Saturday, 23 March 2013

दिमाग का सफ़र बहुत हो चुका, अब दिल का सफ़र होना चाहिए : मुज़फ़्फ़र अली

लखनऊ लिट्रेरी फ़ेस्टिवल में आज अरसे बाद फ़िल्म निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली से भेंट हुई। आज फ़ेस्टिवल में सूफ़ी संगीत पर आधारित उन की किताब ए लीफ़ टर्नस येलो का लोकार्पण भी हुआ। इस मौके पर आज मुज़फ़्फ़र अली बहुत बढ़िया बोले। बोले कि पैसा कमाना बहुत हो गया, दिमाग का सफ़र बहुत हो चुका, अब दिल का सफ़र होना चाहिए। किसी पत्ती के हरे होने और फिर उस के पीला होने और फिर पेड़ को छोड़ देने की बात ऐसी सूफ़ियाना रंग में डूब कर उन्हों ने कही कि मन मोह लिया। उन्हों ने आज के बच्चों के बिगड़ने की चर्चा की और कहा कि इन्हें शायरी सिखा दीजिए, सब सुधर जाएंगे।

उन्हों ने अपनी बात की कि मैं आज जो भी करना चाहता हूं करता हूं। क्यों कि मैं किसी का नौकर नहीं हूं। किताब उन की अंगरेजी में है। पर वह अंगरेजी में सवाल पूछे जाने के बावजूद हिंदी में ही बोलते रहे। दिल की बात। सूफ़ियाना रंग में डूब कर। बल्कि बेकल उत्साही ने इस पर उत्साहित हो कर उन से कहा कि यह किताब उर्दू और हिंदी में भी आनी चाहिए ताकि हम लोग भी पढ़ सकें। आज उन की हंसी कई बार ऐसी लगी जैसे कोई अबोध बचा हंसता हो। १९९५ में मैं उन से पहली बार मिला था लखनऊ में कैसरबाग स्थित उन की हवेली में ही और एक लंबा इंटरव्यू भी लिया था, उन को इस की भी याद थी। कहने लगे कि एक इंटरव्यू आप को फिर देना चाहता हूं। आप चाहें तो अभी ही। मैं ने कहा कि अभी हड़बड़ी में ठीक नहीं रहेगा. इत्मीनान से बैठेंगे। वह बच्चों की तरह ही अबोध हंसी हंसते हुए ही मान भी गए। पर बोले कि जल्दी ही होना चाहिए। मैं ने हामी भर दी।
आज लखनऊ लिट्रेरी फ़ेस्टिवल में समकालीन हिंदी कविता : लोकप्रियता की चुनौती विषय पर भी चर्चा हुई। प्रसिद्ध शायर बेकल उत्साही इस चर्चा में मुख्य वक्ता थे। इस चर्चा में मेरे साथ जे.एन.यू. के अमरेंद्र त्रिपाठी भी थे और फ़ैज़ाबाद के डा रमाशंकर त्रिपाठी भी। चर्चा में कविता पर बाज़ार के दबाव की बात हुई। हालां कि चर्चा कई बार विषय से भटकी भी। भटकी इस लिए कि हिंदी के कवियों या आलोचकों की शिरकत नहीं हो सकी। नरेश सक्सेना को आना था। किसी कारण से वह नहीं आ पाए। बेकल उत्साही अपने बारे में ही बताते रह गए। विषय पर वह आए ही नहीं। रमाशंकर त्रिपाठी अंगरेजी पर ही अपना गुस्सा उतारते रहे और जाने क्या हुआ कि ऐलान कर बैठे कि हिंदी बस समाप्त होने वाली है।

मैं ने उन्हें बताया और आश्वस्त किया कि घबराइए नहीं आने वाले दिनों में हिंदी विश्व की सब से बड़ी भाषा बनने जा रही है। क्यों कि कोई भी भाषा बनती और चलती है बाज़ार और रोजगार से। बाज़ार अभी हिंदी के ही हाथ है। जिस तरह से हिंदी के तकनीकी पक्ष पर काम चल रहा है, जल्दी ही रोजगार की भी भाषा बन जाएगी। लेकिन वह मानने को तैयार नहीं थे। हिंदी के प्रति उन की निराशा बहुत गहरी थी। उदय प्रकाश, राजेश जोशी का नाम ले कर वह कहने लगे कि यह लोग अब राख हो चुके हैं। मैं ने उन्हें बताया कि नज़रिया बदलें अपना। उदय प्रकाश हिंदी लेखन को अंतरराष्ट्रीय मुकाम तक ले गए हैं और कि वह हिंदी की शान हैं। पर वह अंगरेजी की हताशा से उबरने को तैयार थे नहीं। समय कम था चर्चा का सो बात अधूरी रह गई।

पहले की बीवियों के साथ मैं सेकेंड्री हो कर रह गया था : मुज़फ़्फ़र अली

Friday, 22 March 2013

अरविंद कुमार ने अभी-अभी भारतीय कोशकारिता में तीन परिवर्तनकारी क़दम उठाए

भारतीय कोशकारिता में तीन परिवर्तनकारी क़दम !

शुरू से ही कुछ नया करते रहने की अरविंद कुमार की आदत पुरानी है. सरिता-कैरेवान में थे, तो हिंदी में थिसारस की चाहत, आकांक्षा, कामना, ख़्वाहिश उन के मन में जागी. वहीँ उन्होँ ने हिंदी में इंग्लिश के आयंबिक पैंटामीटर और ब्लैंक वर्स (अतुकांत) छंद में हिंदी कविता का सूत्रपात किया और पूरे हिंदी जगत में तहलक़ा मचा दिया. माधुरी में रहे तो फ़िल्मपत्रकारिता के नए आयाम खोले – किसी लोकप्रिय फ़िल्म पत्रिका को कला और साहित्य का संगम बनाया.

और फिर एक दिन…
समांतर कोश और पेंगुइन कोश के साथ अरविंद कुमार

मुंबई के मायाजाल को तिलांजलि दे ​कर अपने बलबूते पर हिंदी का पहला थिसारस बनाने की उन्माद तक पहुँची धुन​ मेँ दिल्ली (माडल टाउन) – गाज़ियाबाद (चंद्रनगर) चले आए. बरसोँ लगे रहे. तिरेसठ साल की उमर में कंप्यूटर-कुशल बन गए. बेटे सुमीत की बनाई कंप्यूटर ऐप्लिकेशन पर लगभग साढ़े चार लाख अभिव्यक्तियोँ का संदर्भ क्रम पर आधारित डाटा बेस बनाने में जुट गए. परिस्थितिवश यह काम बेंगलूरु (एअरपोर्ट रोड) जा पहुँचा. और वहीँ 1996 में पूरा हुआ तथा समांतर कोश के रूप में फलीभूत हुआ.

कोई और होता तो समांतर कोश को मिलीवाहवाही से संतुष्ट हो जाता और हिंदी मेँ अपना अलग मठ खोल कर नेतागीरी करने लगता. लेकिन अरविंद के लिए तो बस काम ही काम है. अब उन्होँने अपने हिंदी डाटा में इंग्लिश पिरोनी शुरू कर दी. परिणाम हुआ 2007 में छपा तीन खंडोँ का महाग्रंथदपेंगुइनइंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिशथिसारसऐंडडिक्शनरी–संसार का सब से बड़ा द्विभाषी थिसारस-कोश. (यह ग्रंथ प्रकाशित तो पेंगुइन इंडिया ने किया था, लेकिन अब अरविंद की अपनी कंपनी अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा लि ने इस के सर्वाधिकार और सभी प्रतियाँ अपने अधीन कर ली हैँ. उन की बेटी मीता लाल इस की बिकरी तथा वितरण का काम सँभाल रही है.)
अपने दोनों कोशों के साथ अरविंद कुमार

काम यहाँ भी नहीँ रुका. अब अपने द्विभाषी कोश को इंटरनैट पर डालने का काम शुरू किया गया. अब अरविंद लैक्सिकन नाम से उन का द्विभाषी हिंदी-इंग्लिश कोश अब उनकी अपनी साइट पर उपलब्ध है –ArvindLexicon,com. जो लोग देवनागरी लिपि पढ़ नहीँ सकते या उस में टाइप नहीँ कर सकते, उन के लिए हिंदी शब्दोँ के रोमन लिपि रूप भी उपलब्ध हैं. इस की सहायता से दुनिया भर में फैले दूसरी पीढ़ी के भारतवंशी हिंदी से जुड़ सकेंगे.

