Wednesday, 31 October 2012

कुनिका के नाते मेरा दांपत्य नहीं बिखरा : कुमार शानू

जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए, तुम देना साथ मेरा, ओ हमनवा । जैसे मेलोडी गीत गाने वाले कुमार शानू की तमन्ना अब संगीत निर्देशक बनने की है। अभी तक उन्हों ने कोई साढ़े सात हजार से भी अधिक गीत 14 भाषाओं में गाए हैं और अभी पांच साल तक लगातार वह गाते ही रहना चाहते हैं। इन दिनों वह बंगला फिल्म में अभिनय भी कर रहे हैं, पर अभिनय को कैरियर बनाने का उनका इरादा बिलकुल नहीं है। किशोर कुमार उन की ज़िंदगी है। सब से बड़े प्रेरणास्रोत हैं। गायकी में भी और शायद ज़िंदगी में भी। किशोर कुमार भी अभिनय करते थे और कुमार शानू भी इन दिनों अभिनय कर रहे हैं। किशोर कुमार भी गायकी में मैलोडी की वकालत करते थे और कुमार शानू भी। किशोर कुमार का दांपत्य भी बिखरा-बिखरा था और कुमार शानू का भी दांपत्य अब उजड़ा-उजड़ा सा है। अपनी पत्नी से अब वह अलग हैं और बाकायदा लड़ाई चल रही है। पर वह इस बारे में कोई बातचीत नहीं करना चाहते हैं। कहते हैं कि कोई पर्सनल बातचीत नहीं करना चाहता। अब तो कुमार शानू के गायकी का कैरियर लगभग स्थगित है। हालां कि बीते दिनों प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने से कुछ समय पहले ही उन का एक अलबम आया जिस कि प्रणव मुखर्जी ने रिलीज़ किया। तो भी अब वह नया कुछ गा रहे हों पता नहीं चलता। तो भी अभी भी वह सुने जाते हैं, पुराने गानों के मार्फ़त ही सही। खैर, ज्योतिष में विश्वास रखने वाले, नई-नई कारों के शौकीन और पालिटिक्स से घृणा करने वाले कुमार शानू १९९७ में लखनऊ एक कार्यक्रम में आए थे। तब दयानंद पांडेय ने राष्ट्रीय सहारा के लिए कुमार शानू से खुल कर बातचीत की थी। बात पुरानी भले है पर प्रासंगिक आज भी है। पेश है वही बातचीत:

-आप ने अंगुलियों और गले में ढेर सारे पत्थर आदि पहन रखे हैं। मतलब आप ज्योतिष में विश्वास रखते हैं।
हां, ज्योतिष में विश्वास करता हूं।

-आप जानते हैं कि कौन सा ग्रह और कौन सा पत्थर गायक बनाने में मदद कर सकता है?
नहीं, गायन तो पैदाइशी है। अगर आप गाना नहीं जानते तो रूबी पहन कर नहीं गा सकते।

-आप गाना गाते समय क्या फ़िल्म के हीरो की छवि भी ध्यान में रखते हैं?
नहीं। हां, सिचुएशन तो सुनता हूं। क्यों कि गाना तो अब पहले रिकॉर्ड होता है और हीरो बाद में सैलेक्ट होता है। पहले बताते भी थे कि कौन हीरो है, पर आज अगर बताते भी हैं तो अगर बताया कि हीरो गोविंदा है तो फ़िल्म जब आती है तो अक्षय कुमार हीरो हो जाता है। तो मैं खुद को हीरो मान कर गा लेता हूं।

-तो क्या इसी नाते आप अब फ़िल्मों में अभिनय करने लगे हैं?
ऐसा कारण नहीं है। बात ऐसी है कि वह स्टोरी ही सिंगर के लिए है और मेरी मातृभाषा बंगला की फ़िल्म है। इस के लिए मैं ने अपना वज़न भी घटाया है कोई 27 किलो। पहले मेरा वजन 102 किलो का था।

-आप गायकी खातिर अपने गले को फिट रखने के लिए परहेज भी करते हैं?
परहेज नहीं करता, क्योंकि यह तो नेचर की चीज़ है। हां, अगर मैं गले का परहेज रखना शुरू कर दूंगा तो ज़रूर गला खराब हो जाएगा। मैं तो तेल फ्राई की तमाम चीज़ें खाता हूं। आइसक्रीम खाता हूं। स्पाइसी खाना मुझे बहुत पसंद है। चाइनीज और मुगलई मेरा फेवरिट खाना है और मैं खुद भी एक अच्छा कुक हूं। जब जो चाहता हूं, बना लेता हूं।

-पर जब आप ने इधर वज़न घटाया है तो क्या डाइटिंग की थी?
डायटिंग जैसी कोई बात नहीं। खाने में थोड़ी क्वांटिटी घटा दी और एक्सरसाइज की।

-लखनऊ आप पहली बार आए हैं?
हां, लखनऊ मेरे लिए फर्स्ट टाइम है।

-कभी उत्तर प्रदेश के किसी और शहर में आना हुआ है क्या पहले?
दिल्ली क्या यूपी में है। दिल्ली आया हूं।

-पर दिल्ली तो यूपी में नहीं है?
तो नहीं आया। आज फ्लाइट के रास्ते में बनारस पड़ा था।

-क्या लखनऊ घूमने का इरादा है?
घूम नहीं पाऊंगा। कल शाम को चार बजे बंबई में रिकॉर्डिंग है। राजेश रौशन जी का एक गाना गाना है, इस लिए चला जाऊंगा।

-किस फ़िल्म के लिए?
फ़िल्म का नाम पता नहीं। गाने का ट्यून और गीतकार का नाम भी पता नहीं।

-आप कुछ पढ़ते भी हैं?
पढ़ना अब नहीं हो पाता। पहले डिटेक्टिव नॉवेल्स पढ़ता था। अब डिस्कवरी चैनल और कार्टून टीवी पर देखता हूं।

-अखबार भी नहीं पढ़ते?
अखबार मंगाता तो हूं। टाइम्स आफ इंडिया। बाथरूम में देख लेता हूं, पर पढ़ नहीं पाता। पर मंगाता इस लिए हूं कि लोगों को लगे कि मैं पढ़ता हूं। (कह कर वह हंसते हैं।)

-हिंदी सिनेमा देखते हैं?
बहुत कम। वैसे अंगरेजी फ़िल्में देख लेता हूं। खास कर फाइट, थ्रिलर वाली फ़िल्में।

-आर्ट फ़िल्में?
आर्ट फ़िल्म देखने के लिए सोने का वक्त चाहिए। जिंदगी में टेंशन वैसे ही बहुत है। आर्ट फ़िल्में देखकर टेंशन और बढ़ाना नहीं चाहता।

-पॉलिटिक्स?
आई हेट पॉलिटिक्स। अब क्यों? आप जानते हैं, क्यों कि पॉलिटिक्स में रियालिस्टिक कुछ है नहीं।

-वोट तो देते हैं?
वोट मैं ने दिया नहीं। कम से कम आठ-नौ साल से। मेरा वोट कोई और दे देता है, तो यह भी रियालिस्टिक है।

-आप को पसंद क्या है?
कंट्री घूमना पसंद है। मुझे पहाड़ और समुद्र पसंद है। आई लव नेचर।

-माना जाता है कि जिन को प्रकृति से लगाव होता है, वह इमेजिनेशन भी काफी रखते हैं?
मैं नहीं रखता। सुबह उठ कर सोचता हूं कि इमेजिनेशन कुछ करूं। पर यह भी जानता हूं कि वह कभी होने वाला नहीं है। तो कहता हूं चुपचाप गाने पर निकल जाओ बेटा, पर सपने तरह-तरह के देखता हूं। बिल्कुल फैंटेंसी भरे।

-आप को गाने किस तरह के पसंद हैं?
गाने मैं हर किस्म का गा चुका हूं। पर सेमी क्लासिकल, सैड सांग्स और रोमांटिक गाने मेरी पसंद के गाने हैं।

-आप का अपना गाना, कौन सा गीत आप को पसंद है?
जुर्म फिल्म का जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए। साजन फिल्म का ये दिल कितना पागल है, ये प्यार तुम्हीं से करता है तथा 1942 ए लव स्टोरी का गाना कुछ न कहो, कुछ ना सुनो भी पसंद है। ऐसे देखने जाऊं तो मुझे अपना गाया बहुत सारा गाना पसंद है।

-गायकी का स्टारडम इन दिनों हिंदी फ़िल्मों में किस के पास है?
मैं खुद स्टारडम के दौर से गुज़र रहा हूं। आशिकी के बाद से। दरअसल स्टारडम शब्द एक्टिंग से है। पर जैसे कि लोग सिंगर को फेस वाइज पहले पहचानते नहीं थे, पर अब इतना मीडिया आ गया है कि लोग जान गए हैं और कहते हैं, देखो वो जा रहा है।

-तो एक्टर स्टार और सिंगर स्टार में फर्क क्या है?
एक्टर स्टार्स और हम में फर्क यह है कि एक्टर या एक्ट्रेस आंखों से दिल में उतरते हैं और हम कानों से दिल में उतरते हैं। पर आंख एक दिन में सात बार झपकती है, तो स्टार चेंज होते रहते हैं। तो आंख के कई पर्दे होते हैं। आंख एक बार आप की झपकी तो दिलीप कुमार, फिर झपकी तो अमिताभ, शाहरूख वगैरह-वगैरह। पर कान में ऐसा कोई पर्दा नहीं होता। कोई झपकी-वपकी नहीं होती। एक बार आपने सुना तो हम आप के हो गए।

-ऐसा क्या हो सकता है कि कोई आप का फैन हो, आपका फॉलोवर हो और आपकी ज़िंदगी में आ जाए?
फॉलोवर? मेरी जिंदगी में क्यों आएगा? मैं खाली तो नहीं हूं कि कोई आ जाए। बड़ी परेशानी है।

-आप का बिखरा दांपत्य हमेशा चर्चा में रहता है?
पर्सनल लाइफ के बारे में बिल्कुल बात नहीं।

-बीते दिनों आपने एक ट्रस्ट बनाया था?
ट्रस्ट बनाया तो अच्छे के लिए।

-कहा गया कि आप ने ऐसा अपनी संपत्ति से पत्नी को वंचित करने के लिए किया?
यह सब गलत बात है। सब झूठ खबरें हैं।

-अभी आप का एक वीडियो एलबम आया है, उस में आप काफी शर्माते हुए दिखते हैं?
हां, सिंगर को एडमायर करने वाला करेक्टर है।

-कुनिका के साथ आप की दोस्ती की चर्चा भी खूब होती है?
हां, हमारी बहुत अच्छी दोस्ती है।

-यह भी कहा जाता है कि आपका दांपत्य इसी लिए बिखरा है?
दांपत्य इस लिए नहीं बिखरा।

-आप के बिखरे दांपत्य का गायकी पर भी असर पड़ा होगा?
गायकी पर कोई असर नहीं पड़ा।

-आप गायकी की दुनिया में आए कैसे?
पहला चांस जगजीत सिंह ने दिया। आंधियां फ़िल्म के लिए। पर पहला ब्रेक जादूगर फ़िल्म से मिला। फर्स्ट हिट फ़िल्म आशिकी थी। 26 गाने एक दिन में रिकॉर्ड करने का गिनीज रिकॉर्ड भी है मेरा। पांच बार लगातार फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड भी मुझे मिला है।

-आप ने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा भी ली है?
बिल्कुल नहीं। कोई गुरु भी हमारा नहीं है, पर हमारी फ़ैमिली म्यूजिकल है। खानदानी। बड़े भाई रापन भट्टाचार्य बंगला फ़िल्मों में म्यूजिक डॉयरेक्टर हैं। पिता जी प्योर क्लॉसिकल हैं।

-आप के इस तरह के गाने से पिता नाराज नहीं होते?
बिलकुल नहीं।

-रियाज कितनी देर करते हैँ?
रियाज बिलकुल नहीं। दिन में जो गाने गाता हूं, वहीं रियाज है।

-बंबई में घर में कौन-कौन है?
घर में मैं अकेला हूं। एक डॉग है। टाइगर।

-घर के और लोग?
दांपत्य की बात अभी खुद कर चुके हैं आप। पर मदर, ब्रदर, सिस्टर सब कलकत्ता में हैं। सब गाने बजाने में।

-इन दिनों जो पॉप का चलन चला है, आप क्या कहना चाहेंगे?
बरसाती मेंढ़क हैं। जैसे तीन-चार महीने मेंढक चलता है। आता है, जाता है। तो पॉप भी ऐसा ही है। फिर भी चेंजेज होना चाहिए, अच्छा है।

-लोक संगीत का भी पॉप में इस्तेमाल खूब हो रहा है?
फोक रिजनल है। फोक तो बेसिक है हमारा। पर पॉप में इसे ढालना ठीक नहीं है। पर सिर्फ़ फोक भी कोई नहीं सुनता, तो कुछ डाल कर लोग देख रहे हैँ। यह भी ठीक है।

-तमाम गायक इन दिनों कंपोजिंग में लग गए हैं। टीवी कार्यक्रमों के एंकर बन गए हैं?
मैं नहीं करना चाहता। इस के लिए बहुत समय चाहिए होता है। मेरे पास समय नहीं है।

-लेकिन आप बंगला फिल्मों में अभिनय कर रहे हैं, तो क्या यह माना जाए कि आप किशोर कुमार को भी फॉलो करने में लगे हैं, क्यों कि वह भी अभिनय करते थे।
इस तरह से लोग समझे तो यह बात अलग है। पर है यह को-इंसीडेंस।

-हिंदी फ़िल्मों में काम करने का इरादा है?
हिंदी फ़िल्मों में आफर तो बहुत हैं, पर काम नहीं करूंगा।

-एक गायक हैं शैंलेंद्र सिंह। उन्हों ने भी कुछ फिल्मों में काम किया, पर पिट गए। कहीं इस डर से तो नहीं, हिंदी फ़िल्में मना कर रहे हैं?
इस डर से नहीं।

-आप की जिंदगी की खास तमन्ना क्या है?
म्यूजिक डॉयरेक्टर बनना चाहता हूं।

-तो दिक्कत क्या है? आप जब चाहें, जिस को कह सकते हैँ?
जब चाहे नहीं कह सकते। सिंगिंग कैरियर को अहिस्ता कर के जाएंगे। पांच साल और गा लूं, तो उस के बारे में सोंचूं।

-आप ने कई धारावाहिकों किस्मत, अंदाज आदि में गाया है। खुद धारावाहिक नहीं बना रहे हैं?
बनाया है। बंगाली में। कुमार शानू प्रा.लि. की ओर से। डीडी-7 के लिए।

-ऐसा क्यों होता है कि चाहें हेमंत कुमार हों, एस.डी. बर्मन हों, सब के सब वापस कलकत्ते की ओर जाने लगते हैँ?

अपनी मां को कोई भूल नहीं सकता न। जहां कहीं भी जाऊं, खाऊं-पीऊं, अपनी मां को नहीं भूल सकता।

-सिनेमा और वीडियो में इन में किसके दिन ज़्यादा अच्छे दिखते हैं, आप को?
निश्चित रूप से वीडियो। वीडियो और धारावाहिक ज्यादा मार्केट में हैं। क्यों कि यह कम खर्चीला है।

-सुनते हैं आप को कारों का बड़ा शौक है?
सही सुना है। मेरे पास इस समय तीन कारें हैं। प्रीविया, शेना और सेलो। ड्राइविंग खुद भी करता हूं। जहाज में भी बैठने का शौक है।

-सुपर कैसेट्स ग्रुप के छोड़ने के बाद आप के कैरियर मे कोई फ़र्क नहीं आया?
कोई नहीं। अब यहां अनुराधा पौंडवाल हर गाने में दखल देने लगीं थीं। डिक्टेटिव नेचर था उन का। तो छोड़ दिया और फिर नौ मन का तेल जलेगा भी नहीं और मिलेगा भी नहीं तो क्या फ़ायदा।

-पर अब तो अनुराधा पौंडवाल फ़िल्मों में गाना बंद कर चुकी हैं। अब आप की वापसी हो सकती है सुपर कैसेट्स में?
अनुराधा ने गाना नहीं बंद कर दिया। लोगों ने उन्हें लेना बंद कर दिया था। पहले बोली थी कि गाऊंगी नहीं, पर अब गा रही हैं। मेरे साथ भी गा रही हैं। अब डिक्टेट नहीं करतीं।

-किस-किस संगीतकार के साथ आप अनुराधा पौंडवाल के साथ गा रहे हैँ?
अन्नू मलिक, दिलीप सेन, समीर सेन और बप्पी दा के साथ।

-ऐसा क्यों हुआ कि मुहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार की जगह तमाम लोगों ने लेनी चाही, पर किशोर कुमार की जगह तो दो-तीन लोगों ने जैसे-तैसे कवर की है, पर रफी और मुकेश की आवाजों का कोई वारिस नहीं दिख रहा?
इस लिए कि हर कोई किसी न किसी को फॉलो कर के इंडस्ट्री में आया है। फॉलो करना बुरी बात नहीं है। सहगल को मुकेश और किशोर दा ने भी फॉलो किया था। नूरजहां को लता ने फॉलो किया था और गीता दत्त को आशा भोसले ने। दुर्रानी को रफी साहब ने। पर इन सब लोगों ने अपना रास्ता बाद में अलग बनाया। आपनी अलग पहचान बनाई। अपनी क्रियेटिविटी को कायम किया। जैसा कि मैं ने भी किया किशोर दा को फॉलो कर के।

-पर किशोर कुमार की मैलोडी आप की गायकी में काफी छाई रहती है?
किशोर दा की मैलोडी ही नहीं, उनकी पूरी सिंगिंग टेक्निक, स्टाइल, एक्टिंग, ब्रोइंग सब इस्तेमाल किया।

-पर जैसे कि रफी और मुकेश की आवाज़ों की लोगों ने वल्गर कॉपी की, कान में शीशा डाला, आप इस से कैसे बच पाए?
कान में शीशा उन लोगों ने इस लिए डाला कि उस में वो अपना कुछ मिला नहीं पाए। स्कूल में टीचर को कई बार फॉलो करते हैं तो इसका मतलब तो यह नहीं होता कि हम टीचर बन जाएं।

रघुवीर सहाय: बाजा फिर बेताल हो गया

जैसे मैं ने कहा
मैं भी देश का नागरिक हूं
बाजा बेताल हो गया।

रघुवीर सहाय की यह कविता देश के तमाम-तमाम नागरिकों की विवशता, सच्चाई और उस की त्रासदी की एक निर्मम सच्चाई और उस की त्रासदी को उकेरती है। और इस त्रासदी की एक निर्मम सच्चाई यह भी है कि रघुवीर सहाय खुद भी इन तमाम नागरिकों में से एक थे। उन के निजी जीवन में हमेशा ही कुछ ऐसा घटता रहा कि बाजा बजते-बजते बेताल हो जाता रहा।

उन की कुछ दिनमानीय टिप्पणियों को छोड़ दें तो मुझे उन की कविता से ज़्यादा प्रिय उन का गद्य लगता है। बहुत भाता है उन का सरल-सहज गद्य। उन की रचनाओं में हमें उन का काल, सहजता, सौंदर्य और जिस कठिन सरलता की जो छौंक मिलती है, खास कर उनके गद्य में गमकती है, छलकती है, नासूरों को फोड़ती, विसूरती हमें कहीं बांधती चलती है कि हम उसे पूरा बांचे बिना नहीं रह पाते।
जैसे :

नीचे घास
ऊपर आकाश
ऐसा ही होता यदि जीवन में विश्वास

बहुतेरे आज भी यह कहते अघाते नहीं कि रघुवीर सहाय जब तक दिनमान के संपादक रहे, तब तक वह दिनमान पढ़े बिना रह नहीं पाते थे, खाना ही हजम नहीं होता था। तो यह भी कहने वाले भी कम नहीं हैं कि रघुवीर सहाय के जमाने का दिनमान उनके पल्ले ही नहीं पड़ता था। ऐसा कहने वाले साक्षरों को तब का दिनमान क्यों नहीं आता था समझ में? क्या सिर्फ़ इस लिए कि रघुवीर सहाय का दिनमान नारी देह के ब्यौरे देने के बजाय स्त्री की आकुलता, विवशता के ब्यौरे देता था। उसके शरीर सौष्ठव पर सिसकारियां भरने के बजाय शरीर शोषण पर सरल और तल्ख टिप्पणियां देता था। इसी लिए?

