Sunday, 10 November 2013

कथाक्रम और शुतुरमुर्गी अदा के मारे लफ़्फ़ाज़ रणबांकुरे !

कथाक्रम के दो दिवसीय सम्मेलन में इस बार हिंदी लेखकों की लफ़्फ़ाज़ी के क्या कहने ? अजब नज़ारा था।  यह जो  हिंदी लेखक किसी प्रकाशक से रायल्टी की बात करने के सपने से भी डर जाते हैं, उलटे पैसा दे कर किताब छपवाने के उपक्रम में लगे रहते हैं। संपादकों की इच्छा कहिए डिक्टेशन कहिए अपनी रचना में शीर्षासन कर पूरी करते हैं। तीन सौ या पांच सौ किताब छपने का रोना रोते हैं। गरज यह कि पाठकों से वंचित और कुंठित यह लेखक खुद ही पाद कर खुद ही खुश हो लेते हैं। [दूसरों को इस से दिक्कत हो या बदबू आए , इस से उन को फ़र्क नहीं पड़ता।] ऐसे लेखक भूमंडलीकृत समाज और साहित्य की मशाल विषय पर धुंआंधार लफ़्फ़ाज़ी का धुंआ ऐसे छोड़ रहे थे गोया कोयले वाला इंजन हों।  साबित यही हुआ कि जैसी बांझ रचनाएं यह हिंदी लेखक करते हैं, वैसी ही बांझ बहस भी वह करते हैं। कि बताइए दू ठो पाठक बटोर नहीं सकते, चार ठो श्रोता बटोर नहीं सकते और लड़ेंगे भूमंडलीकरण से। आग लगा देंगे समूची व्यवस्था में।
यह सारी लफ़्फ़ाज़ी देख-सुन कर बार-बार पाकिस्तान की याद आती रही। कि जैसे पाकिस्तान अमरीका के दिए गए भीख से पेट भरता है, हथियार भी अमरीका से भीख में लेता है और हिंदुस्तान पर भूंकता रहता है अमरीका के दम पर। और जब अमरीका वहां ड्रोन हमले करता है और वहां के लोगों को जब-तब मारता रहता है तो पाकिस्तान अमरीका पर गुर्राता है कि अब जो कर लिया सो कर लिया, अब जो ड्रोन हमला किया तो ठीक नहीं होगा। और अमरीका फिर जल्दी ही एक और ड्रोन हमला कर देता है। अब तो यह पाकिस्तान का यह भूकना भी लगभग बंद  हो गया है। पर हमारे हिंदी लेखक अभी यह काम जारी रखे हुए हैं। इन की लफ़्फ़ाज़ी में अभी जीवन बाकी है। बताइए कि बाज़ार की सारी सहूलियत भी चाहिए और बाज़ार से युद्ध भी ? वह भी कोरी लफ़्फ़ाज़ी के बूते?
यह कौन सा अंतर्विरोध है हमारे हिंदी लेखकों ?
अहंकार में डूबा व्यवहार, सामंतवाद की हदें पार करता हुआ, शालीनता की सारी हदें तोड़ता, कि हिप्पोक्रेसी की सारी आयतें शर्मा-शर्मा जाएं। एक तो रचना नहीं और जो इक्की दुक्की हैं भी बोझिल बौद्धिकता में तरबतर रचनाएं, जिन के दो पन्ने पढ़ना भी किसी सामान्य पाठक के लिए मानसिक उमस का सबब बन जाती हैं लेकिन आप का झंडा ऊंचा रहता है। क्यों कि आप साहित्य के बाज़ार में भले न हों पर एक गिरोह में आप ज़रुर हैं। फ़ासिस्टों का विरोध करते-करते खुद फ़ासिस्ट बन जाते हैं। पर यह फ़सिज़्म, यह गिरोहबंदी कितने दिन किसी रचना, किसी रचनाकार की आयु तय करती है यह भी हम सब जानते हैं। इस लिए कि गिरोहबंदी में तात्कालिक रुप से झंडा तो ऊंचा दिखता है लेकिन सर्वकालिक बन पाता नहीं।
हमारे यह क्रांतिकारी लेखक बात तो ऐसे करते हैं कि समूची व्यवस्था में बस अभी आग लगा देंगे। लेकिन हालत यह है कि उन को आग लगाने के लिए भी ब्रेख्त, नेरुदा, नाज़िम हिकमत आदि की मदद लेनी पड़ती है। यह कभी सोचा क्या हमारे साथियों ने कि क्यों नहीं अभी तक हिंदी में भी एक ब्रेख्त का विकल्प वह रचना के स्तर खड़ा कर पाए। बताइए कि इतने सालों में हिंदी के पास कोई ब्रेख्त, कोई नेरुदा, कोई नाज़िम हिकमत क्यों नहीं हो पाया? इस लिए कि ब्रेख्त या नेरुदा, नाज़िम हिकमत कोरी लफ़्फ़ाज़ी से नहीं बनते। हमारे हिंदी के साथी इस तथ्य से जाने कब तक आंख चुराएंगे? जाने कब जागेंगे? क्या जब हिंदी समूची विदा हो जाएगी तब? तुलसीदास लिख गए हैं कि का वर्षा जब कृषि सुखाने ! लेकिन दिक्कत यह है कि आप तो तुलसीदास को भी लतियाते हैं, गरियाते हैं। विषय कोई भी हो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खंडहर से टकराना हमारे साथियों का प्रिय शगल है।  