Saturday, 11 February 2012

वे जो हारे हुए (भाग एक)

भारतीय राजनीति और समाज में हो रही भारी टूट-फूट और उथल-पुथल की आह, अकुलाहट और इस की आंच का तापमान भर नहीं है, वे जो हारे हुए। ज़िंदगी की जद्दोजहद का, जिजीविषा और उस की ललक का आकाश भी है। मूल्यों का अवमूल्यन, सिद्धांतों का तिरोहित हो जाना, इन का अंतर्द्वंद्व और इस मंथन में हारते जा रहे लोगों के त्रास का अंतहीन कंट्रास्ट और उन का वनवास भी है। जातिवाद का ज़हर, सांप्रदायिकता का सन्निपात और मुनष्यता का क्षरण वे जो हारे हुए में अपने पूरे कसैलेपन के साथ पूरे कैनवस पर दर्ज है। शमशेर के एक शेर में जो कहंे कि, ‘कैसे-कैसे लोग ऐसे-वैसे हो गए, ऐसे-वैसे लोग कैसे-कैसे हो गए!’ वे जो हारे हुए में इस का ही अक्स है, इस की ही पड़ताल है, इस का ही पता है, इस की ही कथा है। आनंद छात्र जीवन में राजनीति का जो ककहरा पढ़ता है, साफ सुथरी राजनीति का ककहरा, यही ककहरा बाद के दिनों में जातीयता, सांप्रदायिकता और माफियाओं की गिरफ़्त में घिरी राजनीति के घटाटोप में ध्वस्त हो जाता है, विलुप्त हो जाता है। जब जब सिर उठाया/चौखट से टकराया में न्यस्त हो जाता है। राजनीतिक दलों के प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील होते जाने से वह उकता कर राजनीति की मुख्य धारा से कट जाता है। ऐसे जैसे किसी छिछली नदी के बीच कोई छोटा सा टापू। वह नौकरी करने को अभिशप्त हो जाता है। पर साफ सुथरी राजनीति का उस का सपना उसे लगातार जगाए रखता है। जीवन में, नौकरी में वह यदा-कदा समझौते करता रहता है। पर राजनीति में समझौते से उस की कुट्टी है। एक जगह वह कहता भी है कि नौकरी भले अपने मन की न करूं पर राजनीति तो अपने मन की ही करूंगा। मुनव्वर, सादिया, माथुर, सुखई और क़ासिम के अपने तनाव, संत्रास और सवाल हैं। महंत, मैडम, माफ़िया तिवारी और जमाल जैसों ने कैसे तो समूची राजनीति और समाज को जकड़ रखा है, डंस रखा है; इस का ताप और भाष्य भी अपने पूरे पन में वे जो हारे हुए में बांचा जा सकता है। गांव की ज़मीनी राजनीति का संस्पर्श भी वे जो हारे हुए में खूब उपस्थित है। अपने ठेठ और ठाट दोनों में। समाज और राजनीति की जो गिनती-पहाड़ा वे जो हारे हुए में उपस्थित है, वह किसी भी ककहरे को, उस की कसक को मलिन और शून्य कर कैसे उसे पराजित भी कर देती है, यह देखना, बांचना और इसे भुगतना वे जो हारे हुए को एक नया अर्थ देता है, एक नई खिड़की, एक नई आंच देता है। एक नया परवाज़ है यह, और आगाज़ भी।






वे जो हारे हुए
पृष्ठ सं.264
मूल्य-400 रुपए

प्रकाशक:
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2011










साफ सुथरी राजनीति और समाज का सपना देखने वाले तमाम-तमाम लोगों के नाम...


रात वह सो गया था कि मोबाईल की घंटी बजी। एक बार की घंटी वह आलस में टाल गया। पर जब दुबारा बजी तो रज़ाई में से निकल कर उठना पड़ा। दूसरी तरफ़ से सादिया थी। बोली, ‘आनंद जी मैं सादिया बोल रही हूं।’

‘कहां से?

‘यहीं आप के लखनऊ से।’

‘कब आई?

‘तीन दिन से हूं।’

‘और अब बता रही हो?’ वह ताना देते हुए बोला, ‘वह भी इतनी रात को?’

‘क्या करती? टाईम ही नहीं मिला।’

‘कहां ठहरी हो?’

‘ठहरी क्या मेडिकल कालेज में हूं।’

‘क्यों ख़ैरियत तो है?’

‘कहां ख़ैरियत है?’ कहती हुई वह रोने लगी। बोली, ‘बिटिया बुरी तरह जल गई है। उसी को ले कर आई हूं।’

‘मुनव्वर भाई कहां हैं?’

‘वह भी आए हैं। साथ ही हैं।’

‘बात करवाओ।’

‘अभी डाक्टर के पास गए हैं।’

‘अच्छा जब आएं तो बात करवाना।’

‘बात क्या करवाऊं - आप आ ही जाते तो अच्छा होता।’ बोलते-बोलते वह रोने लगी, ‘समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं?’

‘अभी क्या टाईम हो रहा है?’ वह अंधेरे में दीवार घड़ी को निहारता हुआ बोला।

‘रात के एक बजने वाले हैं।’ कहते हुए वह बोली, ‘लीजिए ये भी आ गए हैं। इन से बात करिए।’

‘दो।’

‘हां, आनंद जी!’

‘मुनव्वर भाई आप तीन दिन से आए हुए हैं, और अब ख़बर मिल रही है।’

‘यह सब गिला शिकवा बाद में भी कर लेंगे। आप अभी आ जाते तो बहुत अच्छा होता।’

‘रात के एक बजे आ कर क्या कर लूंगा। कोई डाक्टर वग़ैरह तो मिलने से रहा।’

‘क्यों मिलने से रहा? आप तो घर से उठा कर, जगा कर भी डाक्टरों को बुला सकते हैं।’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘मैं आप का पावर जानता हूं।’

‘जब पावर था, तब था। अब ऐसा कुछ भी नहीं है मुनव्वर भाई!’ वह बोला, ‘पर घबराइए नहीं मैं सुबह-सुबह आता हूं।’ रज़ाई में दुबकता हुआ वह बोला।

‘पर यहां तो आनंद भाई बिटिया की जान पर बन आई है। सांस रह-रह कर फंस जा रही है।’

‘डाक्टर प्राब्लम क्या बता रहे हैं?’

‘बेटी है तो जली हुई पर वहां अपने शहर के नर्सिंग होम वाले प्लेटलेट की कमी बता कर यहां के मेडिकल कालेज रेफ़र किए थे, और यहां डाक्टर बर्न यूनिट में भर्ती कर के बर्न का इलाज कर रहे हैं, प्लेटलेट की बात ही नहीं सुन रहे।’

‘अच्छा वहां कोई जूनियर डाक्टर जो ड्यूटी पर हो उस से बात करवाइए।’

‘देखिए कोशिश करता हूं।’ वह ज़रा बिदकते हुए बोले, ‘यहां कोई किसी की सुनता तो है नहीं। फिर भी।’ कह कर वह बोले, ‘काटिएगा नहीं, अभी डाक्टर से बात कराता हूं, और लीजिए एक डाक्टर साहब यहीं आ गई हैं, बात करिए।’

‘कराइए।’

‘डाक्टर साहब ये हमारे दोस्त हैं आनंद जी, ज़रा बात कर लीजिए।’ उधर से मुनव्वर भाई ने डाक्टर से रिक्वेस्ट की।

‘कौन हैं ये आनंद जी।’ डाक्टर ने पूछा।

‘बड़े-बड़े मिनिस्टरों से इनकी दोस्ती रही है, उठना-बैठना है।’ मुनव्वर भाई गिड़गिड़ाए पर ज़रा ठसक से।

‘ख़ुद तो मिनिस्टर नहीं हैं न?’

‘नहीं।’

‘तो फिर?’ डाक्टर ज़रा रुकी और बोली, ‘पहले पेशेन्ट देख लूं, फिर बात करती हूं।’

‘अच्छा-अच्छा!’ मुनव्वर भाई बोले,‘आनंद जी ज़रा रुकिए डाक्टर साहब ज़रा बेटी को देख लें फिर बात करेंगी। आप होल्ड कीजिए।’

‘ठीक बात है।’

थोड़ी देर बाद डाक्टर फ़ोन पर आई तो आनंद ने पूछा, ‘डाक्टर साहब बेटी की तबीयत कैसी है? आखि़र प्राब्लम क्या है?’

‘देखिए सिचुएशन तो बड़ी क्रिटिकल है। फिर भी हम कोशिश कर रहे हैं।’

‘पर यह बताइए कि जब उस की प्लेटलेट कम है तो उसे मेडिकल वार्ड की जगह बर्न यूनिट में क्यों रखे हुई हैं? प्लेटलेट क्यों नहीं चढ़ा रही हैं?’

‘बात प्लेटलेट की नहीं बर्न की है।’ डाक्टर बोलीं, ‘आप समझदार आदमी हो कर भी कैसी बात कर रहे हैं?’

‘मुनव्वर भाई तो कह रहे थे कि प्लेटलेट की कमी के कारण ही नर्सिंग होम वालों ने यहां रेफ़र किया है।’

‘नर्सिंग होम वालों ने तो अपनी बला टाली है और केस को बिगाड़ दिया है।’ डाक्टर बोली, ‘छोटे बच्चों में प्लेटलेट की वैसे भी कमी रहती है, और चलिए प्लेटलेट की प्राब्लम है भी तो बाद में देख लेंगे। अभी तो सोचिए कि बच्ची को बर्न से कैसे बचाएं। सिक्सटी-सेवेंटी परसेंट जली हुई है।’

‘सिक्सटी-सेवेंटी परसेंट जली हुई है?’ आनंद हकबका गया।

‘और तो?’

‘तो फिर कहां बच पाएगी?’ वह डाक्टर से बोला, ‘चांसेज कितना है?’

‘मैं कुछ नहीं कह सकती। बट आई ट्राई माई बेस्ट।’

‘अच्छी बात है डाक्टर साहब। फ़ोन मुनव्वर भाई को दीजिए।’

‘हां, आनंद जी।’ दूसरी ओर से मुनव्वर भाई बोले।

‘देखिए भाई डाक्टर तो ठीक कह रही हैं। वह जैसा इलाज कर रही हैं, करने दीजिए।’

‘ठीक है आनंद जी।’

‘चलिए सुबह आता हूं।’ वह बोला, ‘बेड नंबर, वार्ड नंबर बता दीजिए।’

वार्ड और बेड नंबर बताते हुए मुनव्वर भाई बोले, ‘अगर दस-बीस हज़ार रुपयों की ज़रूरत पड़ी, तो वह भी तो करवा देंगे न आनंद जी!’ वह बोले, ‘भई चुटकियों में पैसे ख़त्म हुए जा रहे हैं।’

‘नहीं-नहीं आप निश्चिंत रहिए जितने भी पैसे की ज़रूरत पड़ेगी, इंतज़ाम करवा दूंगा। आप बस बेटी का इलाज करवाइए।’

‘ठीक है, आनंद जी, करवा ज़रूर दीजिएगा।’

‘फ़ोन ज़रा उस को भी दीजिए।’

‘किसे? सादिया को?’

‘हां।’

‘लीजिए।’

‘हां, आनंद जी!’

‘घबराना बिलकुल नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूं। पूरी तरह।’

‘अच्छी बात है।’

फ़ोन काट कर जब वह सोने लगा तो बीवी तंज़ करती हुई बुदबुदाई, ‘कौन सी माशूक़ा कष्ट में आ गई?’

‘क्या हरदम बेवकू़फी की बात करती रहती हो?’

‘क्यों सच बात चुभ गई?’

‘जानती हो कौन थी?

‘कौन थी?’ बुदबुदाती हुई वह रज़ाई में ही कुनमुनाई!

‘सादिया थी।’

‘तो क्या! बचपन की ही सही, थी तो!’

‘तुम नहीं सुधर सकती।’

‘पहले ख़ुद तो सुधर जाइए।’

‘उ़फ़।’ कह कर वह रज़ाई में करवट बदल कर सो गया।

सादिया!

उसकी बचपन की दोस्त! अबोध! उस के अब्बा रेलवे में थे। हम दोनों एक ही क्लास, एक ही स्कूल में थे। एक ही मुहल्ले में रहना तीसरा संयोग था। स्कूल में भी साथ जाते थे। एक्खट-दुक्खट, आइस-पाइस खेलते, झगड़ते-लड़ते हम लोग बड़े हुए थे। हम भाई-बहन भी नहीं बने, न ही आशिक़-माशूक़। बस एक सामान्य सी दोस्ती हमारी उस मुहल्ले में रहते समय तक जारी रही। फिर पिता रिटायर हुए तो पहले मुहल्ला छूटा, फिर शहर छूटा और सादिया भी छूट गई। न उसने हमें याद किया न हमने उसे।

मुनव्वर भाई के पिता भी रेलवे में काम करते थे और उसी मुहल्ले में रहते थे जहां मेरे और सादिया के पिता रहते थे। मुनव्वर भाई उम्र में न सिर्फ़ मुझ से बड़े थे बल्कि बड़प्पन भी दिखाते थे। कोई आठ-दस बरस बड़े थे वह लेकिन बातचीत में बहस में, वह कभी भी अपने को बड़ा नहीं जताते। बाद के दिनों में जब वह कालेज में आया तो समाजवादियों की संगत में आ गया और इस बहाने छात्र संघ और छात्र राजनीति में भी। उस के कालेज में छात्र संघ तब नहीं था। युवा समाजवादियों ने ताव दिला-दिला कर उस के कालेज में छात्र संघ के बीज बो दिए। विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक पूर्व अध्यक्ष ने इस बीज को आग में बदला और इस आग में घी भी ख़ूब डाला। इतना कि छात्र संघ का आंदोलन धधक उठा। आंनद ने अगुवाई की और जब देखा कि प्रिंसिपल और मैनेजमेंट किसी भी हाल में छात्र संघ नहीं बनने देंगे तो गांधी जी के उपवास का रास्ता चुना। लोगों ने मना भी किया कि अभी इतनी जल्दबाज़ी ठीक नहीं है। अभी बातचीत और ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद तक ही लड़ाई रखी जाए।

‘ज़िंदाबाद मुर्दाबाद तक तो ठीक है पर बातचीत मेरी लिए बहुत मुश्किल है।’ एक दिन सलाहकारों से आजिज़ आ कर आनंद खीझ कर बोला। तो विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक नेता ने आनंद से पूछा भी कि, ‘आख़िर बातचीत में दिक्क़त क्या है? क्या प्रिंसिपल अंगरेज़ी में बात करता है।’

‘नहीं तो।’ वह बोला, ‘और जो प्रिंसिपल साहब अंगरेज़ी में बोलें भी तो क्या दिक्क़त है?’

‘दिक्क़त यह है कि तुम अंगरेज़ी बोल नहीं पाओगे। लोहियावादियों को वैसे भी अंगरेज़ी नहीं आती। पर इस से छुट्टी पाने की भी एक टेक्नीक है मेरे पास?’

‘नहीं यह बात नहीं है।’ आनंद बोला।

‘पर वह अंगरेज़ी से छुट्टी पाने की टेक्नीक क्या है?’ एक दूसरे छात्र नेता ने पूछा।

‘कुछ नहीं अंगरेज़ी का जवाब भ्रष्ट अंगरेज़ी में बल्कि हिंदियाइट अंगरेज़ी में दो साले की बोलती बंद हो जाएगी।’

‘कैसे भाई साहब कैसे?’ एक छात्र अकुला कर बैठने का एंगिल बदलते हुए बोला।

‘देखो अभी ताजा़-ताजा़ सुना है।’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘थोड़ी बहुत मिलावट भले हो इस बात में पर है बिलकुल सच।’

‘क्या?’ वह छात्र थोड़ा और अकुलाया।

‘चुप बे बकलोल।’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘बोलने भी दोगे।’ फिर ज़रा रुका और जब देखा कि पूरी सभा शांत है तो बोलना शुरू किया, ‘क़िस्सा बी.एच.यू. का है। वहां छात्र संघ का अध्यक्ष अंगरेज़ी नहीं जानता था। चुनाव जीतने के बाद वह जब भी कोई मेमोरेंडम ले कर वाइस चांसलर के पास जाता। वाइस चांसलर उसे देख कर पहले तो मुसकुराता फिर कहता, ‘यस मिस्टर प्रेसिडेंट।’ कह कर वह अंगरेज़ी में ही कुछ गिटपिटाता और यह तुरंत वापस आ जाता। अपनी कोई बात कहे बिना, कोई मेमोरेडंम दिए बिना अंगरेज़ी की हीनता में मार खा कर लौट आता पांच मिनट में। बाहर खड़े छात्रों की ओर भी नहीं देखता और आंख चुरा कर भाग लेता। अंततः कुछ लवंडों ने रिसर्च की कि आखि़र मामला क्या है? रिसर्च में पता चला कि अपना अध्यक्ष अंगरेज़ी का जूता खा कर भाग आता है। फिर अध्यक्ष को अंगरेज़ी में बात करने की डट कर प्रैक्टिस कराई गई। प्रैक्टिस क्या बिलकुल रट्टा लगवा दिया गया। लेकिन बेचारा अध्यक्ष हिंदी मीडियम का होनहार था जा कर वहां लथड़ गया। पर ऐसा लथड़ा कि वाइस चांसलर की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई।’

‘क्या गाली वाली बक दी?’

‘गाली?’ पान की पीक थूकते हुए विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘इससे भी बड़ा काम कर दिया। गाली वाली क्या चीज़ होती है?’

‘तो क्या पीट दिया?’ एक दूसरा छात्र उकता कर बोला।

‘पीट दिया?’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘अरे इस से भी बड़ा काम कर दिया।’

‘गोली मार दी?’

‘नहीं भाई इस से भी बड़ा काम किया।’ वह बिना रुके बोला, ‘हुआ यह कि जब अपना अध्यक्ष पहुंचा वाइस चांसलर के पास तो रवायत के अनुसार वाइस चांसलर मुसकुराते हुए ज्यों स्टार्ट हुआ कि, ‘यस मिस्टर प्रेसिडेंट।’ तो अपना अध्यक्ष भी फुल टास में बोल पड़ा, ‘यस मिस्टर वाइस चांसलर!’ वाइस चांसलर ने कुछ टोका टाकी की तो अपने अध्यक्ष ने मेज़ पीटते हुए कहा, ‘नो मिस्टर वाइस चांसलर! ह्वेन आई टाक तो आइयै टाक, ह्वेन यू टाक तो यूवै टाक! बट डोंट टाक इन सेंटर-सेंटर!’ और फिर मेज़ पीटा। अध्यक्ष ने इधर मेज़ पीटा, उधर वाइस चांसलर ने अपना माथा। फिर अपना अध्यक्ष हिंदियाइट अंगरेज़ी बोलता रहा, वाइस चांसलर सुनता रहा। जो अध्यक्ष  दो मिनट में वाइस चांसलर के यहां से भाग निकलता था, एक घंटे बाद बाहर आया। और बाहर तक वाइस चांसलर सी ऑफ़ करने आया। फिर तो छात्र एकता ज़िंदाबाद से धरती हिल गई।’ वह रुका नहीं, बोलता रहा, ‘तो आनंद अगर कहो तो तुम्हें भी अंगरेज़ी का रट्टा लगवाने का इंतज़ाम किया जाए।’ वह बोला, ‘लगे हाथ दो काम हो जाएंगे। अंगरेज़ी की भी ऐसी तैसी कर देंगे और छात्र संघ ज़िंदाबाद भी।’

‘नहीं भाई साहब बात अंगरेज़ी की नहीं है।’

‘तब फिर?’

‘असल में जब हम लोग जाते हैं तो प्रिंसिपल साहब इतनी आत्मीयता से बेटा-बेटा कह कर बात करने लगते हैं कि सारी बात धरी की धरी रह जाती है। और जो एकाध बात याद आती भी है तो वह कहते हैं कि अच्छा विचार करेंगे। बस बात ख़त्म हो जाती है।’

‘बस!’

‘आप को बस लगता है। यहां ज्यों वह बेटा कहते हैं प्राण निकल जाता है।’

‘क्यों?’

‘बेटा कहते ही पिता याद आ जाते हैं। संस्कार बाहर आ जाते हैं। श्रद्धा उपज जाती है और जैसे मैं जलता हुआ जाता हूं वैसे ही पिघलता हुआ बाहर आ जाता हूंू। बात व्यक्तिगत हो जाती है। जब कि छात्र संघ कोई व्यक्तिगत मसला नहीं है, सामूहिक है और हमारा अधिकार भी।’ आनंद बोला, ‘इसी लिए मैं उपवास की बात करता हूं कि तब प्रशासन भी इनवाल्व होगा, बात एक कालेज से निकल कर समूचे शहर में पहुंचेगी, अख़बारों में भी बात आएगी और तब शायद बात प्रिंसिपल के कमरे में अकेले नहीं सब के सामने होगी, सब के साथ होगी। तो शायद बात बन जाएगी।’

‘हां, यह भी ठीक है।’

‘मैं यह भी जानता हूं कि एक दो दिन के उपवास से भी यह बात नहीं बनने वाली है। न ही एक दो छात्रों के उपवास से यह बात बनेेगी।’

‘तो क्या आमरण अनशन का इरादा है?’

‘बिलकुल।’

‘नहीं यह ठीक नहीं होगा।’

‘क्यों?’

‘दो कारणों से।’ विश्वविद्यालय नेता बोला, ‘एक तो तुम लोग सभी अभी बालिग़ नहीं हो सो दूसरे, तीसरे दिन ही पुलिस घसीट ले जाएगी और जो पुलिस से बच भी गए ख़ुदा न ख़ास्ता तो दो दिन से ज़्यादा खाए पिए बिना रह नहीं पाओगे। और कहीं जो तबीयत बिगड़-विगड़ गई तो आंदोलन टूट जाएगा।’

‘तब फिर?’

‘फिर क्या कालेज प्रशासन को एक मांग पत्र दे कर ह़ते भर में मांग पूरी करने को कहा जाए और मांग पूरी न होने पर ह़ते भर बाद क्रमिक अनशन की भी नोटिस दी जाए।’

सब ने इस पर सहमति जताई। सात दिन के लिए चार-चार छात्रों के क्रमिक अनशन के लिए जत्था भी बना दिया गया। कालेज प्रशासन को लगा कि लवंडे गीदड़ भभकी दे रहे हैं। मांग मानना तो दूर उस पर विचार भी नहीं किया। नतीजा सामने था। क्रमिक अनशन शुरू हो गया। आनंद पहले ही जत्थे में था। सुबह खाना खा कर माला वाला पहन कर चार छात्र बैठ गए - क्रमिक अनशन पर। पूरे कालेज में अफ़रा-तफ़री थी। एल.आई.यू. वालों ने भी अनशनधारियों के तख़ते के बगल में अपनी कुर्सियां लगा लीं। डाक्टर आए चेकअप कर गए। रह-रह कर छात्र एकता जिं़दाबाद गूंज उठता। जब कोई छात्र नेता आता छात्र एकता ज़िंदाबाद, इंक़लाब ज़िंदाबाद से जैसे धरती हिल जाती, आकाश गूंज जाता। प्रिंसिपल विरोधी तथा मैनेजमेंट से खार खाए कुछ गुरुजनों ने भी छात्रों के इस क्रमिक अनशन की मांग को मौन-मुखर मिश्रित समर्थन दे रखा था।

दिन जोश ख़रोश और ज़िंदाबाद में गुज़रा। शाम होते-होते उबाल ठंडा होने लगा। छात्रों की दर्शक दीर्घा वाली भीड़ छंटी, जिंदाबाद-ज़िंदाबाद का जुनून भी टूटा।

रात हुई तो भूख लग आई ज़ोरों की। लेकिन नींबू पानी, ग्लूकोज़ पानी से ही काम चलाया गया। एक साथी फिर भी नहीं माना। उस के एक साथी ने समोसा, इमरती उस के मसनद के नीचे ला कर रख दिया, और उसने चद्दर ओढ़ कर लेट कर खा लिया चोरी-चोरी।

आनंद बहुत नाराज़ हुआ। पर भीतर-भीतर। ताकि बात बाहर न जाने पाए। विश्वविद्यालय नेता ने उसे समझाया भी कि ऐसे बात-बात पर जो रिएक्ट करोगे तो राजनीति नहीं कर पाओगे। राजनीति में कंप्रोमाइज़ भी एक शब्द है। यह जान लो, अभी से। पर आनंद तब इस बात को, इस बात के दूर तक जाने के अर्थ को नहीं समझ पाया। पर आंदोलन को धक्का न पहुंचे कालेज मैनेजमेन्ट इसे मुद्दा न बना ले सो भीतर-भीतर धधकता हुआ चुप रहा, और गांधी के साधन की पवित्रता और साध्य के मर्म को परिभाषित करता रहा। एक छात्र ने उकता कर उसे उस का मसनद दिखाते हुए कहा भी कि, ‘जैसे उस लड़के ने मसनद के नीचे रख कर इमरती समोसा खा लिया वह भी वैसे ही कुछ खा पी ले तो पेट की आग शांत होने के साथ गुस्सा भी शांत हो जाएगा। आनंद फिर भी नहीं माना तो उस नेता ने कहा, ‘तो फिर अपने सारे सिद्धांत ही उसी मसनद के नीचे रख कर उन्हें सुला दो। क्यों कि सिद्धांत की राजनीति कुछ और है और व्यवहार की राजनीति कुछ और।’

आनंद फिर भी नहीं माना और रात बड़ी देर तक कुढ़ता रहा। सुबह उठा तो भूख फिर ज़ोर मार रही थी। पर अख़बार में छपी फ़ोटो देख कर भूख को उसने दबाया। तब तक कुछ लोगों की आमद बढ़ गई। इसी आमद में उस लड़के ने फिर दो राउंड समोसा इमरती चद्दर ओढ़ कर खाया-मसनद के नीचे से। इस बार उस के साथ के एक दूसरे अनशनधारी ने भी चद्दर ओढ़ कर मसनद के नीचे से समोसा इमरती उड़ाया। आनंद ने उसे भी लानतें भेजीं। इसी बीच दिन के दस बज गए। क्रमिक अनशन के लिए दूसरी टीम आ गई थी पर कालेज का प्रबंधन या प्रिसिंपल की ओर से मांगों के माने-जाने या किसी तरह की वार्ता ख़ातिर कोई प्रस्ताव आदि का दूर-दूर तक कोई संकेत, कोई आसार दिखाई नहीं दे रहा था। ख़ैर, विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष ने संतरे का रस पिला कर क्रमिक अनशन पर बैठे पहले जत्थे का अनशन तुड़वाया और साथ ही दूसरे जत्थे को फूल की मालाएं पहना कर बैठा दिया। पहले जत्थे पर बैठे अन्य लड़कों के घरों के लोग टिफ़िन में खाना ले कर हाज़िर थे। लेकिन आनंद के घर के लोगों का कोई पता नहीं था। आनंद को अपने पिता का रुख़ मालूम था, इस लिए इस की उम्मीद भी नहीं थी कि कोई उस के लिए घर से खाना ले कर आएगा भी। तो भी एक लड़के ने उसे खाने पर बुलाया भी कि, ‘आओ साथ खा लेंगे।’ उस के टिफ़िन से खाने की बढ़िया ख़ुशबू भी आ रही थी। पर जाने क्यों वह टाल गया। बोला, ‘घर जा रहा हूंू। नहा धो कर ही खाऊंगा।’ और वह पैदल ही घर चल पड़ा। पैसे थे नहीं कि रिक्शा कर लेता। भूख से छटपटाता पैदल चलता वह आखों में खाना बसाए घर पहुंचा तो वहां तसवीर ही बदली हुई थी। सारा मुहल्ला जैसे उस के लिए सवालों की आग बन कर खड़ा था। तिस पर उम्मीद के विपरीत पिता घर में मिले। मारे क्रोध के वह आफ़िस नहीं गए थे। क्रोध में वह जैसे जल रहे थे, या कहूं कि क्रोध में कांप रहे थे, कहना कुछ कठिन ही था। पर वह क्रोध की ज्वालामुखी में धधकते हुए बोले, ‘अनशन ख़तम हो गया नेता जी?’ पिता व्यंग्य में उसे पहली बार नेता जी बोल रहे थे। इस से पहले वह उसे पाजी, नालायक़ आदि संबोधनों से नवाज़ते रहे थे।

‘जी।’ वह भूख में कांपता हुआ बोला।

‘चलो कालेज में अनशन ख़तम हुआ, अब एक दिन का अनशन घर में भी कर लो।’ कहते हुए वह बड़की अम्मा की ओर मुड़े, ‘ख़बरदार जो इस को कल से पहले खाना दिया।’ पिता ज़रा रुके और बड़की अम्मा से बोले, ‘अगर इसे खाना दिया तो समझो कुत्ते को खाना दिया और तुम ख़ुद कुत्ते का मांस खाओगी।’ यह सुन कर बड़की अम्मा जैसे हिल गईं। लेकिन आनंद पेट में लगी आग के बावजूद संयत रहा। यह भी अद्भुत था कि उधर पिता क्रोध से कांप रहे थे और इधर आनंद भूख से कांप रहा था। बड़की अम्मा जड़वत कांप रही थीं। इस दुर्निवार संयोग की साक्षी एक बिल्ली बनी जो इस क्षण में भी कठोर बनी म्याऊं-म्याऊं कर रही थी। इधर बिल्ली की म्याऊं-म्याऊं से बेपरवाह पिता शुरू थे, ‘अनुशासनहीनता घर में बिलकुल बर्दाश्त नहीं होगी।’ वह जोड़ रहे थे, ‘बिना मुझ से अनुमति लिए इस की हिम्मत कैसे हुई अनशन पर बैठने की। और अनशन पर बैठते ही इतना बड़ा नेता बन गया कि छोटा भाई गया तो उसे पहचाना ही नहीं।’ वह दहाड़ रहे थे, ‘दो दिन खाना नहीं मिलेगा तो सारी नेतागिरी घुस जाएगी। पढ़ना-लिखना एक पैसे का नहीं, नेतागिरी करने चला है। नाक कटा कर रख दी।’ बड़बड़ाते, दहाड़ते ही पिता ने कपड़े पहने और साइकिल निकाल कर चले गए।

पिता के जाते ही बड़की अम्मा ने उसे बाहों में भर लिया। लगीं रोने फूट-फूट कर, रोते-रोते ही बोलीं, ‘वह चाहे जो कहें, तुम चलो खा लो।’ कह कर वह खाना परोसने लगीं। पर आनंद ने बड़की अम्मा के पैर छुए। कहा कि, ‘बड़की अम्मा माफ़ करो। अब खाना तो नहीं ही खाऊंगा, और अब इस घर में भी नहीं रहूंगा।’ भूख से उस की अंतड़ियां फटी जा रही थीं। पैर कांप रहे थे, लगता था जैसे वह अभी गिर पडे़गा।

‘इतना कठोर मत बनो बेटा।’ कह कर बड़की अम्मा ने उसे लपक कर फिर बांहों में भर लिया। बोलीं, ‘उन को नहीं बताऊंगी कि तुम को खाना दिया है। खा ले मेरे लाल!’ पुचकारते हुए बड़की अम्मा ने उस के मंुह में निवाला डालने की कोशिश की।

‘बड़की अम्मा नहीं।’ कह कर आनंद ने बड़की अम्मा की ममता में नत होते हुए फिर से पांव छुए और घर से बाहर निकल गया।

पीछे रह गया घर और बड़की अम्मा की गुहार, ‘अरे रुको बेटा, सुनो तो बाबू। मेरे लाल। मोरे भइया!’

भूख से कांपते पांव आगे नहीं बढ़ रहे थे। बड़ी मुश्किल से वह मुहल्ले से बाहर आया। बाहर आते ही उस ने एक हैंडपंप देखा। जा कर भर पेट पानी पिया। पैसे थे नहीं जेब में। तो क्या भला रिक्शा करता या क्या कहीं खाना खाता। किसी तरह ख़ुद को ढकेलते हुए कालेज पहुंचा। दोस्तों ने देखते ही ताड़ लिया। तुरंत चाय पिलाई। विश्वविद्यालय के एक छात्र नेता ने उस के कंधे पर हाथ रखा और एक किनारे ले जा कर पूछा, ‘घर में सब ठीक-ठाक तो है?’

‘कहां?’ कहते हुए आनंद की घिघ्घी बंध गई। वह रो पड़ा। ऐसे जैसे कोई नदी बांध तोड़ गई हो।

‘अइसे तो राजनीति नहीं हो पाएगी।’ वह बोला, ‘कम से कम औरतों की तरह रोने से नहीं ही।’

‘तो क्या करें?’

‘दिल कड़ा करो। और धीरज से काम लो।’ वह बोला, ‘पहले चलो कुछ खा पी लो। बिना खाए पिए चेहरा ऐसे लग रहा है। जैसे कितने जूते खाए हो। कुछ खा पी लोगे तो बुद्धि भी खुलेगी।’

‘मेरे पास पैसे नहीं हैं।’

‘यह बताने की भी ज़रूरत है?’ कह कर वह पास के ही एक छोटे से सस्ते से होटल में उसे ले गया। रोटी दाल और प्याज खा कर जब वह निकला तो लगा कि पिता के ख़िलाफ उसने पहला क़िला जीत लिया।

अब उस की लड़ाई दोतरफ़ा थी।

कालेज प्रबंधन और दूसरे, पिता से।

कालेज प्रबंधन से लड़ना आसान था। पर पिता से मुश्किल। वह पिता जिन की छाया मात्र से वह संकोच से भर जाता था। पिं्रसिपल बस इतना ही उस से कहते, ‘हां बेटा।’ इतने भर ही से वह संस्कारों में सिमट जाता। श्रद्धा से भर जाता। जलता हुआ वह पिघल जाता। और अब वह उसी पिता के ख़िलाफ बिगुल बजा कर खड़ा था। जलता हुआ नहीं, बल्कि ज्वालामुखी बन कर।

यह ज्वालामुखी उसे इस क़दर दहकाए हुए था कि वह रात को भी घर नहीं गया। बड़की अम्मा की याद में वह कई बार छटपटाया पर घर फिर भी नहीं गया। रात उसने टेलीफ़ोन एक्सचेंज के वेटिंग रूम में गुज़ारी। वहां आनंद की ही तरह घर से भागे हुए मिले कामरेड शुक्ला। शुक्ला एक सरकारी द़तर में क्लर्क थे। कम्युनिस्टों की सोहबत में थे। उन के चाचा को यह हरगिज़ पसंद नहीं था। चाचा यूनिवर्सिटी में लेक्चरर थे। चाचा चाहते थे कि कामरेड शुक्ला कामरेडगिरी छोड़ कर घर परिवार के पिंजरे में जैसे तमाम लोग रहते हैं, रहें। पर कामरेड शुक्ला थे कि यह पिंजरा बार-बार तोड़ कर बाहर आ जाते थे। कामरेड शुक्ला शादीशुदा थे, पत्नी गांव पर रहती थी। दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे। पर यह गृहस्थी उन्हें रास नहीं आती। लेकिन मार्क्स और माओ-त्से-तुंग की किताबों में वह भटकते फिरते। आधी से अधिक तनख़्वाह किताबों और कामरेडों में फूंक डालते। एक क्लर्क की तनख़्वाह वैसे भी बहुत कम थी। यह क्लर्की भी उन के चाचा ने ही कह सुन कर दिलवाई थी। सो वह पिंजरे में उन्हें डाल कर रखना चाहते थे। कामरेड शुक्ला भी उस दिन घर से भाग कर आए थे। आदी थे। सो उन्हें यह तड़ते देर नहीं लगी कि आनंद भी घर से भाग कर आया है। आनंद तब टीन एज था और कामरेड शुक्ला दो बच्चों के पिता। परिचय के बाद कामरेड शुक्ला ने पूछा, ‘कुछ खाना वाना खाया है कि खाएंगे?’

‘पैसा नहीं है।’

‘पैसा तो बहुत मेरे पास भी नहीं है लेकिन पास में एक होटल है, वहां मेरा खाता चलता है। चलिए वहीं कुछ खा-पी लेते हैं।’

दूसरे दिन कामरेड शुक्ला ने एक गवर्मेन्ट कालेज के हास्टल में आनंद के रहने की व्यवस्था करवा दी। कुछ दिनों के लिए। बतौर गेस्ट। हास्टल में मेस भी था। सो खाने की व्यवस्था भी हो गई। बिलकुल घर की तरह खाना। हास्टल के साथियों में जो स्पष्ट है कि सभी अपरिचित थे आनंद के लिए अद्भुत सहानुभूति थी। सम्मानजनक सहानुभूति। गवर्मेन्ट कालेज होने के नाते यहां अनुशासन भी कड़ा था और खुले आम लफंगई नहीं थी। मेस में खाने के लिए हर रोज़ अलग-अलग लड़कों का गेस्ट बनना पड़ता था उसे। और यह काम रसोइया ने ख़ुद तय कर रखा था। बस शर्त यह थी कि खाने का भुगतान महीने के आख़िर में हो जाना चाहिए। कामरेड शुक्ला ने तय किया कि इस के लिए पढ़ाई के साथ-साथ कोई काम भी शुरू करना चाहिए। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि जब तक कोई काम नहीं बनता तब तक खाने का भुगतान वह करेंगे। काम कई देखे आनंद ने। पर कोई तकनीकी काम उसे मालूम था नहीं। घरेलू नौकर का काम उसे मंज़ूर नहीं था। काम की तलाश में ही उसे कुर्सी बिनने का काम भी बताया गया। पर पहले कुर्सी बिनना सीखना था उसे। एक कामरेड परवेज़ विश्वविद्यालय में एम.ए. कर रहे थे, रोज़ तीन चार कुर्सियां बिन डालते थे वह। घर पर ही कुर्सियां मंगवा लेते थे वह। उन के साथी कई बार उन्हें चिढ़ाते भी कि,‘बेटा क्यों नेत्रहीनों के पेट पर लात मार रहे हो। उन की रोज़ी छीन रहे हो।’ पर कामरेड परवेज़ बेपरवाह हो कर कहते, ‘काम कर रहा हूं, चोरी मक्कारी नहीं।’ एक जगह खाना बनाने का भी काम करने की बात हुई। अजीब द्वंद्व चल रहा था आनंद के जीवन में। किसी ने एक होटल में प्लेट धोने का काम बताया। इन्हीं सब उधेड़बुन में वह लगा था कि एक दिन रास्ते में मुनव्वर भाई मिल गए। पूछा कि, ‘जब से अख़बार में फोटो छपी तब से आप जनाब गुल ही हो गए।’ वह बोले, ‘इतने बड़े लीडर तो नहीं हो गए आप कि अब मुहल्ले के चौराहे से भी तौबा कर लें।’

‘अरे नहीं, मुनव्वर भाई, बात यह नहीं है।’

‘फिर?’

‘बात यह है कि मैं ने वह मुहल्ला ही छोड़ दिया है।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘मुहल्ला क्या घर ही छोड़ दिया है।’

‘तो नेतागिरी भारी पड़ गई?’

‘नेतागिरी नहीं, पिता की हिटलरशाही भारी पड़ गई मुनव्वर भाई।’ कह कर आनंद ने पूरी तफ़सील से अपना दुख, दिक्क़त और दुविधा बता दी। और कहा कि, ‘फ़िलहाल तो फ़ौरी तौर पर मुझे कोई न कोई काम चाहिए। भोजन बनाने, कुर्सी बीनने या प्लेट धोने से इतर।’

‘अरे आप पढ़े लिखे आदमी हैं, ब्रिलिएंट स्टूडेंट हैं, यह सब काम करने की ज़रूरत भी क्या है?’

‘तो करें क्या?’ वह बोला, ‘हिटलर पिता के आगे घुटने टेक दें?’

‘नहीं, बिलकुल नहीं।’

‘फिर?’

‘ट्यूशन करिए।’

‘कौन देगा ट्यूशन भला मुझ को?’

‘देगा कौन यह तो मैं नहीं जानता। पर मैं दिलवाऊंगा ट्यूशन आप को यह ज़रूर जानता हूं।’ कह कर उन्हों ने अपने हाथ में लिए अख़बार की एक और तह की और हास्टल के कमरे का नंबर लिखने के लिए पूछते हुए जेब से पेन निकाल लिया। हाथ में कोई एक अख़बार मुनव्वर भाई का स्थाई स्वभाव था। सुबह मिलिए, दोपहर मिलिए, शाम मिलिए मतलब कभी मिलिए मुनव्वर भाई के हाथ में मुड़ा हुआ एक अख़बार ज़रूर मिलेगा। बाद में एक अख़बार के साथ-साथ उन के हाथ में एक डायरी भी आ गई। इस क़दर कि बाद में दोस्तों ने मज़ाक-मज़ाक में उन के नाम मुनव्वर आलम ख़ां की तर्ज़ पर उन का नाम अख़बार डायरी ख़ां रख दिया। हालां कि मुनव्वर भाई को यह नाम हरगिज़ पसंद नहीं था। कभी-कभी वह क्रुद्ध भी हो जाते थे यह नाम सुन कर। तो भी लोग पीठ पीछे लगभग इसी नाम से उन का ज़िक्र करते। कई लोग उन्हें मोनव्वर भाई भी कहते या लिखते तो वह सलीके़ से अगले को अपना नाम लिखवाते, ‘मु लगा कर लिखिए मुनव्वर आलम ख़ां।’

दूसरे दिन ही मुनव्वर भाई ने पांच रुपए, पंद्रह रुपए, बीस रुपए और पचीस रुपए के चार ट्यूशन दिलवा दिए। दो ट्यूशन में दस-दस रुपए एडवांस भी दिलवा दिए। आनंद का संघर्ष अब शुरू हुआ था। चारों ट्यूशन में पैदल चलते-चलते उस की तबीयत हरी हो जाती। रही-सही कसर बच्चे शैतानी और चिल्ल पों से पूरी कर देते। तनाव और थकान से चूर उस की अपनी पढ़ाई पस्त होती जा रही थी। जीवन जटिल हो चला था। पांच रुपए वाला ट्यूशन वह छोड़ना चाह रहा था। पर मुनव्वर भाई की रिक्वेस्टनुमा शर्त थी कि, ‘सारे ट्यूशन छोड़ दीजिएगा पर यह ट्यूशन नहीं।’ दरअसल यह ट्यूशन एक धोबी के बच्चे का था जो निर्बल और गरीब था। मुनव्वर भाई कहते, ‘इस के बच्चे का पढ़ना बहुत ज़रूरी है आनंद जी। यह आप की ज़िम्मेदारी है।’ जब कि दूसरा ट्यूशन एक केवट के बच्चे का था जो दूध बेचता था। उस की दो भैंसें थीं। जिस दिन उस की बीवी जो ख़ूब काली थी अपनी भैंस की जितनी ही, ख़ुश होती और भैंस थोड़ा दूध ज़्यादा दे देती उस दिन वह आनंद को एक गिलास दूध दे देती। आनंद को मलाईदार दूध पीना तो अच्छा लगता पर उस के दूध देने का तरीक़ा नहीं। वह उसे दूध ऐसे देती जैसे भिखारी को भीख दे रही हो। और उसे अम्मा की याद आ जाती। यही दूध उसे अम्मा बड़े मनुहार और मान के साथ देती। लगता जैसे वह उसे दूध नहीं अमृत दे रही हों। मुनव्वर भाई जब कभी मिलते तो वह सारी दिक़्क़तें बताता तो वह हंस कर टाल जाते। बहुत कहने पर वह अपनी तकलीफ़ों का पिटारा खोल बैठते। एक दिन कहने लगे कि आप को उस दूध वाली के दूध देने का तरीक़ा पसंद नहीं आता पर भूख लगी रहती है। सो आप को दूध पीना अच्छा लगता है। वैसे ही मुझे जब अब्बा से पैसा लेना होता है तो उस से भी ज़्यादा बुरा लगता है। एक तो जल्दी वह पैसे देते नहीं, दसियों दिन पीछे पड़े रहो तो एक दिन आधा तीहा देते भी हैं तो ऐसे गोया पैसे बेटे को नहीं किसी कोढ़ी को दे रहे हों। जैसे कोढ़ी के कटोरे में सिक्कों की छन्न की आवाज़ होती है वैसे ही मेरे कलेजे में कांटे सी कठोर आवाज़ होती है। गुपचुप। कोढ़ी के कटोरे की आवाज़ तो आप सुन सकते हैं पर मेरे दिल की आवाज?’ वह जैसे रुआंसे हो जाते।

और आज वही मुनव्वर भाई अपनी बेटी के लिए रुआंसे हो रहे थे। तो वह हिल गया था। और वह पुरानी यादों में उतर गया और उन यादों में भीग गया पर पत्नी की शक भरी बेवक़ूफी की बातों ने उन यादों की तासीर को तंग कर दिया।

बड़ी मुश्किल से वह सो पाया।

सुबह वह ज़रा देर से उठा। उठते ही अख़बार देखना शुरू किया। अख़बार देखते ही वह हिल गया। तमाम ख़बरों के साथ एक ख़बर यह भी थी कि, ‘आज हो सकती है सद्दाम हुसैन को फांसी।’ अख़बार पढ़ना छोड़ कर उसने टी.वी. आन किया। सद्दाम हुसैन को फांसी हो चुकी थी। सारे चैनल सद्दाम हुसैन की फांसी वाली क्लिपिंग से अटे पड़े थे। फांसी के ठीक पहले के दृश्यों में सद्दाम हुसैन के चेहरे पर अजीब निश्चिंतता उसे भीतर तक बेध रही थी। सामने फांसी के लिए जल्लाद खड़े हैं और सद्दाम का चेहरा देख ऐसा लगता था गोया वह किसी सेमिनार में जा रहे हों, फांसी चढ़ने नहीं। यह क्या था? अपनी तानाशाही के प्रति प्रायश्चित या जीवन की ढिंठाई या अमरीकी गुंडागर्दी के ख़िलाफ एक मौन प्रतिरोध। आनंद के लिए तुरंत-तुरंत कुछ भी कह पाना कठिन था। फिर उसने अचानक सोचा कि क्या भगत सिंह भी अपनी फांसी के समय ऐसे ही निश्ंिचत रहे होंगे? फिर उसे लगा कि एक क्रांतिकारी, एक शहीद को एक तानाशाह के साथ खड़ा कर के सोचना या तुलना करना तो अपराध हुआ। ख़ैर, अमरीकी गुंडागर्दी और सद्दाम हुसैन की तानाशाही की कथाओं में गंुथी टी.वी. एंकरों की एक्सपर्ट्स के साथ मिली जुली चर्चाएं और मुश्किल कर रही थीं। कि तभी मुनव्वर भाई का फ़ोन आ गया। वह बोले,‘ आनंद जी आप कहां है?’