इसी लिए कि राजनेताओं के बेडरूम और उन की गासिप के बजाय विकास योजनाओं का थोथापन, राजनेताओं के थेथरपन की थाह लेता और देता था, ‘पैनी नजर’ का स्वांग नहीं भरता था। भड़काऊ विज्ञापन और देह उभारू आवरण कथाएं नहीं परोस पाता था रघुवीर सहाय का दिनमान। इसी लिए कि इसी लिए रघुवीर सहाय का दिनमान आदिवासियों के अंतहीन शोषण, नक्सलियों का जुझारूपन, कामगारों के कठिन जीवन को जगह देता था। पंचसितारा होटल या बहुमंजिले भवनों में आग से ज़्यादा तबाही होती है कि दिल्ली की सीमापुरी और मंगोलपुरी की झुग्गियों में आग ज़्यादा तबाही की तरहें बताता था इस लिए? यह और ऐसे बहुतेरे कारण हैं दिनमान के इस या उस खोने में जाने के। या कहूं कि रघुवीर सहाय को इस या उस खाने में खोजने के।

अब कि जैसे वह घोषित लोहियावादी थे, लेकिन मंडल आयोग की सिफरिशों के खिलाफ भी खुल कर खड़े हुए थे। रघुवीर सहाय का स्पष्ट मानना था कि मंडल सिफारिशों में लोहिया जी की बात है ही नहीं। लोहिया जो साठा की बात करते थे। मतलब साठ प्रतिशत आरक्षण में सिर्फ़ पिछड़ी जातियां भर नहीं है। इस साठ में सभी जातियों के पिछड़े इस में शुमार थे। महिलाओं को स्पष्ट रूप से वह पिछड़ा मानते थे।

आकाशवाणी के संवाददाता तथा कल्पना और प्रतीक के संपादक मंडल में रह चुके सहाय जी हमेशा ज़मीन के साथी रहे। वह अंग्रेजी में एम.ए. थे, लेकिन रोटी हिंदी की खाते थे। हिंदी के वह प्रखर प्रवक्ता थे। आजीवन हिंदी के लिए लड़ाई लड़ते रहे, लेकिन कभी-कभी दिक्कत भी हो जाती थी। जाने यह व्यवस्था का दोष था कि उन का खुद का कहना थोड़ा मुश्किल है। कुछ लोगों को जान कर शायद तकलीफ हो सकती है कि हिंदी के पहरुआ रघुवीर सहाय के संपादन में निकलने वाले दिनमान में भी ज़्यादातर अंग्रेजी अखबारों का उथला ही छपा करता था। क्या तो हिंदी मेंसोर्स नहीं था, लेकिन तब तो और हद हो जाती थी, जब दिल्ली की भी खबरें अंग्रेजी ही में लिखवा कर उस का हिंदी अनुवाद दिनमान में छपता था। लगता नहीं था यह वही रघुवीर सहाय हैं, जो हदें लांघते हुए हिंदी के लिए हुंकारते थे, लेकिन क्या कीजिएगा, बाजा बेताल हो जाने के क्रम में यह भी वही रघुवीर सहाय होते थे, लोहियावादी रघुवीर सहाय।

सहाय जी के जमाने में दिनमान में एक तो समाचार कम विचार ही ज़्यादा होते थे। तिस पर भी ज़्यादातर वैचारिक टिप्पणियां भी बिना किसी नाम के होती थीं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना चरचे चरखे लिगते थे और श्यामलाल शर्मा पत्रकार संसद और नियमित, लेकिन तब नाम नहीं जाता था इन का। (बाद में जाने लगा स.द.स.) यह हाल बाकी स्तंभकारों, लेखकों और रिपोर्टरों का भी था। किंचित इक्का-दुक्का ही नाम जाता था किसी का सहाय जी के दिनमान में। परंपरा भी यही थी। बाद के दिनों में टाइम्स के प्रबंधकों से भी उन की खटक गई थी। बनवारी जिन को सहाय जी 10 इंक्रीमेंट दे कर ले आए थे, पहले ही समझ गए थे कि अब सहाय जी ज़्यादा दिन दिनमान में बने रहने वाले नहीं। सो वह सहाय जी से पहले ही दिनमान छोड़ सड़क पर चले गए। बाद के दिनों में बनवारी गांधी शांति प्रतिष्ठान होते हुए जनसत्ता चले गए। पर सहाय जी के जीवन में बाजा फिर बेताल हो गया था।

वह दिनमान के संपादक नहीं रहे, नवभारत टाइम्स के सहायक संपादक के अपने पुराने पद पर स्थानांतरित कर दिए गए थे। यह उन का स्थानांतरण नहीं, अपमान था। पर कहा न बाजा बेताल हो गया था। वह नौकरी से तुरंत इस्तीफा देना चाहते थे, पर ज़िम्मेदारियां विवश किए थीं, वह लंबी छुट्टी पर चले गए। बेटियों की शादी अभी नहीं हुई थी। प्रेस एंक्लेव वाले मकान की किश्तें। बेटा भी तब नौकरी में नहीं था। अजीब सी असंमजस में उन्हों ने छुट्टियां खत्म कर नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर लिया। एक भरी-पूरी पत्रिका निकालने वाला एक प्रतिष्ठित संपादक अब चार पृष्ठों वाला रविवारीय नवभारत टाइम्स निकालने पर विवश था, फिर भी वह अपना प्रिय काम कविताओं का अनुवाद और पुस्तक समीक्षा लिखते रहे थे। फिर खबर आई कि वह स्टेट्समैन समूह से निकलने वाले हिंदी दैनिक ‘नागरिक’ के संपादक तय हो रहे हैं। फिर सुना कि वह लखनऊ से निकलने जा रहे नवभारत टाइम्स की कमान संभालेंगे। पर अंतत: हुआ यह कि वह नवभारत टाइम्स से इस्तीफा दे कर फ्रीलांसर हो गए। सहाय जी इस षडयंत्र के कोई अकले शिकार नहीं थे। इस बनियातंत्र ने पहले भी कई को तार-तार किया था। इस तंत्र को देखते हुए ही सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को सहायक संपादक बना कर जब पराग की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, तो उन्हों ने प्रिंट लाइन पर बतौर संपादक अपना नाम देने से इंकार कर दिया। बाद में उन का नाम बतौर संपादन गया, संपादक नहीं। सहाय जी के बाद दिनमान का भार संभालने वाले नंदन जी के साथ भी बनियातंत्र ने फिर वही सुलूक दुहराया, जो सहाय जी के साथ किया था। सहाय जी तो खाली दिनमान के संपादक थे, पर नंदन जी तो एक समय, एक साथ दिनमान, सारिका, पराग तीनों के संपादक रहे थे, बल्कि 10, दरियागंज के वह संपादक कहे जाते थे। वह भी बाद में नवभारत टाइम्स में फीचर संपादक बना कर रविवारीय परिशिष्ट में डाल दिए गए। नंदन जी तो फिर संडे मेल के प्रधान संपादक हुए, पर सहाय जी ने फिर कोई नौकरी नहीं की, तो नहीं की। बीच में भारत भवन खातिर किसी पीठ पर अशोक बाजपेयी ने उन्हें बुलाया तो भी वह नहीं गए। कभी-कभार वह दिल्ली की सिटी बसों में धक्के खाते रहे, पर किसी पूंजीवादी या सरकारी प्रतिष्ठान की नौकरी में नहीं गए। लेकिन नौकरी की आकुलता वह समझते थे।

मुझे एक घटना याद आती है। अचानक दिल का दौरा पड़ने से सर्वेश्वर जी का निधन हो गया था। दिल्ली से निगम बोध घाट के शवदाह गृह पर सभी शोक में थे। हरिवंश राय बच्चन भी तेजी बच्चन के साथ उपस्थित थे। सर्वेश्वर जी बरसों सहाय जी के साथ काम कर चुके थे। सहाय जी में सर्वेश्वर जी के साथ का ताप पूरे घनत्व में उपस्थित था। वह बेचैन थे कि बच्चन जी से कुछ काम की बात हो जाए और इस के लिए वह कई लोगों को तैयार कर रहे थे। काम की बात यह थी कि बच्चन जी अपने प्रभाव से सर्वेश्वर जी की जगह उन की बड़ी बिटिया को टाइम्स संस्थान में तुरंत नौकरी दिलवा दें। बच्चन जी से कहा गया तो उन्हों ने हामी भर ली और सहाय जी निश्चिंत हो गए थे। नौकरी की आकुलता वह समझते थे, उस की ज़रूरत को तीव्रता से महसूस करते थे। अज्ञेय जी ने दिनमान का जो रूप रचा था, सहाय जी ने उसे और निखारा था। पर वह उसे बाज़ार में टिकाए रखने की गरज से बाजारू नहीं बना सके, बनाना ही नहीं चाहते थे वह उसे बाज़ारू। और दिनमान का बाजा बज गया। जैसे वह दिनमान का कलेवर बाज़ारू नहीं बना पाए। खुद भी बाजार लायक नहीं बन पाए। ‘व्यवहारिक’ होने के बावजूद वह सिद्धांत की लक्ष्मण रेखा को भी जीवन भर ढोते नहीं, जीते रहे। यह वही जी सकते थे। शायद तभी जिस दूरदर्शन पर उन की बिटिया मंजरी जोशी समाचार पढ़ती रही हैं, वहीं उन के निधन की खबर नदारद थी और तो और शहर लखनऊ में उन के ‘चले’ जाने के बाद परदेस बन गया। उस लखनऊ में जिसमें कृष्ण नारायाण कक्कड़ के नेतृत्व में रघुवीर सहाय ने गलियां छानीं, जीना और लिखना सीखा, उसी शहर के लोग उन्हें सही-सलामत अंजुरी भर फूल देने की तमीज भूल गए।

[३० दिसंबर, १९९० को रघुवीर सहाय के निधन पर ३१ दिसंबर, १९९० स्वतंत्र भारत में छपी श्रद्धांजलि]

Tuesday, 30 October 2012

शेखर जोशी और श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी

गालिब के बाबत बहुत सारे किस्से सुनने और पढ़ने को मिलते हैं। कुछ खट्टे, कुछ मीठे। पर एक किस्सा अभी याद आ रहा है। उन दिनों वह बेरोजगार थे। काम की तलाश थी। किसी जुगाड़ से कि किसी की सिफ़ारिश से उन्हें दिल्ली में ही फ़ारसी पढ़ाने का काम मिल गया। पहुंचे वह पढा़ने के लिए। बाकायदा पालकी में सवार हो कर। स्कूल पहुंच कर वह बड़ी देर तक पालकी में बैठे रहे। यह सोच कर कि जो भी कोई स्कूल का कर्ता-धर्ता होगा आ कर उन का स्वागत करेगा। स्वागत के साथ उन्हें स्कूल परिसर में ले जाएगा। वगैरह-वगैरह। पर जब कोई नहीं आया बड़ी देर तक तो किसी ने उन से आ कर पूछा कि आप पालकी में कब तक बैठे रहेंगे? पालकी से उतर कर स्कूल के भीतर क्यों नहीं जा रहे? तो वह बोले कि भाई कोई लेने तो आए मुझे? कोई खैर-मकदम को तो आए ! तो उन्हें बताया गया कि यह तो मुश्किल है। क्यों कि यहां का प्रिंसिपल अंगरेज है। वह आएगा नहीं। उलटे आप को जा कर उस को सलाम बजाना पड़ेगा। तो गालिब मुस्कुराए। पालकी वाले से बोले कि चलो भाई मुझे यहां से वापस ले चलो। मैं तो समझा था कि नौकरी करने से सम्मान और रुतबा बढेगा। पर यहां तो उलटा है। जिस काम में सम्मान नहीं, अपमान मिलता हो, वह मुझे नहीं करना। और गालिब वहां से चले गए। सोचिए कि यह सब तब है जब गालिब पर शराबी, औरतबाज़, जुआरी , अंगरेजों के पिट्ठू आदि होने के भी आरोप खूब लगे हैं। तब भी वह अपमान और सम्मान का मतलब देखने की हिमाकत तो करते ही थे।
पर अब?

लखनऊ के संत गाडगे सभागार में  शेखर जोशी को
श्रीलाल शुक्ल स्मृति सम्मान, २०१२ देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के
लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव। साथ में हैं
लखनऊ के मेयर डॉ दिनेश शर्मा , और उदयशंकर अवस्थी
अब हालात बहुत बदल गए हैं। अब तो लोग सम्मान का जुगाड़ करते हैं, सम्मान खरीदते हैं, लाबीइंग करते हैं। आदि-आदि, करते हैं। वगैरह-वगैरह करते हैं। राजनीतिक, उद्योगपति, फ़िल्म आदि के लोग तो यह सब अब खुल्लमा-खुल्ला करने लगे हैं। हमारे साहित्यकार आदि भी इसी चूहा दौड़ में खुल्लम-खुल्ला दौड़ लगाने लगे हैं। प्रायोजित-नियोजित आदि सब कुछ करने लगे हैं। कुछ लोग तो अब यह सब नहीं हो पाने पर खुद ही पुरस्कार आदि भी शुरु कर लेते हैं और ले भी लेते हैं। खुद ही संस्था गठित कर लेंगे। या पत्रिका निकाल लेंगे। या मित्रवत कह कर यह सब प्रायोजित करवा लेंगे। बाकायदा खर्चा-वर्चा दे कर। तो तकलीफ़ तो होती ही है। पर यह सब तो अलग बात है। अब सब लोग जानते ही हैं कि कौन क्या कर रहा है या क्यों कर रहा है। क्या नया, क्या पुराना, क्या युवा, क्या बुजुर्ग हर कोई इस अंधी दौड़ में बेतहाशा हांफ़ रहा है। इस लिए भी कि लोगों को लगता है कि इस के बिना उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं है। आप के पास पाठक हैं कि नहीं, रचना है कि नहीं इस की कोई परवाह नहीं है। हां, पुरस्कार और सम्मान बहुत ज़रुरी है। जैसे कोई स्त्री चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, कितनी भी आधुनिक और अमीर मनाती हो पर उस की एक पुत्र पाने की लिप्सा भी उतनी ही प्रबल होती है जितनी किसी अनपढ़, गंवार और गरीब स्त्री की होती है। यह सन कांपलेक्स उसे खा डालता है। जो पैसे वाली नहीं है और कि ईश्वर से डरती है तो वह लिंग परीक्षण से भी डरती है और बेटी पर बेटी पैदा करती जाती है। पढी़ लिखी है, पैसे वाली है तो लिंग परीक्षण करवा-करवा कर अबार्शन पर अबार्शन करवाती जाती है। पर चाहिए उसे हर हाल में बेटा ही। लगभग यही हाल हमारी लेखक बिरादरी का भी हो गया है। कि उसे बेटा मतलब पुरस्कार चाहिए ही चाहिए। भले किसी की पिछाडी़ के आगे-पीछे, होना, धोना, सोना या रोना पड़े। जैसे कार्पोरेट सेक्टर की नौकरी में लोग आत्मा गिरवी रख कर हर कीमत पर प्रमोशन और इनक्रीमेंट पा लेना चाहते हैं। उन के लिए नैतिक-अनैतिक कुछ नहीं होता। वैसे ही अपनी लेखक बिरादरी में सिद्धांत स्तर पर तो नैतिक-अनैतिक तो मौखिक भाव में रहता है। पर वहीं तक जहां तक इन सब कामों में कोई बाधा नहीं पड़ती हो। ज़रा सी भी कोई बाधा आते ही यह सब मौखिक भी नहीं रह जाता। सब कुछ विसर्जित हो जाता है। मल-मूत्र की तरह। यह बडी़ दुविधा है। तब और जब लेखक नाम का प्राणी हर दूसरे को नैतिक-अनैतिक के खाने में तौलता ही रहता है। दिक्कत यहीं से शुरु होती है और बतर्ज़ धूमिल जिस की पूंछ उठाया, मादा ही पाया की स्थिति आ जाती है। यहां मादा से लैंगिक भेद या कुछ और का आशय हर्गिज़ नहीं है। इस लिए भी कि अब तो महिलाएं भी वह सारे दंद-फ़ंद करने लगी हैं, बल्कि कहीं ज़्यादा। और कि किसी हद तक महिलाएं सफल भी बहुत हैं। अपनी पूरी तुनक मिजाजी और अहंकार में तर होने के बावजूद। पुरुष उन के आगे कई बार हारने से भी लगे हैं। उन की स्त्री शक्ति कहिए या यौन शक्ति कहिए उन के बहुत काम आने लगी है। और कि खुल कर। इस शक्ति के आगे बड़े-बड़े पानी भरने लगे हैं। बहरहाल अभी यहां मुझे इस विषय पर बहुत बात नहीं करनी है, इस विषय पर फिर कभी विस्तार से बात होगी।