बात अमरीकी दादागिरी से टकराने की होगी, लेकिन आप को ब्राह्मणवाद के जिन्न से फ़ुर्सत नहीं। क्या तो अमरीका भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था का एक्सटेंशन है। अमरीका और चीन कैसे तो समूची दुनिया के बाज़ार पर काबिज़ हो गए हैं, उद्योग से लगायत भाषा तक पर वह काबिज़ हो चुके हैं पर उन से सीधे टकराने में आप को खतरा है। क्यों कि वह ताकतवर हैं। बताइए कि जिस देश में बड़े-बड़े उद्योगपति खुदरा बाज़ार में भी अपने पांव डाल दें, दाल, सब्ज़ी बेचने लग जाएं, उस देश की किसी भी भाषा का क्या होगा? सोचते हैं हमारे यह क्रांतिकारी साथी? सोचते हैं कभी यह कि मोबाइल, कंप्यूटर से लगायत कार तक कुछ भी अपने देश में क्यों नहीं बनता? जिस देश में उद्योगपति और बिल्डर सरकार खरीद लेते हों, सरकार को गुलाम बना लेते हों, घरेलू नौकर बना लेते हों और आप की सारी क्रांतिकारिता इन के खिलाफ़ खामोश हो। फिर भी आप लड़ेंगे भूमंडलीकरण से। बहुत अच्छा !
एक लतीफ़ा याद आता है। आप को भी सुनाए देता हूं।
एक मुहल्ले में एक नया परिवार बसा। सब के घर में मिया बीवी में कुछ न कुछ खटपट होती रहती थी। पर उस नए आए सज्जन के घर में बहुत दिन के बाद भी ऐसा कुछ नहीं दिखा तो एक दिन कुछ लोग उस नए आए सज्जन के घर गए। और बात ही बात में पूछ लिया घर के मुखिया से कि आखिर इस का राज़ क्या है? कैसे मैनेज करते हैं आप? जनाब बोले वेरी सिंपिल ! हम लोगों ने आपस में काम बांट लिए हैं। बड़े-बड़े काम मैं देख लेता हूं। छोटे-छोटे काम पत्नी देख लेती हैं। सो कोई झंझट नहीं होती। सिंपल ! कहते हुए जनाब खुद खुश हो लिए। अब लोगों ने पूछा कि ज़रा छोटे काम क्या हैं, और बड़े काम क्या हैं लगे हाथ यह भी बता दीजिए। जनाब बोले कि देखिए घर में क्या खाना पकेगा, क्या कपड़ा आएगा, कहां घूमने जाएंगे, क्या खरीदा जाएगा, कौन आएगा, कौन जाएगा क्या होगा, क्या नहीं होगा आदि-आदि  छोटे-छोटे काम मेरी पत्नी देख लेती हैं। और बाकी बड़े-बड़े काम मैं देख लेता हूं। पूछा गया कि यह बड़े-बड़े काम क्या हैं? जनाब बोले यही कि अमरीका क्या कर रहा है, रुस और चीन में क्या हो रहा है? वियतनाम, जापान आदि में क्या हो रहा है, क्या होना चाहिए आदि-आदि मामले मैं देख लेता हूं। बताते हुए जनाब फिर खुश हुए और बोले कि इस तरह हमारे यहां सब कुछ स्मूथली हो जाता है, कोई खटपट नहीं होती। लोग समझ गए और अपने-अपने घर लौट गए। तो बस अपने हिंदी के क्रांतिकारी लेखक भी यही काम कर रहे हैं। और बड़े-बड़े मसलों को लफ़्फ़ाज़ी के मार्फ़त तय कर रहे हैं रचना में भी और बोलने में भी। रचना जैसे निकृष्ट काम से इन्हें कोई सरोकार ही नहीं । फिर दूसरे छोटे-छोटे मसले भी इन लेखकों ने भ्रष्ट राजनीतिक पार्टियों, कारपोरेट सेक्टरों, बिल्डरों के ज़िम्मे छोड़ दिया है। भूमंडलीकरण, बाज़ार विरोध, अमरीका की दादागिरी, मोदी की सांप्रदायिकता आदि बड़े-बड़े काम खुद संभाल लिए हैं।
कथाक्रम में बड़े कहे जाने वाले एक लेखक पहले दिन जब बोल रहे थे और जाहिर है विषय से भटक कर बोल रहे थे और बहुत खराब बोल रहे थे तो श्रोताओं में बैठे कुछ लेखक बिदकने लगे। तो एक लेखक ने बड़ी शालीनता से भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता की याद दिलाई और कहा कि जैसे तू बोलता है, वैसा ही लिख! तो यह जैसा लिखते हैं, वैसा ही बोल भी रहे हैं ! इस में हैरत किस बात की?  लोग हंसने लगे। इन साथियों के साथ एक दिक्कत यह भी कि वह अपनी पसंद को ही फ़ैसला मान लेते हैं। उन को अगर गुलाब पसंद है तो वह चाहते हैं कि बागीचे में सारे फूल गुलाब के ही हों। गलती से भी कोई दूसरा फूल देखना उन्हें व्यवस्था में आग लगाने की लफ़्फ़ाज़ी पर मज़बूर कर देता है। अजब सनक है। इस का क्या करें? खैर,साहित्य की मशाल की बात जब प्रेमचंद ने की थी तब माहौल वही था, लेखक तब यही कर रहे थे। इस लिए प्रेमचंद ने यह कहा।
गांधी के हिंद स्वराज की याद है?