बात अब यहाँ भी नहीँ रुकी. अब एक साथ तीन धमाके कर रहे हैँ अरविंद कुमार.

राष्ट्रपति  डाक्टर शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश का सैट भेंट करते अरविंद दंपति (13 दिसंबर 1996)

1. किसी भी भारतीय द्विभाषी कोश के लिए पहली बार उन की टीम ने तैयार किया है – विज़ुअल थिसारस. यानी किसी एक शब्दकोटि के पूरे डाटाबेस में भाषाई संदर्भों का सचित्र ब्योरा.

2. इंटरनैट पर सामग्री पढ़ते पढ़ते अकसर हम किसी शब्द को समझना चाहते हैं या इंग्लिश शब्द के हिंदी अर्थ या हिंदी के इंग्लिश अर्थ जानना चाहते हैं. अब तक संसार की किसी भी भाषा का कोई भी कोश यह सुविधा प्रदान नहीँ करता कि ऐसे शब्द को कोश में तत्काल देखा जा सके. यह सुविधा प्रदान करता है अरविंद लैक्सिकन – उन सभी के लिए जो उस के पंजीकृत सदस्य बन चुके हैं. पंजीकरण पूरी तरह निश्शुल्क है.

3. समांतर कोश का पहला सैट दिसंबर 1996 को तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकर दयाल शर्मा को भेंट किया गया था. तब से अब तक उस का कोई परिवर्धित और अपटुडेट संस्करण नहीं आया था. अब अरविंद जी ने तैयार कर लिया है – समांतर बृहत् कोश. शीघ्र ही इस के प्रकाशन की भी संभावना है.

यह है 83-वर्षीय शब्दसारथी और करामाती कोशकार अरविंद की जिजीविषा का अनुपम उदाहरण!
विज़ुअल थिसारस में कंप्यूटर शब्द के संदर्भोँ का ग्राफ़

Monday, 11 March 2013

राजा हो कर देश की समस्याएं नहीं सुलझा सकता कोई: नाना जी देशमुख

नाना जी देशमुख अब नहीं है। पर मेरा मानना है कि अगर देश में दस-बीस नाना जी देशमुख भी हो जाएं तो देश की सूरत और सीरत दोनों बदल जाएगी। नाना जी ने सत्ता और राजनीति का शहद चखने के बाद वनवासी जीवन चुना। एक समय वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य थे। बाद में वह जनसंघ में आए। इमरजेंसी में वह जे पी के साथ आ गए। मुझे वह फ़ोटो अभी तक नहीं भूली जो इंडियन एक्सप्रेस ने छापी थी। उस फ़ोटो में पुलिस जे पी पर लाठियां बरसा रही है और नाना जी देशमुख उन लाठियों को अपने सीने पर ऐसे खा रहे हैं गोया वह जे पी की ढाल हों। जे पी नीचे हैं और उन के ऊपर सीना ताने लेटे नाना जी देशमुख। नाना जी जेल में भी गए जे पी के साथ। बाद में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब वह मोरार जी देसाई सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। पर जल्दी ही वह राजनीति से छुट्टी ले बैठे। और समाज सेवा में लग गए। इस के लिए भी महाराष्ट्रियन होते हुए भी उन्हों ने उत्तर प्रदेश को ही चुना। पहले गोंडा में प्रभावती ग्राम बनाया। फिर चित्रकूट चले गए। यकीन मानिए चित्रकूट में नाना जी ने जो और जितना काम किया है वह अनूठा है। मैं समझता हूं कि आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में अगर नाना जी न आए होते तो यह क्षेत्र दंतेवाड़ा से भी ज़्यादा खतरनाक इलाका हुआ होता नक्सल मूवमेंट के लिहाज़ से। नाना जी ने अपने कामों से यहां सामाजिक और आर्थिक खाई को बहुत हद तक पाटा। क्या तो काम किए हैं उन्हों ने इस क्षेत्र में। आदिवासी बच्चों के लिए नि:शुल्क आवासीय शिक्षा। उच्चतर सिक्षा भी। उन को रोजगार सिखाने के लिए कई उपक्रम। आयुर्वेद का एक बड़ा शोध संस्थान। जहां जड़ी-बूटी से ले कर सौ से अधिक किस्म की देसी गाय। और भी तमाम कुछ । नाना जी का एक किस्सा बहुत सुनता था कि एक बार वह लखनऊ में यशपाल जी के पास गए और उन से कहा कि आप पांचजन्य के लिए कुछ लिखिए। और आप का लिखा जस का तस छपेगा। यशपाल ने लिखा भी और वह छपा भी। जस का तस। जब नाना जी से मैं १९९७ में जून की गरमियों में चित्रकूट में मिला तो उन की वह सहिष्णुता भी देखी। उन की सरलता और शालीनता भी देखी। ज़मीन पर उन के साथ बैठ कर खाना भी खाया। उन्हों ने अपना पत्तल भी खुद उठाया। जब कि वृद्धावस्था के चलते उन का उठना बैठना बहुत सरल नहीं था। उन से पूछा कि आप ने चित्रकूट ही क्यों चुना सेवा के लिए तो वह बोले मुझे वनवासी राम की ही छवि अच्छी लगती है। राजा राम की नहीं।

कभी सक्रिय राजनीति करने वाले नाना जी देशमुख तब राजनीति के बारे में कोई बात नहीं करना चाहते थे। २० साल हो गए थे तब उन्हें राजनीति से संन्यास लिए हुए। नाना जी देशमुख उत्तर प्रदेश में तब की बसपा भाजपा की साझा सरकार के बारे में कहने लगे कि, 'मैं इस सरकार के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। खास कर उस सरकार के बारे में जहां दोनों दल एक दूसरे को सांप कह रहे हों।' वह कहने लगे, 'इस चक्कर में एक दूसरे का मज़ाक उड़ाना तो राजनीति में आम बात हो गई है।' पेश है नाना जी से देशमुख से खास बात-चीत :

क्या लोग आप से मिलने नहीं आते?
-मुझे क्या मतलब? कोई आए न आए।

कोई भी साथी नहीं आता?
-अभी तक तो नहीं आया। हां चंद्रशेखर आता है। एन. डी. तिवारी भी, पर इन से भी राजनीति पर बात नहीं होती।

आप के साथी आप से मिलने नहीं आते तो आप को तकलीफ़ नहीं होती?
-नहीं। लेकिन जब और कोई मिलने आता है वह कोई भी हो मैं सब से मिलता हूं, पर राजनीति पर बात नहीं करता। वैसे मुलायम भी मेरे मित्र हैं।

मुलायम जो जातिवादी राजनीति कर रहे हैं?
-तो मैं क्या कर सकता हूं?

वह इन दिनों हरिजन एक्ट खत्म करने की बात कर रहे हैं।
-वह चाहे जो करें- हम से क्या?

आप को नहीं लगता कि राजनीति में अच्छे लोगों को होना चाहिए?
-बिलकुल होना चाहिए। हर जगह अच्छे लोग रहने चाहिए।

तो फिर आप राजनीति क्यों छोड़ बैठे?
-मुझे रास नहीं आई। लगा कि यहां ज़्यादा अच्छा काम कर सकता हूं।

तो जितने समय आप ने राजनीति की वह समय आप का व्यर्थ गया?
-व्यर्थ क्यों गया? वह भी एक अनुभव था। वहीं रह कर जाना कि यह काम मैं ज़्यादा अच्छा कर सकता हूं।

यह काम राजनीति में रह कर भी कर सकते थे?
-इस दिशा में राजनीति में रह कर काम करना संभव नहीं था। उपेक्षित कामों को करने के लिए राजनीति छोड़ी।

आप को नहीं लगता कि राजनीति छोड़ कर गलती की?
-मुझे लगता है राजनीति छोड़ कर बहुत ठीक किया।