अभी तो यहां बात करनी है कि सम्मान कार्यक्रमों में क्या आयोजकों द्वारा लेखक का अपमान करना ज़रुरी है? और कि क्या सम्मानित होने वाले लेखक को भी इस का ध्यान नहीं रखना चाहिए? उसे ऐसे समारोहों में जाने से इंकार नहीं कर देना चाहिए। लेखकीय अस्मिता की इतनी तलब तो बनती ही है। ऐसा कुछ एक्का-दुक्का मौकों पर लेखकों ने किया भी है। खैर। बीते दिनों प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी को लखनऊ में क्रमश: दो सम्मान दिए गए। और दोनों ही सम्मान कार्यक्रमों में मुझे लगा कि उन का अपमान ही हुआ। जाने उन्हें कैसा लगा। पर मेरे जैसे उन के प्रशंसकों को तो यह सब कुछ अपमानजनक ही लगा। हालां कि इस में शेखर जोशी बिचारे भला कर भी क्या सकते थे। पर सम्मान के बहाने उन्हें लगातार दो-दो बार अपमानित होते देख कर तकलीफ़ बहुत हुई। यह ठीक है कि इस अपमान से बचना बहुत उन के वश में नहीं था। पर वह इस का प्रतिकार तो कर ही सकते थे। बच भी सकते थे। उन के पास बचने के बहाने भी थे। पर उन का बड़प्पन, उन की विनम्रता और सरलता या और जो भी हो उन्हें अपमान की इस नदी में बहा ले गई। लखनऊ में ही बीते महीने उन्हें राही मासूम रज़ा सम्मान से सम्मानित किया गया। राही मासूम रज़ा अकादमी की तरफ से। शेखर जोशी इस सम्मान को लेने के लिए इलाहाबाद से चल कर आए थे। पर एक दिक्कत यह हुई कि उसी दिन उन की पत्नी बीमार हो गईं। बीमार पत्नी को छोड़ कर वह आयोजन में पहुंचे किसी तरह। नमिता सिंह अलीगढ़ से इस सम्मान समारोह में शरीक होने आईं। पर दिक्कत यह रही कि आयोजकों ने हिंदी और उर्दू के तमाम लोगों को बुलाया तो था पर शेखर जोशी की कहानियों या उन के व्यक्तित्व पर बोलने के लिए एक भी वक्ता तय नहीं किया था। नतीज़ा यह हुआ कि सम्मान तो शेखर जोशी का हो रहा था पर बात राही मासूम रज़ा की होती रही। लगभग सभी वक्ता राही मासूम रज़ा, उन के आधा गांव, महाभारत और उन के फ़िल्मी जीवन पर बोलते रहे। लखनऊ के आलोचक वीरेंद्र यादव को शेखर जोशी पर बोलने के लिए बुलाया गया। वह माइक संभालते ही बोले कि मुझ से तो बोलने के लिए पहले कहा ही नहीं गया था। खैर वह शेखर जोशी पर बोलना शुरु किए पर दो मिनट में ही वह राही मासूम रज़ा पर आ गए। और फिर वह राही मासूम रज़ा पर ही बोलते रह गए। उस के बाद जो भी वक्ता आते शेखर जोशी को बधाई देते और राही मासूम रज़ा पर शुरु हो जाते। शेखर जोशी यह सब देख कर ऊबे। शकील सिद्दीकी भी बैठे थे। कभी उन्हों ने शेखर जोशी की कहानियों पर कोई लेख लिखा था। तो जोशी जी को यह याद आया और उन्हों ने आयोजकों को सलाह दी कि शकील सिद्दीकी से भी भाषण करवा दिया जाए। जाहिर है यह गुपचुप सलाह थी। पर कार्यक्रम संचालक इतने बड़े फ़न्ने खां थे कि उन्हों ने बाकायदा घोषणा की कि शेखर जोशी की विशेष फ़र्माइश है कि उन की कहानियों पर शकील सिद्दीकी साहब बोलें। खैर शकील सिद्दीकी आए। पर वह भी दो मिनट शेखर जोशी पर औपचारिक ढंग से बोल कर राही मासूम रज़ा पर आ गए। उर्दू के साथी तो आते ही राही मासूम रज़ा पर निसार हो जाते रहे। शेखर जोशी ज़्यादातर को याद ही नहीं रहे। एक मोहतरमा तो जो लखनऊ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा पढा़ती हैं, बाकायदा लिखित परचा लाई थीं राही मासूम रज़ा पर और बिस्मिल्ला-ए-रहीम कह कर अपनी बात भी शुरु की पर शेखर जोशी को बधाई देने की भी औपचारिकता भूल गईं। अच्छा ऐसा भी नहीं था कि आयोजक कोई नए लोग थे। तब भी वह लोग ऐसा कर गए। इस के पहले यह आयोजक लोग अपनी बिस्मिल्ला भी ऐसे ही कर चुके थे। इस एकेडमी ने पहले यह राही मासूम रज़ा एवार्ड उर्दू के मशहूर लेखक काज़ी अब्दुल सत्तार को दिया था। अब बताइए कि सत्तार साहब खुद एक मकबूल कथाकार हैं। न सिर्फ़ इतना उन्हों ने राही मासूम रज़ा को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढाया भी है। इस लिहाज़ से राही मासूम रज़ा सत्तार साहब के शिष्य हुए। पर शागिर्द के नाम का एवार्ड आयोजकों ने उस्ताद को दे दिया। और मज़ा यह कि वह आ कर ले भी गए। खैर इस पूरे आयोजन में राही मासूम रज़ा पर अच्छी चर्चा हुई। उन की कई रचनाओं का ज़िक्र लोगों ने बड़े मन से किया। उन की कई गज़लें तरन्नुम से पढ़ी गईं। नज़्में भी लोगों ने पढीं। उन के व्यक्तित्व पर भी चर्चा हुई। यह बात भी हुई कि आधा गांव तो उन्हों ने उर्दू में लिखा था पर उर्दू में वह छपा नहीं। क्यों कि उर्दू के कठमुल्लों को उस से खतरा था। पाकिस्तान बंटवारे की खिलाफ़त थी उस में। आदि-आदि। अच्छी बात हुई कुल मिला कर राही मासूम रज़ा पर। लेकिन चर्चा तो शेखर जोशी पर भी होनी चाहिए थी। जो कि नहीं हुई। यह अफ़सोसनाक था।

अफ़सोसनाक ही था श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह भी। बीते साल यह सम्मान विद्यासागर नौटियाल को दिया गया था शरद पवार के हाथ। यह नैटियाल जी का भी अपमान था। और श्रीलाल शुक्ल का भी। इस लिए भी कि नौटियाल जी जैसा एक ईमानदार और सरल आदमी राजनीति और समाज के महाभ्रष्ट आदमी के हाथ से कोई सम्मान स्वीकार करे। पर नौटियाल जी जिस व्यवस्था और तंत्र के खिलाफ़ जीवन कुर्बान किए बैठे थे, उसी व्यवस्था और तंत्र के प्रतिनिधि से वह श्रीलाल शुक्ल सम्मान लेने को अभिशप्त हुए। पांच साढे़-पांच लाख के इस सम्मान के आगे उन के सारे जीवन मूल्य और सिद्धांत तिरोहित हो गए। पर तब यह सब बातें भी तिरोहित हो गई थीं शरद पवार को पड़े थप्पड़ की गूंज में। ज़िक्र ज़रुरी है कि उन्हीं दिनों अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मुहिम नया-नया शुरु हुआ था। और उन के निशाने पर शरद पवार भी थे। एक सिख युवक ने इफ़्को द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का लाभ लिया और शरद पवार को खींच कर थप्पड़ मार दिया। यह ऐसी घटना थी कि अन्ना जैसा आदमी भी पहली प्रतिक्रिया में लड़खड़ा गया और बोल पड़ा कि, बस एक ही थप्पड़ मारा? अन्ना की इस प्रतिक्रिया की भी खूब निंदा हुई थी तब। बाद में अन्ना ने अपने इस बयान पर पानी डाला इस बयान को संशोधित कर के और इस घटना की निंदा कर के। खैर बाद में नौटियाल जी भी दुनिया से विदा हो गए।

अब की इफ़्को द्वारा श्रीलाल शुक्ल सम्मान फिर उत्तराखंड में ही जन्मे शेखर जोशी को दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार के भ्रष्टतम मंत्री शिवपाल सिंह यादव के हाथ से। इस बार भी जोशी जी के साथ एक त्रासदी गुज़री, उन की पत्नी का इसी हफ़्ते निधन हो गया। तो भी वह सम्मान समारोह में आए। उन्हें सम्मानित करने के लिए आना तो था मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को। अखबारों में इफ़्को की तरफ़ से छपे विज्ञापन में इस की घोषणा भी थी, निमंत्रण पत्र में भी। लेकिन एक दिन पहले एक पांच सितारा होटल में इफ़्को द्वारा आयोजित डिनर में ही मुख्यमंत्री ने शिरकत कर के शेखर जोशी को शाल उढ़ा कर सम्मानित कर दिया। ऐसा बताया गया। व्यक्तिगत बातचीत में। आयोजन में सार्वजनिक रुप से ऐसा कुछ भी बताने की ज़रुरत नहीं समझी गई कि आखिर मुख्यमंत्री मुख्य कार्यक्रम में क्यों नहीं आए। जंगल में मोर नाचा किस ने देखा वाली बात हो गई। बाद में चर्चा हुई कि वह नोएडा में आयोजित किसी कार्यक्रम में चले गए। अब जाने क्या हुआ। पर यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए न हो कर इफ़्को के एक कार्यक्रम में तब्दील था जिस में इफ़्को-जन की ही भीड़ और औपचारिकता थी। खचाखच भरे हाल में लग रहा था जैसे यह सारा कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए नहीं शिवपाल सिंह यादव के ईगो मसाज़और सम्मान के लिए आयोजित था। या फिर श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए। शेखर जोशी के लिए तो हरगिज़ नहीं। समूचे कार्यक्रम में इफ़्को के प्रबंध निदेशक उदयशंकर अवस्थी जिस तरह मंच पर सरे आम शिवपाल सिंह की मिजाजपुर्सी में लगे रहे, वह बहुत अश्लील था। वक्ता बोल रहे हैं और उन का मुंह शिवपाल के कान में। दोनों लोग इस तरह हंस बतिया रहे थे कि लग रहा था गोया यह लोग किसी कार्यक्रम में नहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठे गपिया रहे हों। हंसी ठिठोली कर रहे हों। ज़िक्र ज़रुरी है कि उदयशंकर अवस्थी न सिर्फ़ इफ़्को के प्रबंध निदेशक हैं बल्कि श्रीलाल शुक्ल के दामाद भी हैं। और कि आलोचक देवीशंकर अवस्थी के अनुज भी। आलोचना के लिए एक देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार भी वह चलाते हैं। खैर, श्रीलाल जी एक बड़े लेखक ही नहीं एक सुसंस्कृत व्यक्ति भी थे। उन के दामाद ने उन की याद में भी सम्मान शुरु किया सरकारी पैसे से सही, यह अच्छी बात थी। पर क्या ही अच्छा होता कि उदयशंकर अवस्थी इस श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह को शालीन और सुसंस्कृत भी बने रहने देते। साथ ही इसे कभी शरद पवार तो कभी शिवपाल सिंह यादव जैसे भ्रष्टजनों से दूर रखते और कि इसे इफ़्को का औपचारिक कार्यक्रम बनाने की बजाय एक लेखक का सम्मान समारोह ही बने रहने देते। जिस लेखक का सम्मान हो रहा हो उसी की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित व्याख्यान या फिर उसी लेखक की रचनाओं पर आधारित नाट्य कार्यक्रम आदि भी रखते तो उस लेखक का वह सचमुच सम्मान करते। इफ़्को के पैसे से श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए वह और भी कई मौके ढूंढ सकते हैं। उन की जयंती पर, उन की पुण्यतिथि पर। और फिर श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखक को याद करने के और भी कई तौर-तरीके हो सकते हैं। वह बड़े लेखक हैं। उन को रोज याद कीजिए, कोई हर्ज़ नहीं है अवस्थी जी। पर इस तरह किसी लेखक को अपमानित कर सम्मानित करने का यह तरीका ठीक नहीं है। सम्मान सहित अपमानित करने का मुहावरा शायद ऐसे ही बना होगा। फ़िराक गोरखपुरी ने शायद ऐसे ही किसी मौके से गुज़र कर यह शेर लिखा होगा कि , 'जो कामयाब हैं दुनिया में, उन की क्या कहिए/ है इस से बढ कर भले आदमी की क्या तौहीन !' संयोग से उसी इलाहाबाद में शेखर जोशी भी रहते हैं जहां फ़िराक साहब रहते थे। तो इस बात की तासीर और चुभन वह भी समझते और भुगतते होंगे।
क्या पता?

इस समारोह में अश्लीलता और अपमान की तफ़सील इतनी भर ही नहीं थी। बताइए कि सम्मान समिति के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र यादव अस्वस्थ होने के बावजूद दिल्ली से आए थे और मंच पर उपस्थित थे। बावजूद इस के शेखर जोशी के सम्मान के समय आयोजकों में से किसी भी को इस की सुधि नहीं आई कि राजेंद्र यादव को भी इस में शरीक किया जाए। उन का नाम तो पुकारा गया पर अपनी अस्वस्थता के नाते वह खुद उठ कर आ नहीं सके और दूसरे किसी को फ़ुर्सत नहीं थी कि उन्हें पकड़ कर वहां तक ले आता। इस लिए भी कि सारा मंच और आयोजन तो शिवपालमय था। राजेंद्र यादव उपेक्षित से अकले मंच पर बैठे टुकुर-टुकुर ताकते रह गए और शिवपाल के भ्रष्ट हाथों से शेखर जोशी का सम्मान कहिए, अपमान कहिए हो गया। यह मंज़र देख कर देवेंद्र आर्य का एक शेर याद आ गया : 'गरियाता हूं जिन्हें उन्हीं के हाथों से/ पुरस्कार लेता हूं इस का क्या मतलब !'

सच मानिए कि यह अपमान सिर्फ़ शेखर जोशी का ही नहीं, श्रीलाल शुक्ल का भी अपमान है और समूची लेखक बिरादरी का भी। इस पर गौर किया जाना चाहिए।

उदयशंकर अवस्थी ने अपने भाषण में कहा कि इफ़्को की तरफ़ से यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान हर साल हिंदी के किसी ऐसे लेखक को दिया जाएगा और कि दिया जा रहा है कि जो किसानों और गांव की समस्या पर कहानी लिखता हो। तो दिक्कत यह है कि इफ़्को की किसानों वाली जो भी बाध्यता या मजबूरी हो पर सच यह है कि न तो श्रीलाल शुक्ल किसानों के बारे में कोई कहानी-उपन्यास लिख गए हैं न ही विद्यासागर नौटियाल लिख गए हैं न ही शेखर जोशी ने किसानों पर कोई कहानी-उपन्यास लिखा है। यह तीनों ही शहरी मध्यवर्ग के कहानीकार हैं। हां, नौटियाल जी और शेखर जोशी ने मज़दूरों पर ज़रुर लिखा है। पर किसानों पर तो बिलकुल नहीं। यह भ्रम भी टूटना चाहिए। इतना ही नहीं निर्णायक मंडल में बैठे लोग भी किसानों या गांव पर लिखने वाले लोग नहीं थे। खैर निर्णायक मंडल के लिए यह बाध्यता होती भी नहीं। पर इस सम्मान समारोह का जो सुर था वह पूरी तरह अश्लीलल और गैर लेखकीय था। किसी लेखक को अपमानित करने वाला। बताइए कि सम्मान समारोह शेखर जोशी का था और सम्मानित शिवपाल सिंह यादव हो रहे थे। सारे बुके, स्मृति चिन्ह और शाल शिवपाल सिंह यादव के हवाले थी और सारी चर्चा श्रीलाल शुक्ल पर हो रही थी। क्या शेखर जोशी इतने बौने लेखक हैं? कि एक औपचारिक प्रशस्तिवाचन छोड़ कर उन के नाम पर कुछ और भी नहीं हो सकता था? गनीमत यही रही कि यह शिवपाल जो कभी मुलायम राज में नोएडा में घटित निठारी जैसे कांड के लिए कहते थे कि बडे़-बडे़ शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं घटती रहती हैं तो अब अखिलेश राज में अफ़सरों से अभी कहा था कि मेहनत कर के चोरी करो। फिर इलाहाबाद में महाकुंभ की तैयारियों का जायजा लेने के बाद कहा कि कमीशन में कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। ऐसी भ्रष्ट बयानबाज़ी और बेलगाम लंठई के ट्रैक पर वह इस समारोह में नहीं आए।