‘घबराइए नहीं, मुनव्वर भाई, बस मैं पहुंच रहा हूं। फ़ोन काटते-काटते उसने पूछा, ‘बिटिया कैसी है?’

‘अब क्या बताऊं? कुछ समझ में नहीं आ रहा।’ कह कर मुनव्वर भाई रो पड़े।
‘घबराइए नहीं, बस मैं पहुंच रहा हूं। कह कर उस ने फ़ोन ख़ुद ही काट दिया। और बीवी से पूछा कुछ सब्ज़ी-वब्ज़ी है?’

‘हां है। क्यों?’

‘चार पांच लोगों के लिए जल्दी से पूड़ी सब्ज़ी बना दो। और मेडिकल कालेज चलना हो तो ख़ुद भी फटाफट तैयार हो जाओ।’ कह कर आनंद ख़ुद बाथरूम में घुस गया।

नहा धो कर जब वह निकला तो देखा पत्नी तैयार नहीं थी। तो उस ने पूछा, ‘तुम नहीं चल रही हो?’

‘नहीं, अभी आप हो आइए। मैं बाद में चलूंगी।’

‘ठीक है पूड़ी सब्ज़ी तैयार हो गई?’

‘बस हो रही है।’ पत्नी बोली, ‘जब तक आप कपड़े पहनेंगे तैयार हो जाएगी।’

‘मुझे भी कुछ खिलाओगी?’

‘अभी दूध ले लीजिए। आ कर खाइएगा।’

‘ठीक है, मुनव्वर भाई का खाना पैक करो।’

‘क्यों सादिया का नहीं? क्या वह नहीं खाएगी?’ पत्नी ने जैसे फिर से पिन चुभोया।

‘क्यों सादिया क्यों नहीं खाएगी? अरे, सादिया की मां भी खाएगी, उस का भाई भी खाएगा।’ वह लगभग बिदकते हुए बोला, ‘बस तुम खाना पैक करो।’

जब वह मेडिकल कालेज के लिए निकलने लगा तो सोचा कि एक परिचित डाक्टर को फ़ोन कर दे। ताकि वहां आसानी रहे। एक परिचित डाक्टर से सुबह भी कह चुका था। पहले डाक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिए थे और   अब यह दूसरा डाक्टर भी हाथ खड़े कर रहा था, ‘आज तो संडे है भाई साहब! आप जानते ही हैं कि कोई सीनियर डाक्टर संडे को होता ही नहीं है। पूरा मेडिकल कालेज संडे के दिन जूनियर डाक्टरों के हवाले होता है।’

‘जूनियर डाक्टरों नहीं, स्टूडेंटस के हवाले होता है पूरा मेडिकल कालेज और सातों दिन होता है, यह मैं जानता हूं तभी तो आप से कह रहा हूं कि कोई सीनियर डाक्टर न सही, कोई जूनियर डाक्टर ही सही वहां अटेंड कर ले और मेरे दोस्त की बेटी का जीवन बचा ले।’

‘देखिए भाई साहब देखता हूं।’ डाक्टर बोला, ‘आप को मैं जानता हूं हेल्थ सेक्रेट्री या हेल्थ मिनिस्टर से भी कह सकते हैं। कह देंगे तो लाइन लग जाएगी डाक्टरों की।’

‘लाइन नहीं लगवानी है डाक्टर साहब, जान बचानी है।’

‘ठीक है मैं कुछ करता हूं।’

‘थैंक्यू!’ उस ने दुबारा कहा, ‘थैंक्यू डाक्टर साहब!’

वह जब मेडिकल कालेज पहुंचा तो मुनव्वर भाई द्वारा बताए गए वार्ड और बेड पर न वह मिले, न सादिया और न उन की बेटी। मिला मुनव्वर भाई का साला जो रज़ाई ओढ़े सो रहा था। उसने बताया कि, ‘एक बड़े डाक्टर आए थे, वहीं थोड़ी देर पहले ट्रामा सेंटर रेफ़र करवा कर ले गए हैं।’

‘ट्रामा सेंटर में कहां?’

‘अब यह नहीं मालूम।’

आनंद अभी तक कभी ट्रामा सेंटर नहीं गया था। फिर उसने सोचा ट्रामा सेंटर तो घायलों के लिए है। इसी उधेड़बुन में उसने मुनव्वर भाई का मोबाईल मिलाया और लगातार मिलाया लेकिन हर बार स्विच आफ मिला। हार कर वह ख़ुद ही पहुंचा ट्रामा सेंटर। फिर से मुनव्वर भाई का मोबाइल मिलाया। अब की मिल गया। लेकिन उठा नहीं। वह लगातार मिलाता रहा। अंततः मुनव्वर भाई ने मोबाइल उठाया। आनंद ने पूछा कि,‘आप है कहां?’

‘ट्रामा सेंटर में।’

‘ट्रामा सेंटर में तो मैं भी हूं। आप ट्रामा सेंटर में कहां है?’

‘कैम्पस में ही चाय वाली दुकान पर।’

‘चाय की दुकान में किधर?’ पूछते हुए वह चाय की दुकान पर पहुंचा। मुनव्वर भाई और सादिया एक साथ दिख गए।

मुनव्वर भाई लपक कर मिले। बोले, ‘चलिए आप आए तो सही।’ कहते हुए जैसे सारी थकावट और उदासी से उन्हों ने छुट्टी ली।

‘आना तो था ही।’ आनंद झेंप मिटाते हुए बोला, ‘आप का मोबाइल लगातार स्विच आफ़ क्यों चल रहा था?’

‘स्विच आफ़ नहीं था, बैट्री डाउन थी।’ वह चाय की दुकान पर चार्जिंग में लगा मोबाइल दिखाते हुए बोले, ‘अब चार्ज़ कर रहा हूं।’

‘बेटी के पास कौन है।’

‘अम्मी हैं।’ अभी तक चुप-चुप सादिया भर्राई आवाज़ में बोली।

‘बेटी की तबियत कैसी है?’

‘लगता तो पहले से ठीक ही है।’ सादिया बुझी-बुझी बोली।

‘नहीं आप ने जो फ़ोन पर डाक्टर से बात की उस से भी फ़रक पड़ा।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘और आज सुबह तो जैसे पूरा मेडिकल कालेज मेहरबान हो गया। कोई सीनियर डाक्टर भी आया था, और उस के साथ कई डाक्टर। लगता है बेटी अब बच जाएगी।’ वह बोले, ‘इतने डाक्टरों की फ़ौज। ज़रूर आप ने फ़ोन किया होगा। तभी ट्रामा सेंटर भी ले आए सब।’ वह मारे उत्साह के बोले, ‘आप तो हमारे लिए देवदूत बन कर आए हैं। अब कोई फ़िकर नहीं है।’ आनंद को मुनव्वर भाई का यह संतोष देख कर अच्छा लगा। वह बोेला, ‘अच्छा एक मिनट रुकिए मैं अभी आया।’ कह कर वह भाग कर मेन सड़क पर गया जहां उस की कार खड़ी थी। कार में रखा पूड़ी सब्ज़ी का पैकेट ले कर वह वापस चाय की दुकान पर पहुंचा। पैकेट सादिया को देते हुए बोला, ‘पूड़ी सब्ज़ी है, गरम है। अभी खा लो नहीं ठंडी हो जाएगी।’

‘भाभी नहीं आईं?’ पूड़ी सब्ज़ी का पैकेट सहेजती हुई सादिया बुदबुदाई।

‘असल में आज संडे है।’ वह झेंपता हुआ बोला, ‘छुट्टी का दिन! तो सारा काम आज ही निपटाना होता है। लेकिन शाम तक वह भी आएगी।’

‘हां, भई। वर्किंग लेडी की यह समस्या तो होती है।’

‘आप लोग खाना खा लीजिए तो बेटी को देखने चलूं।’

‘भइया को भी बुला लेते।’ सादिया सकुचाती हुई बोली।

‘पहले आप लोग खा लीजिए फिर उसे भी बुला लेंगे।’ आनंद बोला, ‘बल्कि अम्मी और भइया एक साथ खा लेंगे। उस को बुलाने में भी टाइम लगेगा।’

‘आनंद जी ठीक कह रहे हैं।’ सादिया की तरफ़ मुख़ातिब हो कर मुनव्वर भाई बोले, ‘लाओ निकालो।’ कह कर मुनव्वर भाई पूड़ी सब्ज़ी ले कर खाने लगे। सादिया भी।

पूड़ी सब्ज़ी खाते हुए देख कर लग रहा था कि मुनव्वर भाई कितने दिनों बाद खाना खा रहे हैं। वह जैसे खाने पर टूट पड़े थे। सादिया सकुचा रही थी तो वह उसे लगभग डपटते हुए बोले, ‘खाओ भाई! आख़िर लड़ाई लड़नी है। बेटी को बचाने की लड़ाई!’ वह बोले, ‘देह में ताक़त रहेगी तभी तो लड़ोगी लड़ाई!’ वह ऐसे बोलने लगे गोया अपनी पत्नी से नहीं, ट्रेड यूनियन के किसी मंच से कामगारों को मैनेजमेंट के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए उकसा रहे हों।

‘अच्छा हमें ज़रा बेटी का बेड-वार्ड नंबर बताइए तब तक मैं वहां देखूं।’ आनंद ने कहा तो मुनव्वर भाई ने बेड नंबर-वार्ड नंबर बताते हुए कहा, ‘सेकेंड फ्लोर पर है।’

‘लेकिन बिना पास के नहीं जाने देंगे।’ कहते हुए सादिया ने पास निकाल कर दे दिया।

आनंद जब वार्ड में पहुंचा तो नज़ारा बदला हुआ मिला। मुनव्वर भाई की निश्चिंतता पर पानी पड़ता दिख रहा था। एक साथ दो तीन डाक्टरों को उस ने बेड पर पाया। सभी झुक कर बेटी के इलाज में लगे थे। एक डाक्टर बड़ी तेज़ी से बेटी की छाती पर फ़ीज़ियोथिरेपी कर रहा था और घबराया हुआ भी था। थोड़ी देर बाद उस के चेहरे से घबराहट ख़त्म हुई और वह बेड से हट कर डाक्टर वाली कुर्सी पर लंबी सांस ले कर बैठ गया। आनंद भी उस के पास जा कर पास के स्टूल पर बैठ गया। अपना परिचय दिया। फिर पूछा कि, ‘बेटी की कैसी स्थिति है?’

‘स्थिति क़तई अच्छी नहीं है।’ छत की ओर दोनों हाथ उठा कर डाक्टर बोला, ‘जब तक सरवाइव कर रही है, कर रही है। बाक़ी राम जाने।’ कह कर उसने एक लंबी सांस फिर छोड़ी। बोला, ‘आई ट्राई माई बेस्ट। बाक़ी बहुत मुश्किल है।’

‘क्या प्लेटलेट बहुत कम हो गई है?’ आनंद ने पूछा।

‘प्लेटलेट?’ डाक्टर उसे घूरते हुए बोला, ‘प्राब्लम प्लेटलेट नहीं, बर्न है। सेवेंटी-एट्टी परसेंट जली हुई है।’

‘जी ये तो है।’

‘तो?’

‘बच जाएगी?’ आनंद मायूस हो कर बोला।

‘आप जानते हैं फिर भी पूछ रहे हैं?’

‘नहीं मुझे पहले बताया गया था कि दस परसेंट जली है और प्लेटलेट की भी कमी है।’

‘यही तो।’ डाक्टर बोला, ‘यहां लाने में इतनी देर कर दी। दस दिन हो गए हैं जले हुए। स्किन की तीन लेयर जा चुकी हैं। पूरी देह में सेप्टिक फैल रहा है। सांस नहीं ले पा रही है। यहां बच्चों का वेंटिलेटर है नहीं। जा कर पेडियाट्रिक में देखिए कोई वेंटिलेटर मिल जाए तो कोई रास्ता बने।’ कह कर डाक्टर एक दूसरे बेड पर जा कर मरीज़ देखने लगा। आनंद उस के पीछे-पीछे वहां भी पहंुचा और बोला, ‘डाक्टर साहब एक मिनट!’

‘देखिए सर!’ डाक्टर झल्ला कर बोला, ‘वक्त ख़राब करने से कोई फ़ायदा नहीं। आप मुझ से सवाल-जवाब बाद में कर लीजिएगा। पहले वेंटिलेटर अरेंज कीजिए प्लीज़!’ वह मुड़ते हुए बोला, ‘मेरे पास और भी पेशेंट हैं। प्लीज़!’

‘ठीक बात है।’ कह कर आनंद बेटी के बेड पर एक बार फिर गया। एक नज़र बेटी को फिर से देखा। फूल सी बेटी अपनी मौत की आहट से बेख़बर टुकुर-टुकुर ताक रही थी।

‘डाक्टर साहब।’ कहती हुई सादिया की अम्मी जो अब तक ख़ामोश थीं, उस की ओर लपकीं।

‘मैं डाक्टर नहीं हूं।’ आनंद ने उन्हें बताया और पूछा, ‘आप सादिया की अम्मी हैं?’ कहते हुए उस ने उन के पांव छुए।

‘हां, बेटा। पर आप?’ उस के सिर पर आशीष देती हुई वह धीरे से बोलीं।

‘मैं आनंद हूं।’

‘कौन आनंद?’ वह अचकचाईं।

‘नहीं पहचाना?’

‘नहीं भइया।’ वह बोलीं, ‘बुढ़ापा आ गया है। लगता है आखों में भी उस का असर पड़ रहा है।’ कह कर वह सिर पर साड़ी का पल्लू ठीक करने लगीं। इस बीच उस ने अपने पुराने मुहल्ले जहां वह आस-पास ही रहते थे का नाम बताया, अपने पिता का नाम बताया। तो उन का भ्रम कुछ साफ़़ हुआ फिर भी वह ठीक से याद नहीं कर पाईं लेकिन याद कर लेने का स्वांग रचा और बोलीं, ‘हां-हां पहचान गई।’ अपने स्वांग को और मज़बूत करते हुए वह बोलीं, ‘असल में भइया तब आप छोटे से तो रहे। अब हट्टे कट्टे, लंबे-चौड़े हो गए हैं तो कैसी पहचानती भला?’

‘ये बात तो है?’ आनंद अभी सादिया की अम्मी से बात कर ही रहा था कि वह डाक्टर वहां आ गया और बोला, ‘अरे, आप अभी तक यहीं हैं? गए नहीं पेडियाट्रिक में वेंटिलेटर चेक करने?’

‘आप सीधे वहां रेफ़र क्यों नहीं कर देते?’

‘देखिए मैं एक ज़िम्मेदार डाक्टर हूं। रिस्क नहीं ले सकता। और फिर कुछ सीनियर डाक्टर्स भी इसे वाच कर रहे हैं। यहां तो देखिए कुछ टेंपरेरी अरेंजमंेट मैं ने कर रखा है। वहां, यह भी नहीं हो पाएगा। प्लीज़ आप जल्दी जाइए और देखिए। बातें, यादें बाद में कर लीजिएगा।’

‘अच्छी बात है।’ कह कर आनंद वार्ड से बाहर आ कर सीढ़ियां उतरने लगा। सीढ़ियां चढ़ते हुए मुनव्वर भाई मिल गए। आनंद को घबराया देख कर वह भी घबरा गए बोले, ‘क्या बात है?’

‘कुछ नहीं आप मेरे साथ आइए!’

‘क्या बेटी फिर सीरियस हो गई है?’ मुनव्वर भाई हड़बड़ा कर सीढ़ी पर से फिसलते-फिसलते बचे।

‘पहले अपने आप को संभालिए और पेशेंस से काम लीजिए।’ फिर दोनों निःशब्द ट्रामा सेंटर से बाहर आने लगे। सादिया भी लपकी।

‘तुम यहीं रहो।’ कह कर आनंद ने जेब से पास निकाल कर उसे देते हुए कहा कि, ‘यहीं क्या बेटी के पास चल कर बैठो, हम लोग अभी आते हैं।’

कार स्टार्ट कर वह बैक करने लगा तो जल्दबाज़ी में डिवाइडर से टकरा कर बंपर झूल गया। पर वह झूलते बंपर की परवाह किए बिना मेडिकल कालेज की तरफ़ चला। बच्चों वाले विभाग के पास पहुंच कर कार पार्क की और अंदर चला गया। वेंटिलेटर रूम में जा कर देखा कोई वेंटिलेटर ख़ाली नहीं था। पांच-छह वेंटीलेटर थे और सभी पर बच्चे थे। और उन के परेशान परिजन साथ में। समस्या सुन कर एक जूनियर डाक्टर ने पीछे सटी हुई एक बिल्डिंग की तरफ़ इशारा करते हुए किसी डिपार्टमेंट का नाम लिया और बताया कि, ‘वहां फ़र्स्ट फ्लोर पर चले जाइए-वहां भी कुछ वेंटिलेटर हैं, हो सकता है कोई ख़ाली हो।’

आनंद भाग कर वहां भी गया। वहां स्थिति और विकट थी। एक बच्चे को लिए उस के परिजन पहले ही से कोई वेंटिंलेटर ख़ाली होने की आस में बैठे थे। आनंद वापस फिर वहीं आया और उस जूनियर डाक्टर से रिक्वेस्ट की, कि ‘कोई रास्ता निकालें। प्लीज़।’

डाक्टर ने बड़ी ख़ामोशी से उसे देखा फिर धीरे से बोला, ‘पांच मिनट वेट कीजिए।’

‘ठीक बात है।’ कह कर वह मुनव्वर भाई के साथ बरामदे में खड़ा हो गया। कुछ देर चुपचाप दोनों खड़े फ़र्श देखते रहे। फिर मुनव्वर भाई ही धीरे से बोले, ‘आख़िर बात क्या है?’

‘बेटी को सांस लेने में दिक्क़त हो रही है, इसी लिए वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ गई है।’

‘ओह मतलब मामला सीरियस हो गया है।’ अपने ब्लेज़र में हाथ डालते हुए वह धीरे से बोले।

‘आप तो कह रहे थे कि बेटी बस दस परसेंट ही जली है।’

‘हां।’

‘किसने बताया?’

‘क्या?’

‘कि वह दस परसेंट ही जली है?’

‘बताया क्या मैं ने ख़ुद देखा है। बस उस की हिप और हलका सा पेट जला है।’

‘अपने शहर में किसी डाक्टर को नहीं दिखाया था?’

‘दिखाया था। एक नर्सिंग होम में।’ मुनव्वर भाई जैसे सफ़ाई देने पर उतर आए, ‘ह़ते भर वहां इलाज चला। वह तो जब प्लेटलेट कम हो गया तो यहां रेफ़र करवा कर लाए। बीस हज़ार वहां ख़र्चा था, आठ दस हज़ार यहां भी ख़र्च हो चुके हैं।’ बोलते-बोलते मुनव्वर भाई की आवाज़ रुंध गई। वह आनंद से लिपट गए। बोले, ‘बस किसी तरह बेटी बच जाए आनंद भाई।’ बोलते-बोलते वह सिसकने लगे।

‘घबराइए नहीं मुनव्वर भाई मैं हूं न।’

‘बस आाप ही का भरोसा है।’ कह कर वह आनंद से फिर लिपट गए।

‘भरोसा ऊपर वाले पर रखिए, डाक्टरों पर रखिए। मैं तो हूं ही।’

फिर दोनों निःशब्द फ़र्श देखने लगे। तभी वह जूनियर डाक्टर बरामदे में आया और बोला, ‘जाइए अपना पेशेंट लाइए। जल्दी से।’

‘ख़ाली हो गया वेंटिलेटर।’ मुनव्वर भाई बोले।

‘हां।’

‘कैसे?’

‘बस आप अपना बच्चा ले आइए।’

तब तक एक बच्चे को गोद में लिए उस के माता पिता रोते पीटते वेंटिलेटर रूम से बाहर आते दिखे। आनंद यह दृश्य देख कर घबरा गया। आनंद से भी ज़्यादा मुनव्वर भाई घबरा गए। मारे घबराहट के वह डाक्टर से लिपट गए। डाक्टर अफनाया,‘यह क्या कर रहे हैं? दूर हटिए।’ पर मुनव्वर भाई उस से और लिपट गए और गिड़गिड़ाए, ‘मेरी बेटी बच जाएगी न?’

‘बिलकुल बच जाएगी!’ डाक्टर आनंद की ओर देखते हुए और मुनव्वर भाई को अपने से छुड़ाते हुए बोला, ‘इन्हें ले जाइए और पेशेंट को जल्दी से ले आइए।’

‘ट्रामा सेन्टर से ले आना है। पंद्रह बीस मिनट या आधा घंटा तो लगेगा ही।’

‘ओह ट्रामा सेन्टर।’ डाक्टर बुदबुदाया, ‘जल्दी जाइए।’ फिर पूछा,‘ इतनी देर क्यों लगाएंगे?’

‘अरे पांच सात मिनट जाने में, इतना ही समय आने में और फिर रेफ़र करने की कार्यवाई में भी इतना समय तो लगेगा ही।’ आनंद बोला, ‘बस आप वेंटिलेटर ख़ाली रखिएगा।’

‘आई डू माई बेस्ट।’ डाक्टर बुदबुदाया।

रास्ते में अचानक मुनव्वर भाई बोले,‘क्या सद्दाम हुसैन को फांसी हो गई?’

‘क्यों? आप को कैसे पता चला?’

‘नहीं ट्रामा सेंटर में चाय की दुकान पर कुछ लोग चर्चा कर रहे थे।’ वह बोले, ‘मर्द आदमी था। अमरीका की गुंडई का शिकार हो गया।’

‘क्यों ख़ुद गुंडा नहीं था?’

‘यह तो अपनी-अपनी राय है।’ वह बोले, ‘पर अमरीका की गुंडई पर तो पूरी दुनिया एक राय है।’

‘नहीं। ख़ुद अमरीका और उसके पैंतीस मित्र देश कम से कम इस पर आप की राय के साथ नहीं हैं।’

‘हूं।’ कह कर इस तकलीफ़ में भी हलका सा मुस्कुराए। बोले, ‘सब साले गुंडे हैं। पर आप को लगता है कि इन साम्राज्यवादी ताक़तों का विनाश जल्दी ही हो जाएगा?’ फिर जैसे ख़ुद ही जवाब देने लगे, ‘नहीं तो दुनिया बरबाद हो जाएगी।’

‘अमरीका और सद्दाम पर हम लोग फिर कभी बात कर लेंगे अभी तो बेटी को बचाने की बात करें।’

‘बेटी तो बच जाएगी।’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘आप देवदूत बन कर आ गए हैं। अब सब कुछ ठीक हो जाएगा।’

‘लेकिन बेटी जली कैसे?’

‘अब क्या बताऊं?’ मुनव्वर भाई उदास हो कर बोले, ‘उस का चलना सीखना ही उस के लिए काल बन गया।’

‘मतलब?’

‘अभी-अभी चलना सीखा था उस ने। पहले उंगली थामे फुदक-फुदक चलती थी। फिर गिरते पड़ते चलने लगी। और अब ठुमक-ठुमक कर चलने लगी थी। वो आप के रामचंदर जी वाला भजन है न ठुमक-ठुमक चलत रामचंदर बाजत पैजनिया वाला। ठीक वैसे ही। उस दिन भी आंगन में ठुमक-ठुमक कर चल रही थी। हमारे साथ के किराएदार ने कपड़ा धोने वाले टब में गरम पानी रखा था। ख़ूब खौलता हुआ। वह उसी गरम पानी के टब में जा कर बैठ गई। बैठते ही चिल्लाई। बेगम दौड़ीं फ़ौरन पर तब तक जितना उसे जलना था जल चुकी थी।’ माथा पकड़ते हुए मुनव्वर भाई बोले, ‘क्या बताऊं बेचारी की तकलीफ़ देखी नहीं जाती।’

‘कहीं ऐसा तो नहीं मुनव्वर भाई कि हम लोगों की तकलीफ़ और बेटी की तकलीफ़ एक जैसी ही है?’

‘समझा नहीं।’

‘कहीं हम लोग भी तो इस राजनीति में, इस समाज में चलना सीख लेने की सज़ा ही तो नहीं भुगत रहे?’ आनंद बोला, ‘ठुमक-ठुमक कर चले और खोखले सिस्टम के खौलते पानी वाले टब में बैठ कर जल गए। जल कर अनफ़िट हो
गए। इतने कि अब हाशिए की राजनीति के लायक़ भी नहीं रह गए। इतना कि अब परिचय बताने पर भी लोग नहीं पहचानते। पहचानते हुए भी अपरिचित होते जाते हैं लोग।’

‘क्या पता?’ मुनव्वर भाई लंबी सांस छोड़ते हुए बोले।

‘नहीं याद है अपने शहर में हम लोग भले पैदल होते या साइकिल पर लोग दूर से ही पहचानते। परिचय बताने की ज़रूरत भी नहीं होती थी।’

‘याद है आनंद जी!’

‘पर अब तो हालत यह है कि रहते थे हम हसीन ख़यालों की भींड़ में, उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में।’

‘सवालों?’ मुनव्वर भाई बोले, ‘बवालों की भीड़ में।’

‘लगता है जैसे हम लोग नपुंसक हो गए हैं।’ आनंद बोला, ‘बल्कि इस नपुंसक समय में घुटने टेक कर जी रहे हैं।’

‘ग़लती कहां से हो गई?’ मुनव्वर भाई ने फिर से माथा सहलाया, ‘समझ में नहीं आता कि समूची राजनीति कैसे दोगली और हिप्पोक्रेट हो गई। सारा समाज दिखावटी और खोखला हो गया। मूल्य मर गए और पैसा राक्षस बन कर बड़ा हो गया।’

‘लीजिए ट्रामा सेंटर आ गया!’ गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी करता हुआ आनंद बोला, ‘अपने इन इंटेलेक्चुवल घावों का इलाज भी यहीं करवा लीजिए।’

‘अफ़सोस तो यही है कि इन घावों का इलाज किसी ट्रामा सेंटर में नहीं हो सकता।’ ट्रामा सेंटर में दाखिल होते हुए मुनव्वर भाई बोले। अभी वह दोनों ट्रामा सेंटर के सेकेंड ़लोर पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ ही रहे थे कि एक स्ट्रेचर पर बाडी लिए अस्पताल के कर्मचारी उतर रहे थे। पीछे-पीछे रोते-बिलखते परिजन। यह सब देख कर मुनव्वर भाई फिर दहल गए। आनंद का हाथ पकड़ते हुए बोले, ‘मेरी बेटी तो बच जाएगी न आनंद जी!’

जवाब में आनंद कुछ बोला नहीं हाथ ऊपर उठा कर ऊपर वाले की मर्ज़ी बता दी। वार्ड में बेड पर पहुंचने पर फूल सी बेटी की तकलीफ़ से भरा चेहरा देख कर और मुश्किल हुई। सादिया की अम्मी ऐसे छटपटा रही थीं जैसे कोई मछली पानी से बाहर निकाल दी गई हो। दो तीन जूनियर डाक्टर उस पर झुके हुए थे। कोई आला लगाए नब्ज़ टटोल रहा था, कोई सीने पर फ़िज़ियोथिरेपी में लगा था। छूटते ही आनंद ने डाक्टरों से बताया कि, ‘वेंटिलेटर का इंतज़ाम हो गया है। इसे तुरंत भेज दीजिए।’ जवाब में डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। कहा कि, ‘सर से बात करिए।’

उन का मतलब अपने रेज़ीडेंट डाक्टर से था।

‘वह कहां हैं?’ एक जूनियर डाक्टर ने दाएं-बाएं, बाएं-दाएं कर के किसी कमरे की लोकेशन बताई। उस के हिसाब से आनंद भाग कर गया भी। पर डाक्टर नहीं मिले। वापस आ कर वह झल्लाया तो एक जूनियर डाक्टर ने कहा, ‘मेरे साथ आइए।’ वह रेज़ीडेंट डाक्टर कमरे के अंदर के कमरे में लेटा हुआ था। उसे देखते ही वह उठ बैठा। आनंद ने उसे भी बताया कि, ‘वेंटिलेटर का इंतज़ाम हो गया है।’

‘चलिए देखते हैं।’ डाक्टर खड़े हो कर अपनी पैंट ठीक करते हुए बोला। बरामदे में खड़े मुनव्वर भाई रेज़ीडेंट डाक्टर को देखते ही चहक पड़े। आनंद से बताने लगे, ‘अपने पूर्वांचल के हैं। बहुत ही हेल्पफ़ुल। सुबह यहां आए तो बहुत मदद की इन्होंने।’

‘हां, हां मेरी भी बात हो चुकी है।’

‘कब?’

‘सुबह जब आप नीचे चाय की दुकान पर थे तब।’ रेज़ीडेंट डाक्टर ने आ कर बेटी को देखा। एक जूनियर डाक्टर अभी भी फ़िज़ियोथिरेपी कर रहा था। लगातार। उसे हटा कर जूनियर डाक्टर ने भी कुछ देर फ़िज़ियोथिरेपी की फिर आनंद
की ओर मुड़ा और बिना बोले मुंह पिचका कर आंखों ही आंखों में बता दिया कि अब कहीं भी ले जाना बेकार है। आनंद ने डाक्टर को किनारे ले जा कर धीरे से पूछा, ‘कितनी उम्मीद है?’

‘बिलकुल नहीं।’

‘अभी तो ज़िंदा है?’

‘हां, अभी तो है। पर अब वंेटिलेटर पर ले जाना बेकार है।’ रेज़ीडेंट डाक्टर बोला, ‘पूरी देह में सेप्टिक फैल गया है। अब ले भी जाएंगे तो पता चला कि रास्ते में ही चली जाएगी।’

डाक्टर बोला, ‘अब कोई फ़ायदा नहीं। बहुत देर हो गई।’

डाक्टर जब जाने लगा तो मुनव्वर भाई बेटी के पास से भाग कर आनंद के पास आए। घबराए हुए बोले, ‘डाक्टर साहब क्या बता रहे हैं? वेंटिलेटर पर क्यों नहीं ले जा रहे हैं?’

‘कुछ नहीं मुनव्वर भाई।’ आनंद उन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला, ‘हम लोग अब हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं।’ फिर लगभग पछताते हुए आनंद बोला, ‘काश कि मैं रात ही आ गया होता।’

‘क्या बात बिलकुल बिगड़ गई है?’ मुनव्वर भाई धीरे से बोले।

‘बिगड़ तो गई है।’ आनंद भी उतने ही धीरे से बोला, ‘डाक्टर यही बता रहे हैं।’

‘सादिया कहां है?’ मुनव्वर भाई ने सादिया की अम्मी से पूछा।

‘बाहर बरामदे में बैठी है। तीन दिन से सोई नहीं थक गई है।’ अम्मी बोलीं।

‘तो उसे ज़रा संभालिएगा।’ मुनव्वर भाई अम्मी से हाथ जोड़ कर बोले।

‘का हुआ भइया?’ आनंद की ओर देखती हुई भर्राए गले से अम्मी बोलीं, ‘कुछ हो गया क्या बिटिया को?’

‘नहीं, नहीं अभी कुछ नहीं।’ कह कर उन्हें टालता हुआ आनंद दूसरी तरफ़ हो गया। सादिया की अम्मी छटपटाती हुई बेटी के बेड की तरफ़ लपकीं। उस का माथा चूमा उस का हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर उस की तरफ़ देख कर बोलीं, ‘हाथ तो अभी गरम है।’ वह झुकीं और पुचकार कर बोलीं, ‘बोल बिटिया नानी बोल!’ लेकिन बिटिया कुछ नहीं बोली। सादिया की अम्मी फिर बिन पानी की मछली की तरह छटपटा पड़ीं। अब तक सादिया भी अपनी बेटी के पास आ गई थी। उस की देह की थकावट, मन की छटपटाहट और आंखों में बेटी के बच जाने की आस साफ़ पढ़ी जा सकती थी। वह बेटी के माथे पर हाथ रख कर बेड के पास रखे स्टूल पर बैठ गई। दो डाक्टर भी उस की तीमारदारी में लगे रहे। एक आला लगाए नब्ज़ टटोल रहा था और दूसरा सीने पर फ़िज़ियोथेरेपी कर रहा था। दूसरी तरफ़ आनंद मुनव्वर भाई के पास खड़ा लगातार नर्सिंग होम वाले को कोस रहा था कि ह़ते भर तक उस ने अपने पास रख कर बेटी को ख़तरे में डाल दिया। वह मुनव्वर भाई को भी कोस रहा था कि लखनऊ आने के तीन बाद उसे क्यों ख़बर दी। साथ ही वह अपने को भी कोस रहा था कि वह रात ही क्यों नहीं आ गया! हालां कि अब लगभग तय हो गया था कि बेटी को बचा पाना लगभग संभव नहीं है, जब तक सांस है - उस की तभी तक आस है। डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे। फिर भी अपनी भरसक सभी लगे हुए थे। मुनव्वर भाई भी मान चुके थे कि बेटी को बचाने की लड़ाई अब उन के हाथ से निकल चुकी है। और वह इस जुगत में लगे थे कि सादिया को किसी तरह वहां से हटा दें। क्यों कि कभी भी अप्रिय ख़बर मिल सकती थी। लेकिन सादिया वहां से टस से मस नहीं हो रही थी। अंगद के पांव की तरह जम गई थी।

‘आखि़र सादिया को आप हटाने के लिए इतने परेशान क्यों हैं?’ आनंद ने मुनव्वर भाई से पूछा।

‘इस लिए कि वह कमज़ोर दिल की है और बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। हार्ट अटैक भी हो सकता है।’

‘ओह।’ संक्षिप्त सा बोल कर आनंद चुप हो गया कि तभी बेटी के इलाज में लगा एक जूनियर डाक्टर तेज़ी से रेज़ीडेंट डाक्टर की ओर लपका और रेज़ीडेंट डाक्टर के कान में कुछ खुसफुसाया। रेज़ीडेंट डाक्टर लपक कर बेटी के बेड पर पहुंचा। आला लगा कर नब्ज़ टटोली। सीने पर हाथ रखा। आंखों की पुतलियों को टार्च जला कर देखा। सुस्त क़दमों से आ कर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। मुनव्वर भाई और आनंद की ओर गौर से देखा और आंखों के इशारे से बुलाया। मुनव्वर भाई ने आनंद से धीरे से कहा, ‘शायद डाक्टर साहब बुला रहे हैं।’

‘हां, आइए।’

‘नहीं आप देख लीजिए।’

‘ठीक है।’ कह कर आनंद रेज़ीडेंट डाक्टर के पास पहुंचा, ‘जी डाक्टर साहब।’

‘प्लीज़ बैठ जाइए।’ पास की कुर्सी इंगित करते हुए रेज़ीडेंट डाक्टर ने कहा।

‘जी!’ आनंद कुर्सी पर बैठते हुए बोला।’

‘शी इज नो मोर।’

‘ओह।’ आनंद ज़रा रुका और बोला, ‘एक मदद करेंगे?’

‘बोलिए।’

‘बेटी की मां को ज़रा यहां से हटा लें फिर इस बात को डिस्क्लोज़ करें।’

‘ओ.के.।’

‘थैंक यू।’ कह कर वह मुनव्वर भाई के पास आया और, ‘ज़रा सुनिए!’ कह कर उन्हें बुला कर वार्ड के बाहर बरामदे में ले गया।

‘जी आनंद जी!’

‘बेटी की लड़ाई तो समझिए हम हार गए।’ आनंद ने संकेतों में कहा।

‘अब कोई रास्ता नहीं?’ आनंद से लिपटते हुए मुनव्वर भाई बोले,‘अब कोई गुंजाइश नहीं?’

आनंद ख़ामोश रहा। मुनव्वर भाई रोने लगे। बोले, ‘कुछ तो करिए आनंद जी! आख़िर आप की इतनी पहुंच है!’

‘वहां तो किसी की पहुंच नहीं होती मुनव्वर भाई।’ हाथ ऊपर उठाते हुए आनंद बोला, ‘इसी पर तो किसी का वश नहीं होता।’ कहते हुए आनंद ख़ुद रो पड़ा। तभी सादिया की अम्मी भागी आईं और घबराई हुई बोलीं, ‘बिटिया बिलकुल हिल डुल नहीं रही।’

‘आनंद जी कोई सीनियर डाक्टर बुलवा दीजिए।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘हो सकता है बिटिया बच जाए।’

‘हां भइया।’ सादिया की अम्मी बोलीं, ‘हां, भइया ई लवंडा डाक्टरों के वश की नहीं रही। बिटिया के हाथ पांव भी ठंडे हो रहे हैं।

‘आनंद जी, प्लीज़ कुछ करिए।’

‘मुनव्वर भाई अब कैसे कहूं?’ आनंद उन्हें बाहों में संभालते हुए बोला, ‘समझ नहीं आता।’

‘अब आप ऐसे कहेंगे तो हम लोग क्या करेंगे?’ मुनव्वर भाई सादिया की अम्मी की तरफ़ देखते हुए भर्राई आवाज़ में बोले।

‘मुनव्वर भाई समझिए मेरी बात को।’ आनंद ने रुंधे गले से कहा, ‘बिटिया अब नहीं रही।’

‘क्या?’ कह कर सादिया की अम्मी वहीं फर्श पर माथा पकड़ कर बैठ गईं। लगीं बिलख-बिलख कर रोने। बोलती भी जा रही थीं और रोती भी, ‘हाय बिटिया तुम चली गई, अब हमारी सादिया कैसे जिएगी? कैसे रहेगी?’ इधर मुनव्वर भाई भी आनंद को पकड़े फफक रहे थे। आनंद भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया। रोते-रोते कहने लगा, ‘चुप रहिए मुनव्वर भाई, अपने को संभालिए।’

और मुनव्वर भाई सचमुच जल्दी ही संभल गए। न सिर्फ़ संभल गए, सादिया की अम्मी को भी संभाला। और समझाया कि, ‘सादिया को पता नहीं चले अभी। इस की ज़िम्मेदारी आप की है। नहीं कुछ और गड़बड़ होगा तो आप ही जानिएगा!’ मुनव्वर भाई अचानक डपटने पर आ गए, ‘देखिए गड़बड़ बिलकुल नहीं होने पाए!’

‘नाहीं भइया।’ सादिया की अम्मी बोलीं और फिर आनंद की तरफ़ मुख़ातिब हो कर घिघियाती हुई बोलीं, ‘पर भइया वह भी मां है। अपनी बच्ची की हालत वह नहीं जानेगी तो कौन जानेगा?’

‘हां, मुनव्वर भाई।’ आनंद बोला, ‘आख़िर कब तक छुपाएंगे?’ कहते हुए मुनव्वर भाई सख़्त हो गए। बोले, ‘आनंद जी बाक़ी फार्मेलिटीज़ प्लीज़ आप करवाइए, मैं बेगम को संभालता हूं।’ कह कर वह बेड के पास बैठी सादिया की तरफ़ चल पड़े। और आनंद रेज़ीडेंट डाक्टर की तरफ़। रेज़ीडेंट डाक्टर के पास जा कर आनंद बोला, ‘डाक्टर साहब जो भी फार्मेलिटीज़ करनी हो करवा दीजिए, बाडी दे दीजिए।’

‘इतनी जल्दी?’ डाक्टर ने बड़े सामान्य ढंग से पूछा।

‘क्यों? क्या हुआ?’

‘अरे भई, पोस्टमार्टम होगा।’

‘इतनी छोटी सी बच्ची, फूल सी बच्ची का भी पोस्टमार्टम।’ आनंद आंख फैला कर बोला।

‘हां, पोस्टमार्टम के लिए पेपर बन रहा है।’

‘पोस्टमार्टम से बचने का कोई रास्ता नहीं है?’

‘नहीं सर।’

‘क्यों?’

‘बर्न केस है।’

‘ओह।’

‘हां, आप यह ज़रूर कर सकते हैं कि पुलिस चौकी चले जाइए। वह अगर बिना पोस्टमार्टम के पंचनामा कर देते हैं तो रास्ता बन सकता है।’ रेज़ीडेंट डाक्टर ज़रा रुका और बोला, ‘हालां कि उम्मीद बहुत कम है।’

अभी यह सब चल ही रहा था कि तभी एक और बेड पर मातम छा गया। रोना पीटना शुरू हो गया। एक पैंतीस-चालीस साल का व्यक्ति दुनिया छोड़ चला था। उस की मां और विधवा दोनों ही रो-रो कर बेसुध हुई जा रही थीं। इधर सादिया की अम्मी की छटपटापहट बढ़ती ही जा रही थी। नातिन को खोने का ग़म, बेटी का दुख, अपनी मुश्किलें, दामाद का दबाव सब कुछ मिल कर एक अजीब सांघातिक तनाव उन के भीतर बो रहा था। उनकी छटपटाहट अब ऐसी थी, जैसे कोई लहुलुहान मछली। आनंद की छटपटाहट अलग थी। आज दोपहर बाद आफ़िस में दो मीटिंग्स थीं और दिन के साढ़े बारह बज रहे थे। और अब तक की स्थितियां बता रही थीं कि अब पूरा दिन यहीं ट्रामा सेंटर, पोस्टमार्टम हाउस और क़ब्रिस्तान के बीच ही गुज़ारना है। वह धीरे-धीरे चलते हुए बरामदे में पहुंचा जहां सादिया के साथ मुनव्वर भाई नीचे बिछी चद्दर पर बैठे उसे कुछ समझा रहे थे। इशारों से उसने मुनव्वर भाई को बुलाया और उन्हें कान में बताया कि, ‘पोस्टमार्टम होना है।’

‘क्या?’