किस लिहाज़ से?
-मैं थोड़ा बहुत काम कर पा रहा हूं इस लिहाज़ से।

पर सरकार में रह कर आप इन योजनाओं के लिए बेहतर संसाधन जुटा सकते थे?
- यह आप का खयाल है। क्यों कि सरकार के भरोसे कुछ नहीं होता। सरकार के भरोसे अगर कुछ होता तो रुस फ़ेल नहीं होता। इस देश में ऐसे भी शासक रहे हैं जिन के शासनकाल में सूरज डूबता नहीं था। तो इन्हें भगाने वाले कौन सरकारी लोग थे? आप जानिए कि नौकरशाही में प्रेरणा नहीं होती, पर युवकों में होती है। कष्ट सह कर देश के लिए यह काम कर सकता है। राजा हो कर देश की समस्याएं नहीं सुलझा सकता कोई। राजा हो कर राम भी पराक्रमी नहीं बने। वह तो वनवासी हो कर ही पराक्रमी बने। तो समाज में काम करना ज़रुरी है, सरकार में काम करना ज़रुरी नहीं है।

संसाधन जुटाने में दिक्कत नहीं होती?
-संसाधन से तो लोग भाग रहे हैं। सारे प्राकृतिक संसाधन गांव में हैं। शहरों में न खेत हैं, न जंगल, न भूगर्भ पदार्थ, न पशु। इन संसाधनों को ले कर लोग गांवों में भी संपन्न ह्जो सकते हैं। पर लोग तो शहरों में भाग रहे हैं। झोपड़पट्टी जीवन जीने के लिए। कोई उन्हें बताने वाला नहीं।

सुना है आप अपने प्रोजेक्टस के लिए विदेशी एजेंसियों से अनुदान नहीं लेते?
-विदेशी धन से आत्म-निर्भरता हम प्राप्त नहीं कर सकते। दूसरे यह हमारी स्वतंत्रता पर चोट करता है। हम देश को स्वावलंबन और स्वाभिमान के आधार पर खड़ा करना चाहते हैं। हां विदेशों से आर्तिक सहायता की जगह तकनीकी सहायता लेना उपयोगी हो सकता है।

आप को नहीं लगता कि आप ने बहुत कठिन रास्ता चुन लिया?
-कठिन क्यों मस्ती भरा है। वैसे तो ज़िंदगी भी कठिन है।

देश के वर्तमान हालात पर कुछ कहेंगे?
-देश के हालात अखबारों से पता चलता है। पर अखबार तथ्यों से कम सनसनीखेज खबरों में ज़्यादा विश्वास करते हैं। इस का कारण है कि जो राजनीति चल रही है, वह जनहित का विचार कम कर रही है। राजनीतिज्ञ दूसरों की विफलता और बदनामी कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहता है। देश में विषमता दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। बेकारी और प्रदूषण बढ़ रहा है। पर्यावरण बिगड़ रहा है। प्राकृतिक संसाधन घट रहे हैं। हर एक दल सदस्यता अभियान चलाता है, मतदाताओं को अपने अनुकूल बनाता है, पर इन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए कोई दल कुछ नहीं कर रहा है। अब बताइए लालू आरोप लगा रहे हैं कि देवगौड़ा उन के यहां छापे डलवा रहे हैं तो देवगौड़ा कुछ कह रहे हैं। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। देश की हालत यह है तो क्या कहें?

एक बात और इन तमाम कमों के लिए आप को कभी फंड आदि की दिक्कत नहीं होती?
-कभी नहीं। तमाम लोग फंड ले कर खुद मेरे पास आते हैं। जितना उचित समझता हूं, रख लेता हूं। बाकी वापस दे देता हूं।

यह कौन लोग हैं आप को फंड करने वाले?
-तमाम लोग। बहुत सारे उद्योगपति। राजनीतिक लोग भी। आम लोग भी। लेकिन मैं कभी किसी के पास पैसा मांगने नहीं जाता। जिस को देना होता है खुद आता है यहां चित्रकूट में। यह मुलायम और चंद्रशेखर जैसे लोग कहते हैं कि हमारे इटावा भी चलिए, बलिया चलिए। ऐसा ही कोई काम अपनी स्वतंत्रता से करिए। कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसे और भी बहुत से लोग हैं। हर जगह बुलाते रहते हैं।

तो आप क्यों नहीं चले जाते?
-अब उम्र हो गई है। इतनी क्षमता नहीं रह गई है। यही जो शुरु किया है, निभा ले जाऊं तो बहुत है। अपने ऊपर दाग भी नहीं लगाना चाहता।

एक व्यक्तिगत सवाल पूछना चाहता हूं।
-पूछिए। नि:संकोच पूछिए।

आप को क्या लगता है कि विवाह न कर के आप ने ठीक किया किया कि गलत?
-अब इस सवाल का कोई महत्व नहीं रह गया है।

फिर भी?
- हां यह सच है कि अगर विवाह किए होता तो जीवन में ज़्यादा ऊर्जा होती। जीवन ज़्यादा बेहतर होता। समाज में और बेहतर काम करना संभव बन पाया होता।

तो विवाह न कर के पछताते हैं आप?
ऐसा भी नहीं है। कह कर वह मुसकुराते हैं। अब जो हो गया है , हो गया है। अब जो आगे वही सत्य है, सुंदर है।

Friday, 8 March 2013

यह उपन्यास पुरुष-प्रधान समाज को एक धक्का है


अनिता गौतम

“पति छोड़ दूंगी पर नौकरी नहीं…” यूं तो पूरा उपन्यास इन चंद शब्दों में ही सिमटा है। नारी की बेचारगी की दास्तां अगर बखान की जाए तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि स्त्री की आर्थिक आज़ादी में ही उस की अपनी आज़ादी है। पुरूष पर निर्भरता उस की गुलामी की दास्तान है। भौतिक ज़रूरतें हर किसी की समान होती हैं। और इस के लिए अर्थ ही सहारा बनता। इस पर पुरूष वर्ग का एकाधिपत्य तो नहीं पर सामाजिक व्यवस्था का ताना-बाना कुछ ऐसा है कि नारी और पुरूष के बीच की खाई पटने का नाम नहीं लेती।

मध्य वर्ग , नारी, कस्बा, शिक्षा और गांव इन बिंदुओ पर घूमता दयानंद पांडेय का उपन्यास ‘बांसगाव की मुनमुन’ सामाजिक परिवर्तन की एक व्यवहारिक तस्वीर है। एक पारिवारिक आधार ले कर शुरु होने वाली इस उपन्यास की कहानी पेशे से वकील मुनक्का राय के चार बेटों और तीन बेटियों की ज़िम्मेदारी से बढ़ती हुई पट्टीदार गिरधारी राय के वैमनस्य और प्रतियोगिता की राह पकड़ती है, जो उपन्यास को बहुत ही रोचक बनाता है। गिरधारी राय और मुनक्का की पारिवारिक पृष्टभूमि दिखाते हुए लेखक ने वकालत की दुनिया को भी बड़े ही ज़मीनी तरीके से चित्रित किया है।

इस उपन्यास को रचने में लेखक का व्यवहार-परक दृष्टि बना रहता है। अपने तहसील में वकालत के उतार – चढ़ाव को झेलते हुए मुनक्का बाबू एक पिता के रुप में बहुत ही समर्पित दिखते हैं। लेकिन उन का बड़ा बेटा रमेश उन की गिरधारी राय से प्रतिस्पर्धा के कारण अनचाहे वकालत की दुनिया में खीच लिया जाता है, जो इस पेशे में रम नहीं पाता। एक प्रतिभा वकालती तिकड़म में घुट रही होती है। सामाजिक तिरस्कार और पैसों के अभाव के साथ आगे बढ़ते हुए रमेश के जज बनने की कहानी रोमांचित करती है। इसी तरह उन का एक बेटा सिविल सेवा में चयनित होता है तथा एक बेटे की नौकरी बैंक ऑफिसर के रुप में होती है। एक बेटा एन आर आई हो जाता है। शिक्षा के दम पर उन के बेटों का व्यवस्था में ऊंचा स्थान पाना मघ्यवर्ग की शक्ति का अहसास दिलाता है, वहीं इस वर्ग के मूल्यों को बिखरते हुए भी दिखाया गया है। पद और पैसों के साथ जुड़ कर मुनक्का बाबू के बेटे अपनी दुनिया में माता – पिता और घर को भूल जाते हैं। अपनी छोटी बहन मुनमुन की शादी को एक खानापूर्ति बना देते हैं। सहयोग और जुड़ाव का अंत हो जाता है।