हिंद स्वराज में गांधी ने देश और समाज के तीन दुश्मन बताए हैं। एक रेल, दूसरे डाक्टर और तीसरे वकील । इस के पीछे उन का सुविचारित तर्क था। यह कि रेल लूट का, जमाखोरी का सब से बड़ा औज़ार है। कि कहीं कुछ उत्पादित होता है उसे एक साथ बहुत सारा आप रेल से कहीं दूसरी जगह ले जा सकते हैं। और वहां उस चीज़ का अकाल पड़ सकता है। आप देखिए न कि उड़ीसा से हावड़ा तक एक रेल लाइन है जो बस्तर से गुज़रती है लेकिन वहां बस्तर या आस-पास के लिए एक भी पैसेंजर ट्रेन नहीं है। मालगाड़ियां चलती हैं। तो किस लिए चलती है यह मालगाड़ियां? स्पष्ट है कि अंबानी, टाटा आदि कारपोरेट द्वारा देश के संसाधनों की लूट के कारोबार की सहूलियत के लिए चलती हैं यह मालगाड़ियां। पर देखिए न कि हमारे एक क्रांतिकारी साथी को गांधी और उन का हिंद स्वराज भी बकवास लगा। इस लिए कि उन्हें भगत सिंह को गांधी से बड़ा साबित करना था। वह भूल गए कि भाषण में गांधी को बिना खारिज किए भी वह भगत सिंह को बड़ा कह सकते थे। सच यही है कि गांधी और भगत सिंह दोनों ही बड़े लोग हैं। पर कहा न कि अगर उन्हें गुलाब पसंद है तो बाकी फूलों का कत्ल ज़रुरी है उन के बागीचे में। खैर, गांधी समाज और देश का दूसरा दुश्मन डाक्टर को बताते हैं हिंद स्वराज में। वह कहते हैं कि अगर डाक्टर न हों तो लोग अनाप-शनाप ढंग से रहना-खाना बंद कर देंगे। क्यों कि वह जब जानेंगे कि गड़बड़ी करेंगे खाने-पीने या जीवन में तो कष्ट होगा। और डरेंगे सो गड़बड़ नहीं करेंगे। लेकिन आज वह जानते हैं कि कुछ गड़्बड़ करेंगे खाने-पीने या रहन -सहन में तो डाक्टर है ना ! दवा दे देगा, ठीक हो जाएंगे। और अब देखिए न कि अस्पताल लूट के कितने बड़े अड्डे बन चले हैं। गांधी के हिंद स्वराज में देश और समाज का तीसरा दुश्मन वकील है। ध्यान रहे कि गांधी खुद भी वकील थे। लेकिन गांधी की राय में अगर वकील न होता तो देश में लोग कचहरी नहीं जाते और अंगरेजों का कानून लागू नहीं हो पाता। वकील ही लोगों को कचहरी ले गए और लोगों ने इस बहाने अंगरेजों का कानून स्वीकार लिया। आज भी देखिए न कि वकील अगर न बचाएं देश के अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को तो उन की जगह जेल ही होगी। बच्चा-बच्चा जानता है कि फला हत्यारा है, डकैत है, भ्रष्ट  पर अदालतें उन्हें बख्शे रहती हैं तो इन्हीं वकीलों की कुतर्क और भ्रष्ट तरकीबों के बूते। सोचिए कि एक से एक वकील हैं कि एक-एक पेशी के वह तीस-तीस लाख रुपए लेते हैं। तो यह कौन लोग हैं जो इन वकीलों को बिना उफ़्फ़ किए एक-एक पेशी के तीस -तीस लाख देते हैं? और हमारे क्रांतिकारी साथी कहते हैं कि गांधी और उन का हिंद स्वराज बकवास है। खैर यह उन की राय है। उन्हें यह कहने का हक भी है। पर हम बात कर रहे थे प्रेमचंद के साहित्य के मशाल की। तो दोस्तों जो अभी हमने ज़िक्र किया गांधी के हिंद स्वराज में वर्णित तीन दुश्मनों का तो क्या आप जानते हैं कि यह रेल, डाक्टर और वकील को देश और समाज का दुश्मन बताने की अवधारणा किस की है? क्या गांधी की है? हरगिज़ नहीं। यह पूरी की पूरी अवधारणा टालस्टाय की है। सोचिए कि गांधी जैसा बड़ा नेता भी टालस्टाय जैसे लेखक के विचारों पर चलता था। गांधी तो टाल्स्टाय से इतना प्रभावित थे कि जब दक्षिण अफ़्रीका में जो पहला आश्रम बनाया तो उस का नाम भी टाल्स्टाय के नाम पर ही रखा। गांधी रवींद्र नाथ टैगोर से भी बहुत प्रभावित थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधी को महात्मा उपाधि से विभूषित करने वाले टैगोर ही हैं। वह टैगोर ही थे जिन्हों ने नेता जी सुभाष चंद्र बोस को समझाया था कि वह गांधी का विरोध छोड़ दें। और दिलचस्प यह कि सुभाष चंद्र बोस टैगोर की सलाह सहर्ष मान गए थे। तो प्रेमचंद के सामने यह सब घट रहा था तो वह लिख रहे थे कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।