हां, लखनऊ में इंदिरा नगर की एक सड़क का नाम श्रीलाल शुक्ल के नाम पर करने की घोषणा ज़रुर की। इस के पहले राजेंद्र यादव ने अपने संबोधन में सम्मान राशि साढ़े पांच लाख रुपए को कम बताते हुए इसे साढे ग्यारह लाख रुपए करने की बात कही थी साथ ही यह इच्छा भी जताई कि काश हिंदी में भी कोई सम्मान राशि पचास लाख रुपए की हो जाए। तो शिवपाल ने भी सम्मान राशि को पुरस्कार राशि बताते हुए दोगुना करने की बात कही। लेकिन उदय शंकर अवस्थी इस पर चुप रहे। शिवपाल के भाषण के बाद उदघोषक ने अचानक कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी। फिर तुरंत ही कहा कि अभी श्रीलाल शुक्ल पर वीरेंद्र यादव अपना वक्तव्य देंगे। महफ़िल उखड़ चुकी थी। पूरा महौल अफ़रा-तफ़री में आ गया। शिवपाल गए, भीड़ भी चली गई। पर हाल जो खाली हुआ था फिर भर गया। यह दुबारा आए लोग नाट्य संस्था दर्पण के लोग थे। जो अपने नाटक को कभी दर्शकों की कमी नहीं महसूस होने देते। श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं पर तैयार एक नाट्य कोलाज दर्पण को तुरंत प्रस्तुत करना था। पर बोलने आए वीरेंद्र यादव। श्रीलाल शुक्ल पर। अफ़रा-तफ़री के बीच अभी वह बोल ही रहे थे कि कार्यक्रम संचालक की पर्ची आ गई। नाट्य दल के लोग भी उतावले दिख रहे थे। वीरेंद्र यादव पांच -सात मिनट ही बोले होंगे कि संचालक उन के बगल में खड़े हो गए। वक्तव्य समाप्त हो गया। कोलाज शुरु हुआ। उर्मिल थपलियाल के निर्देशन में। जैसे भारी भीड़ के बावजूद कार्यक्रम बिखरा-बिखरा था, यह कोलाज भी वैसे ही बिखरा-बिखरा था। जल्दबाज़ी में तैयार किया हुआ। दो या तीन दृष्य छोड़ कर सब बेजान। लफ़्फ़ाज़ी से ओत-प्रोत।

जल्दी ही कोलाज खत्म हो गया। बाहर बने पांडाल में नाश्ते के लिए भगदड़ थी। गोया किसी राजनीतिक पार्टी के दफ़्तर में रोजा अफ़्तार की भगदड़। लेखक लोग असहाय और भौंचक इधर-उधर। यह इफ़्को की जनता थी। यह एक नया कोलाज था। एक लेखक की अपमान कथा पूरी हो चुकी थी।

सम्मान राशि चाहे जो हो पर सम्मान तो कम से कम हो ही, लेखक का अपमान कम से कम फिर से न हो, आगे से उदय शंकर अवस्थी और इफ़्को इस बात का खयाल रखें तो क्या ही अच्छा हो। श्रीलाल शुक्ल का दामाद और देवीशंकर अवस्थी का अनुज होने के बावजूद जो लेखकीय सम्मान और लेखकीय गरिमा से उन का फिर भी परिचय न हो तो इसी लखनऊ में ही हर साल संपन्न होने वाले कथाक्रम समारोह या लमही समारोह को आ कर देख लें, जायजा और जायका ले लें। सब कुछ समझ में आ जाएगा। कथाक्रम की ओर से बीते पंद्रह बरस से आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान समारोह प्रति वर्ष आयोजित होता है। अब की साल ३ और ४ नवंबर, २०१२ को सोलहवां समारोह प्रस्तावित है। इस समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखक शिरकत करते हैं। दो दिन का जमावड़ा होता है। जिस लेखक को सम्मानित किया जाता है, उस की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित पूरा एक सत्र होता है। कोई बुजुर्ग लेखक ही सम्मानित करता है। और वो जो कहते हैं न कि न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे की तर्ज़ पर जो कहें कि इस समारोह में लेखक का सम्मान होता है और होता हुआ दिखाई भी देता है। बाकी दो या तीन सत्र में किसी एक विषय पर बहस-मुबाहिसा होता है। जैसा कि लाजिम है आपसी राजनीति, उखाड़-पछाड़ आदि भी इस समारोह का अनिवार्य हिस्सा होती ही है। इस आयोजन के संयोजक शैलेंद्र सागर भी यह सम्मान समारोह अपने पिता आनंद सागर की स्मृति में ही देते हैं। तो इस गरिमामय आयोजन से आनंद सागर की बिना कोई चरण-वंदना के आनंद सागर का भी सम्मान स्वयमेव होता ही है, सम्मानित होने वाले लेखक का भी सम्मान होता है, शैलेंद्र सागर और उपस्थित लेखकों का भी सम्मान होता है। यह सम्मान लाखों रुपए के बजाय कुछ हज़ार रुपए का ही भले होता है पर इस का पूरे देश में सम्मान होता है। प्रतिष्ठा मिलती है।

यही हाल, दो साल से शुरु हुए लमही सम्मान का भी है। स्पष्ट है कि यह प्रेमचंद की स्मृति में होता है, बिना प्रेमचंद की चरण-वंदना किए। लमही के संपादक विजय राय भी प्रेमचंद के परिवार के हैं। इन दोनों मौकों पर इन समारोहों के संयोजक-संपादक शैलेंद्र सागर और विजय राय की विनम्रता और सरलता भी देखते बनती है। सम्मान राशि प्रतीकात्मक होने के बावजूद लेखकीय गरिमा और उस की अस्मिता की तलब जगाते इस सम्मान समारोह में सचमुच लेखक का सम्मान होता है, उस की रचनाधर्मिता का सम्मान होता है। कुछ राजनीति-वाजनीति के बावजूद। उदय शंकर अवस्थी को इन या ऐसे और आयोजनों से सीख लेनी चाहिए। नहीं इस तरह तो वह सम्मानित होने वाले लेखक को तो हर साल अपमानित करेंगे ही, श्रीलाल शुक्ल के नाम की गरिमा को भी डुबो देंगे। वह अपने इर्द-गिर्द घूमने वाले चाटुकार लेखकों से भी बचें, तभी यह कर भी पाएंगे। अब इस प्रसंग का अंत भी गालिब से ही करने को मन हो रहा है। यह किस्सा अभी कुछ समय पहले कथादेश में विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी दर्ज किया था। अब्दुल हलीम शरर जिन्हों ने गालिब की जीवनी लिखी है, उन्हीं के हवाले से। क्या था कि गालिब के निंदक उन के समय में भी खूब थे। कई बार उन के निंदक उन्हें गालियों से भी नवाज़ते थे। चिट्ठियां लिख-लिख कर गरियाते थे। एक दिन शरर गालिब के साथ बैठे थे कि तभी एक चिट्ठी आ गई। चिट्ठी देख कर गालिब उदास हो गए। बोले कि फिर किसी ने गाली लिख भेजी होगी। चिट्ठी खोली पढी़ और बताया शरर को कि इस को तो गाली भी देने नहीं आती। अब बताइए कि मुझे बहन की गाली दे रहा है। इतना भी नहीं जानता कि बूढे़ आदमी को बेटी की गाली दी जाती है। बहन की गाली तो नौजवान को दी जाती है। और बच्चे को मां की गाली। तो बताइए कि अपने उस्ताद लोग तो गाली भी सही ढंग से कबूल करते थे और कि उस की तफ़सील बता गाली देने का सलीका भी बताते थे। फिर इफ़्को और उदय शंकर अवस्थी को जानना चाहिए कि वह तो गाली नहीं सम्मान दे रहे हैं और इस तरह अपमानित कर के? इस से तो श्रीलाल शुक्ल की आत्मा भी कलप जाएगी !

Saturday, 27 October 2012

लखनऊ के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलाने और गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते योगेश प्रवीन



लखनऊ के हुस्न का हाल जानना हो तो योगेश प्रवीन से मिलिए। जैसे रामकथा बहुतों ने लिखी है, वैसे ही लखनऊ और अवध का इतिहास भी बहुतों ने लिखा है। पर अगर रामकथा के लिए लोग तुलसीदास को जानते हैं तो लखनऊ की कथा के लिए हम योगेश प्रवीन को जानते हैं। अब यही योगेश प्रवीन अब की अट्ठाइस अक्टूबर को पचहत्तर वर्ष के हो रहे हैं तो उन की कथा भी बांचने का मन हो रहा है। कभी नवाब वाज़िद अली शाह ने कुल्लियाते अख्तर में लिखा था :

लखनऊ हम पर फ़िदा है हम फ़िदा-ए-लखनऊ
आसमां की क्या हकीकत जो छुड़ाए लखनऊ।


तो योगेश प्रवीन भी इस लखनऊ पर इस कदर फ़िदा और जांनिसार हैं कि लोग-बाग अब उन्हें लखनऊ का चलता फिरता इनसाइक्लोपीडिया कहते हैं। आप को लखनऊ के गली-कूचों के बारे में जानना हो या लखनऊ की शायरी या लखनऊ के नवाबों या बेगमातों का हाल जानना हो, ऐतिहासिक इमारतों, लडा़इयों या कि कुछ और भी जानना हो योगेश प्रवीन आप को तुरंत बताएंगे। और पूरी विनम्रता से बताएंगे। पूरी तफ़सील से और पूरी मासूमियत से। ऐसी विलक्षण जानकारी और ऐसी सादगी योगेश प्रवीन को प्रकृति ने दी है जो उन्हें बहुत बड़ा बनाती है। लखनऊ और अवध की धरोहरों को बताते और लिखते हुए वह अब खुद भी एक धरोहर बन चले हैं। उन का उठना-बैठना, चलना-फिरना जैसे सब कुछ लखनऊ ही के लिए होता है। लखनऊ उन को जीता है और वह लखनऊ को। लखनऊ और अवध पर लिखी उन की दर्जनों किताबें अब दुनिया भर में लखनऊ को जानने का सबब बन चुकी हैं। इस के लिए जाने कितने सम्मान भी उन्हें मिल चुके हैं।

लखनऊवा नफ़ासत उन के मिजाज और लेखन दोनों ही में छलकती मिलती है। उन्हें मिले दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान भी उन्हें अहंकार के तराजू पर नहीं बिठा पाए। वह उसी मासूमियत और उसी सादगी से सब से मिलते हैं। उन से मिलिए तो लखनऊ जैसे उन में बोलता हुआ मिलता है। गोया वह कह रहे हों कि मैं लखनऊ हूं ! लखनऊ पर शोध करते-करते उन का काम इतना बडा़ हो गया कि लोग अब उन पर भी शोध करने लगे हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय की हेमांशु सेन का योगेश प्रवीन पर शोध यहां कबिले ज़िक्र है। लखनऊ को ले कर योगेश प्रवीन के शोध तो महत्वपूर्ण हैं ही, लखनऊ के मद्देनज़र उन्हों ने कविता, नाटक आदि भी खूब लिखे हैं। लखनऊ से यह उन की मुहब्बत ही है कि वह लिखते हैं :

लखनऊ है तो महज़, गुंबदो मीनार नहीं
सिर्फ़ एक शहर नहीं, कूच और बाज़ार नहीं
इस के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलते हैं
इस की गलियों में फ़रिश्तों के पते मिलते हैं

जैसे इटली के रोम शहर के बारे में कहा जाता है कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ वैसे ही लखनऊ का निर्माण भी कोई एक-दो दिन में नहीं हुआ। किसी भी शहर का नहीं होता। तमाम लोगों की तरह योगेश प्रवीन भी मानते हैं कि राजा राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने इस नगर को बसाया। इस नगर को लक्ष्मणपुरी से लक्ष्मणावती और लखनावती होते हुए लखनऊ बनने में काफी समय लगा। प्रागैतिहासिक काल के बाद यह क्षेत्र मौर्य,शुंग, कुषाण, गुप्त वंशों और फिर कन्नौज नरेश हर्ष के बाद गुर्जर प्रतिहारों, गहरवालों, भारशिवों तथा रजपसियों के अधीन रहा है। वह मानते हैं कि इन सभी युगों की सामग्री जनपद में अनेक स्थानों से प्राप्त हुई है। लक्ष्मण टीले, गोमती नगर के पास रामआसरे पुरवा, मोहनलालगंज के निकट हुलासखेडा़ एवं कल्ली पश्चिम से प्राप्त अवशेषों ने लखनऊ के इतिहास को ईसा पूर्व लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व तक पीछे बढा़ दिया है। ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच यहां मुसलमानों का आगमन हुआ। इस प्रकार यहां के पूर्व निवासी भर, पासी, कायस्थ तथा ब्राह्मणों के साथ मुसलमानों की भी आबादी हो गई।

योगेश प्रवीन ने न सिर्फ़ लखनऊ के बसने का सिलसिलेवार इतिहास लिखा है बल्कि लखनऊ के सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व का भी खूब बखान किया है। कई-कई किताबों में। दास्ताने अवध, ताजेदार अवध, गुलिस्ताने अवध, लखनऊ मान्युमेंट्स, लक्ष्मणपुर की आत्मकथा, हिस्ट्री आफ़ लखनऊ कैंट, पत्थर के स्वप्न,अंक विलास आदि किताबों में उन्हों ने अलग-अलग विषय बना कर अवध के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। जब कि लखनऊनामा, दास्ताने लखनऊ, लखनऊ के मोहल्ले और उन की शान जैसी किताबों में लखनऊ शहर के बारे में विस्तार से बताया है। एक से एक बारीक जानकारियां। जैसे कि आज की पाश कालोनी महानगर या चांदगंज किसी समय मवेशीखाने थे। आज का मेडिकल कालेज कभी मच्छी भवन किला था। कि फ़्रांसीसियों ने कभी यहां घोड़ों और नील का व्यापार भी किया था। कुकरैल नाले के नामकरण से संबंधित जनश्रुति में वफ़ादार कुतिया को दंडित करने और कुतिया के कुएं में कूदने से उत्पन्न सोते का वर्णन करते हुए दास्ताने लखनऊ में योगेश प्रवीन लिखते हैं, ' जिस कुएं में कुतिया ने छलांग लगाई उस कुएं से ही एक स्रोत ऐसा फूट निकला जो दक्षिण की तरफ एक छोटी सी नदी की सूरत में बह चला। इस नदी को कुक्कर+ आलय का नाम दिया गया जो मुख सुख के कारण कुक्करालय हो गया फिर प्रयत्न लाघव में कुकरैल कहा जाने लगा।'

वह कैसे तो गुलिस्ताने अवध में बारादरी की आत्मकथा के बहाने लखनऊ का इतिहास लिखते हैं, ' फिर इस मिट्टी से एक तूफ़ान उठा जिस ने नई नवेली विदेशी सत्ता की एक बार जड़ें हिला दीं। इस तूफ़ान का नाम गदर था। बेगम हज़रतमहल ने जी-जान से सन सत्तावन की इस आग को भड़काया था। मैं ने हंस के शमाएं वतन के परवानों को इस आग में जलते देखा है। राजा जिया लाल सिंह को फांसी पर चढ़ते देखा है और मौलवी अहमदुल्ला उर्फ़ नक्कारा शाह की जांबाज़ी के नमूने देखे हैं, मगर मुद्दतों से मराज और मोहताज़ हिंदुस्तानी एक अरसे के लिए गोरों की गिरफ़्त में आ गए।

'कैसरबाग लूट लिया गया। करोड़ों की संपदा कौड़ी के मोल बिक रही थी। जिन के पांवों की मेंहदी देखने को दुनिया तरसती थी, वह बेगमात अवध नंगे सिर बिन चादर के महल से निकल रही थीं। जो नवाबज़ादे घोड़ी पर चढ़ कर हवाखोरी करते थे वे फ़िटन हांकने लगे थे।'

लक्ष्मणपुर की आत्मकथा में अवध शैली की उत्त्पत्ति के बारे में वह लिखते हैं, ' लखनऊ के स्वाभाविक आचरण के अनुरुप यहां राजपूत तथा मुगल वास्तु-कला शैली के मिले-जुले स्थापत्य वाले भवन बड़ी संख्या में मिलते हैं। भवन निर्माण कला के उसी इंडोसिरेनिक स्टाइल में कुछ कमनीय प्रयोगों द्वारा अवध वास्तुकला का उदय हुआ था।' वह लिखते हैं कि, 'लखौरी ईंटों और चूने की इमारतें जो इंडोसिरेनिक अदा में मुसकरा रही हैं, यहां की सिग्नेचर बिल्डिंग बनी हुई हैं।' वह आगे बताते हैं, ' इन मध्यकालीन इमारतों में गुप्तकालीन हिंदू सभ्यता के नगीने जड़े मिलेंगे। दिल्ली में गुलाम वंश की स्थापना काल से मुगलों की दिल्ली उजड़ने तक शेखों का लखनऊ रहा। इन छ: सदियों में सरज़मींने अवध में आफ़तों की वो आंधियां आईं कि हज़ारों बरस पहले वाली सभ्यता पर झाड़ू फिर गई। नतीज़ा यह हुआ कि वो चकनाचूर हिंदू सभ्यता या तो तत्कालीन मुस्लिम इमारतों में तकसीम हो गई या फिर लक्ष्मण टीला, किला मौहम्मदी नगर और दादूपुर की टेकरी में समाधिस्थ हो कर रह गई और यही कारण है कि लखनऊ तथा उस के आस-पास मंदिरों में खंडित मूर्तियों के ढेर लगे हैं।'

यह और ऐसी बेशुमार जानकारियां योगेश प्रवीन की किताबों में समाई मिलती हैं। तो बहारे अवध में लखनऊ के उत्तर-मध्य काल की तहज़ीब, रीति-रिवाज़, जीवन शैली, हिंदू और मुस्लिम-संस्कृति के इतिहास और उस के प्रभाव के बारे में उन्हों ने बड़ी तफ़सील से लिखा है। लखनऊ की शायरी जहान की ज़ुबान पर भी उन की एक बेहतरीन किताब है। लखनऊ से जुड़े तमाम शायरों मीर, हसरत मोहानी से लगायत मजाज, नूर, वाली आसी, मुनव्वर राना और तमाम शायराओं तक की तफ़सील से चर्चा है। और उन की शायरी की खुशबू भी। योगेश प्रवीन की ताजदारे अवध के बारे में अमृतलाल नागर ने लिखा था कि यह सत्यासत्य की दुर्गम पहाड़ियों के बीच कठिन शोध का परिणाम है। ज़िक्र ज़रुरी है कि अमृतलाल नागर की रचनाभूमि भी घूम-फिर कर लखनऊ ही रही है। गुलिस्ताने अवध की चर्चा करते हुए शिवानी ने लिखा है, ' गुलिस्ताने अवध में वहां के नवाबों की चाल-चलन, उन की सनक, उन का विलास-प्रिय स्वभाव, सुंदरी बेगमें, कुटिल राजनीति की असिधार में चमकती वारांगनाएं, अनिवार्य ख्वाजासरा, नवीन धनी इन सब के विषय में योगेश ने परिश्रम से लिखा है।' डूबता अवध के बारे में नैय्यर मसूद ने लिखा है कि किताब का नाम तो डूबता अवध है लेकिन हकीकत यह है कि इस किताब में हम को पुराना अवध फिर एक बार उभरता दिखाई देता है।