अब मुनक्का राय की बेटी मुनमुन उपन्यास का केंद बनने की ओर कदम बढ़ाती है। अपने अंदाज़ में चहकने वाली मुनमुन गलत हाथ में ब्याह दी जाती है। फिर सामाजिक तानेबाने और पारिवारक तनाव के बीच वह अपनी पहचान बनाती है। यह उपन्यास पुरुष-प्रधान समाज को एक धक्का है। बड़े ओहदों पर बैठे बेटों के होते हुए मुनक्का राय का सहारा बन कर मुनमुन ही उन के साथ खड़ी होती है। अपने पियक्कड़ और आवारा पति की पिटाई करते हुए स्त्री – जाति के बिद्रोह का बिगुल फूंकती है और सामाजिक संस्कार और मान्यता के नाम पर होने वाले शोषण का अंत करती है। साथ ही वह दूसरी औरतों के मदद करने के जज्बे के साथ सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई में भी आगे आती है।

स्वच्छंदता , आवारागर्दी और चरित्रहीनता के नाम पर भी मुनमुन को दबाने की कोशिश की जाती है, जिस के स्वर समाज में ही नहीं अपने घर में भी उठते हैं। लेखक वर्तमान परिवेश में शारीरिक संबंध को एक गौण मुद्दा बनाते हुए मुनमुन की शिक्षा और सुलझे दिमाग की विजय का चित्र प्रस्तुत करता है। अपने भाइयों तक से वैमनस्य ले कर मुनमुन पी.सी.एस. में सेलेक्ट हो कर एस.डी.एम. बनती है और अपने भाइयों की बराबरी में खड़ी होती है। और इस प्रकार आखिरी संदेश भी स्त्री के लिए यही आता कि आर्थिक निर्भरता ही किसी को उस की गुलामी से निजात दिला सकती और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए भी शिक्षा के दम पर ही समाज में अपने आप को स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार पूरे घटनाक्रम के बाद एक सुखद अंत ले कर मुनमुन की कहानी समाप्ति तक आती है।

लेखक की भाषा सरल और सहज है जो छोटे – छोटे वाक्यों से कहानी को बांधती है। कहानी और उस के पात्रों के विश्लेषण की रोचकता पूरे उपन्यास में बनी हई है। कस्बा और ग्रामीण परिवेश को उकेरने में लेखक पूरी तरह सफल रहे हैं। अपनी कुछ कुछ छोटी-छोटी घटनाओं के अतिश्योक्ति पूर्ण विश्लेषण के बावजूद यह उपन्यास इस युग के बढ़ते और बदलते दौर का स्मृति-चिन्ह है।

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समीक्ष्य पुस्तक:

बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012

Monday, 4 March 2013

त्रिवेणी के विलाप का यह विन्यास



कल हम भी प्रयाग हो आए। गए थे एक पारिवारिक काम से। पर थोड़ा समय मिला तो कुंभ नगरी भी गए। जा कर कुंभ का जायज़ा भी लिया। गए थे संगम नहाने, गंगा नहा कर लौटे। पहले तो नाव नहीं मिली। पर जब ध्यान से देखा तो पता चला कि बीच नदी में जो नावों का कारवां सजा था संगम की दुकान के नाम पर वहां तो संगम था ही नहीं। पर क्या साधू-संन्यासी, क्या भक्तजन या कोई अन्य भी संगम नहीं नहाया इस पूरे कुंभ में। क्यों कि संगम तो अपनी जगह बदल गया था। संगम की जगह किले के पास आ गया है। उस संगम पर कोई नहाने गया ही नहीं। न ही प्रशासन ने इस पर कोई ध्यान दिया, न ही कोई व्यवस्था की। क्या यह सब भीड़ के नाते हुआ या लापरवाही के नाते? समझना बहुत आसान है। प्रशासन नपुंसक हो चुका है और लोग यथास्थितिवादी। तटस्थता की भी यह हद है। चकित तो धार्मिक गुरुओं का रवैया भी करने वाला है। किसी मीडिया का भी इस तथ्य पर कोई ध्यान क्यों नहीं गया यह भी हैरतंगेज़ है। संगम की शालीनता को इस सिस्टम ने कायरता क्यों मान लिया है यह समझना भी कुछ बहुत कठिन नहीं है। एक कविता की याद आती है:

राजा ने कहा रात है

मंत्री ने कहा रात है

सब ने कहा रात है

यह सुबह-सुबह की बात है

तो क्या यही हो गया है? कि सब ने सुबह-सुबह को रात स्वीकार लिया है। क्यों कि सरकार ऐसा चाहती है कि सरकार और प्रशासन ने नहीं देखा कि कि संगम की जगह बदल गई है तो फिर किसी ने भी यह संगम के जगह बदलने पर गौर नहीं किया और संगम के बजाय गंगा में ही नहा-नहा कर धन्य होते रहे? पाप धोते रहे, पुण्य कमाते रहे। जान गंवाते रहे। यह कौन सी आस्था है या यह कौन सा धर्म है? कि किसी ने यह सोचने या देखने या कहने की ज़रुरत भी नहीं समझी कि संगम की जगह बदल गई है और कि सब को संगम में ही नहाना चाहिए? और कि प्रशासन को संगम में नहाने की व्यवस्था करनी चाहिए?