‘हां।’

‘रुक नहीं सकता?’ वह धीरे से बुदबुदाए।

‘फ़िलहाल तो डाक्टर मना कर रहा है।’

‘चलिए अब जो नसीब में है, भुगतना ही पड़ेगा।’ वह फिर बुदबुदाए।

‘अच्छा यह बताइए कि बेटी को यहीं दफ़नाएंगे या ............?’

‘यहां क्यों?’

‘फिर?’

‘अपने शहर ले जाएंगे। वहां दफ़नाएंगे।’

‘यहां क्या दिक़्क़त है?’

‘अरे वहां अपने लोग हैं, यहां कौन है?’

‘कहिए तो मेरे कुछ मुस्लिम साथी हैं, यहां भी। सब इकट्ठे हो जाएंगे।’

‘ठीक तो नहीं रहेगा पर देखिए।’

‘ठीक है।’ कह कर आनंद ने अपने दो तीन मुस्लिम साथियों को फ़ोन मिलाना शुरू किया। एक के मोबाइल पर लगातार रिंग जा रही थी पर वह उठा नहीं रहा था। अंततः दूसरे साथी को मिलाया तो दो तीन राउंड रिंग के बाद उसने
उठाया। थोड़ी देर तक दोनों तरफ़ से सिर्फ़ ‘हलो-हलो’ ही होता रहा। क्यों कि दूसरी तरफ़ शोर बहुत था। अंततः वही बोला, ‘ज़रा होल्ड करो मैं शोर से किनारे हो कर बात करता हूं।’ फिर ज़रा रुक कर वह बोला, ‘हां, यार बोलो।’

‘यह कहां शोर में फंसे पड़े हो?’

‘कुछ नहीं अपने हीरो सद्दाम को फांसी हो गई है न। तो साले बुश की लानत मलामत कर रहे हैं हम सारे लोग।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘यहां विधानसभा के सामने बास्टर्ड का पुतला फूंकने की तैयारी है।’

‘तब चलो तुम पुतला फंूको।’ आनंद बोला, ‘फुर्सत पा जाओ तो बात करते हैं।’

‘ओ.के.।’

‘आनंद ने तीसरे साथी को फ़ोन किया। उस का फ़ोन तुरंत उठ गया। वह ख़ाली भी था। आनंद ने संक्षेप में सब कुछ बता दिया। और पूछा कि, ‘क्या मदद कर सकते हो?’

‘वो शिया हैं कि सुन्नी?’

‘कौन?’

‘वही जनाब जिन की बिटिया को दफ़नाना है?’

‘अब यह तो मैं ने उन से पूछा नहीं कभी।’ आनंद बोला, ‘पर दफ़नाने में भी शिया सुन्नी का झंझट है, मैं नहीं जानता था।’

‘नहीं झंझट जैसी कोई चीज़ नहीं है, थोड़ा सा एहतियात, थोड़ा सा कस्टम का हेरफेर है कुछ और नहीं।’

‘चलो मैं पूछ कर बताता हूं।’

‘ठीक है, वैसे ज़रा भी किसी को आसानी होती है तो वह अपने शहर और अपनी कम्यूनिटी के ही क़ब्रिस्तान में अपने परिवारीजनों के आसपास ही दफ़नाना पसंद करता है।’ वह बोला, ‘फिर भी जैसा हो बताइएगा मैं हाज़िर हो जाऊंगा
और सारे इंतज़ामात करवा दूंगा।’

‘अच्छी बात है।’ आनंद बोला, ‘पर तुम यह बताओ कि तुम शिया हो या सुन्नी?’

‘क्यों हमारी तहज़ीब, बातचीत से क्या लगता है आप को?’

‘मैंने तो कभी इस लिहाज़ से, किसी आइने में तुम्हें देखा ही नहीं।’ आनंद बोला, ‘मैं तो हिंदू मुसलमान में ही अमूमन कोई चश्मा नहीं लगाता। तो भी कस्टम की मैं क़दर करता हूं, इस लिए पूछ लिया।’

‘फ़ार योर काइंड इनफ़ार्मेशन आनंद जी आई एम अ शिया पर्सन।’

‘चलो ठीक है।’ आनंद बोला, ‘इसी लिए तुम घर पर मिल गए। नहीं तुम भी विधान सभा के सामने होते इस समय बुश का पुतला फूंकते हुए।’

‘नहीं आनंद जी, सद्दाम को हुई फांसी पर तो हमें बहुत ऐतराज़ नहीं है पर फांसी के तरीक़े पर तो हमें भी सख़्त ऐतराज़ है।’ वह बोला, ‘इस तरह उस की वीडियो क्लिपिंग तैयार करवाना और दुनिया भर के चैनलों पर दिखाना कतई अनह्यूमन है।’

‘चलो यह बहस अभी लंबी चलेगी।’ आनंद बोला, ‘ज़रूरत पड़ी तो तुम्हें बताऊंगा।’

‘आनंद जी एक मिनट।’ वह बोला, ‘अगर वह जनाब सुन्नी होंगे तब भी बताइएगा मैं वह बंदोबस्त भी करवा दूंगा।’

‘ठीक है। शुक्रिया।’ आनंद बोला, ‘पर एक बात बताऊं, हालां कि यह मौक़ा नहीं है फिर भी।’

‘प्लीज़ बताइए।’

‘फ़िराक़ गोरखपुरी को जानते हो?’

‘हां बड़े प्यारे और मोहतरम शायर हैं।’

‘जानते हो उन की अंतिम समय में ख़ास चिंता क्या थी?’

‘क्या?’

‘एम्स दिल्ली में वह एडमिट थे। और जब कोई जानने वाला उन से मिलने जाता था, तो वह उस का हाथ, हाथ में ले कर कहते थे कि यार देखना मैं हिंदू हूं, मुझे मर जाने पर जलाना, दफ़नाना नहीं, क्यों कि मैं हिंदू हूं।’

‘मैं समझ सकता हूं।’ वह बोला, ‘पर ऐसा क्यों था?’

‘वह अपने घर परिवार से दरअसल एक ख़ास दूरी बना बैठे थे।’

‘ओह, तभी।’

‘ठीक है, जैसा तय होता है, वैसा तुम्हें बताता हूं।’ कह कर आनंद रेज़ीडेंट डाक्टर की तरफ़ बढ़ा और पूछा, ‘पेपर्स तैयार हो गए हैं क्या?’

‘हां, शायद नीचे भेज दिया गया है। पता कर लीजिए। चाहिए तो एंबुलेंस ले लीजिए। स्टाफ़ से कह देता हूं।’

‘थैंक यू डाक्टर साहब!’ कह कर वह मुनव्वर भाई की तरफ़ लपका। उन्हें बताया कि, ‘पेपर्स तैयार हो गए हैं, पोस्टमार्टम के लिए बेटी को ले चलना है।’

‘ठीक है, पर इन का क्या करें?’ सादिया की तरफ़ इशारा करते हुए मुनव्वर भाई बोले।

‘ऐसा करते हैं कि इन्हें ले चल कर नीचे चाय की दुकान पर बैठा देते हैं और कह देगें कि मेडिकल कालेज में वेटिंलेटर के लिए ले जा रहे हैं।’

‘यही ठीक रहेगा।’ कह कर मुनव्वर भाई सादिया को ले कर सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ चले। सादिया ऐसे चल रही थी गोया उस के पैर में कांटे चुभे हों जब कि मुनव्वर भाई की चाल ऐसी थी गोया उनके पैरों में बेड़ियां डाल दी गई हों। और वह सहारे के लिए सादिया का कंधा थामे चल रहे हों।

ख़ैर, इधर पोस्टमार्टम हाउस ले जाने के लिए पेपर बन गए थे। उधर सादिया के नीचे जाते ही सादिया की अम्मी दहाड़ मार कर रो पड़ीं। दिल का सारा गुबार, सारा मलाल उन की रुदन में ऐसे फूट पड़ा जैसे कोई स्प्रिंग बहुत देर तक दबी-दबी छूटते ही उछल पड़ी हो। अब सादिया की अम्मी की रुलाई से पूरे वार्ड को ख़बर हो गई कि वो फूल से बच्ची गुज़र गई। ख़ैर, नीचे सादिया को छोड़ कर मुनव्वर भाई लौट आए और बेटी को पोस्टमार्टम हाउस ले जाने की तैयारी हो गई। एक दाई भी आ गई, बेटी की बाडी को ले जाने के लिए। पर तय यह हुआ कि नीचे सादिया को कोई शक न हो इस लिए सादिया की अम्मी ही बिटिया को गोद में ले कर एंबुलेंस में बैठें। सादिया की अम्मी से पूछा गया तो वह बोलीं, ‘हां हम लेते चलेंगे।’ बेटी की बाडी उस के ही नन्हें से रंगीन कंबल में लपेट दी गई। जैसी नन्हीं सी बेटी थी, वैसे ही नन्हें-नन्हें दो कंबलों के बीच उसे ऐसे लपेटा गया था गोया ठंड बहुत हो। वैसे ठंड थी भी। ख़ैर, सादिया की अम्मी को ले कर आनंद और मुनव्वर भाई बेटी के बेड पर पहुंचे। सादिया की अम्मी ने दिल कड़ा किया और बेटी की बाडी को उठाने के लिए बेड पर हाथ बढ़ाए भी पर अचानक बिजली की तेज़ी से हाथ ऐसे खींचा गोया करंट लग गया हो।

‘क्यों क्या हुआ?’

‘नहीं भइया हम नहीं छू पाएंगे।’ कहते हुए सादिया की अम्मी की आंखें फिर से छलछला गईं।

‘चलो हटो।’ सादिया की अम्मी को एक तरफ़ करते हुई दाई बोली, ‘ज़्यादा समय नहीं है हमारे पास।’ कह कर उसने बिटिया की कंबल में लिपटी बाडी को झट से उठा लिया। और ले कर चल पड़ी। पीछे-पीछे सादिया की अम्मी, मुनव्वर भाई और आनंद।

एंबुलेंस में आते ही दाई ने बेटी की बाडी को सीट पर रखने के बजाय नीचे धम्म से रख दिया। आनंद ने ऐतराज़ जताया तो वह बोली, ‘मिट्टी है। कोई ज़िंदा तो है नहीं।’ दाई की सख़्ती बरक़रार थी। बोली, ‘बहुत प्यार है तो गोदी में लई लो। सीट पर से तो हचका पड़ते ही लुढ़क जाएगी।’ यह सुनते ही सादिया की अम्मी ने बेटी की बाडी को ऐसे गोद में ले कर चिपका लिया गोया वह ज़िंदा हो।

नीचे जब एंबुलेंस में सब लोग बैठने लगे तो चाय की दुकान पर बैठी सादिया भी लपकी। मुनव्वर भाई ने यह देख लिया और सादिया की तरफ़ बढ़ गए। उस को समझाया और बैठा कर आए। आनंद ने देखा कि तब तक मुनव्वर भाई का छोटा सा बेटा और साला भी सादिया के साथ मेडिकल कालेज से आ कर बैठ गए थे। एंबुलेंस जब स्टार्ट हो गई तो आनंद ने ड्राइवर से कहा कि, ‘पुलिस चौकी चलना।’

‘नहीं भइया पोस्टमार्टम हाउस।’ दाई पूरी सख़्ती से बोली, ‘नौकरी थोड़े ही गंवानी है।’

‘अरे पुलिस से पंचनामा करवाएंगे।’

‘पंचनामा बाद में।’ दाई बोली, ‘पहले पोस्टमार्टम।’

‘लेकिन पुलिस की चिट्ठी भी तो होनी चाहिए।’ आनंद बोला, ‘वह तो ले लें।’

‘कुछ नहीं।’ दाई फिर पूरी सख़्ती से बोली, ‘हमका उलझाओ नहीं। पुलिस-वुलिस, चिट्ठी-पिट्ठी सब वहीं होइ जाएगा, पोस्टमार्टम हाउस में।’

और ड्राईवर एंबुलेंस को पोस्टमार्टम हाउस की ओर बढ़ा ले चला। रास्ते में कोई किसी से कुछ नहीं बोला। सभी निःशब्द। बड़े इमामबाड़े के पहले ही बाएं मोड़ पर एंबुलेंस पोस्टमार्टम हाउस के बाहर रुक गई। एंबुलेंस रुकते ही दाई सादिया की अम्मी की ओर मुख़ातिब हुई, ‘अंदर ले चलोगी कि हम ले लें।’

‘अंदर चीर फाड़ में?’ पूछती हुई सीने से बेटी की बाडी और ज़ोर से चिपकाती हुई सादिया की अम्मी कांप गईं।

‘हां।’ दाई बोली, ‘लाओ दो।’ बेटी की बाडी को ले कर दाई आगे-आगे चली और पीछे-पीछे मुनव्वर भाई सादिया की अम्मी और आनंद। पोस्टमार्टम हाउस में घुसते ही बदबू का एक तेज झोंका आया। लेकिन दाई इस से बेख़बर वहीं ज़मीन पर धूल में ही बेटी की बाडी को धम्म से रख कर ट्रामा सेंटर का दिया क़ाग़ज लिए बरामदे में चढ़ गई। मुनव्वर और आनंद ने हालां कि एक साथ ऐतराज़ जताया कि बेटी की बाडी को इस तरह ज़मीन पर वह न रखे। पर दाई ने दोनों के ऐतराज़ को दर किनार कर दिया। और बड़-बड़ करती बरामदे से लगे कमरे में गई जहां दो तीन डाक्टर और एक हवलदार बैठे थे। उसने वहां क़ाग़ज थमाया, बाहर बेटी की बाडी दिखाई और चलती बनी। उस के जाने के बाद सादिया की अम्मी ने बेटी की बाडी को जमीन पर से उठा कर फिर अपनी गोद में ले लिया और आनंद से बोली, ‘भइया इसका चीर फाड़ रुकवा दीजिए।’

‘देखिए कोशिश करते हैं।’ कह कर वह डाक्टरों के पास गया, परिचय दिया।

‘बैठिए सर।’ कह कर डाक्टरों ने उसे एक कुर्सी इंगित कर बैठने को कहा।

‘देखिए एक रिक्वेस्ट थी।’ कुर्सी पर बैठते हुए आनंद ने कहा, ‘अगर बिना पोस्टमार्टम के ही बेटी की बाडी सौंप दिया जाए तो बड़ी कृपा होगी।’

‘सर, ऐसा था तो यहां बाडी लानी ही नहीं थी।’ एक डाक्टर बोला, ‘वहीं ट्रामा सेंटर से ही डेथ सर्टिफ़िकेट सीधे बनवा लेना चाहिए था।’

‘ऐसा हो सकता था!’

‘वहां के डाक्टर चाहते तो ज़रूर हो सकता था।’

‘कहा तो था मैं ने।’

‘तो सर, अब यहां जब उन लोगों ने भेज दिया है तो पोस्टमार्टम तो होगा।’

‘अरे छोटी सी, फूल सी बच्ची है, कुछ तो दया कीजिए।’

‘नहीं सर।’ डाक्टर बोला, ‘हम कुछ नहीं कर सकते। हां, एक रास्ता यह हो सकता था कि आप पुलिस से कह कर वहीं पंचनामा करवा सकते थे, पर अब तो शायद पुलिस भी न माने। फिर भी आप ट्राई कर लीजिए।’

‘हां, यह हम ज़रूर कर सकते हैं कि एक सिंबालिक पोस्टमार्टम कर दें।’ एक दूसरा डाक्टर बोला, ‘ज़्यादा चीर फाड़ नहीं करें।’

‘चलिए यही कर दीजिए पर जल्दी कर दीजिए।’ आनंद बोला।

‘बस पुलिस का पेपर जितनी जल्दी आ जाएगा, उतनी जल्दी हो जाएगा।’

‘अभी पुलिस का भी कोई पेपर आएगा।’

‘हां, बिना उस के हम कुछ नहीं कर सकते।’ डाक्टर बोला, ‘न हो तो आप लोग ख़ुद पुलिस चौकी पर चले जाइए। काम शायद जल्दी हो जाए। नहीं, जाने कितनी देर लग जाए।’

‘बाडी यहीं रहने दें?’

‘हां, बाडी तो अब हमारे ही पास रहेगी।’

अब सवाल उठा कि बेटी की बाडी को कहां रखा जाए। एक स्वीपर आया और बाडी को ले कर एक हाल में गया जहां तमाम नंग धड़ंग लाशें पड़ी हुई थीं, ऐसे जैसे लाशों की कोई नुमाइश लगी हो। किसिम-किसिम की लाशें। यह नज़ारा देख कर आनंद जैसे हिल गया। बदबू का एक बवंडर सा उठा और आनंद उस हाल से सांस रोके बाहर आ गया। बाहर आ कर डाक्टर्स रूम में गया और डाक्टर से कहा कि, ‘बेटी को उस हाल की जगह कहीं और नहीं रखा जा सकता?’

‘अब बेटी कहां है सर?’ डाक्टर बोला, ‘अब वह बाडी है, सिर्फ़ एक लाश।’

‘तो भी लाशों के उस जंगल से उसे हटाया नहीं जा सकता?’

‘कहां रखना चाहते हैं आप?’ एक दूसरा डाक्टर तिलमिलाते हुए तल्ख़ हो कर बोला, ‘क्या आप चाहते हैं यहीं रख लें?’

‘ज़रा तमीज़ से बात कीजिए।’ आनंद उखड़ गया।

‘एक मिनट।’ पहले वाला डाक्टर आनंद से बोला, ‘नाराज़ मत होइए, बात समझिए।’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ और आनंद को ले कर कमरे से बाहर आ गया। पीछे के एक कमरे में आया। वहां कुछ कबाड़ रखा था। उसने पूछा, ‘यहां रखवा दें?’

‘बिलकुल?’ अलमारी का एक ख़ाना दिखाते हुए आनंद बोला, ‘यहां रखवा दीजिए।’

‘ठीक है।’ कह कर उसने वहीं पान मसाले की पीक थूकी और उस स्वीपर को बुला कर कहा कि, ‘इनका केस यहां ला कर रख दो।’ फिर आनंद की ओर मुख़ातिब होते हुए बोला, ‘पर आप जानते हैं?’ वह बिना रुके बोला, ‘अल्टीमेटली काटने के लिए वहीं ले जाना होगा।’

‘तब की तब देखेंगे।’ आनंद बोला, ‘तब तक तो उसे सम्मान पूर्वक रखिए।’

‘चलिए आप ख़ुश हैं?’ डाक्टर बात को विराम देते हुए बोला।

‘अब इसमें ख़ुश होने की क्या बात है?’

‘कोई बात नहीं, आप पुलिस से पेपर ले आइए फिर हम लोग भी कुछ करें।’

‘ठीक है।’ कह कर आनंद मुनव्वर भाई को ले कर बाहर चलने लगा तो सादिया की अम्मी बोलीं, ‘भइया क्या हम यहीं रहें? कि हम भी साथ चलें?’

‘नहीं आप यहीं रहें।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘हम लोग अभी आते हैं।’

‘लेते चलते हैं इन को भी।’ आनंद ने सलाह दी।

‘नहीं-नहीं आप यहां बेटी को देखिए।’ मुनव्वर भाई ने जैसे फ़रमान जारी किया।

‘लेकिन...।’

‘नहीं, आनंद जी आप ज़रा समझिए कि कहीं उधर बेग़म ने देख लिया हम तीनों को एक साथ तो?’ वह बोले, ‘अभी तो बता सकते हैं कि अम्मी बेटी के साथ हैं।’

‘ओह।’

‘अब हम यहां बिटिया को क्या देखेंगे।’ साड़ी का पल्लू और शाल ठीक करती हुई सादिया की अम्मी बोलीं। वह जैसे पोस्टमार्टम हाउस की आबोहवा और बदबू से उकता गई थीं। लग रहा था कि अगर उन का वश चले तो वह यहां से भाग लें फ़ौरन। लेकिन मुनव्वर भाई के फ़रमान ने उन के हाथ-पांव बांध दिए थे।

मुनव्वर भाई के साथ आनंद बाहर आया। रिक्शा लिया और मेडिकल कालेज की पुलिस चौकी के लिए चल पड़ा।

रिक्शा वाला रिक्शा बहुत धीरे-धीरे चला रहा था। आनंद ने उस से कहा भी कि, ‘भइया ज़रा जल्दी चलो।’ पर वह ऐसे ही धीरे-धीरे चलता रहा। रिक्शे वाले की चाल से परेशान होकर मुनव्वर भाई बोले, ‘मैं ने पहले ही कहा था कि गाड़ी
लेते चलिए।’

‘अब मुझे क्या पता था कि एंबुलेंस छोड़ कर चली आएगी।’ आनंद बोला, ‘आप को पता है कि इतने साल हो गए लखनऊ में रहते हुए पर पहली बार पोस्टमार्टम हाउस आया हूं। और लखनऊ क्या दुनिया के किसी भी पोस्टमार्टम हाउस पहली बार आया हूं।’

‘अरे यह भी कोई आने की जगह है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘मेरा साबक़ा भी पहली बार ही पोस्टमार्टम हाउस से पड़ा है। क़ब्रिस्तान और श्मशान घाट तो कई बार गया हूं पर पोस्टमार्टम हाउस पहली बार।’

‘चलिए अब किया क्या जा सकता है।?’

‘नहीं आनंद जी ज़रा नेतागिरी भारी पड़ गई।’

‘वो कैसे?’

‘असल में मुख्यधारा की राजनीति से भले ख़ारिज हो गया होऊं पर ख़ून से नेतागिरी नहीं गई है। मेरी सांस-सांस में है राजनीति।’ वह बोले, ‘असल में डाक्टर को अपना कांग्रेसी परिचय दे दिया तो वह थोड़ा सक्रिय तो हुआ पर असली चोट दे दी उसने फूल से बच्ची का पोस्टमार्टम करवाने को लिख कर। सोचा होगा कि बाद में कहीं कोई बवाल न हो सो पोस्टमार्टम करवा कर मामला पक्का कर लें।’ वह बोलते रहे, ‘एक ग़लती और हो गई कि डाक्टर को या दाई को ही पैसे दे कर बेटी को ले लिए होते। या फिर पोस्टमार्टम हाउस में ही किसी दलाल को पकड़ कर मामला रफ़ा-दफ़ा करवा लिए होते।’

‘यह आप कह रहे हैं?’

‘हां, मैं ही कह रहा हूं।’ मुनव्वर भाई बगलें झांकते हुए बोले।

‘तो आप की आइडियालजी?’

‘आइडियालजी?’ मुनव्वर भाई अपनी हिप बाईं तरफ़ से हलका सा उठा कर बदबूदार हवा ख़ारिज करते हुए बोले, ‘ऐसे ही धीरे-धीरे आइडियालजी भी ज़िंदगी से ख़ारिज होती गई है, ऐसे ही बदबू मारती हुई।’

‘अफ़सोस नहीं होता?’ नाक दबाते हुए वह बोला।

‘होता तो है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘पर इस बात पर कि साली आइडियालाजी ज़िंदगी में दाखि़ल ही क्यों हुई?’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘आइडियालाजी, ने, नैतिकता और मूल्यों ने मेरा इतना नुक़सान किया है कि क्या बताऊं? साली जवानी ग़ारत हो गई। न इस ओर रहा, न उस ओर। शुरू ही से जो बेशर्म, भ्रष्ट और बेगै़रत रहा होता तो ज़िंदगी में इतनी असुविधा, इतनी क़िल्लत, इतनी ज़िल्लत न उठानी पड़ती।’ वह बोले, ‘आप जानते हैं कि अगर आइडियालाजी, नैतिकता, मूल्य जैसे खोखले शब्दों की आमद मेरी ज़िंदगी में नहीं हुई होती तो मैं भी एक कामयाब नेता होता आज की तारीख़ में। और जो मैं कामयाब नेता होता तो आज जो यह मेरी बेटी मरी है न, नहीं मरी होती।’ वह आनंद की ओर मुड़ कर बोले, ‘बोलिए मरी होती? आप ही बताइए?’

आनंद चुप रहा। क्या बोलता भला?

‘आप को बताऊं आज सिर्फ़ सद्दाम को फांसी नहीं हुई है, मेरी फूल सी बेटी के मर जाने के बाद आज मेरे बचे खुचे वसूलों को भी फांसी हुई है।’

मेडिकल कालेज की पुलिस चौकी के सामने रिक्शा खड़ा हो गया तो मुनव्वर भाई चुप हो गए। पुलिस चौकी में जाने पर पता चला कि अभी तक पोस्टमार्टम हाउस से कोई काग़ज़ नहीं आया है।

मुनव्वर भाई ने आनंद की ओर तीखी नज़रों से देखा और बोले, ‘अब क्या किया जाए?’

‘फिर से पोस्टमार्टम हाउस चला जाए और क्या?’

‘अब की तो अपनी कार ले लीजिए।’

‘आइए ले लेते हैं।’ कह कर आनंद ट्रामा सेंटर की तरफ़ चला। ट्रामा सेंटर के बाहर खड़ी कार जब वह स्टार्ट करने लगा तो मुनव्वर भाई बोले, ‘आप का ड्राइवर कहां गया? क्या छुट्टी पर है?’

‘नहीं हटा दिया है।’

‘क्यों?’

‘ख़र्चा कम करने के लिए।’ कहते हुए आनंद के पेट में भूख की एक मरोड़ सी उभरी। सड़क के किनारे कुछ खाने पीने की चीजें़ देख कर उस का मन हुआ कि कुछ ले कर खा पी ले। क्यों कि अब भूख उसे सता रही थी। पर यह
मौक़ा ठीक नहीं लगा खाने-पीने के लिए सो वह ज़ब्त कर गया। लेकिन मुनव्वर भाई खाना खा लिए थे, उन के पेट में भूख की मरोड़ नहीं थी सो वह बोल रहे थे और लगातार बोल रहे थे, ‘आप तो नौकरी कर रहे हैं आनंद जी। भाभी जी भी नौकरी कर रही हैं फिर भी आप को ख़र्चे कम करने पड़ रहे हैं?’

‘हां, मुनव्वर भाई।’ आनंद बोला, ‘राजनीति छोड़ कर नौकरी की ही इसी लिए कि आइडियालाजी, मूल्य, नैतिकता को तिलांजलि दिए बिना या कहूं कि बिना पतन के परिवार की ज़िम्मेदारियां पूरी कर सकूं।’

‘तो आप ने भी मुझे पतन के पलीते में बांध दिया?’ वह आंखों में आग भर कर बोले।

‘नहीं मैं ने ऐसा कुछ नहीं कहा।’ आनंद ने संजीदगी से कहा, ‘मैं तो अपनी सीमाएं बता रहा हूं।’

‘चलिए शुक्रिया।’

‘किस बात का?’

‘कि आप ने मेरी सीमाओं में परवेस नहीं किया।’ मुनव्वर भाई प्रवेश को आदतन कि इरादतन परवेस ही बोलते थे। वह बोले, ‘फिर भी आप प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते हैं तो क्या मूल्य, नेैतिकता, आइडियालाजी को गंवाए बिना नौकरी करते हैं? कोई कंप्रोमाइज़ नहीं करते?’

आनंद चुप रहा।

‘नो कंप्रोमाइज़?’ मुनव्वर भाई ने अपना सवाल फिर दुहराया। ऐसे गोया वह सवाल नहीं कर रहे हों, हथौड़ा मार रहे हों। और यह हथौड़ा भी आनंद के दिमाग़ पर इस क़दर पड़ा कि वह हड़बड़ाहट में बिना क्लच लिए गेयर बदलने लगा। गेयर बाक्स टूटते-टूटते बचा। हड़बड़ा कर उसने एक्सीलेटर छोड़ कर क्लच पर पैर लगाया और कस कर दबाया। लेकिन तब तक गाड़ी बंद हो गई। पीछे से दूसरी गाड़ी ने टक्कर मार दी। गेयर बाक्स टूटने से बचा तो जो बंपर पहले से टूटा था, और टूट गया। खैर गाड़ी उसने फिर से स्टार्ट की। बुद्धा पार्क में बच्चों को खेलते देख कर मुनव्वर भाई आह भर कर बोले, ‘अगर मेरी बेटी भी ज़िंदा होती तो ऐसे ही खेलती न?’

‘हूं।’ मुंह गोल करते हुए आनंद बोला। फिर दोनों चुप हो गए।

पोस्टमार्टम हाउस के पास पहुंच कर सड़क के एक किनारे गाड़ी खड़ी कर दोनों पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। हैरान परेशान सादिया की अम्मी बोलीं, ‘क्या हुआ काम हो गया?’

‘कहां हुआ?’ मुनव्वर भाई खीझते हुए डाक्टरों के पास गए और भड़कते हुए बोले, ‘पुलिस चौकी में अभी तक तो कोई काग़ज़ आप का पहुंचा नहीं?’

‘पहुंचेगा कैसे?’ एक डाक्टर विवाद से बचता हुआ बोला, ‘यहां से काग़ज़ ले कर जाने वाला दीवान अभी तक यहां से गया ही नहीं।’ डाक्टर ने उसे बाहर की तरफ़ इंगित करते हुए कहा, ‘वो देखिए वहां खड़ा मोबाइल पर बात कर रहा है।’

‘पर आप तो कह रहे थे कि काग़ज़ गया।’

‘हां, मैंने तो तभी भेज दिया था। पर जब यह यहां से गया ही नहीं, तो हम क्या कर सकते हैं?’ डाक्टर बोला, ‘जाइए उसी से पूछिए।’

‘अजीब हाल है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘किसी की कोई जवाबदेही है ही नहीं।’ वह ज़रा रुके और बड़बड़ाए, ‘सारा शोग़, सारा तनाव ग़ुस्से और फज़ीहत में बदल दिया है। जैसे यहां सब के सब अनह्यूमन हो गए हैं।’ बड़बड़ाते हुए ही वह दीवान के पास गए पर वह मोबाइल पर ही लगा रहा। जब ज़्यादा हो गया तो मुनव्वर भाई बड़ी दयनीयता से हाथ जोड़ कर दीवान से बोले, ‘कुछ मानवता भी है आप में बची हुई या वह भी शर्म में घोल कर पी गए हैं।’

‘आप चलिए बस मैं पहुंच रहा हूं।’ मोबाइल पर बात करते हुए ही वह पूरी लापरवाही से ऐसे बोला जैसे उसने मुनव्वर भाई की बात सुनी ही नहीं हो, बस देखते ही डायलाग मार दिया हो।

‘आप के पास अगर समय न हो तो काग़ज़ मुझे दे दीजिए, मैं ही पहुंचा देता हूं।’ मुनव्वर भाई ने फिर याचना की।

‘काग़ज़ आप को कैसे दे दूं?’ वह उलटे घुड़प कर बोला, ‘कहा न चलिए मैं पहुंच रहा हूं दो काग़ज़ और तैयार हो रहे हैं। अकेले कोई आप का ही केस नहीं है।’

‘आइए मेरे साथ मेरी गाड़ी में चले चलिए और बातें भी करते रहिए।’

‘मोटर साइकिल है मेरे पास।’ वह फिर लापरवाही से बोला, ‘कहा न अभी दो केस का लेटर और लेना है।’

‘बड़े हृदयहीन हैं आप लोग भई।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘यहां बिटिया मर गई है और इन लोगों ने उसे केस बना दिया है। बताइए।’ आनंद की तरफ़ देखते हुए रुंधे गले से वह बोले, ‘बताइए क्या ज़माना आ गया है।’ और फिर फफक कर रो पड़े।

आनंद ने उन्हें दिलासा दिलाते हुए चुप करवाया और बोला,‘क्या कीजिएगा सिस्टम ही चौपट हो गया है। और सिस्टम के तराज़ू में मानवीयता नहीं अमानवीयता का ही बोलबाला रहता है।’

‘अब क्या करूं बेटी की मौत ने तोड़ दिया है आनंद जी।’ कहते हुए मुनव्वर भाई फिर फफक पड़े। आनंद ने उन्हें फिर पकड़ा और उन का हाथ पकड़े पोस्टमार्टम परिसर के बाहर आने लगा तो सादिया की अम्मी भी पीछे-पीछे आती हुई बोलीं, ‘हम भी आ जाएं भइया।’

‘आ जाइए।’ आनंद ने धीरे से कहा।

मुनव्वर भाई ने भी कोई ऐतराज़ नहीं किया।

गाड़ी स्टार्ट करने के पहले आनंद ने घड़ी देखी शाम के पौने चार बज गए थे। वापसी में रास्ते में फिर बुद्धा पार्क पड़ा। मुनव्वर भाई ने फिर बड़ी हसरत से आइसक्रीम खाते बच्चों को देखा पर अब की वह चुप रहे।

रेलवे पुल के नीचे तिराहे पर वह गाड़ी मेडिकल कालेज की तरफ़ मोड़ ही रहा था कि मुनव्वर भाई कार में रेडियो पर बज रहे ‘कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नयना’ की ओर इंगित करते हुए कहा, ‘आनंद जी इसे तो बंद कर दीजिए।’ वह रुके और बोले, ‘या कि आप भी अमानवीय हो गए हैं?’

‘सॉरी।’ आनंद बोला, ‘वेरी सॉरी। असल में गाड़ी स्टार्ट के साथ ही यह भी आटोमेटिक स्टार्ट हो जाता है।’ कहते हुए उसने मोड़ गुज़रने के बाद रेडियो बंद कर दिया।

‘हां भई सिस्टम है।’ मुनव्वर भाई ऐसे बुदबुदाए गोया वह आनंद को जूता मार रहे हों।

आनंद यह सुन कर थोड़ा आहत हुआ पर ख़ामोश रहा मुनव्वर भाई के दुख को समझते हुए।

पुलिस चौकी पहुंच कर आनंद ने चौकी इंचार्ज को अपना परिचय दिया, सारी बात बताई, साथ ही दीवान की लापरवाही और बदसलूक़ी भी।

चौकी इंचार्ज से आनंद ने कहा कि ‘डायन भी सात घर छोड़ देती है पर आप लोग तो डायन को भी फेल किए हुए हैं।’ उसने मुनव्वर भाई की ओर इंगित करते हुए कहा कि, ‘बेटी का शोक भी इन की फ़ज़ीहत में कनवर्ट हो गया है।’ कहते हुए उसने मोबाइल निकाल लिया और पूछा कि, क्या अब इस काम के लिए भी एस.एस.पी. या आई.जी., डी.आई.जी. से कहलवाना पड़ेगा।’

‘आप नाराज़ न हों।’ चौकी इंचार्ज बोला, ‘कृपया बैठें। इतना ऊपर जाने की ज़रूरत नहीं है। और कोई काम एस.एस.पी. या डी.आई.जी. के कहने पर करने से अच्छा है आप ही के कहने से कर दें।’ वह बोला, ‘मैं ख़ुद दीवान को बुलाता हूं।’ कह कर अपने मोबाइल से दीवान का मोबाइल मिलाने लगा। मोबाइल से नंबर मिलते ही उसने दीवान को डपटना शुरू कर दिया। गालियां दीं और कहा कि, ‘आदमी नहीं पहचानते हो, हर जगह शिकार ढूंढते हो।’ उसने जोड़ा, ‘जो भी काग़ज़ मिल गया हो, न मिला हो उस से हमें कोई मतलब नहीं, दस मिनट के अंदर हमें तुम्हारा थोबड़ा चौकी में दिख जाना चाहिए।’ कह कर वह आनंद की तरफ़ पलटा, ‘चाय पिएंगे।’

‘ये चाय पीने की न तो जगह है, न यह मौक़ा है।’ आनंद ने धीरे से कहा।

‘राइट-राइट।’ कहते हुए वह बोला, ‘आप को पोस्टमार्टम हाउस जाना ही नहीं चाहिए था। सीधे यहीं आना चाहिए था। हम फ़ौरन काग़ज़ बनवा देते। फिर आप गए होते पोस्टमार्टम हाउस।’

‘आप यहां होते तब तो।’ आनंद बोला, ‘हम लोग एक बार यहां से लौट चुके हैं। आप का मोबाइल नंबर तक तो यहां किसी को मालूम नहीं था, या बताना नहीं चाहते थे ...... अब क्या कहूं?’

‘पुलिस की नौकरी ससुरी है ही ऐसी।’ चौकी इंचार्ज़ बुदबुदाया।

‘ख़ैर यह बताइए कि ज़रा हमारा एक फ़ेवर कर लेंगे?’ आनंद ने कहा, ‘आप चाहें तो अभी भी मेरी मदद कर सकते हैं।’

‘जी बिलकुल। बताएं!’

‘यही कि पोस्टमार्टम से बचा दें बेटी की बाडी को!’

‘मुश्किल है।’ मुंह सिकोड़ते हुए वह बोला, ‘आप को ट्रामा सेंटर में ही सीधा डेथ सर्टिफ़िकेट बनवा लेना था। पर अब तो काग़ज़ पोस्टमार्टम हाउस तक पहुंच चुका है।’

‘नहीं, पोस्टमार्टम हाउस वाले भी और ट्रामा सेंटर के डाक्टर्स भी कह रहे थे कि पुलिस अगर चाहे तो पोस्टमार्टम के बिना भी काम चल सकता है। आप सीधा पंचनामा बनवा सकते हैं।’

‘सब साले अपनी-अपनी बला टालते हैं।’

‘आख़िर फूल सी बच्ची है। बमुश्किल साल सवा साल की।’ आनंद ने भावुक हो कर कहा, ‘हम पर न सही, उसी पर तरस खा लीजिए।’

‘नो सर।’ चौकी इंचार्ज़ बोला, ‘पोस्टमार्टम तो करवाना पड़ेगा। तभी पंचनामा बनेगा। हां, इतना ज़रूर करवा देंगे कि सिंबालिक पोस्टमार्टम हो, ज़्यादा चीर फाड़ न हो और जल्दी हो जाए।’

‘कोई रास्ता नहीं बनता।’ आनंद ने फिर रिक्वेस्ट की।

‘असल में बर्न केस है न। मेडिकोलीगल केस हो गया। करना तो पड़ेगा पोस्टमार्टम।’ कहते हुए चौकी इंचार्ज अचानक चहका, ‘देखिए हमारा दीवान भी आ गया।’

‘जय हिंद सर!’ दीवान ने आते ही चौकी इंचार्ज को सैल्यूट ठोका।

‘जय हिन्द!’ चौकी इंचार्ज बोला, ‘फ़टाफ़ट इन का काग़ज़ तैयार कर लाओ और जा कर ख़ुद खड़े हो कर सिंबालिक पोस्टमार्टम करवाओ। विद आउट टाईम।’

‘राईट सर।’

‘तुम भी इस की मदद करो भई।’ एक दूसरे दीवान से चौकी इंचार्ज ने कहा।

थोड़ी देर में पेपर्स बन गए। मुनव्वर भाई और सादिया की अम्मी को ले कर आनंद फिर पोस्टमार्टम हाउस चला। पीछे-पीछे दीवान भी पेपर्स ले कर अपनी मोटरसाईकिल से चला। हालां कि वह जल्दी ही आनंद की कार से आगे निकल गया। जाने गुस्से में था कि तेज़ी में। पर निकल गया।

रास्ते भर तीनों निःशब्द थे। कार का रेडियो बंद था। पर ट्रैफ़िक का शोर ज़्यादा था। शाम हो जाने से ठंड भी पांव पसार रही थी। पक्षियों के झुंड अपने-अपने घरों की ओर जा रहे थे और आनंद, मुनव्वर भाई, सादिया की अम्मी पोस्टमार्टम हाउस की ओर।

पक्का पुल के पास वाले मोड़ पर आनंद ने देखा कि सूरज डूबते-डूबते लाल हो रहा था। उसने सोचा और शिद्दत से सोचा कि सूरज उगते समय भी लाल और डूबते समय भी लाल क्यों होता है? उस के इस तरह लाल होने के भी क्या कोई निहितार्थ हैं? यही सोचते-सोचते उसने कार पोस्टमार्टम हाउस के पास रोक कर सड़क के किनारे पार्क कर दी।

उधर सूरज लाल हो कर डूब रहा था और इधर मुनव्वर भाई, सादिया की अम्मी और आनंद बुझ रहे थे। थकावट, शोक, असुविधाओं और सिस्टम के जाल ने इन तीनों को ज़ीरो वाट के बल्ब सरीखा बना दिया था। जाने सादिया बेचारी का क्या हाल होगा? आनंद ने सोचा और उसे अपनी अम्मा याद आ गई। जो वह लखनऊ में बीमार होता है या किसी क़िस्म की तकलीफ़ में पड़ता है, बच्चे भी बीमार होते हैं, या चोट खा जाते हैं तो गांव में बैठी अम्मा बिना किसी सूचना के ही खाना-पीना छोड़ बैठती है। उस के दिल में खलबली मच जाती है। कहती है, ‘ज़रूर कहीं कुछ गड़बड़ हुआ है, खाना अच्छा नहीं लग रहा।’

तो क्या सादिया के दिल में भी खलबली नहीं मची होगी? आख़िर वह भी तो मां है। और उस की फूल सी बेटी तो बीमार भी नहीं है, दुनिया से कूच कर गई है। क्या उस के स्तन में दूध नहीं भटक रहा होगा? अपनी बेटी के लिए उस का दिल नहीं तड़प रहा होगा? जमील ख़ैराबादी की गज़ल का एक शेर उसे याद आ जाता है, ‘इक-इक सांस अपनी चाहे नज्ऱ कर दीजै/मां के दूध का हक़ फिर भी अदा नहीं होता।’ तो यह सादिया का दूध अपनी बेटी के लिए कैसे नहीं तड़प रहा होगा? उसने सोचा। और यह भी सोचा कि मुनव्वर भाई सादिया के मातृत्व के साथ क्या नाइंसाफ़ी नहीं कर रहे? आखि़र बेटी की मौत मां से कब तक छुपा पाएंगे? पोस्टमार्टम हाउस के बरामदे में खड़ा वह मुनव्वर भाई से पूछता भी है तो वह एक ठंडा सा जवाब देते हैं, ‘जब तक संभव बनेगा, तब तक।’

आनंद की देह में जाड़ा और पसर जाता है।

पोस्टमार्टम हाउस में अब की तिबारा खडे़-खड़े आधा घंटे हो गए हैं। सादिया की अम्मी बेतरह थक गई हैं। लगता है खड़े-खडे़ वह गिर जाएंगी। आनंद उनसे रिक्वेस्ट करता है कि वह चल कर कार में बैठ जाएं। वह मान जाती हैं। सादिया की अम्मी को कार की पिछली सीट पर वह लेट जाने को कहता है तो वह पैर मोड़ कर शाल ओढ़ कर लेट जाती हैं। वह वापस पोस्टमार्टम हाउस के बरामदे में आ जाता है। थोड़ी देर खड़े-खड़े जब वह थक जाता है तो सारी थकावट, सारे शोक का गुस्सा भीतर बैठे डाक्टरों पर उतारते हुए जैसे फट पड़ता है, ‘आख़िर कब होगा बेटी का पोस्टमार्टम।’

‘बस थोड़ी देर और!’