और आज का लेखक और आज का साहित्य?
राजनीति, कारपोरेट, अफ़सरों और बिल्डरों कि पिछाड़ी धोने में न्यस्त और व्यस्त है। बस कोई पद और पुरस्कार मिल जाए। पिछाड़ी खोलने में भी देरी नहीं लगती। बताइए कि एक टाल्स्टाय थे, टैगोर थे, प्रेमचंद थे और एक आज हम लोग हैं। अपने-अपने अहंकार में व्यस्त-न्यस्त और पस्त ! और लड़ने चले हैं भूमंडलीकरण से।
एक कालीचरण स्नेही हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी के आचार्य हैं। कथाक्रम में कहने लगे कि अगर मेरा वश चलता तो भूमंडलीकृत की जगह कमंडलीकृत लिखता और फिर अपने मनपसंद शगल ब्राह्मणवाद के खंडहर से छद्म तलवारबाज़ी पर आ गए। कालीचरण स्नेही जैसे आचार्यों की दिक्कत यह है कि विषय कोई भी हो उन के पास बस एक ही आर्केस्ट्रा होता है, वही बजाने लगते हैं। दलित विमर्श की दुकानदारी का यह बड़ा चटक रंग है। बताइए कि अगर उन के कुतर्क को स्वीकार ही कर लें एक बार तो उस हिसाब से यह सारे विश्ववि्द्यालय तो ब्राह्मणवाद के ही केंद्र हैं। तो आप ब्राह्मणवाद की गोद में क्यों बैठे हैं भाई? उतर क्यों नहीं जाते? कालीचरण ने बीते दिनों हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों का भी हवाला दिया और तंज़ कसा। ठीक बात है। पर जब दलितों की महारानी मायावती ने इसी हिंदी संस्थान की चूलें हिला दी थीं, अट्ठासी से अधिक पुरस्कार रद्द कर दिए थे तब आप के मुंह में क्यों दही जमी रह गई थी? तब एक सांस भी नहीं निकाली किसी क्रांतिकारी लेखक ने भी? किसी दलित विमर्शकार ने तब। स्थिति तो यह थी कि मायावती की डील एक बिल्डर से हो रही थी। हिंदी संस्थान के भवन को गिरा कर वहां एक बहुमंज़िला कांप्लेक्स बनाने के लिए। करोड़ो रुपए की डील थी। सो मायावती तो हिंदी संस्थान बंद करने पर आमादा थीं। अपने कार्यकाल में कई साल तक न वहां निदेशक नियुक्त किया न कार्यकारी अध्यक्ष। वहां के कर्मचारी पसीना-पसीना हो रहे थे। पर यह दलित विमर्शकार और क्रांतिकारी लेखक सब चुप थे। अखबारों तक की यह हैसियत नहीं रह गई थी कि इस बारे में खबर छाप सकें। दलितों की महारानी मायावती का यह आतंक था। मैं ने हार कर तब आर टी आई ऐक्टिविस्ट नूतन ठाकुर से चर्चा की । मेरे निवेदन पर उन्हों ने एक जनहित याचिका दायर की हाईकोर्ट में। हाईकोर्ट के आदेश का भी मायावती ने संज्ञान नहीं लिया। डेढं-दो साल तक। अंतत: जब नौबत कंटेंप्ट आफ़ कोर्ट की आ गई तब जाते-जाते मायावती ने कार्यकारी अध्यक्ष और निदेशक नियुक्त किया। हिंदी संस्थान के प्राण बचे। अखिलेश सरकार आई तो पुरस्कार सब बहाल हुए। कुछ नए पुरस्कार भी शुरु हुए। पुरस्कार राशि बढ़ी। तो अब कालीचरण स्नेही भी बोलने लगे। लेकिन तब तो बोलती बंद हो गई थी। लेकिन हिंदी लेखकों की एहसानफ़रामोशी देखिए कि सब कुछ हो गया लेकिन एक भी लेखक ने नूतन ठाकुर को एक औपचारिक धन्यवाद भी देना ज़रुरी नहीं समझा आज तक ! और देखिए कि अपनी छोटी-छोटी लड़ाइयों से भी कतरा कर शुतुर्मुर्गी अदा के मालिक यह लेखक भूमंडलीकरण से लड़ते रहे दो दिन तक। कोरी लफ़्फ़ाज़ी हांक-हांक कर। अब उन की इस अदा पर कोई कैसे न कुर्बान हो भला?
