Saturday, 28 July 2012

जैविक पिता और लांछित पिता की त्रासदी

सोचिए कि कर्ण को जब पता चला होगा कि सूर्य उस के नाज़ायज़ पिता हैं तो क्या कर्ण ने भी कभी मांग की होगी सूर्य से कि अपनी रोशनी और अपनी आग मुझे भी दे दो नहीं मैं तुम्हें बदनाम कर दूंगा? खैर, नारायणदत्त तिवारी अब रोहित शेखर के प्रमाणित पिता हो गए हैं। डी.एन.ए. रिपोर्ट का खुलासा हो गया है। रोहित शर्मा अब रोहित तिवारी हो कर उपस्थित हैं । चैनलों पर शहीदाना अंदाज़ में हैं और विजेता भाव में भी। मां उज्जवला भी हैं उन के सुर में सुर मिलाती। अगर नहीं है कोई तो नारायणदत्त तिवारी और बी पी शर्मा नहीं हैं। एक जैविक पिता हैं और दूसरे लांछित पिता। नारायणदत्त तिवारी का बयान तो उन के ओ.एस.डी. भट्ट ने पढ कर सुना दिया है। पर बी.पी शर्मा शुरु ही से इस पूरे परिदृश्य से अनुपस्थित हैं। उन की उपस्थिति होती भी तो भला किस तरह होती? क्या वह भी रोहित और उज्जवला के सुर में सुर मिलाते? कहना कुछ नहीं बहुत कठिन् है। अभी तो समूचा मीडिया तिवारी जी पर टूट पड़ा है। रोहित के बचपन से जवान होते जाने की तमाम-तमाम फ़ोटुओं के साथ जिन में तिवारी जी का रोहित के प्रति छलकता उत्साह साफ दिखता है। उज्जवला भी हैं इन फ़ोटुओं में छलकती और इतराती हुई। और अभी भी तिवारी जी का कहना है कि रोहित से उन्हें कोई शिकायत नहीं है।

तो क्या पुरुष होना इतना बडा़ गुनाह है?

तिवारी जी अगर इस पूरे मामले में दोषी हैं तो उज्जवला शर्मा क्या दूध की धोई हुई हैं? यह सवाल कोई नहीं कर रहा है। किया जाना चाहिए। मीडिया तिवारी जी को ऐसे कोस रही है गोया वह अपराधी हों। जैसे अमरमणि त्रिपाठी, आनंद सेन या राजस्थान के भंवरी केस के सुराणा की तरह हत्यारे हों। यह ठीक है कि वह नाजायज पिता होने के दोषी हैं। पर अपराधी नहीं हैं। भारतीय कानून की निगाह में वह अपराधी नहीं हैं। उन्हों ने अपने बयान में कहा भी है कि उन की सरलता के चलते उन्हें साज़िश के तहत फंसा दिया गया है। सार्वजनिक जीवन जीने की मर्यादा उन्हों ने खंडित की है। यह तो हम सब पहले ही से जानते रहे हैं। पर उन्हें अपराधी की तरह मीडिया में परोसना शर्मनाक है।

दिक्कत यह भी है कि जिस लालच में उज्जवला शर्मा और रोहित ने तिवारी जी की टोपी उछाली है सरे आम उस लालच में भी वह कामयाब होते दीखते नहीं हैं। रोहित की तकलीफ़ यह है कि घर में तो तिवारी जी उन्हें बेटा कह कर बुलाते थे पर बाहर निकलते ही टोपी पहन कर वह उन्हें भूल जाते थे। अजीब त्रासदी है यह? इतनी सारी फ़ोटो में तिवारी जी रोहित और उज्जवला के साथ हैं और हर फ़ोटो में रोहित के प्रति उन का वात्सल्य छलकता बार-बार दिखता है। रोहित और क्या चाहते थे? कि वह एक सार्वजनिक जीवन जीते हुए सब को बताते फिरते कि देखो मैं रोहित का नाज़ायज़ पिता हूं और कि इस की मां मेरी रखैल है?

