Thursday, 30 August 2012

शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा, मुद्राराक्षस जैसा नहीं

सच आज की तारीख में अगर शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा। मुद्राराक्षस जैसा नहीं। नामवर जी बीते ३० अगस्त को लखनऊ आए । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के बुलावे पर। हिंदी संस्थान ने भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर व्याख्यान आयोजित किया था। कुसुम वार्ष्णेय भगवती बाबू पर बोलीं। बिलकुल पारंपरिक ढंग से। मुद्राराक्षस अपनी रवायत के मुताबिक अमृतलाल नागर पर बोले विवादास्पद ढंग से। कहा कि नागर जी प्रथम श्रेणी के लेखक नहीं थे। आदि-आदि। इस पर सभा में विवाद भी हुआ। कुछ लोग इतने मुखर हुए कि मुद्रा जी को बोलने नहीं दिए। यह भी शर्मनाक था। लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी पर नामवर जी बोले बिलकुल पानी की तरह। और इधर जैसा कि वह बढ़ती उम्र के चलते स्मृति दोष के शिकार होने लगे हैं अपने बोलने में जब-तब, आज बिलकुल नहीं हुए। कोई पौन घंटे वह बोले। जैसा एक अभिभूत शिष्य अपने गुरु के लिए बोल सकता है। बिलकुल भक्ति भाव से। उन्हों ने बताया कि कैसे उन के गुरुदेव बिना अपनी हसरत पूरी किए दुनिया से कूच कर गए। उन्हों ने पहले सूर पर लिखा। फिर कबीर पर लिखा। वह तुलसी पर भी लिखना चाहते थे। तैयारी भी कर चुके थे। पर विधिवत तुलसी पर लिखे बिना वह दुनिया छोड़ गए। नामवर ने तुलसी पर उन की लिखी कुछ टीकाओं का हवाला भी दिया। उन्हों ने पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी द्वारा संपादित सरस्वती में तुलसी की रामचरित मानस के अयोध्या कांड की चौपाई:
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथ अमित अति आखर थोरे॥
जिमि मुख मुकुर, मुकुर निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥

पर छपे लेख का विस्तार से ज़िक्र किया। तुलसी की विपन्नता और काशी प्रवास में उन की उपेक्षा को हजारी प्रसाद द्विवेदी की विपन्नता और काशी प्रवास की उपेक्षा से जोड़ा और बताया कि असल में गुरुदेव तुलसी के बहाने अपनी विपन्नता, अपनी उपेक्षा को लिखना चाहते थे। तुलसी ने भी असल में राम के बहाने अपने ही मान-अपमान की कथा लिखी थी। नामवर बोले हर उपन्यास कहीं न कहीं लेखक की आत्मकथा भी होता ही है।

जैसे तुलसी जब बनारस में रहते थे तो बनारस से बाहर रहते थे। अभी भी देखिए कि तुलसी घाट शहर में नहीं शहर से बाहर है। तुलसी भी दरवाज़ा-दरवाज़ा घूम कर एक-एक दाना भिक्षा में बटोरते थे, तब खाते थे। बाबा विश्वनाथ का दर्शन उन्हें नसीब नहीं था। वह शहर से दूर ही रह कर गंगा नहा लेते थे। हमारे गुरुदेव भी उसी बनारस में घूम-घूम कर भागवत बांच-बांच कर जीवन यापन करते थे। शांति निकेतन भी गए पढा़ने तो वहां कोई अच्छी तनख्वाह नहीं मिलती थी। पचास रुपए में कोई बड़े परिवार का खर्च कैसे चला सकता था?वह चलाते थे। तमाम जगहों पर वह लिखते भी रहते थे। बनारस आए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे।बनारसी राजनीति के शिकार हो कर यहां से भी बर्खास्त कर दिए गए। चंडीगढ़ जाना पड़ा उन्हें फिर पढा़ने के लिए। कहते हैं काशी में मरने से मुक्ति मिलती है। पर हमारे गुरुदेव को मुक्ति नहीं मिली। जैसे कबीर काशी छोड़ मगहर में मरे हमारे गुरुदेव भी दिल्ली में मरे।

हजारी प्रसाद द्विवेदी और उन की रचनाओं से जुड़ी कई अनछुई बातें बड़े मोहक अंदाज़ में आज नामवर ने कहीं। बड़ी शिद्दत और नफ़ासत से । न सिर्फ़ वह डूब कर बोल रहे थे बल्कि सुनने वालों को भी उस में डुबकी लगवा रहे थे। किसी शिष्य का गुरु को ऐसा अवदान मैं पहली बार देख रहा था। और भींग रहा था। बतर्ज़ कबीर बरसे कंबल भींजे पानी। वह व्यौरे पर व्यौरे ऐसे परोसते गए जैसे कोई स्त्री रसोई परोसे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और राधाबल्लभ त्रिपाठी तक वह ले गए। विश्वनाथ त्रिपाठी के व्योमकेश दरवेश की भी चर्चा की। उन के उपन्यासों और उन की संस्कृत कविताओं की बात की। कहा कि उन के उपन्यासों में भी कविता है। इस बार नामवर के बोलने की खासियत यह भी थी कि वह बिखरे नहीं, कुछ भूले नहीं। उम्र का प्रभाव आज गायब था। अपेक्षतया कम समय बोले लेकिन हम जैसे सुनने वाले गदगद हो गए। और तृप्त हो कर घर लौटे। हालां कि मुद्रा जी भी नागर जी के शिष्य कहे जाते हैं। पर उन्हों ने आज नागर जी के नाम पर जो बड़बोलापन और बदमगजी की वह भी नहीं भूलने वाली है। जाने क्या है कि वह धारा के खिलाफ़ बोलने के चक्कर में इधर कुछ वर्षों से वह निरंतर कुछ का कुछ इस अंदाज़ में बोल जाते हैं कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है। वह फ़तवा जारी कर बैठते हैं बिना किसी तर्क या आधार के। कई बार वह अपनी विद्वता का दुरुपयोग करते हुए मिलते हैं। खास कर इधर हिंदी कवियों और लेखकों को ले कर उन का धिक्कार भाव बहुत जागा है। श्रीलाल शुक्ल से जो वह शुरु हुए हिंदी लेखकों की धुलाई पर तो प्रेमचंद तक की धुलाई पर उतर आए। भगवती चरण वर्मा पर भी वह फ़तवा जारी कर चुके हैं। बता चुके हैं कि वह जनसंघी और सामंती लेखक थे। वह बिना रचनाओं का ज़िक्र किए, बिना रचनाओं की पड़ताल किए किसी भी के लिए कुछ भी फ़तवा जारी करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। और बिलकुल लगभग कुतर्क करते हुए। मुद्रा जी एकला चलो की धुन में यह भी भूल जाते हैं कि उन्हें आखिर जाना कहां है? एक समय वह लोहियावादी कहे जाते थे पर लोहिया को भी बाद में पानी पी कर कोसने लग गए। तब जब कि वह खुद बताते हैं कि लोहिया जी ने उन का विवाह भी करवाया था। अभी बीते साल कथाक्रम के एक आयोजन में वह कह गए कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान हिंदी कवि भजन लिख रहे थे। आज़ादी की कविताएं या क्रांतिकारी कविताएं तो बस उर्दू में लिखी जा रही थीं। फ़ैज़, इकबाल से लगायत कई नाम उन्हों ने गिना दिए और कहा कि हिंदी में उस समय भजन लिखी जा रही थी। वह मैथिलीशरण से लगायत दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद , पंत, भगवतीचरण वर्मा आदि सभी को भूल गए। ऐसे ही तमाम मौकों पर वह अखबारी सुर्खियां बटोरने वाले बयान दे जाते हैं। भक्ति साहित्य, संस्कृत साहित्य, वेद, उपनिषद, भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, तुलसी आदि से तो उन का बैर भाव जग जाहिर है।स्थापित सत्य है उन का। बहुतों का। पर दिक्कत यह है कि कर्म कांड आदि का विरोध करते-करते वह प्रेमचंद, लोहिया आदि की भी खटिया खड़ी करने में संलग्न हो जाते हैं। विरोध करने के लिए विरोध करने लग जाते हैं। तो बहुत मुश्किल होती है। नहीं सच यह है कि उन के जैसे पढे़ और जानकार बहुत कम लोग रह गए हैं। मैं मानता हूं कि मुद्रा जी का अध्ययन नामवर जी से कम नहीं ज़्यादा ही होगा। पर वह जो बोलने में अतिरेक पर अतिरेक कर जाते हैं वह हम जैसे उन के प्रशंसकों पर कई बार भारी पर जाता है। प्रेमचंद को ले कर तो उठे उन के उबाल को वीरेंद्र यादव ने मानीखेज़ टिप्पणी लिख कर उन्हें शांत कर दिया था। पर भगवती बाबू और अमृतलाल नागर पर उन्हें मकूल जवाब मिलना अभी बाकी है। हां लोहिया पर भी। खास कर इस अर्थ में भी कि जब नामवर जी कह रहे हों कि परंपरा एक वचन नहीं बहुवचन है।

जैसे मुद्रा जी जब नागर जी पर बोलने आए तो कहने लगे कि ऐसे समारोहों में दिक्कत यह है कि झूठ बहुत बोलना पड़ता है। सुनने में बात बहुत अच्छी लगी। पर यह क्या वह तो सचमुच झूठ पर झूठ बोलने पर आमादा हो गए। नागर जी के लेखन पर जैसे उन्हों ने फ़तवा ही जारी कर दिया कि वह प्रथम श्रेणी के लेखक नहीं है। और यह बात जब उन्हों ने एकाधिक बार कही तो किसी ने टोकते हुए पूछा भी कि यह प्रथम श्रेणी का लेखन क्या होता है? पर मुद्रा इसे टाल गए। वह दास्तोवस्की और टालस्टाय आदि का नाम उच्चारने लगे। अपने पूरे भा्षण में वह सिर्फ़ फ़तवा ही जारी करते रहे। नागर जी की किसी रचना का नाम लिए बिना उन्हों ने दूसरा फ़तवा जारी किया कि उन का लेखन पुरातात्विक महत्व का है। फिर उन्हों ने एक वाकया बताया कि एक दिन जब वह नागर जी से मिलने गए तो वह लोहे का बक्सा खोले मिले। उन्हों ने पूछा कि यह क्या? तो नागर जी ने कई कागज़ दिखाते हुए कहा कि जब तुम मेरी जीवनी लिखोगे तो यह सब काम आएगा। तो नागर जी की पत्नी जो वहीं बैठी थीं, बोलीं कि सुभाष जो भी लिखना सच-सच लिखना। ज़िक्र ज़रुरी है कि मुद्रा जी का असली नाम सुभाष गुप्ता है। खैर फिर मुद्रा जी ने इस सच को नागर जी की विपन्नता से जोड़ा। नागर जी के रेडियो की नौकरी छोड़ने का भी व्यौरा बांचा मुद्रा जी ने। फिर उन के व्यक्तित्व पर भी वह ऐसे बोले जैसे नागर जी की सहृदयता या मिलनसारिता आदि भी उन की अपनी नहीं थी। वह बताने लगे कि नागर जी पर वासुदेवशरण अग्रवाल आदि का प्रभाव था। हालां कि यह भी शोध का दिलचस्प विषय होगा कि मुद्राराक्षस के व्यक्तित्व पर आखिर किस का प्रभाव है जो अपनी सारी विद्वता के बावजूद वह बिखर-बिखर जाते हैं। किसी बहस को रचनात्मक बनाने के बजाय विवादित बना कर अधूरा छोड़ देते हैं। और कि बहस के बजाय फ़तवेबाज़ी को तलवार बना लेते हैं। फ़ासिज़्म का विरोध करते-करते खुद अलोकतांत्रिक हो जाते हैं। असहिष्णु हो जाते हैं। फ़ासिस्ट हो जाते हैं। अपनी बात तो वह चाहते हैं कि हर कोई सुने पर वह खुद किसी और की बात सुनने से परहेज़ कर जाते हैं। उन को अगर गुलाब पसंद है तो चाहते हैं कि पूरे बागीचे में सिर्फ़ गुलाब ही हो। यह भला कैसे हो सकता है? वह यह भूल जाते हैं कि किसी और की पसंद कुछ और भी हो सकती है। और कि उस की पसंद को आप भले न पसंद करें, कम से कम सुन तो लें। पर उन को यह सुनना भी गवारा नहीं होता। क्या यह भी एक किस्म का फ़ासिज़्म नहीं है मुद्रा जी? चलिए इस बात को भी दरकिनार कर देते हैं। पर यह तो मुद्रा जी आप भी जानते ही हैं किन मौकों पर क्या बात कहनी चाहिए। तो यह भी जानना क्या अपराध है कि किन मौकों पर क्या बात नहीं कहनी चाहिए? दुर्भाग्य से जानते तो आप यह भी हैं पर अमल में लाते नहीं इन दिनों। अफ़सोस इसी बात का है।