एक पुराना चुनावी वाकया याद आ गया है।
१९८५ में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हो रहे थे। तब मैं जनसत्ता, दिल्ली छोड़ कर नया-नया स्वतंत्र भारत, लखनऊ आया था। तत्कालीन सिंचाई मंत्री वीरबहादुर सिंह तब गोरखपुर में पनियरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सर्वेसर्वा जयपुरिया ने मुझे बुलाया और बड़ी शालीनता से कहा कि आप जनसता, दिल्ली से आए हैं, उस तरह की रिपोर्टिंग में वीरबहादुर के खिलाफ़ कुछ मत लिख दीजिएगा। वीरबहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री हैं। तो ज़रा ध्यान रखिएगा। हमारे पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से। खैर मैं गया पनियरा। पनियरा में वीरबहादुर ने विकास के इतने सारे काम कर दिए थे कि पूछिए मत। जहां पुलिया बननी चाहिए थी, वहां भी पुल बना दिया था। दिल्ली, लखनऊ के लिए सीधी बसें थीं। गांव-गांव बिजली के खभे। नहरें, ट्यूबवेल। उस धुर तराई और पिछड़े इलाके में विकास की रोशनी दूर से ही दिख जाती थी। और चुनाव में भी उन के अलावा किसी और का प्रचार कहीं नहीं दिखा। जब कि उम्मीदवार कई थे वहां से। वीरबहादुर सिंह के मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारती क्रांति दल से दयाशंकर दुबे। दुबे जी से मेरी व्यक्तिगत मित्रता भी थी। उन को प्रचार में भी शून्य देख कर मुझे तकलीफ़ हुई। गोरखपुर उन के घर गया। लगातार दो दिन। वह नहीं मिले। जब कि वीरबहादुर सिंह रोज मिल जाते थे। खैर एक दिन एकदम सुबह पहुंचा दयाशंकर दुबे के घर। बताया गया कि हैं। उन के बैठके में मैं बठ गया। थोड़ी देर में वह आए। उन के चेहरे का भाव देख कर मैं समझ गया कि मेरा आना उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगा है। तो भी मेरे पुराने मित्र थे। सो अपनी अकुलाहट नहीं छुपा पाया। और पूछ ही बैठा कि अगर इसी तरह चुनाव लड़ना था तो क्या ज़रुरत थी यह चुनाव लड़ने की भी ? बताता चलूं कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दयाशंकर दुबे वीरबहादुर सिंह से बहुत सीनियर थे। और कल्पनाथ राय से भी पहले वह छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके थे। तब छात्र राजनीति का बहुत महत्व था और कि प्रतिष्ठा भी। लेकिन कुछ अहंकार और कुछ गलत फ़ैसलों के चलते दयाशंकर दुबे की यह गति बन गई थी। खैर जब मैं  एकाधिक बार उन के इस तरह चुनाव लड़ने की बात पर अपना अफ़सोस ज़ाहिर कर चुका तो वह थोड़ा असहज होते हुए भी कुछ सहज बनने की कोशिश करते हुए बोले कि हुआ क्या कुछ बताओगे भी ! कि बस ऐसे ही डांटते रहोगे ? मैं ने उन्हें बताया कि दो दिन से पनियरा घूम रहा हूं और आप का कहीं नामोनिशान नहीं है। न प्रचार गाडियां हैं, न पोस्टर, न बैनर। एकदम शून्य की स्थिति है। तो वह धीरे से हंसे और बोले कि देखो मैं पनियरा में वीरबहदुरा से क्या चुनाव लड़ूंगा ? पनियरा चुनाव में वीरबहुदुरा से मेरा बाजना वैसे ही बाजना है जैसे बाघ से कोई बिलार बाज जाए ! तो क्या लड़ना ? फिर चुनाव लड़ने की ज़रुरत क्या थी? सुन कर दयाशंकर दुबे बोले, मैं तो दिल्ली गया था गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट मांगने। बड़ा उछल कूद के बाद भी जब गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट नहीं मिला तो घूमते-घामते चौधरी