Saturday, 25 February 2012

नतिनी पूछे नानी से नानी चलबू गौने !

लिखने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है !




मेरे बारे में जो भी कुछ बटोरा है, मनोज जी, प्लीज़ उसे सार्वजनिक करें !



यशवंत जी, यह मनोज दुबे कौन हैं? या तो वह बहुत नादान हैं, या बहुत मासूम ! या फिर बहुत बडे टट्टू ! जो राजनाथ सिंह सूर्य और उन के जैसों दलालों भडुओं की पैरोकारी पर उतर आए हैं! और मुझे बिन मांगे ढेर सारी सलाह दिए जा रहे हैं। न सिर्फ़ सलाह दिए जा रहे हैं मुझे बल्कि मेरे बारे में ऐसी कई बातों को जानने का दावा भी किए जा रहे हैं और बता रहे हैं कि वह बातें यहां लिखने लायक नहीं हैं। लगे हाथ फ़तवा भी जारी किए जा रहे हैं कि मैं और मेरी भडास भावी पीढी के लिए नासूर भी बन सकती हैं। राखी सावंत स्टाइल का नासूर बता रहे हैं। अजब है !



भोजपुरी की एक कहावत याद आ रही है, नतिनी पूछे नानी से नानी चलबू गौने ! मनोज दूबे कुछ वैसे ही सवाल पूछ रहे हैं। जैसे किसी समय राजनाथ सिंह एक लेख में मेला घुमनी का व्यौरा एक बार परोसते हुए पूछ रहे थे। याद तो होगा ही राजनाथ जी आप को? कि अपनी मेला घूमनी को भी भूल गए आप? मैं तो नहीं भूला हूं। क्या करूं? उपन्यासकार जो ठहरा ! दिक्कत यही हो गई इस बार कि आप का पाला एक उपन्यासकार से पड गया है। अपने किसी चमचे या मातहत से नहीं। और उपन्यासकार की नज़र ठीक वैसे ही होती है जैसे किसी घायल नागिन की आंख। कि एक बार जो आंख में समा गया तो समा गया। जीवन भर भूलने वाला/वाली नहीं। ध्यान दीजिएगा मनोज जी आप भी।



मैं ने तो राजनाथ सिंह को भी खुली चुनौती दी थी कि मेरे बारे में जो भी आरोप हों सार्वजनिक करें। और इन मनोज दुबे को भी खुली चुनौती दे रहा हूं कि मेरे बारे में जो भी आरोप आप न्रे बटोरे हैं तुरंत से तुरंत उसे सार्वजनिक करें। यहां तो यशवंत जी आप को बताऊं कि मैं यह बिलकुल नहीं कहता कि मैं बहुत बडा धर्मात्मा हूं, पर यह दावा तो कर ही सकता हूं और वह भी छाती ठोंक कर ब्राह्मण होते हुए भी बिलकुल ठाकुरों की तरह कि कभी कोई पाप नहीं किया है, कोई दलाली या भडुवई नहीं की है। पत्रकारिता के नाम पर कोई दुकान नहीं खोली है। यहां तो पहला काम भी लिखना है और आखिरी काम भी लिखना है। मन्ना डे का गाया एक गाना है: हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है ! मुश्किल के दिनों में गाता भी था कभी, अभी भी जब कभी मुश्किल आती है तो कभी-कभी गाता हूं बतर्ज़ मन्ना डे कि लिखने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है !



यशवंत जी, कभी बात हो तो मनोज दुबे से तो उन्हें बता दीजिएगा कि जितना मैं ने अब तक लिखा है ना, उतना उन के गुरु राजनाथ सिंह सूर्य या उन के जैसे लोग या उन का कोई शिष्य उस की नकल भी लिखने बैठेंगा न तो पसीना चू जाएगा। और मनोज दुबे जैसे डी टी पी आपरेटर उसे टाइप करते-करते थक जाएंगे। क्यों मनोज दुबे जी आप जनसत्ता एक्सप्रेस या आई नेक्स्ट में डी टी पी आपरेटर ही तो रहे हैं न?



