Sunday, 17 June 2012

कोई बलात्कारी नहीं हैं नारायणदत्त तिवारी, साझी धरोहर हैं हमारी

महाभारत की बहुत सारी कथाएं हमारे समाज में आज भी कही सुनी जाती हैं। इस में एक किस्सा बहुत मशहूर है। दुर्योधन और अर्जुन का कृष्ण के पास समर्थन मांगने जाने का। जिस में अर्जुन का पैताने बैठना और दुर्योधन का सिरहाने बैठने और फिर कृष्ण द्वारा अर्जुन को पहले देखे जाने और बतियाने का किस्सा बहुत सुना सुनाया जाता है। पर इस पूरे घटनाक्रम में एक घटना और घटी थी जो ज़्यादा महत्वपूर्ण थी पर बहुत कही सुनी नहीं जाती। लोक मर्यादा कहिए या कुछ और। बहरहाल हुआ यह कि दुर्योधन जाहिर है कि पहले ही से पहुंचे हुए थे। और अर्जुन बाद में आए। कृष्ण जैसा कि कहा जाता है कि सोए हुए थे। तो दुर्योधन ने ही अर्जुन के आने पर अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा कि, 'आइए इंद्र पुत्र ! कहिए कैसे आना हुआ?' अर्जुन ने अपमानित महसूस तो किया पर मौके की नज़ाकत देख चुप रहे। बात खत्म हो गई। पर सचमुच खत्म कहां हुई थी भला? फिर हुआ यह कि जब कृष्ण ने अर्जुन से बात खत्म की और दुर्योधन की तरफ़ मुखातिब हुए तो उन्हों ने दुर्योधन को संबोधित कर पूछा, 'अब बताइए व्यास नंदन आप का क्या कहना है?' कृष्ण ने दुर्योधन को व्यास नंदन कह कर दुर्योधन को उस की ज़मीन बताई और अर्जुन के अपमान का प्रतिकार भी किया। दुर्योधन को यह एहसास भी करवा दिया कि अगर अर्जुन अपने पिता पांडु की संतान नहीं हैं तो श्रीमान दुर्योधन आप भी ऋषि व्यास के ही वंशज हैं, संतान हैं, शांतनु के नहीं। गरज यह कि दोनों ही एक तराजू में हैं। इस लिए इस मसले पर चुप ही रहिए। और दुर्योधन चुप रह गए थे। यह विवाद बहुत लंबा है और टेढा भी। शायद इसी लिए याद कीजिए कि जब बी.आर. चोपडा ने महाभारत बनाई तो उस में इस विवाद पर पानी डालने में राही मासूम रज़ा ने अदभुत चतुराई से काम लिया। उन्हों ने पाडव में किसी भी को वायु पुत्र, इंद्र पुत्र आदि नहीं संबोधित किया। उन्हों ने सब को ही कुंती पुत्र कह कर बडी खूबसूरती से काम चला दिया। और यह कोई अनूठा काम राही मासूम रज़ा ने ही नहीं किया। यह शालीनता हमारी परंपरा में भी रही है। जो शायद अब विस्मृत होने लगी है। अब हम असली मुद्दे पर आते हैं। आज की बात पर आते हैं।

नारायणदत्त तिवारी जैसा सदाशय और विनम्र राजनीतिज्ञ व्यक्ति बडी मुश्किल से मिलता है। कम से कम राजनीतिज्ञ तो हर्गिज़ नहीं। और वह भी वह राजनीतिज्ञ जो सत्ता का स्वाद बार-बार किसिम-किसिम से ले चुका हो। लेकिन वही तिवारी जी आज एक व्यर्थ के विवाद में पड गए हैं तो कोई उन के साथ खड़ा नहीं दीखता। न राजनीति में, न मीडिया में, न समाज में। अभी-अभी, बिलकुल अभी खुशवंत सिंह जैसे उदारमना और खुलेपन के हामीदार लेखक और पत्रकार ने भी अपने कालम में इस घटना को ले कर तिवारी जी पर लगभग तंज किया है। यह देश और समाज का दुर्भाग्य है कुछ और नहीं। राजनीतिज्ञों में सहिष्णुता अब लगभग विलुप्त ही है। लेकिन अटल विहारी वाजपेयी और नारायणदत्त तिवारी जैसे राजनीतिज्ञों में यह सहिष्णुता कूट-कूट कर भरी हुई है। सर्वदा से। कम से कम मेरा अनुभव तो यही है। इसी का लाभ ले कर लोग उन्हें बदनाम करने की हद से भी गुज़ार ही देते हैं। नतीज़ा सामने है। तिवारी जी अब बदनामी से भी आगे आरोपों के भंवर में भी घिर गए हैं। जैसे सारे कानूनी और सामाजिक सवाल और नैतिकता, शुचिता आदि की ज़िम्मेदारी तिवारी जी पर ही डाल दी गई है। इस हद तक कि लोग अब उन का मजाक भी उडाने लग गए हैं। यह बहुत ही चिंताजनक और शर्मनाक बात है। क्या व्यक्तिगत जीवन की बातें इस तरह सडक पर ले आई जानी चाहिए? फिर तो समाज नष्ट हो जाएगा। और जो इसी तरह लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालने लग गए तो समाज और जीवन की तमाम व्यक्तिगत बातें कहां से कहां चली जाएंगी क्या इस बात का अंदाज़ा है किसी को?

सीवन जो उघाड़ने पर जो लोग आमादा हो ही जाएंगे तो हमारे बहुत सारे भगवान भी इन सब चीज़ों से बच नहीं पाएंगे। न ही आज के या बहुत से पुराने राजनीतिज्ञ और अधिकारी आदि भी। सवाल और जवाब इतने और इतने किसिम के हो जाएंगे कि समाज रहने लायक नहीं रह जाएगा। आज भी ऐसी और इस किसिम की बहुत सी बातें परदे में हो कर भी बाहर हैं। चर्चा होती है उन बातों की भी जब-तब लेकिन आफ़ द रिकार्ड। कफील आज़र ने लिखा ही है कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। सब का डी.एन.ए. लिया ही जाने लगेगा तो न त्रेता युग के लोग बचेंगे, न द्वापर युग के। और यह तो खैर कलियुग है ही। आंच कौरव-पांडव पर भी आएगी और कि भगवान राम भी नहीं बचेंगे। न कोई गली बचेगी न कोई गांव या कोई नगर या कोई कालोनी, कि जहां ऐसी दास्तानें और तथ्य न मिल जाएं। बरास्ता विश्वामित्र-मेनका ही शकुंतला-दुष्यंत की कहानी हमारे सामने है। और ऐसी न जाने कितनी कहानियां हमारे इतिहास से ले कर वर्तमान तक फैली पड़ी हैं। यह और ऐसी कहानियां छुपती नहीं हैं लेकिन मुकुट की तरह सिर पर सजा कर घूमी भी नहीं जातीं। जैसे कि हमारी उज्जवला शर्मा जी और उन के सुपुत्र सर पर मुकुट सजा कर घूम रहे हैं। उज्जवला जी और उन के सुपुत्र तो अब कुछ बीते दिनों से यह कहानी लिए घूम रहे हैं पर हकीकत यह है कि यह कहानी रोहित शेखर के पैदा होते ही लोगों की जुबान पर आ गई थी। राजनीतिक हलकों से होती हुई यह कहानी प्रशासनिक हलकों और मीडिया में भी आई। पर सिर्फ़ चर्चा के स्तर पर। चुहुल के स्तर पर। ठीक वैसे ही जैसे कि अभी भी एक बहुत बडे अभिनेता का पिता अमरनाथ झा को बताया जाता रहा है, जैसे एक पूर्व प्रधानमंत्री का पिता राजा दिनेश सिंह को बताया जाता रहा है। जैसे जम्मू और कश्मीर के एक पूर्व मुख्यमंत्री का पिता जवाहरलाल नेहरु को बताया जाता रहा है। ग्वालियर में एक बंगाली परिवार के बच्चों को अटल बिहारी वाजपेयी का बताया जाता रहा है। विजया राजे सिंधिया तक का नाम लिया गया। लखनऊ में तो मंत्री रहीं एक मुस्लिम महिला जो अब स्वर्ग सिधार गई हैं अटल जी के लिए अविवाहित ही रह गईं। लोहिया के साथ भी ऐसे बहुतेरे किस्से संबंधों के हैं। नेहरु के किस्से एक नहीं अनेक हैं। लेडी डायना से लगायत तारकेश्वरी सिनहा तक के। महात्मा गांधी की भी एक लंबी सूची है। तमाम विदेशी औरतों से लगायत राजकुमारी अमृता कौर, जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती, सरोजनी नायडू, आभा तक तमाम नाम हैं। इंदिरा गांधी तक के रिश्ते नेहरु के पी.ए. रहे मथाई, धीरेंद्र ब्रह्मचारी, दिनेश सिंह, बेज्ज़नेव, फ़ीदेल कास्त्रो आदि तक से बताए जाते रहे हैं। अमरीका के एक राष्ट्रपति ने तो उन्हें एक बार गोद में उठा ही लिया था। सोनिया गांधी के भी कई रिश्ते खबरों में तैरते रहे हैं। माधव राव सिंधिया से लगायत अरुण सिंह तक कई सारे नाम हैं। राजीव गांधी के भी तमाम औरतों से नाम जुडे हुए हैं। मार्ग्रेट अल्वा, सोनलमान सिंह, शैलजा, अरुण सिंह की पत्नी आदि बहुतेरे नाम हैं। संजय गांधी की सूची तो बहुत ही लंबी है। अंबिका सोनी से लगायत रुखसाना सुल्ताना तक के। प्रियंका गांधी का भी यही हाल है। शाहरुख खान तक से उन का नाम जुडा हुआ है। राहुल गांधी का भी नाम अछूता नहीं है। देशी-विदेशी लडकियों के नाम हैं। मुलायम सिंह यादव के साथ भी यह किस्सा रहा है। अब उन के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव को ही लीजिए। साधना गुप्ता जी से से उन का विवाह कब हुआ यह कोई नहीं जानता। पर प्रतीक पैदा कब हुए, यह बात बहुत लोग जानते हैं। और स्पष्ट है कि प्रतीक के पैदा होने के बहुत बाद मुलायम सिंह यादव ने उन को अपने साथ रखा। और वह भी पहली पत्नी के निधन के बाद ही। नहीं एक समय तो यही अखिलेश यादव इस मसले पर मुलायम से बगावत पर आमादा हो गए थे। लेकिन यह सब बातें सड़क पर फिर भी नहीं आईं। और मज़ा यह कि साधना जी ने भी पूरी शालीनता बनाए रखी। साध्वी उमा भारती तक नहीं बचीं। उमा भारती और गोविंदाचार्य का रिश्ता सब को मालूम है। यह दोनों विवाह तक के लिए तैयार थे। पर आर.एस.एस. बीच में आ गया। कई उद्योगपतियों और फ़िल्मी सितारों की बात भी जग जाहिर है। अभी नीरा राडिया और टाटा के प्रेम वार्तालाप का टेप आ ही चुका है। तमाम आई.ए.एस. अफ़सरों और तमाम राजनयिक भी ऐसे किस्सों में शुमार हैं। रोमेश भंडारी का स्त्री प्रेम भी हमेशा सुर्खियों में रहा है। कुछ नामी लेखकों-लेखिकाओं की भी बात सुनने को मिलती ही रहती है। लगभग सभी भाषाओं में। हिंदी में भी। खुशवंत सिंह अब तिवारी जी को ले कर चाहे जो लिखें-पढें पर उन के किस्से भी खूब हैं। कई तो उन्हों ने खुद बयान किए हैं। वैसे भी पत्रकारों में तो ऐसे संबंधों की जैसे बरसात है। बिलकुल फ़िल्मी लोगों वाला हाल है। फ़िल्म वालों की बात इस मामले में वैसे भी बहुत मशहूर है। सैकडों नहीं हज़ारो किस्से हैं। कुछ वैसे ही जैसे इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारो हैं ! वैसे चुंबन के लिए मशहूर एक अभिनेता का पिता महेश भट्ट को बताया जाता रहा है। और तो और महेश भट्ट की यातना देखिए कि वह खुद को भी हरामी कहते हैं। उन के पिता भी मशहूर निर्देशक विजय भट्ट हैं। पर चूंकि महेश भट्ट की मां मुस्लिम थीं सो वह चाह कर भी उन से शादी नहीं कर सके। दंगे-फ़साद की नौबत आ गई थी। अपनी इन सारी स्थितियों को ले कर महेश भट्ट ने एक बहुत खूबसूरत फ़िल्म ही बनाई है जन्म ! जिस के नायक कुमार गौरव हैं। पर महेश भट्ट या उन की मां कभी विजय भट्ट की छिछालेदर करने नहीं गईं। खामोशी से स्थितियों को स्वीकार ही नहीं किया बल्कि प्रेम में जो आदर और गरिमा होती है, उसे अब तक निभा भी रहे हैं। बहुत दूर जाने की ज़रुरत नहीं है। फ़िल्म अभिनेत्री नीना गुप्ता ने विवाह नहीं किया है पर एक बेटी की मां हैं। नीना की इस बेटी के पिता मशहूर क्रिकेटर विवियन रिचर्ड हैं। यह सब लोग जानते हैं। नीना गुप्ता भी इस बात को स्वीकार करती हैं। पर वह कभी अपनी या विवियन रिचर्ड की छीछालेदर करने पर उतारु नहीं हुईं। न ही हको-हुकूक मांगने पर आमादा हुईं। फिर यह और ऐसी कहानियों और संबंधों की फ़ेहरिस्त अनंत है। क्या भूलूं, क्या याद करूं? वाली स्थिति है। वैसे भी अब ज़माना लिव-इन-रिलेशनशिप का आ गया है।

हां, जो आप के साथ कहीं छल-छंद हुआ हो तो बात और है। शोषण हुआ हो, आप के साथ कोई धोखा हुआ हो, झांसा दिया गया हो, आप नाबालिग हों तो भी बात समझ में आती है। पर अगर यह सब आप की अपनी सहमति से हुआ हो तो फिर? आप शादीशुदा भी हैं, बच्चे के पिता का नाम स्कूली प्रमाण-पत्रों में आप बी.पी.शर्मा जो आप के आधिकारिक पति रहे हैं, जिन से भी आप ने प्रेम विवाह ही किया था के बावजूद आप को कुछ लोग भडका देते हैं तो आप को याद आता है कि आप के बेटे का पिता तो फला व्यक्ति है । और यह बेटा आप के गर्भ में तब आया जब आप ने कुछ रातें दिल्ली स्थित उत्तर प्रदेश निवास में उस व्यक्ति के साथ हम-बिस्तर हो कर गुज़ारीं। आप यह बताना भूल जाती हैं कि उस व्यक्ति से आप के पहले ही से रागात्मक संबंध रहे हैं। यही नहीं और भी लोगों से आप के रागात्मक संबंध रहे हैं। आप यह भी नहीं बतातीं कि उस आदमी के आवंटित सरकारी बंगले में आप और आप के पिता रहने के लिए जगह मांगते हैं। और वह आदमी शराफ़त में शरण दे देता है। संबंधों में भी आप ही की पहल होती है। नारायणदत्त तिवारी जैसा व्यक्ति बलात्कार तो कर नहीं सकता। यह तो उन के विरोधी भी मानेंगे। हकीकत यह है कि एक समय राज्य मंत्री रहे शेर सिंह तुगलक लेन के एक बंगले में रहते थे। जब नारायणदत्त तिवारी उद्योग मंत्री बने तो उन्हें शेर सिंह का यही बंगला आवंटित हो गया। शेर सिंह और उज्वला शर्मा ने तिवारी जी से उस मकान में बने रहने की इच्छा जताई। तब उज्वला का अपने पति से विवाद शुरु हो गया था। शेर सिंह ने तिवारी जी से यह भी बताया तो तिवारी जी मान गए। यह उन की सहिष्णुता थी। अब उन की इस कृपा पर आप ने उन से खुद संबंध भी बना लिए और उन की सहृदयता का इतना बेजा लाभ लिया। तब तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा जब तक नरसिंहा राव के हित नारायणदत्त तिवारी से नहीं टकराए। तिवारी जी ने अर्जुन सिंह के साथ मिल कर तिवारी कांग्रेस बना ली। तब। और जब नरसिंहा राव और उन की मंडली ने आप को अपने स्वार्थ में भड़काया तो आप भड़क गईं। स्वार्थ में अंधी हो गईं। तिवारी जी को ब्लैक-मेल करने पर लग गईं।

एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। अब उन का यहां नाम क्या लूं? पर जब रोहित शेखर पैदा नहीं हुए थे उस के पहले ही उन्हों ने किसी तरह आप की तिवारी जी से बात-चीत को टेप कर लिया। कहते हैं कि एक समय उन पत्रकार महोदय ने भी आप के मसले पर तिवारी जी को बहुत तंग किया। ब्लैक-मेल किया। पर तिवारी जी ने किसी तरह उस मसले को संभाला। अपनी और आप की इज़्ज़त सड़क पर नहीं आने दी। लेकिन नरसिंहा राव और उन की मंडली आप पर इतनी हावी हो गई कि तिवारी जी दिल्ली से चले लखनऊ। एयरपोर्ट तक आए। पर आप ने जहाज पर चढ़ने नहीं दिया। पता चला बाई रोड आप उन को ले कर चलीं लखनऊ के लिए। बीच में गजरौला रुक गईं। तिवारी जी खबर बन गए। खबर आई कि राव सरकार ने तिवारी जी को गायब करवा दिया। यह आप की नरसिंहा राव से दुरभि-संधि थी। दूसरे दिन खबर आ गई कि वह आप के साथ गजरौला में थे।

माफ़ कीजिए उज्वला जी, आप किसी से अपने बेटे का पितृत्व भी मांगेंगी और उस की पगडी भी उछालेंगी? यह दोनों काम एक साथ तो हो नहीं सकता। लेकिन जैसे इंतिहा यही भर नहीं थी। तिवारी जी की पत्नी सुशीला जी को भी आप ने बार-बार अपमानित किया। बांझ तक कहने से नहीं चूकीं। आप को पता ही रहा होगा कि सुशीला जी कितनी लोकप्रिय डाक्टर थीं। बतौर गाइनाकालोजिस्ट उन्हों ने कितनी ही माताओं और शिशुओं को जीवन दिया है। यह आप क्या जानें भला? रही बात उन के मातृत्व की तो यह तो प्रकृति की बात है। ठीक वैसे ही जैसे आप को आप के पति बी.पी. शर्मा मां बनने का सुख नहीं दे पाए और आप को मां बनने के लिए तिवारी जी की मदद लेनी पड़ी।

खैर, हद तो तब हो गई कि जब आप एक बार लखनऊ पधारीं। तिवारी जी की पत्नी सुशीला जी का निधन हुआ था। तेरही का कार्यक्रम चल रहा था। आप भरी सभा में हंगामा काटने लगीं। कि पूजा में तिवारी जी के बगल में उन के साथ-साथ आप भी बैठेंगी। बतौर पत्नी। और पूजा करेंगी। अब इस का क्या औचित्य था भला? सिवाय तिवारी जी को बदनाम करने, उन पर लांछन लगाने, उन को अपमानित और प्रताणित करने के अलावा और भी कोई मकसद हो सकता था क्या? क्या तो आप अपना हक चाहती थीं? ऐसे और इस तरह हक मिलता है भला? कि एक आदमी अपनी पत्नी का श्राद्ध करने में लगा हो और आप कहें कि पूजा में बतौर पत्नी हम भी साथ में बैठेंगे !