सोचिए कि संगम पर क्या अदभुत नज़ारा है कि एक तरफ से गंगा बहती हुई आती है पूरे वेग से और दूसरी तरफ से पूरे वेग से  बहती आती है यमुना । न गंगा यमुना को डिस्टर्ब करती है न यमुना गंगा को। कोई अतिक्रमण नहीं। दोनों ही एक दूसरे को न रोकती हैं न छेंकती हैं। बड़ी शालीनता से दोनों मिल कर काशी की ओर कूच कर जाती हैं। और एक हो जाती हैं। प्रकृति का यह खूबसूरत नज़ारा औचक कर देता है। इस का औचक सौंदर्य देख मन मुदित हो जाता है। यह अलौकिक नज़ारा देख मन ठहर सा जाता है। दूधिया धारा गंगा की और नीली धारा यमुना की। मन बांध लेती है। मन में मीरा का वह गीत गूंज जाता है-चल मन गंगा यमुना तीर ! मन गुनगुनाने लगता है- तूं गंगा की मौज मैं जमुना की धारा ! गंगा-जमुनी तहज़ीब का चाव भी यही है। और यहां तो विलुप्त सरस्वती का भी संगम  गंगा और यमुना के साथ है। त्रिवेणी का तार बजता है। मन उमग जाता है।  अब भी जब संगम की जगह बदल गई है। तो यह संगम की जगह का बदलना भी क्या प्रकृति से निरंतर छेड़छाड़ का ही नतीज़ा है? या कि संतों और न्यायालय के दबाव के चलते गंगा का पानी ज़्यादा छोड़ दिया गया और यमुना का पानी कम छोड़ा गया। गंगा का प्रवाह प्राकृतिक होने के बजाय कृत्रिम हो गया, तेज़ हो गया और वह यमुना के क्षेत्र में ज़्यादा घुस गई। पर दोनों बहनों का बहनापा फिर भी नहीं गया। और आपस में शालीनता को वह समोए रहीं। संगम की पवित्रता और शालीनता जगह बदलने के बावजूद बनी रही। तो क्या विलुप्त सरस्वती ने भी अपनी जगह बदल ली होगी? विलुप्त सरस्वती का यह विलाप है कोई सुनने वाला? कोई पर्यावरणविद, कोई साधू-संन्यासी, कोई प्रशासन या फिर कोई और सही? प्रकृति का यह विलाप जो नहीं सुना गया तो प्रकृति हमारे साथ क्या करेगी, यह अंदाज़ा है क्या किसी को? सभी नदियां धारा बदलती हैं। गंगा और यमुना भी। पाट और पेट बदलती हैं। संगम की धारा और जगह भी बदलती है। पर इस तरह और इतना तो नहीं ही। बीते कई वर्षों से मैं जब भी कभी इलाहाबाद जाता हूं तो थोड़ा समय निकाल कर संगम भी ज़रुर जाता हूं। संगम की शालीनता को निहारने। संगम की शांत शालीनता मन को असीम शांति से भर देती है। दिन हो, दोपहर हो, शाम हो या सुबह , यह मायने नहीं रखता, संगम की शालीनता को मन में समोने के लिए। चल देता हूं तो बस चल देता हूं। खास कर शाम को उस की नीरवता मन में नव्यता से ऊभ-चूभ कर देती है। इक्का-दुक्का लोग होते हैं। और संगम की शालीनता को निहारने के लिए शांति का स्पंदन शीतलता से भर देता है। संगम को मन में समोना हो, उस की शालीनता को मन में थिराना हो तो शांति ज़रुर चाहिए। भीड़-भाड़ नहीं। सचमुच भीड़ से बच कर ही संगम का सुरुर मन में बांचने का आनंद है, सुख है और उस का वैभव भी। भीड़ में भी उस का वैभव हालां कि कम नहीं होता। तो कल जब भीड़ में भी गया तो संगम का वैभव कम नहीं हुआ। उस की शालीनता, उस का संयम भी बदस्तूर था। इस लिए भी कि संगम तो बिलकुल खाली था। निर्जन था। ऐसे जैसे किसी वन में हो, नगर में नहीं। भीड़ चाहे घाट पर हो चाहे सो काल्ड संगम पर, पर संगम की शांति बदस्तूर तारी थी उस पर। उस की शालीनता और शांति को सरस्वती घाट से आती-जाती नौकाएं भी चीर नहीं पा रही थीं। संगम का यह विलाप मेरे मन में और गहरा गया यह सब देख कर। संगम में नहाने की साध की तरह यह विलाप भी साथ हो लिया है और मैं मन मार कर गंगा में डुबकी मार कर निकल लेता हूं। उस गंगा में जिस गंगा को लोग और तमाम पर्यावरणीय रिपोर्टें चीख-चीख कर कह रही हैं कि  गंदी हो गई है। राज कपूर अपनी फ़िल्म में गाना सुनवा गए हैं राम तेरी गंगा मैली हो गई। उस मैली गंगा में नहा कर, डुबकी मार कर मन फिर भी मुदित है। नहा कर निकलता हूं। कपड़े पहन कर जब चलने को होता हूं तो मेरे सहयात्री श्रीधर नायडू कहते हैं कि, 'सर, आप की एक फ़ोटो ले लूं?' मेरे हां कहने पर वह अपनी टेबलेट से मेरी फ़ोटो खींच लेते हैं। 
श्रीधर से बस अभी रास्ते में ही टैंपो में परिचय हुआ है। हैदराबाद के रहने वाले हैं। रायपुर में रहते हैं। एक  कंपनी में नौकरी करते हैं। किसी काम से बनारस जा रहे थे। रास्ते में इलाहाबाद पड़ा तो उतर गए। कुंभ का पुण्य कमाने के लिए। और रास्ते में मुझे मिल गए। शाम को मेरी भी लखनऊ वापसी की ट्रेन है और उन के बनारस जाने की। बात ही बात हम तय कर लेते हैं कि नहाते समय हम बारी-बारी एक दूसरे का सामान देखेंगे। वी आई पी घाट पर आ कर पता चलता है कि नाव तो सरस्वती घाट पर मिलेगी। यमुना पुल के पास। श्रीधर बहुत हैरान परेशान होते हैं संगम जाने के लिए। पर यहा से संगम जाने के लिए। पर सरस्वती घाट जाने के लिए फिर वापस तीन चार घंटे का उपक्रम होगा। रास्ते भर जाम का लफड़ा है। शाम की ट्रेन है। छूट जाने खतरा है। फिर वह और मैं खुद बहुत सारे जुगाड़ लगाते हैं संगम पर जाने खातिर नाव के लिए। पर कोई जुगाड़ बनता नहीं। फिर किले तक आते-जाते इस घाट से उस घाट तक मेरी नज़र अचानक संगम की बदली जगह पर पड़ती है। तो मैं हैरान परेशान हो जाता हूं। जिन पुलिस वालों से नाव की बात पहले कर रहा था उन्हीं से संगम के सवाल पर उलझ जाता हूं। तो एक पुलिस वाला वी आई.पी. घाट को इंगित कर के  कहता है कि, 'सारे साधू संन्यासी यहीं नहा कर गए हैं। शंकराचार्य से लगायत सारी वी.आई.पी. तक। किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि संगम तो वहां है यहां क्यों नहाऊं? आप ही एक नए आए हो जो यह सवाल पूछ रहे हो !' मैं फिर जब यमुना की नीली धारा और गंगा की दूधिया धारा किले के पहले की तरफ दिखाते हुए कहता हूं कि, 'संगम तो वह देखिए  उधर है। न कि जहां नांवें लगी हैं उधर। यह सुन कर वह पुलिस वाला उस तरफ ध्यान से देखते हुए चुप लगा जाता है। तो मैं उसे टोकता हुआ कहता हूं संगम जब इधर है तो नहाने के लिए भी इधर ही नावें लगा कर व्यवस्था करनी चाहिए थी।' और जब कई बार यही बात कहता  हूं तो वह पुलिस वाला भन्ना जाता है। कहता है यह सब जा कर अखिलेश यादव से पूछिए। उन के पिता जी मुलायम सिंह से पूछिए। शिवपा्ल सिंह से, आज़म खान से पूछिए !  और मेरे पास से चला जाता हे तेज़-तेज़ कदमों से। श्रीधर नायडू जो संगम जाने के लिए लालायित हैं समझाता हूं कि कोई फ़ायदा नहीं वहां जाने से। संगम तो वह है नहीं। संगम तो इधर है जहां नहाने, जाने की कोई व्यवस्था नहीं है। सो यहीं नहाते हैं गंगा में। श्रीधर बड़बड़ाते हैं कि गंगा तो मुझे बनारस में भी मिल जाती। फिर यहां उतरना बेकार गया। मैं तो संगम नहाने आया था। अब यहां क्यों नहाऊं खैर, पहले मैं नहाता हूं। श्रीधर मेरा सामान देखते हैं। नहा धो कर जब मैं ने कपड़े पहन लिए तो अचानक श्रीधर भी मचल गए। बोले, सर मैं भी नहा लेता हूं। और वह भी नहाने चले गए। नहा कर आए तो कपड़े पहनने के बाद बोले, सर आप की फ़ोटो खींच लूं? मैं ने कहा कि बिलकुल। फिर उन्हों ने अपनी टेबलेट से न सिर्फ़ फ़ोटो मेरी खींची बल्कि मेरी आई.डी. पूछ कर वहीं से तुरंत मुझे मेल भी कर दी।
अब हम लोग लौट रहे हैं। मेला हालां कि उजड़ चला है। धूल उड़ रही है। पर भीड़ बनी हुई है। इतवार होने के नाते  स्थानीय लोग ज़्यादा हैं। पर बाहरी लोग भी कम नहीं हैं। भीड़ चल रही है अपनी गति से। अपने मूड से। अपने रंग से। कैलाश गौतम की कविता अमौसा क मेला मन में तिर जाती है- अमौसा नहाए चलल गांव देखा ! भीड़ चल रही है। साथ ही यात्रियों से लूट-पाट भी। क्या रिक्शा वाले, क्या आटो वाले और क्या नाव वाले सब के सब आने वालों को लूटने में एक दूसरे से आगे थे। एक किलोमीटर के लिए भी कोई दो सौ रुपए भी ले सकता था, पाच  सौ रुपए भी। नाव वाले भी आठ सौ ले सकते हज़ार भी, दो हज़ार भी। प्रशासन और पुलिस मूक दर्शक थी।
स्टेशन पर भी भीड़ बहुत है। नहा कर लोग लौट रहे हैं और रेल के डब्बों में भेड़-बकरी की तरह ठुंस रहे हैं। कोई व्यवस्था नहीं है। कोई इधर हांक रहा है कोई उधर। यह दबे-कुचले निर्बल वर्ग के लोग हैं। एक ट्रेन में लोग सामान रखने वाले डब्बे में चढ़ गए हैं। बिलकुल भूसे की तरह। औरतें और बच्चे ज़्यादा हैं इन में। वृद्ध और अधेड़ लोग। कुछ रेल कर्मचारी आते हैं उन्हें कुत्तों की तरह दुत्कार-दुत्कार कर उतार रहे हैं। लोग इधर उधर भाग रहे हैं। ट्रेन के डब्बों में जगह नहीं मिल पा रही है। ट्रेन चल देती है। लोग प्लेटफ़ार्म पर दौड़ते रह जाते हैं। गिरते-पड़ते। पर ट्रेन नहीं मिलती, निकल जाती है। जो कुछ चढ़ गए हैं वह भी कूद-कूद कर चलती ट्रेन से उतर रहे हैं। क्यों कि बाकी परिजन प्लेटफ़ार्म पर रह गए हैं। चेहरे पर अब कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे! का भाव है। प्लेटफ़ार्म पर अब दूसरी ट्रेन आ गई है। लोग फिर इधर-उधर भाग रहे हैं। झोला, झंझट लिए हुए। चलने की क्षमता नहीं है पर दौड़ने की कोशिश जारी है। कुंभ में संगम नहाने के लिए, पुण्य कमाने के लिए यह यातना, अपमान और नर्क भुगतते लोगों को देख कर मन तकलीफ़ से भर जाता है। संगम की शालीनता का सारा सौंदर्य, औचक सौंदर्य मन से तितर -बितर हो जाता है।
मुझे नौचंदी से लौटना है। अचानक उस का प्लेटफ़ार्म बदल जाता है। लोग इधर-उधर हो रहे हैं। अजब अफ़रा-तफ़री है। अमावस्या की शाम का हादसा याद आ जाता है। मरे हुए लोगों के जूते-चप्पल और उन के परिजनों की चीख-पुकार याद आ जाती है। साथ ही दयाशंकर शुक्ल सागर की हिंदुस्तान में लिखी वह खबर भी मन में तैर जाती है एक भयावह दु:स्वप्न की तरह कि स्टेशन पर कफ़न पहले आ गए, डाक्टर और दवाएं बाद में। खैर कोई हादसा नहीं होता। हम सही-सलामत अपने डब्बे में आ जाते हैं।
मन में सवाल बदकता हुआ-सा बाकी है कि संगम की जगह तो बदल गई है मय अपनी शालीनता के। पर यह व्यवस्था कब बदलेगी भला? अपमान, यातना और नरक का यह कौन सा संगम है भला? कि आप संगम तक लोगों को पहुंचा तो देते हैं पर संगम नहाने की व्यवस्था नहीं करते। लोगों के सम्मान से आने-जाने की सुविधा नहीं दे सकते। अपमान, तिरस्कार और मृत्यु की इस त्रिवेणी के तार कब टूटेंगे भला? गंगा, यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी का विलाप भी यही है शायद ! सुबह-सुबह को रात कहने की यह रवायत और राजा की ज़िद अब टूटनी ही चाहिए। राजा की रात की बात को मानने का सूर्यास्त अब बहुत ज़रुरी हो गया है।  आखिर् यह कब तक चलेगा कि कफ़न पहले आ जाएंगे और डाक्टर और दवाएं बाद में। त्रिवेणी के विलाप के इस विन्यास को अब सूर्योदय में बदलना ही होगा।