सच यह है कि जब तक तिवारी जी सत्ता में रहे, सत्ता के फ़ायदे रोहित और उन की मा उज्जवला लूटती रहीं। बाद में जब तिवारी जी उन्हें फ़ायदा देने की स्थिति में नहीं रह गए तब यह मां-बेटे उन्हें भावनात्मक ब्लैकमेल करने लगे। तिवारी जी की संपत्ति के लिए। पर तिवारी जी के पास कोई संपत्ति होती तब न वह उन को देते? अपनी पैतृक संपत्ति तक का तो उन्हों ने ट्रस्ट बना दिया है। वह देते भी तो क्या देते उन्हें? और अभी भी वह क्या पा जाएंगे? दहाड़ तो रहे हैं रोहित कि हर कानूनी हक के लिए वह लड़ेंगे। अब बाकी तो संपत्ति की ही लड़ाई रह गई है न?

खैर। कल्पना कीजिए कि अगर तिवारी जी भी रोहित और उज्जवला के स्तर की बेशर्मी पर कहीं उतर गए होते तो परिदृष्य कैसा होता भला? लेकिन तिवारी जी तो शुरु ही से विरोधियों का भी सम्मान करने के अभ्यस्त रहे हैं। वह अभी भी रोहित के खिलाफ़ कुछ नहीं कह रहे। बल्कि रोहित के साथ सहानुभूति जता रहे हैं। नहीं जानने को कौन नहीं जानता था कि तिवारी जी रोहित के नाज़ायज़ पिता हैं। बिलकुल शुरु ही से। रोहित ने खुद कहा है कि उन के दफ़्तर के लोग उन्हें बहुत आत्मीयता से खिलाते थे। तो क्या मुफ़्त में? फिर भी वह दुहराते हैं कि घर से बाहर निकलते ही टोपी पहन कर वह उन्हें भूल जाते थे। शशि कपूर द्वारा निर्मित श्याम बेनेगल की एक बहुत महत्वपूर्ण फ़िल्म है कलयुग। महाभारत की ही कथा को आधुनिक परिवेश में उन्हों ने इस फ़िल्म में बुना है। दो उद्योगपति परिवार की कहानी है। गांधारी, कुंती, धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह सभी हैं। जिस में कर्ण की भूमिका खुद शशि कपूर ने की है। रेखा द्रौपदी की भूमिका में हैं, कुलभूषण खरबंदा भीम और अनंत नाग अर्जुन वाली भूमिका में। अदभुत फ़िल्म है। जब कर्ण को मारने की बात चलती है तो कुंती डर जाती है। और सभी बेटों को इकट्ठा बैठा कर राय मशविरा करते हुए ऐसा करने से मना करती है। और बताती है कि कर्ण तुम सब का सब से बडा़ भाई है। यह सुनते ही अर्जुन की भूमिका में अनंतनाग जैसे कुंती पर टूट पड़ता है। और लगभग दौडा़ लेता है मारने के लिए। चीखता है, 'कुलटा कहीं की !' बडी़ मुश्किल से राज बब्बर, कुलभूषण वगैरह अनंतनाग को काबू कर पाते हैं।