उज्वला जी, आप से यह पूछते हुए थोड़ी झिझक होती है। फिर भी पूछ रहा हूं कि क्या आप ने नारायणदत्त तिवारी नाम के व्यक्ति से सचमुच कभी प्रेम किया भी था? या सिर्फ़ देह जी थी, स्वार्थ ही जिया था? सच मानिए अगर आप ने एक क्षण भी प्रेम किया होता तिवारी जी से तो तिवारी जी के साथ यह सारी नौटंकी तो हर्गिज़ नहीं करतीं जो आप कर रही हैं। जो लोगों के उकसावे पर आप कर रही हैं। पहले नरसिंहा राव और उन की मंडली की शह थी आप को। अब हरीश रावत और अहमद पटेल जैसे लोगों की शह पर आप तिवारी जी की इज़्ज़त के साथ खेल रही हैं। बताइए कि आप कहती हैं और ताल ठोंक कर कहती हैं कि आप तिवारी जी से प्रेम करती थीं। और जब डाक्टरों की टीम के साथ दल-बल ले कर आप तिवारी जी के घर पहुंचती हैं तो इतना सब हो जाने के बाद भी सदाशयतावश आप और आप के बेटे को भी जलपान के लिए तिवारी जी आग्रह करते हैं। आप मां बेटे जलपान तो नहीं ही लेते, बाहर आ कर मीडिया को बयान देते हैं और पूरी बेशर्मी से देते हैं कि जलपान इस लिए नहीं लिया कि उस में जहर था। बताइए टीम के बाकी लोगों ने भी जलपान किया। उन के जलपान में जहर नहीं था, और आप दोनों के जलपान में जहर था? नहीं करना था जलपान तो नहीं करतीं पर यह बयान भी ज़रुरी था?

क्या इस को ही प्रेम कहते हैं?

लगभग इसी पृष्ठभूमि पर गौरा पंत शिवानी की एक कहानी है करिए छिमा। उस कहानी का नायक श्रीधर भी उत्तराखंड का है। और राजनीतिक है। इस कहानी में पिरभावती की बहन हीरावती का जो चरित्र बुना है शिवानी ने वह अदभुत है। अहर्निष संघर्ष, प्रेम और त्याग की ऐसी दुर्लभ प्रतिमूर्ति हिंदी कहानी में क्या दुनिया की किसी भी कहानी में दुर्लभ है। जाने क्यों आलोचकों ने इस कहानी का ठीक से मूल्यांकन नहीं किया। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था से कहीं कमतर कहानी नहीं है, यह करिए छिमा। बल्कि उस से आगे की कहानी है। कि कहीं प्रेमी की पहचान न हो जाए इस लिए वह अपने नवजात बेटे की हत्या कर बैठती है। और उस का यह करुण गायन: 'कइया नी कइया, करिया नी करिया करिए छिमा, छिमा मेरे परभू !' दिल दहला देता है। वस्तुत: कहानी का नायक कहिए या प्रतिनायक श्रीधर उस का प्रेमी भी नहीं है, बल्कि श्रीधर ने तो उसे चरित्रहीनता का आरोप लगा कर गांव से बाहर करवा देता है, पंचायत के एक फ़ैसले से। पर बाद के दिनों में यही श्रीधर एक दिन जंगल से गुज़र रहा होता है कि ज़ोर की बर्फ़बारी शुरु हो जाती है। विवशता में उसे गांव से बाहर जंगल में एक छोटा सा घर बना कर रह रही हीरावती के घर में शरण लेनी पड्ती है। बर्फ़बारी से सारे रास्ते बंद हैं। यहां तक कि हीरावती के घर का दरवाज़ा भी बर्फ़ से बंद हो जाता है। दोनों अकेले ही घर में होते हैं। और कई दिनों तक। बर्फ़ जब छंटती है तब श्रीधर गांव वापस लौटता है। लेकिन इस बीच वह हीरावती के साथ लगातार हमविस्तर हो चुका होता है। उसे पता नहीं चलता पर हीरावती गर्भवती हो जाती है। श्रीधर गांव से चला जाता है। इधर चरित्रहीनता और गर्भ दोनों का बोझ लिए हीरावती मारी-मारी फिरती रहती है। लगभग विक्षिप्त। लेकिन वह किस का गर्भ ले कर घूम रही है, किसी को नहीं बताती। बाद के दिनों में जब उसे बेटा होता है तो वह उसे पैदा होते ही बर्फ़ की नदी में डुबो कर मार डालती है। इस ज़ुर्म में वह जेल भी जाती है। वर्षों बाद जब जेल की कैद से छूट कर आती है, तब तक श्रीधर बड़ा राजनीतिज्ञ हो कर सत्ता के शीर्ष पर आ चुका होता है। हीरावती उस से मिलने जाती है। बडी मुश्किल से वह उस से मिल पाती है। श्रीधर उस से बड़ी नफ़रत से देखता है। और पूछता है कि, 'तुम ने अपने ही बेटे की हत्या कर दी?' तो हीरावती कहती है, 'तो क्या करती भला? आंख, नाक, शकल सब कुछ तो तेरा ही था। सब जान जाते तब? कि तेरा ही है तब?' श्रीधर ठगा सा रह जाता है, हीरावती की यह बात सुन कर। लेकिन हीरावती यह कर चल देती है। अपने लिए कुछ मांगती या कहती भी नहीं है।

तो एक वह शिवानी की हीरावती है और अब कभी नरसिंहा राव और अब हरीश रावत, अहमद पटेल आदि द्वारा भड़काई गई उज्वला शर्मा हैं। उज्वला प्यार करना बताती हैं और हीरावती तो खैर कुछ जताना या पाना ही नहीं चाहती। न प्यार न अधिकार।

और यह उज्वला जी?

बताइए कि तिवारी जी अपनी पत्नी के श्राद्ध में हैं और उज्वला जी उन के बगल में बैठ कर बतौर पत्नी सारी पूजा करवाने के हठ में पड़ जाती हैं, हंगामा मचा देती हैं। अब कहा जा सकता है कि कहानी और हकीकत में दूरी होती है। हम भी मानते हैं। पर यह भी जानते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है। और फिर शिवानी की इस कहानी का ज़िक्र यहां इस लिए भी किया कि जब यह कहानी छपी थी तो कहानी के नायक श्रीधर में उत्तराखंड के कुछ राजनीतिज्ञों की छवि इस कहानी के दर्पण में भी देखी गई थी। उस में नारायणदत्त तिवारी का भी एक नाम था।

ब्लड टेस्ट के मार्फ़त डी.एन.ए. रिपोर्ट का नतीज़ा अभी आना बाकी है। जाने क्या रिपोर्ट आएगी। लेकिन जो सामाजिक दर्पण की रिपोर्ट है, उस में तिवारी जी को रोहित शेखर का पिता मान लिया गया है। बहुत पहले से। इस बारे में मुकदमा दायर होने के पहले से। बावजूद इस सब के तिवारी जी की जो फ़ज़ीहत उज्वला शर्मा और उन के बेटे ने की है, और अपनी फ़ज़ीहत की चिंता किए बिना की है, वह एक शकुनि चाल के सिवा कुछ नहीं है। यह एक तरह का लाक्षागृह ही है तिवारी जी के लिए। और मुझे जाने क्यों सब कुछ के बावजूद बार-बार लगता है कि नारायणदत्त तिवारी इस लाक्षागृह से सही सलामत निकल आएंगे। निकल आएंगे ही। इसे आप उन के प्रति मेरा आदर भाव मान लें या कुछ और। यह आप पर मुन:सर है।

इस लिए भी कि तिवारी जी ने जाने-अनजाने असंख्य लोगों का उपकार किया है। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि मेरा भी कई बार उन्हों ने उपकार किया है। बिना किसी आग्रह या निवेदन के। मुझे याद है कि वर्ष १९९८ में मुलायम सिंह यादव के चुनाव कवरेज में संभल जाते समय एक एक्सीडेंट में मैं गंभीर रुप से घायल हो गया था। हमारे साथी जयप्रकाश शाही इसी दुर्घटना में हम सब से बिछड़ गए थे। तिवारी जी तब नैनीताल से चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव के बाद वह मुझ से मिलने लखनऊ के मेडिकल कालेज में आए थे, जहां मैं इलाज के लिए भर्ती था। वह बड़ी देर तक मेरा हाथ अपने हाथ में लिए बैठे रहे थे। मेरी तकलीफ देख कर वह बीच-बीच में रोते रहे थे। जब वह चले गए तो वहां उपस्थित कुछ लोगों ने तंज़ किया कि वह मेरे लिए नहीं, अपनी हार के लिए रो रहे थे। मुझे चुनाव परिणाम की भी जानकारी नहीं थी। तो भी मैं ने उन लोगों से सिर्फ़ इतना भर कहा कि आप लोग चुप रहिए। आप लोग तिवारी जी को अभी नहीं जानते। बताइए भला कि अमूमन लोग जब चुनाव हार जाते हैं तब कुछ दिनों ही के लिए सही सार्वजनिक जीवन से छुट्टी ले लेते हैं। लेकिन तिवारी जी नैनीताल से चल कर मुझे देखने आए थे। बहुत सारे राजनीतिज्ञ तब मुझे देखने आए थे, अटल विहारी वाजपेयी, कल्याण सिंह से लगायत मुलायम सिंह यादव और जगदंबिका पाल तक अनेक राजनीतिज्ञ, अफ़सर, पत्रकार, मित्र, परिवारीजन आदि। पर तिवारी जी की वह आत्मीयता और भाऊकता मेरी धरोहर है। ऐसी अनेक घटनाएं हैं तिवारी जी को ले कर। फ़रवरी, १९८५ में मैं लखनऊ आया था स्वतंत्र भारत में रिपोर्टर हो कर। दो महीने बाद ही अप्रैल, १९८५ में मुझे पीलिया हो गया। मेरे पास छुट्टियां भी नहीं थीं। एक महीने की छुट्टी लेनी ही थी। ली भी। कहीं गया नहीं। तिवारी जी तब मुख्यमंत्री थे। उन्हें मेरी बीमारी का शायद जयप्रकाश शाही से पता चला। उन्हों ने बिना कुछ कहे-सुने मुझे विवेकाधीन कोष से ढाई हज़ार रुपए का चेक भिजवाया। तब मेरा वेतन ११०० रुपए था। एक महीने लीव विदाऊट पे हो गया था। कहीं से पैसे का कोई जुगाड़ नहीं था। तिवारी जी ने यह दिक्कत बिना कहे समझी। और चेक भिजवा दिया। जब यह चेक ले कर एक प्रशासनिक अधिकारी मुझ से मिले तो मैं ने उन से पूछा कि यह कैसा चेक है? तो उन्हों ने बताया कि माननीय मुख्यमंत्री जी के आदेश पर विवेकाधीन कोष का चेक है आप के इलाज के लिए। तब तक मैं विवेकाधीन कोष के बारे में नहीं जानता था। बाद में तो यह विवेकाधीन कोष बहुत बदनाम हुआ पत्रकारों के बीच। मुलायम राज में लोगों ने दस-दस लाख रुपए फ़र्जी स्कूलों के नाम पर बार-बार लिए। खैर बाद में मिलने पर मैं ने तिवारी जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की तो वह लजा गए। बोले कुछ नहीं। बस मुसकुरा कर रह गए।

ऐसे जैसे कुछ उन्हों ने किया ही न हो। यह उन की सहृदयता थी, सहिष्णुता थी। ऐसे अनेक अवसर, अनेक घटनाएं हैं, जो उन की सदाशयता और सहिष्णुता की कहानी से रंगे पड़े हैं। मेरे ही नहीं अनेक के। बहुतेरे पत्रकार लापरवाही में मकान का किराया नहीं जमा कर पाते तो लंबा बकाया हो जाता या फिर बिजली के बिल का लंबा बकाया हो जाता तो तिवारी जी बडी शालीनता से यह व्यवस्था करवा देते। तब पत्रकारों का वेतन बहुत कम होता था और कि आज के दिनों जैसी दलाली भी अधिकतर पत्रकार नहीं करते थे। उन दिनों वह मुख्यमंत्री थे। सड़क पर कभी-कभार हम या हमारे जैसे लोग पैदल या स्कूटर पर भी दिख जाते तो वह काफिला रोक कर मिलते। और हाल-चाल पूछ कर ही गुज़रते। और ऐसा वह बार-बार करते। बाद के दिनों में जब वह उद्योग मंत्री हुए तो बजाज स्कूटर की तब बुकिंग चलती थी। लखनऊ के जिस भी पत्रकार ने उन को चिट्ठी लिखी उस को स्कूटर का आवंटन पत्र आ गया। कई लोगों ने इस का दुरुपयोग भी किया। बार-बार आवंटन मंगाया और स्कूटर ब्लैक किया। धंधा सा बना लिया। लेकिन तिवारी जी की सदाशयता नहीं चूकी।

एक समय वह प्रतिपक्ष में थे। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री। भाजपा के समर्थन से। आडवाणी जी की रथयात्रा और फिर गिरफ़्तारी के बाद भाजपा ने केंद्र की वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया साथ ही उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार से भी। राजीव गांधी से समर्थन के लिए मुलायम मिले। राजीव ने उन का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए उन से कहा कि लखनऊ में वह तिवारी जी से भी औपचारिक रुप से ज़रुर मिल लें। तिवारी जी समर्थन के मूड में नहीं थे, यह बात मुलायम जानते थे। सो वह राजीव से सीधे मिले। लेकिन राजीव के कहने पर मुलायम को लखनऊ में तिवारी जी के घर औपचारिक रुप से जाना पड़ा। लेकिन वह खड़े-खड़े गए और खड़े-खड़े ही लौट आए। घर में बैठे भी नहीं। तिवारी जी बहुत अनुनय-विनय करते रहे। अंतत: तिवारी जी ने मुलायम की पहलवानी छवि के मद्देनज़र कहा दूध तो पी लीजिए। संयोग से उस दिन नागपंचमी भी थी। मुलायम समझ गए तिवारी जी के इस तंज़ को। बोले, 'अब दूध विधानसभा में ही पिलाना।' और चले गए।

सचमुच मुलायम को विधानसभा में तब का दूध पिलाना कांग्रेस आज तक भुगत रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस तब जो साफ हुई फिर खड़ी हो नहीं पाई। तिवारी जी असल में दूरदर्शी राजनीतिज्ञ हैं। योजनाकार भी विरल हैं। तमाम-तमाम योजनाएं और परियोजनाएं उन्हों ने न सिर्फ़ बनाई हैं, उन्हें साकार भी किया है। मुझे याद है उत्तर प्रदेश में वर्ड बैंक की मदद से रोड कांग्रेस उन्हों ने ही शुरु किया था। नोएडा जैसी तमाम योजनाएं उन्हीं की बनाई योजनाएं है। ऐसी तमाम योजनाओं को उन्हों ने फलीभूत किया है। उत्तर प्रदेश में भी और उत्तराखंड में भी। पर लोग अब उन के इन सारे गुणों को, इन पक्षों को भूल गए हैं। उन की छवि एक औरतबाज़ राजनीतिज्ञ की बना दी गई है। इस से तकलीफ़ होती है। अरे, आप ही लोग बताएं कि ऐसा कौन सा पुरुष है जिसे औरतों से गुरेज हो भला? और ऐसा कौन सा राजनीतिज्ञ है जिस की सूची में दस-पांच औरतों का नाम न जुडा हो? कल्याण सिंह तो कुसुम राय के चक्कर में बरबाद हो गए। तो क्या कल्याण सिंह के पास सिर्फ़ कुसुम राय भर ही हैं या थीं? और कि कुसुम राय के नाम पर कल्याण सिंह और भाजपा दोनों को ही किनारे लगवाने वाले राजनाथ सिंह के नाम के साथ क्या औरतों की सूची नत्थी नहीं है? बात तो बस फिसल गए तो हर गंगे की ही है।

