Saturday, 13 October 2012

इन द डार्केस्ट आवर... उपन्यास के विमोचन के बहाने रमाकांत और अमृतलाल नागर की याद

लखनऊ में चल रहे पुस्तक मेले में आज एक अंगरेजी उपन्यास इन द डार्केस्ट आवर... उपन्यास का विमोचन किया। मोहिनी सिंह को बहुत बधाई। इस लिए भी कि अभी उन की उम्र २२ साल ही है। उपन्यास लिखने की यह कोई उम्र नहीं मानी जाती। मोहिनी सिंह को आज देख कर अपने बीते हुए दिन अचानक याद आ गए। इस लिए भी कि मेरा भी पहला उपन्यास दरकते दरवाज़े जब छपा था तब मैं भी सिर्फ़ २५ साल का ही था। प्रभात प्रकाशन ने छापा था इसे। और बताते हुए अच्छा लगता है कि तब इस उपन्यास के एवज़ में मुझे २५०० रुपए भी मिले थे। यह १९८४ की बात है। मेरा उपन्यास पहले छपा, कहानी संग्रह बाद में। हालां कि पहली किताब प्रेमचंद पर १९८२ में ही आ गई थी। तब मैं भी दिल्ली में रहता था। उस समय कथाकार रमाकांत जी जो तब दिल्ली में सोवियत एंबेसी में काम करते थे, मुझे बहुत मानते थे, मेरी जब-तब मदद करते रहते थे, टोकते हुए कहा था कि यह उम्र उपन्यास लिखने की अभी नहीं है। मैं ने तब मारे उत्साह के उन्हें बताया कि एक और उपन्यास जाने-अनजाने पुल भी बस आने ही वाला है। लिख रहा हूं। तो उन्हों ने कहा कि इतनी जल्दबाज़ी ठीक नहीं। तो मैं ने उन की इस बात पर गौर करने के बजाय बड़ी ठसक से कहा कि शरत बाबू ने देवदास १८ साल की, सोलह साल की उम्र में लिख दी थी।

बाएं से अमिता दुबे, लेखिका मोहिनी सिंह, नरेश सक्सेना और दयानंद पांडेय
रमाकांत जी तब चुप हो गए थे, मेरे बचपने को देख कर। पर अब जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो पाता हूं कि रमाकांत जी तब सचमुच सच ही कह रहे थे। इस लिए भी कि उपन्यास या कहानी लिखने के लिए जो पकाव होना चाहिए, जो रचाव और बनाव होना चाहिए, जो समझ और दृष्टि होनी चाहिए, जीवन के तमाम गरमी-बरसात झेलने के बाद ही आती है। कविता लिखने की बात और है। यह बात अब समझ में आती है। और रमाकांत जी की याद आ जाती है। क्यों कि उन दोनों उपन्यासों के कच्चेपन का कसैलापन, वह बचपना अब समझ में आता है। हालां कि तब दरकते दरवाज़े मैं ने अमृतलाल नागर को समर्पित किया था। दिल्ली से चल कर लखनऊ नागर जी को उपन्यास देने आया था। नागर जी तब बहुत खुश हुए थे। कुछ पन्ने अलट-पलट कर उन्हों ने अपने पास बुलाया, अपनी बगल में बिठाया और बिलकुल किसी युवा की तरह जोश में आ गए वह। और मेरे कंधे से कंधा लड़ाते हुए बोले कि, 'अब मेरे बराबर में आ गए हो।' मैं कुछ समझा नहीं तो बोले, 'अरे अब तुम भी उपन्यासकार हो गए हो।' मैं तब लजा गया था।

पर आज जब मैं ने मोहिनी सिंह को देखा और किताब का विमोचन किया तो एक साथ रमाकांत जी और नागर जी याद आ गए। पर रमाकांत जी की तरह मोहिनी सिंह से मैं ने ऐसा-वैसा कुछ नहीं कहा। नागर जी को याद किया, मोहिनी सिंह को बधाई दी और अपनी पुरानी यादों में खो गया। इस लिए भी कि अब समय पूरी तरह बदल गया है। आज के बच्चे और युवा हम सब से ज़्यादा समझदार और ज़्यादा जानकार हैं। मोहिनी सिंह लखनऊ के आई. टी. कालेज से पढ़ी हुई हैं और दिल्ली के अभिलेखागार में प्रशिक्षु हैं। मोहिनी सिंह अपनी ज़िंदगी और अपने लेखन में खूब आगे बढें, यशस्वी बनें यही कामना है।

4 comments:

  1. आपके हृदय से निकले ये निर्मल उद्गार सच्चे और अच्छे लगे ।

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  2. बहुत ज्‍यादा लिखने-कहने के मौके को भूल गये पांड़े जी।
    इस मौके पर तो जमकर लिखना चाहिए था। मोहिनी पर और नरेश सक्‍सेना समेत वहां मौजूद लोगों पर भी तो लिखना चाहिए था ना।
    फिर, आपका बल्‍ब जला क्‍यों नहीं मियां
    । सिर्फ टिमाटिमा कर ही काम चला दिया। काहे।
    कुमार सौवीर, लखनऊ

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  3. Thank you so much Sir, Iam so honored to find space in your blog!

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