घबराइए नहीं डी टी पी आपरेटर होना कोई गुनाह या पाप नहीं है। कोई कभी भी तरक्की कर के आगे बढ सकता है। मैं ने तो एक ऐसे संपादक अरविंद कुमार के साथ भी काम किया है जो कभी बाल श्रमिक थे, आज उन्हें शब्दाचार्य कहते हिंदी जगत थकता नहीं है। उन्हों ने थिसारस जैसा अनमोल काम जो किया है। और कि हिंदी जगत कभी भी अरविंद कुमार का उपकार भूल भी नहीं पाएगा। पर मनोज दूबे आप और आप के राजनाथ सिंह जैसे लोग थिसारस के कंसेप्ट से शायद ही वाकिफ़ हों। साक्षर जो ठहरे। खैर, मैं ने अरविंद कुमार पर भी लिखा है, क्या कभी पढा आप ने? अरविंद कुमार भी मेरे संपादक रहे हैं। सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में। मैं ने तो सहाराश्री के बारे में भी लिखा है, अदम गोंडवी के बाबत लिखे एक लेख में। इसी भडास पर। असल में मनोज दुबे आप ने एक आरोप यह लगाया है कि मैं ने जिस भी किसी के साथ काम किया उस के खिलाफ़ लिख दिया। शायद आप ने मेरा लिखा सिर्फ़ राजनाथ या उन के जैसे लोगों के बारे में ही पढा है। अच्छा राजीव शुक्ला के बारे में भी मैं ने लिखा है, पढा आप ने या आप के गुरु ने? [दलाली के बाबत राजीव शुक्ला बीस ठहरते हैं राजनाथ के आगे। कहूं कि राजनाथ के बाप ठहरते हैं। राजनाथ के बाद राजीव आए राज्यसभा में। और देखिए मंत्री भी बन गए। लखनऊ के उसी पार्क रोड से राजीव शुक्ला ने भी बरास्ता पत्रकारिता में पांव पसारे थे, जिस पार्क रोड से राजनाथ ने भी पांव पसारे थे। दोनों पत्रकार। और दोनों ही के साथ मुझे काम करने का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ। पर राजीव शुक्ला आज संसदीय कार्य राज्य मंत्री हैं। अच्छा मनोज दुबे जी आप कभी राजनाथ जी से पूछिएगा कि राज्यसभा में उन्हों ने कभी ऐसा कोई मामला उठाया हो जो लोग याद रख सकें। या फिर वही कभी उसे बडे फ़ख्र से बता सकें कि हां, मैं ने यह मामला कभी राज्यसभा में उठाया था ! खबर तो ऐसी कभी उन्हों ने खैर कभी लिखी ही नहीं जिस के बारे में वह सर उठा कर कह सकें कि हां, मैं ने यह खबर भी लिखी थी।



खैर, अरविंद कुमार पर तो मैं ने लिखा ही है, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, विष्णु प्रभाकर, रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, कन्हैयालाल नंदन, प्रभाष जोशी, अदम गोंडवी, वीरेंद्र सिंह, आलोक तोमर सहित और भी तमाम लोगों पर लिखा है। यह सब भी कभी पढ लीजिएगा। आप की राय अगर दूसरे के निर्देश पर नहीं बनती होगी और कि अपने विवेक से चलते होंगे तो ज़रुर बदल जाएगी, मेरे बारे में। रघुवीर सहाय और कमलेश्वर को छोड कर बाकी जितने लोगों का नाम लिया है अभी मैं ने सब के बारे में इसी भडास पर आप को मिल जाएगा। इस में अरविंद कुमार, प्रभाष जोशी, वीरेंद्र सिंह के संपादकत्व में मैं ने नौकरी भी की है। इसी स्वतंत्र भारत में वीरेंद्र सिंह जैसे पढे लिखे मर्द आदमी को भी बतौर संपादक देखा है, जिया है। बल्कि कहते हुए अच्छा लगता है कि मुझे दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ वीरेंद्र सिंह जी ही ले आए थे। जिस वीर बहादुर सिंह की दिन रात चापलूसी करते नहीं अघाते थे राजनाथ सिंह और झूठा ही उन्हें अपना सहपाठी बताते फिरते हैं उसी मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह का डिनर का न्यौता ठुकराते मैं ने वीरेंद्र सिंह को देखा है। यह उन के संपादक का गर्व था। और कि अधिकार भी। वह वीरेंद्र सिंह जो लैम्ब्रेटा स्कूटर से चलते थे और उस पर प्रेस भी नहीं लिखते थे। और जानकारियां तो अदभुत ! जिस भी विषय पर उन से बात करिए, हमेशा तैयार। उन के समय में स्वतंत्र भारत सवा लाख से अधिक बिकता था, इसी लखनऊ में। यह १९८५ की बात है। आगे-पीछे कोई अखबार नहीं था तब स्वतंत्र भारत के। लेकिन दुर्भाग्य देखिए स्वतंत्र भारत का कि इसी अखबार में शिव सिंह सरोज और राजनाथ सिंह जैसे दलाल और भडुए लोग भी संपादक बन गए। जिन की योग्यता और कद एक ज़िला संवाददाता से ज़्यादा का नहीं रहा, लिखने -पढने के मामले में। पर किस्मत का पट्टा लिखवा कर लाए थे यह लोग कि संपादक बनेंगे, सो बन गए। पर यह लोग संपादक पद की गरिमा क्या होती है, यह भी नहीं ही जानते थे, बल्कि उसे धो-पोंछ कर गोमती में क्या हैदर कैनाल नाले में बहा आए।