सुनता हूं कि मुद्रा जी एक समय नागर जी से बाकायदा और नियमित डिक्टेशन लेते थे। नागर जी की आदत थी बोल कर लिखवाने की। एक समय मुद्राराक्षस और अवध नारायण मुदगल नागर जी का डिक्टेशन लेने के लिए जाने जाते थे। घर में कुमुद नागर, अचला नागर और शरद नागर ने भी उन के डिक्टेशन खूब लिए हैं। खैर इसी कारण से या किसी और कारण से सही मुद्राराक्षस नागर जी के शिष्य कहे जाते रहे हैं। पर आज उन्हों ने अपनी फ़तवेबाज़ी के गुरुर में नागर जी की सारी रोशनाई धो कर बहा दी अफ़सोस इसी बात का है। मुद्रा जी को जाने कोई बताने वाला है कि नहीं कि साहित्य या कोई भी रचना का कोई कैरेट या डिग्री नहीं होती। पसंद या नापसंद होती है। यह कोई इम्तहान नहीं है कि आप किस श्रेणी में पास हुए। रचना को रचना ही रहने दीजिए मुद्रा जी। अध्ययन एक चीज़ है, उस का दुरुपयोग दूसरी चीज़। जीवन में ज़िद चल जाती है आप की तो ज़रुर चलाइए पर यह फ़तवेबाज़ी की ज़िद अब सार्वजनिक मंचों पर ठीक बात नहीं लगती। नागर जी बड़े उपन्यासकार हैं। रहेंगे। किसी मुद्रा की फ़तवेबाज़ी उन्हें खारिज कर फ़ुटपथिया साबित नहीं कर देगी। बूंद और समुद्र से नाच्यो बहुत गोपाल, खंजन-नयन, मानस के हंस, अग्निगर्भा, करवट आदि उन की तमाम-तमाम रचनाएं उन के पाठकों में ऐसे ही हैं जैसे हवा-पानी, धरती-आकाश। हां फिर भी अगर आप को लगता है कि भगवती चरण वर्मा या अमृतलाल नागर आदि ने इतना खराब लिखा है कि उन्हें खारिज़ कर देना चाहिए तो मुद्रा जी बाकायदा उन की रचनाओं के हवाले से तार्किक ढंग से लिख-पढ़ कर खारिज करिए आप का स्वागत है। पर बार अधकचरे फ़तवे जारी कर गगनविहारी बयान जारी कर यह सब करना आप की विद्वता को शूट नहीं करता। लिखा तो कभी प्रेमचंद को ले कर अलीगढ़ के शैलेष ज़ैदी ने भी था। पर क्या प्रेमचंद की मूर्ति खंडित हो गई? हां शैलेष ज़ैदी अब कहां हैं, कम ही लोग जानते होंगे। माफ़ कीजिएगा मुद्रा जी अगर किन्हीं क्षणों में आप को किसी दिनकर, किसी गिरिजा कुमार माथुर या किसी श्रीलाल शुक्ल या किसी और ने भी बैर भाव में या किसी और भाव में ही सही काट लिया है तो उस का दंश जब-तब जिस-तिस पर बार-बार उतारना आप की सेहत और हिंदी साहित्य की सेहत के लिए ठीक नहीं है। उस दंश को बिसारिए और जानिए कि आप भी हमारी और हिंदी साहित्य की शान हैं, धरोहर हैं हमारी। यही बने रहिए। जैसे नामवर जी के पास भी अंतर्विरोध बहुतेरे हैं। बावजूद इस सब के नामवर जी ने आज अपने गुरुदेव के प्रति उन की रचनाओं को याद कर, उन की तकलीफ़ और उन के संघर्ष को याद कर उन के लिए मन में एक मिठास घोली,मन में और सम्मान बोया। आप भी नागर जी के लिए मिठास भले न घोलते, सम्मान भले न बोते पर बात-बेबात कसैलेपन से तो बच ही सकते थे। माफ़ कीजिए मुद्रा जी आज जो भी कुछ हुआ उसे देखते हुए अपनी बात एक बार फिर से दुहराने को मन कर रहा है कि आज की तारीख में अगर शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा। मुद्राराक्षस जैसा नहीं।आमीन !

Monday, 20 August 2012

बेनी की बेलगाम बयानबाज़ी के मायने और बहाने

जैसे हिंदी फ़िल्मों से अब कहानी गुम है, वैसे ही अब राजनीति से विचार गुम हैं। सामाजिक न्याय की राजनीति ने इस विचारहीन राजनीति को और पंख दिए हैं । विचार की जगह जाति की राजनीति ने देश भर में अब डंका बजा रखा है। इस जातीय राजनीति के गठजोड़ में सांप्रदायिकता विरोध के बुखार की छौंक की तफ़सील और जोड़ लीजिए। सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं। फिर आप बेलगाम हो कर चाहे जो बोलिए, जो करिए, राज आप का है। बेनी प्रसाद वर्मा का मंहगाई से खुश होने वाला ताज़ा बेलगाम बयान इसी राजनीति की एक कड़ी है।

बेनी वर्मा आखिर हैं क्या? और कि राजनीति में उन की हैसियत क्या है? नहीं जानते हैं तो जान लीजिए कि कुर्मी समाज उन को चाहे जो माने, वह अपने को कुर्मी समाज का राजा मानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कल्याण सिंह अपने को लोधों का राजा मानते हैं। कल्याण सिंह मिट गए हैं पर उन का यह गुमान अभी भी नहीं गया है। बेनी प्रसाद वर्मा अभी मिट-मिट कर भी खडे़ हैं। तो इस लिए कि अभी वह कांग्रेस में हैं। जिस दिन निकल जाएंगे या निकाल दिए जाएंगे कांग्रेस से तो उन को भी अपना गुमान नापने का थर्मामीटर मिल जाएगा।

एक समय मुलायम के मुंहलगे रहे बेनी वर्मा को आज मुलायम ही की नाक में फांस लगाने के लिए कांग्रेस ने पाल रखा है। किसी पालतू की तरह। हालां कि उन के चेहरे पर विनम्रता की जगह जो अहंकार का सागर छलकता दिखता रहता है नित्य-प्रति, वह उन के कुर्मी होने के गुमान का है। उन को लगता है कि वह कुर्मियों के श्रेष्ठ नेता हैं। बल्कि इस से भी दो कदम आगे की भी वह सोच जाते हैं कि कुर्मीजन उन की खेती हैं, कुर्मी जाति के लोग उन की प्रजा हैं, और वह उन के राजा। हालां कि उन का यह गुमान एकाधिक बार उन की बाराबंकी में उन के कुर्मी भाई लोग तोड़ चुके हैं, उन को और उन के बेटे को चुनाव हरवा कर। अपनी पारंपरिक सीट मसौली से वह भी चुनाव हार गए। बाद में बेटा भी हारा। दरियाबाद से भी बारी-बारी बाप बेटे हारे। पर उन का गुमान है कि जाता नहीं। हालां कि उन के साथ के कुछ दौरों में मैं ने एक समय देखा है कि बाराबंकी के कुर्मी समाज के लोग उन को लगभग देवता का दर्जा देते रहे थे। वह जाते भी तब गांव-गांव थे। और एक-एक आदमी को नाम से गुहारते थे। उन के बच्चों को गोद में ले कर खिलाने लगते थे। यह तब की बात है जब मुलायम राज में वह पी डब्ल्यू डी मिनिस्टर थे। पर दिक्कत यह हुई कि बरसों-बरस मिनिस्टर रहने के बावजूद उन्हों ने अपनी ज़ेब तो भरपूर भरी, पर बाराबंकी को ठीक लखनऊ से सटा होने के बावजूद विकास से वंचित रखा। कुछ सड़क ज़रुर बनवाई। और जब संचार मंत्री थे तब फ़ोन लाइन पहुंचाई। पर फ़ोन रखने की हैसियत नहीं दिलवा पाए। खास कर बेनी वर्मा का क्षेत्र तो आज भी बहुत पिछड़ा हुआ है। इसी पिछडे़पन की सज़ा बाराबंकी बेनी वर्मा और उन के बेटे को चुनाव हरा कर देता रहा है। अंतत: बेनी को बरास्ता बहराइच के कैसरगंज जीतते- हारते हुए अपनी पार्टी बना कर अयोध्या से हार पर हार भुगतते हुए अब कांग्रेस के टिकट पर गोंडा से सांसद होने की राह पकड़नी पडी़ है। अब तो बाराबंकी के सांसद पी.एल.पुनिया हैं। पर बेनी अब भी बाराबंकी को अपनी जागीर मानते हैं। अभी बीते विधानसभाई चुनाव में भी बेनी बेलगाम हुए थे। पहले तो उन्हों ने मुस्लिम आरक्षण पर शहादत भरा बयान दे कर सलमान खुर्शीद की हां में हां मिलाई और फिर चुनाव आयोग से माफ़ी मांग कर पिंड छुड़ाया। और फिर तभी एक बयान में वह बह कर कह गए कि पुनिया तो बाहरी हैं, उन का बाराबंकी से क्या लेना-देना? कांग्रेस के कई नेताओं को पुनिया की पैरवी में उतरना पड़ा और बयान देना पड़ा कि पुनिया बाहरी नहीं हैं। दिक्कत यह है कि आई. ए.एस. भले रहे हैं पुनिया। पर पुनिया भी उसी जातिवादी मंथन से निकले हुए रत्न हैं तिस पर सोने पर सुहागा यह कि वह दलित भी हैं। दूसरे जैसे बेनी का उपयोग कांग्रेस मुलायम की नाक में फांस लगाने के लिए करती है ठीक वैसे ही पुनिया का उपयोग मायावती की नाक में फांस लगाने के लिए करती है। इसी बाराबंकी से एक बडे़ मकबूल शायर हुए हैं खुमार बाराबंकवी। उन्हीं के एक शेर का मिसरा है कि मज़बूरियों ने हाय कितने फ़रिश्ते बनाए हैं। तो कांग्रेस की मज़बूरियों ने बेनी प्रसाद वर्मा और पी.एल.पुनिया को फ़रिश्ता बना रखा है। अब यह गठबंधन की ही मज़बूरी है कि मुलायम के कठोर वचन भी कांग्रेस को मीठे लगते हैं और उन पर नकेल लगाने के लिए बेनी प्रसाद वर्मा जैसे लोग पालतू बना कर रखे जाते हैं। बेनी प्रसाद वर्मा का नया टास्क था कि मुलायम के तीसरे मोर्चे की दहाड़ की हवा वह अपने कुतर्क से ही निकालें। यह टास्क तो उन्हों ने बखूबी पूरा किया पर कुर्मियों का राजा होने का अहंकार उन्हें ज़रा बहका गया। और वह टिमाटर के बढ़ते भाव पर आ गए। हर्षित हो गए मंहगाई पर। पिछड़ों की राजनीति और किसान याद आ गए तो उन्हों ने किसानों में अपनी ऊंची करने के चक्कर में उन के कंधों पर अपना पैर रख दिया। और ज़रा क्या पूरा फिसल गए। अब जैसे बीते चुनाव में सलमान खुर्शीद के मुस्लिम आरक्षण वाले बयान की पैरवी और बचाव में बेनी उतरे थे, ठीक वैसे ही अब की बेनी की पैरवी और बचाव में सलमान खुर्शीद उतर आए हैं। सलमान खुर्शीद तो खैर सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील हैं पर बहुत कम लोग जानते हैं कि बेनी प्रसाद वर्मा भी वकील हैं। बी.ए., एल.एल.बी.। अलग बात है कि उन्हों ने विधायक बनने के बाद एल.एल.बी. की पढ़ाई की और बाकायदा प्रैक्टिस तो कभी करते किसी ने देखा नहीं। पर एक बात तय है कि दोनों ही ने एक दूसरे की पैरवी बहुत ही खराब ढंग से की है। अब जातिवादी राजनीति का तावा गरम है सो सरकार कोई भी हो अपनी रोटी तो उस पर सेंकेगी ही पर यह ज़रुर है कि अगर वैचारिक राजनीति का ज़माना होता तो अब तक सलमान खुर्शीद को और अब बेनी वर्मा को मंत्री पद से निश्चित ही हाथ धोना पड़ गया होता। लेकिन सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक विरोध की राजनीति के नाम पर जातिवादी राजनीति का यह स्वर्णकाल चल रहा है। सो सब कुछ ज़ायज़ हो गया है।