फ़िल्मी ही सही एक दृष्य वह है और एक दृष्य यह है रोहित और उज्जवला का।

तिवारी जी जैसे विनम्र व्यक्ति के साथ यह हादसा ही है। जो लोग तिवारी जी और उन की विनम्रता को जानते हैं, वह लोग समझ सकते होंगे उन का अंतर्द्वद्व। यहां अभी और बिलकुल अभी एक बार की घटना याद आ रही है। नारायणदत्त तिवारी तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। वोट बैंक के चक्कर में हाइकमान के निर्देश पर उन्हों ने उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दे दिया था। इस के विरोध में पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी ने लगभग मुहिम सी चला दी थी तब। धरना प्रदर्शन सब किया। एक बार उन्हों ने लखनऊ में हिंदी संस्थान से जी.पी.ओ. तक जुलूस निकाला। और मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने की बात थी। अमूमन होता यही है कि मुख्यमंत्री वगैरह के औपचारिक ज्ञापन आदि ज़िला प्रशासन के अधिकारी या उन से जुडे़ अधिकारी् ही ले कर इतिश्री कर लेते हैं और ज्ञापन वहां तक ज़रुरी समझते हैं तो पहुंचा देते हैं। पर उस बार उपस्थित अधिकारियों को जब ज्ञापन देने की औपचारिक बात की चतुर्वेदी जी ने और पूछा कि ज्ञापन आप ही लोग लेंगे या मुख्यमंत्री जी लेंगे? तो उपस्थित अधिकारियों ने उन से कहा कि, 'माननीय मुख्यमंत्री जी आप की प्रतीक्षा में हैं।' चतुर्वेदी जी पहुंचे मुख्यमंत्री कार्यालय अपने साथियों के साथ। तिवारी जी न सिर्फ़ प्रतीक्षारत थे बल्कि खडे़ हो कर उन्हों ने चतुर्वेदी जी का लगभग स्वागत किया। प्रणाम कहा। और खड़े हो कर ही हाथ जोड़ कर ही उन से ज्ञापन लिया। चतुर्वेदी जी बहुत गुस्से में थे, तिवारी जी की इस विनम्रता ने उन का सारा गुस्सा पी लिया था। वह मुसकुराते हुए लौटे थे। बाद के दिनों में तिवारी जी से मैं ने पूछा कि, 'अगर आप उन से सहमत थे, उन की मांगों को इस तरह स्वीकार कर रहे थे मान लेने में भी क्या हर्ज़ था?' तिवारी जी ने कहा कि, 'शासन और राजनीति की अपनी ज़रुरतें होती हैं पर इस सब के बावजूद, विरोध के बावजूद हम किसी को सम्मान तो दे ही सकते हैं, देना ही चाहिए। और फिर चतुर्वेदी जी विद्वान व्यक्ति हैं बुजुर्ग हैं, सम्मान का हक बनता है उन का।' ऐसे ही एक बार संस्कृत अकादमी की ओर से सम्मान समारोह आयोजित था। राजभवन में। अध्यक्षता राज्यपाल कर रहे थे। सम्मन तिवारी जी दे रहे थे। मैं ने देखा कि किसी भी विद्वान को उन्हों ने मंच पर नहीं आने दिया। खुद दौड़-दौड़ कर सभी विद्वानों के पास वह पहुंचे और कि सब को सम्मानित किया। अपने भाषण में भी वह विनम्र हुए। और कहा कि वेद्पाठी पंडितों को ढाई हज़ार रुपए सम्मान राशि बहुत कम है। अब वेदपाठी पंडित मिलते कहां हैं? उन्हों ने सम्मान राशि बढा़ कर तुरंत दस हज़ार कर दी और कहा कि अभी तो चेक बन गया है पर बची राशि भी विद्वानों के घर पहुंच जाएगी।

आज कल तो राजनेताओं से सरकारी या कोई अन्य सम्मान लेना भी लगभग अपमान हो गया है। वह ऐसे हिकारत से पेश आते हैं विद्वानों से कि जैसे कोई बहुत निकृष्ट काम कर रहे हों। अव्वल तो अब राजनेता ऐसे सम्मान समारोहों से कतराने लगे हैं। जैसे कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पुरस्कार कभी मुख्यमंत्री ही आते थे देने। पर मायावती कभी नहीं आईं ऐसे किसी समारोह में। किसी मंत्री को अपना प्रतिनिधि बना कर भेज देती थीं। मुलायम भी पिछले कार्यकाल में नहीं आते थे। और अब तो मायावती ने जाते-जाते दो-तीन पुरस्कार छोड़ कर सब रद्द कर दिए थे। अखिलेश सरकार ने उसे अभी तक बहाल नहीं किया है।

एक समय यह पुरस्कार प्रधानमंत्री देने आते थे। एक बार मोरार जी देसाई आए थे। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी को भारत-भारती सम्मान मिलना था। उन का नाम पुकारा गया पर वह मंच पर नहीं पहुंचे। दो बार, तीन बार पुकारा गया। वह नहीं गए। मोरार जी ने आयोजकों से खिन्न हो कर पूछा कि वह आए भी हैं? उन्हें बताया गया कि आए हुए हैं और वह सामने की लाइन में बैठे हुए हैं। मोरार जी समझ गए। वह मंच से खुद उतर कर वाजपेयी जी के पास पहुंचे और उन्हें सम्मानित किया। रघुवीर सहाय ने तब दिनमान में इस विषय पर संपादकीय लिखी थी और बताया था कि यह पहली बार है कि सम्मान पाने वाले का चेहरा फ़ोटो में दिखा। नहीं अमूमन सम्मान देने वाले का चेहरा दिखता है।