‘सुनते-सुनते कान पक गए हैं कि थोड़ी देर और, थोड़ी देर और।’

‘आप प्लीज़ बाहर जाएंगे?’ एक बुज़ुर्ग सा डाक्टर धीरे से बोलता है।

‘नहीं, हम नहीं जाएंगेे।’ आनंद चीख़ा, ‘क्यों जाएं बाहर हम?’

‘हमें थोड़ा काम कर लेने दें।’ वह हाथ में लिए कुछ चार्ट दिखाता हुआ कहता है, ‘कुछ टैली हैं, कुछ क्वैरीज़ हैं, इन को पूरा कर लें तभी आप का केस हो पाएगा।’

‘इसे बाद में नहीं कर सकते?’

‘नही, आब्ज़र्वेंशंस ग़लत हो जाएंगे।’ वह बोला, ‘मर्डर है कि सुसाइड इन्हीं डिटेल्स की टैली पर डिपेंड करेगा। प्लीज़।’

‘आनंद जी प्लीज़!’ मुनव्वर भाई भी आनंद के कंधे पर धीरे से हाथ रखते हुए बोले।

आनंद डाक्टरों के कमरे से बाहर आ कर बरामदे में फिर खड़ा हो गया। कि तभी पुलिस चौकी वाला दीवान दिख गया। बाक़ी गुस्सा उसने उस दीवान पर निकाला। बोला, ‘तुम लोग बिना पैसा लिए लाश भी नहीं छोड़ते?’

‘क्या करें साहब नीचे से ऊपर तक सबका बंधा है।’ वह पूरी ढिठाई और बेशर्मी से बोला, ‘आप लोग बड़े आदमी हैं, इतना भी नहीं समझते।’ जहां पैसा के बिना एक क़दम नहीं उठता वहां आप लोग दबाव और सिफ़ारिश से काम करवाने में लगे हैं।’

‘तो पहले ही बताए होते।’ मुनव्वर भाई खुसफुसाए।

‘क्या बताते आप लोग तो नेतागिरी झाड़ रहे थे।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘वहीं पुलिस चौकी में ही चढ़ावा चढ़ा दिए होते तो पोस्टमार्टम हाउस आने की ज़रूरत ही नहीं पढ़ती। वहीं तुरंत-फुरंत पंचनामा हो गया होता। पर आप लोग चौकी इंचार्ज की चिकनी चुपड़ी बातों में फंस कर सब कुछ फ्ऱी में करवाने में लगे रहे।’

‘तो अब से नहीं हो सकता?’ मुनव्वर भाई खुसफुसाए।

‘अब क्या होगा?’ वह बिदका और बोला, ‘चौकी इंचार्ज से बात करिए।’

‘उस का मोबाइल नंबर दो।’

‘पर यहां डाक्टरों को भी पटाना पड़ेगा।’ दीवान बुदबुदाया।

‘कुल ख़र्च कितना हो जाएगा?’

‘यही कोई दस हज़ार।’ दीवान बुदबुदाया और धीरे से वहां से सरकने लगा।

‘चौकी इंचार्ज़ का मोबाइल नंबर बताओ।’ डपटता हुआ आनंद बोला।

‘नंबर ले कर क्या करेंगे?’ दीवान बुदबुदाया, ‘सारा काम यहीं हो जाएगा।’

‘तो भी नंबर तो बता दो।’

‘ले लीजिए।’ कह कर वह बोला, ‘हो सकता है, वह कुछ बढ़ा दें।’ और चौकी इंचार्ज का मोबाइल नंबर दे दिया। आनंद ने वह नंबर तुरंत मिलाया। पर स्विच आफ़ मिला। उसने बार-बार मिलाया और हर बार स्विच आफ़ मिला। वह आजिज़ आ गया। और बौखलाया हुआ डाक्टरों के कमरे में घुसा। बोला, ‘आख़िर क्या रेट है आप लोगों का जल्दी पोस्टमार्टम करने का?’

‘क्या बात कर रहे हैं?’ एक डाक्टर उसी तल्ख़ी से बोला।

‘नहीं यह बताइए कि क्या तनख़्वाह नहीं मिलती आप लोगों को?’

‘मिलती है, बिलकुल मिलती है।’ कहते हुए तीनों डाक्टर एक साथ उठ खड़े हुए।

‘तो फिर बिना रिश्वत के ख़र्चा नहीं चलता?’ आनंद चीख़ा, ‘लाशों पर भी रिश्वत! हद है!’

आनंद चीख़ रहा था। इस चीख़ में गुस्सा भी था और भूख भी। साथ ही मूल्यों में जीने की घिघियाहट भी। इधर आनंद चीख़ रहा था, उधर दीवान दुम दबा कर मोटरसाईकिल स्टार्ट कर रहा था वहां से भागने के लिए। इतने में एक डाक्टर आनंद के पास हाथ जोड़े आया.. बोला, ‘दस मिनट का समय देंगे?’

‘तब से समय ही तो दे रहा हूं।’ आनंद खिन्न हो कर बोला।


डाक्टर कमरे से निकल कर अंदर हाल में गया जहां लाइन से लाशें रखी हुई थीं। एक स्वीपर को पकड़ कर लाया। जो मुंह पर कपड़ा बांधे हुए था, पर उस की आंखें बता रही थीं कि वह शराब में धुत है। डाक्टर बग़ल के कमरे में बेटी की बाडी दिखाते हुए उसे बताने लगा कि कहां-कहां से क्या-क्या काटना है। उसने डाक्टर की बात को ग़ौर से सुना और बेटी का शव ले कर हाल में चला गया।

पांच मिनट बाद वह डाक्टर भी हाल की ओर जाता दिखाई दिया।

पीछे-पीछे आनंद भी चला गया।

हाल में जगह-जगह किसिम-किसिम की नंग धड़ंग लाशें पड़ी हुई थीं। ऐसे जैसे किसी खेत में झाड़ झंखाड़ उग आए हों। खूब ढेर सारी बदबू मारती हुई लाशें, तय करना मुश्किल था कि कौन सी बदबू किस लाश की है। नथुनों में बदबू भरते ही आनंद उस हाल से बाहर भाग आया। लगभग दौड़ते हुए।

‘क्या हुआ?’ घबरा कर मुनव्वर भाई ने पूछा।

‘कुछ नहीं। लगता है दो चार दिन अब सो नहीं पाऊंगा। सोऊंगा भी तो सपनों में लाशें ही तैरेंगी।’ आनंद हताश हो कर बोला।

‘तो उधर जाने की क्या ज़रूरत थी?’ मुनव्वर भाई किचकिचाए।

‘अब तो ग़लती हो गई।’

‘आप अभी दोपहर में भी गए थे।’

‘अब क्या करूं ग़लती दुबारा हो गई।’ आनंद बोला।

मुनव्वर भाई चुप रहे। ऐसे गोया उन्हों ने उसे माफ़ नहीं किया हो।

‘दफन के लिए कुछ दोस्तों को बुला लूं?’ आनंद ने धीरे से पूछा।

‘नहीं कोई ज़रूरत नहीं।’ मुनव्वर भाई बड़ी सख़्ती से बोले, ‘बड़ा बेमुरव्वत है यह आप का लखनऊ शहर।’

‘तो?’

‘अपने शहर ले जाऊंगा।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘वहां अपने लोग हैं, अपना शहर है, अपना घर है।’ उन के इस अपना घर है बोलने में एक फ़िल्मी गाने की जैसे गूंज थी, ‘अपना घर फिर अपना घर है! आ अब लौट चलें!’

‘कैसे ले जाएंगे?’

‘कोई टैक्सी ले लेंगे।’

‘कहीं बात हुई क्या?’

‘नहीं, मेरी बात तो नहीं हुई।’ वह बोले, ‘आप कोई टैक्सी बुलवा दीजिए।’

‘ठीक बात है।’

‘चलिए आप टैक्सी देखिए मैं ज़रा अपना मोबाइल चार्ज कर लूं। रात में रास्ते में काम आएगा।’ कह कर वह डाक्टरों के कमरे में घुस गए। और आनंद टैक्सी के जुगाड़ में लग गया। पहले दो तीन दोस्तों से फ़ोन करके कहा कि किसी ट्रेवलिंग एजेंसी से बात कर के कोई टैक्सी का बंदोबस्त तुरंत करें। और दो ट्रेवलिंग एजेंसियों का नंबर ले कर ख़ुद भी बतियाने में लग गया। लेकिन सब बेकार गया। लाश ले कर कोई भी चलने को तैयार नहीं हुआ। यह बताने पर कि, ‘अरे छोटी बच्ची है।’

‘तो क्या हुआ? है तो लाश ही।’ कह कर कोई भी तैयार नहीं हुआ।

‘तो क्या अब लाश गाड़ी लेनी पड़ेगी?’ मुनव्वर भाई घबराए, ‘वह तो साले बहुत पैसा लेंगे।’

‘इसी लिए तो कह रहा हूं कि यहीं दफ़न कर दीजिए।’

‘नहीं यहां तो नहीं।’ मुनव्वर भाई फिर सख़्त हो गए।

‘तो ऐसा कीजिए कि ट्रेन से चले जाइए।’

‘ऐसे? और इस हाल में?’

‘किस को पता पड़ेगा?’ आनंद बोला, ‘किसी को कुछ बताने की ज़रूरत ही क्या है?’

‘नहीं-नहीं’ मुनव्वर भाई बोले, ‘ट्रेन में नहीं। दिक़्क़त हो जाएगी।’

‘फिर?’

‘आप ही अपनी कार से क्यों नहीं पहुंचा देते?’

‘रात में मुझे कार चलाने में दिक़्क़त होगी।’ आनंद बोला, ‘सात आठ घंटे का रास्ता है। वह भी हाईवे पर और जो कहीं कोहरा-वोहरा मिल गया तो? फिर कल आफ़िस जाना ज़रूरी है। आज ही दो-दो मीटिंग छोड़ चुका हूं।’

‘संडे के दिन भी मीटिंग?’

‘हां भई, प्राइवेट सेक्टर है।’

‘तो?’

‘यहां से बेटी का शव ले लेते हैं। फिर वहीं मेडिकल कालेज के पास लाश गाड़ियां खड़ी रहती हैं, चल कर ले लेंगे।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘ज़रा बाहर चल कर सादिया की अम्मी को देख लें। बेचारी कार में अकेली हैं।’

‘हां-हां।’

बाहर जा कर आनंद ने देखा सादिया की अम्मी कार में लेटी पड़ी थीं। लेटी-लेटी बाहर ही टुकुर-टुकुर देखे जा रही थीं। उन की आंखों में बेबसी और चेहरे पर लाचारी बिजली के खंभे की रोशनी में साफ़ पढ़ी जा सकती थी। उन दोनों को देखते ही वह उठ बैठीं। हाथ के इशारे से उसने उन्हें लेट जाने को कहा। वह लेट गईं। वापस पोस्टमार्टम हाउस कैंपस में आने लगा तो उस ने देखा कि कुछ मार्शल टाइप जीपें भी वहां खड़ी थीं जो दूर से लाशगाड़ी ही की तरह थीं। पास जा कर पता किया तो वास्तव में वह लाशगाड़ी ही निकलीं। और टैक्सी के रेट पर ही जाने को भी तैयार हो गए उन के ड्राइवर। तुरंत एडवांस दे कर उन्हें रोक लिया आनंद ने और मुनव्वर भाई से कहा कि, ‘चलिए यह एक काम भी हो गया।’ पर मुनव्वर भाई कुछ बोले नहीं।

भीतर जा कर डाक्टर से आनंद ने कहा, ‘भई आप का दस मिनट डेढ़ घंटे में बदल गया है। आखि़र और कितना टाइम लगेगा?’

‘कुछ नहीं बस हुआ समझिए। इधर पेपर्स आप के तैयार हो रहे हैं और उधर सिलाई चल रही है।’

‘सिलाई? आनंद चौंका।

‘अरे जनाब बाडी काटी गई है तो उसकी सिलाई भी तो होगी।’

‘अच्छा-अच्छा।’

‘क्या बाडी ज़्यादा काट दी गई है?’ मुनव्वर भाई ने धीरे से पूछा।

‘नहीं-नहीं।’ डाक्टर बोला, ‘बस थोड़ा सा। और वह भी आप को पता नहीं चलेगा। जिस बैंडेज में आप लोग लाए थे उसी में फिर से पैक कर देंगे। कुछ पता नहीं चलेगा।’

डाक्टर की बात पर दोनों कुछ बोले नहीं। दोनों ही चुप रहे।

थोड़ी देर में मुंह पर कपड़ा लपेटे वह आदमी आया और डाक्टर के कमरे में घुसा तो पीछे-पीछे आनंद और मुनव्वर भाई भी गए। उसने डाक्टर को बताया कि, ‘सिलाई हो गई है। बाडी ले आऊं?’

‘नहीं, अभी नहीं।’ कह कर उसने पेपर्स आनंद के हाथ में दिए और कहा कि, ‘इसे ले कर पुलिस चौकी चले जाइए।’

‘फिर?’

‘फिर क्या वह पंचायतनामा बना देंगे। फिर यहां आइए।’

‘क्या बेवजह की कसरत करवा रहे हैं आप लोग भी।’

‘अब क्या करें सर प्रोसीजर है।’ डाक्टर मुसकुरा कर बोला।

ख़ैर, मुनव्वर भाई को ले कर आनंद पोस्टमार्टम हाउस के बाहर आया। बाहर आ कर देखा कि वह लाशगाड़ी वाली मार्शल ग़ायब थी। उस का कलेजा धक से रह गया। कि साला इस मुसीबत में भी पैसे ले कर भाग गया। पास खड़ी दूसरी मार्शल लाशगाड़ी के ड्राईवर से पूछा तो वह बोला, ‘भागा नहीं है। खाना खाने गया है। आप के जाने के समय तक आ जाएगा। तब तक आप अपनी कार्रवाई पूरी करिए। आप की कार्रवाई पूरी होने से पहले ही आ जाएगा।’

‘तब भी उस को हमें बता कर जाना चाहिए था।’ आनंद ने शिकायती लहजे में कहा।

‘आप के पास बुकिंग रसीद है न?’

‘हां है।’

‘तो फिर वह कहीं नहीं जाएगा।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘वैसे भी पैसा पकड़ने के बाद कोई कहां भाग कर जाएगा?’

‘लेकिन मान लो हमारी कार्रवाई अभी पूरी हो जाए।’

‘कहां साहब।’ वह ड्राइवर बोला, ‘लोगों को दो दिन, तीन दिन लग जाते हैं। आप को तो कुछ घंटे ही हुए हैं।’

‘तुम को कैसे मालूम?’

‘अरे जनाब यहीं दिन रात रहते हैं तो क्या नहीं मालूम?’

‘तो क्या हम लोगों को भी दो दिन लग जाएंगे?’ मुनव्वर भाई घबराए।

‘नहीं आप का केस तो हो गया है, सुना।’

‘ठीक है।’ आनंद बोला, ‘उस ड्राइवर के पास कोई मोबाइल है?’

‘हां है।’ ड्राइवर बोला, ‘आप की रसीद पर भी नंबर होना चाहिए। फिर भी लिख लीजिए।’

नंबर लेकर उस का मोबाइल नंबर तुरंत मिलाया तो स्विच आफ़ मिला। बताया उस ड्राइवर को। तो वह फिर बोला, ‘घबराइए नहीं, वह आप के समय पर यहीं मिलेगा।’

‘चलिए मुनव्वर भाई, पहले चौकी चलें। बाद में इस को देख लेंगे।’ कह कर आनंद ने मुनव्वर भाई का हाथ पकड़ कर खींच लिया।

पुलिस चौकी के रास्ते में तीनों ख़ामोश रहे। बस आती जाती ट्रैफ़िक का शोर था। ट्रैफ़िक का शोर और बेटी का शोक मिल कर एक ऐसी यातना, एक ऐसी ख़ामोशी रच रहे थे कि उसे किसी वायलिन के तार पर ही अभिव्यक्ति मिल सकती थी। यातना और ख़ामोशी के तनाव की अभिव्यक्ति।

पुलिस चौकी में पहुंच कर यह तनाव और बढ़ गया जब पता चला कि चौकी इंचार्ज नहीं है, न ही मुंशी। चौकी इंचार्ज का मोबाइल फिर स्विच आफ़ मिला। थोड़ी देर बाद आनंद ने एस.एस.पी. का मोबाइल मिलाया। वह लगातार बिज़ी था। कि तभी पुलिस चौकी का मुंशी आ गया। मुंशी के आते ही आनंद उस पर बरस पड़ा।

‘ताव मत खाइए सर।’ मुंशी बोला, ‘चौकी इंचार्ज साहब नहीं हैं तो क्या हुआ? आपका काम तो नहीं रुक रहा है?’

‘उन की दस्तख़त कौन करेगा।?’

‘यह देखिए साहब, दस्तख़त कर के आधी कार्रवाई वह पूरी कर गए हैं। बाक़ी कार्रवाई आप लोगों का नाम-गांव और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का ब्यौरा बस भरना है।’

‘ठीक है-ठीक है। आप अपनी कारवाई जल्दी करिए।’

‘पोस्टमार्टम हाउस से जो काग़ज़ लाए हैं वह पहले दीजिए।’

‘लीजिए।’

‘अपना नाम बताइए।’

‘मुनव्वर आलम ख़ा।’ मुनव्वर भाई ज़रा रुके और बोले, ‘मु लगा के लिखिए मुनव्वर। मो मत लगाइएगा।’ सुन कर इस कठिन घड़ी में भी आनंद को हंसी आ गई। हालांकि वह ज़ाहिर तौर पर नहीं हंसा और टाल गया। पर वह पुरानी याद नहीं टाल पाया जब मुनव्वर भाई बोले कि मु लगा के लिखिए मुनव्वर। उनका पुराना नाम अख़बार डायरी ख़ा याद आ गया। हालांकि डायरी अभी भी उनके हाथ में थी, अलबत्ता, अख़बार नहीं था। जब कि सुबह जब वह मिला था तब उन के हाथ में डायरी और अख़बार दोनों ही बदस्तूर थे। दरअसल कुछ आदतें, कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो आदमी जिंदगी भर नहीं छोड़ पाता। ऐसी ही शायद मुनव्वर भाई की यह आदत थी।

मुंशी डिटेल पूछता जा रहा था और मुनव्वर भाई बिना आपा खोए यंत्रवत जवाब देते जा रहे थे। अंत में हुआ कि पांच लोगों को लाइए जो पंचनामे पर दस्तख़त कर सकें। मुंशी ने पूछा भी कि, ‘पांच लोग हैं क्या?’

‘थोड़ा समय दीजिए तो पांच क्या पचास लोगों को बुला दूं।’ आनंद कुढ़ कर बोला।

‘क्या रात यहीं काटनी है?’ मुंशी तरेर कर बोला, ‘मुझे तो घर जाना है। बस आप के काम के लिए ही रुका हूं।’ वह बोला, ‘पचास नहीं सिर्फ़ पांच लोग। न हों तो बताइए।’

‘पांच लोग तो हैं। आनंद बोला।

‘पांच कहां चार लोग।’ मुनव्वर भाई आनंद का हाथ पकड़ते हुए बोले।

‘क्यों?’ आनंद बोला, ‘हम आप दो। सादिया, सादिया की अम्मी और भाई तीन। कुल पांच हो तो गए।’

‘नहीं सादिया नहीं।’ मुनव्वर भाई अफना कर बोले, ‘आप समझिए ज़रा। सादिया नहीं।’

‘ये सादिया कौन है?’ मुंशी ने धीरे से पूछा।

‘बच्ची की मां है।’ आनंद ने भी उतनी ही धीरे से जवाब दिया।

‘अच्छा तो बच्ची की मां को अभी नहीं बताया गया है?’

‘नहीं?’ मुनव्वर भाई ने संक्षिप्त और सख़्त आवाज़ में जवाब दिया।

‘पर कब तक छुपाएंगे? वह भी मां से।’ कहते हुए मुंशी मुसकुराया। फिर बोला, ‘ख़ैर बाक़ी दो को बुलाइए। एक मैं हो जाऊंगा, पांच पूरे हो जाएंगे।’ पर ‘एक मैं हो जाऊंगा।’ मुंशी के इस कहने में पैसे का लोभ और मांग के संकेत बहुत साफ़ पढ़े जा सकते थे।

ख़ैर, आनंद ने ट्रामा सेंटर जा कर सादिया के भाई को लिया जो ट्रामा सेंटर की चाय की दुकान पर कंबल ओढ़े सादिया के साथ डटा पड़ा था। आनंद को देखते ही सादिया के इंतज़ार और सब्र का गुब्बारा जैसे फट पड़ा। बिलखती रोती हुई वह आनंद का गला पकड़ कर झूल गई, ‘कहां है मेरी जान का टुकड़ा।’

‘अभी आता हूं तो बताता हूं।’ सादिया से बिना आंख मिलाए, बात टालते हुए आनंद उसे अपने से अलग करते हुए बोला। लेकिन वह उसे छोड़े ही न। रोती बिलखती बार-बार आनंद को ऐसे पकड़ कर झूल जाए जैसे वह किसी नदी में डूब रही हो और बचाने आए आनंद को ऐसे पकड़ कर डूब रही हो गोया हम तो डूबेंगे सनम, तुम को भी ले डूबेंगे। आनंद ने उस की दिक्क़त समझी और अपनी भी। उसे लगा कि अब वह भी रो पड़ेगा। बड़ी मुश्किल से उसने अपनी रुलाई रोकी और सादिया के भाई को आंखों ही आंखों में इशारा किया कि वह उसे सादिया से छुड़ाए। उसने कोशिश भी की पर सादिया मानती ही नहीं थी। भाई उसे छुड़ाए और वह दौड़ कर उसे फिर-फिर पकड़ कर झूल जाए। अंततः वह रोती-रोती गिड़गिड़ाई, ‘मैं भी चलूंगी अपनी बेटी के पास। हमको भी ले चलिए।’

‘अभी आता हूं न, फिर बताता हूं।’

‘कब तक आएंगे?’ वह बोली, ‘दिन भर तो यहां बैठे-बैठे बीत गया। वह ज़रा रुकी और बोली, ‘अम्मी कहां हैं?’

‘बेटी के पास।’ वह लड़खड़ा कर बोला।

‘आप झूठ बोल रहे हैं।’ वह बोली, ‘मैं जानती हूं आप को झूठ बोलना नहीं आता।’

‘क्या बात कर रही हो?’ आनंद धीरे से बुदबुदाया।

‘अच्छा सच-सच बताइए।’

‘क्या?’

‘मेरी बेटी जिं़दा है?’

‘क्यों?’ आनंद यह पूछते हुए एक बार तो हिल गया। पर किसी तरह उसने अपने को संभाला और धीरे से बोला, ‘ऐसा क्यों पूछ रही हो?’

सादिया चुप हो गई। वह नीचे सड़क देखने लगी।

‘तुम बेटे को देखो, हम लोग बस अभी आ रहे हैं।’

वह फिर भी कुछ नहीं बोली।

तो क्या वह समझ गई थी कि उस की बेटी अब नहीं रही?

आनंद के लिए समझना कुछ नहीं बहुत कठिन था।

ख़ैर, पुलिस चौकी जब वह पहुंचा तो देखा कि चौकी इंचार्ज आ चुका था। मुनव्वर भाई से वह बतिया रहा था। मुनव्वर भाई, आनंद और सादिया के भाई ने दस्तख़त किए और सादिया की अम्मी ने अंगूठा लगाया। पांचवां दस्तख़त ख़ुद मुंशी ने कर दिया। और मुनव्वर भाई की ओर याचना भरी निगाह से देखा। पर उन्हों ने उस की ओर देखा ही नहीं, चौकी इंचार्ज की ख़ुशामद में ही ख़र्च होते रहे।

ख़ैर, पंचनामा का काग़ज़ ले कर पोस्टमार्टम हाउस की ओर कूच किया सबने। रास्ते में सादिया की अम्मी ने अपने बेटे से सादिया का हाल-चाल लिया और पूछा कि, ‘कहीं उसे पता तो नहीं पड़ गया?’

‘क्या पता पड़ गया?’ सादिया का भाई पूछते हुए अचकचा गया।

‘कुछ नहीं, कुछ नहीं।’ मुनव्वर भाई जैसे बीच में कूद पड़े, और पीछे मुड़ कर सास से मुख़ातिब हो कर बोले, ‘आप बिलकुल ही पागल हैं? कब क्या कहां बोलना चाहिए, कुछ जानती भी हैं?’

‘क्या हुआ भइया?’

‘कुछ नहीं चुप रहिए।’ मुनव्वर भाई बोले,‘कभी औरतों को अपना मुंह बंद भी रखना चाहिए।’ मुनव्वर भाई का यह कहना सब को चुप करा गया।

पोस्टमार्टम हाउस पहुंच कर सादिया की अम्मी और भाई को कार में ही छोड़ कर पुलिस चौकी का काग़ज़ आनंद ने डाक्टरों को देते हुए कहा,‘अब तो छुट्टी दीजिए।’

‘इसे ले कर हम क्या करें?’ डाक्टर ने बड़ी विरक्ति से कहा।

‘बेटी का शव दे दीजिए।’

‘ऐसे नहीं?’

‘फिर?’ आनंद फिर भड़क गया।

‘नाराज़ मत होइए।’

‘तो कितना पैसा चाहिए।’ आनंद पूरी तरह उखड़ गया।

‘पैसा नहीं।’ डाक्टर भी तैश में आ गया, ‘अभी तक सिर्फ़ आप के लिए बैठा हूं नहीं कब का घर चला गया होता।’

‘तो?’ ढीला पड़ता हुआ आनंद बोला।

‘ट्रामा सेंटर के पेपर्स लाइए।’

‘यह कौन देगा?’

‘यह पेपर्स जो पंचनामा का हमें दे रहे हैं ट्रामा सेंटर ले जाइए, वहीं फिर से पेपर्स बनेंगे। ले कर आइए बाडी ले जाइए।’

‘हद है। यह बात पहले ही बतानी चाहिए थी।’

‘यह तो ख़ुद ही जाननी चाहिए।’ डाक्टर बोला, ‘रुटीन है।’

‘यह रुटीन आप के लिए है, हम लोगों के लिए नहीं।’

‘चलिए विवाद करने से कुछ नहीं होगा।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘ट्रामा सेंटर चलिए।’

‘ट्रामा सेंटर जाना मेरे लिए तो बड़ा मुश्किल है।’ पोस्टमार्टम हाउस के बाहर निकलते हुए आनंद ने मुनव्वर भाई से कहा।

‘क्यों?’ मुनव्वर भाई अचानक रुक गए।

‘सादिया है वहां।’

‘तो?’

‘मैं उस का सामना नहीं कर सकता।’

‘तो क्या मैं कर सकता हूं?’ मुनव्वर भाई फफक पड़े, ‘आनंद जी, आज आप मेरे लिए देवदूत बन कर आए हैं।’ कहते हुए आनंद से लिपट गए। आनंद को उन के मुंह से पायरिया की तेज़ बदबू मिली। लग रहा था सुबह उन्हों ने ठीक से ब्रश भी नहीं किया रहा होगा। किसी तरह उसने अपने को उन से छुड़ाया और कहा, ‘ऐसा मत कहिए मुनव्वर भाई!’ उसने जोड़ा, ‘मुझे याद है कि आप ने कैसे-कैसे मुझे पांच-पांच रुपए के ट्यूशन दिलाए हैं।’ वह भावुक हो गया।

कार में बैठते ही सादिया की अम्मी ने पूछा, ‘क्या हुआ?’

‘कुछ नहीं, बस अब आप अपना मुंह बंद रखिए।’ पीछे बैठी अपनी सास की तरफ़ मुख़ातिब हो कर मुनव्वर भाई बोले।

‘ऐसे अम्मी को आप ज़लील मत करिए जीज्जू।’ सादिया का भाई धीरे से बोला।

‘अब आप जनाब चुप रहने का क्या लेंगे?’

‘प्लीज़ जीज्जू ऐसे मत बोलिए।’

‘तो अब दोनों चुपचाप रहो।’ मुनव्वर भाई सख़्ती से बोले, ‘मैं कुछ नहीं बोलूंगा।’

‘ मुनव्वर भाई!’ आनंद ने उन्हें समझाने की कोशिश की।

‘कुछ नहीं आनंद जी, एक तो दिमाग़ वैसे ही परेशान है। दूसरे ये मां बेटे!’

अब सभी चुप हो गए।

ट्रामा सेंटर में मुनव्वर भाई और आनंद को देखते ही सादिया फिर किसी मेढ़की की तरह फुदकी और फुदकते-फुदकते दोनों के पास आ गई। वह कुछ बोले उस के पहले ही मुनव्वर भाई ने उसे लगभग काशन दे दिया, ‘जहां बैठी थी, चुपचाप चल कर वहीं बैठो। जब ज़रूरत होगी तुम्हें बुला लूंगा।’ कह कर मुनव्वर भाई आगे बढ़ गए। आनंद ने चलते-चलते पीछे मुड़ कर देखा सादिया-चुपचाप खड़ी नीचे सड़क निहार रही थी।

अजीब थी यह उस की सड़क निहारने की यातना भी।

‘आप बाहर तो बहुत डेमोक्रेटिक बनते हैं।’ ट्रामा सेंटर की सीढ़ियां चढ़ते हुए आनंद ने मुनव्वर भाई से पूछा, ‘पर घर में इस क़दर तानाशाही? समझ में नहीं आता।’

‘अब यह सब समझने का यही समय है?’ पूछते-पूछते मुनव्वर भाई सीढ़ियों पर रुक से गए। और आनंद की आंखों में अपनी आंखें ऐसे डाल दीं गोया आंखंे नहीं बर्छी हों।
आनंद चुप रह गया।

दोनों सेकंेड ़लोर के उस वार्ड में गए जहां बेटी एडमिट थी। डाक्टर्स, नर्स सभी बदल गए थे। ख़ैर, फ़ाइल मिल गई थी। डेथ सर्टिफ़िकेट बनने में कोई पंद्रह बीस मिनट लगे। डेथ सर्टिफ़िकेट ले कर फिर पोस्टमार्टम हाउस गए सब लोग।

मार्शल जीप का ड्राइवर बाहर ही मिल गया। उलटे बोला, ‘बहुत देर कर दी आप लोगों ने।’

‘घबराओ नहीं बस चल ही रहे हैं।’

पोस्टमार्टम हाउस के भीतर जा कर ट्रामा सेंटर के पेपर्स डाक्टर को दिखाया। और कहा, ‘अब तो कोई कार्रवाई शेष नहीं रह गई है?’

‘नहीं बिलकुल नहीं।’ कह कर डाक्टर ने एक स्वीपर को बुलवाया और कहा कि, ‘बच्ची की बाडी इन्हें दे दो।’

इस बीच मुनव्वर भाई भाग कर गए और बाहर कार में बैठी सादिया की अम्मी को बुला लाए। बेचारी ठंड में कांपती बूढ़ी औरत पोस्टमार्टम हाउस के परिसर में ऐसे खड़ी थी गोया अब उस का भी पोस्टमार्टम होने वाला हो। बल्कि उस बकरी या गाय की तरह जो कसाईबाड़े में खड़ी हो चुपचाप आंसू बहाती रहती है। अपनी हत्या की प्रतीक्षा करती हुई। उसे लगा जैसे यह सादिया की अम्मी नहीं सादिया ही हो। और फ़र्क़ भी क्या था वहां ट्रामा सेंटर में चुपचाप नीचे सड़क निहारती सादिया और यहां पोस्टमार्टम हाउस के कैंपस में खड़ी सादिया की अम्मी!

और उधर लाशों के ढेर में कहीं पड़ी सादिया की फूल सी बेटी!

तीनों में आख़िर फ़र्क़ क्या है?

आनंद ने सोचा और बार-बार सोचा।

अभी वह यह सब सोच ही रहा था। कि एक स्वीपर सादिया की बेटी के शव को ले कर बाहर आया। और बरामदे में नीचे फ़र्श पर ही रख दिया। इस बार बेटी के शव को नीचे फ़र्श पर रखने को ले कर जाने क्यों किसी ने बुरा नहीं माना। तो क्या अब तक सब की देह से गुस्सा ग़ायब हो गया था और कि सब को सिस्टम की नपुंसकता ने घेर लिया था?

तो भी सादिया की अम्मी धीरे-धीरे बेटी के शव तक गईं उसे उस के उढ़ाए हुए कंबल को हटा कर देखा। देखते ही घबराईं और इशारे से आनंद को बुलाया और बेटी के शव की सिलाई दिखाई और फफक कर रो पड़ीं, ‘हमार बिटिया
कइसे जिएगी। या अल्लाह!’

शव की सिलाई देख कर आनंद भी हिल गया। फूल सी बेटी जूते सी सिल दी गई थी। वह भीतर डाक्टर के कमरे में गया और कहा, ‘कम से कम सिलाई पर बैंडेज तो बांध दिया होता?’

‘अब यहां बैंडेज तो होता नहीं?’

डाक्टर बोला, ‘आप बैंडेज ले आइए बंधवा देता हूं। या फिर कोई कपड़ा लाइए सिलवा देता हूं, पर जल्दी।’

‘जो बैंडेज पहले से बंधा हुआ लाए थे, वही नहीं बंध सकता?’

‘देखता हूं अगर मिल जाता है तो वही बंधवा देता हूं।’ कह कर डाक्टर ने स्वीपर को बुलवाया और कहा कि, ‘देखो बच्ची की बाडी पर जो पट्टी बंधी थी, मिल जाए तो उसी से फिर से कस कर बांध दो।’

‘वो तो ख़राब हो गई है।’

‘ख़राब हो गई तो क्या हुआ? है न।’ डाक्टर बोला, ‘बस लपेट दो कस कर ताकि सिलाई नहीं दिखे।’ वह बुदबुदाया, ‘कौन कहीं ज़िंदा है?’

स्वीपर बेटी के शव को ले कर फिर से भीतर गया। थोड़ी देर में बैंडेज में बांध कर लाया। पर अब की उस के दो नन्हें कंबलों में से एक कंबल नहीं लाया। सादिया की अम्मी ने टोका तो वह जा कर दूसरा नन्हा कंबल ले आया। और हाथ पसार कर खड़ा हो गया। सादिया की अम्मी ने उसे झिड़क दिया, ‘शर्म नहीं आती?’ वह बड़बड़ाई, ‘ज़िंदा ले जाती और मांगते तो समझ में आता, पर मुर्दा के भी पैसे? हुंह!’ कह कर उन्हों ने बेटी के शव को नन्हें कंबलों में लपेट कर फिर से सीने से चिपका लिया। चलते-चलते उस का माथा भी चूम लिया।

‘इन को कहां बैठाया जाए?’ मुनव्वर भाई ने चलते-चलते धीरे से पूछा, ‘आप की गाड़ी में या लाश गाड़ी में?’

‘आप जैसा बेहतर समझें।’ आनंद बोला।

‘फिर भी आप की राय?’

‘मैं ने कहा न कि आप जहां बेहतर समझें?’

‘चलिए लाश गाड़ी में ही बैठाते हैं।’मुनव्वर भाई बोले, ‘बार-बार उतारने बैठाने से बेहतर है कि एक ही जगह बैठा दें।’

‘यह भी ठीक है।’

‘आप अब इस गाड़ी में बैठिए।’ मुनव्वर भाई ने सादिया की अम्मी को टोकते हुए कहा जो आनंद की कार में बैठने जा रही थीं।

‘इस में क्यों?’ उन्हों ने आपत्ति दर्ज की।

‘इस लिए कि अब लखनऊ से चलना है।’

‘इस को ले कर?’ सादिया की अम्मी ने बेटी के शव को इंगित करते हुए कहा।

‘जी हां।’ मुनव्वर भाई ने सादिया की अम्मी को किसी और सवाल का मौक़ा दिए बिना कहा, ‘अब सादिया के सामने कोई ड्रामा नहीं होना चाहिए। कि मां बेटी मिलें और गले मिल कर रोना धोना चालू कर दें।’ मुनव्वर भाई ने कहा,

‘चुपचाप शांति से पेश आइए। कहीं कुछ गड़बड़ नहीं होने पाए।’ उन्होंने जोड़ा, ‘नहीं अभी एक गई है, फिर दूसरा आने वाला भी चला जाए और फिर वह भी चली जाए।’

‘हां, भइया।’

‘तो पूरा ध्यान रखिए। यह आप की ज़िम्मेदारी है।’

‘मैं अकेले ही बैठूंगी इसमें?’

‘नहीं, अभी आप के साहबज़ादे को भी भेज रहा हूं।’ कह कर मुनव्वर भाई ने आनंद से कहा, ‘ज़रा उस को भी बुला लीजिए।’

जब मां बेटे बेटी के शव को ले कर मार्शल में पीछे से बैठने लगे तो अचानक मुनव्वर भाई को पीछे जब ‘लाश के वास्ते’ लिखा दिखा तो वह घबराए। बोले,‘आनंद जी यह तो गड़बड़ हो गया।’

‘क्या?’

‘यह देखिए!’ उन्हों ने ‘लाश के वास्ते’ लिखा दिखाया।

‘अब यह तो लिखा रहेगा ही।’

‘कहीं सादिया देख लेगी तो सब गड़बड़ हो जाएगा।’

‘कुछ नहीं होगा।’ आनंद बोला, ‘रात हो गई है और कुछ ऐसा कर दिया जाएगा कि ऊपर उसे देखने का मौक़ा ही न मिले।’

‘चलिए फिर यह आप की ज़िम्मेदारी है।’

‘बिलकुल।’ आनंद बोला, ‘आप निश्चिंत रहिए।’ कह कर उसने ड्राईवर से कहा कि, ‘ट्रामा सेंटर चलो भाई।’ फिर लाश गाड़ी के पीछे-पीछे अपनी कार लगा दी।

रास्ते में उसने मुनव्वर भाई से पूछा, ‘आख़िर सादिया से यह सब कुछ छुपाने के लिए इतनी कसरत क्यों?’

‘दरअसल आनंद जी इस टुंटपुजिया राजनीति ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। आदर्शवादिता मुझे ले डूबी। न इधर का रहा, न उधर का। तिस पर कांग्रेसी। जिस की यू.पी. में अब कहीं क़दर नहीं। शादी होनी मुश्किल हो गई। ओवरएज क्या, परम ओवरएज हो गया। बड़ी मुश्किल से पुराने संबंधों का वास्ता, कुछ सादिया के बाप की ग़रीबी, फिर वह भी ओवरएज हो रही थी, उस से मेरी शादी हुई। देर से शादी हुई तो बच्चे भी देर से। बताइए यह पचपन-छप्पन साल की उमर कोई बच्चा पैदा करने की है?’ कहते हुए वह ज़रा रुके और अपने बाल दिखाते हुए बोले, ‘यह कोई सचमुच काले बाल हैं। अरे बाल रंगने से कोई उमर छुप जाती है?’ कह कर वह चुप लगा गए।

आनंद भी चुप रहा।

थोड़ी देर बाद मुनव्वर भाई बोले, ‘आप तब सीढ़ियों पर मेरी तानाशाही पूछ रहे थे न? स्थिति यह है कि सादिया दिल की कमज़ोर है, कहीं हार्ट अटैक पड़ गया और वह भी मर मरा गई तो इस बुढ़ौती में फिर कौन शादी करेगा? कहां जाऊंगा मैं?’ वह ज़रा देर रुके और बोले, ‘फिर वह प्रेगनेंट है, कहीं टेंशन में एबार्शन हो गया तो?’ कह कर मुनव्वर भाई फिर चुप हो गए।

आनंद भी चुप रहा।

लेकिन मुनव्वर भाई फिर बुदबुदाए, ‘और आप जनाब हैं कि मुझे तानाशाह बताए जा रहे हैं।’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘अरे देर से ही सही, बुढ़ौती में ही सही, तिनका-तिनका जोड़ कर गृहस्थी बसा रहा हूं, उसूलों को, मूल्यों को बेच कर आदर्शों को तिलांजलि दे कर जीवन बचा रहा हूं आनंद जी! तानाशाही नहीं!’ कहते-कहते वह फिर फफक पड़े, ‘पर इस बेटी ने बैरियर लगा दिया है। क्या करें?’

लाश गाड़ी ट्रामा सेंटर के सामने आ कर रुक गई लेकिन आनंद ने कार नहीं रोकी। वह आगे मोड़ से मुड़ते हुए ट्रामा सेंटर के गेट के पास आ कर रुका। वह गाड़ी सड़क के किनारे पार्क कर, लाक कर ट्रामा सेंटर में घुसने लगा तो देखा कि लाश गाड़ी भी आ कर उस की कार के पास खड़ी हो गई। मुनव्वर भाई का साला उस में से उतर कर आनंद के पास आया और पूछने लगा कि, ‘सब सामान भी इसी में ला कर रख लें?’

‘हां,हां’ बिलकुल।’ आनंद ने धीरे से कहा, ‘अपनी दीदी को भी लिवाते लाना।’

‘आप भी चले जाइए।’ मुनव्वर भाई ने आनंद से लगभग मनुहार की।

‘क्या सामान लेने?’

‘नहीं-नहीं, सामान तो वह ले आएगा।’ मुनव्वर भाई फिर मनुहार पर उतर आए, ‘सादिया को लेते आइए।’

‘सॉरी मुनव्वर भाई।’ आनंद उन के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, ‘मैं सादिया का सामना नहीं कर पाऊंगा।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘झूठ मैं बोल नहीं पाता। वह कुछ पूछेगी, मैं झूठ बताऊंगा और वह मेरा झूठ पकड़ लेगी। वह शुरू से ही मेरा झूठ चेक कर लेती है और जानती है कि मैं झूठ नहीं बोलता।’

‘पोस्टमार्टम हाउस में तो आप पूरी ज़िम्मेदारी ले रहे थे।’ मुनव्वर भाई बिदके।

‘वह तो यह ‘लाश के वास्ते’ लिखा न देखे वह इस की ज़िम्मेदारी ली थी।’

‘उस को क्यों नहीं लाए भई?’ मुनव्वर भाई ने सादिया के भाई से पूछा जो सामान ले कर ट्रामा सेंटर के भीतर से आ रहा था।

‘अभी और जो सामान बचा है, वह उसे देख रही है।’ ठंड से कांपता हुआ सादिया का भाई बोला।

‘ठीक है, ठीक है।’ बला टालते हुए मुनव्वर भाई बोले।

मार्शल जीप में सामान रखने में दिक़्क़त हुई तो सादिया की अम्मी को नीचे उतरना पड़ा बेटी के शव के साथ। हुआ यह कि सामान आगे की तरफ़ रख दिया जाए नहीं पीछे से चढ़ने का रास्ता बंद हो जाएगा।

पर क्या किसी शव को भी जाड़ा लग सकता है?

आनंद यह देख कर दंग था कि सादिया की अम्मी बेटी के शव को सीने से ऐसे चिपकाए खड़ी थीं कंबल में लपेट के इस जतन से कि उसे कहीं ठंड न लग जाए।

यह ममत्व था, तानाशाही की गूंज थी, तनाव था या सचमुच ठंड थी?