नहीं सोचिए कि किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं, बिचौलिए तिजोरी भरते जा रहे हैं और एक कैबिनेट इस्पात मंत्री इस्पात जैसी कड़ाई और पूरी बेशर्मी से कहता है कि मंहगाई से उसे खुशी होती है। अभी कुछ दिन पहले ऐसे ही अपने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहूलवालिया जो लाखों के बाथरूम इस्तेमाल करते हैं और बाईस रुपए कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर मानते हैं ने पेट्रोल के दाम बढने पर कहा था कि यह अच्छी खबर है। आहूलवालिया तो आई.ए.एस. अफ़सर रहे हैं, ज़मीन से कटे हुए आदमी हैं पर बेनी वर्मा तो गन्ना किसानों की लड़ाई लड़ते हुए राजनीति में आए हैं। पहली बार जब वह उत्तर प्रदेश में मंत्री बने भी थे तो गन्ना मंत्री ही बने थे। लाख जातिवादी राजनीति के दीमक उन के दिमाग में घूमते हों पर इतना तो वह भी जानते ही हैं कि किसान को उस की पैदावार की क्या कीमत मिलती है? और कितना बिचौलिए और व्यापारी को? किसान को तो आज भी न्यूनतम समर्थन मूल्य ही मिलता है जैसे तैसे मर-खप कर। पर बाकी व्यापार मैक्सिमम रिटेल प्राइस पर चलता है। यह देश कृषि आधारित देश है। पूरी अर्थव्यवस्था खेती और मानसून के भरोसे टिकी पडी़ बताई जाती है। पर किसानों की पैदावार के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार हर साल ऐसे घोषित करती है गोया किसानों को भीख दे रही हो। तिस पर भी गेहूं खरीद या धान खरीद या फिर गन्ना खरीद में किसान क्या क्या सहता भुगतता है, वह ही जानता है। खाद-बीज तो वह अधिकतम मूल्य पर पाता है पर अपनी उपज वह न्यूनतम मूल्य पर देता है। कुछ खास पैदावार को छोड़ कर बाकी पैदावार पर तो उसे वह न्यूनतम मूल्य भी नहीं मिलता। तिस पर अनाज का सड़ जाना, बोरा न होना, रिश्वत देना आदि सरकारी समस्याएं अलग हैं। चीनी मिलें गन्ना किसानों का जो शोषण करती हैं, सालों-साल बकाया लगाती हैं, यह भला किस से और किस सरकार से छुपा है? जानते सब हैं। पर सरकारी नीतियां सारी की सारी गरीबों और किसानों के खिलाफ़ हैं। अगर न होतीं तो बेनी प्रसाद वर्मा जैसे जातिवादी नेता कांग्रेस के लिए उपयोगी नहीं होते और न ही उन की यह हिम्मत होती यह कहने की कि मंहगाई से उन्हें खुशी होती है। जनता उन्हें भून कर खा जाती। बहुत दिन नहीं हुआ मायावती राज में चित्रकूट में कुख्यात अपराधी ददुआ एक पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। कुछ पुलिसकर्मी भी इस मुठभेड़ में शहीद हुए थे। पर बेनी प्रसाद वर्मा इस मुठभेड़ को फर्ज़ी करार देते हुए खून के आंसू रोए थे। तो सिर्फ़ इस लिए कि ददुआ कुर्मी समुदाय से था। बेनी की नज़र कुर्मी वोटों के लिए कलप रही थी। एक कुख्यात डाकू के मारे जाने पर उन की बेताब रूदाद तो दिखती है पर देश के गरीब किसानों और आमजनों के लिए मंहगाई उन के हर्ष का सबब कैसे बन जाती है भला? क्या बेनी और उन के जैसे नेता ज़मीन और जनता से इतना कट गए हैं?

वह कहते हैं कि लैपटाप के दाम, मोबाइल के दाम बढ़ने पर लोग कुछ नहीं कहते पर टिमाटर के दाम बढने पर हल्ला करने लगते हैं। टमाटर को टिमाटर कह कर वह अपना गंवई लुक भी देना नहीं भूलते। सत्ता का नशा उन पर इस कदर सवार है कि अपनी गलतबयानी पर उन्हें कोई अफ़सोस भी नहीं है। किसी पेशेवर बेशर्म की तरह कह रहे हैं कि उन के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। एक समय मुलायम के राज में वह नंबर दो हुआ करते थे। पर जब मुलायम सिंह के पास घुन बन कर अमर सिंह समाजवादी पार्टी में अवतरित हुए तो वह धीरे-धीरे हाशिए से भी बाहर हो गए। राजा से प्रजा बन गए। बात यहां तक पहुंची कि उन्हें मुलायम से बगावत कर अपनी पार्टी बनानी पडी़। हालां कि तब के चुनाव में वह मधु कोड़ा की तर्ज़ पर पर मुख्यमंत्री बनने का सपना भी जोड़ बैठे थे। पर मुलायम के बिना उन की राजनीतिक ज़मीन खिसक गई। उन की पार्टी का कोई भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया। खुद भी ज़मानत नहीं बचा पाए। मज़बूर हो कर कांग्रेस की नाव पर सवार हुए बेनी वर्मा। और कांग्रेस ने भी उन्हें लगभग अपमानित करते हुए राज्यमंत्री बनाया। तब जब कि उसी केंद्र में मुलायम के साथ कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। देवगौड़ा के राज में संचार मंत्री। तो भी मुलायम और अमर सिंह को सबक सिखाने की गरज़ से वह यह अपमान पी गए। बाद में कांग्रेस ने भी उन के समर्पण और उपयोगिता को देखते हुए प्रमोट कर उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया और मुलायम के खिलाफ़ बयानबाज़ी के लिए घोड़ा बना लि्या। बीते चुनाव में भी बेनी चुनाव सभाओं में अपने को बतौर मुख्यमंत्री ही पेश करते और सपना जोड़ते रहे। राहुल गांधी भी उन्हें भाव देते रहे और अपने साथ रखते रहे। पर कांग्रेस का तंबू जब चुनाव में उखड़ गया तो बेनी का मुख्यमंत्री बनने का सपना भी उजड़ गया। लेकिन मुलायम को घाव देने के लिए उन के तरकश से तीर कभी खत्म नहीं हुए। न शायद होंगे। मुझे लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क की एक सभा भुलाए नहीं भूलती। उस सभा में सभी थे पर बेनी प्रसाद वर्मा नहीं थे। वह अमर सिंह का समाजवादी पार्टी में अवतार का काल था। बेनी अपनी उपेक्षा से नाराज हो कर नहीं आए थे। मुलायम ने कई संदेश और संदेशवाहक भेजे बेनी को बुलाने खातिर। पर बेनी नहीं आए। अंतत: मुलायम ने मंच पर माइक संभाला और ऐलान किया कि आप लोग यहीं रुकें मैं बेनी बाबू को लेने जा रहा हूं। मुलायम मंच और जनसभा छोड़ कर गए और लौटे तो साथ में बेनी प्रसाद वर्मा को ले कर ही लौटे। फिर मैं ने बेनी बाबू को लखनऊ की एक और जनसभा में देखा। गोमती नदी के किनारे लक्ष्मण पार्क में। हरिवंश राय बच्चन के नाम डाक टिकट जारी करने आए थे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। अमिताभ बच्चन भी सपरिवार थे। मुलायम मय अमर सिंह अपने मंत्रिमंडल के साथ। खूब भीड़-भाड़ भी। और उसी भीड़-भाड़ में बेनी प्रसाद वर्मा भ। उन के लिए वी.आई.पी. पास की भी व्यवस्था नहीं थी। वह जनता गैलरी में दिखे। जब कि एक से एक नवोधा आगे की लाइन में। वापसी में मैं ने उन से पूछा भी तो आकाश निहारते हुए वह बोले, 'जहां का पास होगा वहीं तो बैठूंगा।' इस के बाद वह कुछ नहीं बोले। मैं तभी समझ गया कि अब बेनी प्रसाद वर्मा बहुत दिनों तक नहीं रहने वाले मुलायम के साथ। पर जल्दी ही वह फिर मुख्यधारा में आते दिखे। पर वह चुनावी मौका था। बसपा राज आ गया था। बेनी अब मुलायम के लिए फिर दूध की मक्खी हो गए। गोमती में तब से अब तक बहुत पानी बह गया। उसी पानी में मुलायम और बेनी के संबंध भी बह गए। और अब वही बेनी कांग्रेस में रह कर मुलायम की नाक में फांस लगाने के लिए यूज़ हो रहे हैं। और जो चाह रहे हैं अनाप-शनाप बोल रहे हैं। आखिर सामाजिक न्याय है। वे लोग जाग चुके हैं। उन का राज है। महगाई किसी को मार रही हो तो मारे, उन की बला से। उन को खुशी है कि मंहगाई बढ़ रही है। आप उन की जय-जयकार लगाइए। जय हो !