अब बात उठती है नैतिक-अनैतिक की। लोहिया कहते थे कि अगर ज़ोर-ज़बरदस्ती न हो, शोषण न हो, आपसी सहमति हो तो कोई संबंध अनैतिक नहीं होता। और लोहिया सही कहते थे। तिवारी जी ने उज्वला शर्मा के साथ न कोई ज़बरदस्ती की, न शोषण किया। सारी बात आपसी सहमति की थी। उज्वला जी नादान नहीं थीं। गरीब मजलूम नहीं थीं। एक मंत्री की बेटी थीं, विवाहित थीं। उन को कोई हक नहीं कि इस तरह की बात करें। हां जो शेखर के पैदा होते ही जो उन्हों ने यह आवाज़ उठाई होतीं तो उन की बात में दम होता। अच्छा कितने लोग यह बात जानते हैं कि तलाक के बाद अब भी वह अपने पति बी.पी. शर्मा के साथ ही नई दिल्ली की डिफ़ेंस कालोनी में रहती हैं। फ़र्क बस इतना है कि दोनों के फ़्लैट दिखावे के लिए ऊपर-नीचे के हैं। और फिर इस पूरी कवायद में बी.पी. शर्मा का पक्ष नदारद है।

तो क्या उज्वला शर्मा या रोहित शर्मा ने यह सारी जंग नारायणदत्त तिवारी की संपत्ति प्राप्त करने के लिए की है? यह एक अनुत्तरित सवाल है।

इस लिए भी कि नारायणदत्त तिवारी कोई ज़मीदार नहीं रहे हैं। खांटी समाजवादी स्वभाव के हैं और रहे हैं। एक औरतों वाले दाग को छोड दीजिए तो तिवारी जी पर कोई ऐसा-वैसा दाग नहीं है। तब जब कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के वह एक नहीं चार बार मुख्यमंत्री रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं। आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे हैं। केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री, वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री आदि कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। नैनीताल की जनता ने १९९१ में जो उन्हें विजयी बनाया होता तो तय मानिए वह देश के प्रधान मंत्री भी हुए ही हुए होते। और शायद देश की दशा और दिशा कुछ और ही होती। खैर अभी तक भूल कर भी उन पर भ्रष्टाचार या कदाचार के आरोप नहीं लगे हैं। न ही सचमुच उन्हों ने दाएं बाएं से पैसा कमाया है। अभी भी वह सरकारी मकान में रहते हैं। जो बतौर पूर्व मुख्य मंत्री उन्हें औपचारिक रुप से मिला हुआ है। उन के छोटे भाई अभी भी लखनऊ में स्कूटर पर चलते दिख जाते हैं। तो तिवारी जी के पास अकूत संपत्ति तो छोड़िए मामूली संपत्ति भी नहीं है। नारायणदत्त तिवारी कोई मुलायम सिंह यादव या मायावती परंपरा के मुख्यमंत्री भी नहीं रहे। न ही ए. राजा आदि की परंपरा के केंद्रीय मंत्री। तो उन के पास पैतृक संपत्ति के सिवाय कोई अतिरिक्त संपत्ति मेरी जानकारी में तो नहीं है। किसी के पास हो इस की जानकारी तो ज़रुर बताए। तिवारी जो तो अब की चुनाव में अपने भतीजे मनीष तिवारी तक को जितवा नहीं पाए। अभी सोचिए कि यही उज्वला शर्मा का पाला अगर प्रमोद महाजन, मुलायम या अमरमणि त्रिपाठी टाइप किसी राजनीतिज्ञ से पडा होता तब परिदृष्य क्या होता भला?

तो तिवारी जी की भलमनसाहत और उन की सहिष्णुता का, उन के सहृदय होने का इतना लाभ तो मत लीजिए उज्वला जी और रोहित शेखर जी। उन के शिष्ट और सभ्य होने का इम्तहान-दर-इम्तहान लेना ठीक नहीं है। कि लोग उन का मजाक उड़ाने लग जाएं। जानिए कि नारायणदत्त तिवारी जैसे राजनीतिज्ञ बड़े सौभाग्य से किसी समाज और देश को मिलते हैं। वह हमारी साझी धरोहर हैं। उन्हें सम्मान और उन की गरिमा देना अब से ही सही सीखिए उज्वला जी और रोहित जी ! यह आप के हित में भी है और समाज के भी हित में। हो सके तो यह मामला मिल बैठ कर सुलटा लीजिए। तिवारी जी की टोपी उछाल कर नहीं। फ़िल्म की ही जो चर्चा एक बार फिर करें तो एक फ़िल्म है 'एकलव्य'। राजस्थानी पृष्ठभूमि पर आधारित इस फ़िल्म में एक रजवाड़े की कहानी में अमिताभ बच्चन एक राज परिवार में नौकर हैं। पर राजकुमार के पिता भी हो जाते हैं। फ़िल्म की कहानी तमाम उठा-पटक और ह्त्या दर हत्या में घूमती है। पर आखिर में राजकुमार बने सैफ़ अली खान उन्हें पूरे सम्मान से सार्वजनिक रुप से पिता कुबूल करते हैं, आप की तरह अपमान दर अपमान की कई इबारतें लिख कर नहीं। किसी को पिता कुबूल करना ही है तो उसे पिता जैसा सम्मान दे कर कुबूल कीजिए। पर आप लोग तो अपमानित करने पर तुले हैं। खैर।

सोचिए उज्वला जी कि अगर तिवारी जी भी आप की तरह आप की ईटें उखाडने लग जाएंगे तो आप क्या कर लेंगी? अभी तो वह शालीनतावश अपने खून का सैंपल देने से बचते रहे हैं, जो अब दे भी दिया है। लेकिन कहीं वह भी ईंट का जवाब पत्थर से देने पर आ जाते या आ ही जाएं तो आप का क्या होगा? अदालती धूर्तई तो यह कहती है कि तिवारी जी भी सवाल खड़े कर दें कि क्या आप शेर सिंह की बेटी हैं भी कि नहीं? आप के पति बी.पी. शर्मा भी अपने पिता के हैं कि नहीं। आदि-आदि। और जब ईंट खुदने ही लगेगी हर किसी की तो कहीं न कही बहुत नहीं तो कुछ लोग तो ज़रुर ही व्यास नंदन की राह पर आ जाएंगे। फिर क्या होगा इस समाज और इस समाज की शालीनता का? तब तो और जब आप का शोषण न हुआ हो, आप के साथ ज़ोर-ज़बर्दस्ती-बलात्कार न हुआ हो।

मेरा मानना है कि इस पूरे मामले को इस दर्पण में भी देखा जाना चाहिए। एकतरफ़ा तिवारी जी को दोषी बता देना ठीक नहीं है। वह चाहे समाज दोषी ठहराए या कोई अदालत। यह व्यक्तिगत मामला है, इसे व्यक्तिगत ही रहने देना चाहिए। इस लिए भी कि नारायणदत्त तिवारी कोई बलात्कारी नहीं हैं। एक सभ्य और शिष्ट व्यक्ति हैं। उन को उन का सम्मान दिया जाना चाहिए। जिस के कि वह हकदार हैं। ध्यान रखिए कि तिवारी जी हमारी साझी धरोहर हैं। राष्ट्रपति चुनाव के शोर में तिवारी जी का यह पक्ष भी बहुत ज़रुरी है। इस लिए भी कि, 'पूछा कली से कुछ कुंवारपन की सुनाओ, हज़ार संभली खुशबू बिखर जाती है।' आमीन !

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Saturday, 16 June 2012

मुलायम का चरखा, ममता की हेकड़ी और समय की दीवार पर प्रणब मुखर्जी का नाम

एक समय में महात्मा गांधी राजनीति भी चरखा कात कर करते थे। पर अब मुलायम सिंह यादव जैसों ने राजनीति में गांधी के चरखे की भूमिका बदल दी है। गांधी चरखा पर सूत कातते थे यह कह कर कि चरखा धैर्य और संयम सिखाता है। जैसे सूत नहीं टूटने पर सारा ध्यान केंद्रित रहता है चरखा कातने पर, वैसे ही इस से संयम नहीं टूटने का अभ्यास होता है जीवन में। राजनीति में। पर गांधी के धैर्य और संयम, समन्वय को धता बता कर कुश्ती वाला चरखा दांव मारते हैं मुलायम अपनी सफलता के लिए। राजनीति में सत्ता का शहद चाटने के लिए। तो राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनज़र ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव का मेल और कांग्रेस को दी गई चुनौती अड़तालिस घंटे भी बरकरार नहीं रह पाई। कूटनीतिक कमीनेपन का इस से उम्दा उदाहरण कोई और हो नहीं सकता। ममता ने बिसात बिछाई ज़रुर पर उस पर खेल गए मुलायम। और मार दिया चरखा दांव। ममता की हैसियत उस जैसी हो गई कि जिस डाल पर बैठी हों वह डाल ही नहीं पेड़ ही काट डाली। ममता बनर्जी की गुंडई पहली बार पानी पा गई। वैसे भी इन दिनों ममता की प्राथमिकताएं भी अब बदलने लगी हैं। जिस तरह आई.पी.एल. में शाहरुख की टीम के विजयी होने पर उन्हों ने सरकारी खजाना लुटा कर उन का भाव-विभोर हो कर स्वागत किया वह बहुतों को नहीं भाया। कंगाल हो चले बंगाल के सरकारी खजाने का अपव्यय सब को ही खला। स्वागत तक तो ठीक था, पर पूरी टीम को सोने का हार देना? यही ठीक नहीं था। मां, माटी, मानुष के नारे और इस के भाव से उलट उन की तानाशाही और बदमिजाजी उन पर और उन की राजनीति पर अब बहुत भारी पड़ रही है।

तो क्या उन के इस व्यवहार और मनोविज्ञान की पड़ताल उन के अविवाहित जीवन में ढूंढा जाना चाहिए? जाने ऐसा क्या है कि भारतीय राजनीति में अभी सक्रिय कोई चार महिलाएं जो राजनीति के पहले पायदान पर दीखती तो हैं पर अपनी तानाशाही और बदमिजाजी के चलते उन्हें वह स्वीकार्यता और सम्मान नहीं मिल पाता समाज और राजनीति दोनों में, जिस की कि वह हकदार भी हैं। जयललिता, मायावती, ममता और उमा भारती।

चारो ही महिलाएं तानाशाह, बदमिजाज, अराजक और मनबढ हैं। बेलगाम या बेअंदाज़ भी कह सकते हैं। एहसानफ़रामोशी भी इन में कूट-कूट कर भरी पड़ी है। अपनी इस प्रवृत्ति को यह चारो जब-तब प्रदर्शन करती ही रहती हैं। जयललिता और मायावती ने तो भ्रष्टाचार के भी झंडे बढ़-चढ़ कर गाड़े हैं। लेकिन अविवाहित तो गिरिजा व्यास भी हैं पर उन में यह कर्कशापन इस स्तर पर सार्वजनिक तौर पर तो नहीं ही दिखता। तो क्या अविवाहित होना और मुख्यमंत्री की कुर्सी पा जाने का केमिकल लोचा है यह? जो भी हो अति कभी भी कोई भी समाज या राजनीति बहुत दिनों तक नहीं बर्दाश्त कर पाती। और ममता, मायावती, जयललिता और उमा भारती यह चारो महिलाएं अति की भी पराकाष्ठा अकसर पार करती दीखती हैं। सत्ता तो हर किसी को तानाशाह बनाती है, मनबढ़ भी और बदमिजाज भी। इस को स्त्री या पुरुष खाने में बांट कर देखने की बहुत ज़रुरत होती भी नहीं। बावजूद इस के सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में शिष्टाचार और मर्यादा की एक रेखा जो होती है, परंपरा और विश्वास का जो एक तंतु होता है, यह चारो महिलाएं निरंतर उसे तोड़ती क्या तबाह करती दीखती हैं। नहीं सोचिए होने को तो मदर टेरेसा भी अविवाहित ही थीं। लेकिन वह तो तानाशाह नहीं थीं। अराजक या मनबढ नहीं थीं। ममता की मूर्ति थीं। उन के पास जो सत्ता थी, वह अनिर्वचनीय थी। और फिर ममता से बड़ी कोई सत्ता होती नहीं। यह मैं मानता हूं। तो क्या इन महिलाओं से ममत्व की भावना और ममता का मनोविज्ञान क्या उन की राजनीति सोख लेती है भला? उन को तानाशाह बना देती है? या कि पुरुषों की बेड़ी से आज़ाद होते ही यह असुरक्षा की बेड़ी में इस कदर लिपट जाती हैं कि उन में अराजकता, तानाशाही, मनबढई आदि घर कर जाती है? और कि जब यह प्रवृत्ति और और मज़बूत हो जाती है तब उन में आर्थिक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरा जाती हैं। ममता और उमा भारती पर तो भ्रष्टाचार के दाग अभी तक नहीं लगे हैं। पर मायावती और जयललिता में तय करना कठिन है कि कौन ज़्यादा भ्रष्ट है। कामकाजी महिलाओं में भी जो अविवाहित हैं, परित्यक्ता हैं या विधवा हैं, और कि बास की कुर्सी पर हैं तो उन में भी यह तुनकमिजाजी, बदमिजाजी, असुरक्षा, अविश्वास और तानाशाही यदा-कदा दिख ही जाती है। खैर, इन के ज़रुर कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी होते ही होंगे।

बहरहाल, बात हम यहां ममता बनर्जी की कर रहे थे। जब वह एन डी ए में थीं तब भी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति को भी जब-तब धौंसियाती रहती थीं। वाजपेयी जी ममता के इगो मसाज में कोलकाता जा कर उन की माता जी के पांव भी छू आए। पर ममता तो ममता ठहरीं। ममत्व के विरुद्ध ठहरीं। अपनी आदत से लाचार ठहरीं। और फिर वाजपेयी जी को तो इन चारो कुमारियों ने समय-समय पर धोखा दिया। जब कि वह भी कुंवारे ही थे। जयललिता और मायावती ने तो बारी-बारी समर्थन की सहमति दे कर भी ऐन वक्त पर धोखा दे कर उन की सरकार ही गिराने की गुनाहगार बनीं। खैर जब यू पी ए की सरकार बनी तो ममता उस की घटक दल बन कर सरकार में शामिल हो कर फिर रेल मंत्री बनीं और रेल को अपनी ही तरह से चलाती रहीं। दिल्ली के बजाय कोलकाता में रह कर। खैर कांग्रेस के साथ मिल कर लाल किला ढाह कर अब मुख्यमंत्री हैं। लेकिन सब को साथ ले कर नहीं, एकला चलो गाती हुई, मनमोहन सरकार को बात-बेबात झुकाती हुई। हद तो तब हो गई जब ठीक रेल बजट के बाद जिस तरह उन्हों ने रेल बजट के खिलाफ़ न सिर्फ़ हुंकार भरी, बल्कि अपने ही धड़े के मंत्री दिनेश त्रिवेदी के खिलाफ़ बिगुल बजा दिया। और उन की बलि ले कर ही छोड़ी। सारा शिष्टाचार और संसदीय परंपरा जैसे वह गंगा-सागर में बहा बैठीं। किराए में रोल बैक वह दिनेश त्रिवेदी से भी करवा सकती थीं। पर नहीं। वह तो दिनेश त्रिवेदी पर पहले फ़िदा थीं पर बाद में जाने क्या हुआ कि उन को डस बैठीं। खैर फिर एफ़.डी.आई. आदि जैसे मुद्दों पर वह सरकार को झुकाती रहीं, पेट्रोल पर बमबमाती रहीं। बिलकुल प्रतिपक्ष की तरह। लेकिन सचमुच जब पेट्रोल के दाम बढ़े तो बस लफ़्फ़ाज़ी तक रह गईं। सिंगूर, नंदीग्राम में बहे खून पर चढ कर मुख्य मंत्री की कुर्सी पर बैठने वाली ममता अभी तक वहां के किसानों को ज़मीन वापस नहीं कर पाईं हैं। तो भी इधर ममता ने तानाशाही और मनबढई के सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं। अपने प्रदेश में भी और देश में भी। बताइए कि अपने खिलाफ़ कार्टून बनाने वाले तक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खून करते हुए वह जेल में ठूंस देती हैं। अखबारों को जो उन की हां में हां नहीं मिलाते उन की ऐसी-तैसी कर देती हैं। विज्ञापन से वंचित कर देती हैं। महाश्वेता देवी जिन के वह पांव छू कर आशीर्वाद लेती रही हैं तक को नाराज कर लेती हैं। उन पर तानाशाही और मनबढई का बुखार ऐसा चढ जाता है कि अपने आगे सब को वह मूर्ख और कमजोर समझ बैठती हैं। संसदीय गरिमा, शिष्टाचार. मर्यादा आदि को वह बंगाल की खाड़ी में बहा कर राष्ट्रपति चुनाव में भी अपनी गुंडई जारी रखती हैं। समूचा देश और पार्टियां प्रणब मुखर्जी के वृंदगान में लगा होता है और वह कलाम, मनमोहन और सोमनाथ की बांसुरी बजा कर मुलायम को नचाने लगती हैं। वह भूल जाती हैं कि मुलायम सिंह यादव का पुराना रिकार्ड। और बताइए राजनीति भी करना चाहती है? वह भी केंद्र की?

मुलायम सिंह यादव भारतीय राजनीति में बिजली का वह नंगा तार हैं जिन को आप दुश्मनी छुएं तब तो मरना ही है, लेकिन अगर दोस्ती में छुएं तब भी मरना है। यह बात कांग्रेस जानती थी, भाजपा और मायावती जानती थीं, ममता क्यों नहीं जान पाईं? अपनी हेकड़ी में मुलायम का स्वभाव, उन का चरित्र भी भूल गईं? ए भाई ऐसे ही राजनीति करेंगी आप?