आनंद ने एक बार में ही यह सब कुछ सोच लिया। और मान लिया कि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ ममत्व था। तिहरा ममत्व। सादिया की अम्मी का यह ममत्व सादिया के लिए तो था ही, सादिया को गुज़र गई बेटी के शोक से बचाने के लिए भी था और कहीं उस के पेट में पल रहा बच्चा एबार्ट न हो जाए, उस की सुरक्षा में भी था। कि जिस शव को दोपहर में उस के बेड से उठाने में जिस के हाथ कांप गए थे और वह शव नहीं उठा पाई थी, वही औरत उस शव को चीर फाड़ के बाद भी सीने से इस क़दर चिपकाए खड़ी थी गोया वह जिंदा हो गई हो।

सादिया और उस के पेट में पल रहे गर्भ को बचाने की ऐसी कोशिश कोई मां ही कर सकती है। उसे महाभारत प्रसंग में अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र याद आ गया जो उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के लिए चला था जिसे श्रीकृष्ण को यत्नपूर्वक बेअसर करना पड़ा था।

तो क्या सादिया की अम्मी अभी उसी श्रीकृष्ण की भूमिका में थीं? सादिया के गर्भ को बचाने ख़ातिर? कि नातिन के शव को सीने से इस लिए चिपकाए खड़ी थीं कि सादिया को कहीं कोई नुक़सान नहीं पहुंचे और कि उस के गर्भ में पल रहा बच्चा सुरक्षित रहे।

आनंद को लगा कि सादिया की अम्मी श्रीकृष्ण से भी बड़ी भूमिका में थीं, मनुष्य हो कर भी उन का यह यत्न उन के मातृत्व को मान भी दे रहा था और देवत्व भी।

आनंद यह सब सोच ही रहा था कि सादिया ट्रामा सेंटर से बाहर आ गई अपने भाई के साथ सड़क निहारती हुई। धीरे-धीरे।

‘हम लोग चल कहां रहे हैं?’ उसने आते ही मुनव्वर भाई से लगभग नाराज़गी से पूछा।

‘घर और कहां?’

‘और ज़ोया?’ उसने उसी नाराज़गी से पूछा, ‘वह यहीं वेंटीलेटर पर ही रहेगी?

‘नहीं वह भी साथ है।’ मुनव्वर भाई थोड़ा सा हकबकाए और आनंद की तरफ़ लाचार नज़रों से देखने लगे।

पर आनंद ठीक सादिया की तरह सिर नीचे कर सड़क देखने लगा।

‘क्यों इलाज ख़त्म हो गया?’ सब को चुप देख कर सादिया ने आनंद से पूछा।

‘नहीं यहां का ख़त्म हो गया अब बाक़ी घर पर भी हो सकता है।’ आनंद ने बीच का जवाब देना ही ठीक समझा बतर्ज़ युधिष्ठिर कि अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो!

‘सारे सवाल यहीं कर लोगी कि चलोगी भी?’ मुनव्वर भाई ने सादिया का हाथ पकड़ कर आगे की सीट पर अपने साथ बैठाने की कोशिश की। और सादिया की अम्मी और भाई से कहा कि आप लोग भी जल्दी से बैठिए। सादिया का भाई, भांजी का शव हाथ में ले कर मां को जीप में चढ़ाने लगा, आनंद ने भी सहारा दिया।

‘नहीं मैं भी अम्मी के साथ पीछे ही बैठूंगी।’ कह कर मुनव्वर भाई से अचानक हाथ छुड़ा कर बिलकुल किसी गौरैया की तरह सादिया फुदकी और जीप के पीछे आ गई।

आनंद का दिल जैसे बैठ गया। कि अब क्या होगा?

ग़नीमत कि उसने जीप के पीछे ऊपर किसी इबारत की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। और लगभग हड़बड़ी में वह जीप के अंदर दाखि़ल हो गई। आनंद ने देखा कि सादिया की अम्मी ने सादिया को देखते ही नातिन के शव को और कस के अपने सीने से चिपका लिया। और नातिन का मुंह ऐसे देखा गोया उसे वह पुचकारने वाली हों।

मुनव्वर भाई भी जीप के पीछे आए और सब को इत्मीनान से बैठा देख कर आनंद की तरफ़ मुड़े, गले लगाया, धीरे से रोए और बोले, ‘आप ने बड़ी मदद की।’

‘पर क्या फ़ायदा हुआ?’ आनंद भी रो पड़ा। उस की आवाज़ रुंध गई, ‘बेटी तो नहीं बचा पाए न।’

‘सब ऊपर वाले का खेल है।’ मुनव्वर भाई बोले, ‘नसीब में नहीं थी, अल्लाह की मर्ज़ी के आगे भला किस की चली है?’

‘ये तो है।’ कह कर आनंद ने उन से अपने को छुड़ाया, हाथ मिलाया और कहा कि, ‘अब चलिए, वैसे भी बहुत देर हो गई है।’ उसने जोड़ा, ‘रास्ते में कहीं कोई दिक़्क़त पेश आए तो घबराइएगा नहीं, मुझे फ़ोन कर दीजिएगा। घर पहुंच जाइएगा तो पहुंचने की ख़बर ज़रूर दे दीजिएगा।’

‘ठीक है।’ कह कर मुनव्वर भाई चले तो गीली आंखों से उसने सब को विदा किया। मौक़ा हालां कि हाथ जोड़ने का नहीं था तो भी जाने क्यों सादिया की अम्मी को देख कर उस के हाथ जुड़ गए। उस का मन हुआ कि उन के पांव छू ले पर वह ज़्यादा अंदर की ओर बैठी थीं। सो हाथ जोड़ कर ही प्रणाम किया। जवाब में सादिया ने हाथ उठा कर सलाम किया। सादिया के सलाम से अचानक वह ठिठका और सोचा कि क्या बेटी के साथ-साथ सादिया के भीतर की ‘मां’ भी मर गई है कि पास ही में अम्मी की गोद में बेटी का शव है और उसे इस की गंध भी नहीं मिल पा रही है? आख़िर कैसा है उस का दूध जो जननी हो कर भी अपने जाये की ख़बर नहीं पा रही है?

आख़िर यह कैसा कम्यूनिकेशन गैप है? या कि वह पत्थर हो गई है कि उस के दूध में खलबली नहीं हो रही?

ख़ैर, आगे जा कर उसने मुनव्वर भाई से भी हाथ जोड़ कर विदा ली।

मार्शल के निकल जाने के बाद उसने भी अपनी कार स्टार्ट की और अपने घर की ओर चल पड़ा। पेट की भूख अब सिर चढ़ कर बोल रही थी। उसने देखा सड़कों पर से एकाएक बिजली गुल हो गई। उसने अचानक सड़क के एक किनारे जा कर कार रोक दी। घर पर फ़ोन मिलाया। और पत्नी से पूछा कि ‘बिजली आ रही है क्या?’ पत्नी ने कहा, ‘हां।’ तो उस ने पत्नी को बताया कि पानी गरम करने के लिए गीज़र ऑन कर दे और खाना तैयार रखे, वह बस घर पहुंच रहा है। पत्नी ने टोका भी कि, ‘इस वक़्त नहाएंगे?’

‘हां, भाई हां।’ कह कर उसने फ़ोन काट दिया।

घर पहुंच कर कपड़े उतार कर वह सीधे बाथरूम में घुस गया। नहा कर निकला तो पत्नी ने फिर टोका, ‘इस सर्दी में नहाने की क्या ज़रूरत थी?’

‘ज़रूरत थी तभी तो नहाया।’ आनंद ने कहा, ‘पहले खाना खिलाओ और खाओ फिर बताता हूं कि क्यों नहाया?’

‘फिर भी?’

‘अब मान भी जाओ।’ कहते हुए आनंद ने पूछा, ‘खाना तैयार नहीं है क्या?’

‘नहीं, तैयार है।’

खाना खाने के बाद पत्नी ने फिर पूछताछ शुरू कर दी। आनंद ने फिर टाला, ‘बच्चे कहां हैं?’

‘अपने कमरे में पढ़ या सो रहे होंगे।’

‘तो तुम भी सो जाओ मैं बहुत थक गया हूं।’

‘आप बात को टाल रहे हैं।’

‘टालूंगा क्यों?’ आनंद ने फिर बात बदली, ‘पता है तुम्हारी ज़रा सी बेवक़ूफ़ी, ज़रा से आलस ने आज दिन भर भूखे तड़पा दिया।’ उसने जैसे जोड़ा, ‘अगर तुमने खाना खिला कर भेजा होता तो दिन भर क्या अभी तक भूखे तड़पना न
पड़ता।’

‘क्यों सादिया ने खिलाया नहीं अपने हाथों से? पिछली बार ईद में तो अपने हाथों से आप को खिला रही थी कबाब, सेंवई और शबाब!’ शबाब पर उस का ज़ोर ज़्यादा था।

‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात करती हो?’ आनंद गुस्साया, ‘कुछ पता भी है तुम्हें?’

‘हां, हमें सब पता है।’

‘ख़ाक पता है।’ आनंद बोला, ‘पता होता तो ऐसे मौक़े पर इस तरह बेवक़ूफ़ी की बात नहीं करतीं।’ वह झल्ला कर बोला, ‘पता है तुम्हें उस की बेटी मेरे जाने के दो घंटे बाद ही मर गई। पोस्टमार्टम हाउस के चार-चार चक्कर लगाने पड़े। दिन भर पेट में भूख और मन में ज़िल्लत उठानी पड़ी।’

‘ओह सॉरी!’ पत्नी बोली, ‘और आप ने खाना खा लिया?’

‘तो क्या भूख से छटपटाता रहता?’

‘ऐसे में तो भूख ख़ुद ही मर जाती है।’

‘दिन भर जो ज़िल्लत और अपमान उठाया है, यहां वहां गिड़गिड़ाया और झल्लाया हूं, ऐसे में भूख! अरे शोक भी दफ़न हो गया! उस की बेटी तो कल दफ़न होगी, उस के मरने का शोक आज ही दफ़न हो गया।’ वह बोला, ‘और क्या-क्या बताऊं? सब कुछ बता दूंगा तो सो नहीं पाओगी दो चार दस दिन।’ वह हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘भगवान से मनाओ कि आज मैं कम से कम ठीक से सो जाऊं।’

‘इतना गुस्सा क्यों हो रहे हैं, कहा न सॉरी।’

‘हुंह सॉरी!’

‘दिन में आप का कोई फ़ोन नहीं आया तो मैं समझी कि सब कुछ ठीक ठीक होगा और कि.........

‘और कि मैं गुलछर्रे उड़ा रहा हूंगा।’

‘ऐसा मैं ने कब कहा?’

‘मतलब तो तुम्हारा यही था।’

‘ओ.के. बात प्लीज़ यहीं ख़त्म करिए।’

‘ठीक है मेरी मां।’ वह हाथ जोड़ कर बोला और रज़ाई खींच कर ओढ़ा और सोते हुए पत्नी से बोला, ‘मोबाइल प्लीज़ चार्ज़िग में लगा दो।’

‘दूध लेंगे?’

‘नहीं।’ कह कर उसने सोचा कि क्यों न एक बार वह मुनव्वर भाई को फ़ोन कर के हालचाल ले ले। उसने दो तीन बार उन का मोबाइल मिलाया पर हर बार स्विच आफ़ मिला। वह समझ गया कि उनके मोबाइल की बैट्री डाउन है।

वह सोने की कोशिश में लग गया। बड़ी देर तक वह सो नहीं पाया। रह-रह कर सादिया की अम्मी नातिन का शव सीने से चिपकाए सामने आ कर खड़ी हो जातीं। तो कभी पोस्टमार्टम हाउस के हाल में लाइन से पसरी लाशें। डाक्टरों की हिप्पोक्रेसी।

और मुनव्वर भाई की लाचारी।

ख़ास कर आइडियालजी के सवाल पर हिप उठा कर हवा ख़ारिज करते हुए उनका यह कहना कि आइडियालजी तो ऐसे ही धीरे-धीरे ख़ारिज हो गई ज़िंदगी से। उसूल, मूल्य वग़ैरह-वग़ैरह सब कुछ गडमड आते जाते रहे। जागते हुए भी और सपने में भी।

सपने में भी।

वह कुछ भी तो नहीं भूल पा रहा था।

एक थे विनोबा भावे, इमरजेंसी के पोषक संत बन कर वह ख़ुद ही सो गए! :  एक थे जे.पी., जैसे वह जीवन भर सत्ता से दूर रहे वैसे ही उन के अनुयायी सत्ता की छाल देह पर लपेटे बिना सांस नहीं ले पाते : सन्नो जब वकील साहब से छुट्टी पाती तो उनके चचेरे भाई दबोच लेते, बाद में नौकर भी दबोच ले ते :

सुबह काम वाली की बेल के साथ ही वह उठ गया। अख़बार वग़ैरह देख कर बाथरूम में घुस गया। तैयार होकर खा पीकर वह आफ़िस पहुंचा तो कल की मीटिंग मिनिट्स देखने लगा। मिनिट्स देख ही रहा था कि उस का मोबाइल बज गया। उठाया तो उस के शहर से जमाल का फ़ोन था।

‘कैसे याद किया जमाल मियां।’ वह तफ़रीह लेते हुए बोला।

‘याद नहीं फ़रियाद कर रहा हूं।’

‘क्यों क्या हुआ?’

‘अरे यहां आप के मुनव्वर भाई नरक किए हुए हैं।’

‘क्या बात कर रहे हो?’ आनंद बिदकते हुए बोला, ‘उन की तो कल बेटी गुज़र गई, वह ख़ुद परेशान हैं।’

‘परेशान थे।’ जमाल बोला, ‘अब परेशान कर रहे हैं।’

‘किस को?’

‘नर्सिंग होम वाले को।’

‘क्यों?’

‘उस से मुआवज़ा मांग रहे हैं पचीस लाख रुपए का।’

‘क्या?’

‘बेटी की लाश ले कर नर्सिंग होम के सामने ले कर मजमा बांधे हैं। मदारियों की तरह।’

‘ऐसा तो नहीं करना चाहिए उन को।’

‘अब कर तो रहे हैं।’ जमाल बोला, ‘यहां बार-बार आप का भी नाम ले रहे हैं आनंद जी! बेटी की लाश तो बेच ही रहे हैं, छोड़ आप को भी नहीं रहे हैं।’

‘क्या बात कर रहे हो?’

‘ठीक कह रहा हूं।’ जमाल गला खंखारते हुए बोला।

‘ऐसे तो वह नहीं थे।’

‘बिलकुल नहीं थे!’ जमाल बोला, ‘पर आनंद जी, जिस मुनव्वर भाई को आप-हम जानते थे वह आदर्शवादी मुनव्वर तो कब का मर गया।’

‘अब क्या कर सकते हैं?’ आनंद अफ़सोस करते हुए बोला।

‘पता है आप को कि अख़बारों को एक छोटा सा बयान जारी करने के लिए भी वह पैसा ले लेते हैं। वह बोला, ‘वह चाहे किसी के पक्ष में हो या किसी के खि़लाफ़। किसी के खि़लाफ़ धरना प्रदर्शन करने में पैसा ले लेते हैं।’ पहले फर्टिलाइज़र कारख़ाने में ट्रेड यूनियन के नाम पर दलाली करते थे, वह बंद हुआ तो शुगर मिलों में दलाली शुरू कर दी, फिर रेलवे में दलाली का डंका बजाया। क्या-क्या बताऊं? आनंद जी और आज अपनी बेटी की लाश पर ताल ठोंक कर मुआवज़ा मांग रहे हैं।’

‘इतना पतन तो नहीं हो सकता मुनव्वर भाई का!’ आनंद ने फिर अफ़सोस जताया और कहा कि, ‘एक तो मुनव्वर भाई का इतना पतन मैं मान नहीं सकता, और अगर ऐसा हुआ भी है तो इस के लिए जमाल मियां तुम और तुम जैसे लोग भी ज़िम्मेदार हैं।’

‘हद है, वो कैसे?’

‘उनको सक्रिय राजनीति से काट कर, उन के ख़िलाफ निरंतर गोटें बिछा कर। इस क़दर कि आज तक वह एम.एल.ए. का चुनाव भी नहीं लड़ पाए।’ आनंद बोला, ‘जब कि मुझे अपने वो दिन याद हैं जब हम लोग सिद्धांतवादी राजनीति के लिए मुनव्वर भाई को न सिर्फ़ जानते थे, उन की क़समें भी खाते थे। और जमाल मियां उन की क़समें खाने वालों में कभी तुम भी थे। अलग बात है जल्दी ही तुम्हारे रास्ते जुदा हो गए और तुम समझौतावादी राजनीति के शिकार हो गए सत्ता के गलियारों में टहलने क्या लगे, सत्ताधारियों की गोद में ही जा बैठे।’

‘तो यह क्या ग़लत हुआ?’ जमाल बिदकते हुए बोला, ‘तब हमारी पार्टी सत्ता में थी, तो सत्ता के गलियारों में हम नहीं टहलते तो कौन टहलता?’

‘मुनव्वर भाई भी तो तब टहल सकते थे।’

‘तब वह सिद्धातों का, मूल्यों और आदर्शों का झुनझुना बजा रहे थे तो कोई क्या करता?’

‘संजय गांधी रिजीम के कांग्रेसी हो तुम और मुनव्वर भाई जैसे लोग। और उस रिजीम की राजनीति में पैदा हो कर भी अगर मुनव्वर भाई सिद्धांत, मूल्य और आदर्श की बात बरसों तक करते रहे तो क्या वह आसान था?’

‘पर अब क्या कर रहे हैं?’

‘अब जैसा कि तुम बता रहे हो, वैसा अगर वह करने लगे हैं तो मैं उस को क़तई जस्टीफ़ाई नहीं कर रहा, कंडम करता हूं!’

‘बस-बस यही! यही मैं चाहता हूं कि एक बार आप उन को फ़ोन कर के समझा दीजिए कि यह सब जो वह कर रहे हैं, बंद करें और नर्सिंग होम से अपनी मदारीगिरी उठा कर चलते बनें। बेटी की लाश को क़ब्रिस्तान ले जाएं। पर उस ग़रीब नर्सिंग होम वाले को बख़्श दें।’

‘मतलब जनाब की सारी सहानुभूति उस नर्सिंग होम वाले के साथ है, मुनव्वर भाई की बेटी के साथ नहीं है।’

‘नहीं, उन की बेटी का शोग़ हम सभी को है, पर उस नर्सिंग होम वाले को वह बख़्श दें, बस!’

‘वह नर्सिंग होम वाले को बख़्शें, न बख़्शें इस में मेरा रोल कहां है?’ आनंद ने जमाल से लगभग खेलते हुए कहा, ‘मैं तो तुम लोगों से कोई तीन सौ किलोमीटर दूर लखनऊ में बैठा हूं, मैं क्या कर सकता हूं?’

‘फ़ोन कर के उन्हें समझा सकते हैं। उन्हें सिद्धांतों, मूल्यों और उसूलों की याद दिला सकते हैं।’ जमाल बोला, ‘मुझे यक़ीन है आप की बात पर वह इतना तो शर्म करेंगे ही कि नर्सिंग होम से अपनी ब्लैकमेलिंग की दुकान हटा लेंगे!’

‘सिद्धांतों, मूल्यों वगै़रह का झुनझुना तो जमाल मियां तुम लोग भी उन के सामने जा कर बजा सकते हो।’

‘हम लोगों की तो वह सुनेंगे नहीं न!’

'तो हमारी कैसे सुन लेंगे?'

‘अरे, आप का नाम सुबह से ही वह क़ुरआन की आयतों की तरह पढ़ रहे हैं, जो ही मिल रहा है उसी से!’ जमाल बोला, ‘और लोग हैं कि चुप हो जा रहे हैं।’

‘मुझे उस शहर में कोई जानता भी है अब के समय में?’

‘अरे आनंद जी आप पुराने चावल हैं, कम से कम हमारा सर्किल, हमारी पीढ़ी आप के चाहने वालों से भरी पड़ी है।’ वह चहका, ‘कभी आज़मा कर देखिए।’ वह लंबी सांस भरते हुए बोला, ‘आप के पुराने कालेज की एक दीवार पर तो अभी भी आप का बड़ा-बड़ा नाम लिखा पड़ा है। किसी ने मिटाने की जुर्रत नहीं की है आज तक। और जो ढूंढें तो यूनिवर्सिटी के गलियारों में भी आप का नाम कहीं न कहीं मिल जाएगा और कहीं न सही छात्र संघ भवन में तो आप का नाम दर्ज है ही।’

‘आज के गुंडों और ठेकेदार छात्र नेताओं के नामों के बीच कहीं फंसा हुआ नाम।’ आनंद बिदका।

‘यही तो आज की पॉलिटिक्स की ट्रेजडी है। ख़ास कर स्टूडेंट पालिटिक्स की।’ जमाल बोला।

‘क्यों मेन पॉलिटिक्स क्या गुंडों और ठेकेदारों से ख़ारिज हो गई है?’

‘इसी की यातना तो हम लोग झेल रहे हैं आनंद जी, जो आज पॉलिटिक्स के हाशिए पर खड़े हैं।’

‘जमाल मियां तुम सिर्फ़ अपनी सोच रहे हो।’ आनंद की बेबसी जैसे बाहर आ गई, ‘सोचो कि तुम तो फिर भी पॉलिटिक्स में हो, कभी हमारे बारे में भी सोचो कि पॉलिटिक्स में हम भी क्यों नहीं हैं? क्यों छोड़नी पड़ी पॉलिटिक्स मुझे! या मेरे जैसे लोगों को पॉलिटिक्स क्यों छोड़नी पड़ती है?’

‘है तो यह अफ़सोसनाक पर क्या करें।’ जमाल ने लंबी सांस भरी और बोला, ‘यह तो लंबा डिबेट हो जाएगा। फिर कभी इस पर बात करेंगे। आप कहेंगे तो सेमिनार करवा देंगे।’

‘अपने किसी एन.जी.ओ. के थू्र!’ बात बीच में काटता हुआ आनंद बोला, ‘आज कल कुल कितने एन.जी.ओ. चला रहे हो?’

‘यही कोई सात-आठ।’

‘मैंने तो सुना कि बीस-पच्चीस एन.जी.ओ. हैं तुम्हारे और सभी करोड़ों में लोट पोट हैं।’ आनंद बोला, ‘मैं कहूं कि आख़िर क्यों कांग्रेस यू.पी. में ज़मींदोज़ हो गई है। अब कांग्रेसी भैया लोग स्वैच्छिक संगठन चलाएं कि कांग्रेस का संगठन।’

‘क्या आनंद जी!’ जमाल बोला, ‘सुबह से क्या मैं ही मिला हूं? और एन.जी.ओ. किस पार्टी के लोग नहीं चला रहे हैं?’ वह बोला, ‘गुंडों ठेकेदारों और करप्ट लोगों के बीच पॉलिटिक्स में कैसे सरवाइव कर रहे हैं हम और हमारे जैसे लोग ही जानते हैं।’

‘क्या बात कर रहे हो?’ आनंद ने तंज़ किया, ‘दो-दो बार एम.पी. का टिकट पाए तुम और दोनों बार ज़मानत तक नहीं बचा पाए और फिर भी बता रहे हो कि सरवाइव कर रहे हैं। अरे, सरवाइवल अगर प्राब्लम है तो छोड़ दो पॉलिटिक्स, पॉलिटिशियन बन कर एन.जी.ओ. चलाने से अच्छा है एन.जी.ओ. ही चलाओ! सीधे-सीधे धंधे में आओ!’

‘चलिए यह सारे गिले-शिकवे कभी फिर दूर कर लेंगे।’ जमाल बोला, ‘अभी तो मुनव्वर भाई को संभालिए।’

‘उन को हम क्या संभालें? तुम लोग क्या कम हो, उन्हें संभालने के लिए?’

‘मेरी तो कभी उन्हों ने सुनी ही नहीं। हरदम मेरे लिए उलटा ही सोचा उन्हों ने।’

‘तुम भी तो उन्हें हमेशा काटते ही रहे। इतना काटा कि बेचारे मुख्य धारा की राजनीति छोड़ो, हाशिए पर भी नहीं रहे। कहूं कि धोबी के कुत्ते हो गए, न घर के रहे न घाट के।’ आनंद बोला, ‘कि आज उन का इतना पतन हो गया है कि बेटी की लाश पर मुआवज़ा मांगने लगे हैं।’

‘यही तो!’ जमाल ऐसे चहक कर बोला जैसे उस ने मैदान मार लिया हो, ‘आनंद जी इसी लिए कह रहा हूं कि प्लीज़ उन्हें समझाइए।’

‘देखो जमाल मियां, मेरे वश का उन्हें समझाना है भी नहीं, और फिर जिस की आंख पर लोभ और लालच का चश्मा चढ़ जाता है वह किसी के समझाने पर समझता भी नहीं है।’

‘फिर भी आप ट्राई तो कर ही सकते हैं।’

‘कोई फ़ायदा नहीं। जमाल मियां तुम ने ग़लत नंबर मिला लिया है।’ आनंद ने कहा, ‘वैसे भी नर्सिंग होम वाले ने भी कोई कम हरामीपना नहीं किया कि सत्तर-अस्सी परसेंट जली हुई बच्ची को ह़ते भर अपने पास रखा और जब देह में सेप्टिक फैलने लगा तो प्लेटलेट कम होने का बहाना बना कर अपनी बला टालने के लिए लखनऊ रेफ़र कर दिया तब जब कि प्लेटलेट की कोई समस्या ही नहीं थी।’

‘आप ही कह रहे हैं कि बच्ची सत्तर-अस्सी परसेंट जली हुई थी तो वह कैसे बचती भला?’

‘बच भी सकती थी अगर वह उसे तुरंत दिल्ली में सफ़दरजंग अस्पताल भेज देते या फिर वहीं मिलेट्री हास्पिटल भेज देते जैसे बाद में लखनऊ भेजा। पहले ही भेज देते।’ आनंद ज़रा रुका और बोला, ‘जब तुम जानते हो, मैं जानता हूं कि सत्तर-अस्सी परसेंट जली बच्ची को बचाना मुश्किल था तो क्या वह नर्सिंग होम वाला नहीं जानता था? और जो जानता था तो उस ने साफ़-साफ़ मुनव्वर भाई को क्यों नहीं बता दिया कि आप की बेटी नहीं बच सकती। पर नहीं, उस ने उन्हें बताया कि दस पंद्रह परसेंट जली है, ठीक हो जाएगी। बीस पच्चीस हज़ार रुपए उस ग़रीब आदमी से ऐंठ लिए सो अलग। और जब केस बिगड़ा तो प्लेटलेट की कमी का हौव्वा खड़ा कर के लखनऊ भेज कर अपना पिंड छुड़ा लिया।’

‘आप तो मुनव्वर भाई को ही जस्टीफ़ाई कर रहे हैं।’ जमाल ज़बान में कड़वाहट भरते हुए बोला।

‘क़तई नहीं।’ आनंद बोला, ‘मैं मुनव्वर भाई को क़तई जस्टीफ़ाई नहीं कर रहा पर नर्सिंग होम वाले के हरामीपने को प्वाइंट आउट कर बता रहा हूं कि वह भी कम दोषी नहीं है। और बताऊं जमाल मियां कि मुनव्वर भाई की वह फूल सी बेटी लगता है अभी भी मेरी आंखों में बसी बैठी है। उस बेचारी अबोध का क्या दोष था, जो उसे निरपराध दुनिया से कूच करना पड़ा?’

‘चलिए आनंद जी, कोई बात नहीं, कोई हासिल नहीं हुआ इतनी लंबी बात का आप से।’

‘वैसे जमाल मियां सच-सच बताओ कि उस नर्सिंग होम वाले से तुम को इतनी सहानुभूति क्यों हो रही है?’ आनंद ने अपनी बात में पिन थोड़ी और चुभोई, ‘कि तुम किसी डील के तहत यह इतनी देर से बात कर रहे हो? फ़ोन के बिल की परवाह किए बिना!’

‘कैसी डील?’ जमाल ज़रा भोला बनता हुआ बोला ‘समझा नहीं।’

‘इतने भोले मत बनो जमाल मियां।’ आनंद बोला, ‘मैं नर्सिंग होम वाले से तुम्हारी डील की बात कर रहा हूं।’

‘अरे नहीं आनंद जी!’ झेंप भरी आवाज़ में जमाल बोला, ‘कोई डील वील नहीं। वह तो अपने जानने वाले हैं! और ग़रज़ सिर्फ़ इतनी थी कि मैं जब कभी हेल्थ कैंप वगै़रह लगवाता हूं ग़रीबों के लिए तो इनके डाक्टरों की निःशुल्क सेवाएं मिल जाती हैं तो मैं ने सोचा कि मैं भी अपना फ़र्ज़ अदा कर दूं।’

‘ठीक है तुम अपना फ़र्ज़ अदा करो। पर जमाल मियां इस केस के बीच में मुझे प्लीज़ मत डालो और माफ़ करो। फिर कभी कुछ मेरे लायक़ हो तो ज़रूर बताना।’

‘ओ.के. आनंद जी!’ कह कर जमाल ने फ़ोन काट दिया।

आनंद भी आफ़िस के काम में लग गया।

लेकिन यादों में फिर पुरानी रीलें घूमने लगीं।

गोरा चिट्टा गोल मुंह वाला जमाल। लोग कहते उस के एक नहीं दो मुंह हैं। दोनों ‘गोल’। इस ‘गोल’ के प्रतीक को कम ही लोग समझते थे। खै़र, यह तो बाद की बात है। पहले तो वह आनंद से मुनव्वर भाई के साथ ही मिला था। तब दोनों जार्ज इस्लामिया कालेज में पढ़ते थे। दोनों ही छात्र संघ पदाधिकारी थे। दोनों ही युवक कांग्रेस के सदस्य थे। जमाल मुनव्वर भाई से दो साल जूनियर था और अपने कालेज के छात्र संघ में भी जूनियर लाइब्रेरियन था। जब कि मुनव्वर भाई महामंत्री। तब जमाल मुनव्वर भाई के पास हरदम शरणागत रहता और मुनव्वर भाई भी उसे आशीर्वाद दिए रहते। लेकिन आनंद को तभी दो चार मुलाक़ातों में ही समझ में आ गया कि जमाल महत्वाकांक्षी व्यक्ति है और कि वह मुनव्वर भाई के कंधे पर पांव रख कर बहुत जल्दी उन को पीछे करने वाला है। उन दिनों वह छींटदार बुशर्ट और बेलबाटम पहनता था जब कि मुनव्वर भाई खादी का सफ़ेद कुर्ता पायजामा। हां, हाथ में उन के डायरी और अख़बार भी होता था। उन दिनों मुनव्वर भाई को उस ने कभी पैंट क़मीज़ तो क्या खादी के सफे़द कुर्ता पायजामा के सिवाय किसी और ड्रेस में भी नहीं देखा। हां, घर में ज़रूर वह करघे की चेकदार लुंगी में होते। पर जमाल बिलकुल उलट! जब ख़ूब चौड़ी मोहरी वाले बेलबाटम पर छींट वाली बुशर्ट पहन कर हाई हील की संेडिल पहने लचक कर वह चलता तो पीछे से कई बार लड़की होने का भ्रम देता। उस की इसी चाल और चेहरे मोहरे से वशीभूत कुछ देहाती टाइप के छात्र उसे ‘नमकीन’ या ‘चिक्कन’ खि़ताब से नवाज़ते। इस ‘नमकीन’ या ‘चिक्कन’ पर कभी वह ऐतराज़ जताता तो कभी चुप लगा जाता। मौके़-मौक़े की बात होती। कभी यह शब्द उसे सूट करता, कभी नहीं। यह पूरी तरह उस के मिज़ाज पर मुनःसर करता। मुनव्वर भाई के सामने कभी ज़िक्र होता तो वह मुसकुरा कर टाल जाते। कभी कभार बात कुछ ज़्यादा बढ़ती तो वह जैसे हस्तक्षेप करते हुए कहते, ‘नहीं नहीं लड़का अच्छा है।’ तो कभी कहते ‘वर्कर अच्छा है।’ बाद के दिनों में मुनव्वर भाई शहर युवक कांग्रेस के महामंत्री हुए तो कुछ ही दिनों बाद जमाल भी शहर युवक कांग्रेस का संगठन मंत्री बन गया। युवक कांग्रेस संजय गांधी कल्चर में ऊभ चूभ थी। उधर अंबिका सोनी राष्ट्रीय स्तर पर झंडे गाड़ संजय गांधी की ‘ख़ास’ बनी मचल रही थीं तो शहरांे में भी लड़कियों की खेप की खेप युवक कांग्रेस ज्वाइन कर लचक रही थी। उसी लचक में जमाल भी कमर लचकाता फिरता रहता।

कांग्रेसी नेताओं के लिए जैसे बहार आ गई थी। बाक़ी पार्टियों में महिलाओं का लगभग अकाल था। पर कांग्रेस में, वह भी युवक कांग्रेस में वसंत मचल रहा था।

लेकिन शहर के एक नेता जो उन दिनों प्रदेश सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर थे, युवक कांग्रेस की लड़कियों पर नहीं जमाल पर फ़िदा हो गए। उनकी सोहबत में आते ही जमाल ने अपनी अंकुआती, टीनएज मूछों को भी साफ़ करवा दिया। और जमाल की गाड़ी चल निकली। कांग्रेसियों में मज़ाक़ चलता कि अगर जमाल जनसंघ में होता तो ज़्यादा बिज़ी होता और कहीं ज़्यादा सफल भी। पर जमाल को यह सारी चीज़ें न दिखाई देतीं, न यह तंज़ सुनाई देता। उसे तो सफलता की सीढ़ियां चढ़नी थीं, वह चढ़ रहा था। भले इन सफलता की सीढ़ियों के बदले कोई उस पर भी चढ़ लेता था। देखते-देखते वह शहर युवक कांग्रेस का अध्यक्ष हो गया और मुनव्वर भाई महामंत्री ही रह गए। लोग मुनव्वर भाई से कहते भी कि, ‘बताइए आप उससे सीनियर हैं और उसके अंडर में काम कर रहे हैं?’ लोग उन्हें सलाह देते कि, ‘इस्तीफ़ा क्यों नहीं दे देते?’ वह कहते, ‘कैसे इस्तीफ़ा दे दूं? वह जोड़ते, ‘कांग्रेस का अनुशासित सिपाही हूं जो ज़िम्मेदारी दी जाएगी, वही तो निभाऊंगा।’

‘पर जमाल तो आप का जूनियर है।’ आनंद ने भी एक दिन मुनव्वर भाई को घेरा।

‘जूनियर था, अब वह मेरा सीनियर है!’ संक्षिप्त सा जवाब दिया मुनव्वर भाई ने और कहा कि, ‘पार्टी ने ज़रूर उस को मुझ से योग्य समझा तभी उसे यह मौक़ा, यह ज़िम्मेदारी दी गई।’ पर मुनव्वर भाई की यह सादगी, यह त्याग, यह अपमान का घूंट भी उन के काम नहीं आया। बात उठी कि अध्यक्ष और महामंत्री दोनों ही मुस्लिम कैसे हैं? कोई एक पद गै़र मुस्लिम को दिया जाना चाहिए। और यह सवाल भी किसी और ने नहीं, जमाल ने ही उठवाया। क्यों कि मुनव्वर भाई का क़द उसे अध्यक्ष होने के बावजूद ढंक लेता था। उनकी लियाक़त, सादगी और त्याग महामंत्री होने के बावजूद, उन के सामने अध्यक्ष बौना पड़ जाता था। अध्यक्ष को भी अपना बौनापन चुभता था तो सो उस ने एक पद गै़र मुस्लिम को जाना चाहिए की चर्चा को हवा दी और फिर इस हवा को आग दी। अंततः मुनव्वर भाई के महामंत्री की बलि चढ़ी और एक त्रिपाठी जी को जो कि निहायत ही चुगद टाइप के थे, शहर कांग्रेस का महामंत्री बना दिया गया। मुनव्वर भाई ख़ाली हो गए।
लेकिन जल्दी ही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति मुनव्वर भाई के काम आई। एक एम.पी. ने जिस का उस कैबिनेट मंत्री से दुराव था, जोड़-तोड़ कर के मुनव्वर भाई को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का मेंबर बनवा दिया। शहर कांग्रेस के महामंत्री पद से हटने के बाद मुनव्वर भाई डिप्रेशन में आ गए थे। पी.सी.सी. की मेंबरी ने उन्हें डिप्रेशन से उबारा। अब वह फिर से सक्रिय हो गए थे।

लेकिन सक्रिय उधर जमाल भी था कि कैसे उन की पी.सी.सी. की मेंबरी कटवाई जाए। पर मुनव्वर भाई फिर भी बेफ़िक्र थे। कोई इस बारे में कुछ कहता भी तो वह कहते कि, ‘कटवा दे। कौन बैनामा करवा कर आया हूं पी.सी.सी. की मेंबरी। क्या पता यहां कटे तो आल इंडिया कांग्रेस कमेटी की मंेबरी मिल जाए। यहां तो बस पार्टी के लिए काम करते रहना है एक मज़बूत सिपाही की तरह जिस को जो करना हो करे, हमें क्या?’

बात ख़त्म हो जाती।

आनंद ने एक बार एक रेस्टोरेंट में बैठे-बैठे जमाल से उस कैबिनेट मिनिस्टर की चर्चा करते हुए पूछा कि, ‘तुम्हारा परिचय इनसे कैसे हुआ?’

‘मुनव्वर भाई ने करवाया।’ छूटते ही जमाल बोला।

‘तब भी तुम मुनव्वर भाई को इतना काटते हो?’

‘कोई किसी को नहीं काटता।’ जमाल बोला, ‘लोग ख़ुद ब ख़ुद कट जाते हैं। और आप को बताऊं कि ज़ाती तौर पर मैं मुनव्वर भाई की बेहद-बेहद रिस्पेक्ट करता हूं। और करता रहूंगा। उन के बहुत से एहसान हैं मुझ पर। बल्कि सच कहूं तो मैं आज जो कुछ भी हूं मुनव्वर भाई की वजह से हूं।’

‘ऐसा!’ आनंद ने तंज़ किया।

‘जी बिलकुल।’ वह बोला, ‘मैं कोई एहसानफ़रामोश इंसान नहीं हूं।’

‘तब भी तुम मुनव्वर भाई को इतना काटते हो।’ आनंद ने अपनी बात फिर दुहराई।

‘देखिए आनंद जी मैं ने आप से पहले भी अर्ज़ किया कि कोई किसी को नहीं काटता, लोग ख़ुद ब ख़ुद कट जाते हैं।’ वह बोला, ‘रही बात मेरी और मुनव्वर भाई की तो आलाकमान जिस को तय करेगा वही तो काम करेगा। और मैं कोई आलाकमान तो हूं नहीं।’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘अब अगर आलाकमान पार्टी में युवा मुसलमानों के नेता के तौर पर मुझे बेहतर पाता है तो मुझे ख़ुशी होती है। और आनंद जी पार्टी में युवा मुसलमानों का नेता तो कोई एक ही रहेगा। दस-बीस तो नहीं हो सकते?’

‘तुम शायद जानते ही होगे कि मुनव्वर भाई की सोच में मुसलमानों, सिर्फ़ मुसलमानों का नेता बनना नहीं है। वह सारे समाज और देश का नेता बनने का सपना देखते हैं। बड़े दायरे में सोचते हैं।’

‘यह तो ज़मीनी हक़ीक़त से मुंह मोड़ने वाली बात है।’ जमाल बोला, ‘वोट हिंदू मुसलमान के ख़ाने में हैं, देश बंट गया हिंदू मुसलमानों के ख़ाने में।’

‘तुम को लगता है कि तुम्हारी नेता इंदिरा गांधी सिर्फ़ हिंदुओं की नेता हैं?’

‘बिलकुल नहीं।’

‘फिर?’ आनंद बोला, ‘चलो तुम्हारी बात पर आते हैं। तुम्हें मालूम है कि पार्टी और पार्टी के बाहर तुम्हारी इमेज युवा मुस्लिम नेता से ज़्यादा मंत्री जी से क़रीबी होने की है!’

‘अब मंत्री जी भी मुझे पसंद करते हैं तो यह मेरी ख़ुशनसीबी है!’

‘तुम्हारी इस ख़ुशनसीबी का सच बताऊं?’

‘देखिए आनंद जी, मैं आप की बेहद-बेहद रिस्पेक्ट करता हूं।’ तिलमिला कर वह बोला, ‘आप से बिलो द बेल्ट बात या लूज़ टाक की उम्मीद मैं नहीं करता।’

‘पर जमाल सच को तुम कब तक टालोगे?’

‘माना कि आप मुनव्वर भाई के वेल-विशर हैं पर मैं जानता हूं कि आप मेरे भी दुश्मन नहीं हैं।’

‘ठीक बात हैे।’ आनंद ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘हक़ीक़त यह है कि तुम्हें पार्टी या पार्टी के बाहर भी मंत्री जी के लौंडे के रूप में जाना जाता है। आने वाले दिनों में अगर इस इमेज से तुम ने छुट्टी नहीं ली तो तुम्हारे युवा मुसलमानों का नेता बनने में मंत्री जी भी एक हद से आगे मदद नहीं कर पाएंगे। इस पर तुम्हें सोचना चाहिए। यह मेरी जंेटिल एडवाइस है तुम्हें।’

‘आनंद जी अब आप ने कुछ ज़्यादा ही बोल दिया है। आप की रिस्पेक्ट करता हूं।’ जमाल तिलमिलाता हुआ कुर्ते की आस्तीन मोड़ता हुआ बोला, ‘आप की जगह अभी कोई दूसरा होता तो उस की खोपड़ी फोड़ देता।’ कहते-कहते वह उत्तेजित हो कर चिल्लाने लगा।

कुछ लोगों ने आ कर उसे पकड़ा तो वह होश में आया और कहने लगा, ‘आनंद जी आप अपने वर्ड्स वापस ले लीजिए वरना बहुत बुरा होगा!’

‘देखो जमाल मैंने तुम पर कोई लांछन या कोई आरोप नहीं लगाया सो कोई वर्ड्स वापस लेने जैसी कोई बात है नहीं।’ आनंद भी तेज़-तेज़ बोलने लगा और कहा, ‘मैं ने सिर्फ़ तुम्हारी बिगड़ती इमेज की चर्चा की और मेरी बात पर यक़ीन न हो तो कहो यहीं रायशुमारी करावा दूं लोगों से। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा!’

‘स्टाप इट! स्टाप इट आनंद जी!’ जमाल फिर चिल्लाया, ‘अब यह सब करेंगे तो आप का लिहाज़ भूल जाऊंगा मैं।’

तब तक रेस्टोरेंट की भीड़ आनंद और जमाल के पास सिमट आई थी। कुछ लोगों ने जमाल को पकड़ लिया और कुछ आनंद से वहां से चले जाने को कहने लगे। कि तभी वहां फ़तेह बहादुर सिंह आ गए। आए धीरे से हंसे और आनंद के कान में फुसफुसा कर पूछा कि, ‘इस को मंत्री का लौंडा कह दिया क्या?’ आनंद ने प्रकारांतर से मुंह गोल कर के हामी भरी तो वह फिर धीरे से हंसे और बीच बचाव कर बात ख़त्म करवाई। दोनों को फिर से चाय पिलवाई, हाथ मिलवाया और विदा किया।

फ़तेह बहादुर सिंह का नाम फ़तेह बहादुर सिंह भले था पर अपने नाम के अनुरूप फ़तेह कभी पाई नहीं उन्होंने अपनी ज़िंदगी में। कम से कम अब तक तो यही था। आदर्शवादी राजनीति के मारे हुए फतेह बहादुर अब किसी तरह सरवाइव कर रहे थे।

और आनंद?