Friday, 10 August 2012

चाचाओं के चक्रव्यूह में अखिलेश और फिर चोरों के चक्रव्यूह में उत्तर प्रदेश

यह अजब है कि उत्तर प्रदेश में एक बहुमत की सरकार के बावजूद इस का कोई एक खेवनहार नहीं है। अराजकता और अंधेरगर्दी की सारी हदें यहां जैसे बाढ़ में विलीन हो गई हैं। ठीक वैसे ही जैसे इस बार यहां बारिश कम हुई तो सूखा भी पड़ा और अब बाढ़ भी आ गई है। लेकिन प्रदेश सरकार के पास न तो सूखा से निपटने की कोई कार्य-योजना थी और न अब बाढ़ से निपटने की कोई कार्य-योजना है। जैसे कि अभी जब गेहूं खरीद के समय बोरे नहीं थे, तो सरकार ने कहा कि पिछली सरकार ने इंतज़ाम नहीं किया। और जब गरमी में बिजली का बोझ बढा़ तो सरकार ने फिर पिछली सरकार के सिर ठीकरा फोड़ दिया। और सरकार के पिता श्री मुलायम तो दो कदम और आगे चले गए। बोले कि पिछली सरकार के अधिकारियों की बदमाशी से बिजली की दिक्कत हो रही है। पर अभी जब ग्रिड फेल होने से आधे देश में देश में बिजली गुल हो गई तो सब ने एक सुर से उत्तर प्रदेश सरकार पर आरोप मढ़ दिया कि उत्तर प्रदेश के ज़्यादा बिजली लेने से यह गड़बडी़ हुई तो क्या सरकार, क्या उस के पिताश्री सभी खामोशी साध गए।

सच यह है कि अखिलेश को मुलायम ने मुख्यमंत्री बनवा कर अपने पारिवारिक विद्रोह को दबाने और पारिवारिक विरासत को संभालने का काम कर तो लिया पर अखिलेश को सर्व संपन्न मुख्यमंत्री बनने की राह में इतने सारे रोडे़ बिछा दिए हैं कि अखिलेश क्या साक्षात यदुवंशी कृष्ण भी जो आ जाएं तो वह भी सरकार नहीं चला पाएंगे इन स्थितियों में। अपनी मर्जी से अखिलेश न तो एक मंत्री नियुक्त कर पाए, न ही उन को पोर्टफ़ोलियो दे पाए। मंत्री तो मंत्री एक अधिकारी भी वह अपनी पसंद का नहीं नियुक्त कर पाए हैं अभी तक। वास्तव में तो अखिलेश अपने पिता का खड़ाऊं राज चला रहे हैं। इसी दबाव में वह कई बार मूर्खता भरे फ़ैसलों का ऐलान कर बैठते हैं। वह चाहे शाम 7 बजे के बाद बाज़ार की बिजली काट देने की घोषणा हो या फिर विधायकों को विधायक निधि से बीस लाख की कार खरीदने का फ़ैसला हो और पलट कर उसे वापस लौटा लेने का मामला हो या फिर मायावती के तमाम फ़ैसलों को पलट देने का मामला हो। कानून व्यवस्था पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। अधिकारियों-कर्मचारियों में यादव अधिकारियों-कर्मचारियों का दबदबा है ठीक वैसे ही जैसे मायावती राज में दलित अधिकारियों-कर्मचारियों का दबदबा रहा था। सरकारी अमले की दो तिहाई ऊर्जा इस जातीय संतुलन में ही बर्बाद है। काम क्या खाक होगा? तिस पर शिवपाल सिंह और आज़म खान जैसे अखिलेश के चाचाओं का सत्ता के समानांतर केंद्र बन जाना। अखिलेश को यह और मुलायम के तमाम सहयोगी रहे मंत्री मुख्यमंत्री स्वीकार ही नहीं पाए हैं। वह उन्हें बच्चा ही मानते हैं। और यह तब तक चलता रहेगा जब तक मुलायम प्रदेश राजनीति से खुद को अलग नहीं करते। और कि अखिलेश का गर्भनाल काट कर उन्हें कुछ कडे़ फ़ैसला लेना नहीं सीखाते। पर चाचा तो चाचा लोग अखिलेश तो अनीता सिंह जैसी चाचियों से भी तबाह हैं। अनीता सिंह उन की सचिव औपचारिक तौर पर भले हों, आदेश तो वह मुलायम सिंह से ही लेती हैं। और जो कभी-कभार ज़रुरत पड़ जाती है तो अखिलेश से फ़ाइलों पर औपचारिक आदेश के एवज़ में सिर्फ़ हस्ताक्षर करवा लेती हैं। ठीक वैसे ही जैसे कभी बसपा के सहयोग से मुलायम सिंह यादव जब मुख्यमंत्री बने े तो उन के एक सचिव थे पी.एल.पुनिया जो आजकल कांग्रेस के सांसद हैं और अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष भी। तो इन पी.एल. पुनिया को तब मुख्यमंत्री का सचिव कांशीराम ने बनवाया था। और तब के दिनों पुनिया मुलायम के बजाय कांशीराम से आदेश लेते थे और मुलायम से सिर्फ़ दस्तखत करवाते थे। तो इतिहास जैसे फिर अपने को दुहरा रहा है।

तो आखिर क्या करें अखिलेश यादव?

सिर्फ़ मायावती की शुरु की हुई और पूरी हुई योजनाओं का लोकार्पण और उन के द्वारा बनाए गए ज़िलों का नामांतरण? अखिलेश युवा हैं और उन की नियति पर भी अभी तक के काम-काज को देखते हुए सवाल उठाना विपक्ष के लिए भी मुश्किल है या किसी राजनीतिक पर्यवेक्षक को कोई निर्मम टिप्पणी करना भी अभी मुश्किल है। हां, उन के अनिर्णय की नोटिस लेना अब अनिवार्य हो गया है। वह अगर अभी और बिलकुल अभी नहीं चेते और जो कुछ कड़े फ़ैसले लेने का फ़ैसला नहीं लेते तो उन को बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। इस में कोई दो राय नहीं।

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व के शुरुआती दिनों की याद आ जाती है अखिलेश की दुर्दशा को देख कर। थोडी़ पृष्ठभूमि की याद कर लें। नेहरु के निधन के बाद स्वाभाविक उत्तराधिकारी की तलाश में लालबहादुर शास्त्री और मोरार जी देसाई के नाम उभरे थे। इंदिरा की दावेदारी दबी-दबी रह गई थी। अंतत: तमाम उठापटक के बाद लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री हो गए थे। पर जब ताशकंद से लालबहादुर शास्त्री के निधन की खबर इंदिरा गांधी को देर रात क्या लगभग भोर में मिली तो इंदिरा ने तुरंत बिसात बिछा ली थी अपने प्रधानमंत्री बनने के लिए। और उन्हों ने शास्त्री जी के निधन की पहली सूचना अपने पिता नेहरु के मित्र और मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र को फ़ोन कर के दी, पिता से उन के संबंधों का हवाला दिया और कहा कि वह फ़ौरन दिल्ली पहुंचे और उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रयत्न शुरु करें। द्वारिका प्रसाद ने भी देर नहीं की। जब इंदिरा का फ़ोन उन्हें मिला तो भोर के चार बज रहे थे। और वह सुबह के सात बजे वह दिल्ली में इंदिरा के घर उपस्थित थे। योजना बनी। यह बिलकुल स्पष्ट था कि तब मोरार जी देसाई सब से प्रबल उम्मीदवार थे प्रधान मंत्री पद के। कामराज तब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। पहली योजना के तहत द्वारिका प्रसाद मिश्र ने कामराज को ही मोरार जी के बरक्स प्रधानमंत्री पद के लिए खडा़ किया। नाम चल गया। अब मोरार जी और कामराज आमने-सामने थे। कामराज के सामने जाहिर है मोरार जी देसाई बीस पड़ रहे थे। सो अब दूसरे राऊंड में द्वारिका प्रसाद मिश्र ने कामराज को मोरार जी के भारी पड़ने का डर दिखाया। और बताया कि चूंकि उन को हिंदी भी नहीं आती सो वह देश भी ठीक से नहीं चला पएंगे। कामराज द्वारिका प्रसाद मिश्र के डराने में डर भी गए। तब? तब फिर क्या हो? रास्ता भी द्वारिका प्रसाद मिश्र ने कामराज को सुझाया। और इंदिरा का नाम सुझाया। नेहरु से संबंधों का वास्ता दिया और कहा कि आप की बच्ची है। उसे अपना उम्मीदवार घोषित कर दीजिए। अगर जीत गई तो आप की जीत, अगर हार गई तो कह दीजिएगा बच्ची थी। साथ ही यह भी जता दिया कि मोरार जी को अगर पटकनी कोई दे सकता है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ इंदिरा गांधी। और हुआ भी यही। इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री बन गईं। मोरार जी देसाई तब हार गए थे।

अब शुरु हुआ असली खेल। कामराज इंदिरा को बच्ची ही समझते रहे। प्रधानमंत्री मानने को तैयार ही नहीं थे। इंदिरा सुनो ! से संबोधित करते। इंदिरा इधर आओ ! कहते रहते। यह करो, वह करो, फ़रमाते रहते। इंदिरा एक प्रधानमंत्री की बेटी थीं, प्रधानमंत्री का ज़माना देखा था, उन की सचिव रह चुकी थीं, उन का कामकाज संभाल चुकी थीं, प्रधानमंत्री की हनक और उस की गरिमा का भान था उन्हें। जाहिर है कामराज का यह व्यवहार उन्हें नहीं सुहाता था। सो उन्हों ने कामराज योजना बनाई और पहले राऊंड में कामराज को ही निपटाया, कामराज को किनारे किया। इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बना कर आधुनिक चाणक्य बने द्वारिका प्रसाद मिश्र भी इंदिरा को बेटी ही मानते रहे, प्रधानमंत्री नहीं। सो इंदिरा ने दूसरे राऊंड में इस चाणक्य को निपटाया। सिंडीकेट-इंडीकेट और जाने क्या-क्या हुआ। और एक समय वह भी आया कि कांग्रेस में लोग उन्हें इंदिरा इज़ इंडिया कहने लग गए।