चरण सिंह से जा कर मिला और गोरखपुर शहर से उन की पार्टी का टिकट मांगा तो वह बोले कि गोरखपुर शहर से तो नहीं लेकिन जो पनियरा से लड़ों तो मैं तुम्हें अपना टिकट दे सकता हूं। तुम्हें चुनाव लड़ने का खर्चा, झंडा, पोस्टर, गाड़ी भी दूंगा और खुद आ कर एक बढ़िया लेक्चर भी दूंगा। तो मैं मान गया। और लड़ गया। यह सोच कर कि चलो इस में से कुछ आगे का खर्चा भी बचा लूंगा। मैं ने कहा कि आप की एक भी गाड़ी दिखी नहीं क्षेत्र में। तो वह बोले कि कैसे दिखेगी? दो गाड़ी मिली है। एक पर खुद चढ़ रहा हूं दूसरी को टैक्सी में चलवा दिया है। कह कर वह फ़िक्क से हंसे। मैं ने पूछा, और पोस्टर, बैनर? वह थोड़ा गंभीर हुए पर मुस्कुराए और उठ कर खड़े हो गए। धीरे से बोले, मेरे साथ आओ ! फिर वह भीतर के एक कमरे में ले गए। अजब नज़ारा था। एक कबाड़ी उन के पोस्टर तौल रहा था। उन्हों ने हाथ के इशारे से दिखाया और फिर मुझ से धीरे से बोले, यह रहा पोस्टर ! मैं अवाक रह गया। फिर वह मुझे ले कर बाहर के कमरे में आ
गए। मै ने पूछा कि यह क्या है? चुनाव के पहले ही पोस्टर तौलवा दे रहे हैं? वह बोले अभी अच्छा भाव मिल जा रहा है। चुनाव बाद तो सभी बेचेंगे और भाव गिर जाएगा। मैं ने कहा चिपकवाया क्यों नहीं? वह बोले व्यर्थ में पोस्टर भी जाता, चिपकाने के लिए मज़दूरी देनी पड़ती, लेई बनवानी पड़ती। बड़ा झमेला है। और फिर वीरबहदुरा भी अपना मित्र है, वह भी अपने ढंग से मदद कर रहा है। कह कर वह मुसकुराए। मैं समझ गया। और उन से विदा ले कर चला आया। बाद के दिनों में जैसा कि जयपुरिया ने कहा था वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री भी बने। और यही दयाशंकर दुबे उन के साथ-साथ घूमते देखे जाते थे। अब सोचिए कि जैसे वीरबहादुर सिंह के साथ दयाशंकर दुबे घूमने लगे थे हमारे हिंदी लेखक भी भूमंडलीकरण के साथ नहीं डोल रहे हैं? हां लेकिन जैसे दयाशंकर दुबे जो एक सच देख रहे थे और कह भी रहे थे बेलाग हो कर कि वीरबहदुरा से बाजना वैसे ही है जैसे किसी बाघ से बिलार बाज जाए ! यही काम अपने हिंदी लेखक भी नहीं कर रहे हैं? सच यह है कि मुहावरों से लड़ना भी बड़ा कठिन होता है। हम आज की तारीख में भूमंडलीकरण से लड़ाई में इसी कठिन काम में अपनी ऊर्जा भस्म कर रहे हैं। भूमंडलीकरण अब दुनिया का एक सच है। लफ़्फ़ाज़ी के बूते उस से लड़ना हो नहीं सकता। ज़मीनी तैयारी है नहीं आप के पास। भूमंडलीकरण से लड़ना वैसे ही है आज की तारीख में जैसे पाकिस्तान अमरीका से लड़ रहा है। जैसे मुस्लिम देश अमरीका से लड़ रहे हैं। अमरीका की रोटी, अमरीकी संसाधन, अमरीका का हथियार और ड्रोन हमलों पर बिल्ली की सी गुर्राहट ! गांधी वैसे ही नहीं कहते थे कि साध्य तो पवित्र होने ही चाहिए, साधन भी उतने ही पवित्र होने चाहिए। अमरीकी औज़ारों से, भूमंडलीकरण के औज़ारों से ही आप उस से लड़ेंगे? तो लड़ चुके फिर आप।