वैसे हमेशा ही से रहा है कि ममता जब-जब मनमोहन सरकार को आंख तरेरती रही हैं, मीडिया से लगायत राजनीतिक हलकों तक में भी मनमोहन सरकार के तारनहार और ममता के विकल्प के रुप में मुलायम ही को देखा जाता रहा है। ममता यह भी भूल गईं? परमाणु करार के चलते जब वामपंथियों ने मनमोहन सरकार को बीच मझधार में छोड़ा तब भी वामपंथियों से बेशर्मी दिखा कर मनमोहन सरकार को मुलायम ही ने सहारा दिया था। और अभी बिलकुल अभी यू पी ए सरकार के तीन साल की उपलब्धि रिपोर्ट जारी करने के मौके पर गदगद भाव में मुलायम को कांग्रेस के मंच पर खडे पूरे देश ने देखा था तो क्या ममता की आंख पर मोतियाबिंद छाया था कि इस के निहितार्थ वह नहीं पढ सकीं? अच्छा मायावती, मुलायम और लालू के खिलाफ़ आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक सी बी आई का सोटा भी है कांग्रेस के पास यह भी भूल गईं ममता? कि कांग्रेस जब चाहे तब जगन रेड्डी की तर्ज़ पर मायावती, मुलायम और लालू को जब चाहे तब गिरफ़्तार करवा सकती है या मदारी की तरह एक इशारे पर मुलायम, मायावती और लालू को नचा सकती है? यह भी भूल गईं?

और फिर मुलायम अखाड़े के पहलवान हैं। और कि राजनीति में भी कुश्ती का एक दांव होता है चरखा दांव, इस चरखा दांव को जब-तब आज़माते ही नहीं रहते, सब को चित्त भी करते रहते हैं। यह भी ममता जी भूल गईं?

मुलायम सिंह यादव का समूचा राजनीतिक जीवन चरखा दांव से भरा पड़ा है। वह लोहिया की माला जपते ज़रुर हैं पर सारे काम लोहिया के सिद्धांतों के विपरीत करते हैं। संचय के खिलाफ़ थे लोहिया। पर मुलायम? बिना संचय के एक सांस नहीं ले सकते। यह संचय का ही प्रताप है कि वह आय से अधिक संपत्ति के मामले में सी.बी.आई. के फंदे में फंसे पड़े हैं। और कि अदालती धूर्तई के बूते मामले को बरसों से लटकाए पड़े हैं।

गैर कांग्रेसवाद के जनक थे लोहिया। पर मुलायम हरदम न सिर्फ़ कांग्रेस से सटे रहते हैं बल्कि कांग्रेस से खुद भी समर्थन ले कर सरकार चलाते रहे हैं, कांग्रेस की सरकार चलाने के लिए अपमानित होने की हद तक समर्थन भी देते रहते हैं, दे भी रहे हैं। लोहिया दाम बांधो के हामीदार थे। आंदोलन करते रहते थे। पर मुलायम? अंबानी आदि तमाम उद्योगपतियों के लगभग एजेंट की तरह काम करते हैं। उन की ज़ेब में रहते हैं। वह उद्योगपति जो दाम बढाने और मुनाफ़ाखोरी की तरकीब में दिन रात एक किए रहते हैं। तो मुलायम ने जब लोहिया तक को अपने चरखा दांव में चित्त कर रखा है, उन मुलायम से सटने और उन के संग-साथ से आप कांग्रेस को निपटाने चली थीं? इतनी नादान कैसे हो गईं आप भला?

मुलायम एक समय चरण सिंह के चरणों में बैठते थे। कम से कम मैं ने ऐसे ही बैठे देखा है मुलायम को चरण सिंह के साथ। चरण सिंह कुर्सी पर और मुलायम उन के चरणों में फ़र्श पर। लेकिन उन्हीं चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को उत्तर प्रदेश में बरबाद करने में उन्हों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। अब वह जाटलैंड में ही आधे-अधूरे सिमट कर रह गए हैं। और बेहद मौकापरस्त बन कर ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। उन को भी येन-केन-प्रकारेण सत्ता का शहद और मुद्रा ही चाहिए। सोचिए कि अजीत सिंह उन चौधरी चरण सिंह के बेटे हैं और मुलायम सिंह उन के शिष्य हैं जिन चौधरी चरण सिंह के पास मुख्य मंत्री आदि रहने के बाद भी कई बार लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए ट्रेन के किराए का पैसा नहीं रहता था। दोस्त-अहबाब मिल कर किसी तरह व्यवस्था करते थे। तो चरण सिंह को भी चरखा।

मुलायम सांप्रदायिकता के विरोध की बात बहुत करते हैं। इसी बिना पर वह भाजपा का विरोध करते हुए कांग्रेस का समर्थन करने का तर्क भी देते हैं। पर उन से कोई यह पूछने वाला नहीं है कि उत्तर प्रदेश में जब १९७७ में पहली बार सहकारिता मंत्री बने थे राम नरेश यादव के मुख्यमंत्रित्व वाली सरकार में तब क्या यही जिस को आप बार-बार सांप्रदायिक कह कर मुस्लिम मतदाताओं को अपना बंधुआ मतदाता बना लेते हैं, वह सरकार क्या बिना जनसंघ धड़े के सहयोग से बनी थी? और कि क्या उस सरकार में भी जनसंघ धड़े के लोग शामिल नहीं थे? यही कल्याण सिंह तब क्या आप के साथ स्वास्थ्य मंत्री नहीं थे? अच्छा चलिए वह सब आपातकाल के प्रतिकार में था। और कि आप की राजनीतिक चेतना तब इतनी प्रखर नहीं थी। पर जब श्रीमान मुलायम सिंह यादव जब आप १९८९ में पहली बार मुख्य मंत्री बने तो क्या इसी सांप्रदायिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से ही नहीं बने? तो क्या भाजपा ने आप को बिना मांगे समर्थन दे दिया था? मतलब मुस्लिम मतदाताओं को भी चरखा। गरज यह कि सत्ता का शहद चाट्ने के लिए मुलायम सिंह यादव कभी भी किसी भी को चरखा दांव से चित्त कर सकते हैं। और फिर अपने को पाक साफ बता कर अगली तैयारी में लग सकते हैं। फिर भाजपा ने जब आडवाणी की रथयात्रा और उन की गिरफ़्तारी के मद्देनज़र मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। तो बाद में कांग्रेस के समर्थन से न सिर्फ़ सरकार बचाई बल्कि कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर विधायको को सपा में मिला लिया। और तब से उत्तर प्रदेश में जो कांग्रेस साफ हुई तो फिर खड़ी नहीं हो पाई। राजीव गांधी ने मजबूरन तभी परेशान हो कर दल-बदल विधेयक बनवाया।

खैर, याद कीजिए कि जब मुलायम सिंह यादव दुबारा मुख्य मंत्री बने तो फिर भाजपा या कांग्रेस की जगह उन्हों ने बहुजन समाज पार्टी का समर्थन लिया। बसपा सरकार में भी शामिल हुई। पर कांशीराम और मायावती ने अंतत: जब उन को कान पकड़ने और माफ़ी मांगने तक की नौबत ला दी। इतना ही नहीं जब कांशीराम और मायावती के सामने उन की कान पकड़े खडे एक फ़ोटो एक अखबार मे छप गई तो मुलायम अपना आपा खो बैठे। फिर २ जून, १९९५ का गेस्ट हाऊस कांड हो गया। जिस तरह मायावती को मारने की कोशिश सपाइयों ने की वह संसदीय इतिहास के लिए एक शर्मनाक घटना है। जो भी हो बसपा को भी चरखा दांव में चपेट लिया मुलायम ने। सत्य प्रकाश मालवीय हों या कल्याण सिंह, अमर सिंह हों मधुकर दीघे हों या मोहन सिंह या और भी तमाम लोग या घटनाएं उन का विस्तार बहुत है। पूरी किताब भर का मामला है। पर अभी और बिलकुल अभी ममता बनर्जी मुलायम के चरखा दांव की ताज़ा शिकार हुई हैं।

ममता ने तो यह सोच कर शतरंज की चाल बिछाई थी मुलायम के साथ की कि हर बार कांग्रेस उन का विकल्प मुलायम में ढूंढती है तो पहले अपने विकल्प को ही अपने साथ कर लो। पर वह मुलायम का राजनीतिक इतिहास और उन के चरखा दांव को बहुत उत्साह में ध्यान नहीं रख पाईं। वह अपनी तानाशाही और हेकड़ी में भूल गईं कि इतिहास भी एक विषय होता है। और बच्चों को पाठयक्रम में यों ही नहीं पढ़ाया जाता।

हालां कि कवियत्री, पेंटर और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अभी भी अपने एकला चलो रे गान पर कायम हैं और कह रही हैं कि खेल अभी बाकी है और कि कलाम ही उन के प्रत्याशी हैं। पर वह शायद कलाम से यह पूछना भूल ही गई हैं कि क्या वह ऐसे में प्रत्याशी बनना पसंद भी करेंगे? वह यह भी भूल गई हैं कि संसदीय राजनीति और वह भी लगभग विफल होती जा रही संसदीय राजनीति तानाशाही, हेकड़ी, बदमिजाजी, अराजकता और कि एकला चलो गान से कतई नहीं चलती। यह संसदीय राजनीति कविता लिखने या पेंटिंग बनाने का काम नहीं है। अब तो मुलायम सिंह यादव लगभग क्रेडिट लेते हुए पूरे गुरुर और मुसकुराहट के साथ कह रहे हैं कि कोई एक महीना पहले ही सोनिया गांधी से उन्हों ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव किया था। ठीक वैसे ही जैसे एक समय उन्हों ने ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम की सिफ़ारिश अटल बिहारी वाजपेयी से राष्ट्रपति बनाने के लिए की थी। अब उन्हों ने सोनिया से क्या कहा, क्या सुना इस का खंडन करने तो अभी सोनिया गांधी नहीं आने वालीं। पर मां, माटी, मानुष का पहाड़ा पढ़ने वाली ममता बनर्जी क्या आप सुन पा रही हैं जो मुलायम सिंह यादव फ़रमा रहे हैं! हो सके तो उन्हें सुनिए। और पढ़िए ममता जी समय की दीवार पर लिखी इबारत को कि अब प्रणव मुखर्जी ही देश के अगले राष्ट्रपति हैं। वामपंथी दल और एन डी ए भी अपने समर्थन का औपचारिक ऐलान बस करने ही वाले हैं। प्रणब बाबू ने भी बड़ी विनम्रता से आप को अपनी बहन कह कर आप से समर्थन मांग ही लिया है। मान जाइए आप भी बहन बन जाइए। संसदीय राजनीति का तकाज़ा यही है। एकला चलो गान कभी फिर किसी मौके पर गा लीजिएगा। मौके बहुत मिलेंगे अभी। अभी तो महाश्वेता देवी ने जो कहा है कि अगर प्रणब बाबू राष्ट्रपति हो जाएंगे तो उन को बहुत आनंद होगा। आप भी आनंद में आइए। और गाइए आमार बांगला, सोनार बांगला, आमी तोमाय भालो बासी ! भूल जाइए मुलायम का चरखा, प्रणब बाबू से मतभेद और छोड दीजिए एकला चलो की ज़िद !


प्रणव मुखर्जी के निष्पक्ष नहीं, बोनलेस राष्ट्रपति बनने के पूरे आसार

Thursday, 14 June 2012

2050 तक हिंदी दुनिया की सब से बड़ी भाषा बनने जा रही है

पंख फैला कर उड़ पड़ी है हिंदी

दुनिया अब हिंदी की तरफ़ बड़े रश्क से देख रही है। अमरीका, चीन जैसी महाशक्तियां भी अब हिंदी सीखने की ज़रूरत महसूस कर रही हैं और कि सीख रही हैं क्योंकि हिंदी के जाने बिना वह हिंदुस्तान के बाज़ार को जान नहीं सकते, हिंदी के बिना उनका व्यापार चल नहीं सकता। सो वह हिंदी सीखने, जानने के लिए लालायित हैं क्योंकि हिदी के बिना उनका कल्याण नहीं है। सच यह है कि हिंदी अब अपने पंख फ़ैला करउड़ने को तैयार है। और यकीन मानिए कि आगामी 2050 तक हिंदी दुनिया की सब से बड़ी भाषा बनने जा रही है। अब भविष्य का आकाश हिंदी का आकाश है। अब इसकी उड़ान को कोई रोक नहीं सकता। हिंदी अब विश्वविद्यालयी खूंटे को तोड़ कर आगे निकल आई है।कोई भाषा बाज़ार और रोजगार से आगे बढती है। हिंदी अब बाज़ार की भाषा तो बन ही चुकी है, रोजगार की भी इसमें अपार संभावनाएं हैं। अब बिना हिंदी के किसी का कामचलने वाला नहीं है। क्यों कि कोई भी भाषा विद्वान नहीं बनाते, जनता बनाती है। अपने दैनंदिन व्यवहार से। हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई इस का विधवा विलाप करने से कुछ नहीं होने वाला है। आप ही बताइए कि हिंदी के लिए देश को तोड़ना क्या ठीक होता? और कि क्या देश चलाने में तब क्या हिंदी सक्षम भी थी भला? जो आप हिंदी को राष्ट्रभाषा बना लेते? शासन चला पाते आधी-अधूरी हिंदी के साथ? हालत यह हैकि आज भी तकनीकी शब्दावली हिंदी में हमारे पास पूरी नहीं है। लगभग सभी मंत्रालयों में इस पर काम चल रहा है। भाषाविद लगे हुए हैं। काम गंभीरता से हो रहा है। इसी लिए मैं कह रहा हूं कि हिंदी 2050 में दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बनने जा रही है। कोई रोक नहीं सकता। बस ज़रूरी है कि हम आप हिंदी को अपने स्वाभिमान से जोड़ना सीखें। हमारे देश में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी लाई थी। बाद में मैकाले की शिक्षा पद्धति ने इस को हमारी गुलामी से जोड़ दिया। इसी लिए आज भी कहा जाता है कि अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी छोड़ गए। तय मानिए कि अंग्रेजी सीख कर आप गुलाम ही बन सकते हैं, मालिक नहीं। मालिक तो आप अपनी ही भाषा सीख कर बन सकते हैं। चाहे वह हिंदी हो या कोई भी भारतीय भाषा। आज लड़के अंग्रेजी पढ कर यू.एस., यू.के. जा रहे हैं तो नौकर बन कर ही, मालिक बन कर नहीं। अगर 10 साल पहले मुझ से कोई हिंदी के भविष्य के बारे में बात करता तो मैं यह ज़रूर कहता कि हिंदी डूब रही है, लेकिन आज की तारीख में यह कहना हिंदी के साथ ज़्यादती होगी, क्यों कि हिंदी अब न सिर्फ फूलती-फलती दिखती है, बल्कि परवान चढ़ती भी दिखती है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश तक अमेरीकियों से हिंदी पढ़ने को कह गए हैं। ओबामा भी कह रहे हैं। न सिर्फ़ इतना हिंदी अब ग्लोबलाइज़ भी हो गई है। जाहिर है आगे और होगी, क्यों कि हिंदी ने अब शास्त्रीय और पंडिताऊ हिंदी की कैद से छुटकारा पा लिया है। पाठ्यक्रमों वाली हिंदी के खूंटे से आज की हिंदी ने अपना पिंड छुड़ा लिया है। हिंदी आज के बाज़ार की सब से बड़ी भाषा बन गई है, हालां कि आम तौर पर अंग्रेजी की बेहिसाब बढ़ती लोकप्रियता कई बार संशय में डालती है और लोग कहते हैं कि हिंदी डूब रही है।