तो अब अखिलेश को भी क्या कामराज योजना की तरह ही क्या चाचा योजना की ज़रुरत नहीं आज़मानी चाहिए? समय आ गया है कि अब अखिलेश अर्जुन बन कर अपने चाचाओं-चाचियों के चक्रव्यूह तोड़ कर मुख्यमंत्री की तरह निर्द्वंद्व हो कर, खुल कर काम-काज करें और कि साथ ही अपने पिताश्री के खडा़ऊंराज से मुक्ति लें। नहीं यह तय है कि अगर वह ऐसे ही बने रहे तो कोई उन्हें चाचा चक्रव्यूह में फंस कर अभिमन्यु की तरह बेमौत मरने से रोक नहीं सकेगा। कन्हैयालाल नंदन की एक कविता है, 'तुम्हें नहीं मालूम/ कि जब आमने सामने खड़ी कर दी जाती हैं सेनाएं/ तो योग और क्षेम नापने का तराजू/ सिर्फ़ एक होता है/ कि कौन हुआ धराशायी/ और कौन है/ जिसकी पताका ऊपर फहराई/।' तो इतिहास तो विजेता ही का नाम दर्ज करता है। नहीं होने को उत्तर प्रदेश में श्रीपति मिश्र जैसे नाकारा मुख्यमंत्री भी हो कर गए हैं जिन के राज में कहा जाता था कि, 'नो वर्क, नो कंप्लेंड !' या फिर नरसिंहा राव के प्रधानमंत्रित्व के ज़माने में उन के लिए कहा जाता था कि, ' निर्णय न लेना भी एक निर्णय है !' और बाबरी मस्जिद गिर जाती थी। तो अखिलेश यादव भी कुछ-कुछ वैसी इबारतें दर्ज़ करने की तरफ़ अग्रसर हैं। मंत्रियों की मनमानी बढ़ती जा रही है। चाचा शिवपाल मुलायम के राज में निठारी जैसे कांड के लिए कहते थे कि बडे़-बडे़ शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं घटती रहती हैं तो अब अखिलेश राज में अफ़सरों से कह रहे हैं कि मेहनत कर के चोरी करो। जैसे कभी मायावती सांसदों विधायकों से एक मीटिंग में कह गई थीं कि निधि का पैसा अकेले-अकेले मत खाओ, कुछ हिस्सा हमें भी दे दिया करो। आज़म खां से लिया गया एक ज़िले का प्रभार रातोरात लौटाने को विवश होना पड़ता है मुख्यमंत्री को। इतना कमज़ोर मुख्यमंत्री? जनता में तो यही संदेश जाता है। हालत यह है कि आज़म और शिवपाल अखिलेश के लिए सब से बडे़ स्पीड-ब्रेकर बन कर सरकार में उपस्थित हैं। तो राजा भैया जैसे गले के पत्थर भी बेशुमार हैं। सपा के 111 विधायक तो दागी हैं। और ऐसे में जो मुख्यमंत्री अपने मंत्री परिषद के लोगों को ही काबू न कर सके, अपने अधिकारियों पर ही लगाम न लगा सके, वह मुख्यमंत्री राज क्या चलाएगा। एक मायावती मुख्यमंत्री थीं कि क्या मंत्री, क्या अधिकारी हर कोई उन से थरथराता था। गंवई शब्दावली में कहूं तो यह लोग मूत मारते थे मायावती नाम भर से। और अब? खैर मायावती जो करती थीं वह भी अनुचित था, तानाशाही थी, वह भी नहीं होना चाहिए। पर वह जो कहते हैं कि सरकार चलती इकबाल और धमक से। तो अखिलेश सरकार की न तो कोई धमक है न कोई इकबाल। टका सेर भाजी, टका सेर खाजा वाला आलम है। मनमोहन सिंह से भी गई गुज़री हालत है उत्तर प्रदेश में अखिलेश की। उन की सारी पढाई-लिखाई उन के जाहिल सहयोगियों की भेंट चढ़ गई है। पढे़-लिखे मुख्यमंत्री की जो छाप दिखनी चाहिए, जो समझ दिखनी चाहिए अखिलेश के अब तक के काम-काज में नहीं दिखी है, जो समझ और दृष्टि दिखनी चाहिए वह नदारद है अब तक तो। कभी एक इंजीनियर मुख्यमंत्री थे मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह तो उन के प्रशासन और फ़ैसलों में वह इंजीनियरों वाली चमक देखी जाती थी। आज की तारीख में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इंजीनियर हैं। उन के प्रशासन और फ़ैसलों में भी वह चमक और तुर्शी साफ दिखती है। बिहार की छवि बदल कर रख दी है उन्हों ने। पर यहां हमारे उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी इंजीनियर हैं, वह भी आस्ट्रेलिया के पढे़ हुए। पर न वह चमक है न तुर्शी उन के फ़ैसलों और कामकाज में। न वह विज़न है, न दृष्टि जो उन से दरकार है। चुनाव के समय जैसे पूरी सख्ती से उन्हों ने डी.पी.यादव जैसे बाहुबली को आज़म के फ़ैसले के बावजूद दरकिनार किया था, मोहन सिंह जैसे लोग तब डी.पी.यादव की पैरोकारी में बह गए थे। उसी दमदारी और सख्ती की ज़रुरत उन्हें अब भी है। राजनीतिक रुप से भी और प्रशासनिक रुप से भी। नहीं पापा कहते हैं बडा़ नाम करेगा वह गाते रह जाएंगे और पापा भले उन्हें सौ में सौ नंबर देते रहेंगे, प्रदेश, जनता और इतिहास उन्हें सौ में शून्य दे कर दफ़ना देगा। नंदन जी की ही एक और कविता है:

सब पी गए पूजा नमाज़ बोल प्यार के
और नखरे तो ज़रा देखिए परवरदिगार के
लुटने में कोई उज्र नहीं आज लूट ले
लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूट मार के

तो अखिलेश जी समझाइए अपने चाचाओं और चाचियों को, कि लूटमार के भी कुछ वसूल होते हैं तो सत्ता को साधने के भी। उदाहरण बहुत हैं पर आप के ही एक और चाचा हैं कल्याण सिंह। अच्छे और सख्त शासक होने के बावजूद आप की एक चाची कुसुम राय को नहीं संभाल पाए और दफ़न हो गए। राजनाथ सिंह के शकुनी चाल में फंस कर। तो उन से ही सही सबक लीजिए और साथ ही अपने पिताश्री को भी समझाइए कि अब रामराज का ज़माना नहीं रहा सो खड़ाऊंराज से आप को वह मुक्त कर दें। नहीं अभी आप को वह खडा़ऊं सौंप कर दिल्ली में उपप्रधानमंत्री फिर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का सपना जोड़ कर और फिर तोड़ कर अब आडवाणी के ब्लाग को हाज़िर-नाज़िर मान कर फिर से प्रधानमंत्री बनने का जो सपना जोड़ रहे हैं, जब आप और आप का राज कायम रहेगा, तभी पूरा हो पाएगा। इस लिए भी कि जिस भ्रष्टाचार से आजिज आ कर लोगों ने मायावती को किनारे कर आप को राज थमाया, वह भ्रष्टाचार फिर से फ़न फैलाए खड़ा है। कहीं दोगुनी ताकत से।

एक बात और नोट कर लीजिए अखिलेश जी कि अगर आप अपना निजाम चाक-चौबंद नहीं रख पाएंगे तो पुत्र मोह के मारे मुलायम के पास आप के सौतेले भाई प्रतीक यादव भी एक विकल्प हैं। अलग बात है कि यादव बिरादरी में अभी प्रतीक की स्वीकृति नहीं है। सो इस का लाभ आप को अभी है। पर मुलायम अपनी सत्ता की साध पूरी करने के लिए कब किस से हाथ मिला लें, कब किस को किनारे लगा दें कोई नहीं जानता। वह खुद भी नहीं। पुराने लोगों की तो बात ही क्या नए लोगों में राज बब्बर, अमर सिंह, कल्याण सिंह, आज़म खान, लालू यादव, अजीत सिंह, कांग्रेस, भाजपा, बसपा, वामपंथी और अभी ताज़ा-ताज़ा ममता बनर्जी। बहुत लंबी सूची है। तो कुल मिला कर बात यह कि अपने लिए नहीं न सही, पापा के लिए तो आप को खरा उतरना ही है। इस उत्तर प्रदेश को जो अब चौपट प्रदेश बन चुका है, इस को भी पटरी पर लाना ही है। उत्तर प्रदेश के लोगों को आप से बहुत उम्मीदें हैं। आप में लोग अब नीतीश देखते हैं। लोग उत्तर प्रदेश को बिहार की तरह सकारात्मक ढंग से बदलते हुए देखना चाहते हैं। पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा गाना आप शायद तभी गा सकेंगे और उस में जोड़ भी सकेंगे कि बेटा हमारा ऐसा काम करेगा !

Wednesday, 8 August 2012

एक जनांदोलन के गर्भपात की त्रासदी

यह जो कि नहीं होना चाहिए था, हो गया है। एक जनांदोलन के इस तरह अनायास और अचानक हुए गर्भपात की उम्मीद तो उस के दुश्मनों को भी नहीं थी। इस जनांदोलन के दुश्मन कई एक थे। जैसे यू.पी.ए. सरकार मुख्य दुश्मन थी पर सामाजिक न्याय का गान गाने वाले भी इस आंदोलन को फूटी आंख नहीं देख रहे थे। उन को बहुत डर था कि कहीं यह आंदोलन खुदा न खास्ता सफल हो गया तो उन के आरक्षण की मलाई भी यह आंदोलन बाद के दिनों में न उतार ले। शुरु के दिनों में कुछ दलित उभार की मलाई खाने वाले लोग हुंकार भर कर पूछ ही रहे थे कि इस अन्ना आंदोलन में दलित कहां है? अन्ना के खिलाफ़ छिटपुट प्रदर्शन भी किया इन लोगों ने। फिर आरोप ही लगा दिया कि यह तो सवर्णों का आंदोलन है। इस में वही लोग शामिल हैं जो कभी आरक्षण के विरोध में आंदोलन कर रहे थे।

एक जनांदोलन जो भ्रष्टाचार के खिलाफ़ था, ऐसे बेहूदा आरोपों का कोई प्रतिकार ही नहीं कर रहा था। आरक्षण की मलाई चाट रही पिछडी़ जातियों के मठाधीश लोग भी मुखर हुए और बताने लगे कि यह तो कारपोरेट सेक्टर द्वारा प्रायोजित आंदोलन है। न सिर्फ़ बताने लगे बल्कि प्रमाणित भी करने लगे। एक पार्टी है भारतीय जनता पार्टी। इस का विरोध करने के नाम पर लोग बड़ी जल्दी एकजुट हो जाते हैं। तो कांग्रेस ने अन्ना के पीछे भाजपा का नाम जोड़ दिया। बहुत सफाई देते रहे अन्ना और उन के साथी कि उन लोगों का भाजपा से कुछ लेना-देना नहीं। और अब वह भाजपा भी अन्ना से खतरा महसूस करते हुई न सिर्फ़ किनारे हो गई, अन्ना का विरोध भी करने लगी। वास्तव में इस जनांदोलन से सभी पारंपरिक लोगों को खतरा हो गया। खास कर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील सभी राजनीतिक पार्टियों, क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, क्या ये, क्या वे । और आरक्षण की मलाई चाट रहे सामाजिक न्याय के गुण-गान गाने वालों को अन्ना क्या कोई भी आंदोलन रास नहीं आ सकता। आलम यह है कि अन्ना आंदोलन को कुचलने के लिए लगभग सभी ने लाक्षागृह बनाए। छोड़ा किसी ने नहीं। शुरुवात रामदेव ने की। महत्वोन्माद की बीमारी के मारे रामदेव को लगा कि उन की दुकान तो खुलने के पहले ही बंद होने की राह पर आ गई। सो वह प्रतिद्वंद्विता की आंच ले कर खड़े हो गए। रहा भी न जाए और सहा भी न जाए के अंदाज़ में। तो अन्ना आंदोलन की जड़ खोद कर पहला मट्ठा रामदेव ने ही डाला। पर जाने क्यों यह अन्ना और उन के साथियों को दिखा नहीं। और वह रामदेव से दूरी बना-बना कर ही सही गले भी मिलते रहे। अन्ना और उन की टीम से पहली गलती यही हुई। और देखिए न कि इस आंदोलन के ठीक गर्भपात के पहले भी रामदेव आए और जैसे अंतिम धक्का देते हुए बोल गए कि सवा करोड़ से कम की भीड़ पर कोई आंदोलन कैसे हो सकता है? उन से कोई यह पूछने वाला नहीं है कि दिल्ली में या देश में ही सही वह कौन सी जगह है जहां एक साथ सवा करोड़ लोग इकट्ठा हो सकते हैं। हालत यह है कि दस लाख लोग भी एक साथ देश में कहीं इकट्ठा हो सकें ऐसी कोई जगह नहीं है। एक लखनऊ में मायावती के बनवाए कांशीराम स्मारक और रमादेवी पार्क हैं जिस में लगभग पांच लाख लोग इकट्ठा हो सकते हैं। और मायावती ही इतनी भीड़ इकट्ठी भी कर सकती हैं। अभी तक तो और कोई यह जगह भरना तो दूर उसे भरने की सोच भी नहीं पाया। खैर, ऐसी और कोई जगह किसी की जानकारी में हो तो कृपया देश को बताए। लफ़्फ़ाज़ी और लंतरानी हांकना और बात है। ज़मीनी हकीकत और बात है।