क्षमा करें ज़रा विषयांतर हो गया।

पर क्या यह सम्मान समाज में किसी लेखक या किसी भी व्यक्ति का इस तरह रह गया है क्या? तिवारी जी का जो हाल मीडिया ने बीते कुछ वर्षों से बना रखा है, इस पितृत्व विवाद के चलते, लगता है जैसे वह कभी विकास पुरुष नहीं रहे, गिरहकट या लुच्चे हों। यह बहुत शर्मनाक है। किसी की निजी ज़िंदगी में मीडिया का इस तरह घुसपैठ किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। पिता एक सम्मानित संस्था है उस को इस तरह लांछित करना किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है। पिता शब्द की गरिमा को बनाए रखना ज़रुरी भी है। तिवारी जी रोहित के पिता थे, यह रोहित और उज्ज्वला ही नहीं बहुतेरे लोग वर्षों से जानते थे। डी.एन.ए.टेस्ट ने अब उस पर एक मुहर लगा दी है। उन फ़ोटुओं को एक बार फिर से निहारिए जिस में रोहित के प्रति तिवारी जी का प्यार उन का वात्सल्य छ्लक रहा है। अनेक फ़ोटो इस की गवाह हैं। अगर सिर्फ़ ऐयाशी ही की ही भावना रही होती तो वह तमाम पुरुषों की तरह कतरा गए होते। और कम से कम साल दर साल हर जन्म-दिन पर फ़ोटो तो नहीं ही खिंचवाते। गलती उन से हुई है, सार्वजनिक जीवन जीने की मर्यादा उन्हों ने लांघी है पर इस बिना पर उन के पितृत्व को इस तरह चौराहे पर खडा़ कर लांछित तो मत कीजिए। सुन रही हैं उज्जवला जी, रोहित जी और मीडिया की दुकानें? और फिर बिचारे बी.पी शर्मा को भी समाज में मुंह दिखाने भर के लिए जीने का हक देंगे कि नहीं?

क्या पुरुष होना इतना बडा़ गुनाह है? कि औरत के सारे गुनाह माफ़ और पुरुष को फांसी !

यह ठीक है कि पिता घोषित हो कर तिवारी जी हार गए हैं। बालेश्वर एक गाना गाते थे कि, 'जे केहू से नाईं हारल/ ते हारि गइल अपने से !' तो तिवारी जी अपनों से हार गए हैं। और जो इसी बात को इस तरह भी देखना चाहें तो देख सकते हैं, कि बेटे से हार कर भी अंतत: पिता की ही जीत होती है। पिता के लिए इस से बडा़ सुख कोई और होता नहीं कि वह अपने ही जाए से हार जाए।


कोई बलात्कारी नहीं हैं नारायणदत्त तिवारी, साझी धरोहर हैं हमारी


8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (29-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. आप शायद कानून एक पक्ष से अनभिज्ञ हैं की अगर किसी महिला को शादी का वादा करके शादी ना की जाए लेकिन उसका दैहिक शोषण किया जाये तो वो कानून अपराध हैं , किसी महिला को रखैल की पदवी देना अगर जरुरी हैं तो पुरुष को क्या कहा जाता हैं जो शादी से बाहर बच्चा तो पैदा कर सकते हैं पर मान नहीं सकते
    नारी की त्रासदी हैं की वो गर्भ में रखती हैं और इसलिये मुकर नहीं सकती पर पुरुष अगर वो गर्भ धारण नहीं करता तो क्या अपना बच्चा भी नहीं कह सकता
    पहले पति की बात करना फिजूल हैं क्युकी तलाक हो चुका है और उन्होने नाम केवल शेखर की नानी के कहने से दिया { ध्यान दे नानी के कहने से क़ोई ये करता हैं क्यूँ ??? और क्या शेखर की नानी उनकी सगी नानी थी या सौतेली यानी उनके नाना से कम उम्र की पत्नी } नकी
    जब शेखर का जनम हुआ उस समय के कानून यौन शोषण के प्रति इतने सख्त नहीं थे
    अब हैं और इसी वजह से शेखर की माँ कह सकती हैं की वो यौन शोषण का शिकार हुई हैं , उनके साथ एक उनसे उम्र में बहुत बड़े पुरुष ने उस समय जब वो अपने पति से तलाक ले रही थी शादी का झांसा दे कर शादी नहीं की
    समय हैं की हम समाज की बातो को छोड़ कर कानून और संविधान की बात करे और जो भी गलत हैं साक्ष्य मिलने पर उसको पूरी सजा दिलवाये
    और जिन का आप गुण गान कर रहे हैं ये क़ोई एक किस्सा नहीं हैं जिंदगी का क्या पता अब और लोग भी अपनी अर्जी लगा दे लेकिन शेखर की माँ के क़ोई और बच्चा नहीं हैं सो उनका चरित्र इनसे तो लाख गुना बेहतर ही हैं