हिंदी के प्रकाशक भी जिस तरह लेखकों का शोषण कर सरकारी खरीद के बहाने हिंदी किताबों की लाइब्रेरियों में कैद कर पाठक-लेखक के बीच खाई बना रहे हैं, उस से भी हिंदी डूब रही है। प्रकाशक के पास बाइंडर तक को देने के लिए पैसा है, पर लेखक को देने के लिए उस के पास धेला नहीं है। बीते वर्षों में निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल को जिस तरह प्रकाशक के खिलाफ खड़ा होना पड़ा , रायल्टी के लिए यह स्थिति हिंदी को डुबोने वाली है। महाश्वेता देवी जैसी लेखिका को भी बांगला प्रकाशक से नहीं, हिंदी प्रकाशक से शिकायत है। यह स्थिति भी हिंदी को डुबोने वाली है। आज हिंदी का बड़ा से बड़ा लेखक भी हिंदी में लेखन कर रोटी, दाल या घर नहीं चला सकता। यह स्थिति भी हिंदी को डुबोने वाली है। एक आंकड़ा भी हिंदी का दिल हिला देने वाला है। वह यह कि हर छठवें मिनट में एक हिंदी भाषी अंग्रेजी बोलने लगता है। यह चौंकाने वाली बात एंथ्रोपॉलीजिकल सर्वे आफ़ इंडिया ने अपनी ताज़ी रिपोर्ट में बताई है। संतोष की बात है कि इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है हर पांच सेकेंड में हिंदी बोलने वाला एक बच्चा पैदा हो जाता है। गरज यह है कि हिंदी बची रहेगी। पर सवाल यह है कि उस की हैसियत क्या होगी? क्यों कि रिपोर्ट इस बात की तसल्ली तो देती है कि हिंदी भाषियों की आबादी हर पांच सेकेंड में बढ़ रही है, लेकिन साथ ही यह भी चुगली खाती है कि हिंदी भाषियों की आबादी बेतहाशा बढ़ रही है। जिस परिवार की जनसंख्या ज्यादा होती है, उसकी दुर्दशा कैसे और कितनी होती है यह भी हम सभी जानते हैं। हिंदी आज से 10-20 साल पहले जिस गति को प्राप्त हो रही थी, हिंदी सप्ताह व हिंदी पखवारे में समा रही थी, लग रहा था कि हिंदी को बचाने के लिए जल्दी ही कोई परियोजना भी शुरू करनी पड़ेगी। जैसा कि पॉली और संस्कृत भाषाओं के साथ हुआ है। लेकिन परियोजनाएं क्या भाषाएं बचा पाती हैं? सरकारी आश्रय से भाषाएं बच पाती हैं? अगर बच पातीं तो उर्दू कब की बच गई होती। सच यह है कि कोई भी भाषा बचती है तो सिर्फ़ इस लिए कि उस का बाज़ार क्या है? उस की ज़रूरत क्या है? उस की मांग कहां है? वह रोजगार दे सकती है क्या? या फिर रोजगार में सहायक भी हो सकती है क्या? अगर नहीं तो किसी भी भाषा को आप हम क्या कोई भी नहीं बचा सकता। संस्कृत, पाली, उर्दू जैसी भाषाएं अगर बेमौत मरीं हैं तो सिर्फ़ इस लिए कि वह रोजगार और बाजार की भाषाएं नहीं बन सकीं। चाहें उर्दू हो या संस्कृत हो या पाली, जब तक वह कुछ रोजगार दे सकती थीं, चलीं। लेकिन पाली का तो अब कोई नामलेवा ही नहीं है। बहुतेरे लोग तो यह भी नहीं जानते कि पाली कोई भाषा भी थी। इतिहास के पन्नों की बात हो गई है पाली। लेकिन संस्कृत? वह पंडितों की भाषा मान ली गई है और जनबहिष्कृत हो गई है। इस लिए भी कि वह बाज़ार में न पहले थीं और न अब कोई संभावना है। उर्दू एक समय देश की मुगलिया सल्तनत में सिर चढ़ कर बोलती थी। उस के बिना कोई नौकरी मिलनी मुश्किल थी। जैसे आज रोजगार और बाज़ार में अंग्रेजी की धमक है, तब वही धमक उर्दू की होती थी। बड़े-बड़े पंडित तक तब उर्दू पढ़ते-पढ़ाते थे। मुगलों के बाद अंग्रेज आए तो उर्दू धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई। फिर जैसे संस्कृत पंडितों की भाषा मान ली गई थी, वैसे ही उर्दू मुसलमानों की भाषा मान ली गई। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में राजनीतिक कारणों से वोट बैंक के फेर में उर्दू दूसरी राजभाषा का दर्जा भले ही पाई हुई हो, लेकिन रोजगार की भाषा अब वह नहीं है। और न ही बाज़ार की भाषा है। सो, उर्दू भी अब इतिहास में समाती जाती दिखती है। उर्दू को बचाने के लिए भी राजनेता और भाषाविद् योजना-परियोजना की बतकही करते रहते हैं। पुलिस, थानों तथा कुछ स्कूलों में भी मूंगफली की तरह उर्दू-उर्दू हुआ है। पर यह नाकाफी है और मौत से बदतर है।

हां, हिंदी ने इधर होश संभाला है और होशियारी दिखाई है। रोजगार की भाषा आज अंग्रेजी भले हो पर बाज़ार की भाषा तो आज हिंदी है। और लगता है आगे भी रहेगी क्या, दौड़ेगी भी । कारण यह है कि हिंदी न विश्वविद्यालयी हिंदी के खूंटे से अपना पिंड छुड़ा लिया है। शास्त्रीय हदों को तोड़ते हुए हिंदी ने अपने को बाज़ार में उतार लिया है और हम विज्ञापन देख रहे हैं कि दो साल तक टॉकटाइम फ्री। लाइफ़ टाइम प्रीपेड। दिल मांगे मोर हम कहने ही लगे हैं। इतना ही नहीं, अंग्रेजी अखबार अब हिंदी शब्दों को रोमन में लिख कर अपनी अंग्रेजी हेडिंग बनाने लगे हैं। अरविंद कुमार जैसे भाषाविद् कहने लगे हैं कि विद्वान भाषा नहीं बनाते। भाषा बाज़ार बनाती है। भाषा व्यापार और संपर्क से बनती है। हिंदी ने बहुत सारे अंग्रेजी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल आदि शब्दों को अपना बना लिया है। इस लिए हिंदी के बचे रहने के आसार तो दिखते हैं। आधुनिक हिंदी के विकास एवं विस्तार में जाएं तो हम पाते हैं कि भिन्न-भिन्न भाषाओं के देश में आने, भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के संपर्क में आने से हिंदी को बखूबी बढ़ावा मिला है। हिंदी से यहां हमारा अभिप्राय खड़ी बोली से है। हम ब्रज भाषा,भोजपुरी, मैथिली, अवधी आदि भाषाओं के पिछड़ेपन को देखें तो बात ज़्यादा आसानी से समझ में आती है। वह भाषाएं अपने पुराने कलेवर राधा-कृष्ण (ब्रज भाषा), रामचरित मानस (अवधी) से आगे कुछ लेने को तैयार नहीं। इन के बोलने वालों ने अपने को भूतकाल में कैद कर रखा है। लेकिन खड़ी बोली यानी हिंदी ने ऐसा नहीं किया है। अमीर खुसरो जैसों ने हिंदी को एक नया विकास दिया है। नया तेवर और नया शिल्प दिया। बाद में इस की प्रगति उर्दू के नाम पर जो उस जमाने में अलग भाषा नहीं बन पाई थी, बल्कि हिंदी को देवनागरी की जगह फारसी लिपी में लिखी भर गई थी। कबीर, मीर तकी मीर और नज़ीर अकबराबादी जैसे शायर इस बात के प्रमाण हैं। उर्दू लिपी में लिखी जाने से पद्मावत उर्दू नहीं बन जाती। वह रहती अवधी ही है। ऐसे उदाहरण इस तरफ भी इशारा करते हैं कि अवधी आदि भाषाओं ने अपनी शब्दावली में नए शब्द लेने से इंकार कर दिया और नए भावों को अपनी भाषा में नहीं लिया, तो पिछड़ी रह गई। हमारी हिंदी के पाठ्यक्रमों में प्राचीन काव्य और साहित्य के नाम पर यही आंचलिक भाषाएं और उन के कवि सम्मिलित किए जाते हैं। जो बहुत हद तक इस के पीछे उन्नीसवीं शताब्दी की वह होड़ है, जो अंग्रेजी शिक्षाविदों ने हिंदी और उर्दू को अलग करने के लिए इन भाषाओं को धार्मिक रंग देने के लिए किया।

खड़ी बोली के विकास में अमीर खुसरो के बाद नई बातों, भावों, विषयों को लेने और उठाने की क्षमता पैदा हो चुकी थी। इस लिए उस का विकास अनुवादों, शुरू में बाइबिल आदि, बाद में समाचारों, लेखों, कविता, कहानियों आदि का विकास तेज़ी से हुआ। तो इस के पीछे पढ़े-लिखे लोगों की पूरी फौज थी। यह लोग अंग्रेजी पढ़े-लिखे थे। इन सब ने नए भाव लिए थे, नई जानकारी पाई थी। हमारा आधुनिक हिंदी साहित्य अगर आज आधुनिक है तो इस के पीछे स्वयं अग्रेजी और अंग्रेजी के माध्यम से विश्व भर के साहित्य से हमारा संपर्क है। हमारी आज़ादी की लड़ाई, आर्य समाज जैसे सुधार आंदोलनों के पीछे अंग्रेजी भाषा और यूरोप के सामाजिक, राजनैतिक विचारधाराओं का हमारे नेताओं द्वारा आत्मसात किया जाना भी एक महत्वपूर्ण कारण है। स्वामी दयानंद एक हद तक क्रिश्चियन आंदोलन के विरुद्ध हिंदू धर्म के समर्थन और उस की रक्षा का कार्य कर रहे थे। कई बार तो लगता कि अगर अंग्रेजी के माध्यम से हम लोग पूरी दुनिया के संपर्क में न आए होते या खुदा ना खास्ता 1857 का आंदोलन सफल हो गया होता तो शायद हम आज तक वहीं होते, जहां आज अफगानिस्तान या ईरान हैं। बात कुछ अटपटी है ज़रूर और तल्ख भी, पर सच्चाई यही है। अब वैश्वीकरण के युग में देश-विदेश से हम लोगों का संबंध केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित नहीं रह पाएगा। गांव के लोग, छोटी जातियों के लोग भी अब तेज़ी से अंग्रेजी पढ़ रहे हैं। जैसे उच्च वर्ग के लोगों ने अपने भारतीय संस्कार नहीं छोड़े, बल्कि उन्हें बदला। उसी तरह यह नए लोग बहुत गहरे तक अंग्रेजी शिक्षा पा कर अपना सुधार तो करेंगे ही अपनी भाषा को भी नया रंग देंगे। आज मध्यम वर्ग जो अंग्रेजी मिश्रित भाषा बोलता है, वह इस बात का प्रमाण है कि हम हिंदी में नई शब्दावली स्वीकार कर रहे हैं। हमने अरबी, फारसी से शब्द लिए तो हम गरीब नहीं, अमीर हुए। और आज अंग्रेजी से हिंदी में कुछ शब्द ले रहे हैं तो भी हम अमीर ही हो रहे हैं, गरीब नहीं। आज की पीढ़ी ने और आज के अखबारों ने जो नई भाषा बनानी शुरू की है, वही हिंदी को और हमें आगे ले जाएगी। पंडिताऊ हिंदी से छुट्टी पा कर ही हिंदी गद्य और पद्य में क्रांतिकारी बदलाव स्पष्ट दिखाई देते हैं।

हिंदी के भविष्य की बात करें और हिंदी सिनेमा की बात न करें तो शायद यह गलती होगी। सच यही है कि हिंदी भाषा के विकास में हमारी हिंदी फ़िल्मों और हिंदी गानों की भी बहुत बड़ी भूमिका है। सिनेमा दादा फाल्के के जमाने से ले कर अब तक हमारे लिए हमेशा नई और विदेशी टेक्निक थी और रहेगी। बोलने वाली फ़िल्मों का अविष्कार भी हमारे लिए नया जमाना ले कर आया। हमने विदेशी टेक्निक का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए किया। दादा फाल्के ने पहली फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र बनाई थी। दादा फाल्के ने अपनी देखी पहली फ़िल्म के अनुभव पर लिखा है कि परदे पर मैं क्राइस्ट को देख रहा था और मेरे मन में कृष्ण का चरित्र चित्रों में चल रहा था। हिंदी फ़िल्में पूरी दुनिया में अभारतीयों को भी आकर्षित करती हैं। एक समय आवारा हूं जैसे गीत दुनिया भर के लोग गाते दिखते थे। रूस में, मिश्र में, अरब में, हर कहीं। आज फ़िल्म और फ़िल्मी गीत प्रवासी भारतीयों को भारत से जोड़े रखती है। उन की वह संतान जो विदेशों में पैदा हुई है और हिंदी पढ़ना-लिखना नहीं जानती है, लेकिन हिंदी फ़िल्मी गीत समझती है। और उन्हें सुनना चाहती है। हिंदी पढ़ना चाहती है।

यह अद्भुत संयोग ही है कि अमरीका में एक तरफ पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश अमेरिकियों से हिंदी पढ़ने के लिए कह गए तो आज ओबामा भी हिंदी पढने को कह रहे हैं। तो दूसरी तरफ अमरीका में ही एक भारतीय अविनाश चोपड़े ने रोमन स्क्रिप्ट में हिंदी लिखने की जो नई विधि (आईटीआरएएनएस) बनाई है, उस के द्वारा अनगिनत लोग हिंदी में लिख रहे हैं। यहां तक कि संस्कृत का डॉ. लोनियर का प्रसिद्ध कोश भी अब इंटरनेट पर आईटीआरएएनएस में उपलब्ध है। यह हिंदी के विकास का नया आकाश है। इंटरनेट पर या मोबाइल फ़ोन पर रोमन लिपि में ही सही हिंदी में चैटिंग और चिट्ठी-पत्री अबाध रूप से जारी है। अब विभिन्न टीवी चैनलों पर जो हिंदी बोली जा रही है, वह सारी दुनिया में पहुंच रही है, रेडियो की समाचारी हिंदी, हिंदी भाषा को सीमित कर रही थी, अब वह हिंदी अपने रुपहले पंख फैला कर उड़ पड़ी है। उड़ पड़ी है अनंत आकाश को नापने।

निचली शक्तियों की अनदेखी साहित्य की सेहत के लिए ठीक नहीं : राजेंद्र यादव

हंस के संपादक और कभी कहानीकार रहे राजेंद्र यादव हिंदी में एक दुर्लभ प्रजाति के जीव हैं। हद से अधिक प्रतिबद्ध होना, खूब पढा-लिखा होना और हद से भी अधिक लोकतांत्रिक होने का अदभुत कंट्रास्ट अगर देखना हो तो राजेंद्र यादव को देखिए। इस मामले में हिंदी में वह इकलौते हैं। न भूतो, न भविष्यति भी आप कह सकते हैं। इस असहिष्णु होते जाते समाज में वह अपने खिलाफ़ सुनने और अपनी ही पत्रिका में अपने खिलाफ़ छापने में कभी गुरेज नहीं करते। आप उन को ले कर कुछ भी कह-लिख दीजिए उन के हंस में ससम्मान छपा मिलेगा। वह प्रतिबद्ध हैं अपनी स्थापनाओं को ले कर पर तानाशाह नहीं हैं। अपने तमाम समकालीनों की तरह फ़ासिस्ट भी नहीं हैं। उन का यह उदारवादी चेहरा मुझे बहुत भाता है। वह उम्र और बीमरियों को धता बताते हुए लगातार सक्रिय हैं। आप उन से असहमत हो सकते हैं पर उन के विरोधी नहीं। हर साल जिस तरह उन का जन्म-दिन मनाया जाता है, बिलकुल किसी उत्सव की तरह वह अदभुत है। और हिंदी क्या तमाम भाषाओं के लेखकों को भी यह नसीब नहीं है। देश भर से लोग अपने आप जुटते हैं। जैसे हंस की सालगिरह मनाई जाती है, वह भी अप्रतिम है। हंस का इतने दिनों से लगातार निकलते रहना भी आसान नहीं, बल्कि प्रतिमान ही है। राजेंद्र यादव और उन का स्त्री प्रेम भी सर्वविदित है पर स्त्रियां उन से मिलने को हमेशा लालायित रहती हैं। हिंदी में इतना पढा-लिखा लेखक और संपादक भी शायद ही कोई मिले। एक मनोहर श्याम जोशी थे और ये राजेंद्र यादव हैं। चाहे किसी भारतीय भाषा मे कुछ लिखा जा रहा हो या दुनिया की किसी और भाषा में, राजेंद्र यादव उस से परिचित मिलेंगे। हर साल वह हंस के मार्फ़त कुछ नए कहानीकारों को भी ज़रुर प्रस्तुत करते हैं। यह आज के दौर में बहुत कठिन है। वह कई बार एकला चलो को भी साबित करते हुए दीखते हैं। और उस पर लाख बाधाएं आएं, अडिग रहते हैं। अपने को खलनायक बनाए जाने की हद भी वह बार-बार पार कर जाते हैं। कुल मिला कर सारा आकाश के इस लेखक का आकाश इतना अनंत और विस्तृत है कि उस में जाने कितने लोक, जाने कितने युग समा जाते हैं पर आकाश और-और विस्तृत होता जाता है, और अनंत, और अलौकिक होता जाता है। बावजूद मन्नू जी से उन के अलगाव और इस से उपजे अवसाद, अकेलापन और फिर उन के निरंतर अकेले होते जाने की त्रासदी और आलोचकीय उपेक्षा के। दलित विमर्श और स्त्री विमर्श से उन का गहरा नाता है। राजेंद्र यादव ने बहुत दिनों से खुद कोई कहानी नहीं लिखी है और दलित विषयवस्तु वाली कहानी तो कभी नहीं लिखी है। पर वह दलित विषयवस्तु वाली कहानियों को लिखने पर, निचली शक्तियों के उभार को देखने पर खासा जोर देते रहे हैं। अब भी देते हैं। इस फेर में वह कहानी के शिल्प और कला जैसी चीजों को भी बाकायदा नकारने का आह्वान भी करते रहते हैं और बाकायदा आंदोलन के मूड में रहते हैं। १९९६ में वह कथाक्रम की एक गोष्ठी में लखनऊ आए थे। तभी दयानंद पांडेय ने राष्ट्रीय सहारा के लिए उन से बातचीत की थी। पेश है बातचीत:
  • आप इधर लगातार साहित्य में ‘दलित’ की वकालत करते आ रहे हैं। एक जिद की हद तक। क्या आप को लगता है कि साहित्य ‘डिक्टेट’ कर के लिखवाया जा सकता है?
-नहीं। बिल्कुल नहीं। पर बात तो हम कह ही सकते हैं और मेरा कहना यह है कि निचली शक्तियां जो उभर कर सामने आ रही हैं, उन की अनदेखी अब साहित्य की सेहत के लिए ठीक नहीं है। तो दलित शक्तियों को साहित्य में जगह तो देनी ही पड़ेगी। कहानियों में भी।

  • इधर जो सामाजिक समता और सामाजिक न्याय की बात चली है, क्या इन दलित विषयवस्तु वाली कहानियों से उस राजनीतिक आंदोलन को मदद मिली है या कि उस राजनीतिक आंदोलन से ऐसी कहानियों को?