अन्ना आंदोलन की दूसरी बडी़ कमज़ोरी उन के साथियों का बड़बोलापन था। जनता की थोडी़ सी भीड़ देख कर मदमस्त हो गए यह लोग और अपने को संभाल नहीं पाए। जिस का जो मन किया जिस-तिस मुद्दे पर बेलगाम बोलता गया। कशमीर से लगायत लोकपाल तक। देश की जो सब से बड़ी ताकत है संसदीय व्यवस्था, उस पर भी चोट करने से बाज़ नहीं आए यह लोग। यह लोग यह भूल गए कि यह संसदीय व्यवस्था और यह लोकतंत्र ही है जो आप को यह सब करने और बोलने दे रही है। कालिदास बन गए और उसी डाल को काटने में लीन हो गए। दूसरे यह लोग भूल गए कि कोई भी जनांदोलन हथेली पर सरसो उगाना नहीं है। यह लगभग एक तरह की किसानी है। खेती-बारी है। बरसों लग जाते हैं मिट्टी बनाने में। खाद-पानी देते-देते मिट्टी बनती है। और फिर इस में भी यह पपीते की खेती भी नहीं है कि लगाते ही 6 महीने में फल मिलने लगता है पर 6 महीने ही में पपीता खत्म भी हो जाता है। जनांदोलन जैसे कटहल की खेती है। कि लगाती एक पीढ़ी है, खाती आगे की पीढ़ियां हैं। गांधी के पहले भी तमाम-तमाम लोगों ने आज़ादी की लड़ाई लडी थी। और फिर गांधी भी कोई दो एक दिन में ही कामयाब नहीं हो गए थे। चंपारण के भी हीरो वह कोई एक-दो दिन में ही नहीं हो गए थे। जालियावाला बाग से लगायत दांडीयात्रा तक बहुत पानी बहा। लोगों ने लाठियां जेल और ज़ुल्म सहे। फिर कहीं साबरमती के संत के नाम आज़ादी दिलवाने का तमगा लगा। दिल्ली फिर भी तुरंत नहीं मिली थी। जे. पी. को भी इंदिरा गांधी की तानाशाही से लड़ने में बहुत समय लगा था। वी. पी. सिंह को भी बोफ़ोर्स को आंदोलन ब्ना कर, जनमोर्चा और फिर राजीव सरकार के पतन तक की लडा़ई में समय लगा था। पका-पकाया नतीज़ा किसी भी आंदोलन को नहीं मिला, कभी भी, कहीं भी। पर यह अन्ना और उन की टीम जैसे सब कुछ तुरंत पा लेना चाहती थी। भ्रष्टाचार से लडा़ई न हो गोया फ़ास्ट फ़ूड हो। मैगी या बर्गर हो जो फटाफट तैयार हो जाए। तिस में कोढ़ में खाज का काम किया इलेक्ट्रानिक मीडिया ने। भीड़ और, कैंडिल मार्च के फ़ैशन परेड दिखा-दिखा कर। हद ही हो गई थी। हां, यह सही है कि इस अन्ना आंदोलन में किसान और मज़दूर की भागीदारी उस तरह नहीं थी, जिस तरह होनी चाहिए थी। और इसी लिए यह आंदोलन शुरु ही से गगन विहारी आंदोलन बन गया था। चैनलों के कंधे पर सवार यह आंदोलन ज़मीनी आंदोलन नहीं बन पाया। अन्ना यहीं छले गए। वह अपनी थाली और मंदिर में रहने को अपनी थाती बताते रहे पर उन के साथी उड़ते रहे मीडिया मैनेजमेंट के डैनों पर। वैसे ही जैसे राहुल की जनसभाएं या किसी दलित के घर जाना-खाना इवेंट मैनेजमेंट का हिस्सा होती हैं। भट्टा पारसौल से लगायत मुंबई से स्लीपर क्लास की यात्रा तक। तो जो नतीज़ा राहुल को चुनावों में मिला लगभग वही नतीज़ा अन्ना आंदोलन कहिए, जनांदोलन कहिए उस को भी वही नतीज़ा मिला। यह आंदोलन पब्लिसिटी तो पा गया पर ज़मीन नसीब नहीं हुई इसे। आंदोलन के कर्ता-धर्ता यह भूल गए कि गांवों और कस्बों में बिजली ही नहीं आती जो लोग टी.वी. देख कर आंदोलित हों। दूसरे अगर जहां कहीं लोग-बाग टी.वी. थोडा़ बहुत देख भी लेते हैं, वहां दूरदर्शन देखा जाता है, ये खबरिया चैनल नहीं जो उन्हें शेर बनाते फिर रहे थे। तो जनता से कटा यह जनांदोलन खबरिया चैनलों के कंधे पर चलता भी तो कितने दिन चलता भला? वह भी दिल्ली और मुंबई के ज़ोर पर। जहां के लोग जो बगल में किसी के मर जाने पर भी मुंह फेर लेते हैं। लाश सड़ जाती है, बदबू मारने लगती है तो पुलिस बुलाते हैं। उस दिल्ली और मुंबई के लोगों के ज़ोर पर? तिस पर तमन्ना 'मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों ' की !

अन्ना और उन की वह टीम यह भी भूल गई कि कांग्रेस नाम का मगरमच्छ उन्हें लीलने को एक नहीं कई मोर्चों पर मुंह बाए खड़ा है। और जो वह एक शेर है कि, 'मैं सच भी बोलूंगा तो हार जाऊंगा/ वह झूठ भी बोलेगा तो लाजवाब कर देगा।' कांग्रेस इस शेर के अमल में लाजवाब है। कपिल सिब्बल से लगायत, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद जैसे वकीलों की कुटिल फ़ौज तो थी ही सोनिया जैसी मदारी भी थी जो बडे़-बडे़ लोगों को अपनी डिप्लोमेसी में नचा कर शीशे में उतार देती है। जो एक साथ मुलायम और मायावती को बिठा लेती है। मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी जैसों को अपना सेवक बना कर एक इशारे पर नचा लेती है। आडवाणी और भाजपा जैसी घाघ पार्टी को भी थूक कर चटवा लेती है और पूरी शालीनता से। बडे़-बडे़ लालू, करुणानिधि उस के यहां पानी भरते हैं। उस सोनिया को हंसते हुए अन्ना कहते थे कि उस के बारे में क्या बोलें, औरत है, बीमार है। बताइए यह भी कोई बात हुई? दिग्विजय सिंह जैसों के कुतर्क का तोड़ भी नहीं था, अन्ना और उन के लोगों के पास। और चिंगारी जो शोला बन सकती थी, फ़ुस्स हो गई। अनुभवहीनता और जल्दबाज़ी में उस आंदोलन का गर्भपात हो गया।

अफ़सोस इस बात का नहीं है कि यह अन्ना आंदोलन का गर्भपात हो गया। अफ़सोस इस बात का है कि अब कोई किसी आंदोलन की क्या फिर कभी सोचेगा? इस नई बाज़ार व्यवस्था ने आदमी को अकेला कर दिया है। उस के पास अपने ही लिए टाइम नहीं है, अपने परिजनों के लिए टाइम नहीं है, तो आंदोलन तो उस की कल्पना में भी नहीं है। सीमा आज़ाद जैसों को पुलिस जब चाहती है बरसों के लिए जेल में ठूंस देती है। और कोई आहट तक नहीं होती सडक पर। लोग ड्राइंगरूम में या फ़ेसबुक पर चर्चा कर के सो जाते हैं। कोई आंदोलन नहीं होता। राजनीतिज्ञों, अफ़सरों का अतिशय भ्रष्टाचार, कारपोरेट सेक्टर की मनमानियां, जल, जंगल, ज़मीन की लडा़ई ,बिल्डरों का खेती की ज़मीनों का हड़पते जाना, आकाश छूती मंहगाई यह सब अब किसी को क्यों नहीं आंदोलित करता? क्यों लोग सुन्न हो चुके हैं? ऐसे में अन्ना आंदोलन का खड़ा होना एक बड़ी घटना थी। पर उस का इस तरह अचानक गर्भपात हो जाना उस से भी बडी घटना है और अफ़सोसनाक घटना है।