रही बात घनश्याम पंकज की तो उन की भाषा पर, उन की समझ पर, उन की दृष्टि पर तो मैं आज भी मोहित हूं। उन का संपादक रुप तो बहुत ही उज्जवल है और चमकदार भी। स्वतंत्र भारत को नया लोक, नया लुक देते हुए उस की गुणवत्ता को जैसा पंकज जी ने निखारा, किसी और ने नहीं। जिस को सरोज जी और राजनाथ जी जैसे लोग नष्ट कर बैठे थे। पंकज जी के इस योगदान को कोई कैसे भुला सकता है भला? पर स्वतंत्र भारत की बरबादी में वह भी एक कारण जाने-अनजाने बन गए, इस का बहुत अफ़सोस भी है। मनोज दुबे, आप ने सुभाष राय का भी इस लेख में ज़िक्र किया है, यह ज़िक्र यहां ज़रा नहीं बहुत अटपटा है। सुभाष राय जैसे संपादक पढे-लिखों में शुमार होते हैं। दलालों और भडुओं में नहीं। उन पर ऐसा दाग नहीं है। वह एक संवेदनशील कवि भी हैं। उन की चर्चा जो मैं ने की थी कभी अपने लिखे में तो वह लेखकीय अस्मिता के ही तहत। किसी और अर्थ में नहीं। और वह उन की कोई नौकरी वाली मजबूरी भी रही हो सकती है।



मनोज दुबे, आप ने बताया है कि आज मै भी कहीं संपादक हो सकता था। क्या कह रहे हैं आप भाई? मैं या मेरे जैसा व्यक्ति आज कहीं संपादक भी हो सकता है? कोई पढने-लिखने वाला व्यक्ति आज की तारीख में और संपादक? क्या चाहते हैं? कि सडक पर आ जाऊं? कि आप ने जो तरकीब बताई है कि 'मार्निंग वाक' करूं। मतलब दलाल भडुआ बन जाऊं? ए भाई इतना बुरा भी मत सोचिए मेरे बारे में। मतभेद ही रखिए तो ठीक। रंजिश पर मत आइए। मुझे लिखने-पढने के ही काम में लगे रहने दीजिए और आजीविका के लिए मुझे छोटी-मोटी नौकरी ही करते रहने दीजिए न ! आखिर बाल-बच्चेदार आदमी हूं। इतनी रियायत तो बरतिए ही ना ! अपने गुरु राजनाथ सिंह की तरह मत पेश आइए। कि नौकरी ही खा जाने की तरकीब लगा जाइए। और अब तो मैं भी नौकरी कैसे की जाती है, और कि कैसे बचाई जाती है, इतने धक्के खाने के बाद तो जान ही गया हूं भाई ! बावजूद इस सब के ऐसे में वो एक शेर याद आता है कि रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ/ आ फिर से मुझे छोड के जाने के लिए आ। तो मनोज दुबे जी प्लीज़ जो भी कुछ मेरे बारे में आप ने बटोरा है न प्लीज़ उसे सार्वजनिक रुप से साझा करिए ना ! आखिर मैं भी तो जो दूसरों को दर्पण दिखाने में लगा हूं इन दिनों, देखूं तो सही कि मनोज दुबे जी के दर्पण में मैं कैसा हूं? यह ज़रुरी है, बहुत ज़रुरी है। प्लीज़ खुलासा करें। क्यों कि मैं भी जानता तो हूं ही कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। चाहे वह कैसा भी हो। मुझे बहुत खुशी होगी। अंजुम रहबर का एक नहीं दो शेर इस वक्त एक साथ याद आ रहा है। एक तो यह कि : आइने पर इल्ज़ाम लागाना फ़िजूल है/ सच मान लीजिए चेहरे पर धूल है। और दूसरा शेर है कि: जिन के आंगन में अमीरी का शज़र लगता है/ उन का हर ऐब भी ज़माने को हुनर लगता है। तो मनोज जी आप को राजनाथ सिंह सूर्य की दलाली भी हुनर लगती है और मेरा लिखना-पढना भी ऐब लगता है तो इस में कुसूर मेरा नहीं, आप का भी नहीं ज़माने के दस्तूर का है! आप क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता ! आमीन! बस मेरे बारे में जो भी कुछ आप ने बटोरा है ना प्लीज़ उस को सार्वजनिक रुप से साझा करिए। इतनी तो कृपा आप मेरे ऊपर करेंगे ही ऐसा मुझे विश्वास है।

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