Saturday, 2 March 2013

बालेश्वर : जेहन में कबीर, जीवन में आर्केस्ट्रा

जैसे कोई मीठी और नरम ईख हो, जिसे छीलते ही पोर-पोर खुल जाए। बालेश्वर की गायकी की मिठास कुछ-कुछ क्या बिलकुल वैसी ही है। तिस पर कंहरवा धुन। सोने पर सुहागा हो जाता है। वह जब गाते हैं- ‘समधिनियां क पेट जैसे इंडिया क गेट’ या फिर ‘मोर पिया एम.पी. ए.एल.ए से बड़का, दिल्ली-लखनऊवा में वोही क डंका, अरे वोट में बदलि देला वोटर क बक्सा’ या फिर, ‘दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले। हिटलरशाही मिले पर मिली जुली सरकार न मिले, मरदा एक ही मिले हिजड़ा कई हज़ार न मिले। या फिर ‘पूजा करे मंदिर में और ध्यान लगावे जूता का।’ और एक बार तो एक शादी में जयमाल के समय बालेश्वर गाने लगे, केकरे गले में डारूं हार, सिया बउरहिया बनिके’, तो दुल्हन उन की गायकी में ऐसे डूब गई कि जयमाल लिए-लिए ठिठक कर खड़ी हो गई। सखियों ने कोंच कर टोका तो वह दूल्हे की तरफ आगे बढ़ी। तो यह बालेश्वर की गायकी की गमक थी और कुछ और नहीं।

दरअसल भोजपुरी गायकी  में जीते जी किंवदंती बन चले  बालेश्वर अपनी उम्र के सतहत्तर वसंत देख चुकने के बावजूद आज भी उतने ही सक्रिय हैं, जितने जवानी में वह थे। वाद-विवाद उन के पीछे तब भी थे और आज भी हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि आज उन के साथ एक अंतर्विरोध भी नत्थी हो गया है। उन की सोच, उन की विचारधारा, गायकी और उन की दृष्टि उन्हें कबीर की ओर ले जाती है। पर दिक्कत यह है कि वह जीते कबीर में हैं और गाते आर्केस्ट्रा में हैं। गाते भी क्या हैं- उन के गानों पर लड़कियां नाचती हैं। बालेश्वर से जब बात चली तो उन्हों ने अपना अंतर्विरोध खुद भी स्वीकार किया। कहने लगे, ‘छट्ठी-बरही, शादी-ब्याह, मुंडन जैसे कार्यक्रमों से तो ज़िंदगी कट नहीं सकती। गु्ज़ारा नहीं हो सकता। मैं किसी तरह अपना गुज़ारा चला भी लूं। पर हमारे साथी कलाकारों का काम कैसे चलेगा? यही सब सोच कर ऐसे कार्यक्रमों में जाना पड़ता है। लाचारी है।’

‘आप के कई गानों मे खास कर सामाजिक सरोकार वाले गानों में कबीर की गूंज सुनाई देती है। ऐसा कैसे है?’ पूछने पर बालेश्वर कहते हैं कि, ‘असल में आज समाज को एक कबीर चाहिए ही। पर अब मैं कबीर तो हो नहीं सकता, पर उन को सोच तो सकता ही हूं।’ बीते दिनों रायबरेली में हुए संसदीय उप चुनाव में सोनिया गांधी की जन सभाओं में कार्यक्रम पेश कर के बालेस्वर सुर्खियों में आ गए थे। खास कर इलेक्ट्रानिक चैनलों पर। कहा गया कि सोनिया गांधी भीड़ बटोरने के लिए नाच-गाने का सहारा ले रही हैं। और बालेश्वर भी उन की सभाओं में गाते फिरते, ‘हमहूं कांग्रेसी हो गइलीं, ए ललमुनिया की।’ यह और ऐसे कई गानों की ऑडियो सी.डी. और कैसेट भी रायबरेली में बजते मिले। बालेश्वर इस से पहले समाजवादी पार्टी और बाद में भारतीय जनता पार्टी के लिए भी गा चुके हैं। सच यह भी है कि बालेश्वर सब से पहले कम्युनिस्ट पार्टी के लिए गाते थे। यह पूछने पर कि, ‘आप कम्युनिस्ट पार्टी के लिए गाते-गाते अचानक सपा, भाजपा, कांग्रेस के लिए गाने लगे? बालेश्वर बोले, ‘मैं जनता का आदमी हूं। और अब जब कम्युनिस्ट ही कम्युनिस्ट नहीं रह गए तो मैं गाय की तरह उस खंभे से कैसे बंधा रहता? और जब छट्ठी-बरही, शादी ब्याह में गा सकता हूं तो सपा, भाजपा और कांग्रेस के लिए गाने में क्या रखा है? हम को तो जो बुलाएगा, जहां बुलाएगा जाऊंगा और गाऊंगा। मज़दूर आदमी हूं। मज़दूरी करनी है। गुज़ारा चलाना है।’

दरअसल बालेश्वर की गायकी  की शुरुआत राजनीति से ही हुई। कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक झारखंडे राय अपनी चुनावी सभाओं में बालेश्वर से गाना गवाते थे। चुनावी दिनों में जीप में बैठ कर माइक ले कर बालेश्वर गाते घूमते थे। तब वह युवा थे। बाद के दिनों में झारखंडे राय ही उन्हें लखनऊ लिवा लाए। अब बालेश्वर के आगे संघर्ष की एक लंबी राह खड़ी थी। और सफलता उन की बाट जोह रही थी। लखनऊ में बालेश्वर ने मिट्टी ढोने से ले कर कप-प्लेट धोने तक के काम किए। वह कहते हैं, ‘मेहनत मजूरी से अपना पेट पालता था और अपनी गायकी को जिलाए रखता था। अब तो सपा, भाजपा, कांग्रेस सभी हमको बुलाते हैं। पर पर तब लखनऊ में कोई भोजपुरी गाना सुनने को तैयार नहीं था। यही आकाशवाणी वाले फेल कर दिए। कइयों बार। सच भी यही है कि अवध की धरती पर बालेश्वर ने भोजपुरी का जो झंडा गाड़ा है, वह अकथनीय है। आज लखनऊ में भोजपुरी गाने वालों के पचास से अधिक ग्रुप हैं तो इस का श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ बालेश्वर को जाता है। अधिकांश कलाकार बालेश्वर के शिष्य हैं। इन में बहुत सारे कलाकार तो बालेश्वर के ही गाए गाने जगह-जगह गाते मिल जाते हैं। बिलकुल उन्हीं की धुन, उन्हीं के सुर में। लेकिन यह कलाकार बालेश्वर की गायकी को छू तक नहीं पाते। फिर भी अवधी के गढ़ में भोजपुरी फूल-फल रही है तो यह बड़ी बात है। आसान नहीं है कि लाल जी टंडन जैसे नेताओं को भी चुनाव में बालेश्वर के भोजपुरी गानों में गाए गानों के कैसेट चाहिए होते हैं।