आनंद उन दिनों आदर्शवादी राजनीति का ककहरा पढ़ रहा था।

‘जज़्बात, सिद्धांत, ईमानदारी और मेहनत! ये चार शब्द अगर आप अपने जीवन में गंठिया लें और सौ फ़ीसदी अमल में भी लाएं तो आप को तरक़्क़ी से कोई रोक नहीं सकता।’ आनंद जब अपनी खनकदार लेकिन सहज आवाज़ में अपने साथियों के बीच यह बात कहता तो साथियों पर उस का रौब तो नहीं ग़ालिब होता। पर वह अपने दोनों कंधे थोड़ा सा अदब से झुकाए गर्दन ज़रा आगे बढ़ा कर जाकेट के पॉकेट में दोनों हाथ डाले जैसे जोड़ता, ‘फिर देश में ही क्या हो सकता है दुनिया के नक़्शे पर आप के नाम का परचम लहराए।’ वह जैसे बुदबुदाता, ‘कोई रोक ही नहीं सकता आप को आगे बढ़ने से!’ साथी लोग आनंद की इन बातों पर मन ही मन मुसकुराते और आगे बढ़ जाते। लेकिन कुछ साथी थे ऐसे जिन्हें आनंद की इन सीधी बातों में दम दिखता और वह उन्हें एप्रीशिएट करते। तो कुछ साथी ऐसे भी थे जो खुल्लमखुल्ला उसे क्रेक डिक्लेयर कर देते। लेकिन उस के सामने नहीं, पीठ पीछे। पर बात घूम फिर कर आनंद तक भी आती। लेकिन आनंद उन साथियों पर नाराज़ होने, अप्रिय टिप्पणी करने से लगभग बचता। और जब साथी कुढ़ते हुए उन्हें कुरेदते इस मसले पर कि, आख़िर वह सब आप को क्रेक डिक्लेयर कर रहे हैं! तो वह लगभग गंभीर होते हुए कहता, ‘ये सब हताश और परेशान लोग हैं। इन की बातों का प्रतिवाद कर इन से माथा फोड़ना, फोड़वाना है। शोहदे हैं सब जाने दीजिए। हम लोग अपना काम करें।’

यह सत्तर के दशक के बीच के साल थे। इमरजेंसी बस लगना ही चाहती थी। और आनंद राजनीति में उतर रहा था। विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में। मूल्यों और आदर्श की राजनीति करने। मुश्किल था यह काम। वह मानता था। पर ज़रूरी भी है, यह भी वह मानता था। कहता था, ‘यह बेहद ज़रूरी है।’

संजय गांधी की युवक कांग्रेस ब्रिगेड की छाया इस विश्वविद्यालय में भी थी और भरपूर। लड़कियां बेलबाटम पहन कर निकलतीं और संजय गांधी ब्रिगेड के लड़के उस में घुसने को तैयार! घात लगा कर घुस भी जाते।
कुछ दिन बाद तो युवक कांग्रेस में लड़कियों की जैसे बहार आ गई। अब बहुतेरे लड़के तो युवक कांग्रेस की सदस्यता रसीद कटवाते ही इसी लिए थे कि वहां खुले व्यवहार वाली लड़कियां भी हैं। विश्वविद्यालय भी इसी हवा में सांस खींच रहा था। और इस आबोहवा में आनंद चला था, मूल्यों और आदर्श की राजनीति करने।

उस का लंबा क़द और चौड़ा माथा उस के सैद्धांतिक राजनीति में जैसे कलफ़ लगाता। हालां कि इस तरुणाई में भी वह तन कर नहीं ज़रा झुक कर खड़ा होता। और नौजवानों को जैसे मोह लेता अपनी इस अदा से। लोहिया और गांधी, मार्क्स और लेनिन को पढ़ते-पढा़ते आनंद का़का और सार्त्र को भी पढ़ता। दास्तोवस्की और गोर्की के साथ-साथ प्रेमचंद और निराला को भी बांचता। दिनकर को गर्व से गाता और बच्चन को भी गुनगुनाते हुए धूमिल की कविताएं और दुष्यंत कुमार के शेर कोट करता चलता। अजब कंट्रास्ट था। लोग बाग और गुरुजन भी पूछते उस से कि तुम बनना क्या चाहते हो आखि़र आनंद? नेता कि बुद्धिजीवी? पहले यह तो तय कर लो।’ वह अकुलाते हुए कहता, ‘बनना तो अच्छा आदमी ही चाहता हूं। और अच्छा आदमी बन कर राजनीति करना चाहता हूं।’

‘साहित्य और राजनीति एक साथ?’

‘मार्क्स कहता था कि रूसी समाज को जानने में उसे गोर्की से काफ़ी मदद मिलती है।’

‘तो साहित्य पढ़ कर, किताब पढ़ कर समाज को जानोगे, फिर राजनीति करोगे?’

‘हर्ज क्या है?’

‘क्यों ख़ुद समाज से बाहर रहते हो क्या?’ एक गुरुजन की तल्ख़ टिप्पणी थी तो विश्वविद्यालय छात्र संघ के एक पूर्व अध्यक्ष बोले, ‘यह न तो राजनीति करेगा, न साहित्य! जो भी करेगा वह एक नपुसंक राजनीति के बाने में रह कर बुद्धिजीवी होने के ढोंग का सुख भोगेगा।’

‘देखिए आप समझते नहीं हैं। राजनीति बिना विचार के संभव है क्या? बिना सिद्धांत और मूल्य के संभव है क्या? या आप लोग संजय गांधी की युवक कांग्रेस वाली फासीवादी राजनीति में देश को नष्ट करने का सपना देख रहे हैं? मैं तो भाई इस का पुरज़ोर विरोध करता हूं।’ कहते हुए आनंद विश्वविद्यालय की सड़कों पर छितराए गुलमुहर के छोटे-छोटे फूलों को कुचलते हुए आहिस्ता-आहिस्ता ऐसे चलता गोया वह फासीवादी राजनीति को कुचलते हुए चल रहा हो गुलमुहर के फूल नहीं।

लेकिन उस को लगता था कि उस के सपने कुचले जा रहे हैं। साफ़ सुथरी राजनीति का सपना। विचारों की राजनीति का सपना।

आनंद पर उन दिनों लोहिया का नशा सवार था। लोहिया का दाम बांधो, जाति तोड़ो, अंगरेज़ी हटाओ का कंसेप्ट उस के सिर चढ़ कर बोलता था। पर दिक़्क़त यह थी कि आनंद दाम बांधो, जाति तोड़ो, बुदबुदाता था पर दाम थे कि बंधते नहीं थे और राजनीति थी कि जातियों के आक्सीजन में जी रही थी। ग्रास रूट पर जाता तो बिना जातिगत चौखटे के कोई बात ही नहीं होती। और जब सेमिनारों में जाता तो बिना अंगरेज़ी के औघड़पन के कोई बात ही नहीं सुनता। अजीब अंतर्विरोध में फंसता जा रहा था आनंद!

इन सांघातिक स्थितियों से जूझ-जूझ कर वह फिर-फिर हारता, हारता जाता। हार-हार कर बुदबुदाता सर्वेश्वर की एक कविता, ‘जब-जब सिर उठाया चौखट से टकराया।’

कभी कभार वह इस कविता को स्वर भी देता और लगभग किचकिचा कर बोलता, ‘जब-जब सिर उठाया चौखट से टकराया।’ तो उस के घेरे में उपस्थित उद्दंड छात्र कविता का भाष्य, मर्म या संकेत समझने के बजाय एक भद्दा सा फ़िक़रा कसते, ‘तो आनंद जी सिर उठा के चलते ही क्यों हैं?’

‘क्या करूं सिर झुका कर चलने की आदत नहीं है।’

‘पर गरदन तो आप की हरदम कंधे में धंसी रहती है।’ दूसरा फ़िक़रा आता।

‘और जो ज़्यादा दिक़्क़त हो तो चौखट बड़ा बनवा लीजिए। छोटे चौखट को उखड़वा फेंकिए।’ तीसरा फ़िक़रा आता, ‘चौखट का क्या दोष, आप ख़ुद ही ज़्यादा लंबे हैं।’

‘बेवक़ूफ़ो मैं घर के चौखट की बात नहीं कर रहा।’

‘तो?’

‘समाज की, राजनीति की, व्यवस्था के चौखट की बात कर रहा हूं।’ आनंद थोड़ा सहज, थोड़ा असहज हो कर बताता। व्यवस्था विरोधी बातें करना आनंद की जैसे आदत में शुमार होता जा रहा था।

जे.पी. मूवमेंट ज़ोर पकड़ रहा था। आनंद को जैसे राह मिल गई। वह भी जे.पी. मूवमेंट से जुड़ गया। हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, इस आकाश से कोई गंगा निकलनी चाहिए/मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए/सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।’ अपने भाषणों में दुष्यंत का यह शेर आनंद जब दोनों हाथ जाकेट के जेबों में डाले, गरदन कंधों में धंसाए पढ़ता तो जैसे लोगों में चिंगारी फूट पड़ती व्यवस्था को बदलने की। पर्वत सी पीर पिघलती तो ख़ैर नहीं दिखती लेकिन, सीनों में आग ज़रूर सुलगती। लोगों के ज़ेहन में और जज़्बात में भी। आनंद अब अपनी राजनीति की हदें विश्वविद्यालय से बाहर भी तलाश रहा था। नुक्कड़ सभाएं उस की शहर से ले कर गांवों तक फैल रही थीं। शहरों में अपने भाषणों में वह शेर सुनाता तो गांवों में लोक गीतों के मुखड़े।

आनंद की स्वीकृति अब एक स्थानीय जुझारू नेता की हो रही थी। और स्थानीय लोग उस में एक राष्ट्रीय नेता की संभावना साफ़ देख रहे थे।

आनंद भी नुक्कड़ सभाएं ज़रूर कर रहा था लेकिन उस के भाषणों में राष्ट्रीय फ़लक होता, स्थानीय मुद्दे और घटनाएं भी होतीं लेकिन ज़िलाधिकारी और थानेदार नहीं आते उस के भाषणों में अन्य स्थानीय नेताओं की तरह। बल्कि समूची व्यवस्था और व्यवस्था का देश समाया होता उस के भाषणों में। अपने देश के प्रजातंत्र में वह खोट ढूंढता और धूमिल को कोट करते हुए बताता कि ‘हमारे देश का प्रजातंत्र ठीक वैसे ही है जैसे किसी बाल्टी पर लिखा हुआ हो आग पर उस के भीतर होता है बालू या पानी।’ बात को वह और आगे बढ़ाता बतर्ज़ धूमिल ही, ‘लोहे का स्वाद लोहार से नहीं उस घोड़े से पूछो जिस के मुंह में लगाम लगी हुई है।’ सत्ता व्यवस्था की विद्रूपता प्याज़ की तरह परत दर परत वह जब अपने भाषणों में खोलता तो उस के समकालीन छात्र नेता तो छोड़िए अन्य वरिष्ठ राजनीतिज्ञ भी दांतों तले उंगली दबा लेते। बुज़ुर्ग नेताओं को आनंद में एक बड़ी संभावना दिखने लगी थी। लेकिन ज़्यादातर स्थानीय राजनीतिज्ञ आनंद की काट ढूंढने लग गए थे। क्यों कि उन में आनंद के रूप में अपने लिए ख़तरा दिखने लगा था। एक स्थानीय नेता तो ऐलान ही कर बैठे कि, ‘आनंद के पर अभी नहीं कतरे गए तो किसी दिन ये लखनऊ दिल्ली में बैठेगा और हम लोग इस का दरबार करेंगे और ये साफ़ सुथरी राजनीति की सनक में हम लोगों की एक नहीं सुनेगा।’

आनंद के कानों तक भी यह बात आई लेकिन वह बोला, ‘आज की तारीख़ में यह और ऐसी बातों का कोई अर्थ नहीं है। अभी हम सबको एकजुट हो कर रहना है और बड़ी लड़ाई लड़नी है।’

इस बड़ी लड़ाई की अगुवाई जे.पी. कर रहे थे और आनंद तथा उस जैसे जोग अपने को जे.पी. का सिपाही बताते थे और यही जे.पी. देश भर में अलख जगाते आनंद के शहर आ रहे थे। पूरा शहर जैसे एक जुनून में क़ैद हो गया था। कांग्रेसी हकबक अलग-थलग पड़ ऐसे छटपटा रहे थे गोया कोई उन की विरासत छीन ले रहा हो।

जे.पी. का कार्यक्रम अंततः विश्वविद्यालय में ही रखा गया। जे.पी. बीमार थे लेकिन सत्ता व्यवस्था ज़्यादा बीमार थी सो वह सत्ता व्यवस्था की बीमारी दूर करने, व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव की बात कर रहे थे। देश भर में घूम-घूम कर।

जे.पी. जब आए तो उन्हें ट्रेन से रिसीव करने, उन्हें ठहराने, उन के कार्यक्रम तक आगे-आगे रहने वालों में आनंद भी एक था। जाने क्यों जे.पी. के आस-पास उपस्थित रह कर ही आनंद और उस के जैसे लोगों के नथुनों में एक अजीब सी सांस समा जाती, सीने फूलने लगते और मन उड़ने लगता। अजीब सी फैंटेसी, अजीब सा उत्साह था यह।

हालांकि बहुतेरे लोगों ने गुपचुप ही सही काटने की बहुतेरी कोशिश की आनंद को लेकिन जब जे.पी. विश्वविद्यालय पहुंचे तो छात्र-छात्राओं और लोगों के उमड़ आए जन सैलाब को जे.पी. के पहले आनंद ने संबोधित किया। बहुत ही संक्षिप्त भाषण था आनंद का और कहा कि यहां आप लोग जे.पी. को सुनने आए हैं, मुझे नहीं, यह मैं जानता हूं और मैं यह भी जानता हूं कि ‘कैसे-कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।’ फिर लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नारों से आकाश गूंजने लगा। लोग नारे लगा रहे थे जे.पी. तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं। जे.पी. ने अस्वस्थ होने के कारण अपना भाषण कुर्सी पर बैठे-बैठे दिया। और अपने भाषण से नौजवानों में सत्ता व्यवस्था को बदलने का एक नशा, एक जुनून, रच कर एक जंग का ऐलान कर दिया।

आनंद और उस के जैसे नौजवान तो इस सत्ता व्यवस्था को उखाड़ने के लिए जैसे कमर कस कर कूद पड़े। उस के भाषणों में जैसे आग दहकती थी। आनंद ने अब अपने साथ कुछ रंगकर्मियों को भी जोड़ लिया था और अपने भाषण के पहले व्यवस्था विरोधी नुक्कड़ नाटक-नुक्कड़ गीत भी करवाता। ‘हम होंगे कामयाब एक दिन हो-हो मन में है विश्वास, पूरा ़है विश्वास हम होंगे कामयाब एक दिन।’ जब उस के रंगकर्मी साथी एक स्वर में गाते तो एक समां सा बंध जाता।

आनंद को जे.पी. मूवमेंट में एक राह, एक जुनून, एक नशा तो मिला ही था, पर एक सब से बड़ी बात यह थी कि इस मूवमेंट में तब जातिवादी गंध नहीं थी। जातिवादी राजनीति या अंगरेज़ी की हिप्पोक्रेसी की चौखट से सिर के टकराने की नौबत नहीं थी। यह बहुत बड़ी सहूलियत थी।

युवक कांग्रेस के नेताओं की राजनीति इन दिनों बिखरने लगी थी। अलग बात है कि युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष आनंद के ही शहर के थे और पढ़े लिखे भी। लेकिन स्थानीय राजनीति में उन का बहुत ज़ोर इस लिए नहीं था कि उन की राजनीतिक यात्रा अपने शहर से नहीं बल्कि बनारस से शुरू हुई थी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से। एम.टेक. टॉंप किया था उन्हों ने और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी छात्र संघ के अध्यक्ष रहे थे। पढ़े लिखे समझदार और साफ़ सुथरी राजनीति के हामीदार रहे तब के प्रदेश युवक कांग्रेस अध्यक्ष राकेश को आनंद बहुत पसंद करता था पर कहता था कि वह ग़लत पार्टी में हैं। उन्हें युवक कांग्रेस छोड़ कर जे.पी. मूवमेंट में आ जाना चाहिए।

राकेश और आनंद में कई एक समानताएं थीं। दोनों पड़ोसी रहे थे और दोनों ही ग्रामीण पृष्ठभूमि के और दोनों ही संवेदनशील और साफ़ सुथरी राजनीति के पक्षधर। हद दर्जे के आदर्शवादी। राकेश की स्थिति यह थी जब वह टीन एज थे और इसी शहर में स्कूल की पढ़ाई कर रहे थे तो राजनीति से लगभग घृणा करते थे। इस घृणा का कारण थे उनके एक चचेरे बड़े भाई वीर प्रताप बहादुर सिंह। यह चचेरे भाई वीर प्रताप बहादुर एडवोकेट थे और तब के दिनों शहर कांग्रेस के महामंत्री रहे थे। व्यवहार में वह विनम्रता दिखाते ज़रूर थे पर ज़मींदारी का अहंकार उन में कूट-कूट कर भरा था और ऐंठ भी।

वकालत चलती नहीं थी, सो राजनीति का शौक़ भी पाल लिया था। वस्तुतः उन का ज़ोर न राजनीति में था न वकालत में। घर की ज़मींदारी से राशन पानी और ख़र्चा वर्चा, नौकर-चाकर सभी उपलब्ध थे। और पैसा था तो दरबारी भी थे। अय्याशी भी। आरामतलबी, औरतबाज़ी और शराब सब कुछ वह साधते पर सब कुछ गुप्त। तब के समय चुनाव पांच साल पर ही होते। और जब भी चुनाव का ऐलान होता अटैची ले कर वीर प्रताप बहादुर लखनऊ निकल जाते। पर जाने क्यों तमाम कोशिशों और ख़र्च-वर्च के बावजूद वह कांग्रेस का टिकट नहीं पाते और लौट आते अपनी वकालत में।

कचहरी भी वह रिक्शे से जाते। नौकर सुबह नौ बजे रिक्शा बुला लाता। वकील साहब आराम से दस बजे, ग्यारह बजे जब मन करता तैयार हो कर निकलते, तब तक रिक्शा खड़ा रहता। लेकिन कचहरी जा कर वह रिक्शे वाले को तय किराया ही देते। एक घंटा, दो घंटा रुकने का नहीं। नोक झोंक करता अगर रिक्शा वाला तो लातों जूतों से पिटाई उस की तय होती। यही हाल शाम को भी होता। वह कचहरी से शाम जल्दी ही आ जाते और रिक्शे वाले को रोके रखते। घंटे दो घंटे बाद वह फिर शहर घूमने निकलते। घूमने निकलते पार्टी बैठक के नाम पर और पी पा कर देर रात लौटते। कई बार भोर हो जाती औरतबाज़ी के फेर में तो कभी-कभी सुबह भी।

कई बार तो अगर वह रात कहीं गए नहीं होते, घर पर ही रहे होते तो अगली सुबह काम वाली महरी उनकी शिकार हो जाती। महरी क्या थी टीन एजर थी। नाम था सन्नो। पंद्रह-सोलह साल की। मुंह अंधेरे आती और वकील साहब अपने कमरे में बुला लेते कि पहले इस कमरे की सफ़ाई करो। और दरवाज़ा बंद कर लेते। वह लड़की भी पैसे की लालच में बिछ जाती थी। अजब था। कि उसको भी पैसा प्यारा था, इज़्ज़त नहीं। मां का निधन हो चुका था। दादी को ठीक से दिखता नहीं था। बाप हरदम घर से लापता रहता। शराब के लती बाप को घर में रोटी कैसे बनती है, इसकी भी चिंता नहीं होती। और बेटी को इज़्ज़त से कोई सरोकार नहीं था। उन दिनों दस पैसे, चार आने दे कर कोई भी उसे लिटा सकता था। बैचलर्स के घर उसे सूट करते बरतन मांजने के लिए। और वीर प्रताप बहादुर सिंह, एडवोकेट का घर उसे काफ़ी सूट करता। यहां सभी ‘बैचलर’ थे। वकील साहब तो शादीशुदा थे। उनके नौकर भी। पर सबकी बीवियां गांव पर थीं। हां, वकील साहब के दो-तीन चचेरे भाई ज़रूर बैचलर थे। जो यहां रह कर पढ़ाई कर रहे थे। तो सन्नो जब वकील साहब से छुट्टी पाती तो उनके चचेरे भाई दबोच लेते। बाद में नौकर भी दबोच लेते। कई बार तो होता यह कि चचेरे भाई और नौकर उससे कहते कि झाड़ू, चौका, बरतन वह ख़ुद कर लेंगे बस वह उनकी वासना तृप्त कर दे। सुबह हो या शाम। और वह मान जाती। दोपहर में शहर से लगे एक ताल में बकरी के लिए वह घास लेने जाती साथ ही कंडा भी बीनती। पर वहां भी पता चलता कि लड़के पहले सन्नो के लिए घास काटते और कंडा बीनते, फिर अपने लिए। और वह उनके लिए भी वहीं ताल में लेट जाती।

आनंद भी उन दिनों टीनएज था। एक सुबह वह वकील साहब के एक चचेरे भाई से अपनी किताब मांगने उन के घर गया तो देखा कि नौकर और एक चचेरा भाई दोनों मिल कर बर्तन मांज रहे थे अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए। और दूसरा चचेरा भाई सन्नो के साथ संभोगरत था। किचेन में ही। किचेन भी ख़ूब बड़ा था। पूरा कमरा। बाहर का दरवाज़ा खुला पड़ा था सो आनंद सीधे घर में घुस गया। आनंद के पहुंचते ही अफ़रा तफ़री मच गई। आनंद ख़ुद ही झेंप गया यह सब देख कर। पर यह तो बाद के दिनों की बात है। राकेश प्रताप बहादुर सिंह तब तक बी.एच.यू. पढ़ने जा चुके थे। बी.टेक. की पढ़ाई की ख़ातिर। लेकिन जब वह यहां थे तब भी वीर प्रताप बहादुर सिंह से वह हरदम ही लगभग असहमत रहते। पर एक बार यह असहमति उन की अवज्ञा में बदल गई। सुबह के आठ बजे थे। नौकर किसी काम में लगा था, वीर प्रताप बहादुर को सिगरेट की तलब लगी और राकेश प्रताप बहादुर सामने पड़ गए। राकेश को उन्होंने पैसे देते हुए चौराहे से सिगरेट लाने को कहा। राकेश ने छूटते ही सिगरेट लाने से साफ़ इंकार कर दिया। कहा कि ‘मैं पढ़ाई कर रहा हूं। सिगरेट लेने नहीं जा सकता।’ यह सुनते ही वीर प्रताप बहादुर सिंह का सामंती जानवर जाग गया। और इस क़दर जाग गया कि लात-घूंसा, जूता-चप्पल जो भी कुछ मिला उस से राकेश प्रताप बहादुर सिंह की डट कर पिटाई हुई। वह पीटते रहे और कहते रहे, ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे मना करने की?’ साथ ही पूछते भी रहे कि, ‘बोलो, सिगरेट लाओगे कि नहीं?’ और राकेश प्रताप बहादुर भी पूरी अकड़ और पूरी ढीठाई से हर बार जवाब देते रहे, ‘नहीं, सिगरेट लेने नहीं जाऊंगा।’ राकेश प्रताप बहादुर की पिटाई से पूरा अहाता इकट्ठा हो गया। सभी लोग इकट्ठे हो गए। रोक छेंक भी की लोगों ने पर सब बेअसर। इसी बीच उन का नौकर आ गया। उन का पैर पकड़ कर बोला, ‘छिमा सरकार। पैसे दीजिए हम सिगरेट लाए देते हैं।’ उस का इतना कहना था कि उस की भी शामत आ गई। लातों जूतों उस की पिटाई शुरू हो गई। और जब बहुत हो गया तो राकेश प्रताप बहादुर ने आगे बढ़ कर वीर प्रताप बहादुर का जूता वाला हाथ थाम लिया और पूरी सख़्ती से कहा, ‘बड़े भइया अब बस! बहुत हो गया!’

राकेश प्रताप बहादुर की इस सख़्त आवाज़ की उम्मीद शायद वीर प्रताप बहादुर सिंह को नहीं थी। इस सख़्त आवाज़ ने जैसे उन्हें बेअसर कर दिया। वह जूता धीरे से वहीं हाथों से गिरा कर हारे हुए क़दमों से थोड़ी दूर रखी आराम कुर्सी पर जा कर लेट गए। ऐसे गोया पोरस सिंकदर से हार गया हो। और सिंकदर से कह रहा हो कि, ‘मेरे साथ वही व्यवहार किया जाए जो एक राजा दूसरे राजा से करता है।’ लेकिन इधर सिंकदर इस से इंकार करता हुआ वीर प्रताप बहादुर की सामंती ज़ंजीरों को छिन्न भिन्न कर धूल में मिला देने पर आमादा था। मुंह फूट गया था, ख़ून बह रहा था पर आंखों में नफ़रत की धूल भरी आंधी जैसे उन्हें उड़ा ले जाना चाहती थी। राकेश प्रताप बहादुर के मन में राजनीति से नफ़रत के बीज यहीं पड़े।

पर बाद में यही राकेश प्रताप बहादुर सिंह जब बी.एच.यू. में छात्र संघ के अध्यक्ष बने और इस बारे में अख़बारों में ख़बर छपी तो उनके पुराने मुहल्ले के लोग चौंके। कि अरे राकेश बाबू भी राजनीति में? बी.एच.यू. में राकेश बाबू की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से समझा जा सकता था कि बी.एच.यू. में तब एक अध्यक्ष को छोड़ छात्र संघ के सभी पदाधिकारी विद्यार्थी परिषद के चुने गए थे। एक सिर्फ़ अध्यक्ष ही एन.एस.यू.आई. से चुना गया था। यह आसान नहीं था। और सोने पर सुहागा यह कि राकेश बहादुर सिंह ने उस बार एम.टेक. में भी टॉप किया। यह भी एक रिकार्ड था। तब के उ.प्र. के मुख्यमंत्री हेमवतीनंदन बहुगुणा राकेश प्रताप बहादुर से इस क़दर प्रभावित हुए कि उन्हें उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया। इस सब से उन के परिवार में, गांव में, शहर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई। पर एक आदमी दुखी था इस सब से बेहद दुखी। वह थे उन के चचेरे बड़े भाई वीर प्रताप बहादुर सिंह। पर वह खुल कर कहीं कुछ नहीं बोले। ख़ुशी में ख़ामोश शिरकत उन की कमोबेश सभी ने नोट की। संजय गांधी रिजीम में राकेश प्रताप बहादुर की आदर्शवादी और साफ़ सुथरी राजनीति की चादर आसान बात नहीं थी। वह भी बहुगुणा जैसे राजनीतिज्ञ की छत्र-छाया में।

इमर्जेंसी के दिनों की बात है। सर्दियों में राकेश प्रताप बहादुर सिंह शहर आए। बहैसियत अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस। वह चाहते तो कहीं किसी आलीशान होटल में या किसी बड़े रईस के घर भी ठहर सकते थे। गाड़ी-घोड़ा, फ़ौज-फाटा कर सकते थे। तब के दिनों में यह चलन चल चुका था। पर नहीं, वह तो ऐसे आए कि शहर को पता ही नहीं चला। चुपचाप स्टेशन पर अकेले उतरे। रिक्शा किया और अपने उस किराए के घर आ गए जहां उन के चचेरे बड़े भाई वीर प्रताप सिंह रहते थे। दूसरे दिन शहर में निकले भी तो पैदल चौराहे तक गए। नौकर ने कहा भी कि ‘रुकिए बाऊ साहब, हम रिक्शा ले आते हैं।’ पर वह धीरे से, ‘नहीं।’ कह कर ख़ुद निकल पड़े। जब वह पैदल निकले तब कहीं मुहल्ले वाले भी जान पाए। और सब के मुंह से अनायास निकल पड़ा, ‘अरे, राकेश बाबू!’ और वह सब को पुराने दिनों की तरह, अपने स्कूली दिनों की तरह, ‘चाचा जी नमस्ते!’ ‘भइया जी नमस्कार।’ जैसे संबोधनों से सम्मान देते उसी सहजता से चौराहे की तरफ़ चल पड़े। आनंद भी उन के साथ हो चला। भीड़ बढ़ती गई तो वह बोला, ‘बाऊ साहब मैं आप के साथ बैठ कर इत्मीनान से बात करना चाहता हूं।’ वह उन्हें शुरू ही से बाऊ साहब या राकेश बाबू से ही संबोधित करता था।

‘ठीक है आज दिन में तो कई मीटिंग्स हैं। रात को वापस आता हूं तो बैठते हैं। बल्कि खाना साथ खाएंगे। ठीक?’

‘ठीक है। पर भूलिएगा नहीं।’

‘अरे नहीं आनंद जी इस में भूलने की क्या बात है?’ बंद गले के सूट पर फ़र की टोपी। राकेश बाबू का लुक लगभग पूरा-पूरा नेताओं जैसा ही हो चला था। तिस पर उन का लंबा क़द और इज़ाफ़ा भर रहा था।

रात जब वह घर लौटे तो मुहल्ले वालों के अलावा युवक कांग्रेसियों की भीड़ भी जुट चुकी थी। वह सब से विनम्रता पूर्वक मिले और धीरे-धीरे सभी को विदा किया। बड़े भाई वीर प्रताप से बिलकुल उलटा। कोई चोचलापन नहीं, कोई हेकड़ी, कोई ग़ुरूर नहीं। पर बातचीत में तुर्शी और तेवर साफ़ दिखता था। दिन में राकेश बाबू से बतियाने के लिए आनंद ने ढेर सारी बातें सोच रखी थीं पर रात जब वह उन के साथ बैठा तो सब कुछ बिखर गया। और ज़्यादातर बातचीत बचपन की बीती यादों पर केंद्रित हो गई। बचपन और टीनएज के दोस्तों परिचितों को वह याद कर-कर के पूछते रहे। बचपन और टीनएज में खेले गए उबहन कूद, सेवेन टाइम्स, फुटबाल, गुल्ली-डंडा और ईंट जोड़ कर बनाए गए विकेट वाले क्रिकेट तक की याद की। आइस पाइस की भी याद की। इन्हीं यादों में ऊभ-चूभ आनंद ने उन से पूछा, ‘राकेश बाबू आप तो पहले राजनीति से बड़ी घृणा करते थे?’ उस ने जोड़ा, ‘और फिर भी आप राजनीति में?’
‘हां, मुझे लगा कि राजनीति में पढ़े लिखे लोगों को भी आना चाहिए। क्यों कि सिर्फ़ इंटेलेक्चुवल बहस करने से ही बात नहीं बनने वाली कि आप ड्राइंगरूम में बैठ कर पालिटिशियंस और पालिटिक्स को सिर्फ़ कोसते रहिए। इस से काम नहीं चलेगा।’ वह बोले, ‘आज राजनीति में पढ़े-लिखे, समझदार और ईमानदार लोगों की ज़्यादा ज़रूरत है?’

‘यह हम आप सोचते हैं। पर आज का हमारा समाज और ख़ास कर आप की संजय गांधी ब्रिगेड भी ऐसा सोचती है भला?’

‘तो उन की सोच को राजनीति में आए बिना आख़िर बदलेंगे कैसे?’ उन्हों ने पूछा, ‘क्या इंटेलेक्चुअल डिसकशन से?’

‘थियरोटिकली तो यह बात ठीक लगती है पर क्या प्रैक्टिकली भी यह संभव है?’

‘क्यों नहीं संभव है?’ राकेश बाबू बोले, ‘मैं आज राजनीति में जूते घिस रहा हूं। चाहता तो एम.टेक. के बाद कहीं बढ़िया नौकरी कर के ऐशो-आराम की ज़िंदगी बसर कर रहा होता। पर जो समाज को बदलने, उसे सुंदर बनाने का सपना देखा है, उसे कैसे साकार करता? क्या इंजीनियर बन कर?’ वह बोले, ‘हरगिज़ नहीं। यह सपना सच हो सकता है, राजनीति में ही आ कर। और जो पढ़े लिखे लोग राजनीति से कतराते रहेंगे तो गंुडे मवाली ही देश की राजनीति संभालेंगे!’

‘आप की बात सिद्धांत रूप से तो सुनने में अच्छी लगती है, पर व्यवहार रूप में मुश्किल दिखती है।’

‘यही तो।’ राकेश बाबू बोले, ‘यही तो करना है। और यह कोई मुश्किल काम नहीं है। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, डा. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, गोविंद बल्लभ पंत या आपके लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव आदि नेताओं की एक लंबी सूची और परंपरा है हमारे सामने जिन्होंने सिद्धांत की राजनीति को व्यावहारिक जामा भी पहनाया।’

‘हां, लेकिन आप के इस कहने में आंशिक झूठ का भी साया है।’
‘कैसे?’

‘आप इस सूची में कई नेताओं का नाम भूल गए हैं। जैसे कि आप ने जे.पी. जैसों का नाम नहीं लिया। और अपनी नेता इंदिरा गांधी का नाम नहीं लिया!’ आनंद बोला, ‘राजनीति में सिद्धांत और व्यवहार की जितनी दूरी, दूरी क्या जितनी बड़ी खाई इंदिरा गांधी ने खोदी है, शायद ही किसी ने खोदी हो।’

‘इंदिरा जी को समझने में यह देश, ख़ास कर आप जैसे लोग हमेशा ग़लती करते हैं।’ वह बोले, ‘प्रीवीपर्स, बैंकों का नेशनलाइजे़शन, ग़रीबी हटाओ जैसा नारा, बीस सूत्रीय कार्यक्रम और छोड़िए सेवेंटी वन में पाकिस्तान को धूल चटा कर बांगलादेश को दुनिया के नक्शे पर रखना जैसे कार्यों को आप मामूली काम समझते हैं?’

‘नहीं बिलकुल नहीं।’ आनंद बोला, ‘पर इंदिरा जी की एक बड़ी उपलब्धि बताना तो आप भूल ही गए!’

‘क्या?’

‘यह इमरजेंसी के नाम पर तानाशाही और ज़ुल्म का जो राज वह चला रही हैं उसे क्या कहेंगे आप?’

‘कुछ नहीं, देश को अराजकता की आंधी से बचाने के लिए ज़रूरी फ़ैसला था!’ वह बोले, ‘और यह आप के जे.पी.!’ कहते हुए उन्होंने एक लंबी सांस छोड़ी और बोले, ‘जे.पी. को तो अमरीका और उस की सी.आई.ए. ने गोद ले रखा है! जे.पी. और जार्ज फर्नाण्डीज़ दोनों को आर.एस.एस. की मार्फ़त अमरीका बुरी तरह इस्तेमाल कर रहा है! यह तथ्य अभी देश के भोले-भाले लोगों को नहीं पता है।’

‘असल में तानाशाही में फ़ासिज़्म भी मिला होता है। और इस वक़्त आप की नेता इंदिरा गांधी देश को अराजकता की आंधी से बचाने के नाम पर एक साथ डिक्टेटर और फ़ासिस्ट दोनों हो गई हैं। शायद इसी लिए इस तरह का दुष्प्रचार भी करती करवाती जा रही हैं।’

‘दुष्प्रचार नहीं यह तथ्य हैं आनंद जी!’

‘अच्छा ये जो अख़बारों में सेंसरशिप, जबरिया नसबंदी यहां तक कि अस्सी साल की महिलाओं की नसबंदी!’ वह बोला, ‘थाने और जेलों में यातनाएं! लोगों के मलद्वार में, महिलाओं के यौन अंगों में मिर्चें डलवाना वग़ैरह यह सब क्या है?’

‘कहीं-कहीं प्रशासनिक स्तर पर चूक हो रही है, यह मैं मानता हूं पर यातना की इतनी भयावह तसवीर जो आप पेश कर रहे हैं, सच्चाई के विपरीत है।’ वह बोले, ‘यह आर.एस.एस, वालों का दुष्प्रचार है। अफ़वाह फैलाने में इन ससुरों का कोई जवाब नहीं है! इन के आगे हिटलर भी फे़ल है!’

‘ये गुड़ बोओ और पेड़ बोओ क्या है!’

‘संजय गांधी जी के शब्दों पर नहीं भावनाओं पर जाइए। वृक्षारोपण के बहाने पर्यावरण और गन्ना के बहाने वह किसानों को समृद्ध करना चाहते हैं।’

‘पर आप के नेता को जब यही नहीं पता कि गुड़ नहीं गन्ना बोया जाता है और पेड़ बोया नहीं रोपा जाता है तो वह देश की जनता का दुख-दर्द कैसे समझेगा!’

‘समझेगा-समझेगा!’ वह बोले, ‘राजनीति सिर्फ़ शब्दों से नहीं संवेदना, सपना और दृष्टि से चलती है। संजय जी के सरोकार देखिए, उन के सपने देखिए। वह सपने देखने वाले आदमी हैं और सपने ही समाज बदलते हैं।’

‘तानाशाही के बूटों तले कुचलने वाला समाज!’

‘इतनी तल्ख़ी, इतनी आग, इतनी आंच आप की बातों में क्यों हैं, आनंद जी?’

‘सच अगर तल्ख़ है, सच अगर आग है, सच अगर आंच है, सच अगर फांस भी है तो है।’

‘सो तो है।’

‘पर वैसे ही जैसे एक शेर में कहूं कि सच तो एक परिंदा है, घायल है, पर ज़िंदा है!’ आनंद बोला, ‘फिर एक फ़ासिस्ट राज में अगर इंदिरा इज़ इंडिया कहा जाता है तो यह क्या है?’ इस के बरअक्स एक छोटी सी प्रतिक्रिया भी नहीं होती कांग्रेस में? इस लिए कि कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ कह रहे हैं?’ वह बोला, ‘यह तो व्यक्तिवाद की भी पराकाष्ठा है!’

‘देखिए इंदिरा जी बड़ी नेता हैं!’

‘होंगी! पर क्या वह इंडिया हैं?’

‘नहीं, नहीं यह तो वैसे ही है जैसे हम धरती पर कश्मीर को स्वर्ग कह बैठते हैं। बरुआ जी की भावनाएं हैं और कुछ नहीं। इसे तिल का ताड़ बनाने की ज़रूरत नहीं है।’

‘और यह जो देश भर के तमाम प्रतिपक्षी नेताओं को चुन-चुन कर जेलों में ठूंस दिया गया है। यहां तक कि चंद्रशेखर, रामधन और हेगड़े जैसे कांग्रसियों को भी!’

‘आप तो सारे देश का हिसाब ऐसे मुझ से मांग रहे हैं जैसे मैं ही सारा देश चला रहा हूं, ये सारी ग़लतियां मैं ही कर रहा हूं। इस सब के लिए एक अकेला मैं ही ज़िम्मेदार हूं।’

‘नहीं, मैं तो सिर्फ़ आप से बात कर रहा हूं और बताना चाह रहा हूं कि आप इस समय एक ग़लत पार्टी में हैं, उस का पुराना इतिहास चाहे जितना स्वर्णिम रहा हो, आज की तारीख़ में कांग्रेस एक फ़ासिस्ट पार्टी के रूप में हमारे समाने उपस्थित है। कि कोई उस के ख़िलाफ़ कुछ मुंह खोले तो उसे जेल में ठूंस दो। उस पर अत्याचार बरपा कर दो। इंदिरा गांधी को कभी कहा गया रहा होगा कि दुर्गा हैं, गाया गया होगा, यह गीत कि आमार दीदी, तोमार दीदी, इंदिरा दीदी, ज़िंदाबाद!’ वह बोला, ‘पर आज तो वह सुरसा बन कर सारी प्रजातांत्रिक शक्तियों को, सारे सिस्टम को निगले हुई हैं!’

‘अच्छा तो आप चाहते हैं कि यही सब मैं भी बोलूं और चंद्रशेखर जी, रामधन जी की तरह मैं भी जेल भेज दिया जाऊं?’

‘बिलकुल!’ वह बोला, ‘अभी आप ही कह रहे थे कि सिद्धांत और व्यवहार को एक करना है। और कि यह कोई मुश्किल काम नहीं है। गांधी, नेहरू वग़ैरह का उदाहरण भी आप दे रहे थे और कि बता रहे थे कि इन लोगों ने सिद्धांत की राजनीति को व्यावहारिक जामा भी पहनाया।’

‘चलिए सोचता हूं कि इस के मद्दे नज़र आप की बात!’

‘मेरी नहीं, आप की बात!’ आनंद बोला, ‘यह मैं नहीं आप ही कह रहे थे। मैं तो सिर्फ़ याद दिला रहा था!’

‘ठीक है भाई, मेरी ही बात!’ राकेश बाबू बोले, ‘रात बहुत हो गई है। सुबह जल्दी उठना भी है।’

‘ठीक है तो मैं चलता हूं। आप सोइए!’ खड़ा हो कर कंबल अपनी देह पर लपेटता हुआ वह बोला, ‘कहिए तो चलते-चलते आज के हालात पर एक शेर सुना दूं?’

‘बिलकुल-बिलकुल!’ वह उत्सुक होते हुए बोले।

‘भोपाल के एक शायर हैं दुष्यंत कुमार। शेर उन्हीं का है कि कैसे-कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं/अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।’

‘क्या बात है!’ राकेश जी बोले, ‘यह सारा भाषण और तर्क-वितर्क करने के बजाय आप पहले ही यह शेर सुना दिये होते। तो भी मैं आप की बात समझ सकता था।’

‘तो चलिए दो शेर और सुनाए देता हूं।’

‘हां, पर इस के बाद और नहीं।’

‘ठीक बात है!’ वह बोला, ‘यह शेर भी दुष्यंत जी का ही है, कि सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए/मेरे सीने में हो या तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।’

‘बहुत बढ़िया!’ राकेश जी बोले, ‘अगर आप कभी भाषण देंगे तो लगता है कि तारकेश्वरी सिनहा की छुट्टी कर देंगे। ख़ैर, चलिए मैं भी कुछ कोशिश करता हूं। आग जलाने की, सूरत बदलने की!’

‘ठीक बाऊ साहब, नमस्कार!’

‘नमस्कार!’