काशीनाथ सिंह ने कुछ दिन पहले कहा था कि राजनीति में जो हो रहा है, दुर्भाग्य से वैसा ही कुछ साहित्य में भी हो रहा है और आज आलोचना में रचना की बजाय रचनाकार को ध्यान में रखा जाता है। काशीनाथ सिंह ज़मीन से जुड़े रचनाकार हैं। इस लिए साफ देख पाते हैं, साफ लिख पाते हैं और साफ बोल भी पाते हैं। याद कीजिए कि जैसा तू बोलता है वैसा ही लिख ! काशी की इस बात में थोड़ा मैं और जोड़ना चाहता हूं कि साहित्य में आज राजनीति की ही तरह जाति भी एक फ़ैक्टर हो चला है। इतना ही नहीं जैसे कांग्रेस, सपा, बसपा आदि पार्टियां अपना निकम्मापन, भ्रष्टाचार आदि छिपाने के लिए एक फर्जी धर्मनिरपेक्षता का तंबू तान कर खड़ी हो जाती हैं ठीक उसी तरह हिंदी पट्टी के लेखक रचना की कमज़ोरी छुपाने के लिए प्रगतिशीलता, विचारधारा आदि का फर्ज़ी खेल शुरु कर देते हैं। दलित विमर्श, ब्राह्मण विमर्श का खाना खींच देते हैं। बात रचना की न हो कर लफ़्फ़ाज़ी विमर्श में बदल देते हैं। ब्रेख्त, नेरुदा, नाज़िम हिकमत का उद्धरण ठोंकने लगते हैं। हिंदी के रचनाकार नहीं याद आते उन्हें।

काशीनाथ सिंह ने कथाक्रम में भी भूमंडलीकरण के हस्तक्षेप को ईमानदारी से स्वीकार किया। अपने घर का ही हवाला दिया। अपने बेटे, अपने पोते का हवाला दिया। और बताया कि जैसे बेटा भोजपुरी बोलने से कतराता है, पोता हिंदी बोलने से कतराता है। उन्हों ने भूमंडलीकरण की अच्छी चीज़ों को स्वीकार करने पर हामी भी भरी। और कहा कि इतना खराब शब्द भी नहीं है भूमंडलीकरण। काशी ने तो यहां तक कहा कि अगर बाज़ार है तो हम हिंदी लेखकों को भी अपना बाज़ार क्यों नहीं बनाना चाहिए? जया जादवानी ने भी भूमंडलीकरण से अब न बच पाने की बात को स्वीकार किया। प्रांजल धर ने अच्छी सूचनाएं भी परोसीं। जै्से कि वह अपने लिखने में धारदार होते हैं, विषय से नहीं भटकते, बोलने में भी नहीं भटके। महेश कटारे भी विषय पर बने रहे। अखिलेश  भी विषय पर बोले और संतुलित बोले। लेकिन ज़्यादातर लेखक विषय से भटके रहे और अपने मनगढ़ंत निष्कर्षों और विमर्श पर समूची शक्ति और दुराग्रह से डटे रहे। कहूंगा कि पूरी बेशर्मी से। एक विद्वान तो जयनंदन के सम्मान पर बोल रहे थे। तमाम दाएं-बाएं बोल गए पर जयनंदन की किसी एक रचना का नाम नहीं ले पाए। अलबत्ता यह फ़तवा ज़रुर जारी कर गए कि जयनंदन मुझ से बड़ी रचना नहीं लिख पाए हैं। वाह ! क्या किसी लेखक के सम्मान का भाषण यही होता है? खैर, यह लखनऊ है आप कुछ भी बोल लीजिए, सुन लेता है।
कथाक्रम में एक समय नामवर सिंह और राजेंद्र यादव में अपनी-अपनी स्थापनाओं को ले कर खूब गरमागरमी होती थी, विमर्श का आनंद आता था। नामवर का व्याख्यान गहरे ले जाता था, राजेंद्र यादव की सूचनाएं और विमर्श एक नई खिड़की खोलती थी, पूरे दो दिन तक गरमाहट बनी रहती थी, एक आग सुलगती रहती थी, जिस की आंच साल भर तक बनी रहती थी और कथाक्रम की प्रतीक्षा भी  एक आकुल भूख के साथ बनी रहती थी। लेकिन एक बार अशोक वाजपेयी आए तो नामवर सिंह और राजेंद्र यादव भी बिखर गए उस बार। अशोक वाजपेयी के व्याख्यान की आंच में। कथाक्रम के आयोजन के वह सुनहरे विमर्श के दिन अब याद बन कर रह गए हैं। कह सकते हैं कि लेखकों की अब विषय पर बिना तैयारी के आना, रचना, सूचना और समझ के स्तर पर निरंतर दरिद्र होते जाना, विषय कोई भी हो एक ही रिकार्ड हर बार, हर जगह बजाना कुछ ज़्यादा होने लगा है। शैलेंद्र सागर जिस मीरा भाव से कथाक्रम का आयोजन करते हैं, लेखक साथियों को उन की इस पवित्र भावना का भी आदर करते हुए आना चाहिए इस कार्यक्रम में। कथाक्रम अपनी कुंठाएं उतारने का मंच तो नहीं ही है, न ही बनाए जाने की ज़रुरत है। जिस तरह दो-तीन लेखिकाओं के बीच मंच से व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप हुए और लगभग झोंटा-झोटव्वल