या में सवा लाख बाती , दीपदान और पंचकोसी परिक्रमा में पत्नी का शिशु भाव

अयोध्या में दीप ज्योति में नहाए सरयू तट पर मालिनी अवस्थी 

अयोध्या में सरयू तट पर सवा लाख बाती जला कर हम भी अपनी अम्मा और पत्नी के साथ दीपदान कर चुके हैं। भोर में ही सरयू में स्नान कर हर किसी ने सवा-सवा लाख बाती अलग-अलग जलाई थी । वर्ष 2005 में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर । दीपदान के बाद पत्नी के साथ अयोध्या में पंचकोसी परिक्रमा का सुख भी अर्जित किया था । पंचकोसी परिक्रमा का लक्ष्य तो हमारी अम्मा का भी था । बल्कि अम्मा के ही आदेश और निर्देश पर उन की इच्छा और उन की मनौती पूरी करने के लिए ही हम अयोध्या पहुंचे थे । लेकिन अम्मा की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए उन को पंचकोसी परिक्रमा पर चलने से मना करना पड़ा । बल्कि मनाना पड़ा । बहुत हाथ पैर जोड़ने पर बड़ी मुश्किल से मानी थीं अम्मा । अम्मा को किसी बात के लिए मना पाना , बहुत कठिन है डगर पनघट की , वाली बात होती है । सर्वदा ही । अकसर वह नहीं ही मानती हैं । पर उस बार किसी तरह मना पाना संभव हुआ था । पत्नी बड़े उत्साह से चलीं साथ में । लेकिन आधे रास्ते बाद पत्नी को अंततः राम याद आने लगे । झूठ न बोलूं तो मुझे भी ।

दीपदान का एक दृश्य 
लेकिन अब बीच रास्ते लौटना नामुमकिन था । कोई सवारी भी नहीं थी पूरे पंचकोसी के रास्ते । ज़्यादातर कच्चा और धूल भरा रास्ता । कोई सुविधा नहीं । अब इस सुविधा विहीन रास्ते में कोई गांव दिख जाता , कोई घर दिख जाता तो पत्नी बिलकुल शिशु बन जातीं । शिशु भाव में ही कहतीं कि , ' अब यहीं कहीं घर ले लीजिए , किराए पर । अब हम से नहीं चला जाता । हम और नहीं चल पाएंगे । ' मज़ा लेते हुए मैं पूछता , ' और बच्चे ? ' वह कहतीं , ' बच्चों को भी यहीं बुलवा लेंगे ! लेकिन अब बस ! ' उस दिन कठिन ही था , पत्नी को धीरे-धीरे बहला कर , बस अब थोड़ी दूर और , थोड़ी दूर और कह-कह कर गंतव्य तक पहुंच कर पंचकोसी परिक्रमा पूरा करना । पर राम के नाम पर कोई कार्य आप शुरू करें , और वह पूरा न हो , ऐसा तो होता नहीं देखा अभी तक मैं ने । पत्नी थक भले गई थीं , थक मैं भी गया था , पर धीरे-धीरे पंचकोसी परिक्रमा पूरी कर ली ।

नदी की तरह बहती भीड़ ने बहुत साहस बंधाया था तब । लोगों को तो समुद्र की लहरों की तरह उछलते , कूदते , चलते देखा मैं ने उस पंचकोसी परिक्रमा पथ पर । हम जैसे सुकुआर लोग कम ही थे अयोध्या की उस पंचकोसी परिक्रमा में । सुना कि लोग तो हंसते - खेलते चौदहकोसी परिक्रमा भी करते हैं । हंसते-खेलते तो नहीं पर राम-राम करते-करते हर्ष विभोर हो कर हम ने भी पंचकोसी परिक्रमा पूरी की । सरयू तट पर सवा लाख बाती जला कर , दीपदान कर , पंचकोसी परिक्रमा पूरी कर पूरे तोष , संतोष के साथ , हर्ष विभोर हो कर हम लौटे थे अयोध्या से लखनऊ अपने घर । आज अयोध्या में दीप ज्योति में नहाए सरयू तट को देख कर अपना वह दीपदान याद आ गया । हां , वह सुबह थी , यह शाम है । पर राम की अयोध्या में क्या सुबह , क्या शाम !

अयोध्या में दीप ज्योति में नहाए सरयू तट का एक दृश्य