यह अनायास नहीं है कि जब कोई फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने लखनऊ आता है तो वह पहले योगेश प्रवीन को ढूंढता है फिर शूटिंग शुरु करता है। वह चाहे शतरंज के खिलाड़ी बनाने आए सत्यजीत रे हों या जुनून बनाने आए श्याम बेनेगल हों या फिर उमराव जान बनाने वाले मुजफ़्फ़र अली या और तमाम फ़िल्मकार। योगेश प्रवीन की सलाह के बिना किसी का काम चलता नहीं। ज़िक्र ज़रुरी है कि आशा भोसले, अनूप जलोटा, उदित नारायण, अग्निहोत्री बंधु समेत तमाम गायकों ने योगेश प्रवीन के लिखे भजन, गीत और गज़ल गाए हैं।

वैसे तो पेशे से शिक्षक रहे योगेश प्रवीन ने कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता आदि तमाम विधाओं में बहुत कुछ लिखा है। पर जैसे पूरी गज़ल में कोई एक शेर गज़ल का हासिल शेर होता है और कि वही जाना जाता है। ठीक वैसे ही योगेश प्रवीन का कुल हासिल लखनऊ ही है। वह लिखने-बोलने और बताने के लिए लखनऊ ही के लिए जैसे पैदा हुए हैं। लखनऊ, लखनऊ और बस लखनऊ ही उन की पहचान है। उन से मैं ने एक बार पूछा कि आखिर अवध और लखनऊ के बारे में लिखने के लिए उन्हें सूझा कैसे? कि वह इसी के हो कर रह गए? तो वह जैसे फिर से लखनऊ में डूब से गए। कहने लगे कि छोटी सी छोटी चीज़ को भी बड़े औकात का दर्जा देना लखनऊ का मिजाज है, इस लिए। यहां लखौरियों से महल बन जाता है। कच्चे सूत का कमाल है, चिकन ! है किसी शहर में यह लियाकत? वह कहने लगे जादू सरसो पे पढ़े जाते हैं, तरबूज पर नहीं। आप दुनिया के किसी शहर में चले जाइए, कुछ दिन रह जाइए या ज़िंदगी बिता दीजिए पर वहां के हो नहीं पाएंगे। पर लखनऊ में आ कर कुछ समय ही रह लीजिए आप यहां के हो कर रह जाएंगे। आप लखनाऊवा हो जाएंगे। वह बताने लगे कि एक बार अपनी जवानी के दिनों में वह एक रिश्तेदारी में हैदराबाद गए। वहां एक प्रदर्शनी देखने गए। प्रदर्शनी में लखनऊ की बहुत गंदी तसवीर दिखाई गई थी। एक पिंजरे में बटेर, पतंग, मुजरा, हिजडा़, मुर्गा, झाड़-फ़ानूश आदि यहां की विलासिता। लखनऊ के सामाजिक इतिहास का कोई ज़िक्र नहीं, सिर्फ़ अपमान। तो मुझे बहुत तकलीफ़ हुई। फिर जब मुझे पढ़ने-लिखने का होश हुआ और मैं ने समाज में आंख खोली तो मैं ने देखा कि अवध कल्चर और लखनऊ का नाम लेते ही लोगों के सामने एक पतनशील संस्कृति, एक ज़नाने कल्चर और नाच-गाने का स्कूल, जहां रास-विलास का बडा़ प्रभाव है, यही तसवीर बन कर सामने आ जाता है। वह बताते हैं कि मुझे बहुत दुख हुआ और लगा कि हमारे समाज को राजघराने का इतिहास ही नहीं, आम आवाम का इतिहास भी जानना चाहिए। जो कि कहीं कायदे से नहीं लिखा गया। अब देखिए कि १८५७ की जंगे-आज़ादी में लखनऊ की जो भूमिका रही है वो किसी की नहीं है। ईस्ट इंडिया कंपनी के ४ दुर्दांत सेना नायकों में से सिर्फ़ एक कालिन कैंपबेल ही यहां से सही सलामत लौट पाया था। लखनऊ का कातिल हेनरी लारेंस, कानपुर का ज़ालिम जनरल नील, दिल्ली का धूर्त नृशंस मेजर हडसन तीनों लखनऊ में यहां के क्रांतिकारियों द्वारा मार गिराए गए। और लखनऊ का मूसाबाग, सिकंदरबाग, आलमबाग, दिलकुशा, कैसरबाग, रेज़ीडेंसी के भवन हमारे पूर्वजों की वीरता के गवाह हैं। हिंदी की पहली कहानी रानी केतकी की कहानी यहीं लखनऊ के लाल बारादरी भवन के दरबार हाल में सैय्यद इंशा अल्ला खां इंशा द्वारा लिखी गई। उर्दू का विश्वविख्यात उपन्यास उमराव जान अदा यहां मौलवीगंज में सैय्यद इशा अल्ला खां इंशा द्वारा लिखा गया। हिदुस्तान का पहला ओपेरा इंदर-सभा यहां गोलागंज में मिर्ज़ा अमानत द्वारा लिखा गया। मामूली से मामूली को बडा़ से बडा़ रुतबा देना लखनऊ का मिजाज है। दूर-दूर के लोगों तक को अपना बना लेने का हुनर लखनऊ के पास है। उर्दू शायरी का लखनऊ स्कूल आज भी दुनिया में लाजवाब है। जाहिर है कि यह सारी बातें योगेश प्रवीन के पहले भी थीं पर लोग कहते नहीं थे। लखनऊ की छवि सिर्फ़ एक ऐय्याश संस्कृति से जोड़ कर देखी जाती थी। पर दुनिया के नक्शे में लखनऊ को एक नायाब संस्कृति और तहज़ीब से जोड़ कर देखने का कायल बनाया योगेश प्रवीन, उन के शोध और उन के लिखे लखनऊ के इतिहास ने। योगेश प्रवीन के लखनऊ से इश्क की इंतिहा यही भर नहीं है। योगेश प्रवीन की मानें तो लखनऊ बेस्ट कंपोज़िशन सिटी आफ़ द वर्ड है। लखनऊ का दुनिया में कोई जोड़ नहीं है। बेजोड़ है लखनऊ।


लगता है कि जैसे योगेश प्रवीन को ईश्वर और प्रकृति ने लखनऊ का इतिहास लिखने ही के लिए दुनिया में भेजा था। नहीं योगेश प्रवीन तो लखनऊ के मेडिकल कालेज में मेडिकल की पढ़ाई के लिए एडमीशन ले चुके थे। सी.पी.एम.टी. के मार्फ़त। उन्हें बनना तो डाक्टर था। पर बीच पढ़ाई में वह बीमार पड़ गए। मेडिकल कालेज से पढ़ाई कर बनने वाला डाक्टर अब डाक्टरों के चक्कर लगाने लगा। एक बार तो उन्हें मृत समझ कर ज़मीन पर लिटा भी दिया गया। वह बताते हैं कि खैर किसी तरह उठा तो फिर कलम उठा कर ही अपने को संभाला किसी तरह। पढ़ाई छूट गई। टाइम पास करने के लिए वह अपने एक रिश्तेदार की कोचिंग में केमिस्ट्री पढ़ाने लगे, सीपी.एम.टी. की तैयारी करने वाले लड़कों को पढ़ाने लगे। मुफ़्त में। कि तभी विद्यांत कालेज में किसी ने कहा कि वहां मुफ़्त में पढ़ाते हो, यहां आ कर पढा़ओ, पैसा भी मिलेगा। तो वहां पढ़ाने लगा। इंटर तक पढा़ था। फिर धीरे-धीरे हिंदी में एम. ए. किया, लेक्चरर हो गया। फिर संस्कृत में भी एम.ए,. किया। लखनऊ से इश्क था ही लखनऊ पर लिखने लगा। ज़िक्र ज़रुरी है कि योगेश प्रवीन चिर कुंवारे हैं। बीमारी के चक्कर में विवाह नहीं किया। फिर लखनऊ से इश्क कर लिया। अपने कुंवारेपन और लिखने-पढ़ने के शौक पर वह ज़ौक का एक शेर सुनाते हैं, 'रहता सुखन से नाम कयामत तलक है ज़ौक/ औलाद से तो बस यही दो पुश्त, चार पुश्त!'

योगेश प्रवीन पर अपनी मां श्रीमती रमा श्रीवास्तव का सब से ज़्यादा प्रभाव दिखता है। रमा जी भी साहित्यकार थीं। उस दौर में भी उन की दो किताबें छपी थीं। संचित सुमन नाम से कविता संग्रह और मधु सीकर नाम से कहानी संग्रह। वह बातचीत में अकसर अपनी मां का ज़िक्र करते मिलते हैं। उन की जुबान पर मां और लखनऊ जितना होते हैं कोई और नहीं। जैसे लखनऊ के किस्से खत्म नहीं होते वैसे ही योगेश प्रवीन के किस्से भी खत्म होने वाले नहीं हैं। बहुतेरी बातें, बहुतेरे फ़साने हैं लखनऊ और उस से योगेश प्रवीन की आशिकी के। ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में जाने आलम वाजिद अली शाह ने कलकत्ते में अपनी नज़रबंदी के दौरान कहा था कि, ' कलकत्ता मुल्क का बादशाह हो सकता है लेकिन रुह का बादशाह लखनऊ ही रहेगा क्यों कि इंसानी तहज़ीब का सब से आला मरकज़ वही है।' आला मरकज़ मतलब महान केंद्र। तो योगेश प्रवीन भी शायद लखनऊ में उसी रुह का आला मरकज़ ढूंढते फिरते रहते हैं। तभी तो वह लखनऊ की गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते फिरते हैं किसी फ़कीर के मानिंद। और लखनऊ के आंचल में खिलता हुआ फूल पा जाते हैं। यह आसान नहीं है। वाज़िद अली शाह के ही एक मिसरे में जो कहें कि दरो दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं। लखनऊ के प्रति उन की दीवानगी को देखते हुए उन्हें लखनऊ का मीरा कहने को जी चाहता है। हालां कि अब लखनऊ काफी बदल गया है। यह लक्ष्मणपुरी, नवाबों की नगरी से आगे अब आई. टी. हब बनने की ओर अग्रसर है। तो भी उन्हीं के शेर में जो कहूं कि, 'तब देख के छिपते थे, अब छिप के देखते हैं/ वो दौरे लड़कपन था, ये रंगे जवानी है।' अब जो भी हो जाए पर लखनऊ से मीरा की तरह आशिकी फ़रमाने वाला योगेश प्रवीन तो बस एक ही रहेगा। कोई और नहीं। उन को इस कौस्तुभ जयंती पर बहुत-बहुत सलाम ! बहुत-बहुत सैल्यूट ! ईश्वर करे कि वह शतायु हों और लखनऊ के आंचल में खिलते फूलों को और विस्तार दें और इसी मासूमियत से यहां की गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते हुए ही लखनऊ पर जांनिसार रहें, अपनी पूरी मासूमियत और रवानी के साथ।

[आप चाहें तो योगेश प्रवीन जी को उन की 75 वीं जयंती पर बधाई देने के लिए उन से इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं : 09336861204 ]

Tuesday, 23 October 2012

शिवमूर्ति की स्वीकृति का बैंड-बाजा

चंद्रधर शर्मा गुलेरी के बाद हिंदी कहानी में सब से कम लिख कर अगर कोई दूसरा नाम मुझे सूझता है तो वह नाम है ज्ञानरंजन का। तीसरा नाम है शिवमूर्ति और चौथा नाम है उदय प्रकाश का। ज्ञानरंजन के पास तो गुलेरी की तरह एक उपन्यास भी नहीं है। उदय प्रकाश ने तो कम लिख कर भी अंतरराष्ट्रीय छवि अर्जित कर ली है। वह हिंदी से ज़्यादा विदेशी भाषाओं में अब पाए जाते हैं। वह कई बार साफ-साफ बोल भी जाते हैं। बाज़ दफ़ा वह ठकुरसुहाती करने वालों पर प्रहार भी कर लेते हैं सो बहुतेरे उन के खिलाफ़ खड़े हुए दीखते हैं, लगभग दुश्मनी की हद तक। लेकिन उदय प्रकाश हथियार नहीं डालते। प्रहार और तेज़ कर देते हैं। इस से उपजा अवसाद भी वह कभी किसी से छुपाते नहीं। सो विदेशी भाषाओं में भले वह दुलरुआ हैं पर हिंदी में उन के निंदक कई एक मिल जाते हैं। लेकिन उन की रचनाओं का बाल भी बांका नहीं होता और उन की टी.आर.पी. बढ़ती जाती है। उन की कहानियों की मिठास आलोचना की आंच का पाग पा कर और बढ़ जाती है। ज्ञानरंजन की स्थिति उदय प्रकाश जैसी तो नहीं है पर हिंदी में तमाम चर्चा के बावजूद वह भी दुलरुवा नहीं हैं। उन के निंदक भी बहुतेरे मिल जाते हैं। पर जैसे कोई गुलेरी का कोई निंदक नहीं मिलता, शिवमूर्ति को भी कोई निंदक नहीं मिलता । हां, भीतर-भीतर जलता-भुनता हुआ एक तबका ज़रुर दिखता है। अकुलाता और अफनाता हुआ। उन की प्रसिद्धि की आंच में झुलसता और खीजता हुआ।

मैं समझता हूं कि कम लिख कर ज़्यादा चर्चित लोगों में कथामूर्ति शिवमूर्ति ने जितना लिखा है, उस से ज़्यादा ही उन पर लिखा गया है। यह सौभाग्य मैं समझता हूं हिंदी में सिर्फ़ शिवमूर्ति को ही नसीब है। लेकिन शिवमूर्ति खतरे नहीं उठाते। उन की कहानियां या उपन्यास भी खतरे से खारिज़ हैं। हां, वह अपने पाठकों और पात्रों के बीच एक ऐसा मधुमास रचते हैं जिस की धूप मीठी लगती है, तीखी नहीं। जैसे कभी ज्ञानरंजन शहरी मध्यवर्ग की कहानियां लिख कर, उन के बारीक व्यौरे परोस कर आज तक हिंदी कथा-जगत में खलबली मचाए हुए हैं, ठीक वैसे ही शिवमूर्ति गंवई निम्न-वर्ग या मध्य-वर्ग की कहानियां लिख कर, दबे कुचलों की धूप-बरसात, दिखा कर सन्नाटा तोड़ते दीखते हैं। वह अपनी कहानियों में एक सिनेमाई जादू रचते हैं। जैसे कभी द्विजेंद्रनाथ मिश्र निर्गुण रचते थे। निर्गुण की कहानियों में भी मध्य-वर्ग का मधुमास और उस की इमली सी खट- मिठास वैसे ही मिलती है जैसे शिवमूर्ति के यहां मिलती है। शिवमूर्ति की एक बहुत बड़ी थाती है उन की औरतें। उन की कहानी की औरतें भी और उन की ज़िंदगी की औरतें भी। एकदम उन की कहानियों और ज़िंदगी की तरह दिखने में ऊबड़-खाबड पर भीतर से पूरी तरह से व्यवस्थित। चाक-चौबंद। इतना व्यवस्थित, संतुष्ट और निश्चिंत लेखक हो सकता है और भी हों पर मुझे शिवमूर्ति के सिवाय हिंदी में कोई और नहीं दिखता। संघर्ष तो बहुतेरे लेखकों के जीवन में है पर शिवमूर्ति जैसा जीवन-संघर्ष भी बिलकुल अकेला है।

अब दिक्कत यह है कि हिंदी में आलोचक पहले तो फ़ासिस्ट हुए फिर आलसी सो आलोचना नाम की संस्था लगभग समाप्त है। सो आलोचना में अब एक भेड़-चाल की सी स्थिति है। कोई एक भेड़ जिस राह पर चलती है, सभी भेंड़ें उसी राह चल निकल पड़ती हैं। फिर राह पकड़ कर तू एक चला चल मिल जाएगी मधुशाला वाली स्थिति तो है ही। समीक्षा अब जैसे मूंगफली हो गई है। टाइम काटने के लिए। अब एक कवि, अपने परिचित या दोस्त कवि के लिए लिखता है, मूंगफली की तरह, कोई कहानीकार, अपने दोस्त कहानीकार के लिए लिखता है। सिर्फ़ चर्चा के स्तर पर या सूचना के स्तर पर। आज-कल तो संपादक भी सिर्फ़ दोस्ती ही निभाते हैं, रचना से उन का कोई सरोकार नहीं, रचनाकार की शकल से मतलब रह गया है या फिर अपने अहंकार से मतलब है। सो संपादकों और पत्रिकाओं की स्थिति तो और बुरी है। सो सब कुछ के बावजूद शिवमूर्ति पर लिखा तो खूब गया है लेकिन जैसे तुलसी दास या प्रेमचंद के लिए रामचंद्र शुक्ल ने लिखा, कबीर के लिए हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा निराला के लिए रामविलास शर्मा ने लिखा, निर्मल वर्मा के लिए नामवर सिंह ने लिखा या फिर फणीश्वरनाथ रेणु के लिए सेल्यूलाइड के परदे पर जैसा शैलेंद्र ने लिखा बरास्ता बासु भट्टाचार्य वैसा अभी ज्ञानरंजन, उदय प्रकाश और शिवमूर्ति जैसे लेखकों पर नहीं लिखा गया है। अब इस शार्ट-कट और ठकुरसुहाती के दौर में कब और कौन लिखेगा इन कथामूर्तियों पर कहना कठिन है।

