Thursday, 7 February 2013

मीडिया तो अब काले धन की गोद में

[लेखों का संग्रह]

-मेरी पांच नई किताबें-

अब की पुस्तक मेले में एक साथ मेरी पांच नई किताबें होंगी।

१-यादों का मधुबन
[संस्मरण]
२-मीडिया तो अब काले धन की गोद में
[लेखों का संग्रह]
३-एक जनांदोलन के गर्भपात की त्रासदी
[राजनीतिक लेखों का संग्रह]
४-कुछ मुलाकातें, कुछ बातें
[ संगीत, सिनेमा, थिएटर और साहित्य से जुड़े लोगों के इंटरव्यू]
५- ग्यारह प्रतिनिधि कहानियां

यह सभी किताबें जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुई हैं। दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में हा्ल नंबर १२ के स्टाल नंबर २५ और २६ पर आप को यह किताबें मिल सकती हैं।



'कुछ शब्द जो अब अपमानित होने पर/ स्वयं ही जीवन और भाषा से/ बाहर चले जाते हैं/ 'पवित्रता' अब एक ऐसा ही शब्द है/ जो अब व्यवहार में नहीं,/ उस की जाति के शब्द/ अब ढूंढे नहीं मिलते/ हवा, पानी, मिट्टी तक में/ ऐसा कोई जीता जागता उदाहरण दिखाई नहीं देता आजकल/ जो सिद्ध और प्रमाणित कर सके/ उसी शब्द की शत-प्रतिशत शुद्धता को।' कुंवर नारायण की यह कविता हमें सिर्फ़ शब्द की पवित्रता नष्ट होने की आंच नहीं देती। हम कैसे भयावह समय में जी रहे हैं इस की थाह भी देती है। इस का भान भी देती है। शब्द और समाज के इस कालेपन को सब से ज़्यादा डसा है मीडिया ने। मीडिया को डसा है काले धन ने। काले धन ने हालां कि मीडिया, राजनीति, समाज और उस के सभी सरोकारों का जो कृष्ण पक्ष हमारे सामने उपस्थित है वह बहुत भयावह, बहुत डरावना है। साहित्य, संगीत, सिनेमा, कला, थिएटर और भाषाएं सभी इस में घायल हैं। ग्लोबलाइज़ेशन का जो ग्लैमराइज़ेशन है वह मीडिया पर कहीं ज़्यादा है, कहीं ज़्यादा घातक है। कोई भी धनपशु, बेईमान, चार सौ बीस, चोर उचक्का, हत्यारा, डकैत या कोई भी ऐरा-गैरा अखबार निकाल सकता है, चैनल चला सकता है। और समाज को हांक सकता है। जनमत बनाने और बिगाड़ने का ठेका ले सकता है। पेड न्यूज़ को कारोबार बना सकता है। और इस अखबार या चैनल में कोई भी विद्वान, कोई भी मेधावी, विशेषज्ञ, बुद्धिजीवी, पत्रकार चाकरी कर सकता है क्या कर ही रहा है। एक अर्थ में कहूं तो यह कि मक्कारी के घर खुद्दारी नौकरी कर रही है। तिस पर तुर्रा यह कि पत्रकारिता के नाम पर दलालों की पौ बारह है। ऐसे पत्रकार की सफलता आज की तारीख में इस बात में निहित है कि वह मालिकों, राजनीतिज्ञो, अफ़सरों का कितना बड़ा अर्दली और दरबान है। जितना ही बड़ा अर्दली है, जितना ही बड़ा दरबान है, उतना ही बड़ा विद्वान है, उतना ही बड़ा पत्रकार है। जितना बड़ा दलाल है, जितना बड़ा कुत्ता है उतना ही बड़ा सफल पत्रकार है। मीडिया तो अब काले धन की गोद में लेख में इसी इबारत और इस की आंच की तफ़सील में ध्वस्त हो चुकी इसी मीडिया का बयान है, इस की ही पड़ताल है। इस किताब में इस बहाने संग्रहित बाकी लेखों में भी इस हाहाकार की ध्वनि-प्रतिध्वनि और चीख यत्र-तत्र उपस्थित है। लेख और भी हैं। जिन की खिड़की दरवाज़े कई तरफ़ खुलते हैं। साहित्य , समाज से लगायत फ़िल्म तक।

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