Friday, 13 July 2012

कु-व्यवस्था तंत्र में फंसे आदमी की छटपटाहट

विभांशु दिव्याल

दयानंद पांडेय के सद्य: प्रकाशित कहानी संग्रह ‘फ़ेसबुक में फंसे चेहरे’ में संकलित उनकी ताजा प्रकाशित कहानियों से गुज़रते हुए मिश्रित प्रतिक्रिया पैदा होती है। वह अपने परिवेश पर गहरी नज़र रखने वाले कथाकार हैं और अपने आसपास घट रहे को बड़ी शिद्दत से अपनी कहानियों का कथ्य बना देते हैं, फिर चाहे यह परिवार, समाज में आते बदलाव के रूप में घट रहा हो, किसी व्यवसाय की नई प्रवृत्तियों के रूप में अथवा संचार क्षेत्र में हुई क्रांतियों के वैयक्तिक सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में। उन की कथा कथ्य इकहरा न हो कर विस्तृत और बहुफलकीय है। शायद इस लिए भी कि वह पेशे से पत्रकार हैं और उन की रचना दृष्टि एक साथ अनेकानेक विषय और क्षेत्रों में पैठ बनाती रहती है।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘फ़ेसबुक में फंसे चेहरे’ यथा नाम लोकप्रिय सोशल साइट जहां एक और फेसबुक की लोकप्रियता को दर्शाती है कि राम सिंगार जैसे व्यक्ति भी अपने बच्चों की मदद से चैट करते हैं, लोगों की कुंठाओं, कामनाओं, वासनाओं और बेहूदगियों का साक्षात्कार करते हैं, तो दूसरी ओर फेसबुक पीढ़ी के जनसरोकार जैसी अनुत्तेजक चीज़ से पूरी तरह विमुख होने पर पीड़ा भी महसूस करते हैं। मगर इस साइट का या इस के बहाने स्वयं अपनी दमित वासनाओं को बाहर उलीचने का आकर्षक दबाव इतना खींचू है कि फेसबुक पर न बैठने की कसम खाने के बावजूद वह इसे छोड़ नहीं पाते। यहां कथाकार ऐसी साइटों के प्रभाव को एक नशे की आदत की तरह सामने रखता है, जिसके सामाजिक सुप्रभाव, विशेषकर भारतीय संदर्भ में स्थापित करना संभव है। इसी तरह ‘बर्फ़ में फंसी मछली’ का कथ्य एक व्यक्ति की कैशौर्य से ले कर पत्नी प्राप्त कर लेने के बावजूद, अधेड़ावस्था तक सतत चलने वाली प्यार की तलाश भले हो, मगर इसके कथ्य की आधारभूमि मोबाइल और इंटरनेट के जरिए ही तैयार होती है। इंटरनेट के माध्यम से कथानायक बिना किसी नस्ल, उम्र, भाषा, भेद के जब रशियन, अमरीकन, अफ्रीकन, इंडियन, नाइजीरियन लड़कियों को एक साथ अपने संपर्क में पाता है तो इसे ग्लोबलाइज़ेशन की पराकाष्ठा के रूप में देखता है। बहरहाल यह कहानी उस समय मार्मिक हो उठती है, जब उस की रशियन प्रेमिका, उस के सान्निध्य में रहने के लिए भारत आना चाहती है। मगर बीमार हो जाने के कारण नहीं आ पाती और जब वह अपनी प्रेमिका से मिलने की आतुरता में रूस जाने की योजना बनाता है तब उसे उस के निधन की सूचना मिलती है।

‘सूर्यनाथ की मौत’ कहानी भी कथित ग्लोबलाइज़ेशन के प्रभाव को उस मॉल संस्कृति के रूप में अभिव्यक्ति देती है, जिस के चलते इस देश की युवा पीढ़ी न अपने गांधी को याद रखना चाहती है, न अपने इतिहास में झांकना चाहती है और न एक देश-समाज के तौर पर अपने भविष्य का अभिकल्पन करना चाहती है। सूर्यनाथ को लगता है कि वह बाज़ार चलाने और बनाने वाली गौडसे जमात से घिर गए हैं और ‘बिना गोली खाए ही मर जाते हैं।’ एक जीनियस की विवादास्पद मौत में विष्णु प्रताप सिंह नाम के जीनियस की मौत होती है, मगर यह मौत सूर्यनाथ की तरह जीते जी मौत नहीं है, बल्कि एक खुद्दार और दिमागदार व्यक्ति के विवाहेतर संबंध की फिसलन में पड़ जाने से हुई भौतिक मौत है, जिस का काला साया उस की पत्नी और बच्चों को घेर लेता है।

‘मैत्रेयी की मुश्किलें’ तथा ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ दोनों कहानियों में परगमन की भरमार है। पहली की पृष्ठभूमि नव उदित शहरी संस्कृति है, जिस में सत्ता, सुरक्षा और महत्व की आकांक्षी औरत पुरुष सत्तात्मक सामाजिक ढांचे में भोग्या की तरह तो हर जगह स्वीकार्य है, परंतु हाड़-मांस की दिल-दिमाग वाली मानुषी की तरह कहीं नहीं। दूसरी कहानी की पृष्ठभूमि वह ग्रामीण सामंती संस्कृति है, जो आसपास घट रहे तमाम परिवर्तनों के बावजूद आदमी को अपनी जकड़ से मुक्त नहीं होने देती और उसे अनेकानेक त्रासद स्थितियों के दलदल में धकेलती रहती है। घोड़े वाले बाऊ साहब अपने घुड़सवारी के शौक में ऐसे डूबते हैं कि कब उन के हाथ से ज़िंदगी को साध कर रखने वाले साधन फिसलते चले गए, उन्हें पता भी नहीं लगता। पहली पत्नी उन्हें संतान का सुख नहीं दे पाती तो वह दूसरा विवाह कर लेते हैं, लेकिन यह स्वीकार नहीं कर पाते कि स्वयं वह अक्षमताग्रस्त हैं। उन की दोनों पत्नियां मिल कर उन्हें सात अनौरस संतानों का पिता बना देती है। उन की दूसरी पत्नी की मृत्यु जब गर्भपात कराने के प्रयास में होती है, तब उन्हें वास्तविकता का पता चलता है। आसमान से ज़मीन पर गिरे बाऊ साहब जब अपने इस दुख को घुड़सवारी जो अब तंगी के कारण बैल सवारी बन गई है, के शौक में ही डुबोने की कोशिश करते हैं तो बेहद दयनीय हो उठते हैं। कहानी अपने मार्मिक अंत तक पहुंचती है।