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  3. प्रसंग दुखद है किन्तु विचारणीय भी । तिवारी जी की शक्सियत निःसन्देह बहुत बड़ी है । किन्तु लंबी कानूनी लड़ाई हारने के बाद कमसकम अब तो उन्हें रोहित को एक पिता की भांति सार्वजनिक रूप से आशीर्वाद दे देना चाहिए । यह उनकी उदारता और सदाशयता को बढ़ाएगा ही । उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के बारे में आपकी दी हुई जानकारियां महत्त्वपूर्ण हैं । इसमें एक इज़ाफ़ा और करूंगा । तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने भी हिन्दी संस्थान में पधारकर महियसी महादेवी वर्मा को सम्मानित करने का सौभाग्य प्राप्त किया था । उक्त समय के दोनों के ऐतिहासिक संयुक्त चित्र को संस्थान निदेशक के कार्यालय कक्ष में आज भी देखा जा सकता है ।

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  4. अब तो उन्हें रोहित को एक पिता की भांति सार्वजनिक रूप से आशीर्वाद दे देना चाहिए ।-सहमत

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  5. पूरे प्रकरण के पीछे की कहानी है यह तो आते आते सामने आएगी... लेकिन गलती तो गलती है... और जिन पर उदाहरण प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदारी होती है उनकी गलती की आंच और भी घातक बन जाती है...
    रचना जी का पक्ष भी सर्वथा विचारणीय है...

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  6. पण्डे जी आप क़ि सोच बस पुरुष वादी है जहा आप लोगो क़ि नागर में अगर पुरुष कुछ भी कर दे वो पुरुष है महिला को अपनी इज्जत का खला रख कर शांत मों रहना चहिये सच में .. मुझे तो बस ऐसी सोच वाले पुरषों और महिलाओ पर बस दया आती है ....
    रही बार उज्जवला क़ि तो मै काहू गी उन्हों ने यह .. कम डेर से किया पर सही किया .
    मेरे विचार से तो तिवारी . रोहित के नाजायज पिता है ..

    एक बात कहना चाहुगी आप जैसे बुद्धि जीवि से ऐसी सामन्ती सोच .. के बारे में जान कर मुझे आज दुःख हुआ ..

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    1. मुझे यह देख कर अछा लगा कि आपने एक उचित प्रश्न को उठाया है. धन, शोहरत, और विभिन्न स्वार्थों की पूर्ति कस लिए ऐसे सम्बन्ध बनाये जाते हें फिर निहित स्वार्थ के लिए ब्लैक मेल किया जाता है यह निंदनीय है

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  7. ऐसे में यह विचार आना स्वाभाविक है कि क्या किसी स्त्री की सहमति से उसके नितांत निजी क्षणों के सहयात्री रहे किसी पुरूष को लांछित करने का अधिकार स्त्री के पास सुरक्षित होना चाहिये अथवा नहीं ?

    क्या स्त्री को सिर्फ इसलिये यह अधिकार मिलना चाहिये कि उसने अपने शरीर के मांस की ओट में पुरूष को एक स्थान उपलब्ध कराया?

    क्या यह उदाहरण एक पुरूष के कुटिल न होने का सामाजिक दण्ड है? https://www.facebook.com/notes/ashok-shukla/%E0%A4%89%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A5%80/738802962817143?ref=notif&notif_t=like

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