शिवमूर्ति जैसे लेखकों के लिए एक चुनौती और है कि प्रेमचंद की परंपरा की बात तो बहुत होती है इन की पैरवी में पर अभी तक हिंदी में एक भी लेखक ऐसा नहीं हो पाया है जिस के खाते में प्रेमचंद की तरह प्राइमरी कक्षा से लगायत एम.ए. तक पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम लायक रचनाएं हों। प्रेमचंद की परंपरा की बात और पैरवी करना तो बहुत आसान है पर ईदगाह, पंच परमेश्वर, कफन, पूस की रात से लगायत रंगभूमि, गोदान तक की अनमोल यात्रा किसी भी के पास नहीं है। शिवमूर्ति के पास भी नहीं। लेकिन शिवमूर्ति के पास एक ऐसा अनुभव संसार है, समय है, मन है और कि स्वास्थ्य और सुविधाएं भी कि वह प्रेमचंद के इस प्रतिमान को न सिर्फ़ छू सकते हैं बल्कि उसे और आगे भी बढा सकते हैं। इस लिए भी कि वह अभी भी लिख रहे हैं, ज्ञानरंजन लिखना बरसों से छोड़ चुके हैं, उदय प्रकाश अंतरराष्ट्रीय हो चुके हैं, सिनेमा वगैरह में उलझ चुके हैं। शिवमूर्ति के पास ऐसा कोई स्पीड-ब्रेकर नहीं है। न ही अहंकार पालने और उस में बिला जाने के लिए वह किसी पत्रिका के संपादक हैं। उन के लिए यह बहुत बड़ी सुविधा है। ज़िम्मेदारियों से मुक्त हैं। अनुभव-संपदा के साथ-साथ उन के पास गहन यायावरी भी है, उन की पत्नी और बच्चे भी यही चाहते हैं कि 'ए' कुछ बड़ा लिखें। साहित्य अकादमी वगैरह उन को नहीं मिला है, वह इन चिंताओं को भी अपने विशाल पाठक-संसार के प्यार से धो सकते हैं। कमलेश्वर, अमरकांत, मनोहर श्याम जोशी, काशीनाथ सिंह आदि की तरह प्रतीक्षारत भी रह सकते हैं।

दो पत्रिकाओं मंच और लमही ने दो साल के भीतर ही जिस तरह बारी-बारी उन पर केंद्रित अंक निकाले हैं वह हर्ष का विषय तो है ही, उन की स्वीकृति का बैंड-बाजा भी है। उन की लोकप्रियता का मानक भी। पर लमही में अपनी एक टिप्पणी में जो बात दूधनाथ सिंह ने कही है वह भी एकदम से टाल देने वाली नहीं है। दूधनाथ लिखते हैं :

समकालीन हिंदी कथा साहित्य में शिवमूर्ति की छवि एक भले मानुष की है। वह सब के मित्र हैं। किसी के बारे में बुरा नहीं कहते और भला भी नहीं कहते। हिंदी के आधुनिक समाज में इस तरह का निरपेक्ष नाम लोकप्रियता की एक बहुत बड़ी साधना और पूंजी है। यह घातक और क्रूर है। ऐसे लोग अच्छे नहीं होते क्यों कि वे अपनी अधिकांश धारणाएं गोपनीय बना कर रखते हैं। फूलने-फलने का यह कायदा हिंदी में इन दिनों आम तौर पर प्रचलित है। शिवमूर्ति भी कुछ ऐसे सय, सुसंकृत, भोले-भाले, कठोर और मन में सब को ठेंगे पर रखने वाले इंसान हैं यह हिंदी लेखकों की एक अनन्य इच्छा भी है।

शिवमूर्ति को दूधनाथ सिंह के इस कहे पर गौर ज़रुर करना चाहिए।

नहीं अभी और बिलकुल अभी पाखी ने भी ज्ञानरंजन पर केंद्रित एक अंक निकाला है। पाखी में ज्ञानरंजन के लिए एक भरा-पूरा प्रतिपक्ष भी है। पर बीते साल मंच और अब की साल लमही ने जो शिवमूर्ति पर अंक केंद्रित किए हैं, इन दोनों ही पत्रिकाओं में शिवमूर्ति का प्रतिपक्ष बिलकुल नदारद है। है भी तो दशमलव शून्य के बराबर भी नहीं। जैसे लमही में यह दूधनाथ की टिप्पणी है। या मंच में एक जगह राजेंद्र यादव अपने पत्र में चुटकी काटते हुए पूछते हैं कि, 'तुम ने अपने कुछ गुणों के विज्ञापन के लिए राजेंद्र राव से कितने का सौदा किया? और?' पर यह कुछ-कुछ गुदगुदाने और परिहास के ही भाव में ही है। ठीक वैसे ही जैसे राजेंद्र यादव शिवमूर्ति को कभी दुष्ट शिरोमणि या राक्षस शिरोमणि से संबोधित करते मिलते हैं। तो इस में उन का प्यार भी छलकता है और वात्सल्य भी। जैसे कि अपनी डायरी में ही एक जगह शिवमूर्ति अपनी बीमारी और अस्पताल के व्यौरे बांचते हुए लिखते हैं कि : 'यादव जी पास आ गए। बोले-तुम हरामी हो। सुंदर चेहरों से घिरे हो इस लिए घर जाने का जल्दी नाम नहीं लोगे। मैं मुस्करा उठा। बेचारी सी मुस्कराहट। पास खड़ी नर्स भी मुस्कराने लगी।'

एक दिक्कत और है इन पत्रिकाओं में कि इन में शिवमूर्ति की रचनाओं से ज़्यादा बात और चर्चा उन के व्यक्तित्व पर है। व्यक्तित्व बहुत ज़रुरी है, पर रचना ज़्यादा ज़रुरी है। मेरा मानना है कि शिवमूर्ति की रचना पर ज़्यादा बात होनी चाहिए। इस लिए भी कि शिवमूर्ति के व्यक्तित्व से बड़ी उन की रचनाएं हैं। यह ठीक है कि उन का जीवन भी, जीवन संघर्ष उन की रचनाओं जितना ही उद्वेलित करता है, उन का संघर्ष भी अब मोहित करता है। इस लिए कि उन्हों ने अपनी कहानियों में रावणों की शिनाख्त कर दी है। अब अगर उन की कहानियां न होतीं तो उन के संघर्ष को भला कोई क्यों अगरबत्ती दिखाता? कहानियां हैं तभी उन का यह संघर्ष है। नहीं इस से भी ज़्यादा और लोमहर्षक संघर्ष आज भी करोड़ों लोगों के जीवन में हलकोरे मार रहा है। लेकिन हम उन करोड़ों लोगों के संघर्ष को भूल जाते हैं, शिवमूर्ति को याद रखते हैं। तो इस लिए कि उन के पास कसाईबाड़ा, सिरी उपमा जोग, भरत नाट्यम, केशर-कस्तूरी, तिरिया-चरित्तर, तर्पण और छलांग है। ख्वाजा ओ मेरे पीर है।

एक समय था कि पाठ्यक्रम बनाने वाले कुछ मूर्ख विशेषज्ञों के चलते हम तुलसी दास के पत्नी प्रेम के बाबत लाश पर तैर कर जाने, सांप को रस्सी समझ कर पकड़ कर घर में घुस जाने जैसी कथाएं भी पढ़ते थे। हालां कि तुलसी दास के जीवन में और भी तमाम ऐसी घटनाएं जो हमें कई बार सोचने के लिए विवश कर देती हैं। हिला कर रख देती हैं। खैर तो भी क्या हम सिर्फ़ इन कथाओं के चलते ही तुलसी दास को जानते हैं या पढते हैं? या कि जैसे कालीदास के बारे में भी हमें पढ़ाया गया है कि वह जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे, और फिर विद्योतमा से उन का मूर्खता भरा शास्त्रार्थ भी पढ़ा़या गया है। ठीक वैसे ही बाल्मिकी के डाकू होने का प्रसंग। पर क्या बाल्मिकी या कालिदास को हम क्या सिर्फ़ इन या ऐसी घटनाओं के बाबत ही जानते हैं? या कि फ़िराक को हम उन के होमो या शराबी होने के नाते जानते हैं कि उन की शायरी के नाते? बिलकुल इसी तरह हम बाद के दिनों में प्रेमचंद की गरीबी, उन का संघर्ष आदि भी पढ़ते रहे थे। उन के जीवन में औरतों आदि का भी विवरण मिलता है। तो क्या प्रेमचंद को क्या हम सिर्फ़ इन्हीं अर्थों में जानते हैं या कि उन की कालजयी रचनाओं के लिए। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा लिखने वाले इकबाल का हाथ सांप्रदायिक दंगों में भी सना था पर हम उन्हें उस के लिए भूल कर उन की रचना के लिए ही याद करते हैं। इसी तरह और भी कई लेखकों कवियों के जीवन चरित से जुड़ी तमाम बातें भी आती रही हैं तो सिर्फ़ इस लिए उन का रचनाकार भी बड़ा था या है। पर यह बातें दाल में नमक की तरह होती रही हैं या हैं। नमक में दाल की तरह नहीं। लेकिन इधर परंपरा ऐसी चर्चाओं के मामले में नमक में दाल की तरह हो गई हैं। इस से बचना ज़रा ज़रुरी है।

एक बार नामवर जी से लेखक-आलोचक संबंधों पर बात चली। मैं ने उन से स्पष्ट कहा कि आज की तारीख में आलोचक बडा़ हो गया है और लेखक छोटा। तो उन्हों ने इस का कडा़ प्रतिवाद किया। और साफ कहा कि यदि रामचंद्र शुक्ल जैसा आलोचक हो तो रचना भी उस दौर की उतनी बड़ी थी। आलोचक किसी लेखक को बड़ा नहीं बनाता, उस के बड़प्पन को स्वीकार करता, करवाता है। अब निराला को ही लीजिए। निराला को उस दौर के आलोचकों ने नहीं माना था। पर आलोचक गलत साबित हुए और निराला बड़े हो गए। प्रेमचंद के ज़माने में भी रामचंद्र शुक्ल थे और शुक्ल ने उन को स्वीकार किया था। पर तब एक आलोचक थे अवध उपाध्याय। अवध उपाध्याय को लोग भूल गए हैं। पर इन्हीं अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद के उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ को टॉलस्टाय के एक उपन्यास का अनुवाद तथा ‘रंगभूमि’ को मैकरे का अनुवाद कहा था। पर देखिए कि प्रेमचंद को आज लोग जानते हैं, लेकिन अवध उपाध्याय को कोई नहीं जानता। नामवर जी ने कहा कि यह मत भूलिए कि रचनाकार भी आलोचक होते हैं। वह भी किसी को स्वीकार करते हैं और किसी को खारिज। पर साहित्यिक दुनिया किस को स्वीकार करती है, मुन:सर इस पर होता है। किसी एक-दो आलोचक का सवाल नहीं होता। इस कसौटी पर तो नामवर की बात सही लगती है। ऐसे में यह आकलन करना ज़रुरी हो गया है कि क्या तमाम रचनाकारों की उपस्थिति के बावजूद आज आलोचना क्यों गायब है? क्या रचना में कहीं कमी है या आलोचना सचमुच लुप्त हो गई है, इस की पड़ताल ज़रुरी है।

एक समय था कि साहित्य में एक वामपंथी शब्दावली खूब चली थी वर्ग-चेतना, वर्ग-संघर्ष, वर्ग-शत्रु। वामपंथी राजनीति में भी यह शब्द आम था। पर बाद के दिनों में यह सारे शब्द तिरोहित हो गए। खास कर वामपंथ के पतन और देश में मंडल-कमंडल की राजनीति के गरमाने के बाद। वह वामपंथी शब्दावली जाति-चेतना, जाति-संघर्ष, जाति-शत्रु में तब्दील हो गई। भारतीय राजनीति में भी और साहित्य में भी। राजनीति में थोड़ी परदेदारी के साथ पर साहित्य में खुल्लम-खुल्ला। वर्ग-शत्रु का जाति-शत्रु में तब्दील होना समाज, राजनीति और साहित्य तीनों के लिए घातक है। राजनीति में तो वोट-बैंक के चलते यह सब हुआ पर साहित्य में इन शब्दों का पतन क्यों और कैसे हुआ यह ज़रुर पड़ताल का विषय है। आखिर साहित्य में कौन से वोट-बैंक की ज़रुरत आ पडी़ भला? प्रेमचंद का वह कहना कि साहित्य आगे-आगे चलने वाली मशाल है, लोग कैसे भूल गए? यह भी भला कैसे भूल गए कि साहित्य जोड़ने का काम करता है, तोड़ने का नहीं। लोहिया कहते रहे हैं, नारा लगाते ही रहे हैं कि जाति तोड़ो ! और अपने लेखक लोग हैं कि अब पूरी ताकत से जातियों की चौहद्दी बना कर क्रांति करने में लग गए हैं। आखिर करुणानिधि-जयललिता, मायावती-मुलायम-लालू जैसे तमाम भ्रष्ट लोग वर्ग-शत्रु नहीं तो क्या हैं? क्या इस बिना पर इन्हें वर्ग-शत्रु के खाने से मुक्त कर ही दिया जाना चाहिए कि यह लोग पिछड़े हैं या दलित हैं? राजनीति तो इसी तरह बेईमान और तबाह हुई ही है, साहित्य में भी यही खेती और यही सोच ज़रुरी है? अमृतलाल नागर सवर्ण थे तो इस बिना पर उन्हें स्वच्छ्कारों पर नाच्यो बहुत गोपाल नहीं लिखना चाहिए था? प्रेमचंद ने कफ़न लिख कर दलित विरोध की कहानी लिख दी? तो फिर क्या प्रेमचंद की ठाकुर का कुंआ ब्राह्मण विरोध की कहानी है? ब्राह्मणवादी व्यवस्था और ब्राह्मण दोनों दो बातें हैं, यह क्या लोग नहीं जानते? राजनीति की तरह साहित्य में भी सवर्णों को गरियाना और निंदा भी एक फ़ैशन सा क्यों हो गया है? इन सवालों की भी पड़ताल ज़रुरी है। शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर धंसाना ठीक नहीं है।

दुर्भाग्य से तमाम स्वनाम-धन्य लेखकों के साथ-साथ शिवमूर्ति के साथ भी यह हुआ है। उदय प्रकाश के साथ भी। उदय प्रकाश की बहुप्रशंसित कहानी पीली छतरी वाली लड़की में तो यह जातिगत बदले का जोश इस कदर मदमस्त हो जाता है कि बताइए कि नायक राहुल एक सवर्ण लड़की अंजलि जोशी के साथ प्रेम करता है। प्रेम करता है बदला लेने के लिए। लड़की को भगा ले जाता है। कोई व्यक्तिगतगत रंजिश नहीं। बस जातिगत बदले के लिए। जो कि प्रेम में पागल लड़की नहीं जानती। संभोग भी करता है नायक प्रेम की बिसात पर उस सवर्ण लड़की के साथ तो हर आघात पर उस के मन में प्रेम नहीं, बदला होता है। संभोग के हर आघात में वह बदला ही ले रहा होता है। अदभुत है यह जातिगत बदला भी जो प्रेम का कवच पहन कर लिया जा रहा है। पुरखों के ज़माने के अपमान का बदला ले रहा है राहुल। प्रेम में ऐसा भी होता है भला? लगता ही नहीं कि यह वही लेखक है जिस ने वारेन हेस्टिंगस का सांड़ या और अंत में प्रार्थना लिखने वाला लेखक ही है। छप्पन तोले की करधन या तिरिछ जैसी कहानियों का लेखक है। पर उदय प्रकाश की यह कहानी तमाम सहमतियों-असहमतियों के बावजूद उन के लेखन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन चुकी है। इसी तरह मैत्रेयी पुष्पा के यहां भी यह जातिगत बदले की बिसात बिछी हुई है। अपनी रचनाओं में वह वही चौकाने वाला आख्यान और सेक्स विमर्श रख देती हैं जो मृदुला गर्ग शहरी पृष्ठभूमि दिखा कर चितकोबरा में रखती हैं। मैत्रेयी अपनी रचनाओं में शहर के बजाय गांव की औरत का सेक्स आख्यान रख कर चौंकाती हैं और उस में जातिगत बदले का एक गणित भी भर देती हैं। जाने भारत के किस गांव का वह वर्णन लिखती हैं। आज का बता कर। और महौल अठारहवीं सदी के सामंती-संस्कृति का रचती हैं। आप आज के गांव में जाइए तो पाएंगे कि लोग दलित एक्ट के हद से अधिक दुरुपयोग में कराह रहे हैं। जेल और फर्जी मुकदमे भुगत रहे हैं। हकीकत तो यह है। दलितोत्थान की गाथाएं अब सब की जुबान पर हैं। ए राजा से लगायत मायावती तक। राजधानियों के राजमार्गों से लगायत गांवों की मेड़ों तक। पर मैत्रेयी की रचनाओं के गांव में दलित सवर्णों के सामने खड़े और बैठने की स्थिति में ही नहीं पाए जाते हैं। दलित और गांव कितना बदल चुके हैं, मैत्रेयी पुष्पा या दलित आह की आंच पर भात पकाने वाले और तमाम रचनाकार जानते ही नहीं।

अफ़सोस कि इसी फ़ैशन में समा कर शिवमूर्ति भी तर्पण में बदला लेने का आख्यान लिख लेते हैं।