अन्ना और उन की उस टीम ने लगता है कि बीते आंदोलनों और आज के हालात पर कभी बैठ कर गौर नहीं किया। उपवास बुद्ध और गांधी पैदा करता है, ब्लैकमेलर नहीं। अन्ना टीम ने उपवास की ताकत से सरकार को झुकाने यानी ब्लैकमेल करने की आदत बना ली। और भूल गए कि सत्ता वह भले राम की ही क्यों न हो कुचक्र ही रचती है। किसी भी सत्ता से लड़ाई सत्य के हथियारों से ही लडी़ जा सकती है, उपवास भी उस का एक रास्ता है। पर जब आप उपवास को तोप की तरह इस्तेमाल करने लगेंगे तो वह अपनी उपयोगिता खो देगा। नमक से नमक का ही काम लीजिए, चीनी का नहीं। या फिर चीनी से भी नमक का काम मत लीजिए। अन्ना और उन के साथियों ने दुर्भाग्य से यही किया। और पता नहीं किस 'होशियार' ने उन्हें राजनीतिक विकल्प देने का सपना दिखा दिया। और यह लोग उस सपने पर समूचे आंदोलन की बलि चढा़ बैठे। भूल गए यह लोग कि कोई भी समाज बदलता है जनांदोलन से, राजनीतिक आंदोलन से नहीं। राजनीतिक आंदोलन से सत्ता पाई जा सकती है, समाज नहीं बदला जा सकता। अभी ज़रुरत समाज को बदलने की थी। समाज बदलेगा तभी राजनीति बदलेगी। अभी तो सच यही है कि इस समाज में कोई ईमानदार आदमी चुनाव नहीं लड़ सकता, जीतना तो बहुत दूर की कौडी़ है। समाज से सिर्फ़ भ्रष्टाचार ही नहीं सांप्रदायिकता और जाति-पाति, छुआछूत आदि भी हटाना होगा तभी एक बेहतर राजनीतिक विकल्प खड़ा हो पाएगा। अभी तो जितनी गंदी कांग्रेस है, उतनी ही गंदी भाजपा भी है, उतनी ही गंदी वामपंथी पार्टियां हैं, उतनी ही गंदी सपा-बसपा टाइप क्षेत्रीय पार्टियां भी हैं। जैसे देश की सभी नदियां दूषित-प्रदूषित हो कर सिर्फ़ सीवर का पानी और फ़ैक्ट्रियों का कचरा ढोने को अभिशप्त हो चली हैं, ठीक वैसे ही सभी के सभी राजनीतिक दल भी उद्योग जगत और कारपोरेट जगत के पैसे और जातियों के अंगार की सवारी पर सवार हैं। आप आएंगे अभी की राजनीति में तो शेर होते हुए भी आप को भी सियारों की शादी में बैंड बजाना ही पड़ेगा। फिर व्यवस्था क्या बदलेंगे, आप खुद बदल कर धूर्त हो जाएंगे। अब से चेतिए अन्ना जी। जानिए कि आंदोलन या जनांदोलन कोई जादू की छड़ी नहीं है। एक सतत प्रक्रिया है बदलाव की। सो शुरुआत समाज बदलने से कीजिए। देश और समाज को बदलने में मराठियों का कभी बड़ा योगदान रहा है। शिवा जी, गोपाल कृष्ण गोखले, डा. अंबेडकर से लगायत बाबा राघवदास से नाना जी देशमुख तक एक लंबी कड़ी है। आप में भी वह तत्व दिखते हैं। पैसा और सिर्फ़ पैसा के पीछे भागने वाले इस समाज को पहले बदलना ज़रुरी है। फिर सत्ता और पैसा के पीछे भागने वाली राजनीति बदलने की सोचिए। बाहुबलियों और भ्रष्टचारियो से निपटने की सोचिए। राजनीति, कारपोरेट और मीडिया के गठजोड़ को तोड़ना मुश्किल ज़रुर है, पर ज़रुरी भी है। सो खबरिया चैनलों और अपने दिखावे के साथियों से परहेज़ करिए। बात फिर से शुरु कीजिए। अब की देश के किसी भी गांव से शुरु कीजिए। किसी शहर से नहीं। आहिस्ता-आहिस्ता बात बनेगी और ज़रुर बनेगी। हां, आहिस्ता-आहिस्ता। आंदोलन ऐसे ही शुरु होते हैं। रामदेव की तरह दुकान लगा कर नहीं। अब देखिए न कि देखा-देखी में आप का आंदोलन अभी और बिलकुल अभी तो रामदेव की दुकान के काम आ गया है। आप की सारी मेहनत और तपस्या खाद बन गई रामदेव की दुकान के लिए। कोई बात नहीं। अभी कुछ दिन आराम और चिंतन के बाद उठिए।इस लिए भी कि गरीबों को रोटी नहीं, मोबाइल देने वाली इस राजनीतिक व्यवस्था का बदलना अब बहुत ज़रुरी हो गया है। तब तक के लिए नागार्जुन की यह एक कविता बांचिए :

भूल जाओ पुराने सपने
सियासत में
न अड़ाओ
अपनी ये काँपती टाँगें
हाँ, महाराज,
राजनीतिक फतवेवाजी से
अलग ही रक्खो अपने को
माला तो है ही तुम्हारे पास
नाम-वाम जपने को
भूल जाओ पुराने सपने को
न रह जाए, तो-
राजघाट पहुँच जाओ
बापू की समाधि से जरा दूर
हरी दूब पर बैठ जाओ
अपना वो लाल गमछा बिछाकर
आहिस्ते से गुन-गुनाना :
‘‘बैस्नो जन तो तेणे कहिए
जे पीर पराई जाणे रे’’
देखना, 2 अक्टूबर के
दिनों में उधर मत झाँकना
-जी, हाँ, महाराज !
2 अक्टूबर वाले सप्ताह में
राजघाट भूलकर भी न जाना
उन दिनों तो वहाँ
तुम्हारी पिटाई भी हो सकती है
कुर्ता भी फट सकता है
हां, बाबा, अर्जुन नागा !
आमीन !



Saturday, 4 August 2012

लमही गांव की मन में टूटती तसवीर और उस की छटपटाहट के बीच प्रेमचंद की जय !

लमही की जो तसवीर बत्तीस बरस पहले मन में बसा कर लौटा था, अब की वहां जा कर वह तसवीर टूट गई है। ऐसे जैसे मन में कोई शीशा टूट गया है। दरक गया है वह सब कुछ। जो लमही नाक में सांस लेती थी, मन में वास करती थी, वह कहीं किसी कोने में भी दिखी नहीं। हम होंगे कामयाब ! गीत की वह आग, वह आंच, वह सदा, वह गूंज और वह गमक कहीं गहरे डूब गई। लमही में अब कोई गांव नहीं, एक बसता हुआ सा शहर सांस लेता है। अधिसंख्य गांवों की तरह प्रेमचंद की लमही में भी न अब गाय दिखती है न गोबर। तो होरी, धनिया और गोबर जैसे पात्रों को ऐसे में वहां ढूंढना भी दूर की कौड़ी है। हां, अब वहां 'विकास' है। सो सरकारी योजनाओं वाले बोर्ड हैं, बिल्डर हैं। आम के घने बागों और उन की छांह की जगह बिल्डरों की धमक है, उन्हीं की आरामगाह भी, छाव नहीं।। खेतों की प्लाटिंग हो गई है, होती जा रही है। गरज यह कि लमही अब गांव की खोल उतार कर कस्बा से शहर होने की राह पर है या कहिए कि शहर की सांस ले रहा है। बेतरतीब बसता हुआ शहर। शहर बनने की आहट में इस गांव की छटपटाहट की आंच तपाती है।

लहुराबीर में जहां प्रेमचंद का सरस्वती प्रेस और निवास था उस के पास प्रेमचंद की मूर्ति पर माल्यार्पण के बाद
श्रीकृष्ण तिवारी, सुधाकर अदीब, दयानंद पांडेय, अमिता दुबे,  करुणाकर अदीब, वीरेंद्र सारंग व अन्य
वैसे भी लमही बनारस शहर से कुछ बहुत दूर नहीं था। ऐसे विवरण मिलते ही हैं कि एक समय प्रेमचंद यहां से बनारस पैदल ही ट्यूशन पढ़ाने जाया करते थे। पर अब लमही और बनारस शहर में उस की दूरी भी सुन्न हो गई है। लमही अब शहर से जुड़ कर शहर का ही एक हिस्सा हो चला है। यह गांव की शहर के बरक्स हार है। हर कहीं शहर ऐसे ही गांव को खा रहे हैं। शहर के पांव बाद में पहुंच रहे हैं गांव में, बिल्डर और उन की कालोनियां ग्राह की तरह उन्हें ग्रसने पहले पहुंच रही हैं। और जहां जिस गांव में शहर के पांव पहुंचने बाकी हैं वहां के गांव भी शहर के बरक्स थक कर हार रहे हैं। अब यह एक निर्मम सचाई है। कोई माने या न माने। शहरों की बेतरतीब भीड़ में खोते यह गांव और गांव के लोग अजब मजधार में फंस गए हैं। न गांव के रह गए हैं, न शहर के हो पा रहे हैं। आधा इधर, आधा उधर। मतलब न इधर के, न उधर के। यह कौन सा बार्डर है? कौन सी दुरभि-संधि है यह विकास की? कि गांव के सीवान भी सियार की तरह गुम हो गए हैं। लमही के नायक और सपूत प्रेमचंद जो होते तो इस परिवेश और इस पीड़ा को भला कैसे बांचते? नसीम निकहत का एक शेर बरबस याद आता है, 'शहरों की रौनक के पीछे क्या-क्या छूटा है निकहत/ ऊंची हवेली, बाग का सब्ज़ा, छत के कबूतर छोड़ आए।'

कोई बत्तीस साल बाद एक बार फिर से बीती 31 जुलाई, 2012 को प्रेमचंद जयंती पर लमही जाना हुआ। पहली बार 1980 में प्रेमचंद जन्म-शताब्दी के मौके पर गया था। तब विद्यार्थी था और तीन दिन रहा था लमही में। डा. लाल बहादुर वर्मा ने जनवादी लेखक संघ की ओर से तब इस आयोजन में बुलाया था। अब की उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से निदेशक डा. सुधाकर अदीब के बुलावे पर गया था। पिछली बार तीन दिन रहा था अब की तीन घंटे ही रहा लमही में। लेकिन इस तीन घंटे में ही लमही की करवट और उस की गमक की थाह लेना मुश्किल नहीं था। सब कुछ जैसे टूट रहा था। मौका चूंकि प्रेमचंद जयंती का था सो समूचा लमही प्रेमचंद से सराबोर था। लमही महोत्सव में तर-बतर। चहुं ओर प्रेमचंद की जय थी। बोलो प्रेमचंद की जय ! की जय-जयकार थी। बनारस और लखनऊ से कुछ लेखक, कवि, रंगकर्मी और अधिकारी बटुरे थे। किसी लेखक की जन्म-स्थली में ऐसा समारोहपूर्वक कार्यक्रम मन को मुदित करने वाला था। पर गांव के गुम होने टीस थी कि मन से जा भी नहीं रही थी।

प्रेमचंद के पैतृक घर के पास बाएं से अनिल मिश्र, अमिता दुबे, वीरेंद्र सारंग,  रंगकर्मी उमेश भाटिया, दयानंद पांडेय,
सुधाकर अदीब, नरेंद्र नाथ मिश्र और करुणाकर अदीब ।
यह सिर्फ़ प्रेमचंद को याद करने भर का यत्न भर नहीं था। यह प्रेमचंद को जीने का भी क्षण था। बहुत ज़्यादा विद्वान नहीं थे इस समारोह में। श्रीकृष्ण तिवारी जैसे गीतकार, चौथी प्रसाद यादव जैसे आलोचक और हीरालाल यादव जैसे बिरहा गायक एक साथ प्रेमचंद के 'लोकेल' का भान करवा रहे थे। बनारस के कुछ रंगकर्मी भी प्रेमचंद की कहानियों के मंचन के साथ उपस्थित थे। प्रेमचंद मदरसा, लमही के बच्चे बैनर के साथ अपनी पूरी बोली-बानी और वेश-भूषा में अपनी उपस्थिति की खनक खनका रहे थे। मेरी जानकारी में प्रेमचंद के सिवाय किसी और हिंदी लेखक को शायद ही हर साल कोई महोत्सव नसीब होता हो। प्रेमचंद को नसीब होता है और अपनी माटी में, अपनी लमही में होता है - लमही महोत्सव के नाम से। यह बहुत बडी़ बात है। वर्ष २००५ से हर साल यह महोत्सव आयोजित होता है। इस में सरकारी संस्थाओं और प्रशासन सहित स्थानीय लोगों की भागीदारी होती है। लमही की शान प्रेमचंद को विषय बना कर गीत गाए जाते हैं। संगीत में निबद्ध इन गीतों की लयकारी में बोलो प्रेमचंद की जय ! में मन भींग-भींग जाता है। प्रशासनिक अमला, स्कूली बच्चे, लोग-बाग सब के सब प्रेमचंदमय ! किसी हिंदी लेखक का ऐसा मान उस की माटी में मै ने अभी तक तो नहीं देखा। कुछ लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों को यहां स्मृति सम्मान से सम्मानित भी किया गया। मुझे भी। उपन्यास सम्राट की माटी में यह स्मृति सम्मान पा कर मैं भाउक हो गया। और लमही में यह कोई अकेला कार्यक्रम नहीं है। गांव के मंदिर परिसर में भी कार्यक्रम है। वहां भी गीत-संगीत का आलम है और भीड़ बिलकुल मेले जैसी। बूढे़, बच्चे और स्त्रियां सभी हैं। प्रेमचंद भले लिख गए हों कि साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है, मनोरंजन नहीं है। पर लमही के इस मंदिर परिसर में लोग उन के नाम पर मनोरंजन के निमित्त ही उपस्थित हैं। मंदिर परिसर बड़ा है, और मंच भी खूब ऊंचा और खूब बड़ा। उतना ही बड़ा प्रेमचंद जयंती का बैनर भी। मुख्य कार्यक्रम को मात करता बैनर, मंच और भीड़। फ़िल्मी गानों पर डांस की तैयारी। लगभग आर्केस्ट्रा वाला माहौल है। ठीक वैसे ही जैसे किसी पुलिस लाइन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। बैनर पर ढेर सारी संस्थाओं के नाम भी हैं। बडे़-बडे़। आप कह सकते हैं कि बिलकुल ईदगाह के मेले वाली रौनक है। जाने कितने हमीद बैठे हैं और खडे़ भी हैं इस भीड़ में। छिटपुट दुकानें भी हैं यहां। वैसी ही, गांव के मेले में जैसी होती हैं।