-न तो वह शक्तियां कहानी के लिए मददगार हुई हैं, न यह कहानियां उन के लिए मददगार हैं। हमारा उन से कोई सरोकार भी नहीं है। राजनीतिकों के अपने भटकाव हैं। उस से हमें लेना-देना नहीं है। पर अब हमारे देश और समाज की मुख्यधारा निचली शक्तियां ही हैं। सब कुछ वही तय कर रही हैं। मेरे लिए महत्वपूर्ण यही है।
  • सत्तर के दशक में हिंदी में पार्टी लाइन आधार पर ढेरों कहानियां लिखीं गईं। अब उन का कोई नामलेवा भी नहीं है। इन कहानियों की सारी क्रांतियां अंतत: नकली साबित हो कर रह गईं। आप को क्या लगता है कि यह दलित विषयवस्तु वाली कहानियां भी उसी राह पर नहीं चली जाएंगी?
-जा भी सकती हैं और नहीं भी। और ज़रूरी नहीं है कि जो एक बार कोई चीज़ हो गई वह अपने को बार-बार दुहराए ही। अब तो यह एक आंदोलन है। दलित विषयवस्तु वाली कहानियां लिखनी ही पड़ेंगी।
  • इस आंदोलन को कोई नाम देना चाहेंगे?
-अभी कोई संगठन तो है नहीं। पर तमाम संवाद के दौरान जुड़ते हुए इसे आंदोलन की शक्ल तो देंगे ही। ताकि दबाव डाल सकें। इस समय लगभग सभी भाषाओं की कहानियों में यह एक ही समस्या है-निचली शक्तियों का उभार। और कभी भी किसी एक भाषा के माध्यम से सभी लोग इस आंदोलन से जुड़ जाएंगे।
  • तो अब आप राजनीतिक चोला पहनने की तैयारी में हैं?
-साहित्य में निचली शक्तियों की बात करना राजनीतिक नहीं है। कृपया साहित्य और राजनीति को एक साथ नहीं मिलाएं। फिर अखबार क्या करेंगे?

  • आप को लोग बतौर कहानीकार जानते हैं। पर आप कहानियां लिखना छोड़ कर फतवेबाज़ी में लग गए हैं। आप क्या कहेंगे?
-हां, कहानियां इधर नहीं लिखी है। हंस का संपादन कर रहा हूं। फतवेबाज़ी नहीं।
  • आप बार-बार लोगों से दलित विषयवस्तु वाली कहानियां लिखने को कहते हैं और खुद कभी कोई दलित विषयवस्तु वाली कहानी आप ने लिखी नहीं। यह दोहरा चरित्र क्यों?
-ज़रूरी नहीं कि दलित कहानियों की बात चलाने के लिए दलित विषयवस्तु वाली कहानी भी मैं लिखूं ही। और फिर मैं ही हूं जिसने अपने सारे लिखे को नकार दिया है। कोई और हो तो बताइए?
  • हां, हैं, कई हैं?
-नाम बताइए?
  • जैसे रजनीश। जैसे हुसैन। रजनीश ने अपने कहे को नकारा और हुसेन ने अपने बनाए को जलाया।
-कहानीकार का नाम बताइए?

  • आप राज्यसभा सदस्य कब हो रहे हैं?

-राज्यसभा की सदस्यता कौन देगा?
  • आखिर अब आप ‘राजनीतिक’ हो रहे हैं?
-ऐसा कुछ नहीं है। न मैं राजनीतिक हो रहा हूं। न मैं राज्यसभा में जा रहा हूं। नोबुल प्राइज के चक्कर में ज़रूर हूं। (कहते हुए हंसते हैं)

  • बीते दिनों कांशीराम ने पत्रकारों की पिटाई की। क्या इस को भी दलित चेतना और निचली शक्तियों के उभार से ही जोड़ कर देखते हैं?
-इन से हमें कोई मतलब नहीं है। पर सवाल यह है कि क्या आप कांशीराम को उत्तर भारत की राजनीति से वापस भेज सकते हैं? भारतीय राजनीति से खारिज कर सकते हैं उन को? सच्चाई यह है कि कांशीराम की लोग चाहें जितनी निंदा कर लें पर अब कांशीराम को उत्तर भारत की राजनीति से खारिज नहीं किया जा सकता है।
  • आप द्वारा लिए गए बिहार सरकार के लखटकिया पुरस्कार की काफी निंदा की गई। आप क्या कहेंगे?
-मैं ने अपनी बात हंस के संपादकीय में कह दी है।
  • कहा गया कि छोटा पुरस्कार होने के नाते आपने जातिवाद का मुलम्मा चढ़ा कर उत्तर प्रदेश का पुरस्कार अस्वीकार कर ‘शोहरत’ बटोरी। पर चूंकि बिहार का पुरस्कार लखटकिया था, नरसंहार में बिहार सरकार के हाथ सने होने के बावजूद ले लिया।
-हंस के लिए लिया।
  • कहा जाता है कि उस मुहल्ले के लोगों ने सार्वजनिक बयान देकर कहा था कि अगर हंस को चलाने की ऐसी मजबूरी है तो वह लोग चंदा दे कर आप को पुरस्कार जितना पैसा दे देंगे। पर आप ने उन की भी नहीं सुनीं?
-यह सब सिर्फ़ कहने की बाते हैं। मुझे ऐसा प्रस्ताव किसी ने नहीं दिया।
  • ठीक है। पर हंस अगर आप मूल्यों की हिफ़ाज़त के लिए निकाल रहे हैं तो बिहार सरकार से यह पुरस्कार इस तरह लेना और वह पैसा हंस में लगाना भी मूल्यों का अवमूल्यन नहीं है?
-नहीं, मैं नहीं मानता। मुझे ऐसा नहीं लगता।

  • क्या आप अब भी उत्तर प्रदेश के लोगों को मूढ़ मानते हैं?

-हां।

  • ऐसा कहना क्या उत्तर प्रदेश के लोगों को अपमानित करना नहीं है?
-नहीं।

Saturday, 9 June 2012

ऊपर-ऊपर लाल मछलियाँ, नीचे ग्राह बसे !


यह डिंपल यादव का निर्विरोध निर्वाचन तो लोकतंत्र का मर जाना ही है

डिंपल यादव का कन्नौज से इस तरह निर्विरोध जीत जाना क्या लोकतंत्र का मर जाना भी नहीं है? खतरनाक है इस तरह लोकतंत्र का मर जाना। मुक्तिबोध की एक कविता ऐसे में याद आती है, 'मर गया देश, जीवित रहे तुम।' आखिर हम किस लोकतंत्र में आ गए हैं? डिंपल क्या इतनी सर्व-स्वीकार नेता हैं कि उन के खिलाफ़ किसी राजनीतिक दल ने उम्मीदवार ही नहीं खड़ा करना चाहा? बल्कि यह दूसरा सवाल है। पहला सवाल यह है कि क्या डिंपल यादव राजनीतिज्ञ भी हैं? उन की योग्यता यही तो है कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी हैं। मुलायम सिंह यादव की बहू हैं। एक चुनाव फ़िरोज़ाबाद से हार चुकी हैं। कांग्रेस के राज बब्बर से। और फिर क्या डिंपल के अलावा कोई और उम्मीदवार समाजवादी पार्टी में नहीं शेष रह गया था?

या क्या यह मुलायम ब्रिगेड की गुंडई से उपजा परिदृष्य भी है?

इसी कन्नौज से लोहिया एक बार संसद पहुंच चुके हैं। और बोफ़ोर्स के असल हीरो टी.एन.चतुर्वेदी जैसे व्यक्ति इसी कन्नौज से चुनाव हार भी चुके हैं। तब जब एक समय वी. पी. सिंह एंड कंपनी के लोग अरुण नेहरु आदि जब कन्नौज जाते थे तब वहां की माटी माथे पर लगाते थे यह कह कर कि यहां कि माटी बड़ी पावन है, पवित्र है, और कि टी. एन. चतुर्वेदी यहीं के हैं और कि उन्हों ने ही बोफ़ोर्स का घपला बतौर सी.ए.जी. सामने किया था। कन्नौज की माटी तब उन्हें बड़ी पवित्र लगती थी। पर वही टी.एन. चतुर्वेदी जब कन्नौज से चुनाव लड़े तो उन की ज़मानत तक ज़ब्त हो गई। इन्हीं मुलायम सिंह यादव एंड ब्रिगेड के चलते। तब टी.एन.चतुर्वेदी को चुनाव में ठीक से प्रचार तक नहीं करने दिया गया था। उन के कार्यकर्ताओं को मारा पीटा गया अलग से। और एक समय केंद्रीय गृह सचिव की कुर्सी पर बैठने वाले टी.एन. चतुर्वेदी आंख में आंसू भरे यह सब देखते रहे थे। तब के दिनों मुलायम सिंह यादव ही मुख्यमंत्री थे। अब उन के पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं। बाद में जब टी.एन. चतुर्वेदी एक बार एक इंटरव्यू के समय मुझे इस का व्यौरा बताने लगे तो उन की आंखों में खून के आंसू थे। और अब उसी कन्नौज में डिंपल यादव के खिलाफ़ कोई चुनाव लडने की हिम्मत नहीं कर पाया।

तो क्या गुंडई और सरकारी मशीनरी जब एक साथ खडी हो जाती है तो यही होता है?

अस्सी के दशक के शुरुआती दिनों की बात है। मैं तब दिल्ली में रहता था। एक बार गोरखपुर गया था। गोलघर बाज़ार में कुछ दोस्तों के साथ खड़ा बतिया रहा था कि मेरे गांव के प्रधान जी उधर से गुज़रे। मेरी पट्टीदारी के थे। उम्र में बड़े थे सो संस्कारवश उन को देखते ही उन के पांव छुए। और पास खड़े दोस्तों से उन का परिचय करवाया कि, 'हमारे गांव के प्रधान जी हैं, हमारे भइया हैं।' और फिर जैसे मुझे याद आया तो यह भी बताया कि, 'खासियत यह है कि आज की तारीख में भी निर्विरोध चुने गए हैं।' मुझे लगा कि यह उन की तारीफ़ तो होगी ही अपने गांव की भी तारीफ़ होगी कि जहां ग्राम प्रधानी के चुनाव में जगह-जगह से खून-खच्चर की खबरें आने लगी थीं, उस दौर में हमारे गांव में निर्विरोध प्रधान चुना जा रहा है। पर मेरा यह कहना भर था कि, 'निर्विरोध चुने गए हैं।' प्रधान जी की आंखों में खून उतर आया। फ़ुल वाल्यूम में भड़क पडे। गांव भर की मादर-फ़ादर की। और बमके, 'कवने सारे क हिम्मत रहल जवन हमरे आगे खड़ा होत?' हम सब को सांप सूंघ गया उन के इस बमकने से। मैं पछताया कि काहें भला इन का परिचय दोस्तों से करवाया। खैर वह बमक कर चले गए। हम लोग दूसरी बातों में लग गए। लेकिन मैं सोच में पड़ गया। इस लिए भी कि प्रधान जी की छवि गुंडई की तो हरगिज़ नहीं थी। तो फिर ऐसा क्यों कहा उन्हों ने? बाद में मैं ने गांव में पता किया तो दूसरी ही बात पता चली। लोग उन से इस लिए डरते थे कि वह सूदखोरी का धंधा करते थे। और कि गांव जवार में ज़्यादातर लोग उन के कर्ज़दार थे। सब की पुरनोट उन के पास थी।

तो क्या यहां भी सभी राजनीतिक पार्टियों की पुरनोट अखिलेश यादव के पास है? गुंडई और सरकारी मशीनरी का ज़ोर तो खैर है ही। कम से कम कांग्रेस की पुरनोट तो है ही समाजवादी पार्टी के पास। बाहर से ही सही समर्थन तो है ही केंद्र सरकार को। पहले भी यू.पी.ए.-1 के समय वाम दलों के समर्थन वापसी के समय यही समाजवादी पार्टी सजीवनी बूटी बन कर सामने आई थी और सरकार बच गई थी। अब यू.पी.ए.-2 में भी ममता की धौंस के समय भी यही समाजवादी पार्टी ढाल बन कर खड़ी होती है सरकार बचाने को। और तिस पर राष्ट्रपति चुनाव सिर पर है। तो कांग्रेस की पुरनोट तो है ही समाजवादी पार्टी के पास।

पर बहुजन समाज पार्टी? जिसे अभी एक दिन पहले ही समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने ऐन विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष कहने के बजाय नेता शत्रु पक्ष कह कर संबोधित किया है और आन रिकार्ड कहा है। वह बसपा भी क्यों नहीं आई कन्नौज में डिंपल के खिलाफ़ चुनाव मैदान में? और पार्टी विथ डिफ़रेंस भारतीय जनता पार्टी भी? कभी हां, कभी ना कहती हुई सो क्यों गई भाजपा?

तो क्या यह कोई बड़ी राजनीतिक मजबूरी थी? या सिर्फ़ और सिर्फ़ समाजवादी गुंडई का भय ही है?

राजनीतिक पंडित और प्रेक्षक इस के चाहे जो मतलब या कयास लगाएं और बताएं पर सच यही है कि यह लोकतंत्र के लिए कतई शुभ नहीं है। संसदीय जनतंत्र वैसे भी इस समय दांव पर है। संसदीय गरिमा संसद में ही अब विलुप्त हो रही है। लगभग सभी राजनीतिक दल अब प्राइवेट लि. कंपनी भी नहीं, कारपोरेट सेक्टर में तब्दील हैं। तो ऐसे समय में डिंपल यादव का कन्नौज संसदीय सीट से निर्विरोध चुना जाना आतंक पैदा करता है जनतंत्र के खिलाफ़। आप मान लीजिए कि जैसे हमारे गांव में अस्सी के दशक में उस प्रधान जी का आतंक था, भले ही सूदखोरी का सही, अब वह आतंक एक दूसरे रुप में उत्तर प्रदेश में भी फैल गया है। तब प्रधान जी ने निर्विरोध चुनाव जीता था, अब डिंपल जीत गई हैं। बात एक ही है। बस आतंक फैल कर एक गांव से देश की संसद में पहुंच गया है।

आप देखिए कि अभी हो रहे निकाय चुनाव से भी उत्तर प्रदेश में सत्ता पक्ष और मुख्य प्रतिपक्ष अनुपस्थित है। और कि ऐलानिया तौर पर अनुपस्थित है। तो क्या इन पार्टियों का जनतंत्र में यकीन है भी भला? आखिर जो राजनीतिक दल निकाय चुनाव को हेय समझता हो उसे आखिर क्या अधिकार है विधान सभा या लोकसभा का भी चुनाव लड़ने का और वहां बैठने का भी? बसपा और सपा का यह रंग उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृष्य को बदरंग करता है। बसपा तो खैर शुरु ही से निकाय चुनाव में अनुपस्थित रहती आई है। और अब की सपा भी बसपा की ही राह चल पडी है। जाने यह संयोग है कि प्रवृत्ति सपा और बसपा दोनों ही की प्राथमिकताएं हमेशा ही से एक जैसी रही हैं। तानाशाही, भ्रष्टाचार, बेशर्मी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रख देना, सिद्धांत में कुछ और व्यवहार में कुछ सर्वदा ही से दोनों ही पार्टियों के मूलभूत सिद्धांत रहे हैं। बसपा राज आता है तो दलित उपनिवेश में उत्तर प्रदेश तब्दील हो जाता है। हर जगह दलित अफ़सर नज़र आने लगते हैं। और जब सपा का राज आता है तो पूरा प्रदेश यादव उपनिवेश में तब्दील हो जाता है। हर जगह यादव अफ़सर और उन की हनक दिखाई देने लगती है।

और जब दोनों पार्टियां संग साथ थीं, तब की याद कीजिए। दोनों की मिली जुली सरकार थी। दोनों ही पार्टियां दबे-कुचलों, गरीब-गुरबों की बात करती थीं। पर जब राज्यसभा में किसी को भेजने की बात आई तो बसपा ने उद्योगपति जयंत मल्होत्रा को भेजा और सपा ने राज बब्बर को। इन की प्राथमिकताएं शुरु से ही यही और ऐसी ही रही हैं। आय से अधिक संपत्ति की सी.बी.आई. जांच इन्हीं दोनों के मुखिया लोगों मुलायम और मायावती पर ही है। उत्तर प्रदेश में आयुर्वेद से ले कर अनाज घोटाले तब के मुलायम राज में हुए तो मायावती राज में मंडी घोटाला, कृषि फ़ार्म घोटाला, फ़ायर घोटाला से लगायत एन. आर.एच. एम. और पत्थर घोटालों की अनंत फ़ेहरिस्त है। स्थिति क्या भूलू, क्या याद करूं वाली है।

और जो यह निर्विरोध डिपल यादव का चुना जाना है, संसदीय राजनीति के पतन की पराकाष्ठा कहिए, रसातल कहिए या चाहे कोई और विशेषण दीजिए पर हो यही गया है। और यह भी अनायास नहीं है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश में वह पहली निर्विरोध सांसद चुने जाने का तमगा हासिल किए जाने पर समूची विधान सभा इस पर मनन करने के बजाय ध्वनि-मत से प्रस्ताव पास कर देती है। और अखबारों या चैनलों पर भी अहा-अहा ही होता है। यहां बुद्धिनाथ मिश्र का एक गीत याद आता है :
ऊपर-ऊपर लाल मछलियाँ
नीचे ग्राह बसे।
राजा के पोखर में है पानी की थाह किसे।

तो इस जनतंत्र में बड़ी तेज़ी से फिर से उपज रहे राजतंत्र की यह आहट आखिर हमारे संविधान पंडित या राजनीतिक पंडित क्या नहीं देख पा रहे? कि समाजवादी गुंडई और सरकारी मशीनरी के वशीभूत इन सब की आंख पर भी मोतियाबिंद की मोटी परत जम गई है? पूछने को मन होता है कि हे मुलायम सिंह यादव ! अब आप की बहू लोकसभा तो पहुंच गईं। तो क्या आप को महिला आरक्षण के विरोध में बल्कि कहूं कि महिलाओं के अपमान में दिया गया वह अपना बयान क्या आज भी याद है कि ऐसी औरतें जब लोकसभा में आएंगी तो लोग सीटी बजाएंगे ! आखिर डिंपल जी पढी-लिखी भी हैं और अपने पिता के घर से सवर्ण भी हैं।