यस इंडियन

बालेश्वर की स्थिति यह है कि आसाम, बिहार, बंगाल, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों से लगायत हालैंड, मारीशस और सूरीनाम जैसे देशों में भी लगातार उन के कार्यक्रम होते रहते हैं। जब भारत महोत्सव मनाया जा रहा था तो तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के साथ अमरीकी देशों के दौरे को बालेश्वर अपनी उपलब्धि मानते हैं। अस्सी के दशक से शुरु हुई विदेश यात्राएं अभी भी जारी हैं। ज़िक्र ज़रूरी है कि बालेश्वर अपने गाने भले ही खुद लिखते हैं। पर वह कुछ खास पढ़े लिखे नहीं हैं। यह पूछने पर कि विदेशी दौरों में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती? ‘दिक्कत? अरे बहुत दिक्कत होती है।’ वह बताने लगे कि, ‘धरती से ऊपर (जहाज में) सिर्फ़ दो ही चीज़ चलती है। एक अंगरेजी और दूसरा डालर।’

‘अंगरेजी आप जानते नहीं तो कैसे काम चलता है?’ अपने होठों पर उंगली रखते हुए चुप रहने का संकेत देते हुए कहते हैं कि, ‘चुप रहता हूं। बिलकुल चुप!’

’और डालर?’

’डालर रख लेता हूं। पर जब पहली बार हालैंड जा रहा था तो बड़ा गड़बड़ हो गया। हालैंड में आयोजक के एजेंट ने दिल्ली में जहाज पर बैठा दिया और बताया कि हालैंड एयर पोर्ट पर आयोजक लेने आएंगे। और डालर वगैरह कुछ दिया नहीं। गड़बड़ यह हुई कि रास्ते में जहाज या कि मौसम खराब हो गया। जहाज रूस में उतार दिया गया। दो दिन हम रूस में पड़े रहे। न अंगरेजी आती थी न डालर था। बड़ी परेशानी हुई। यह सोच-सोच कर परेशान था कि अब हवाई जहाज लेट हो गया है। आयोजक पता नहीं एयरपोर्ट पर मिलेगा कि नहीं मिलेगा। नहीं मिलेगा तो क्या करूंगा। आयोजक का पता ठिकाना भी नहीं मालूम था। फिर एक आदमी वहां हिंदी जानने वाला मिला। उसने बताया कि अगर आयोजक नहीं मिलेगा तो हालैंड में किसी भी मंदिर में चले जाना। वहां रहने खाने की व्यवस्था लोग करवा देंगे। पर गनीमत यह हुई कि हालैंड एयरपोर्ट पर आयोजक मिल गया। उस को जहाज की खराबी और लेट का पता चल गया था।’

वह बताने लगे कि, ‘पर हालैंड में एक दूसरी दिक्कत आ गई। कि आज भी उस घटना को सोच कर प्राण सूख जाता है। हुआ यह कि हम सभी कलाकार हालैंड में घूम रहे थे। आयोजक साथ में था। और वह कहीं बिछड़ गया। हम लोग आयोजक को खोजने में परेशान ही थे कि पुलिस ने पकड़ लिया। होम लोगों के होश उड़ गए। कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे कि वह पूछ क्या रहा है। और वह गुस्सा होता जा रहा था। अंत में अंगरेजी का दो शब्द हमको मालूम था। एक यस और दूसरा इंडियन। तो बिना कुछ सोचे समझे बोलना शुरु कर दिया-यस इंडियन, यस इंडियन। और धीरे धीरे हमारे सभी साथी यस इंडियन, यस इंडियन कहने लगे। हाथ जोड़ कर यस इंडियन,यस इंडियन, ऐसे जैसे भजन गा रहे हों। पुलिस वाला गुस्से में जाने क्या गिट-पिट, गिट-पिट बोल रहा था। और हम लोग यस इंडियन, यस इंडियन...। गनीमत यह हुई कि थोड़ी देर में ही आयोजक ने हम लोगों को खोज लिया और हम लोग बच गए’।

‘लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला’ या फिर कटहर क कोवा तू खइलू, तो हई मोटका मुअड़वा का होई’ या फिर ‘अंखिया बता रही है, लूटी कहीं गई है।’ जैसे द्विअर्थी गाने भी आपने खूब गाए हैं। यहां तक कि निर्गुण में भी आप अश्लीलता की छौंक संकेतों-संकेतों में लगा देते हैं। तो यह सब क्या है? आप के कार्यक्रमों में भी आज कल आप का गाना कम, लड़कियों का डांस ज़्यादा हो गया है। इस पर क्या कहेंगे?’ ‘देखिए इस में हमारा कोई दोष नहीं है। आज की पब्लिक दो ही चीज़ देखती है।’ बालेश्वर बोले, ‘एक क्रिकेट और दूसरा लड़कियों का डांस। बाकी कुछ नहीं। आज कान में उंगली डाल के मैं बिरहा गाऊं तो कितने लोग सुनेंगे? सब भाग खड़े होंगे। आज हालत यह है कि जब लोग प्रोग्राम बुक करने आते हैं तो यह नहीं पूछते कि मैं कितना गाना गाऊंगा। बल्कि यह पूछते हैं कि कार्यक्रम में लड़कियां कितनी हैं? चलिए छोड़िए मैं बहुत छोटा कलाकार हूं। पर बिरजू महाराज तो बहुत बड़े कलाकार हैं। अभी वह लखनऊ आए तो थे तो अखबार में उन का एक इंटरव्यू छपा था। जिस में उन्होंने बड़ी तकलीफ के साथ बताया था कि उन से आयोजक उनके डांस के बारे में नहीं, उनके ग्रुप में कितनी लड़कियां आएंगीं, यह पूछते हैं। तो क्या करिएगा? समाज ही बदल गया है। इस में मैं क्या कर सकता हूं।‘

‘बाबू क मुंह जइसे फैज़ाबादी बंडा, दहेज में मांगे लें हीरो होंडा’ या फिर ‘जब से लइकी लोग साइकिल चलावै लगलीं, तब से लइकन कै रफ़्तार कम हो गइल’ या ‘हार गया चुनाव, लेकिन हार नहीं मानता, घरवा में सब कुछ भरल बा लेकिन चेहरा पर बारह बजल बा।’ या ‘ददरी क मेला’ या ‘फगुनवा में रंग रसे-रसे बरसे’ जैसे तमाम गीत बालेश्वर की खासियत भी है और पहचान भी। कंहरवा धुन उन की थाती है। बालेश्वर के गाए अधिकतर गाने कंहरवा धुन में ही गुंथे हुए हैं। समाज की धड़कन और उस की कसक उन के गीतों में हमेशा कांटों सी चुभती मिलती है। वह तमाम प्रसंगों पर तंज़ करना भी खूब जानते हैं। ‘बीस आना क माला’ या फिर ‘शाहजहां ने मुहब्बत की तो ताजमहल बनवा दिया, और कांशीराम ने मुहब्बत की तो मायावती को मुख्यमंत्री बनवा दिया’ या फिर ‘नाचे न नचावे केहू पइसा नचावेला, पैसा जिसने बनाया दुनिया में लाके छोड़ दिया, दुनिया तो स्वर्ग थी पैसे ने ला कर बोर दिया, पइसा देखा दिया तो घूंघट उठा दिया, पइसा देखा दिया तो परदा हटा दिया, कोई न हटावे हटे, पइसा हटावेला।’ इतना ही नहीं अपने पर भी वह तंज़ करना खूब जानते हैं। उन्हें जब एक दशक पूर्व यश भारती से सम्मानित किया गया तब भी उन्होंने एक गाना लिखा और उसे झूम कर गाया भी, ‘तनी ठुमका लगा द बारी धनिया, कि तोंहके यश भारती दियाइब’।