वाराणसी के कमिशनर चंचल तिवारी से स्मृति-सम्मान लेते हुए दयानंद पांडेय
गाना बजाना तो तब भी हुआ था, जब बत्तीस बरस पहले आया था इस लमही में। पर तब नुक्कड़ नाटक हुए थे। हम होंगे कामयाब एक दिन जैसे गीत गाए थे रंगकर्मियों ने। तब लगभग देश भर से लेखक और रंगकर्मी जुटे थे। डा शमशुल इस्लाम जो तब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढाते थे और उन की पत्नी नीलम जी, गोरखपुर के डा. लालबहादुर वर्मा और उन की टीम ने जो क्रांतिकारी और समाज को बदलने वाले नाटक और गीत तीन दिन तक पेश किए थे वह अदभुत था। बनारस से तब भी लोग आए थे। रामप्रकाश शुक्ल, नचिकेता, शांति सुमन, शशि प्रकाश, कात्यायनी आदि तमाम-तमाम रंगकर्मी भी। दिन में नुक्कड़ नाटक देख कर रात को गांव के आस-पास के बहुत सारे लोग इकट्ठे हो गए थे। नाच देखने की गरज से। लाठियां ले-ले कर। बहुत समझाने पर भी लोग मानने को तैयार नहीं थे। कहने लगे कि बाई जी लोग आई हैं, कम से कम फ़िल्मी ही हो जाए दो-चार ठो। बमुश्किल गांव के कुछ समझदार लोगों के सहयोग से साथी स्त्रियों को 'सुरक्षित' किया गया था उस रात। दूसरे दिन पुलिस की व्यवस्था करवाई गई एहतियात के तौर पर। पर कुछ अप्रिय नहीं हुआ था।

खैर, गांव का वह प्राइमरी स्कूल खोजता हूं जहां बत्तीस बरस पहले तीन दिन ठहरा था। नहीं मिलता। बाग नदारद है स्कूल के सामने का और पुरानी बिल्डिंग की जगह नई बिल्डिंग मिलती है। कुछ और सरकारी उपक्रम भी उसी परिसर में हैं। गांव का बाग, ट्यूबवेल और पुराने मकान भी नहीं मिलते। पर मन वही खोजता है। कच्चे मकान अब पक्के हो गए हैं। दिशा-दशा बदल गई है। हां, तालाब दोनों ही पुराने मिलते हैं। बस सरकारी बोर्ड लग गया है। तालाबों के सुंदरीकरण का। पर तालाब का सुंदरीकरण अधूरा है। अधूरा क्या बस लगता है कि जैसे काम शुरु होते ही बंद हो गया हो। खैर, प्रेमचंद के पैतृक घर में भी हम लोग जाते हैं। यह घर जो तब खंडहर होने को लगता था, बत्तीस बरस पहले, अब चाक चौबंद है। लगता है कि जैसे अभी जल्दी ही बना हो। दीवारों के प्लास्टर और पुताई चकाचक है। पर भीतर जाने पर प्रेमचंद की रचनाओं के नाम बने बडे़-बडे़ शिलापटों का ढेर कूडे़ की तरह रखा देख कर मन खिन्न हो गया है। रंगभूमि से लगायत तमाम रचनाओं के शिलापट। यह सरकारी योजनाओं का कुफल है। संस्कृति विभाग ने यह बडे़-बडे़ शिलापट बनवा तो लिए पर लगवाए नहीं। लगवाने के नाम पर सूरदास बन गया। रंगभमि के सूरदास की याद आ जाती है। एक वह सूरदास था, जो आज़ादी की अलख जगाता था और एक यह सरकारी सूरदास। जो योजनाएं बना कर सो गया है। क्या इन्हीं दिनों के लिए लिखा था कभी इसी बनारस में शभूनाथ सिंह ने, 'समय की शिला पर मधुर चित्र कितने/ किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए/ किसी ने लिखी आंसुओं से कहानी/ किसी ने पढा़ किंतु दो बूंद पानी/ इसी में गए बीत दिन ज़िंदगी के/ गई धुल जवानी, गई मिट निशानी।' तो क्या समय की शिला पर मधुर चित्र ऐसे ही बनते-मिटते हैं? निशानी ऐसे ही मिटती है? और यह सब तब है जब केंद्र और प्रदेश दोनों ही सरकारें प्रेमचंद पर मेहरबान हैं। प्रेमचंद स्मारक के सामने लगा पत्थर इस की चुगली भी खाता है। प्रेमचंद के पुश्तैनी घर और स्मारक के बीच खिंची दीवार देख कर भी मन बिदक गया।

पराड़कर भवन में आयोजित कहानी गोष्ठी में कहानी पाठ करते हुए दयानंद पांडेय। 
मंच पर काशीनाथ सिंह, सुधाकर अदीब व अन्य
बहरहाल अच्छा यह है कि लोग इस सब के बावजूद प्रेमचंद की जयंती के उत्साह में हैं। प्रेमचंद की किताबें भी बिक रहीं हैं। ठीक वैसे ही जैसे गांव के मेलों में बिकती हैं। बिना स्टाल के। देख रहा हूं कि एक और आदमी भी साइकिल पर गट्ठर बांधे आया है और किताबें खोल कर रास्ते में एक जगह पक्का देख कर उस पर बिछा रहा है किताबें। प्रेमचंद की किताबों के साथ में चाणक्य नीति जैसी और किताबें भी हैं। सब की सब पेपरबैक या पाकेट साइज़ में। ज्ञानेंद्रपति जी से बात हो रही है। मोबाइल पर। बताता हूं कि लमही में हूं। तो वह कहते हैं कि हां, यह भी एक वार्षिक श्रृंगार है। समारोह में कोई पूछ रहा है कि प्रेमचंद जी के परिवार से भी कोई आया है क्या? सवाल अनुत्तरित रह जाता है। कुछ देर बाद एक सज्जन बुदबुदा रहे हैं, 'कभी कोई नहीं आया।' जैसे वह अपने ही को बता रहे हैं।

वार्षिक श्रृंगार यानी समारोह जारी है। कार्यक्रम पर कार्यक्रम होने हैं तीन दिन तक। भरा-पूरा शेड्यूल है लमही महोत्सव का। प्रेमचंद की जय ! का। लेकिन अब हम लोग लमही से निकल रहे हैं। लमही बनारस शहर में भले विलीन हो रहा है पर बनारस से लमही आना और जाना बहुत तकलीफ़देह है। बनारस-आज़मगढ़ रोड है। पर जगह-जगह गड्ढों, जलभराव और कीचड़ से लथ-पथ। अनायास मिल जाने वाला जाम भी है जगह-जगह। आना-जाना आसान नहीं। बनारस से सुबह जब चले थे तब लहुराबीर में प्रेमचंद जी की मूर्ति पर माल्यार्पण करते हुए चले थे। प्रेमचंद की जय यहां भी हुई थी। पर जैसी जय लमही में हुई प्रेमचंद की वैसी तो नहीं थी। वापस नागरी प्रचारिणी सभा में कार्यक्रम है प्रेमचंद जी की जयंती पर ही। यहां सुधाकर अदीब मुख्य वक्ता हैं। सब लोग अपने-अपने ढंग से प्रेमचंद को व्याख्यायित कर रहे हैं। यहां जनता नहीं है, लेखकों की बिरादरी है। शाम को पराड़कर भवन में प्रेमचंद की याद में ही कथा-गोष्ठी हुई। काशीनाथ सिंह की अध्यक्षता में। यहां श्रोताओं में जनता भी है। और लेखक बिरादरी भी। हाल भरा-पूरा है। काशीनाथ सिंह कह रहे हैं कि यहां तुलसी, कबीर, रैदास भी हमारे हैं पर उन को तो मठ वाले ले गए। लेकिन प्रेमचंद अभी भी हमारे पास हैं।किसी मठ के पास नहीं। और कि हम लोग जो काम करते रहे हैं बरसों से, अच्छा है कि अब सरकार भी करने लगी है, उसी रास्ते पर आ गई है। उन का इशारा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और इस के निदेशक सुधाकर अदीब की तरफ़ है। क्यों कि यह पहली ही बार है कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने प्रेमचंद पर बनारस में कोई कार्यक्रम आयोजित किया है। वह भी सात कहानीकारों का कहानी पाठ। काशी कहते हैं कि कथाकारों का यह प्रेमचंद को दिया गया अर्घ्य है। काशी सच ही कहते हैं।

प्रेमचंद के पैतृक घर में रखी उन की रचनाओं के नाम के शिलापट
हम लखनऊ वापस लौट आए हैं। पर कानों में अभी भी गूंज रहा है- प्रेमचंद की जय ! प्रेमचंद की जय-जयकार मन से बिसरती ही नहीं। न ही लमही की वह तसवीर जो बत्तीस बरस पहले मन में बसी थी, भूलती है। और लमही की जो तसवीर टूटी है मन में अभी-अभी, बिलकुल अभी शहर में तब्दील होते जाने की उस की छटपटाती लहूलुहान तसवीर भी मन में संत्रास की एक बडी़ सी चादर बिछा गई है। सरकारीकरण की आंच में वह बदसूरत बन गए तालाब, प्रेमचंद के घर में उन की रचनाओं के नाम के ढेरों शिलापटों का ढेर मन को सांघातिक तनाव में ले जाता है। सवाल फिर मन में सुलगता है कि क्या समय की शिला पर मधुर चित्र ऐसे ही बनाए और मिटाए जाते रहेंगे? बावजूद इस सुलगन के, इस सवाल के कानों से प्रेमचंद की जय ! की गूंज नहीं जाती। जय-जयकार मची हुई है।

प्रेमचंद एक अनुभव