जाने यह संयोग ही था या कुछ और कि इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद राकेश बाबू के राजनीतिक गुरु और आक़ा हेमवती नंदन बहुगुणा से इंदिरा गांधी किसी बात पर नाराज़ हो गईं। उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया। और उन्हीं के शिष्य नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री पद पर बैठा दिया। इस से पहले भी यही हुआ था। पी.ए.सी. रिवोल्ट के बाद कमलापति त्रिपाठी को हटाया गया। फिर कुछ दिन बाद जब सरकार बहाल हुई तो कमलापति के शिष्य बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया था।

ख़ैर, बाद के दिनों में यह चीजें और डेवलप हुईं।

और संयोग देखिए कि जब 1977 में इमरजेंसी ख़त्म हुई, जनता पार्टी का गठन हुआ और चुनाव का ऐलान हुआ तो जनसंघियों, समाजवादियों के साथ-साथ जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा, नंदिनी सत्पथी जैसे कई कांग्रेसी भी कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में आ मिले। जनता पार्टी ने जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी की तो उस के शहर में जनसंघ धड़े के एक नेता का नाम जारी हुआ। पर रातोरात सूची में संशोधन कर बहुगुणा ने जनसंघी नेता का नाम कटवा कर राकेश प्रताप बहादुर सिंह का नाम जारी करवा दिया। कहते हैं कि बहुगुणा ने तब तीन चार सीटों को प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था। जिस में सब से ऊपर ़राकेश प्रताप बहादुर की सीट थी। खै़र, उधर राकेश प्रताप बहादुर सिंह का नाम लोकसभा सीट के लिए जारी हुआ, इधर उन के चचेरे भाई वीर प्रताप बहादुर सिंह को हार्ट-अटैक हो गया। राकेश बाबू की उम्मीदवारी उन के गले की फांस बन गई। कहां विधायकी के टिकट के जुगाड़ में जवानी बीत गई, बुढ़ापे ने दरवाज़ा खटखटा दिया पर टिकट नहीं मिला। विधायकी तो बहुत दूर की बात थी। और यह कल का लौंडा राकेश जनता पार्टी से एम.पी. का टिकट पा गया था। तब जनता पार्टी से टिकट का मतलब था बिना किसी बाधा के लोकसभा में पहंुचना। राकेश प्रताप की इस सफलता से वीर प्रताप बहादुर टूट गए। इतना टूटे कि हार्ट-अटैक हो गया। डाक्टरों ने बहुत हाथ-पांव मारे पर दूसरे ही दिन उन का निधन हो गया। एक बेटा था जो लखनऊ के सेंट फ्ऱांसिस कालेज में पढ़ता था। राकेश प्रताप ने उस की पढ़ाई का ज़िम्मा ले लिया। चुनाव जनता के भरोसे छोड़ वह वीर प्रताप के श्राद्ध वगै़रह में लग गए। हालां कि संयुक्त परिवार था, जमींदारी थी फिर भी अब घर-परिवार के इंजन राकेश प्रताप बहादुर ंिसंह थे। जनता पार्टी की लहर थी सो वह रिकार्ड मतों से चुनाव भी जीते। फिर भी कहने वाले माने नहीं। कहने लगे कि, ‘राकेश प्रताप ने लाश पर खडे़ हो कर चुनाव जीता है।’ लेकिन राकेश प्रताप पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ा। उन्हों ने वीर प्रताप के इकलौते बेटे की पढ़ाई की पूरी ज़िम्मेदारी लेते हुए उसे पढ़ने के लिए बाद में जे.एन.यू. भी भेजा। वीर प्रताप का बेटा पढ़ने में भी होशियार था। उस की मेहनत रंग लाई। और अंततः वह आई.ए.एस. एलायड में सेलेक्ट हो गया। इनकम-टैक्स में। अब वह इनकम-टैक्स में बड़ा अफ़सर है। राकेश प्रताप लोकसभा पहुंच कर युवा सांसदों में शुमार हुए। न सिर्फ़ शुमार हुए बल्कि तेज़-तर्रार पार्लियामेंटेरियन के तौर पर जाने जाने लगे। लोकसभा मंे होने वाली तमाम बहसों में वह शिरकत करने लगे। ख़बरों में उन का अकसर ज़िक्र होता। दिल्ली से जब अपने शहर भी वह आते तो शालीनता उन के सिर पर सवार रहती। दिखावा, पाखंड, भ्रष्टाचार आदि जो राजनीति का चलन बनता जा रहा था, इन चीज़ों से वह कोसों दूर रहते। एक बार तो वह जब दिल्ली से आए तो संयोगवश उन की ट्रेन दस मिनट पहले आ गई। स्टेशन पर उन्हें कोई रिसीव करने वाला तब तक पहुंचा भी नहीं था। पर वह परेशान नहीं हुए। न कहीं फ़ोन वगै़रह किया। चुपचाप अटैची उठाई, रिक्शा किया और अपने घर चले गए। शहर में वैसे भी वह अकसर अकेले रिक्शे पर बैठे घूमते दिखाई पड़ जाते। कई बार किसी साथी के साथ मोटर-साइकिल या स्कूटर पर भी बैठे दिख जाते वह। पर अपने क्षेत्र के विकास की चिंता वह बराबर करते। उन दिनों सांसद निधि जैसी व्यवस्थाएं नहीं थीं, फिर भी विकास का पहिया अपने क्षेत्र में उन्हों ने कभी रुकने नहीं दिया। वह अकसर दलगत बेवक़ूफियों से भी दूर रहते। जनता पार्टी में वह थे ही, पर आए कांग्रेस से थे सो कांग्रेसियों से भी उन के संबंध मधुर थे। इस से और आसानी होती उन्हें। कभी विरोध के स्वर पक्ष या विपक्ष से नहीं उठते उन के ख़िलाफ़। हालां कि इस से खिन्न कुछ मुरहे छुटभैये कहते भी कि, ‘क्या करें भइया, शहर की राजनीति नीरस हो गई है!’

‘क्यों?’ कोई अनमना हो कर पूछता।

‘क्यों क्या?’ मुरहा बोलता, ‘बिना उखाड़-पछाड़ के भी कोई राजनीति होती है भला? ऐसे तो लोकल पालिटिक्स का पटरा हो जाएगा!’

पर सचमुच ऐसा नहीं हुआ कि लोकल पालिटिक्स का पटरा हो जाए। जल्दी ही चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम आदि की महत्वाकांक्षाएं ज़ोर मारने लगीं। मोरार जी देसाई सरकार का पतन हो गया। चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री हो गए। हेमवती नंदन बहुगुणा भी पैंतरा बदल कर चरण सिंह के साथ आ गए। सो राकेश प्रताप बहादुर सिंह भी उधर ही आ गए। शहर में भी जनता पार्टी दो फाड़ क्या तीन चार फाड़ हो गई। अब जब पार्टी टुकड़े-टुकडे़ हो गई तो लोकल पालिटिक्स भी ज़ोर मारने लगी। राकेश प्रताप पर शालीन ही सही टिप्पणियां, बाद मंे छींटाकशी में बदलीं। चरण सिंह की सरकार गिरी और चुनाव का ऐलान हो गया। अब बहुगुणा फिर से कांग्रेस से हाथ मिला बैठे थे। संजय उनके भांजे हो गए और वह मामा। मामा-भांजे के साथ राकेश जी भी नत्थी हो कर फिर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े। चुनाव हारते-हारते बचे। कुछ हज़ार वोटों से जीते। उन के बहुतेरे दोस्तों-साथियों ने उन्हें बहुगुणा से किनारा कसने, छुट्टी लेने जैसी सलाहें बिना मांगे दीं और वह सिर्फ़ मुसकुरा कर रह जाते। कोई जब ज़्यादा पीछे पड़ता तो वह मुसकुराहट में थोड़ा और इज़ाफ़ा करते। और धीरे से कहते, ‘बिना मांगे किसी को सलाह नहीं देनी चाहिए।’ और फिर जैसे जोड़ते, ‘और आप तो भाई साहब जानते हैं कि बिना मांगी सलाह पर मैं अमल भी नहीं करता।’ कोई फिर भी उन का पीछा नहीं छोड़ता तो वह थोड़ा सख़्ती से कहते कि, ‘बहुगुणा जी मेरे लिए व्यक्तिगत और वैचारिक निष्ठा का प्रश्न हैं। मैं उन का साथ किसी सूरत में नहीं छोड़ सकता।’ एक बार उन के एक वकील दोस्त ने एक अख़बार में एक लेख, जिस का शीर्षक ‘चूकते-चूकते चुक गए हैं बहुगुणा’ था, दिखाते हुए उन से कहा कि अब तो संभल जाइए राकेश जी!’
‘क्या संभल जाएं?’ बिफरते हुए राकेश जी लगभग चीख़ पड़े, ‘बहुगुणा जी कोई कुरता-पायजामा हैं कि उन्हें बदल दूं?’ राजनीति में किसी के प्रति समर्पण और निष्ठा की पराकाष्ठा थी यह। फिर जल्दी ही वह थोड़ा संयत हो कर बोले, ‘क्षमा कीजिए भाई साहब, मैं इस तरह की राजनीति करने के लिए राजनीति में नहीं आया!’

अलग बात है कि कुछ समय बाद बहुगुणा चल बसे। पर जाने राकेश प्रताप उन के साथ नत्थी होने का कि ईमानदार राजनीति करने का अभिशाप आज तक भुगत रहे हैं। और राजनीति के हाशिए पर आ खड़े हुए हैं। बहुगुणा उन्हें कांग्रेस में छोड़ गए थे, वह आज भी कांग्रेस में हैं। शायद आगे भी कंाग्रेस में रहें। बहुगुणा के निधन के बाद वह दो बार संसदीय चुनाव हार गए। बाद के दिनों में उन्हें कांग्रेस ने टिकट भी नहीं दिया। उन के बाद टिकट दिया कांग्रेस ने उन की सीट पर तो जमाल को दिया जो अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाया। हां, राकेश जी बाद में प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष बना दिए गए। पर एक बार प्रदेश कांगेस के कार्यालय में एक महिला से बलात्कार की घटना सामने आते ही उन्हों ने प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। यह कह कर कि जब हम अपने पार्टी कार्यालय की पवित्रता नहीं बचा सकते तो कोई हक़ नहीं कि पदाधिकारी भी बने रहें। पर उन की यह बात नक़्क़ारख़ाने में तूती साबित हुई। किसी और ने, न अख़बारों ने, न कांग्रेसियों ने इस पर कोई ध्यान दिया। सब ने ऐसा बर्ताव किया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। वैसे भी उन के जैसे व्यक्ति के लिए प्रदेश कांग्रेस में कोई जगह नहीं रह गई थी। बल्कि कहें कि उत्तर प्रदेश में अब कांग्रेस के लिए कोई जगह नहीं रह गई थी। जिस जातिवादी गठजोड़ को कांग्रेस परदे के पीछे रख कर राज करती आ रही थी, वही जातिवादी गठजोड़ अब परदे फाड़ कर खुले आम बदबू की तरह पांव पसारे उत्तर प्रदेश में चौतरफ़ा छा गए थे। ऐसे जैसे जातिवाद का फोड़ा फूट पड़ा था। जातियों का विस्तार हो गया था और राजनीति उन से पानी मांग रही थी।

तो राकेश प्रताप बहादुर सिंह ?

जो राकेश प्रताप बहादुर सिंह कभी कहते थे कि राजनीति में पढे़-लिखे लोगों को आना चाहिए। क्यों कि सिर्फ़ इंटेलेक्चुअल बहस करने से ही बात नहीं बनने वाली, कि आप ड्राइंगरूम में बैठ कर पालिटिशियंस और पालिटिक्स को सिर्फ़ कोसते रहिए। इस से काम नहीं चलेगा। आज अपने घर के ड्राइंग रूम में न सही पार्टी कार्यालयों में बैठ कर इंटलेक्चुअल बहस में फंस गए थे और कोसने लग गए थे कि ‘बताइए, अब पालिटिक्स में कैसे-कैसे लोग आ रहे हैं?’
और ख़ुद हाशिए पर छोड़िए हाशिए से भी बाहर हो रहे थे। सिद्धांत की राजनीति अब जातिवादी, भ्रष्टाचारी और गंुडई की राजनीति से पानी मांग रही थी। अद्भुत था यह!

अद्भुत ही था मुनव्वर भाई का अपने शहर में बेटी की लाश का मजमा!

दुपहरिया उतरते-उतरते जमाल का फ़ोन फिर आ गया। कहने लगा, ‘आनंद जी, मनुव्वर भाई को समझाइए!’

‘क्या समझाऊं?’ आनंद भी पूरी तल्ख़ी से बोला।

‘यही कि मदारीपना और ब्लैकमेलिंग छोड़ दें। और कि बेटी को बाइज़्ज़त दफ़ना दें।’

‘यह तो तुम भी उन्हें समझा सकते हो!’

‘क्या ख़ाक समझाऊं?’ जमाल बोला, ‘मेरी तो शकल से ही उन्हें एलर्जी है!’

‘सोचो जमाल सोचो!’ आनंद बोला एक समय था जब मुनव्वर भाई तुम्हें दिलोजान से चाहते थे। तुम्हें अपना छोटा भाई बता कर सब के सामने पेश करते थे।’ वह बोलता गया, ‘पर ज़रूर तुम ने कुछ ऐसा किया होगा कि तुम्हारी शकल से भी उन्हें एलर्जी हो गई!’

‘आनंद जी यह समय इस तफ़सील का नहीं है!’

‘तो?’

‘मुनव्वर भाई को सही मशविरा देने का है।’

‘एक मशविरा तुम्हें दे सकता हूं?’

‘शौक़ से!’ जमाल बोला, ‘फ़रमाइए तो आप!’

‘मान लोगे भला?’

‘बिलकुल!’

‘तो तुम एक काम तो तुरंत यह करो कि उस नर्सिंग होम वाले की पैरोकारी बंद कर दो।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘बल्कि कहूं कि उस की दलाली बंद कर दो, सब अपने आप ठीक हो जाएगा!’

‘यह तो कोई बात नहीं हुई आनंद जी!’ जमाल बोला, ‘और आनंद जी माइंड योर लैंगवेज, मैं किसी का दलाल नहीं हूं।’

‘श्योर!’

‘आनंद जी आप की शुरू से ही बेहद-बेहद रिस्पेक्ट करता हूं, इस का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि आप के मुंह में जो आए, वह मुझे कह दें!’

‘अच्छा उस नर्सिंग होम वाले की पैरोकारी तुम नहीं कर रहे हो?’

‘पैरोकारी क्या मैं तो जायज़ बात कह रहा था!’

‘क्या?’ आनंद ने पूछा कि, ‘यही न कि मुनव्वर भाई नर्सिंग होम से अपनी बेटी की मौत का मुआवज़ा न मांगें।’

‘एक्जे़क्टली?’

‘क्यों भई क्यों?’

‘अच्छा चलिए जो मुआवज़ा मांगना ही है तो सही प्लेटफ़ार्म पर जाएं। उपभोक्ता फ़ोरम है, अदालतें हैं। पर वह तो खुल्लम खुल्ला ब्लैकमेल कर रहे हैं।’

‘भई वाह जमाल मियां। वाह!’ आनंद बोला, ‘अदालतें! जानते हो कि ये अदालतें आज की तारीख़ में शरीफ़ आदमियों के लिए कसाईबाड़ा बन चली हैं। और अपराधियों के लिए चरागाह कहो या सैरगाह! फिर भी तुम अदालतों की बात कर रहे हो?’

‘अब आप मुनव्वर भाई की पैरोकारी नहीं कर रहे हैं आनंद जी!’ जमाल ‘पैरोकारी’ पर ख़ासा ज़ोर देते हुए ऐसे बोला जैसे वह कह रहा हो कि आनंद जी अब आप मुनव्वर भाई की दलाली कर रहे हैं।

‘अब तुम जो चाहो समझो जमाल!’ जमाल के तंज़ को समझते हुए वह बोला, ‘अब तुम मुझे भले ही मनुव्वर भाई का दलाल कह लो पर यह जान लो कि अदालतों में तो मुनव्वर भाई की दाल गलने वाली है नहीं।’

‘क्यों?’

‘एक तो वह फोकट का कोई चूतिया टाइप का वकील ढूंढेंगे, उस से कुछ बनेगा नहीं। और जो मान लो क़ायदे का वकील करेंगे भी तो वह पहले ही राउंड में उन से इतनी फ़ीस ले लेगा कि उन की पैंट उतर जाएगी। फिर वह तारीख़ों के मकड़जाल में उलझेंगे। और अंततः पता चलेगा कि वह नर्सिंग होम वाला संबंधित जज को औने पौने में ख़रीद लेगा और मुनव्वर भाई हाथ मलते रह जाएंगे। बेटी तो उन की चली ही गई है, मुआवज़ा भी उन का मर जाएगा!’

‘तो अब आप भी उन्हें उन की ब्लैकमेलिंग में शह दे रहे हैं?’

‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात कर रहे हो?’ आनंद भड़क कर बोला, ‘लखनऊ में तो उन से इस बारे में कोई चर्चा ही नहीं हुई। और वहां पहुंचने के बाद उन से कोई बात नहीं हुई। और इस सब के बावजूद मैं उन के इस क़दम को कंडम कर रहा हूं। पहले भी यह बात मैं ने तुम से कही थी।’

‘तो एक बार आनंद जी प्लीज़ और प्लीज़ एक बार मुनव्वर भाई को आप फ़ोन कर के सिर्फ़ इतना सा कह दीजिए कि वह यह सब ठीक नहीं कर रहे और कि आप उन के इस फ़ैसले को कंडम कर रहे हैं।’

‘इस से क्या होगा?’

‘होगा यह कि आप के इस कहे से उन की शर्म हया जागेगी और वह अपना मजमा उठा लेंगे।’

‘इस से क्या होगा?’ आनंद ने सवाल फिर दुहराया।

‘होगा यह कि जो अपना नर्सिंग होम वाला मुनव्वर भाई की मदारीगिरी से जो डिफ़ेम हो रहा है, वह फ़ेज़ ख़त्म हो जाएगा। और नर्सिंग होम की इमेज ख़राब होने से बच जाएगी!’ जमाल बोला, ‘आप को पता है कि दोपहर बीत गई है और सुबह से एक भी पेशेंट इस नर्सिंग होम में इंट्री नहीं ले पाया है। उलटे चार मरीज़ जो भरती थे, भाग गए हैं।’ वह बोला, ‘ऐसे तो उस बिचारे का बिज़नेस डूब जाएगा।’

‘एक बात क्या दो बात बताऊं जमाल तुम्हें?’

‘बताइए आनंद भाई!’

‘अव्वल तो यह कि मुनव्वर भाई के इस फ़ैसले से मैं सहमत नहीं हूं, यह साफ़ है। पर तुम यह भी जान लो कि मैं अगर इस मसले पर उन के साथ नहीं हूं तो तुम्हारी तरह उन के खि़लाफ़़ भी नहीं हूं।’ वह बोला, ‘मेरा स्टैंड बिलकुल साफ़ है। इज़ दैट क्लियर?’

‘ओ.के.!’

‘दूसरी बात यह है कि जो तुम कह रहे थे कि मुनव्वर भाई उस नर्सिंग होम वाले का बिज़नेस चौपट कर रहे हैं तो तुम ग़लत कह रहे हो।’

‘क्या आनंद जी!’

‘मेरी पूरी बात तो सुनो!’

‘अच्छा बताइए!’

‘फिर मैं कह रहा हूं कि उस नर्सिंग होम वाले का बिज़नेस मुनव्वर भाई नहीं चौपट कर रहे हैं।’

‘तो?’

‘एक तो उस नर्सिंग होम का मालिक ख़ुद कर रहा है और दूसरे तुम ख़ुद ज़िम्मेदार हो इस के लिए!’

‘क्या बक रहे हैं आनंद जी!’

‘ज़रा तमीज़ में रहो जमाल!’ आनंद बिदकते हुए बोला, ‘बात सुननी हो तो सुनो, नहीं फ़ोन काट दो। वैसे भी मैं ने नहीं तुम्हीं ने मिलाया है।’

‘अच्छा बताइए सॉरी!’

‘तो अगर तुम चाहते हो कि नर्सिंग होम वाले का बिज़नेस न चौपट हो और कि उस की इमेज और न ख़राब हो तो तुम एक काम करो कि इस पूरे मामले से अपने को तुरंत ड्राप कर लो। और कि और भी जो तुम्हारे जैसे लोग नर्सिंग होम वाले की सो काल्ड मदद कर रहे हों, उन से भी कह दो कि ड्राप कर लें!’

‘ड्राप कर लें?’ जमाल बौखला कर बोला, ‘तब तो मुनव्वर भाई उसे कच्चा चबा जाएंगे!’

‘ना, मुनव्वर भाई टूटे हुए हैं, हारे हुए हैं, उन्हें जितना चढ़ाओगे चढ़ते जाएंगे, जितना लड़ाओगे, लड़ते जाएंगे। वह बेटी अपनी खो चुके हैं, तुम लोग बात ज़्यादा बढ़ाओगे तो वह अपने आप को भी दांव पर लगा सकते हैं। और जो कहीं ख़ुदा न ख़ास्ता उन के साथ भी कुछ हो गया, या उन्हों ने ख़ुद कुछ अप्रिय कर करवा लिया तो? तो अभी तो सिर्फ़ भीड़ जुटी है। कल को शहर में मूवमेंट खड़ा हो जाएगा। कौन रोकेगा उसे? तब तो तुम्हारा नर्सिंग होम वाला कहीं का नहीं रहेगा!’ आनंद बोला, ‘एक हारे हुए आदमी का मनोविज्ञान समझो जमाल! और तुम तो मुनव्वर भाई का मनोविज्ञान अच्छी तरह जानते हो कि जब वह अड़ जाएं तो टूट भले जाएं, झुकेंगे नहीं!’ वह बुदबुदाया, ‘इसी अड़ियलपने में उन्हों ने अपना जीवन नष्ट कर लिया। और तुम से ज़्यादा उन का यह सब कौन जानता है?’

‘जी आनंद जी, यह एक पासिबिलिटी तो है कि मुनव्वर भाई अपने साथ भी कुछ ऐसा-वैसा कर सकते हैं।’ जमाल बोला, ‘पर इस की क्या गारंटी है कि हम लोग ड्राप कर लें तो बात ख़त्म हो ही जाएगी!’

‘देखो जमाल, मुनव्वर भाई हारे हुए हैं, असफल हैं, टूटे हुए हैं, सब ठीक है। पर वह जाहिल भी हैं, यह बात तो तुम भी नहीं मानोगे?’

‘बिलकुल नहीं। किसी सूरत में नहीं!’

‘तो क्या वह यह नहीं जान पाए होंगे अभी तक कि नर्सिंग होम वाले को बैकिंग कौन-कौन दे रहा है?’

‘हां, ये तो है!’

‘फिर जब उन्हों ने यह जाना होगा कि तुम भी हो बैकिंग में तब?’

‘हूं।’

‘फिर तुम्हारा नाम आना मतलब सांड़ को लाल कपड़ा दिखाना है।’

‘ये तो है!’ जमाल बोला, ‘पर विकल्प क्या है?’

‘विकल्प यह है कि तुम लोग ख़ुद को ड्राप कर लो। और नर्सिंग होम वाले से कहो कि सीधे मुनव्वर भाई से बात करे। चाहे तो प्रशासन को साथ ले ले। और अव्वल तो यह कि जब तुम लोग हाथ खड़े कर लोगे तो वह ख़ुद ही कोई रास्ता निकाल लेगा। बिज़नेस मैन है, वह सारे गुण जानता होगा। वह तो अभी तक इस लिए अड़ा होगा कि तुम लोग उस के साथ हो। जब उस को लगेगा कि वह अकेला हो गया है तो ख़ुद ही कंप्रोमाइज़ कर लेगा!’

‘यह तो आनंद जी, एक तरह से मुनव्वर भाई को वाक ओवर दे कर उन की फ़तह का रास्ता तजवीज़ कर रहे हैं आप!’

बल्कि महाभारत वाला इक्ज़ांपिल दूं कि, ‘अश्वत्थामा मरो, नरो वा कुंजरो! कह कर आप हमें चित्त करना चाहते हैं।’

‘अब चाहे जो समझ लो जमाल मियां।’ आनंद बोला, ‘तुम ने राय मांगी मैं ने दे दी।’ वह बोला, ‘फिर विकल्प तुम्हारे पास दोनों ही हैं। लड़वा लो या कंप्रोमाइज़ करवा लो।’

‘चलिए देखता हूं!’ जमाल बोला, ‘पर आप एक बार ख़ुद बात नहीं कर लेंगे मुनव्वर भाई से!’

‘मुनव्वर भाई से एक बार क्या सौ बार बात करूंगा।’ आनंद बोला, ‘पर माफ़ करना जमाल इस इशू पर तो बिलकुल नहीं!’

‘आखि़र क्यों?’

‘क्यों कि मैं मुनव्वर भाई को शर्मिंदा नहीं करना चाहता। आखि़र सिस्टम के मारे हुए हैं और मेरे पुराने दोस्त हैं।’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘दोस्त तो वह तुम्हारे भी रहे हैं। बल्कि एक समय के तुम्हारे रहनुमा भी!’

‘चलिए आनंद जी!’

‘एक बात और कहूं जमाल!’

‘कहिए!’

‘अगर बेटी की लाश पर ही सही मुनव्वर भाई को कुछ पैसे मिल जाएंगे तो उन का कुछ भला हो जाएगा, अलबत्ता नर्सिंग होम वाले की सेहत पर इस से कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। वह तो लोगों को लूट कर और कमा लेगा!’

‘हां, पर आनंद जी आप के मुंह से यह और ऐसी बात शोभा नहीं देती!’ वह बोला, ‘हम तो आप को, आप की आइडियालजी के लिए ही आज तक सलाम करते रहे हैं!’

‘चलो अब से मत करना!’

‘नहीं हम तो फिर भी आप को सलाम करेंगे!’ किसी विजेता की तरह जमाल बोला। कह कर जमाल ने फ़ोन काट दिया।

पर थोड़ी देर बाद नर्सिंग होम वाले का फ़ोन आ गया। आनंद समझ गया कि यह जमाल का काइयांपन है। वह उधर से रिरिया रहा था, ‘आनंद भइया कुछ करिए! मुनव्वर भइया को समझाइए!’

‘हम लोग एक दूसरे को पहले से जानते हैं क्या?’ आनंद ने बड़ी तल्ख़ी से पूछा।

‘आप साहब बड़े आदमी ठहरे।’ वह बोला, ‘आप भले हमें नहीं जानते पर हम तो आप को जानते हैं!’

‘कैसे जानते हैं?’

‘अरे साहब, आप इस शहर के हैं, इतने बड़े पालिटिशियन हैं, कौन नहीं जानता आप को?’

‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात कर रहे हैं?’ आनंद बोला, ‘वह शहर छोड़े, और फिर राजनीति छोड़े तो मुझे एक अरसा हो गया!’

‘तो भी, तो भी!’ वह रिरियाया, ‘आप को, आप के काम को, आप की इमेज को सब जानते हैं!’

‘अच्छा?’ आनंद ने जैसे उस के रिरियाहट के गुब्बारे में पिन चुभोते हुए कहा, ‘अच्छा, जो अभी आप के कहे मुताबिक़ मैं अगर मुनव्वर भाई से बात नहीं करूं तो क्या आप की नज़र में फिर भी मेरी इमेज वैसी ही रहेगी?’

‘बिलकुल जी, बिलकुल जी!’

‘तो अब आप फ़ाइनली समझ लीजिए कि मैं न तो आप को जानता हूं, न मुनव्वर भाई को न किसी और को!’ आनंद बोला, ‘फिर आप यह भी नोट कर लीजिए कि मैं इस मसले पर न तो आप से, न किसी और से एक शब्द भी बात नहीं करना चाहता!’

‘आप तो सर जी, नाराज़ हो गए।’

‘आप को मेरा नंबर कहां से मिला?’

‘ही ही!’

‘जमाल ने दिया?’

‘वह तो जी आप की हमेशा ही तारीफ़ करते रहते हैं।’

‘करते रहते हैं या आज कर रहे थे?’

‘जी-जी!’

‘अच्छा दो एक बात पूछूं?’

‘जी, पूछें सर!’

‘आप के नर्सिंग होम में बर्न यूनिट है?’

‘जी?’

‘बर्न यूनिट?’

‘जी, यूनिट तो नहीं है पर इलाज हम करते हैं?’

‘सेवेंटी एट्टी परसेंट जले लोगों का भी इलाज आप बिना बर्न यूनिट के करते हैं?’

‘तो तो जी, सब ऊपर वाले की मेहरबानी है, जो बच जाता है, बच जाता है, नहीं तो हम क्या कर सकते हैं जी?’

‘क्यों?’ आनंद बौखला कर बोला, ‘लोगों को लूट तो सकते हैं, मार तो सकते हैं?’ वह बोला, ‘आप को पता है कि सेवंेटी एट्टी परसेट जले लोगों का देश में सिर्फ़ दो ही जगह इलाज संभव है। एक दिल्ली के सफ़दरजंग हास्पिटल मेें, या फिर किसी मिलेट्री हास्पिटल में? और कि फ़ि़टी परसेंट से अधिक जले लोगों के बचने की संभावना शून्य होती है?’

‘नहीं जी!’

‘तो फिर नर्सिंग होम क्यों खोला है? सिर्फ़ लूटने के लिए?’

जवाब में वह कुछ नहीं बोला। लेकिन आनंद बोलता रहा, ‘अरे, जब सेवेंटी, एट्टी परसेंट वह बच्ची जल गई थी, तो तुरंत उसे सफ़दरजंग हास्पिटल भेजना था, जहां मु़त इलाज भी होता और शायद वह फूल सी बच्ची बच जाती! पर नहीं, जब बीस पचीस हज़ार लूट लिए और देखा कि स्थिति बिगड़ गई है तो प्लेटलेट कम होने का ड्रामा कर लखनऊ भेज दिया? अजीब है।’

‘जी सर!’ वह किसी घाघ बिजनेसमैन की तरह पूरी विनम्रता से फिर रिरियाया।

फिर आनंद ने ही ‘सॉरी!’ कह कर फ़ोन काट दिया।

फिर किसी का फ़ोन नहीं आया।

पर सफ़दरजंग अस्पताल की याद आ गई।

दूर के एक रिश्तेदार की बेटी जल गई थी। तेईस, चौबीस साल की लड़की की शादी को अभी सात, आठ महीने ही हुए थे। और जल गई। कि जला दी गई? तुरंत-तुरंत कुछ कहना मुश्किल था। कहानी यह बताई गई कि घर में गैस ख़त्म हो गई थी सो कोयले की अंगीठी सुलगाई। कोयला ठीक से आग नहीं पकड़ रहा था सो घर में रखा स्प्रिट कोयले पर डाला। स्प्रिट ने भड़क कर उसे आग की लपटों में ले लिया। सिंथेटिक साड़ी पहने थी, सो आग पर क़ाबू नहीं पाया जा सका। और वह जब तक साड़ी उतार कर फेंकती फांकती तब तक वह पूरी तरह जल चुकी थी। फ़ोन पर यह कहानी सुन कर आनंद ने लड़की के पिता से पूछा कि, ‘क्या लड़की को आग से बचाने में उस की ससुराल पक्ष में किसी का हाथ पांव भी जला है?’

‘नहीं कहीं कोई ज़रा भी नहीं जला है?’

‘क्या तब घर मेें कोई था नहीं?’

‘सास ससुर थे।’

‘और पति?’

‘वह कहीं काम से गया था।’

‘क्या उन का घर बहुत बड़ा है?’

‘नहीं।’

‘तो फिर वह बचाने क्यों नहीं आए? आखि़र जब वह जली होगी तो जलते ही चीख़ी चिल्लाई होगी!’

‘वह लोग दूसरे कमरे में थे।’

‘कमरे में ही थे न? किसी महल में तो नहीं!’

‘छोड़िए यह सब!’ लड़की के पिता बोले, ‘जलने के बाद वह सब इलाज के लिए सिविल हास्पिटल ले आए, हमें इनफ़ार्म किया। मेरे लिए यही बहुत है। और फिर यह सब बाद में डिसकस कर लेंगे। अभी तो किसी तरह बेटी को बचाने की सोचिए!’

‘कहां हैं, अभी आप लोग?’

‘एक नर्सिंग होम में।’

‘अभी तो आप सिविल हास्पिटल बता रहे थे?’

‘हां, वहां से यहां ले आए!’

‘क्यों?’

‘क्या करते वहां डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए।’

‘ओह!’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘वहां जो डाक्टर उस का इलाज कर रहे हैं, उन से बात करवा दीजिए।’

‘ठीक है अभी खोज कर बात करवाता हूं।’

‘मैं इंतज़ार कर रहा हूं।’

‘वो तो ठीक है, पर यह बताइए क्या बेटी को ले कर लखनऊ आ जाऊं?’

‘पहले वहां के डाक्टर से बात तो करवा दीजिए! कैसी स्थिति है यह तो पता चले पहले।’

‘करवाता हूं अभी!’

लेकिन फ़ोन कट गया।

थोड़ी देर बाद फिर फ़ोन आया तो उधर से डाक्टर से बात हुई। डाक्टर ने बताया, ‘सेवेंटी-एट्टी परसेंट जल चुकी है लड़की।’

‘चांसेज़ कितने हैं?’

‘चांसेज़?’ डाक्टर जैसे ख़ुद सवाल पर उतर आया, ‘सेवेंटी-एट्टी परसेंट जल चुकी है लड़की और आप चांसेज़ पूछ रहे हैं?’

‘तब भी?’

‘देखिए मैं कुछ नहीं कह सकता।’ कहते हुए डाक्टर उकता गया। और फ़ोन उस ने लड़की के पिता को दे दिया।

‘तो क्या करूं लखनऊ आ जाऊं?’ लड़की का लाचार पिता पूछ रहा था।

‘ऐसा कीजिए कि थोड़ी देर रुक कर बात करते हैं।’ आनंद ने कहा।

‘क्यों?’ लड़की के पिता की आवाज़ रुंध गई।

‘लखनऊ में डाक्टरों से ज़रा डिसकस कर लूं फिर बताता हूं।’

‘अच्छा-अच्छा!’ लड़की के पिता की आवाज़ में थोड़ी राहत आ गई।

फिर उस ने कुछ डाक्टर दोस्तों से लखनऊ में बात की। एक डाक्टर को जब उस ने बताया कि लड़की सेवेंटी-एट्टी परसेंट जल गई है तो उस ने कहा कि थर्टी-फोर्टी परसेंट जल गए लोग नहीं बचते तो ये तो सेवेंटी-एट्टी परसेंट जली हुई है सो बचने के चांसेज़ शून्य हैं। और लखनऊ में तो बिलकुल नहीं। अब कोई चमत्कार हो जाए तो अलग बात है। उस डाक्टर ने यह भी कहा कि लखनऊ के मेडिकल कालेज तक में क़ायदे की बर्न यूनिट नहीं है, वेंटिलेटर नहीं है। लखनऊ लाने से बेहतर है, उसे वहीं रहने दीजिए। पर यह कहने पर कि ऐसे ही तो उसे नहीं न मरने देंगे? डाक्टर ने बताया कि फिर उसे वहीं मिलेट्री हास्पिटल में दिखाइए या फिर दिल्ली में सफ़दरजंग हास्पिटल ले जाइए। लखनऊ तो हरगिज़ नहीं।

अंततः दिल्ली में सफ़दरजंग हास्पिटल जाना तय हुआ। वह लोग लड़की को ले कर ट्रेन से चले। ए.सी. कोच में मय कंपाउंडर के। जो रास्ते भर ग्लूकोज़ की ड्रिप लगाता रहा। आनंद भी लखनऊ से उसी ट्रेन में आ गया। ट्रेन में पहुंच कर लड़की को देखते ही वह अवाक रह गया। वह तो पूरा हनुमान बनी हुई थी। पूरी देह बैंडेज में लिपटी पड़ी थी। गले से ले कर पैर तक। उस ए.सी. कोच में ग्लूकोज की चढ़ती बोतल के बावजूद लड़की के चेहरे पर उसे देखते ही मुस्कान आ गई। लड़की मुसकुरा रही थी और वह दहल गया था। दहल गया था उस का यह रूप देख कर। इस के पहले उस ने उसे शादी के जोड़े में देखा था और आज बैंडेज में! इस तकलीफ़़ में भी लड़की के चेहरे पर मुस्कान और जीने की ललक देख कर वह दंग था। लड़की की मुस्कान और जीने की ललक के बावजूद आनंद से रहा नहीं गया। उस के माथे पर हाथ फेरते हुए वह रो पड़ा। उस के आंसू छलछला पड़े। बोलती हुई आवाज़ रुंध गई। फिर भी उस ने पूछा, ‘दर्द ज़्यादा है?’

‘दर्द तो नहीं, जलन ज़्यादा है!’ लड़की ज़रा रुकी और बोली, ‘लग रहा है, पूरी देह अभी भी जल रही है।’ वह फिर रुकी और बोली, ‘लग रहा है जैसे ट्रेन में नहीं, आग में लेटी हुई हूं।’ कह कर वह फिर मुस्कुराने की कोशिश करने लगी। आनंद और रोने लगा। सुबक-सुबक कर। सुबकते हुए ही वह बोला, ‘घबराओ नहीं बेटी, ठीक हो जाओगी।’ आनंद को सुबकते देख कंपाउंडर ने उसे इशारा किया कि वह वहां से हट जाए। वह वहां से हट गया। उस ने देखा लड़की के माता पिता की आंखें रोते-रोते सूख गई थीं। चेहरा बिलकुल धुआं। बदहवास। लड़की के पिता में फिर भी हिम्मत बाक़ी थी। हिम्मत बेटी को बचा लेने की। लड़की के भाई-भाभी उस की देख रेख में लगे थे। ट्रेन के लखनऊ से चलने का समय हो गया था। लड़की की ननद जो लखनऊ में ही रहती थी, लड़की से मिल कर ट्रेन से उतर रही थी।

ट्रेन चलने के बाद आनंद ने लड़की के पिता से पूछा कि, ‘लड़की के ससुराल के लोग नहीं आए हैं क्या?’

‘ननद अभी मिल कर गई है और उस का हसबैंड उधर सो रहा है।’ ऊपर की बर्थ दिखाते हुए वह बोले।

‘सो रहा है?’

‘हां, दो दिन से सो नहीं पाया था।’

‘और सास-ससुर? घर के और लोग?’

‘सास-ससुर वहां अस्पताल में थे।’ कह कर लड़की के पिता ने आंखें झुका लीं।

‘और ख़र्च-वर्च?’

‘ख़र्च-वर्च की दिक़्क़त नहीं है।’ कहते हुए वह आनंद के कंधे पर सिर रख कर लिपट गए। रुंधे गले से बोले, ‘खेत-बारी सब बेंच दूंगा, अपने को बेंच दूंगा पर बस अब आप बेटी को बचा लीजिए किसी तरह!’

‘बचाने वाला तो देखिए भगवान है, डाक्टर हैं!’

‘नहीं बाबू अब सब कुछ आप के सहारे है।’ कह कर वह फिर बिलखने लगे। आनंद ने उन्हें सांत्वना दी और खाना खाने को कहा।

‘खाना खाने का मन नहीं है।’ उन्हों ने जैसे जोड़ा, ‘भूख मर गई है।’ वह बोले।

‘ऐसे तो काम नहीं चलेगा।’ खाना खाने का इसरार करते हुए आनंद ने कहा, ‘आखि़र कल दिन भर दौड़-भाग करनी होगी। देह में कुछ नहीं होगा तो कैसे दौड़-भाग कर पाएंगे?’ कहते हुए उस ने उन के हाथ में पूड़ी-सब्ज़ी का पैकेट थमा दिया। बाक़ी लोगों से भी आनंद ने खाने का इसरार करते हुए कहा कि, ‘खा लीजिए, नहीं खाना ठंडा हो जाएगा।’

खा पी कर आनंद सो गया।

सुबह दिल्ली पहुंचे तो बारिश हो रही थी। लड़की के पिता तिहरी परेशानी में पड़ गए। एक तो बारिश हो रही थी दूसरे, लड़की की हालत बिगड़ती जा रही थी। तीसरे उन के जो दो चार क़रीबी लोग जो दिल्ली में ही रहते थे उन में से कोई भी स्टेशन उन्हें रिसीव करने या बेटी की मिज़ाजपुर्सी करने नहीं आया था। ख़ास कर अपने एक भांजे पर वह कुढ़े हुए थे, जो उन के घर पर रह कर पढ़ा था। और अब दिल्ली में कहीं इंजीनियर था। उन को उम्मीद थी कि दिल्ली पहुंचते ही उन के रिश्तेदार लोग उन्हें हाथों-हाथ थाम लेंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ था। हाथों-हाथ थाम लेना तो दूर कोई झांकने भी नहीं आया था। इस सब से वह गहरे डिप्रेशन मेें चले गए थे। और रह-रह बुदबुदा भी रहे थे, ‘बताइए दुख की ऐसी घड़ी में भी ससुरे नहीं आए!’

‘न हो तो फ़ोन कर लीजिए। हो सकता है लोग भूल गए हों।’ उस ने जोड़ा, ‘एक तो बारिश है दूसरे, दिल्ली में वैसे ही लोग व्यस्त रहते हैं।’

‘रहते होंगे!’ वह भड़कते हुए बोले, ‘मैं अब किसी को याद दिलाने नहीं जाऊंगा। अब सब आएं चाहे भाड़ में जाएं।’

ख़ैर, अच्छा यह था कि स्टेशन पर स्ट्रेचर मिल गया और फ़ोन करने पर एंबुलेंस भी आ गई। सफ़दरजंग अस्पताल में आनंद ने पहले ही से एक आई.ए.एस. अफ़सर से सिफ़ारिश करवा ली थी। वह तो अस्पताल पहुंच कर पता लगा कि वहां का स्टाफ़ ऐसे गंभीर रूप से जले रोगियों की तीमारदारी में वैसे ही प्राण-प्रण से लग जाता है। बिना किसी सिफ़ारिश, बिना किसी रिश्वत। और दवा, बैंडेज वगै़रह सब कुछ फ्री! सफ़दरजंग अस्पताल की इस बर्न यूनिट में ऐसी चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था देख कर आनंद दंग था। व्यवस्था देख कर लगता ही नहीं था कि यह सरकारी अस्पताल है। मरीजों की ही नहीं, तीमारदारों के भी बैठने आदि की व्यवस्था पूरी चाक चौबंद। लड़की के पिता को लगा कि अब बेटी बच जाएगी। और वह निश्ंिचत हो गए। लेकिन आनंद उन की निश्ंिचतता देख कर परेशान हो गया। यह सोच कर कि जब इस अभागे बाप को अचानक बेटी के निधन की ख़बर मिलेगी तो बर्दाश्त कर भी पाएगा? क्यों कि लखनऊ में तो डाक्टरों ने उसे बता ही दिया था कि कोई चमत्कार ही लड़की को बचा सकता है। फिर भी वह वहां बर्न यूनिट के हेड से मिला और तफ़सील में बात की। बहुत स्पष्ट तो नहीं लेकिन दबे लहजे में ही उस ने बता दिया कि बहुत मुश्किल है। फिर भी उस ने चलते वक़्त दिलासा दिया। ‘आई विल ट्राई माइ बेस्ट! लेट्स होप!’ कह कर उस ने कंधे उचकाए और दोनों हाथ ऊपर की ओर उठा दिए।

डाक्टर के पास से आनंद जब लौटा तो उस ने देखा कि लड़की का पति पान मसाला चबाते हुए आराम से बैठा था। पर लड़की का पिता आकुल हो कर पूछ रहा था, ‘डाक्टर साहब ने क्या बताया? बेटी बच तो जाएगी न?’

‘उम्मीद तो दिलाई है।’ आनंद ने कह तो दिया पर साथ ही यह भी बता दिया कि, ‘देखिए हम लोग एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। बाक़ी भगवान मालिक है!’

यह सुनते ही लड़की के पिता का चेहरा बुझ गया। साथ ही उस ने ग़ौर किया कि लड़की के पति के चेहरे पर शिकन भी नहीं आई। वह बदस्तूर पान मसाला चबाता रहा। आनंद को यह देख कर तकलीफ़़ भी हुई और ग़ुस्सा भी आया।

थोड़ी देर बाद लड़की का पुराना बैंडेज उतार कर नया बैंडेज करने का समय आ गया। बैंडेज के समय आनंद लड़की के पति को ले कर ड्रेसिंग रूम में गया। थोड़ी देर बाद बैंडेज बदल रही नर्स ने दोनों से जाने को कह दिया। दोनों जाने लगे तो लड़की ने अपने पति को पास बुला लिया। बड़े मनुहार से बोली, ‘आप मत जाइए! मेरे पास रहिए!’ इतना सब के बाद भी पति के प्रति उसका यह अगाध प्रेम और विश्वास आनंद को भीतर तक भिगो गया। वह भावुक हो गया। इसी बीच जब नर्स ने फिर ऐतराज़ किया तो लड़की बोली, ‘यह मेरे हसबैंड हैं। इन को तो रहने दीजिए मेरे पास।’ लाख तकलीफ़़ के बावजूद उस की आवाज़ में मिठास थी। सख़्त सी दिखने वाली नर्स भी उस की आवाज़ की इस मिठास में पग गई।

आनंद बाहर आ गया।

थोड़ी देर में लड़की के तेज़-तेज़ चीखने की आवाज़ आने लगी। वह समझ गया कि पुरानी बैंडेज उस की देह से उतारी जा रही है।

कुछ देर बाद वह ड्रेसिंग रूम से अपने बेड पर शि़ट कर दी गई। ड्रेसिंग के बाद वह फिर से पूरा हनुमान जी बन गई थी। सिर छोड़ कर पूरी देह पर बैंडेज! अब एक यातना और शुरू हो गई कि उस के पास कोई भी नहीं रह सकता था। तीमारदार बाहर से समय-समय पर उसे पारदर्शी शीशे से ही देख कर संतोष कर सकते थे। ऐसे ही समय-समय पर उसे दूध या पानी दे सकते थे। बस कोई एक। वह भी तब जब नर्स बाहर आ कर तीमारदार को सूचना दे।
अजीब यातना थी यह। कि तकलीफ़ में घिरा मरीज़ अकेले ही रहे। कोई उस के माथे पर हाथ भी नहीं रख सकता था। कोई दिलासा भी नहीं दे सकता था। देह तो जली थी ही, मन भी जलाना था। एक नहीं, सभी मरीज़ों की यही यातना थी। सब के तीमारदार बाहर बैठे रहते थे, अपने मरीज़ की पुकार के इंतज़ार में। नर्स आती और बताती कि फ़लां बेड नंबर का तीमारदार कौन है? और वह संबंधित बेड वाला तीमारदार उठता और दूध-पानी जो भी देना होता जा कर दे आता।

एक बार बहुत मनुहार के बाद लड़की की मां के साथ आनंद भी दो मिनट के लिए लड़की के पास गया। हाल-चाल पूछा तो वह बुदबुदाई, ‘पूरी देह में जलन है। लगता है बेड पर नहीं आग में लेटी हूं।’ ऐसे ही रात ट्रेन में वह कह रही थी कि, ‘ट्रेन में नहीं, आग में लेटी हूं।’ आनंद फिर तकलीफ़ से भर गया। फिर भी अपने भीतर का गुबार निकालते हुए पूछा कि, ‘सच-सच बताना बेटी तुम अचानक जल गई या तुम्हारी ससुराल के लोगों ने तुम्हें जला दिया?’
‘नहीं अंकल मैं अंगीठी से ही जल गई थी।’ कहते हुए उस का चेहरा तकलीफ़ से भर गया।

‘गैस नहीं है क्या तुम्हारे घर में?’