खाने कमाने दीजिए

ज़ी.टी.वी. के अंत्याक्षरी कार्यक्रम में अन्नू कपूर सरीखे कलाकार बालेश्वर का गाना बिलकुल उन्हीं के अंदाज में रई-रई, रई-रई कह कर गाते दिख जाते हैं। बालेश्वर का एक गीत है ‘फगुनवा में रंग रसे-रसे बरसे!’ अन्नू कपूर बिलकुल बालेश्वर अंदाज़ में पिछली होली में गाने लगे। बस गाने का एक शब्द अनजाने में वह बदल गए कि फगुनवा में अंग अंग रस बरसे। इतना ही नहीं बालेश्वर के गाए कई गाने फ़िल्मों मे चले गए। बिना उन के नाम या अनुमति के। जब से सिपाही से भइलें हवलदार हो नथुनिए पे गोली मारे। मूल गाना बालेश्वर का है। उन के पुराने कैसेटों में है। पर कुछ समय पहले पटना के एक गायक ने इसी गाने को फास्ट करके गा दिया। रातों-रात न सिर्फ़ वह मशहूर हो गया बल्कि यही गाना बदल कर एक फ़िल्म में आ गया- अंखियों से गोली मारे। पर बालेश्वर इन सब चीज़ों पर कभी ऐतराज नहीं करते। कहते हैं, ‘सब का धंधा है। रोजी रोटी है। खाने कमाने दीजिए। अब तो बात यहां तक आ गई है कि बालेश्वर के कई शिष्य ही उन के लिखे और गाए गानों में अपना नाम जोड़ कर गाने लगे हैं। बालेश्वर को फिर भी ऐतराज नहीं होता। कहते हैं, ‘किस-किस को कहां-कहां रोकूं? अरे खाने कमाने दीजिए।’

सेहत का राज़


बालेश्वर अगर सतहत्तर  की उम्र में भी बिलकुल फिट  और खूब सक्रिय दिखते हैं  तो इस के राज सिर्फ़ तीन हैं। एक संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और कार्यक्रमों में निरंतर व्यस्तता।

गरीबी, संघर्ष, पिछड़ी जाति और संबंधों का निभाव

बालेश्वर अपनी गरीबी, संघर्ष और अपने पिछड़ी जाति का होने का दंश नहीं भूल पाते हैं। यह दंश उन्हें बराबर सालता  रहता है। वह कहते हैं कि जब जहाज में बैठता हूं और नीचे देखता हूं तो अपनी पुरानी गरीबी याद आ जाती है और रो पड़ता हूं। वह यह भी मानते हैं कि अगर वह पिछड़ी जाति के नहीं होते और कि पढ़े लिखे होते तो गायकी की दुनिया में बहुत आगे गए होते। वह कहते हैं कि आज मनोज तिवारी गायकी में क्यों इतना आगे हैं? क्यों कि वह ब्राह्मण हैं। और कि पढ़े लिखे हैं। गाना बजाना कौन सुनता समझता है? जिस का पेट भरा होता है। तो सवर्ण, सवर्ण को ही ज़्यादा आगे बढ़ाता है।

लखनऊ में आज बालेश्वर के भरोसे कई परिवारों का चूल्हा जलता है पर इसी लखनऊ में  बालेश्वर ने न जाने कितनी  रातें पानी पी-पी कर काटी हैं। भूख और बदहाली से जैसे उन की दोस्ती थी उन दिनों। ‘हम कोइलरी चलि जाइब ए ललमुनिया क माई!’ जैसा गीत उन्हीं दिनों बालेश्वर ने लिखा था। जिस में बेरोजगारी की यातना साफ झलकती है। उन दिनों वह चाह कर भी नहीं भूल पाते। वह उन लोगों को भी नहीं भूल पाते जिन लोगों ने उन के संघर्ष के दिनों में साथ दिया, उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिया। और वह संबंधों को निभाना जानते हैं सो इन मदद करने वालों की उन के पास न सिर्फ़ एक लंबी सूची है बल्कि उन सब की स्मृतियों को उन्हों ने सहेज भी रखा है।

इन में से कुछ लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन  बालेश्वर के दिलों में  हैं। उन की स्मृति स्वरूप उन्हों ने अपने घर में उन लोगों की बड़ी-बड़ी फ़ोटो बनवा कर टांग रखी है। भारत महोत्सव की फ़ोटो में गाते हुए तथा यश भारती से सम्मानित होते तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल बोरा और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के साथ रंगीन फ़ोटो, कुछ और सम्मान समारोहों की रंगीन फ़ोटुओं के बीच कुछ श्वेत श्याम फ़ोटो भी हैं। विधायक रहे और उन्हें लखनऊ ले आने वाले झारखंडे राय की फ़ोटो सब से पहली है। लखनऊ में उन्हें सब से पहले मंचों पर पेश करने वाले हरवंश जायसवाल की बड़ी फ़ोटो भी है। हरवंश जायसवाल ने न सिर्फ़ उन्हें मंचों पर पेश किया बल्कि उन्हें लखनऊ का सलीका और शऊर भी सिखाया। बालेश्वर का एच.एम.वी. का सब से पहला एल.पी. रिकार्ड भी हरवंश जायसवाल के सहयोग से रिलीज़ हुआ। पत्रकार जय प्रकाश शाही की भी बड़ी सी फ़ोटो बालेश्वर ने टांग रखी है। वह मानते हैं कि उन्हें यश भारती सम्मान दिलाने और मीडिया में उन्हें भरपूर स्थान दिलाने में शाही जी का बड़ा सहयोग रहा। साथ ही उन के एक सहकर्मी रहे और मित्र की पत्नी श्रीमती पांडेय की भी बड़ी फ़ोटो है। वह कहते हैं कि पड़ाइन ने हमारा बड़ा खयाल रखा। अपनी जान भर कभी हम को भूखा नहीं सोने दिया। अब वह नहीं हैं तो भी उन के परिवार से, उन के बच्चों के साथ बालेश्वर का वही अपनापन है, जो पहले था। उमानाथ राय जो चेयरमैन साहब उर्फ़ हड़बोंग नाम से मशहूर थे, टी सीरीज़ वाले गुलशन कुमार, और पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय भी उन की स्मृतियों में उसी तरह ताजा हैं जैसे कोई फूल अभी-अभी खिला हो और वह उन सबसे मिल कर अभी-अभी आए हों।

बालू अड्डा


बालेश्वर जब राज्य संपत्ति  विभाग में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी करते थे तब दारुलशफा में उन्हें सरकारी क्वार्टर मिला था। बाद में उन्हों ने एक मकान गोमती नगर में  और एक बालू अड्डा में बनवाया।  रिटायर होने के बाद बालू अड्डा  में उन्हों ने एक और घर बनाया और यहां बालेश्वर संगीत विद्यालय खोला। अब वह इस संगीत विद्यालय में ही रहते भी हैं। बालू अड्डा वाला पहला घर बेटों को दे दिया। गोमती नगर वाला घर छोटे भाई को दे दिया। खुद क्यों नहीं गए गोमती नगर रहने? पूछने पर वह कहते हैं, ‘गोमतीनगर बड़े लोगों की कालोनी है। वहां हमारे समाज की धड़कन नहीं है। मन ऊबता है वहां। कोई किसी को पूछता नहीं। बालू अड्डा मलिन बस्ती है, मज़दूर रहते हैं। यहां हमारा समाज धड़कता है। लोगों का मेला लगा रहता है। जीवन में धड़कन बनी रहती है। दूसरे, यहां हर जगह आने-जाने की सवारी मिल जाती है। कलाकारों को आने जाने में सुविधा रहती है। कई साथी कलाकार तो अब बालू अड्डा में ही रहने लगे हैं। कुछ कलाकारों  ने घर बनवा लिया है तो कुछ किराए पर हैं। तो कलाकारों का भी साथ रहता है। तीसरे भैंसा कुंड भी यहां से सटा हुआ है। मर जाऊंगा तो लोगों को वहां ले जाने में दिक्कत नहीं होगी। सिर्फ़ एक सड़क पार करनी होगी।’

कबीर एक बार फिर उन पर तारी हो जाते हैं।