मुक्तिबोध और कि बुद्धिनाथ मिश्र को अब एक साथ याद करना फिर ज़रुरी है : 'मर गया देश, जीवित रहे तुम।' और कि, 'ऊपर-ऊपर लाल मछलियाँ /नीचे ग्राह बसे।/राजा के पोखर में है पानी की थाह किसे।' अब इन राजा बने राजनीतिज्ञों और उन के पोखर के पानी की थाह लेना सचमुच बहुत ज़रुरी हो गया है। कोई माने या न माने। क्यों कि अब यह देश तो मार ही चुके हैं और मार कर उसे परिवारवाद, भ्रष्टाचार और कारपोरेट के पिंजड़े में कैद कर चुके हैं। अब जनता त्राहि-त्राहि करे या त्राहिमाम ! इन को कोई फ़र्क नहीं पडने वाला।

Wednesday, 6 June 2012

कहां मिलेगी अब प्यार की वह भाषा

मन हिल गया है राज कपूर के निधन की खबर से। हालांकि प्यार जैसी अक्षुण्ण चीज़ किसी के रहने न रहने से शेष नहीं होती पर मैं तो यही सोच कर उदास हूं कि अब कैमरे की आंख से प्यार की सत्ता को सहेजने का एक अर्थ डूब गया है। कैमरे की आंख से प्यार की तरलता और मादकता अब एक साथ देखने को नहीं मिलेगी। खास कर ऐसे माहौल में जब मिथुन चक्रवर्ती सरीखे अभिनेता फ़रमाने लगे हैं कि ‘प्रेम नाम की कोई चीज़ नहीं है। आप इसे परिभाषित नहीं कर सकते, क्यों कि इस का अस्तित्व ही नहीं है। कुछ क्षण जो आप किसी औरत के साथ साझा करते हैं। इसे प्रचंड आकर्षण कहना चाहिए।’ इसी लिए मैं राज के निधन से दुखी होने की बात दुहराता हूं और यह दुख भुला नहीं पाता हूं। फ़र्क देखिए कि एक तरफ अपने को सुपर स्टार ‘समझने वाले’ मिथुन ‘किसी औरत के साथ कुछ क्षण साझा कर लेने’ तक ही अपने को ‘सार्थक’ समझते हैं, दूसरी ओर राजकपूर हैं कि ज़िंदगी की 64 रीलें देख भोग लेने के बाद भी अपनी 40-45 बरस पुरानी मुलाकातों वाली स्वर्गीय नरगिस को बेसाख्ता अपनी ‘हीरोइन’ बताने में फूले नहीं समाते थे। नरगिस की कसक उन के दिल को बराबर मथती रहती है। हालां कि यह भी गौरतलब है कि राज कपूर के कैमरे से जो प्यार छलक कर रुपहले परदे पर उतरता है, उसमें कितना उन का अपना है। क्या यह भी एक दुर्लभ संयोग नहीं है कि राजकपूर को लोग आज निधन के बाद ज्यादातर उनकी फ़िल्मों के गीतों से ही याद कर रहे हैं। जिन्हें आम तौर पर शैलेंद्र, शंकर जयकिशन और मुकेश की त्रिवेणी ने बहाया है। सवाल यह भी बनता है कि अगर राजकपूर के पास इस त्रिवेणी के साथ ख्वाज़ा अहमद अब्बास की धारदार कहानियां न होती तो क्या तब भी राजकपूर की यही इयत्ता, प्रभुसत्ता और प्रासंगिकता बनी रहती? हालां कि सवाल यह भी है कि अगर राजकपूर न होते तो शैलेंद्र, हसरत, शंकर जयकिशन, मुकेश और ख्वाज़ा अहमद अब्बास की दुनिया कैसी और क्या होती? हालां कि ख्वाज़ा अहमद अब्बास के निधन पर राजकपूर ने आंखें भर कर बड़ी सादगी से स्वीकारा था कि ‘यह जो राजकपूर-राजकपूर बना, जिस राजकपूर को लोगों ने हाथों-हाथ उठा लिया, वह राजकपूर नहीं, अब्बास साहब ही हैं। उन्हों ने ही यह बनाया...। अब्बास साहब न होते तो राजकपूर-राजकपूर न होते।’ दादा साहब फाल्के पुरस्कार पर भी राजकपूर की यही प्रतिक्रिया रही कि यह पुरस्कार मेरा नहीं, मेरे संगी साथियों का है और फिर वह शैलेंद्र जी की याद में डूब गए थे। राजकपूर सिम्मी गेरेवाल और सिद्धार्थ काक द्वारा बनाई गई फ़िल्मों में भी शैलेंद्र और नरगिस की याद को जिस तल्खी और शिद्दत से सहेजते हैं, उसे देख सुन-कर मन भीग जाता है। अब शायद ही ऐसा कोई फ़िल्मकार हो जो राज कपूर सरीखा निकले, जो कि अपने गीतकारों, संगीतकारों का इस तरह से कर्ज़दार बनने का मन रखता हो। अब जब राजकपूर दुनियां से कूच कर गए हैं और नरगिस तो खैर कब की कूच कर गई हैं तो यह सवाल भी करने को मन हो आता है कि अगर नरगिस न होतीं तो क्या तब भी राजकपूर की दुनिया यही और वह ऐसे ही होती? ‘मेरा नाम जोकर’ में राजू की रुसी हीरोइन जब उन से विदा लेने आती है तो दस्विदानियां (फिर मिलेंगे) कह कर जाती है। पर राज कपूर तो अपने दीवानों से दस्विदानियां भी नहीं कह गए। ‘छलिया मेरा नाम, छलना मेरा काम’ की तर्ज़ पर छल गए।

[2 जून,1988  को राजकपूर के निधन पर स्वतंत्र भारत में 3 जून,1988 को प्रकाशित हुई श्रद्धांजलि।]


दम भर अदम पर !

दम भर अदम पर ! यह काम कोई शुद्ध संपादक ही कर सकता था। कोई रैकेटियर संपादक नहीं। मोटी-मोटी पत्रिकाएं छापने वाले रैकेटियर संपादकों के वश का यह है भी नहीं कि वो दबे-कुचले लोगों की आवाज़ को आवाज़ देने वाले अदम गोंडवी पर इतना बढिया विशेषांक, इतनी जल्दी निकालने का नखरा उठाते। बहराइच जैसी छोटी सी जगह से यह काम कर दिखाया है डा. जय नारायण ने। कल के लिए का ७५ वां अंक अदम गोंडवी स्मृति अंक है। मैनेजर पांडेय, विजय बहादुर सिंह, राजेश जोशी आदि के विमर्श तो हैं ही, विजय बहादुर सिंह की अदम से बात-चीत भी महत्वपूर्ण है। तमाम लोगों के संस्मरण, परिचर्चा,लेख, विमर्श आदि अदम गोंडवी की ज़िंदगी और उन की शायरी का एक नया ही मेयार रचते हुए एक नई ही दृष्टि और एक नई ही रहगुज़र से हमें गुज़ारते हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी, निदा फ़ाज़ली, गिरिराज कराडू, आलोक धन्वा, पुरुषोत्तम अग्रवाल, शिवमूर्ति, संजीव, अनामिका, प्रमिला बुधवार, उमेश चौहान, बुद्धिनाथ मिश्र, नवीन जोशी, अल्पना मिश्र, आदियोग, श्याम अंकुरम, ओम निश्चल, अटल तिवारी आदि के लेखों, टिप्पणियों आदि से भरा-पुरा कल के लिए का यह अंक बेहद पठनीय और संग्रहणीय भी है। हवा-हवाई फ़तवों से बहुत दूर-दूर है और कि अदम की शायरी की पगडंडी पर हमें बडी बेकली से ले जाता है। डा. जय नारायण की संपादकीय भी उतनी ही सहज-सरल और पारदर्शी है, जितनी अदम की शायरी और ज़िंदगी। संपादकीय में कोई बिब-व्यंजना या लफ़्फ़ाज़ी, फ़तवा आदि भी नहीं है। १०० पृष्ठों वाली इस पत्रिका में अदम पर डा. जय नारायण की एक गज़ल भी है इस अंक में। जिस का आखिरी शेर यहां मौजू है : एक नश्तर की तरह दिल में उतर जाती हैं,/ फ़र्ज़े-ज़र्राह निभाती हैं अदम की गज़लें। सचमुच बाकमाल अंक है अदम पर कल के लिए का।
तो आमीन अदम गोंडवी, आमीन !

Tuesday, 5 June 2012

आलोचक किसी को बड़ा या छोटा नहीं करता : नामवर सिंह

रचना बड़ी कि आलोचना? पूछने पर नामवर सिंह जैनेंद्र जी का संदर्भ दे कर पूछते हैं कि ‘किस की अकल और किस की भैंस?’ इसी तर्ज़ पर वह कहते हैं कि ‘कौन रचना है और कौन आलोचक?’ वह मानते हैं कि ‘आलोचक किसी लेखक को बड़ा बनाता नहीं, स्वीकार करता है।’ दरअसल लगभग हर व्याख्यान में एक नई लाइन ले लेने वाले नामवर सिंह हिंदी साहित्य, खास कर आलोचना के परिदृश्य पर जिस तरह सक्रिय रहे हैं, वह अपने आप में एक अप्रतिम उदाहरण है। अपने वक्तव्यों से उत्तेजना जगाना अगर किसी को सीखना हो तो वह नामवर से सीखे। क्यों कि जाने सायास या अनायास, नामवर के हर वक्तव्य उत्तेजना जगाते हैं। हर रचना को वह नई खोज मानते हैं और कहते हैं कि हर रचना को हर तरह से नई दिखना चाहिए। इन दिनों इसी अर्थ में वह परंपरा नहीं, परंपराओं पर ज़ोर देते मिलते हैं। उन की गुरुता का जादू भी अजब है। अब देखिए कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को वह अपना गुरु मानते हैं। पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार नामवर को पहले मिलता है आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को उन के दो साल बाद। वह भी आलोचना पर नहीं, उन के एक उपन्यास पर। जब कि वह जाने आलोचना के लिए जाते हैं। यह भी गज़ब ही है कि हिंदी साहित्य में जो भी कुछ घटित होता है, उस की स्वीकृति नामवर से पाने या फिर उस बाबत जिरह की खातिर लोगों में जो ललक दीखती है वह किसी और हिंदी आलोचक को नसीब नहीं। यह सिलसिला कोई चार दशक से भी ज़्यादा समय से अनवरत जारी है। कम ही हिंदी आलोचक हैं, जिन के जीते जी उन पर कोई गंभीर किताब केंद्रित की गई हो। नामवर ऐसे ही आलोचक हैं, जिन के जीते जी उन पर कोई गंभीर किताब केंद्रित की गई है। दयानंद पांडेय ने उन से राष्ट्रीय सहारा के लिए खास बातचीत की थी। यहां पेश है उन से हुई उस बहस-तलब बात-चीत के संपादित अंश :-
सुधीश पचौरी के द्वारा संपादित ‘नामवर के विमर्श’ उन के जीवन और साहित्य के बाबत एक नहीं, कई खिड़कियां खोलती हुई किताब है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को अपना गुरु मानने वाले नामवर आज भी अपना खांटी बनारसीपन टटका रखे हुए हैं। बरसों बनारस से दूर रह कर भी आज भी बनारसीपन जीते मिलते हैं। गर्वीली गरीबी के बखान में ऊभ-चूभ, चूना लगा कर सुर्ती ठोंक कर खाने वाले नामवर हिंदी आलोचना में भी देसी बयार ही बहाते हैं, विदेशी बयार में वह नहीं बहते मिलते। ‘वाद-विवाद-संवाद’ उन की महत्वपूर्ण पुस्तक है। दरअसल ‘वाद-विवाद-संवाद’ ही उन की आलोचना का आधारबिंदु है। नामवर मानते भी हैं कि संवाद ही आलोचना की ताकत है। संवादधर्मिता ही शक्ति है। असहमति ही उन का आलोचनात्मक दर्शन है। नामवर का आलोचनाई जादू इसी से जाना जा सकता है कि जिस को वह लेखक मान लें, वह लेखक। नहीं, खारिज! फिर भी नामवर बड़ी विनम्रता से इस बात से इनकार करते हैं। हालां कि निर्मल वर्मा के अनन्य प्रशंसक रहे नामवर बाद के दिनों में उन्हें हिंदू लेखक कह कर खारिज करने में लग गए। पर निर्मल वर्मा तो खारिज नहीं हुए। बहरहाल, मौखिक ही मौलिक की स्थापना देने और उस की गंगा बहाने वाले नामवर की मौखिक के भी अब कई-कई खंड पुस्तक रुप में हमारे सामने उपस्थित हैं। हिंदी के वह विरले लेखक हैं जिन का ७५ वां वर्ष लोगों ने देश भर में घूम-घूम मनाया। प्रभाष जोशी के नेतृत्व में। अब वह पंचानबे पार कर छियानबवें वसंत में प्रवेश कर गए हैं। पर उन की सक्रियता अब भी बरकरार है। उन को सुनने के लिए लोग अब भी उत्सुक मिलते हैं। पर इधर साल दो साल से वह अपने बोलने में बिखरने लगे हैं। तो सूप तो सूप चलनी जैसे लोग भी उन के कुछ कहे को तोड़-मरोड़ कर ऐतराज पर ऐतराज ठोंकने लगे हैं। और दुर्भाग्य देखिए कि वह भी इन चीज़ों पर सफाई देने लग जा रहे हैं। तो यह उन के लिए, उन की गरिमा के लिए मुफ़ीद नहीं जान पडता। पर चूंकि हिंदी आलोचना पर उन का चार दशक से अधिक का ‘राज’ चलता आ रहा है सो वह अपने को उसी तरह ‘ट्रीट’ करते जा रहे हैं। पर उन को अब समझ लेना चाहिए कि अब आलोचना में उन की तानाशाही के दिन गुज़र चुके हैं, विदा हो चुके हैं। सो आछे दिन पाछे गए के भाव में उन्हें अब आ ही जाना चाहिए। आ तो उन्हें तब ही जाना चाहिए था जब उन्हों ने ‘इतिहास की शव-साधना’ लिखी और मुह की खा गए थे। अपनी ही कही लिखी बात को काटने पर आमादा हो गए। जो कीचड़ वह राम विलास शर्मा पर डालना चाह रहे थे, उन्हीं पर आ गिरा। अब जैसे इतिहास खुद को दुहरा रहा है। हिंदी आलोचना का ककहरा भी नहीं सीख पाने वाले लोग, कहूं कि आलोचना की बाल मंडली के लोग अब उन पर ही कीचड़ उछालने में बात-बेबात संलग्न दिखने लगे हैं। यह सब देख कर मेरे जैसे प्रशंसकों का मानना है कि नामवर सिंह को अब वाद-विवाद-संवाद से न सिर्फ़ बचना चाहिए बल्कि उन को अब अपने ‘मौखिक’ से भी छुट्टी ले ही लेना चाहिए। इस लिए भी कि अब उन के बोलने में वह धार तो जाती ही रही है, बिखरने और विस्मृत भी वह होने ही लगे हैं। बहरहाल, १९९७ में ‘कथाक्रम’ की गोष्ठी का उद्घाटन करने वह लखनऊ आए थे। इस मौके पर हुई बातचीत पेश है :


दिखने में बात बचकानी है और बहस पुरानी कि आलोचना बड़ी की रचना?
- इन चीज़ों में क्या दिलचस्पी हो सकती है।

इस लिए कि सुगबुगाहट के ही तौर पर सही यह सवाल फिर से टटोला जाने लगा है।
- हां, टटोला तो जा रहा है। पर यह इस पर निर्भर है कि कौन रचना है और कौन आलोचना।

पर यह सवाल नामवर सिंह के अर्थ में ज़्यादा गूंजता है? कहूं कि आप के समय से?
- गलत बात है यह। यदि रामचंद्र शुक्ल जैसा आलोचक हो तो रचना भी उस दौर की उतनी बड़ी थी। बल्कि इस के बारे में एक लतीफा सुनाएं। जैनेंद्र जी से किसी ने पूछा था कि ‘अकल बड़ी कि भैंस? ’ तो जैनेंद्र जी ने कहा था कि ‘किस की अकल और किस की भैंस?’ तो जब रचनाएं अच्छी होती हैं तो आलोचनाएं भी अच्छी होती हैं।

यह तो ठीक बात है, लेकिन अगर इस सवाल को थोड़ा और साफ कर के नामवर सिंह, निर्मल वर्मा, राजेंद्र यादव प्रसंग से जोड़ कर बात करें तो?
- मैं कहता हूं इस लिए ही निर्मल वर्मा बड़े लेखक नहीं है। दुनिया के लेखकों में उन का नाम है। सिर्फ़ हिंदी नहीं, बाकी भाषाओं में भी वह खूब छपे और सराहे गए हैं। इस नाते एक बात मान और जान लीजिए कि आलोचना किसी लेखक को बड़ा बनाती नहीं है। हां, उस के बड़प्पन को स्वीकार करवाता है।

तो राजेंद्र यादव आप पर इस तरह की तोहमत लगातार क्यों लगाते रहे हैं? खास कर निर्मल वर्मा प्रसंग पर?
- यह सवाल तो राजेंद्र यादव से पूछिए। रही बात निर्मल की तो निर्मल, राजेंद्र से बड़े लेखक हैं। यह दुनिया मानती है। दुनिया की कई भाषाओं में वह छपे हैं और जो पुरस्कार भी बड़े लेखक होने का पैमाना है तो निर्मल को ज़्यादा पुरस्कार भी मिले है।

यह तो आप की ही महिमा से हुआ बताते हैं वह?
- मैं फिर कह रहा हूं कि आलोचक किसी लेखक को बड़ा नहीं बनाता, उस के बड़प्पन को स्वीकार करता, करवाता है। अब निराला को ही लीजिए। निराला को उस दौर के आलोचकों ने नहीं माना था। पर आलोचक गलत साबित हुए और निराला बड़े हो गए।

आलोचकों की बात आज की तारीख में चल रही है?
- अगर रचना बड़ी होगी तो देर सबेर अपने को स्वीकार करवा लेगी।