‘है पर ख़त्म हो गई थी।’

‘तुम्हें बचाने क्यों नहीं आया तुम्हारे घर का कोई?’

‘अब क्या बताएं?’ वह जैसे निराश हो गई।

‘चलो फिर भी थोड़ी हिम्मत रखो!’ कह कर वह मुड़ा तो देखा लड़की का पति उस के पीछे खड़ा था। पान मसाला चबाता हुआ।

वार्ड से बाहर आ कर लड़की के पिता से उस ने यह वाक़या बताया और अपना शक भी। कहा कि, ‘और यह जो जासूस की तरह जा कर मेरे पीछे खड़ा हो गया। इस से तो मेरा शक और गहरा होता है।’

‘देखिए आनंद बाबू जैसे भी हो आखि़र रहना उसे इसी पति और परिवार के साथ है।’

‘अरे, जब बचेगी तब तो रहेगी!’ आनंद भड़क कर बोला। फिर पछताया भी कि यह क्या बोल दिया।

‘क्या नहीं बचेगी?’ लाचार पिता का गला रुंध गया।

‘वह तो बाद की बात है।’ आनंद बोला, ‘अगर मैं आप की जगह होता तो पूरे परिवार के खि़लाफ़़ एफ़.आई.आर. लिखवा कर बंद करवा देता।’

‘अब कोई फ़ायदा भी नहीं है।’

‘क्यों?’

‘बेटी एस.डी.एम. को बयान दे चुकी है अपने ही को दोषी बताते हुए।’

‘कब?’

‘जलने के बाद जब घर से सदर अस्पताल ये लोग लाए थे। तब अस्पताल में ही एस.डी.एम. आ कर बयान ले गया।’

‘तो क्या हुआ? एफ़.आई.आर. फिर भी हो सकती है।’ वह बोला, ‘एस.डी.एम. को बयान दुबारा दिया जा सकता है।’

‘लेकिन रहना उस को उसी घर परिवार में है।’

आनंद लड़की के पिता की इस लाचारी पर चुप रह गया।

कुछ दूसरे तीमारदारों की सलाह पर थोड़ी दूर पर एक गेस्ट हाउस में एक कमरा ले कर रहने-सोने की व्यवस्था की गई। यहां दवाई आदि के ख़र्च से तो छुट्टी मिल गई थी। पांच-छः लोगों के रहने खाने का ख़र्च बढ़ गया था। निम्न मध्यवर्गीय परिवार के लिए यह भी एक समस्या थी। नहीं-नहीं में भी रोज़ का दो ढाई हज़ार का ख़र्च।

शाम होते-होते यहां भी एस.डी.एम. आया और लड़की ने वही रटा रटाया बयान दुहरा दिया जो शायद उस के ससुराल वालों ने पहले से रटा दिया था। सब की खुसुर-फुुसुर सुन कर एक तीमारदार ने लड़की के पिता को बेख़ौफ़ सलाह दे दी कि, ‘अगर लड़की को ससुरालियों ने जलाया है तो बिना मौक़ा चूके पुलिस में रिपोर्ट लिखवाओ और सब को बंद करा दो।’ सुन कर लड़की के पिता ने फिर पुरानी टेक ली कि, ‘आखि़र उसी परिवार में रहना है।’

‘कहीं नहीं रहना है।’ वह तीमारदार बेधड़क बोला, ‘इस अस्पताल से मुक़द्दर वाले ही बच कर जाते हैं। ज़्यादातर मर कर ही जाते हैं। और फिर तुम्हारी बेटी जिस तरह जली है, बहुत मुश्किल है।’

‘और जो बच ही गई तो?’
‘तब तो और बुरा होगा!’ तीमारदार बोला, ‘जल कर बचने के बाद हमारी सोसाइटी में मर्दों का ही गुज़ारा है, औरतों का नहीं।’ वह तीमारदार बोलता जा रहा था, ‘जो बच भी गई तो भी उस का हसबैंड उसे छोड़ देगा।’
‘क्यों?’

‘जली हुई औरत, वह भी इस क़दर जली औरत देखने के लायक़ नहीं रहेगी तो हसबैंड कितने दिन रखेगा?’ वह बोला, ‘जो बच गई तो और बुरा होगा। नरक हो जाएगी ज़िंदगी। भगवान उसे उठा ही ले तो अच्छा है।’

‘अच्छा अब आप यहां से जाइए!’ बहुत देर से चुप लड़की की मां उस तीमारदार पर बरस पड़ी। बोली, ‘हम लोग यहां बिटिया को जिलाने आए हैं, मारने नहीं।’ वह ज़रा देर चुप रही और बोली, ‘डाक्टर से हम भी बात किए हैं। वह बताए हैं कि बच जाएगी। और जब बच जाएगी तो बाद की तब देख लेंगे। नहीं होगा तो गहना-गुरिया बेच कर प्लास्टिक सर्जरी करवा देंगे। एतना हम भी जानते हैं।’

तीमारदार भुनभुनाता हुआ चला गया।

दूसरे दिन उस ने देखा कि लड़की के चेहरे पर संतोष और आराम की रेखा थी। वह ख़ुश हुआ। और लड़की के पिता से बोला, ‘अब तो यहां के इलाज से आप संतुष्ट हैं न?’

‘हां, बिलकुल।’

‘तो अब कोई दिक़्क़त है नहीं। कहिए तो मैं लखनऊ लौट जाऊं। अगर कोई बात होगी, कोई ज़रूरत होगी तो फिर आ जाऊंगा।’

‘पर आप के रहने की बात कुछ और है।’

‘वो तो है। पर मैं फ़ोन पर तो हूं ही हमेशा। जो बात कहनी-सुननी होगी, हो जाएगी।’ उस ने जोड़ा, ‘फिर यहां पेशेंट के साथ तो किसी को वैसे भी नहीं रहना है।’

‘चलिए आप जैसा चाहें।’

आनंद लखनऊ लौट आया था।

लखनऊ आ कर एक डाक्टर दोस्त से उस ने स्थितियां बताईं और कहा कि, ‘इंप्रूवमेंट तो है। लगता है लड़की बच जाएगी।’ डाक्टर आनंद की बात सुन कर मुसकुराया। बोला, ‘चलिए बच जाए तो अच्छी बात है। पर है बहुत मुश्किल।’

‘क्यों?’

‘देखिए तीन चार दिन में चीजें़ सामने नहीं आतीं। जब स्किन की पहली, दूसरी और तीसरी लेयर तक जल जाती है। ख़ास कर तब दिक़्क़त और बढ़ जाती है। पहली लेयर जलने के बाद दूसरी लेयर काम करने लगती है। दूसरी लेयर के बाद तीसरी लेयर काम करती है। फिर मांस आ जाता है। या इस के पहले ही सेप्टिक हो जाता है। फिर इस सेप्टिक का ज़हर पूरी देह में फैलने लगता है। तब डाक्टर और दवाई दोनों लाचार हो जाते हैं। कई बार इस पर भी डिपेंड करता है कि कितना एरिया जला है और कितना डीप। दोनों ही फै़क्टर काम करते हैं। अगर दस परसेंट कोई जला हो तो नब्बे परसेंट बचने की गुंजाइश होती है। और अगर नब्बे परसेंट जला है तो दस परसंेट बचने की गुंजाइश होती है। कभी-कभी चमत्कार भी होता है। पर अमूमन नहीं। नब्बे परसेंट जले लोगों की जीवित होने की सूचना लगभग नहीं आती। और कई बार दस परसेंट जले लोग भी मौत को गले लगा बैठते हैं। इट डिपेंड्स ऑन आल सिचुएशंस!’

सुन कर आनंद चुप्पी लगा गया।

तीन दिन बाद एक शाम उस लड़की के निधन की भी ख़बर आ गई। मां-बाप की यातना यह थी कि अस्पताल में होते हुए भी अंतिम समय बेटी के पास नहीं रह पाए। बेटी से कुछ कह-सुन नहीं पाए। अस्पताल की व्यवस्था ही ऐसी थी।

ख़ैर, पोस्टमार्टम के बाद दिल्ली मंे ही अंत्येष्टि कर सब लोग लौट आए। पति ने अग्नि दी। तेरही भी ससुरालीजनों ने की। पर लड़की के पिता तेरही में नहीं गए। अभी शोक ठंडा भी नहीं हुआ था कि लड़के की शादी की तैयारी की ख़बरें आ गईं। अब लड़की की मां का माथा ठनका। आनंद को फ़ोन कर कहा कि, ‘भइया अब से इन लोगों के खि़लाफ़़ पुलिस में रिपोर्ट नहीं हो सकती?’ वह बोली, ‘बताइए भइया साल भर तो यह लोग रुक ही सकते थे। पर दो महीने बाद ही शादी की तैयारी कर ली इन लोगों ने? हमारे दुख का भी ख़याल नहीं किया इन लोगों ने?’

‘रिपोर्ट करने में हर्ज नहीं है। पर सुबूत क्या है उन के खि़लाफ़़?’

‘दो तीन चिट्ठियां हैं।’ वह ज़रा रुकी और बोली, ‘फिर सास ने उस को आग लगाने के लिए उकसाया था।’

‘यह कैसे पता?’

‘बेटी ने अस्पताल में मेरी बहू को बताया था। और बहू ने मुझे।’

‘तो तभी क्यों नहीं बताया?’

‘मैं ने ही बहू का मुंह बंद कर दिया था। लोक लाज और फिर बेटी की जिं़दगी सोच कर। पर अब तो हद हो गई।’

‘उस के पापा क्या कह रहे हैं?’

‘वह तो कुछ बोल ही नहीं रहे।’

‘बात करवाइए!’

‘लीजिए।’ कह कर वह लड़की के पिता से बोली, ‘लीजिए आनंद भैया से बात करिए!’ फ़ोन पर आ कर वह बोले, ‘देखिए आनंद जी, अब जब हमारी बेटी ही नहीं रही तो उस की ससुराल भी नहीं रही। जैसे बेटी को संतोष कर लिया, वैसे ही इस को भी बर्दाश्त कर ले रहे हैं। वैसे भी कुछ होगा-वोगा नहीं। जाने दीजिए!’

पर यहां मुनव्वर भाई ने जाने नहीं दिया नर्सिंग होम वाले को। पांच लाख रुपए का मुआवज़ा ले कर ही छोड़ा। बेटी के पोस्टमार्टम के झमेले में फंसने के बाद लखनऊ में उन्हों ने आनंद से सही ही कहा था कि आज सिर्फ़ सद्दाम हुसैन को ही फांसी नहीं हुई है, मेरे उसूलों और आदर्शों को भी फांसी हुई है। लेकिन तब आनंद ने मुनव्वर भाई के इस कहे की तासीर को अब समझा था।

मुनव्वर भाई का यह बदलना, उन के उसूलों और आदर्शों को फांसी वगै़रह सिर्फ़ मुनव्वर भाई के स्तर पर ही नहीं हो रहा था। आनंद देख रहा था कि समूचा समाज ही आदर्शों-उसूलों को फांसी दे रहा था। पहले जो लोग गुंडों-माफ़ियाओं का विरोध भले नहीं करते थे पर उन के साथ रहने में गुरेज़ तो करते ही थे। एक विभाजन रेखा तो रखते ही थे। कम से कम उन के समर्थन में तो नहीं ही रहते थे। पर अब वही लोग जो गुंडों-माफ़ियाओं से दूरी रखने के बजाय उन के साथ अपना नाम बड़े फ़ख््रा़ के साथ जोड़ने लगे थे। उन के साथ सट कर छाती फुला कर फ़ोटो खिंचवाने लगे थे। चौतरफ़ा आलम यही था। रिश्वतख़ोरों को पहले लोग नफ़रत की नज़र से देखते थे। पर अब वही रिश्वतख़ोरी उन की योग्यता बन चली थी।

और योग्यता?

योग्यता अब सब से बड़ी अयोग्यता मान ली गई थी।

नब्बे के दशक में एक राष्ट्रीय पत्रिका के एक सर्वे की उसे याद आ गई। तब के दिनों नरसिंहा राव प्रधानमंत्री थे। चौदह भाषाओं के ज्ञाता इस प्रधानमंत्री के समय में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। पर एक भी भाषा में यह प्रधानमंत्री इस को गिरने से रोकने का आदेश नहीं दे पाया। शिबू सोरेन जैसे संघर्षशील आदिवासी नेता को रिश्वत की हांडी में चढ़ा कर अल्पमत की सरकार को पांच साल पूरी कामयाबी से चला ले जाने और समूचे देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने वाले इस राजनेता का कोई कुछ तब बिगाड़ नहीं पाया था। हर्षद मेहता जैसे कांडों की झड़ी लगी थी। तभी के दिनों उस राष्ट्रीय पत्रिका ने एक सर्वे में देश की लड़कियों से सवाल पूछा था कि वह किस के साथ सोना पसंद करेंगी? हर्षद मेहता तब भी जेल में था। फिर भी लड़कियों की पहली पसंद में हर्षद मेहता था और दूसरी पसंद में सत्तर पार कर चुके तब के प्रधानमंत्री नरसिंहा राव थे। जैसा निर्लज्ज यह सवाल था, वैसी ही निर्लज्ज यह लड़कियां थीं।
और अब क्या समूचा समाज ही अब निर्लज्ज नहीं हो चला था?

तभी तो ग़रीबी, भुखमरी, बीमारी, अशिक्षा, मंहगाई और बेरोज़गारी से जूझते इस देश के राष्ट्रीय कहे जाने वाले अख़बार और पत्रिकाएं औरतों को कैसा मर्द पसंद है या कि मर्दों को कैसी औरतें पसंद हैं? या कि फिर औरतों का सब से पसंदीदा सेक्स आसन क्या है पर सर्वे रिपोर्ट छाप-छाप धन्य होती हैं।

धन्य है भारत देश!

दिल्ली समेत सारा देश आतंकवादी विस्फोटों में भुट्टे की तरह भुन रहा है और अपने राजनीतिज्ञ हैं कि तराज़्ाू बाट लिए मुस्लिम वोट के हिसाब किताब में अफनाए हुए हैं। देश बिखरता है तो बिखरे! कल टूटता हो तो आज टूट जाए पर मुस्लिम वोटों का मेढक दूसरे की तराज़्ाू में नहीं जाना चाहिए। सामाजिक समरसता के नाम पर देश में गृहयुद्ध के बादल गरजें तो उन की बला से। पिछड़ा, अति पिछड़ा, यह दलित और वह दलित, यह ब्राह्मण तो वह कायस्थ, वह ठाकुर तो यह बनिया! जाति तोड़ो के अलंबरदार लोहिया के अनुयायी भी जब इस जातिवादी सांप-नेवले की लड़ाई का पसावन पीते पसीना-पसीना दिखते हैं तो आनंद का धैर्य जवाब दे जाता है।
तो क्या इन्हीं कारकों के हावी हो जाने से ही उस ने राजनीति से तौबा कर ली? क्या इन कारकों से उसे लड़ना नहीं चाहिए था? वह पूछता है अपने आप से ही। पूछता यह भी है कि क्या इस गंधाती जातिवादी राजनीति से लड़ने के औज़ार थे उस के पास?

एक गांधी थे, उन की अहिंसा, उन का सत्य और उन की पारदर्शिता थी। उन का सत्याग्रह और आदर्श थे। और महत्वपूर्ण यह कि साध्य को पाने के लिए साधन भी पवित्र होने चाहिए। इन्हीं सब बातों को ले कर आनंद और उस के जैसे मुट्ठी भर लोग गांधी की प्रासंगिकता के झंडे गाड़ते फिरते। पर समाज में तो गांधी की प्रासंगिकता धूल धूसरित थी। पहले वह जब-तब सुनता ही रहता था कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। और अब लगे रहो मुन्ना भाई जैसी फ़िल्मों से गांधी की प्रासंगिकता का स्वेटर ख़ुद कांग्रेसी बुन रहे थे। इतना लाचार गांधी को उस ने कभी नहीं पाया था। फ़िल्म ने एक नई शब्दावली गढ़ी थी-गांधीगिरी! जैसे गांधीगिरी न हो उठाईगिरी हो गई हो! दादागिरी, हो गई हो! गांधी का इस से बड़ा अपमान और क्या हो सकता था कि फ़िल्म में एक गुंडा पूरी गुंडई से गांधीगिरी झाड़ रहा था। जो कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी बढ़ा देने की मिसाल देते हुए दूसरे गाल पर भी थप्पड़ लगने पर वह अगले की ठुंकाई यह कह कर कर रहा था कि दूसरे गाल पर थप्पड़ मारने के बाद क्या करना है बापू ने अपुन को यह नहीं बताया! और गांधी के बारे में थोड़ा बहुत जानने वालों की हेठी तो देखिए कि रेडियो पर गांधी पर पूछे गए सवालों का जवाब बताने वाले प्रोफे़सर, प्रेशर कुकर और अन्य चीज़ें पाने के लिए कुत्तागिरी को भी शर्मशार करते दिखते हैं। और फ़िल्म का प्रभाव देखिए कि जगह-जगह शराबी, मवाली, गुंडे, शरीफ़ जिसे देखिए हाथ में फूल ले कर गांधीगिरी झाड़ रहे हैं। तिस पर तुर्रा यह कि खबरिया चैनल उसे दिन-रात दिखा-दिखा अघा रहे हैं।

इस गांधीगिरी से गांधी कितने दलदल में और धंस गए इस का हिसाब-किताब करने की किसी समाजशास्त्री को भी सुधि है भला? क्या समाजशास्त्री, क्या इतिहासकार, क्या लेखक और क्या कवि सभी गांधीगिरी के इस बाज़ार पर इस क़दर मुग्ध हैं कि बाज़ार उन्हें लील जाने पर आमादा हैं, इस की आहट को भी नज़र अंदाज़ कर यह सब के सब बाज़ार की प्रशस्तिगाथा का शिलालेख तैयार करने में युद्धरत हैं। युद्धरत हैं यह सभी स्वामी रामदेवों की योग पताका के बाज़ार का मीनू रचने, पढ़ने, बेचने और छलने की प्रवीणता हासिल करने में। आशाराम बापू जा रहे हैं, स्वामी रामदेव आ रहे हैं। एक बाज़ार जा रहा है, दूसरा बाज़ार आ रहा है। यह क्या है? कि योग, आध्यात्म, गांधी सभी बिकाऊ हो गए हैं!

बाज़ार इतना बड़ा और आदमी इतना छोटा? इतना बौना? बाज़ार से आदमी है कि आदमी से बाज़ार? यह सवाल उतना ही अनबूझ होता जा रहा है जितना कभी विद्यार्थी जीवन में एक सवाल होता था कि नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है!

एक लोहिया थे। जाति तोड़ो, दाम बांधो का पहाड़ा पढ़ाते थे। उन के अनुयायी समाजवादियों ने इस पहाड़े को जातिवाद के पहाड़ से ढंक दिया, साथ ही पूंजीपतियों की दलाली शुरू कर दी। दाम आसमान छूने लगे तो उन की बला से! जैसे सच्चे गांधीवादी हाशिए से भी बाहर होते-होते जाने किस दड़बे में बिला गए, वैसे ही सच्चे लोहियावादी भी ‘जाने कहां गए वो दिन’ कहते जाने कहां सिधार गए।

एक थे विनोबा भावे। इमरजेंसी के पोषक संत बन कर वह ख़ुद ही सो गए!

एक थे जे.पी.! लोक नायक जयप्रकाश नारायण। जैसे वह जीवन भर सत्ता से दूर रहे वैसे ही उन के अनुयायी सत्ता की छाल देह पर लपेटे बिना सांस नहीं ले पाते। दूसरी आज़ादी की रणभेरी बजाने वाले जे.पी. के ये अनुयायी जे.पी. आंदोलन का बाजा बजाते हुए भ्रष्टाचार की बजबजाती गंगा में आकंठ तर होने के लिए ही जैसे अवतार लिए हों सब के सब!

आनंद ख़ुद भी जे.पी. आंदोलन का सिपाही रहा है। यह सारी चिंताएं जब वह एक रोज़ अपने एक पुराने समाजवादी साथी से शेयर करने लगा जो ख़ुद भी राजसुख भोगते हुए मंत्री पद छकने में विभोर था तो वह उकता गया। दोनों के हाथ में शराब थी। और शराब के बहाने दोनों बहुत समय बाद अपनी दोस्ती का रिन्यूवल कर रहे थे। अचानक वह कहने लगा, ‘आनंद एक तो तुम ने राजनीति अचानक छोड़ कर ग़लती की। तुम्हें थोड़ा सर्वाइव करना चाहिए था। जो तुम कर नहीं पाए। यह तुम्हारी पहली ग़लती थी। दूसरी ग़लती तुमने कारपोरेट सेक्टर की नौकरी कर के की।’ वह ज़रा रुका और बोला, ‘अब देख रहा हूं कि तुम्हारी सोच भी अब कारपोरेट हो गई है। सोचो कि तुम्हारी यह सोच कहीं न कहीं देश की उस महान जनता का अपमान नहीं करती? वह महान जनता जो जनादेश दे कर हमारे जैसे लोगांे को विधानसभा या लोकसभा में भेजती है। कैसे मान लूं कि तुम्हारी सोच सही है और देश की समूची जनता ग़लत! जानते हो यह सब तुम नहीं, तुम्हारी पराजित मानसिकता, तुम्हारा फ्रस्ट्रेशन, तुम्हारी दोहरी मानसिकता बोल रही है। तुम्हारी ही भाषा में कहूं कि तुम उलटी कर रहे हो! हमारी सफलता तुम्हें हज़म नहीं हो रही, पच नहीं रही!’

‘तुम बोल चुके?’

‘हां!’

‘अब मैं बोलूं?’ शराब का गिलास मेज़ पर रखते हुए आनंद बोला।

‘बिलकुल!’

‘देखो राजनीति छोड़ कर मैं ने ग़लती की। अपनी उस नपुंसकता पर पछतावा है मुझे। पर क्या करूं? जिन औज़ारों को ले कर, जिन उद्देश्यों को ले कर राजनीति के सपने हमने बुने थे वह औज़ार भोंथरे हो चले थे, उद्देश्य गुम हो गए दिखते थे। ग़लती हुई कि उन औज़ारों में हम चमक नहीं ला पाए। विचारों के दीए में उतना तेल नहीं डाल पाए कि रोशनी हो और गुम हुए उद्देश्य हासिल कर लें। हथियार डाल दिए हम ने। ग़लती यह भी हुई कि सुविधाओं के जाल में फंस कर कारपोरेट सेक्टर की नौकरी की। यह भी मानता हूं। राजनीति नहीं, न सही, गांव में खेती बारी कर जीवन तो चल ही सकता था! और हो सकता था कि राजनीति के अपने औज़ारों को साफ़ सुथरा कर फिर से राजनीति में आते। पर डियर यह बताओ कि मैं तो कारपोरेट सेक्टर की नौकरी कर रहा हूं। पर तुम भी क्या कारपोरेट सेक्टर की नौकरी नहीं कर रहे?

‘क्या बात कर रहे हो?’ वह किंचित गुस्से में पर मुसकुरा कर बोला।

‘नहीं नाराज़ होने की बात नहीं है और तुम इसे व्यक्तिगत भी मत लो!’

‘चलो!’ कहते हुए उस ने कंधे उचकाए और शराब की एक घूंट भरी।

‘सच बताओ कि इस समय तुम जिस पार्टी में हो वह क्या अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील नहीं है? और देश की ऐसी कौन सी पार्टी है जो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील नहीं है? और जो कोई एक भी ऐसी पार्टी हो जो कारपोरेट सेक्टर की दलाली नहीं खाती हो तो उस का नाम ज़रा हमें भी बता दो। सच मानो बड़ा सुख मिलेगा और अपना सारा गिला शिकवा दूर हो जाएगा। देश की महान जनता का जनादेश पा कर आए तुम या तुम्हारे जैसे लोगों को सैल्यूट मारूंगा डियर! प्लीज़ बता दो!’ उस ने जैसे जोड़ा, ‘और हां ऐसी भी किसी एक पार्टी का नाम बता दो जिस में विचारधारा चलती हो और जातिवाद, सांप्रदायिकता नहीं। देश की महान जनता का महान जनादेश पा कर आए लोगों में कोई गुंडा, माफ़िया या हिस्ट्री शीटर न हो! नौकरी-चाकरी छोड़-छाड़ कर उस पार्टी को ज्वाइन कर लूंगा। भले ही फिर से वहां जा कर दरी ही बिछाने का काम करना पडे़।’

‘तुम राजनीतिक पार्टी की बात कर रहे हो या कि किसी रामलीला मंडली की? अब तो रामलीला मंडली भी शायद ही कहीं इतनी साफ़ सुथरी मिले!’

‘तो?’

‘तुम एक काम क्यों नहीं करते?’

‘क्या?’

‘मज़ाक मत समझना और बुरा भी मत मानना!’ वह बोला, ‘मित्रवत सलाह दे रहा हूं।’

‘क्या?’

‘तुम किसी साइकेट्रिक से क्यों नहीं मिल लेते?’

‘तुम्हें लंबी काउंसिलिंग की ज़रूरत है। और शायद दवा की भी!’

‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात कर रहे हो?’ आनंद बोला, ‘मैं तुम्हें पागल दिखता हूं?’

‘दिखते नहीं हो पर जिस तरह की बातें तुम कर रहे हो, उस से मुझे डर लग रहा है।’

‘कि मैं पागल हो जाऊंगा।’

‘हां। कुछ समय पहले एक फ़िल्म देखी थी प्रहार। उस में नाना पाटेकर भी सेना का मेजर है। तुम्हारी तरह ऊट पटांग, बिना सिर पांव के बोलता है, गुंडों से मार पीट करता है। और अंततः कोर्ट उसे पागलख़ाने भेज देती है।’ वह बोला,

‘ऐसे ही वह एक फ़िल्म प्रतिघात में भी पागल हो जाता है। दो तीन और फ़िल्मों में भी मैं ने उस को पागलों की तरह ही बड़बड़ाते देखा है। व्यवस्था से बउराया हुआ, घबराया हुआ। जैसे कि तुम!’

‘बड़ी फ़िल्में देख रहे हो आजकल? इतना टाइम मिल जाता है?’

‘टाइम कहां मिलता है? निकालना पड़ता है। फिर मैं तो नाना पाटेकर का फ़ैन हूं।’

‘अच्छा!’

‘तो?’ वह लंबा घूंट मारते हुए बोला।

‘नाना पाटेकर के डायलाग्स अच्छे लगते हैं सो उस के फ़ैन हो और मेरी बातें इतनी बुरी लग रही हैं कि मुझे पागलख़ाने भेज रहे हो?’ आनंद बोला, ‘जानते हो क्यों?’

‘क्यों?’

‘वह तुम्हारे जज़्बात को सहलाता है अपने संवादों से तो अच्छा लगता है। और मैं तुम्हारी रीढ़ पर सीधे मार रहा हूं सो तुम्हें पागल दिखता हूं। नाना पाटेकर के संवाद तुम्हारा मनोरंजन करते हैं। मेरी बातें तुम्हारा ख़ून खौला रही हैं सो तुम्हें या तुम्हारे सिस्टम के लिए ख़तरा दिखती हैं सो पागल का लिबास पहना कर रुख़सत करना ज़रूरी लगता है। है न?’

‘क्या बात कर रहे हो?’ वह बोला, ‘तुम्हारा पुराना मित्र हूं। सो कह दिया। रही बात तुम से या तुम्हारी बातों से ख़तरे की तो तुम्हें चाहे जितना गुमान हो अपनी बातों पर। पर मैं यह तो जानता ही हूं कि कारपोरेट सेक्टर में काम करने वाले लोग इस कद़र बधिया बना दिए जाते हैं कि वह किसी के लिए सुविधा भले बन जाएं, असुविधा तो हरगिज़ नहीं बन सकते। और ख़तरा तो क़तई नहीं, सपने में भी नहीं।’

‘ऐसा!’ आनंद बोला, ‘बड़े मुग़ालते पाल रखे हैं!’

‘मुग़ालता नहीं, सच है यह।’ वह बोला, ‘वी.पी. सिंह जो बोफ़ोर्स के घोड़े पर सवार हो कर बड़ी तेज़ी से धराशायी हो गए जानते हो कैसे?’

‘कैसे?’

‘यह कारपोरेट लॉबी के लोग। अरुण नेहरू जैसे लोग उन्हें धूल में मिला दिए। पहले राजीव को खाया, फिर वी.पी. को। राजीव गांधी हों या वी.पी. सिंह सब को पेंट बना कर देश की दीवार पर पोत दिया अरुण नेहरू, अरुण सिंह सरीखों ने!’ वह बोला, ‘नतीजा देखो कि कांग्रेस के पास अब एक सर्वमान्य और जनाधार वाला नेता नहीं है। बिना जनादेश के एक आदमी प्रधानमंत्री पद पर पांच साल न सिर्फ़ गुज़ार लेता है, आगे भी प्रधानमंत्री बने रहने के सपने जोड़ता है। विचार के नाम पर उस के पास आर्थिक उदारीकरण की एक कुदाल है जिस से देश की नींव खोद कर वह समूची अर्थव्यवस्था को अमरीका के पास गिरवी रख देना चाहता है।’

‘चलो तुम्हारे तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद, एक पाखंडी समाजवादी के नेतृत्व में काम करने के बावजूद समाजवादी आग का झुनझुना तुम्हारे सीने में अभी भी बजता है तो अच्छा है। हालां कि यह आग सुलगती तो अच्छा था। पर ध्यान रखना यह और ऐसी कोई बात कहने के जुर्म में कोई तुम्हें किसी साइकेट्रिक के पास जाने की सलाह दे दे तो साइकेट्रिक के पास चले मत जाना!’

‘साले तुम सुधरोगे नहीं, हमारा रसगुल्ला हमीं को घुमा कर मार रहे हो?’ वह बोला, ‘लेकिन फिर भी तुम ज़रूर जाना। शायद तुम्हारे फ्रस्ट्रेशन, तुम्हारे तनाव, तुम्हारे मोहभंग को विश्राम मिले। मेरा क्या है! सरकारी सुविधाओं और सफलता के नशे में यह आग डायलूट होती रहती है, होम होती रहती है। सो मुझे ज़रूरत नहीं पड़ेगी।’

‘वैसे भी तुम तो मूल्यों और नैतिकता की राजनीति को पहले ही तिलांजलि दे चुके हो सो तुम्हें ज़रूरत पड़ेगी भी क्यों? ख़ैर, और बताओ घर परिवार कैसे चल रहा है?’

‘सरकार से, राजनीति से फुर्सत मिले तब तो परिवार सोचूं?’ वह पूरी रौ में बोला, ‘परिवार को दिल्ली शि़ट कर दिया है। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में यहां लखनऊ में डिस्टरबेंस बहुत था। दूसरे, बच्चों को सत्ता और राजनीति के नशे से भी दूर रखना था। सो दिल्ली भेज दिया।’

‘चलो तुमने सत्ता, राजनीति और परिवार के बीच सेतु बना लिया है, अच्छा है।’ कह कर आनंद ने उस से छुट्टी ली और घर चला आया।

तो क्या राजनीति और परिवार एक साथ नहीं चल सकते?

उस ने सोचा। यह भी सोचा कि आखि़र उस ने भी परिवार के लिए ही तो राजनीति नहीं छोड़ी? पत्नी से यही ज़िक्र किया और बताया कि बताओ उस ने राजनीति के लिए परिवार दिल्ली शि़ट कर दिया!

‘आप ने ज़्यादा पी ली है, सो जाइए!’ पत्नी ने कहा।

हद है! तो क्या वह जैसे राजनीति के लिए उपयोगी नहीं रह गया वैसे ही परिवार के लिए भी अनुपयोगी होता जा रहा है?

दोस्त कहता है साइकेट्रिक को दिखाओ और पत्नी कहती है ज़्यादा पी ली है सो जाइए! इतनी निस्संगता? गांधी, लोहिया, जे.पी. जैसे उस के राजनीति के विचार और औज़ार इतने बेमानी हो गए? वह ख़ुद भी तो बेमानी नहीं हो गया? परिवार में भी? उस ने राजनीति छोड़ दी, क्या घर भी छोड़ दे?

उ़फ़!

तो क्या वह बुद्ध बन जाए? बुद्ध की शरण में चला जाए? बुद्धं शरणम् गच्छामि, धम्मं शरणम गच्छामि! वह सोचता है। सोचता है कि पत्नी उस से ऊब रही है कि वह पत्नी से ऊब रहा है? राजनीति से वह ऊब रहा है या राजनीति उस से ऊब रही है? बहुत ऊब कर जब उस ने राजनीति छोड़ी थी, तब ऐलान कर बाक़ायदा सब को बता कर छोड़ी थी। कि अब बस! मेरे वश की राजनीति नहीं रही या कि शायद अब की राजनीति के लायक़ नहीं रहा वह अब! तो क्या पत्नी को भी अब वह बता दे कि अब घर के भी लायक़ नहीं रहा वह। या यह घर अब उस के लायक़ नहीं रहा। बिन बताए घर छोड़ दे। जैसे सिद्धार्थ सोती पत्नी को छोड़ घर से निकल गया। बन गया बुद्ध! गौतम बुद्ध!

उसे मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा की वह पंक्तियां याद आ गईं, ‘सखि वे मुझ से कह कर जाते/तो क्या वह मुझ को अपनी पग बाधा ही पाते?/मुझ को बहुत उन्हों ने माना/फिर भी क्या पूरा पहचाना?/मैं ने मुख्य उसी को जाना/जो वे मन में लाते।’ उस ने सोचा। सोचा कि पत्नी तो कभी उस के पथ की बाधा बनी नहीं।

फिर काहे को घर छोड़ना?

उस ने सोचा। सोचा कि आखि़र पत्नी के साथ कैसा अहंकार? फिर वह पिए हुए तो है ही। क्या ग़लत कह दिया उस ने? फिर सोचा कि कहीं अहंकार में ही तो उस ने राजनीति से कुट्टी नहीं की थी? दुनिया की अधिकतम समस्याएं अहंकार की ही तो उपज हैं। सोचते-सोचते वह सो गया।

सुबह उठने की जल्दी नहीं थी। पत्नी ने दो बार जगाया और पूछा कि, ‘आफ़िस नहीं जाना है क्या?’

‘जाना तो है पर आफ़िस नहीं एक सेमिनार में जाना है।’ सोए-सोए वह बुदबुदाया।

‘तो पहले ही बताया होता।’ पत्नी बोली, ‘तो खाना भी खाएंगे कि नहीं?’

‘नाश्ता कर लेंगे!’ वह बोला, ‘आधे घंटे बाद जगा देना। और हां, गीज़र चला देना।’

सेमिनार में वह भी वक्ता है। पर जावेद अख़्तर ख़ास वक्ता हैं। मुंबई से फ़िल्मी ग्लैमर ओढ़े हुए आए हैं सो थोड़ी भीड़-भाड़ ज़्यादा है। तक़रीर भी उन की अच्छी होती है। बोलने का लहज़ा इतना उम्दा होता है कि बस पूछिए मत। बिलकुल लज़ीज़ खाने का मज़ा देते हैं। उन की बातों की चाशनी और लहजे की आंच में बड़े-बड़े क़ुर्बान हो जाते हैं। हालां कि सेमिनार का मसला आतंकवाद है पर वह बोल बाबरी मस्जिद पर रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम दोनों कठमुल्लों को लताड़ रहे हैं। जाने क्या है कि देश के लगभग सभी मुसलमान बाबरी मस्जिद के घाव को लगातार हरा कर सहलाते ही रहते हैं। देश के और मसले उन्हें विचलित नहीं करते। वह बाबरी मस्जिद के विलाप से मुक्ति नहीं पाते। वह चाहे लाख प्रोग्रेसिव हों या धुर कठमुल्ले। जावेद अख़्तर के बीच बोलने में एक औरत उठ खड़ी होती है और बड़े सलीक़े से कहती है कि, ‘बाबरी मस्जिद की शहादत हमें भी झकझोरती है पर कश्मीर से हिंदुओं का पलायन, कारगिल, लालक़िला, लोकसभा और दिल्ली-मुंबई पर हमले सहित देश में अन्य आतंकवादी हमले भी हमें झकझोरते हैं, हिला कर रख देते हैं, इस पर भी तो बोलिए!’

‘जी बिलकुल! और इस फ़ेहरिस्त में गुजरात दंगे को भी जोड़ लेते हैं।’ जावेद बोले, ‘हम इस सब की मज़म्मत करते हैं।’

‘जी गोधरा को भी जोड़ लीजिए और इन सब की तफ़सील में भी जाइए। सिर्फ़ मज़म्मत से काम मत चलाइए। क्यों कि यह मज़म्मत तो ठीक वैसे ही है जैसे रंज लीडर को है बहुत मगर आराम के साथ!’

‘बिलकुल दुरुस्त फ़रमाती हैं आप।’ और फिर कलफ़ लगी उर्दू में वह शुरू हो गए।

खाने के समय वह फिर लोगों से घिर गए। आनंद ने उन से कहा कि, ‘अब आप को भी पालिटिक्स ज्वाइन कर लेनी चाहिए!’

‘नहीं साहब माफ़ कीजिए। सियासत से दूरी ही अच्छी!’ वह बोले, ‘हमें हमारा काम ही अच्छा लगता है।’

‘कर तो ख़ैर आप वैसे भी सियासत ही रहे हैं। बस फ़र्क है कि बुर्क़ा ओढ़ कर कर रहे हैं। एक पर्देदारी है बस!’

‘नहीं जनाब। ऐसा नहीं है।’

‘अच्छा छोड़िए। इन दिनों आप बहुत अच्छी तक़रीरें तो दे ही रहे हैं गीत भी बहुत अच्छे लिख रहे हैं।’

‘ज़र्रानवाज़ी का शुक्रिया!’

‘और जो आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं आप से?’

‘शौक़ से!’

‘आप को अपने पुराने काम को ले कर कभी पछतावा नहीं होता?’

‘अब आप ज़ाती हो रहे हैं।’

‘नहीं-नहीं मैं हनी इरानी की बात नहीं कर रहा हूं!’

‘तो?’

‘मैं तो आप के फ़िल्मी काम की बात कर रहा हूं।’

‘ओह क्या ऐसा कर दिया?’

‘अरे, आप को इस का एहसास भी नहीं है?’

‘आप बताएं तो सही!’ जावेद खीझ पड़े।

‘ये जंज़ीर, दीवार और शोले जैसी एंग्री यंग मैन वाली फ़िल्में लिख कर आप को कभी अफ़सोस नहीं हुआ?’ आनंद बोला, ‘आप को नहीं लगता कि ऐसी फ़िल्में लिख कर एक पूरी की पूरी पीढ़ी बर्बाद कर दी आप ने। हिंसा हमारे समाज का ख़ास हिस्सा बन गई। माफ़ियागिरी, स्मगलिंग, गुंडई दाल में नमक की तरह ही नहीं मिली बल्कि अब तो नमक में दाल की तरह मिल कर जस्टीफ़ाई होने लगी! यह सोच कर आप को कभी मुश्किल नहीं होती। आज की आप की तक़रीरें चूहे खा कर हज जाने जैसी नहीं लगतीं? कि फ़िल्मों में ही नहीं समाज में भी विलेन और हीरो का फ़र्क़ ख़त्म कर दिया!’

‘आप को लगता है कि फ़िल्में ऐसा कर सकती हैं?’ जावेद बगलें झांकते हुए बोले।

‘कर सकती हैं? आनंद बोला, ‘अरे कर चुकी हैं एक नपुंसक, हिंसक और लालची समाज रच चुकी हैं। आप की तब की लिखी फ़िल्मों ने इस का बीज बोया था, आज की फ़िल्में उस की फ़सल काट रही हैं। न कोई कहानी, न कोई कंटेंट, न मेसेज! सिरे से चार सौ बीसी सिखाती-पढ़ाती ये मीनिंगलेस फ़िल्में कौन सा समाज गढ़ रही हैं, भगवान ही मालिक है।’

‘भई आप तो बहुत परेशान लगते हैं!’ जावेद बगलें झांकते हुए बोले।

‘क्या करें जावेद जी विदेशी फ़िल्मों की नक़ल लिख कर, समाज में हिंसा परोस कर आप और अमिताभ बच्चन जैसों ने नाम, पैसा और शोहरत भले कमा लिए हों पर यह समाज जावेद अख़्तरों और अमिताभ बच्चनों को कभी माफ़ नहीं करेगा!’

‘चलिए, आप तो अभी हमें माफ़ कर दीजिए!’ कह कर जावेद खाना बिना ठीक से खाए ही निकल गए।

आयोजकों में से एक व्यक्ति आनंद के पास आया और शिकायत भरे अंदाज़ में बोला, ‘आप ने उन के खाने का ज़ायका ही बिगाड़ दिया। कम से कम ठीक से खाना तो खा लेने दिया होता।’

‘नहीं भाई साहब, ये बात तो ठीक ही कर रहे थे।’ एक व्यक्ति आइसक्रीम खाते हुए बोला, ‘राजेश खन्ना तक तो ठीक था। प्यार-मोहब्बत की बातें चल रही थीं। ई अमितभवा ने आ कर बदला लेना, बाप का बदला लेना शुरू कर दिया। और हर जगह मार पीट, ख़ून ख़राबा! माहौल बिगाड़ दिया फ़िल्मों का।’

माहौल यहां का भी बिगड़ गया था। सो लोग जाने लगे।

आनंद ने आफ़िस से आज छुट्टी ले रखी थी। सो सोचा कि अब वह कहां जाए?

पहुंचा काफ़ी हाउस।

2 comments:

  1. नमस्कार! सादर अभिनन्दन.पूरा समाज आपके इस दर्पण में पूरी चमक के साथ विद्यमान हैं. ब्लाग पर भी प्रस्तुति हेतु धन्यवाद. यहां नहीं होता तो शायद मैं इस महान कृति से वंचित ही रहता.

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  2. पोस्टमार्टम के प्रकरण से मन घिना गया । आखिर पैसे के लिए कितने नीचे गिरेगा यह समाज?

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