संग्रह की शेष दो कहानियों ‘हवाई पट्टी के हवा सिंह’ और ‘मन्ना जल्दी आना’ अपनी अधिक प्रामाणिक वस्तु, राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र को अधिक पैनेपन के साथ नंगा करने और अपने अधिक सघन कहानीपन के लिए अधिक उल्लेखनीय है। ‘हवाई पट्टी के हवा सिंह’ में जब आज की चुनावी राजनीति की कोख से उत्पन्न एक हवाबाज़ नेता एक छोटे शहर की चुनावी सभा में भाग लेने के लिए एक पत्रकार मंडली के साथ हवाई यात्रा करते हैं और शहर की असुरक्षित, उपेक्षित हवाई पट्टी को लोगों से घिरा देख कर अपने जहाज की ज़मीन पर उतारने में पायलट को हिचकिचाता देख जिस तरह उसे जहाज उतारने का आदेश देते हैं, असुरक्षित खतरनाक लैंडिंग पर दौड़ते समय जिस तरह एक जाबांज जीप चालक अपनी जीप को जहाज के सामांतर दौड़ाने की जांबाज़ी दिखाता है, जिस तरह आसपास की रिहायशी बस्तियों की भीड़ जहाज को छू कर देखने को ललक पड़ती है, जिस तरह पायलट अपनी चतुराई से जहाज को बचाता है और उस के राजनीति और पत्रकारिता के असली चेहरे को उजागर करता है। भीड़ की जहाज को छू कर और उस के भीतर घुस कर देखने की लंठ औत्सुक्य हास्य पैदा करता है और साथ ही समूचे लोकतंत्र और प्रशासनिक व्यवस्था पर गहरा व्यंग्य बन कर उभरता है।

‘मन्ना जल्दी आना’ का केंद्रीय पात्र बंगाल का बिहारी मुसलमान अब्दुल मन्नान है, जिस की कहानी पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने से शुरू हो कर उस के करुण विस्थापन, बांग्लादेशी मुसलमानों के हाथ अपनी दुर्गति, भारत में लंबे समय तक रहने के दौरान विद्वेष और आत्मीयता के उतार-चढ़ाव, भारत से निष्कासन, नेपाल में तस्करी का जीवन और फिर भारत वापस लौटने पर खत्म होने तक विभाजन की त्रासदी, राजनीति और प्रशासन की संवेदनहीनता, हिंदू-मुस्लिम संबंध, अपनों की क्षुद्रता और परायों की दयानतदारी जैसी अनेकानेक स्थितियों को मार्मिकता के साथ उजागर करती है। भारत वापस लौटने पर मन्नान को और तो सब कुछ मिल जाता है, नहीं मिलता तो उनका वह तोता ‘मिट्ठू मियां’ जो उन से कहता था ‘मन्ना जल्दी आना।’ मन्नान और मिट्ठू मियां का रिश्ता जैसे सारी मानवीय क्रूरता पर करुणा की बूंद बन कर बरस जाता है।

वस्तु की संपन्नता और विविधता के बावजूद दयानंद पांडेय की ज़्यादातर कहानियां अच्छी कहानी से बहुत अच्छी कहानी बनने से पहले ही ठहर जाती हैं। पात्रों को अपनी परिस्थितियों और तद्जन्य संवादों के माध्यम से स्वयं अपनी चारित्रिकता को स्थपित करते चलने का अवसर न दे कर जब कहानीकार अपनी टिप्पणियों से पात्र के चरित्र को स्थापित करने का काम करता है तो कहानी के पात्र, पाठक संबंध में शौथिल्य आ जाता है। उदाहरण के लिए ‘मैत्रेयी की मुश्किलें’ कहानी में शुरू में ही कथक पात्र के हवाले से कहानीकार का यह कथन ‘मैत्रेयी दत्ता अब कहां है, नागेंद्र नहीं जानता। लेकिन यह ज़रूर जानता है कि वह जहां कहीं भी होगी, दुख के दरिया में सुख के सपने संजोती अनजाने में अपने लिए कांटे बो रही होगी।’ केंद्रीय पात्र मैत्रेयी के चरित्र की असामान्यता को स्थापित कर देता है, जो पाठक को मैत्रेयी के प्रति रागात्मकता से जुड़ने नहीं देती और उस के सारे दुख-दर्द पाठक की सहानुभूति के दायरे में खिसक जाते हैं। कहानी का वांछित प्रभाव तब ढीला हो जाता है। कथाकार दयानंद पांडेय को धैर्य के साथ इस कमजोरी से उबरना चाहिए।


समीक्ष्य-पुस्तक:
कहानी संग्रह - फ़ेसबुक में फंसे चेहरे
कहानीकार - दयानंद पांडेय
पृष्ठ-216
मूल्य-350 रुप॔ए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012

2 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. उम्दा समीक्षा !

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