नहीं, जैसे प्रेमचंद को लें। उनके ज़माने में आलोचकों की उतनी स्वीकार्यता नहीं थी और लेखक आलोचकों का मुंह नहीं जोहते थे। पर आज आलोचकों की स्वीकार्यता कहीं ज़्यादा है और लेखक आलोचकों को बड़े ‘मोह’ से देखते हैं और उन का कहा जोहते हैं।
- प्रेमचंद के ज़माने में भी रामचंद्र शुक्ल थे और शुक्ल ने उन को स्वीकार किया था। पर तब एक आलोचक थे अवध उपाध्याय। अवध उपाध्याय को लोग भूल गए हैं। पर इन्हीं अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद के उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ को टॉलस्टाय के एक उपन्यास का अनुवाद तथा ‘रंगभूमि’ को मैकरे का अनुवाद कहा था। पर देखिए कि प्रेमचंद को आज लोग जानते हैं, लेकिन अवध उपाध्याय को कोई नहीं जानता।

पर यह तो आप फिर भी मानेंगे कि कई बार आलोचक कुछ को बेवज़ह ‘स्थापित’ कर देते हैं तो कुछ को बेवज़ह ‘खारिज’।
- यह मत भूलिए कि रचनाकार भी आलोचक होते हैं। वह भी किसी को स्वीकार करते हैं और किसी को खारिज। पर साहित्यिक दुनिया किस को स्वीकार करती है, मुन:सर इस पर होता है। किसी एक-दो आलोचक का सवाल नहीं होता।

इधर तो हिंदूवादी-दलितवादी का दौर चल रहा है?
- बहुत दिनों तक दलितों को दबाया गया है। अब उन का उभार हो रहा है। युग की इस नई प्रवृत्ति को पहचानना और स्वीकारना होगा। अभी तक दलितों में जो साहित्यकार हुए उन्हें मान्यता नहीं दी गई। एक समय कबीर को लोग नहीं मानते थे। रैदास को नहीं मानते थे। अब मानते हैं। दलित भी अब संगठित हो कर लिख रहे हैं।

पर क्या इस लिए कि इन दिनों भारतीय राजनीति में दलित तत्व उभार पर है, इस लिए साहित्य में भी दलित-दलित होने लगा है? बल्कि इसी पर दलित लेखन के लिए डिक्टेट किया जाने लगा है। ठीक है?
- डिक्टेशन राइटिंग ठीक नहीं है।

पर राजेंद्र यादव जैसे लोग इस बात के पक्षधर दिखते हैं।
- राजेंद्र या कोई भी प्रोत्साहन दे सकता है। किसी के डिक्टेशन पर साहित्य न तो लिखा जाता है और न ही पढ़ा जाता है।

इन दिनों किताबों के न छप पाने का बड़ा रोना है। प्रकाशक कागज आदि की महंगाई ले कर बैठ जाते हैं। खास कर हिंदी साहित्य छापने के बाबत।
- बावजूद इस के किताबें भी छप रही हैं।

आप तो राजनीति में थे। अब फिर राजनीति में आने का मन नहीं करता?

- नहीं। और राजनीति के बारे में कोई बात नहीं करूंगा।

पर आप तो दो-तीन बार चुनाव लड़ चुके हैं।
- अब चुनाव नहीं लड़ सकता। पैसा नहीं है कि चुनाव लड़ूं।

तो जब चुनाव लड़े थे तो पैसा था?
- तब भी नहीं था। पर 1959 में जब चुनाव लड़ा था तब बिना पैसे के चुनाव लड़ा था। तब बिना पैसे के चुनाव लड़ा जा सकता था, अब नहीं।

आप धोती-कुर्ता पहनते हैं और जहाजों में बैठते हैं। क्या आप को लोग नेता समझ कर जलते-भुनते नहीं, या फिर सिफ़ारिशों वगैरह के चक्कर में पड़ जाते हों तो क्या करते हैं?
- यह मेरी पहले की पोशाक है। आज की नहीं, फिर किसी ने मुझे नेता समझने का भ्रम आज तक नहीं पाला।

उमराव जान फ़िल्म का संगीत खैय्याम का नहीं, मधु रानी का है : पीनाज मसानी

यह बात १९९१ की है। जब नवभारत टाइम्स के लिए दयानंद पांडेय ने पीनाज मसानी से बात की। पीनाज मसानी ने उमराव जान के फ़िल्म के संगीत पर सवाल उठा दिया था। खास लखनऊ में। एक तरह से मुज़्ज़फ़्फ़र अली के आंगन में। उन के घर से कोई एक किलोमीटर की दूरी पर होटल क्लार्क्स में बैठी वह मुझ से बतिया रही थीं। उन दिनों वह गज़लों की रानी बनी घूमती थीं।

क्या उमराव जान फ़िल्म का संगीत खैय्याम का नहीं है? नहीं, कहना है मशहूर गज़ल गायिका पीनाज मसानी का। तो किस का है? मधु रानी जी का। जिन की मैं शागिर्द हूं। पीनाज मसानी बोलीं। ‘दिल लगाना कोई मजाक नहीं’ गाने वाली पीनाज मसानी ने आर.डी. बर्मन, बप्पी लाहिड़ी, स्वर्गीय जयदेव, मधुरानी, उषा खन्ना आदि ढेर सारे संगीतकारों के साथ काम किया है। अपने कैसेट मुहब्बत के सागर में पीनाज मसानी ने खुद भी संगीत दिया है। हिंदी और तमिल फ़िल्मों में भी पीनाज मसानी ने गाया है। पीनाज बंबई मूल की हैं और वहीं रहती हैं। तलत अजीज, अनूप जलोटा, पंकज उधास को अपना समकालीन मानती हैं। चंदन दास, अशोक खोसला को अपने बाद, लेकिन अच्छा मानती हैं। वह शकील बंदायूनी का एक शेर सुनाती हैं, ‘मेरी ज़िंदगी है जालिम तेरे गम से आशिकारा/ तेरा गम है दर हकीकत तेरे दर से प्यारा।’ कहतीं हैं कि यह शेर मुझे बहुत पसंद हैं। फिर वह गालिब का एक मिसरा पढ़ती हैं ‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है’ और कहतीं हैं मुझे यह भी बहुत पसंद है। पीनाज मसानी अपने गुरु मधुरानी की सब से अच्छी कंपोजिंग में गाई मीर की एक गज़ल का ज़िक्र करती हैं और उस के दो शेर सुनाती हैं। ‘रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह/अटका कहीं जो आप का भी दिल इसी तरह।’ मधुरानी के संगीत की वह फिर तारीफ करने से नहीं अघातीं। दो शेर फिर सुनाती हैं। ‘दिल में रख लो कि निगाहों में बसा लो मुझ को/ जिंदगी हूं मैं किसी शक्ल में ढालो मुझ को।’ रियाज कब करती हैं, पूछने पर वह कहती हैं, सुबह-सुबह। घर में कौन-कौन है? माता-पिता। एक बड़ी बहन भी है मेरी। उस की शादी हो गई है। किसी ने फिकरा कस दिया है ‘हर आदमी की सफलता के पीछे किसी औरत का हाथ होता है और आप के?’ फिकरा सुन कर पीनाज मसानी क्षण भर को ठिठकती हैं। फिर बेलौस हो जाती हैं। कहती हैं, ‘मेरी सफलता के पीछे खुदा का हाथ है। फिर वह जैसे जोड़ती हैं, ‘हां, मेरी सफलता के पीछे भी एक औरत का हाथ है। मेरी गुरु मधुरानी का हाथ।’ आप की हॉबी क्या है? फैन लेटर्स। रोज करीबन 25-30 फैन लेटर्स आ ही जाते हैं। और टेलीफ़ोन फैन? हां, वह भी हैं। पर फ़ोन पर मैं ज़्यादा बात नहीं करती। अगर आप गज़ल गायिका नहीं होती तो क्या होतीं? पता नहीं। पर क्या पता बी.काम कर के कहीं चार्टड एकाउंटेंट बन जाती।

Friday, 1 June 2012

हिंदी की अस्मिता का पहाड़ा अधूरा छूट गया

पंडित श्री नारायण चतुर्वेदी आज सुबह उर्दू की शर शय्या पर से उतर गए। सुबह 8.25 पर। पिछले साल जब उर्दू राजभाषा बनाई गई तभी वह उर्दू की शर शय्या पर चढ़ गए थे। लखटकिया पुरस्कार लतियाने पर भी इस शरशय्या से वह नहीं उतर पाए। उतरे तब जब आज प्राण पखेरू उड़ गए। जनता भारत भारती पुरस्कार भी उन्हें भरोसा न दिला सका और वह सोए ही रहे। और आज सो ही गए।

दरअसल वह मर तो तभी गए थे, जब पिछले साल हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर उर्दू को राजभाषा का दर्जा देने का उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐलान कर दिया था। तब भी वह अस्वस्थ थे। पर विरोध उन्हों ने किया और पुरज़ोर विरोध। हिंदी संस्थान का लखटकिया पुरस्कार जो उन्हें काफी हीलहुज़्ज़त के बाद दिया गया था और पर्याप्त देर से मिला था। उन्हों ने बिना देर किए उसे लात मार दी थी। पुरस्कार को लात मारी और 96 बरस की उम्र की परवाह नहीं की। विरोध जुलूस निकाल दिया। वह पैदल ठीक से चल नहीं सकते थे। इतना कि लखनऊ में हिंदी संस्थान से जीपीओ तक भी [एक किलोमीटर से भी कम] पैदल नहीं चल सकते थे। पर यथा-संभव वह पैदल भी चले और बाकी कार में। इस चक्कर में उन के कुछ अनुगामियों की बड़ी बुरी दशा मैं ने देखी। जब वह पैदल चलने लगते और जब वह कार में बैठते तो सभी कार में उन के अगल-बगल बैठने की ललक में धकियाने-मुकियाने पर उतर जाते थे और ऐसा एकाधिक बार हुआ। पंडित जी अस्वस्थ थे और बुरी तरह यह उन के अनुगामी भी जानते थे। पर बार-बार धकियाने मुकियाने से बाज़ नहीं आए। कई बार उस गंभीर जुलूस में भी इस कारण हास्य की रचना होती रही। और तब यह समझना कठिन था कि धकियाने-मुकियाने वाले सचमुच चतुर्वेदी जी से इतना प्यार करते हैं और मिठाई पर मक्खी की तरह खिंचे जा रहे हैं या कि वह उन के साथ फ़ोटो खिंचवाने की ललक में उन तक खिंच जा रहे हैं। समझना बड़ा कठिन था, इस लिए भी कि यह चतुर्वेदी जी के साथ भैया जी-भैया जी कह कर जब तक चिपटने वाले अतिरिक्त उत्साही नौजवान नहीं बुर्जुगवार लोग ही थे।

तो यह था पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी का व्यक्तित्व। दरअसल वह कृतित्व के लिए कम और व्यक्तित्व के लिए ज़्यादा जाने गए। उन की छिटपुट रचनाओं खास-कर हिंदी प्रसंग की कुछ कविताओं और लेखों को छोड़ दें तो उन का व्यक्तित्व उन के कृतित्व पर हमेशा भारी रहा है। वह हमेशा हिंदी के प्रचारक ही बने रहे। साहित्य सेवा से ज़्यादा उन्हों ने हिंदी सेवा की और कई बार हदें लांघ कर, हदें तोड़ कर वह जय हिंदी करते रहे। पंडित विद्यानिवास मिश्र कहते हैं कि ‘हम उन के हैं’ यह भाव हमें हिंदी के भाव से भरता है। पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी खुद भी कहते थे ‘हम पल्लव हैं। किंतु न हम हीन हैं, न दीन और दयनीय। बिना हमारे वंदनवार असंभव है...।’ तो यह सिर्फ़ वह अपने लिए ही नहीं, हिंदी की अस्मिता के लिए भी कहते थे। पुरुषोत्तम दास टंडन के वह इलाहाबाद में सिर्फ़ पड़ोसी ही नहीं थे। उन के सहयात्री भी थे। जीवन भर वह हिंदी का परचम ही फहराते रहे। 

हिंदी पर वह इतना ज़्यादा मुखर थे कि वह कट्टर हिंदू भी कहे जाते थे और बाद में तो वह बकायदा जनसंघी बता दिए गए। पर उन्हों ने कभी इस के प्रतिवाद की सोची भी नहीं। अलग बात है वह नंद किशोर अवस्थी को कुरान शरीफ के अनुवाद में मदद भी करते रहे। क्यों कि वह चाहते थे कि ‘हिंदी के गुलदस्ते में हर प्रकार के हरेक आकार के और हरेक गंध के फूल होने चाहिए।’ 

तो यह उन का अंतर्विरोध नहीं था कि एक तरफ तो कुरान शरीफ के हिंदी अनुवाद में मदद करें, दूसरी ओर उर्दू के राजभाषा बनाए जाने का विरोध करें। दरअसल इस के पीछे एक सोच थी, एक अंतर्दृष्टि थी। वह कहते भी थे कि मैं उर्दू का विरोधी नहीं हूं, क्यों कि उर्दू भी हिंदी की ही एक शैली है, तो उस का विरोध कैसे कर सकता हूं? 

पर चूंकि उर्दू को राजभाषा बनाना राजनीतिज्ञों की अल्पसंख्यकों का वोट बटोरने का औजार माना गया है, इस लिए विरोध हुआ और भैया जी ने इस की कमान संभाल ली। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी बड़ी शालीनता से श्रीनारायण चतुर्वेदी से उर्दू राजभाषा विरोध का ज्ञापन लेने के लिए इंतज़ार करते रहे। चतुर्वेदी जी पहुंचे तो उन्हों ने उन की इज़्ज़त आफज़ाई की। खड़े हो कर उन से ज्ञापन लिया। उन की बात भी बड़ी विनम्रता से सुनी। पर मानी नहीं। तो यह राजनीतिज्ञों के ही वश की बात थी कि आप बात सुन लें, सही भी बताएं, पर मानें नहीं और मजबूरी बता जाएं। 

वहीं पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी की जन्मभूमि इटावा है और आज के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी न सिर्फ़ इटावा के हैं, हेलीकॉप्टर ले ले वह बार-बार इटावा जाते ही रहते हैं। पर पिछले साल भर से बीमार पक्षाघात से पीड़ित पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी का देखने क्या, पूछने की भी कभी सुधि नहीं ली उन्हों ने। तो क्या सिर्फ़ इस लिए कि वह उर्दू के राजभाषा बनाए जाने का विरोध करते रहे थे और मुलायम उन का हालचाल लेते तो अल्पसंख्यक उन से कुपित हो जाते? इस लिए तो क्या आज वह अल्पसंख्यक नाराज नहीं होंगे। जब मुलायम औपचारिकतावश ही सही चतुर्वेदी जी के निधन पर शोक व्यक्त करेंगे। 

यह त्रासदी ही है कि मुलायम सरकार के फ़ैसलों में सिर्फ़ एक ही फ़ैसला एकमत से सिर आंखों पर लिया गया और उन की वाहवाही हुई। वह था हिंदी में राजकाज का फ़ैसला और उन के हिंदी अध्यादेश का। पर हिंदी की तूती बजवाने वाले मुलायम हिंदी के प्रखर प्रचारक का हाल सिर्फ़ इस लिए नहीं ले पाए कि अल्पसंख्यक नाराज हो जाएंगे। 

शायद इस लिए भी उन का व्यक्तित्व उन के कृतित्व पर भारी पड़ा कि उन्हों ने सालों साल नौकरियां की। पर चाहे कान्यकुब्ज कालेज की प्रिंसपली हो, विलायती पढ़ाई, शिक्षा विभाग या आकाशवाणी की अफसरी उन के हिंदी प्रचारकों के सामने सभी बौने ही नहीं बने बिला भी गए। यह कृतित्व और व्यक्तित्व ही की लड़ाई थी कि उन की लखनऊ की त्रिवेणी से कभी नहीं पटी। त्रिवेणी मतलब यशपाल, भगवतीचरण वर्मा और अमृतलाल नागर। नागर जी तो चतुर्वेदी जी का नाम सुनते ही भड़क जाते थे। पर उन्हें संबोधित करते थे ‘पूज्य’ ही कह कर। और नागर जी ही क्यों भगवती बाबू और यशपाल जी भी उन का बड़ा आदर करते थे। यशपाल जी तो कहते ही थे कि घर में माता-पिता के अलावा अगर मैं किसी का पांव छूता हूं तो भैया जी का ही। 

हिंदी की हेठी उन्हें अंत तक तावे पर बैठाए रही और जब उन्हें लगा कि मौत करीब आ ही गई है तो उन्हों ने परिजनों से कह दिया कि उन की मौत के बाद तमाशा न किया जाए। तमाशा मतलब उन का पार्थिव शरीर हिंदी संस्थान या हिंदी साहित्य सम्मेलन वगैरह जगहों पर ‘प्रदर्शन’, ‘प्रदर्शनी’ के लिए न ले जाया जाए। इलाहाबाद ही में चिता जलाई जाए। उन के घनिष्ठ लक्ष्मीनारायण गुप्त कहते हैं, ऐसा ही होगा भी। तमाशा नहीं होगा। 

संयोग दुखद है पर है कि कल नागर जी का 75 वां जन्मदिन था और आज ही भैया जी का निधन हो गया। हम कल अभी रोए ही थे आज फिर रो गए। 27 सितंबर को भैया जी भी 97 पूरा करने वाले थे। पर लगता है वह हिंदी की हेठी के विरोध में गिनती पूरा किए बिना ही कूच कर गए। हिंदी की अस्मिता का पहाड़ा पूरा पढ़ाए बिना ही वह हम से बिला गए।


[18 अगस्त, 1990 को पंडित श्री नारायण चतुर्वेदी के निधन के बाद 19 अगस्त,1990 को स्वतंत्र भारत में छपी श्रद्धांजलि]