कसाईबाड़ा की कसक और उस का सरोकार, भरतनाट्यम की तड़प और उस का सरोकार, सिरी उपमा जोग की संवेदना, उस की मासूमियत और उस की वह हूक, केसर कस्तूरी का वह कसाव, कसैलापन, आंच और तिरिया-चरित्तर की वह छ्टपटाहट भरी आकुलता और उस का सरोकार तर्पण तक आते-आते शिवमूर्ति से बिखरने लगता है तो क्यों? छलांग में वह व्यवस्था से मोर्चा लेते हुए थोड़ा वह संभलते हैं पर वह उसे अभी अधूरा ही बताते हैं। तो उस का आधा-अधूरा प्रकाशन क्या किसी दबाव में वह स्वीकार बैठे? यह दबाव भी ठीक नहीं है। इसी तरह तर्पण के बनावटीपन में जो दबाव है वह भी ठीक नहीं है। तर्पण हालां कि अपनी बुनावट और कहन में अदभुत है पर जो दलित उभार के उफ़ान पर जो भात वह पकाते हैं वह कच्चा रह जाता है। जैसे ऐलान ही करते हैं वह: वह संघर्ष था रोटी के लिए। यह वर्ण संघर्ष है। इज्जत के लिए। इज्जत की लड़ाई रोटी की लड़ाई से ज़्यादा ज़रुरी है। इसी लिए इस लडा़ई के लिए सरकार ने हमें अलग से कानून दिया है। हरिजन एक्ट। हम इस कानून से इस नाग को नाथेंगे।'

सूत्र वाक्य में तो यह बात एक बार बहुत अच्छी लगती है। पर कहानी की बुनावट और कथ्य में बात और तरह से मिलती है। जैसे डावरी एक्ट और दलित एक्ट का ज़रुरत से ज़्यादा दुरुपयोग बीते सालों में हुआ है, इस तर्पण में भी यह दुरुपयोग सामने आया है। शिवमूर्ति एक ईमानदार कथाकार हैं। इस लिए वह कथ्य में अपने जातिगत विरोध वाले मित्रों की तरह बेईमानी नहीं कर पाते। पर डायलागबाज़ी और सूत्र वाक्यों मे फंस जाते हैं इस कहानी में। बताइए कि चोरी करती पकड़ी गई लड़की परिजनों के उकसाने पर झूठे बलात्कार का केस दर्ज करवा देती है। फिर हत्या आदि की बातें, गांव की राजनीति और दलितों पर अत्याचार आदि के पुराने किस्से तक तो ठीक है यह कथा पर यह जो तर्पण का शहीदाना भाव है वह कहानी में ही पूरी तरह फ़र्जी है और यही कहानी का संदेश भी। तो बात बिगड़ जाती है। आप अगले को फ़र्जी मामले में फ़ंसा भी दें और 'गया-जगन्नाथ' में तर्पण का भी ताव रखें तो यह क्या है? क्या पाठक इतना मूर्ख है? यहीं प्रेमचंद के नमक का दारोगा की याद आ जाती है। वह ईमानदार दारोगा अंतत: उस बेईमान व्यापारी के यहां नौकरी करने लगता है जिस को वह बेईमानी के आरोप में पकड़ चुका होता है। प्रेमचंद की यह बहुत कमजोर कहानी इस अर्थ में भी है क्यों कि वह आदर्शवादी कथाकार के रुप में जाने जाते हैं। पर आदर्शवाद और तार्किकता दोनों ही कसौटी पर नमक का दारोगा एक विफलता की कहानी है और विवशता की भी। यही स्थिति शिवमूर्ति के तर्पण के साथ भी गुज़रती है। जैसे कि अखिलेश की एक बेहद खराब, हवा-हवाई कहानी ग्रहण भी इसी बिना पर खोखली क्रांति दिखाती है। तर्पण उपन्यास कथावस्तु आदि के लिहाज़ से शानदार रचना है बस उस का अंत भहरा गया है दलित उफान की आंच में भात पकाने के चक्कर में। नतीज़तन दलित उफान के नाम पर लिखी यह कहानी दलित के संघर्ष कथा के बजाय सवर्ण उत्पीड़न के खाते में दर्ज हो जाती है। जो कि इन दिनों अब गांव क्या, शहर क्या आम बात हो गई है। जब कि शिवमूर्ति का यह लक्ष्य हर्गिज नहीं है। वह लिख रहे हैं दलित उत्पीड़न की ही कथा। लेकिन जाने क्यों अभी तक किसी आलोचक ने तर्पण के इस एप्रोच की पड़ताल नहीं की। सब ने सिर्फ़ वाह-वाह की। तो क्या दूधनाथ वाली बात यहां मौजू है? कसाईबाडा़ की सनीचरी और विमली यहां याद आ जाती हैं जो अपने पूरे तेवर में पूरी निर्भीकता से पूरी पारदर्शिता और जुझारूपन के साथ उपस्थित हैं। यह चरित्र भी शिवमूर्ति के ही रचे चरित्र हैं।

एक बात और। कि कोई कितना भी बेहतरीन रचनाकार क्यों न हो, हर कोई उसे पढ़ेगा ही यह भी कतई ज़रुरी नहीं है। पढ़ेगा भी और उस की संवेदना भी समझेगा यह भी ज़रुरी नहीं है। अशोक वाजपेयी का ज़िक्र यहां ज़रुरी लग रहा है। बीते दिनों वह शिवमूर्ति पर केंद्रित लमही के अंक का विमोचन करने और शिवमूर्ति को लमही सम्मान देने के लिए आयोजित समारोह में आए। अशोक वाजपेयी की छवि एक अतिशय पढ़ाकू व्यक्ति, आलोचक, कवि और कुशल वक्ता की है। उम्मीद थी कि वह शिवमूर्ति पर औरों से कुछ अलग ढंग से बोलेंगे। लेकिन उन से क्या सभी से अच्छा तो शिवमूर्ति अपने गंवई ठाठ के साथ बोल गए। लेकिन अशोक वाजपेयी को सुन कर समझ में आ गया कि उन्हों ने शिवमूर्ति की एक भी कहानी नहीं पढ़ी है। वह सिर्फ़ शोभा की चीज़ बन कर आए और चले गए। माना कि वह शहरी बाबू हैं, कलावादी हैं पर आते समय शिवमूर्ति की दो चार कहानी भी नहीं पलट सकते थे? एक गंवई कथाकार के साथ यह सौतेलापन? आप फ़्रांस आदि के परदेसी लेखकों पर हरदम जांनिसार रहते हैं, अपनी विद्वता से सब को आक्रांत रखते हैं और अपनी ही माटी के एक सशक्त कहानीकार को जो बीते तीन दशक से भी ज़्यादा समय से चर्चा के शिखर पर है, उसे पढने, जानने की भी सलाहियत नहीं रखते? और तो और नामवर जैसे लोगों को बरंबार टोकते भी रहते हैं बाकायदा लिख-लिख कर कि वह बिना तैयारी के बोले ! तो भारत भवन क्या ऐसे ही बनते हैं कि शहर ऐसे ही संभावना बनते हैं? छोड़िए निर्मल वर्मा तो शहरी भी नहीं विलायती बाबू ठहरे। पर एक बार वह इसी लखनऊ में आए और ठेंठ गंवई कथाकार जिन को लोगों ने कई बार आंचलिक कथाकार भी कहा है उन फणीश्वर नाथ रेणु पर क्या तो बढ़िया व्याख्यान दिया था। डेढ़ दशक से ज़्यादा हो गए रेणु पर विलायती बाबू निर्मल वर्मा को सुने पर लगता है जैसे अभी कल ही बोल कर गए हों। उस की गूंज मन में इस तरह बाकी है। तो कथामूर्ति शिवमूर्ति वेणु को अपनी वेणु को रेणु से भी आगे ले जाने पर गौर करना चाहिए। इस लिए कि वह हिंदी कथा के अनन्य और विलक्षण लेखक हैं। इस लिए भी कि लिखा तो रेणु ने भी बहुत ज़्यादा नहीं लिखा है। और कि उन के समय में तो संचार क्रांति भी नहीं थी न सूचना का विस्फ़ोट ही। पर उन के पात्रों का गरल-पान, उन का भोलापन और कांइयापन आज भी वैसे ही सुलगता और सुलगाता रहता है। शिवमूर्ति के पास म्यान से बाहर ही सही शिव कुमारी जी आदि हैं तो उन के पास भी लतिका जी आदि थीं। और उस समय एक साथ एक म्यान में दो तलवार रखना बड़ा चुनौतीपूर्ण और मानीखेज़ था। गरज यह कि तमाम लोगों की तरह इन दोनों ही लोगों के पास राधा और रुक्मणि का संयोग है। प्रेमचंद के साथ भी था। शिवमूर्ति के पात्र भी लोगों के सामने हैं। उन के भी थे। फ़र्क ज़रा यह है कि वह उन पर हमलावर भी थे। मुकदमे से भी और आक्रमण से भी। उन की रचनाओं पर सफल फ़िल्म और धारावाहिक भी हैं। शिवमूर्ति अभी इस धार में बावजूद बासु चटर्जी और सुशील कुमार सिंह और मनहर चौहान आदि के स्टेज शो के अभी मजधार में हैं। बल्कि एक अर्थ में किनारे ही खड़े हैं। किसी नाव के इंतज़ार में। पर प्रेमचंद की रचनाओं पर भी सफल सिनेमा नहीं बन पाया है। सिवाय सत्यजीत रे की शतरंज के खिलाड़ी के। नहीं बनाई तो सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की सदगति भी थी पर वह बह गई थी। गोदान भी बस बन गई थी। सिनेमा और साहित्य का रिश्ता वैसे भी कोई बहुत मधुर कभी रहा नहीं। खास कर हिंदी में। पर कमोबेश जैसे हर गरीब की तमन्ना और जद्दोजहद अमीर बनने की होती है, वैसे ही हर लेखक की तमन्ना तो रही है, रहती ही है कि उस की रचना किसी भी तरह सिनेमा के पर्दे पर दिख जाए। शिवमूर्ति की भी है। ठीक वैसे ही जैसे हर गीतकार या कवि की इच्छा रहती है कि उस के गीत-गज़ल या कविता, नज़्म को गायक मिल जाए। जो अकसर नहीं ही मिलता। बहुत कम को नसीब होता है यह संयोग। जैसे कि महादेवी वर्मा हैं। महादेवी ने भी बहुत कम लिखा है। पर जो भी लिखा है वह प्रतिमान है। बावजूद इस के उन को भी बहुत कम लोगों ने गाया है। यह साध बहुतों की पूरी नहीं होती। क्यों कि गायन और सिनेमा, थिएटर आदि प्रदर्शनकारी कला हैं। और लेखन प्रदर्शनकारी कला नहीं है।

बहरहाल बात यहां हम शिवमूर्ति और उन के कथा संसार की कर रहे हैं। शिवमूर्ति से तमाम लोगों की तरह मेरे भी घरेलू और आत्मीय संबंध हैं। और बतौर पाठक बहुत सारी अपेक्षाएं भी हैं। तो अगर घरेलू बातचीत के अंदाज़ में बात करें तो प्रेमचंद अगर ग्रामीण संवेदना के राजा हैं तो रेणु राजकुमार हैं और शिवमूर्ति राजा बेटा । इस राजा बेटा को अभी राज तक पहुंचना शेष है। शिवमूर्ति की स्वीकृति का यह बैंड-बाजा तब और जोर से बजेगा, जब राजा बेटा राज तक पहुंचेगा।

इन्हें भी देखें
  1. शिवमूर्ति अगर कहीं जज रहे होते...
  2. मेरे लिए लिखना, कबाड़ खाने से साइकिल कसने की तरह है : शिवमूर्ति 
  3. धान फूटते गोभी वाले गांव में 

Saturday, 20 October 2012

लुट गया राजा प्रणय की चांदनी में

डा॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक'
जन्मतिथि २१ अक्टूबर १९१८ निर्वाण तिथि ३० दिसम्बर २०११
कभी दरबारी रही कविता सत्ता को चुनौती भी दे सकती है, पहले कभी सोचा नहीं जाता था। पर ऐसा समय भी आया जब कविता में सत्ता को चुनौती देना कवियों का प्रिय शगल बन गया। दिनकर, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा जैसे तमाम कवि हैं जिन्हों ने पौराणिक कथाओं को कविता में गूंथ कर सत्ता से सीधा मुठभेड़ किया तो कबीर, राम प्रसाद बिस्मिल, फ़ैज़, दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी जैसे कवि भी हैं जो सीधे-सीध सत्ता को कठघरे में खडा़ करते हैं और ऐसे सवाल करते हैं कि मुहावरा बन जाते हैं और किसी भी सत्ता के पास कोई उत्तर होता नहीं। धर्मवीर भारती अंधा युग के मार्फ़त, नरेश मेहता महाप्रस्थान के मार्फ़त तो श्रीकांत वर्मा मगध के मार्फ़त सत्ता को जिस तरह घेरते हैं और सुलगते हुए सवालों से जिस तरह वर्तमान सत्ता को भी सवालों के फंदे में घेरते हैं वह अदभुत है। ऐसे ही एक और कवि हैं लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक। जिन को जाने क्यों ज़रा कम जाना गया। निशंक न सिर्फ़ सत्ता को अपने सवालों से घेरते हैं बल्कि कई पौराणिक पात्रों को उन की पारंपरिक छवि से भी उन्हें मुक्त करते हैं। न सिर्फ़ सत्ता से सवाल करते हैं, सत्ता और व्यवस्था के चरित्र पर प्रहार भी करते हैं। राम कथा के बहाने बहुतों ने बहुतेरी बातें कही हैं। तुलसी से लगायत मैथिली शरण गुप्त तक और भी कई ने। पर निशंक जब राम कथा को हाथ में लेते हैं तो उन के यहां कैकेयी, सुमित्रा और विभीषण तक की न सिर्फ़ पारंपरिक छवियां टूटती हैं बल्कि सत्ता और व्यवस्था विमर्श से एक नई मुठभेड़ भी होती है। नए सवाल सुलगते हैं और इन की एक नई ही छवि हमारे सामने उपस्थित होती है।

आचार्य मुंशीराम शर्मा सोम अभिनन्दन समारोह के अवसर पर
बाँए से महादेवी वर्मा, आचार्य सोम, डा॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक एवं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी।
निशंक के यहां आ कर विभीषण के प्रश्न आज के सतासीनों पर भी कैसे तो चस्पा हो जाते हैं। प्रज्ञा-उदभास निशंक का खंड-काव्य है। इस में उन्हों ने विभीषण की आत्मकथा लिखी है। जिस में उन का विभीषण कहता है, 'राजा ही बन गया विधाता, न्याय खड़ा है हाथ पसारे।' विभीषण कहता है कि, 'मनमाने निर्णय लेने पर, राजा रहता नहीं अकेला/ हां में हां कहने वालों का, सदा लगा रहता है मेला।' विभीषण की यह आत्मकथा वर्ष २००१ में यानी अब से ११ वर्ष पहले छपी थी। और निशंक विभीषण की यातना लिख रहे थे, ' मैं विभीषण हूं, मुझे जग जानता है, पर मुझे वह भ्रातृ-द्रोही मानता है/ विश्व में लोकोक्ति बन कर जी रहा हूं, राम चरणामृत मिला, विष पी रहा हूं।' और बता रहे थे कि, ' अक्षर और अमर बनने की रही प्रबल अभिलाषा, बर्वरता की राजनीति में लुप्त प्यार की भाषा/ जन-हित भुला दिया, निज -हित की वाणी पर बंधन है. भय-आतंक-दमन के बल पर फूल रहा शासन है।' जाहिर है कि विभीषण यह सारी बातें रावण के मद्देनज़र कह रहा है। वह कह रहा है कि, ' माना प्रबल बाहुबल से रक्षित रहता सिंहासन. एकतंत्र-शासन से पर होता है पंगु प्रशासन।' और बता रहा है कि, 'श्रवण-सुखद, मुंह-मीठी कहने वालों की न कमी है, राजसभा में उन की ही रहती बस धाक जमी है।' तो क्या यह बातें जो विभीषण रावण राज के लिए कह रहा है, आज का शासन भी, आज का राज भी रावण राज में तब्दील नहीं है? आज की जनता की भी हालत विभीषण की ही तरह असुरक्षित और अपमानित नहीं है? निशंक का विभीषण तो हालात बयान कर रहा है, 'बुझने पर भी असुरक्षा की आग रही जलती थी, प्रजा पराजित सी अनुभव कर, बैठ हाथ मलती थी।' विभीषण तो बता रहा है, 'जहां शील का पानी न हो, वहां- आंसुओं से मुंह धो कर क्या करता?/ यह मोह का त्याग था, द्रोह नहीं, अपमानित हो कर क्या करता?' उस की यातना देखिए कि, 'मंत्री का भी मुंह किया बंद, मंत्रणा-शक्ति पड़ गई मंद।/ फिर मैं जनहित कैसे करता? भाई के ही हाथों मरता? वह बताता है कि, 'मैं तो उन्हें नीति की तुला पर विनत हो के, चाहता था तोलना प्रतीति से, दुलार से।/ किंतु मेरी याचना पे बिना ही विचार किए, क्यों मुझे निकाला गया चरण प्रहार से?' स्पष्ट है कि यह यातना सिर्फ़ विभीषण की यातना नहीं है, यह आज के आम-जन की भी यातना है। निशंक विभीषण की यातना को आज की जनता की यातना से जोड़ते हैं। साथ ही आज की शासन-व्यवस्था को रावण के राज जैसा ही बताते हैं और ऐसे शासन व्यवस्था के हश्र से आगाह भी करते चलते हैं, ' विश्व विजय का स्वप्न संजो कर यह भी जान न पाए, आत्मशक्ति के सम्मुख जग में कौन सामने आए?/ धू-धू नगर जला, राजा की आंखों के आगे ही, कोई नहीं बचा पाया, हम ऐसे रहे अभागे।'

श्रीनारायण चतुर्वदी अभिनन्दन समारोह के अवसर पर बोलते हुए डा॰ निशंक
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और महादेवी वर्मा जैसी कालजयी विभूतियाँ भी
 इस अवसर पर उपस्थित थीं।
सिर्फ़ खंड काव्य या महाकाव्य या पौराणिक आख्यानों में ही निशंक यह और ऐसे सवाल नहीं उठाते। तूणीर में संग्रहित कविताएं भी ऐसे ही तमाम सवालों में सुलगाती हैं। वह लिखते हैं, ;त्याग, दृढ़ संकल्प तो चांडाल के हाथों बिके हैं/ कामिनी-कंचन तथा कादंब पर जीवन टिके हैं/ आप का यह राष्ट्र-चिंतन मोम का घर बन गया है/ प्रश्न उत्तर बन गया है।' कविता के दरबारी होने की यातना भी निशंक के यहां सुलगती मिलती है। और वह बताते हैं कि, 'पूस माह में पसीने की तरह/ हम रहे सत्य से कटे-कटे।/ कवि बनने चले थे दरबारी हो गए।' ज़िंदगी ताश की गड्डी कविता में वह लिखते हैं, ' आदमी हारता है, पिटता है,/फिर भी खेलता ही रहता है/ एक बार ट्रंप-कार्ड बन कर/ जो सब पर रोब गांठता है/ जब वह ट्रंप नहीं रहता है/ तो बड़ा मायूस हो जाता है/ कुछ लोग जीवन भर/ पत्ते ही फेंटते रहते हैं/ गड्डी के भीतर उन की कोई औकात नहीं/ और बाहर वे जा नहीं सकते।' आम आदमी की पीड़ा उन की कविताओं की जैसे संगिनी है। संकल्प की विजय की नायिका कैकेयी है। निशंक ने इस खंड-काव्य में कैकेयी का यहां एक नया ही मिथ , एक नया ही रुप न सिर्फ़ गढा़ है बल्कि स्थापित भी किया है कि, 'विश्व की मंगल-कामना के लिए, राम को कैकेयी ने वन भेजा।' और बताया है कि, 'यश-दीप में राम के, कैकेयी थी, खुद स्नेह बनी, जली हो कर बाती।' और फिर कैकेयी के बहाने दशरथ से जो तल्ख सवाल निशंक ने उठाए हैं यहां, सत्ता व्यवस्था पर जो निरंतर प्रहार किए हैं वह बहुत ही खौलाने वाले हैं। निशंक के यहां जैसे विभीषण पाज़िटिव पात्र है वैसे ही कैकेयी भी पाज़िटिव शेड में उपस्थित है। कैकेयी का निगेटिव शेड निशंक के यहां अनुपस्थित है। वह बहुत स्पष्ट मानते हैं कि अयोध्या का राजा बन कर राम लोक कल्याण नहीं कर सकते थे और कि राम की क्षमताओं के मद्देनज़र ही कैकेयी ने राम को वन भेज कर उन को वनाधिराज बना कर लोक कल्याण के लिए वन भिजवाया। निशंक की कैकेयी कहती है, 'अवध का राजा बना यदि राम मेरा, तो न होगा प्रीति का वन में सबेरा।/ नगरवासी सौख्य-सुविधा-युक्त होंगे, किंतु बनवासी न दुख से मुक्त होंगे।' उन की कैकेयी जैसी जोड़ती है, 'मनुज हैं सब एक, फिर अलगाव कैसा?/ है जगा पृथकत्व का यह भाव कैसा?/ नृपति का है कार्य उन को भी उठाना, उन्हें भी मानव समझ, उर से लगाना।' वह कहती है, ' सुत -विरह का दु:ख भी मैं झेल लूंगी, किंतु अब उद्धार मानव का करुंगी।/ राम सब का है, दिखा दूंगी सभी को, कैकेयी मां है, बता दूंगी सभी को।' वह जैसे फिर जोड़ती है, ' है कठिन यह कार्य, फिर भी मैं करुंगी, मैं नहीं अब लोक निंदा से डरुंगी।/ राज्य-सुत का मोह सारा छोड़ दूंगी, धार मैं इतिहास की भी मोड़ दूंगी।' तो जैसे तमाम लोग कैकेयी में खल चरित्र की पड़ताल करते हैं, निशंक उस से उलट कैकेयी का एक नया ही रुप उपस्थित करते हैं। न सिर्फ़ कैकेयी का नया और सकारात्मक रुप उपस्थित करते हैं निशंक बल्कि कैकेयी के मार्फ़त सत्ता व्यवस्था की नब्ज़ भी टटोलते हैं, ' मंत्रीगण स्वविवेक से न विचार पाते, नृपति के स्वर में सदा स्वर हैं मिलाते।/ गुरु स्वयं नृप-इष्ट ही पहचानते हैं, राज्य को वे व्यक्ति-सत्ता मानते हैं।/ भूप मंत्री ही बने सब के नियामक. वही अनुशासक, वही रक्षक, विधायक।/ शक्ति चिंतन की हमारी खो गई है, बुद्धि शासक-वर्ग आश्रित हो गई है।' इस तरह निशंक न सिर्फ़ कैकेयी के बहाने दशरथ से सत्ता के निरंकुश बनने का प्रश्न उपस्थित करते हैं बल्कि आज की राजनीतिक सत्ता से भी इस बहाने मुठभेड़ करते दिखते हैं। और फिर सवाल खड़ा करते हैं कि, ' लोक हित में कौन फिर आगे बढ़ेगा?/ कौन कष्टों के हिमालय पर चढ़ेगा?/ क्या न कोल-किरात भय से मुक्त होंगे?/ क्या न वानर-भील श्रीसंयुक्त होंगे?' निशंक जैसे सवाल-दर-सवाल उठाते हैं, ' प्रश्न है, पर कौन उन का हल निकाले? सर्प के बिल में स्वकर को कौन डाले?/ लोक-सेवा से बड़ा क्या आज शासन?/ राज-सिंहासन बडा़ है या कुशासन?' कैकेयी के कोप-भवन में राजा दशरथ से कैकेयी के संवाद भी काफी कुछ चीज़ें स्पष्ट करते हैं, ' राम को वनवास चौदह वर्ष का हो, जो कि कारण लोक के उत्कर्ष का हो।/ दूसरा वर दो यही, मत देर लाओ, धैर्य रख कर सत्य-निष्ठा-व्रत निभाओ।'

अध्येय मासिक पत्रिका हैदराबाद के सम्पादक श्री दादे प्रसाद के
अभिनन्दन समारोह में बाँए से निशंक जी, डा॰ रामकुमार वर्मा, दादे प्रसाद,
भगवती चरण वर्मा और पं॰ श्रीनारायण चतुर्वेदी जी।
कैकेयी को वरदान दे कर राम को वनवास देने के राजा दशरथ के फ़ैसले पर 'लुट गया राजा प्रणय की चांदनी में, खो गया दिनपति अंधेरी यामिनी में।' जैसे छंद इस खंड-काव्य में लिख कर निशंक दशरथ की कमजोरियों को रेखांकित कर आज की राज-व्यवस्था से भी प्रश्न खड़ा करते हैं। क्यों कि आज-कल तो नित नए किस्से उपस्थित हैं राजाओं के प्रणय की चांदनी में लुटने के। निशंक की कविताओं को ले कर कभी किसी को संशय नहीं रहा। कभी वह सुमित्रा नंदन पंत, महादेवी वर्मा,पंडित नरेंद्र शर्मा, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर जैसों के साथ कवि सम्मेलनों के मंच पर काव्य पाठ करते थे। हजारी प्रसाद द्विवेदी, यशपाल और श्रीनारायण चतुर्वेदी के साथ सभाओं में मंच शेयर करते थे। अमृतलाल नागर तो उन्हें अपना गुरुभाई कहते नहीं थकते थे। क्रांतिदूत राना बेनी माधव के जीवन पर आधारित खंड-काव्य की भूमिका में नागर जी ने लिखा है कि, 'शब्द-लालित्य निशंक जी की पुरानी सिद्धि है। क्रांतिदूत बेनी माधव सिंह में उन की यह सिद्धि और भी निखर कर सामने आई है।' निशंक जी के गीत संग्रह साधना के स्वर की भूमिका में भगवती चरण वर्मा ने लिखा है कि, 'डा. निशंक की कविता में अपनी ईमानदारी है, उन में सुलझा हुआ शिल्प है, उन के पास मजी हुई भाषा है।'

कान्यकुब्ज कॉलेज, लखनऊ के करदहा हाल में
सुप्रसिद्ध हिन्दी विद्वान फादर कामिल बुल्के की अध्यक्षता में आयोजित
 तुलसी जयन्ती के अवसर पर कविता पाठ करते हुए डा॰  निशंक।
एक बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उन से रामायण की एक उपेक्षित पात्र सुमित्रा पर लिखने को कहा तो उन्हों ने सुमित्रा को ले कर एक महाकाव्य ही लिख दिया। और इस सुमित्रा भी में वह सत्ता-व्यवस्था की खबर लेने से नहीं चूके। और लिखा कि, 'नृप बडा़ नहीं होता सम्मान बिना।' लिखा कि, 'नीति ध्वस्त, नय ध्वस्त, मनुज संस्कार ध्वस्त है,/ धैर्य छिपा तम में, साहस का सूर्य अस्त है।' निशंक जी ने चाहे गीत लिखे, कविता लिखी, ब्रज भाषा में लिखा, खंड-काव्य लिखे या महाकाव्य या फिर निबंध या संस्मरण उन के यहां एक चिंता हमेशा ही मिलती है, वह है-लोकधर्म की। सत्ता और व्यवस्था से चुभते हुए सवाल करने की। और उसे आज से जोड़ने की। गोया वह ऐतिहासिक या पौराणिक कथा से नहीं आज से मुठभेड़ कर रहे हों। सुमित्रा के ही एकादश सर्ग में वह लिखते हैं, ' स्वार्थ होगा प्रबल यदि सेवा बनी व्यवसाय,/ धर्म होगा ढोंग यदि निष्ठा हुई निरुपाय।' सोचिए कि सुमित्रा का प्रकाशन वर्ष १९८९ में हुआ था। तब हमारी शिक्षा और चिकित्सा जैसे सेवा क्षेत्र प्राइवेट सेक्टर के सुपुर्द नहीं हुए थे। अब हो गए हैं तो देखिए क्या तो हाल है? शिक्षा और चिकित्सा या और भी कई सेवा क्षेत्र प्राइवेट सेक्टर के सुपुर्द हो कर कैसे तो लूट के अड्डे बन गए हैं। पर आम आदमी मुंह बाए निरुपाय खड़ा है।सोचिए कि निशंक ने यह खतरा सुमित्रा जैसे महाकाव्य में भांप लिया था। सुमित्रा में वह कई और चीज़ों पर भी विस्तार देते हैं। जो बाकी जगह उस तरह नहीं मिलतीं। जैसे सजीवनी बूटी ले कर जा रहे हनुमान को शत्रु समझ कर भरत द्वारा अयोध्या में मार गिराया जाना। फिर इलाज कर वापस भेजना। पर निशंक यह व्यौरा बहुत विस्तार से और तार्किक ढंग से बांचते हैं। निशंक जी अगर आज जीवित होते तो अब की २१ अक्टूबर को ९४ वर्ष के हो जाते। पर पेशे से प्राध्यापक रहे निशंक जी जब बीते ३० दिसंबर, २०११ को बड़ी खामोशी से कूच कर गए तो अखबारों में ठीक से सुर्खी भी नहीं बन सके। तो बहुत अफ़सोस हुआ। कि एक महत्वपूर्ण कवि के अवदान को हिंदी समाज इस तरह भूल सकता है? सुमित्रा में वह लिख ही गए हैं, ' ठकुर-सुहाती कहने वाले मौज उड़ाते,/ खरे समीक्षक नहीं मंच पर जाने पाते।' इस लिए भी कि यह लिखना आसान नहीं है, 'लुट गया राजा प्रणय की चांदनी में, खो गया दिनपति अंधेरी यामिनी में।' राजा तो प्रणय चांदनी में फिर भी लुटते रहेंगे पर अब इस को लिखने के लिए निशंक नहीं होंगे। मलाल यही है। निशंक जी ने एक गीत में लिखा भी है, 'देखता हूं बिक रहा है कौड़ियों में रुप कंचन,/ और मैं आदर्श ले कर, साधना में बांधता मन/ राह है मेरी पुरानी।' लेकिन वही यह भी लिख गए हैं, 'मैं ने एक किरन मांगी थी तुम ने नील गगन दे डाला/ मैं ने अपनापन मांगा था, तुम ने पागलपन दे डाला।' तो उन की कविताओं का नीलगगन सचमुच उन के प्रति पागलपन के पाग में डुबो देता है। उन की कविताओं के उस नीलगगन और उन को शत-शत प्रणाम !

पूर्व शिक्षा मंत्री स्व॰ चतुर्भुज शर्मा के आवास पर आयोजित
तुलसी जयन्ती समारोह का संचालन करते हुए डा॰निशंक।
मंच पर आसीन तत्कालीन महामहिम राज्यपाल, उत्तरप्रदेश
श्री वी॰ गोपाल रेड्डी, विधानसभा अध्यक्ष प्रो॰ वासुदेव सिंह,
शिक्षामंत्री चतुर्भुज शर्मा तथा अन्य विद्वतजन।

डा॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक
जन्मतिथि २१ अक्टूबर १९१८
निर्वाण तिथि ३० दिसम्बर २०११
कान्यकुब्ज कालेज १९६१ ६२
बैठे हुए बाँए से सर्वश्री कांति मोहन अवस्थी (प्रिन्सिपल, इण्टर विभाग), पं॰छंगालाल मालवीय (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग), पं॰ नरेन्द्र शर्मा, कविवर सुमित्रानंदन पंत, प्रिंसिपल मदनगोपाल मिश्र, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक', डा॰ महेन्द्र नाथ मिश्र। खड़े हुए बाँए से सर्वश्री कृपाशंकर तिवारी, श्रीपाल सिंह, हरीकृष्ण शर्मा (अध्यक्ष, संसद), सत्यप्रकाश राना (प्रधानमंत्री, संसद), सतीश चन्द्र बाजपेयी, दयाशंकर दीक्षित (सभापति, हिंदी परिषद), परमिथलेश कुमार शुक्लम लाल मणि मिश्र, कु॰ प्रभा शर्मा, कु॰ आशा मेहरोत्रा


[राष्ट्रीय सहारा से साभार]

Saturday, 13 October 2012

इन द डार्केस्ट आवर... उपन्यास के विमोचन के बहाने रमाकांत और अमृतलाल नागर की याद

लखनऊ में चल रहे पुस्तक मेले में आज एक अंगरेजी उपन्यास इन द डार्केस्ट आवर... उपन्यास का विमोचन किया। मोहिनी सिंह को बहुत बधाई। इस लिए भी कि अभी उन की उम्र २२ साल ही है। उपन्यास लिखने की यह कोई उम्र नहीं मानी जाती। मोहिनी सिंह को आज देख कर अपने बीते हुए दिन अचानक याद आ गए। इस लिए भी कि मेरा भी पहला उपन्यास दरकते दरवाज़े जब छपा था तब मैं भी सिर्फ़ २५ साल का ही था। प्रभात प्रकाशन ने छापा था इसे। और बताते हुए अच्छा लगता है कि तब इस उपन्यास के एवज़ में मुझे २५०० रुपए भी मिले थे। यह १९८४ की बात है। मेरा उपन्यास पहले छपा, कहानी संग्रह बाद में। हालां कि पहली किताब प्रेमचंद पर १९८२ में ही आ गई थी। तब मैं भी दिल्ली में रहता था। उस समय कथाकार रमाकांत जी जो तब दिल्ली में सोवियत एंबेसी में काम करते थे, मुझे बहुत मानते थे, मेरी जब-तब मदद करते रहते थे, टोकते हुए कहा था कि यह उम्र उपन्यास लिखने की अभी नहीं है। मैं ने तब मारे उत्साह के उन्हें बताया कि एक और उपन्यास जाने-अनजाने पुल भी बस आने ही वाला है। लिख रहा हूं। तो उन्हों ने कहा कि इतनी जल्दबाज़ी ठीक नहीं। तो मैं ने उन की इस बात पर गौर करने के बजाय बड़ी ठसक से कहा कि शरत बाबू ने देवदास १८ साल की, सोलह साल की उम्र में लिख दी थी।

बाएं से अमिता दुबे, लेखिका मोहिनी सिंह, नरेश सक्सेना और दयानंद पांडेय
रमाकांत जी तब चुप हो गए थे, मेरे बचपने को देख कर। पर अब जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो पाता हूं कि रमाकांत जी तब सचमुच सच ही कह रहे थे। इस लिए भी कि उपन्यास या कहानी लिखने के लिए जो पकाव होना चाहिए, जो रचाव और बनाव होना चाहिए, जो समझ और दृष्टि होनी चाहिए, जीवन के तमाम गरमी-बरसात झेलने के बाद ही आती है। कविता लिखने की बात और है। यह बात अब समझ में आती है। और रमाकांत जी की याद आ जाती है। क्यों कि उन दोनों उपन्यासों के कच्चेपन का कसैलापन, वह बचपना अब समझ में आता है। हालां कि तब दरकते दरवाज़े मैं ने अमृतलाल नागर को समर्पित किया था। दिल्ली से चल कर लखनऊ नागर जी को उपन्यास देने आया था। नागर जी तब बहुत खुश हुए थे। कुछ पन्ने अलट-पलट कर उन्हों ने अपने पास बुलाया, अपनी बगल में बिठाया और बिलकुल किसी युवा की तरह जोश में आ गए वह। और मेरे कंधे से कंधा लड़ाते हुए बोले कि, 'अब मेरे बराबर में आ गए हो।' मैं कुछ समझा नहीं तो बोले, 'अरे अब तुम भी उपन्यासकार हो गए हो।' मैं तब लजा गया था।

पर आज जब मैं ने मोहिनी सिंह को देखा और किताब का विमोचन किया तो एक साथ रमाकांत जी और नागर जी याद आ गए। पर रमाकांत जी की तरह मोहिनी सिंह से मैं ने ऐसा-वैसा कुछ नहीं कहा। नागर जी को याद किया, मोहिनी सिंह को बधाई दी और अपनी पुरानी यादों में खो गया। इस लिए भी कि अब समय पूरी तरह बदल गया है। आज के बच्चे और युवा हम सब से ज़्यादा समझदार और ज़्यादा जानकार हैं। मोहिनी सिंह लखनऊ के आई. टी. कालेज से पढ़ी हुई हैं और दिल्ली के अभिलेखागार में प्रशिक्षु हैं। मोहिनी सिंह अपनी ज़िंदगी और अपने लेखन में खूब आगे बढें, यशस्वी बनें यही कामना है।