विमर्श की नौबत आई वह कतई अशोभनीय था। मैं ने इसी कथाक्रम में नामवर-राजेंद्र के आरोप-प्रत्यारोप भी देखे हैं। लेकिन उन दोनों ने या उन के अनुयायियों में भी कभी लेशमात्र भी व्यक्तिगत विमर्श सामने नहीं आए। उसी मुहब्बत से मिलते-जुलते दिखते थे, एक दूसरे की आलोचना को बर्दाश्त करते हुए। मैं ने इसी कथाक्रम में रवींद्र कालिया को मंच पर नामवर सिंह की बात का कड़ा प्रतिवाद करते देखा है। इस के बाद मंच से नीचे उतर कर नामवर सिंह से रवींद्र कालिया को बिलकुल आनंद भाव में प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो ! भी कहते और नामवर को पान कूंचते मंद-मंद मुसकुराते भी देखा है। यह भाव बना रहना चाहिए। कथाक्रम या किसी भी विमर्श का सम्मान इसी भाव में निहित है। व्यक्तिगत कुंठा या गरमा गरमी में नहीं। जैसा कि इस बार कुछ लेखिकाओं ने कर दिया। भेद-मतभेद होते हैं, आलोचना होती है, उस को हजम करना सीखना चाहिए। उस के प्रतिरोध के और भी रास्ते हैं। और भी तरीके हैं। यह तो हरगिज़ नहीं। कि आप आंख में आंख डाल कर बात भी नहीं कर पाएं। सलाम-दुआ भी न कर पाएं? इस घटिया राजनीति में भी तमाम गिरावट और मुश्किलों के बावजूद पराजित व्यक्ति भी विजेता को गले मिल कर, हाथ मिला कर बधाई देता ही है। और आप तो साहित्य रच रहे हैं। और किसी भी साहित्य, किसी भी रचना का काम जोड़ना ही है, तोड़ना नहीं है। कथाक्रम भी जोड़ने के लिए ही साल भर में एक बार सब को बटोरता है, तोड़ने के लिए नहीं। लेकिन क्या कीजिएगा फर्जी विमर्शों को सर चढ़ाने की उपज की यह यातना भी हम नहीं तो क्या चेतन भगत भुगतेंगे? बोएंगे बबूल और चाहेंगे आम ? सोचिए कि  मुहावरों से भी लड़ना सचमुच कितना कठिन है। और हम हैं कि लड़ने चले हैं भूमंडलीकरण से ! भाई वाह !










  

3 comments:

  1. दयानंद जी। काश कि लफ्फाजियों और लंतरानियों में खोये रहने वाले लेखक आपके इस आलेख को पढ पाते और उस पर अमल कर पाते। कितने श्रम से ऐसा आयोजन एक साल में एक बार होता है । उसमें भी बिना तेयारी के बोलना और हर बात पर ब्राहमणवाद के सिर पर ठीकरा फोड़ना सचाई से मुँह मोड़ना है। लेखिकाओं में एक दूसरे से बढ़ने की होड़ है। तू बड़ी कि मै बड़ी। वह बहनापा बिला गया है जो आज से कुछ दशक पहले की लेखिकाओं में पाया जाता था। नामवर जी राजेंद्र जी रवींद्र कालिया जी श्रीलाल शुक्‍ल जी की संजीदगी का कहना ही क्‍या। ये ज़रा सी बात पर मुँह फुला लेने वाले लेखक नहीं हैं। राजेंद्र यादव जी तो हर वक्‍त अपने विरुद्ध एक मोर्चा खोले ही रहते थे। नामवर जी ने किसी की मुरव्‍वत न की न रामविलास जी की न राम स्‍वरूप चतुर्वेदी की। तब भी लोग उनके किये का बुरा न मानते थे। विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने राजेंद्र जी व नामवर जी दोनों पर लेख लिख कर उनकी धज्‍जियॉं उड़ाई पर मिलने पर नामवर जी के साथ तम्‍बाकू का आदान प्रदान करते दीखते। आज यह लेखकीय शिष्‍टाचार गायब हो गया है।

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  2. Kathakram jis shiddat se Shailendra Sagar ayojit karte chale aa rahe he vah vehad sarahniya he. Es hetu unhe jitana saraha jaye kam he. Es baar ka ayojan vakai pahle jesa nahi raha kya karan rahe vah Dayanand ji ke is aalekh se spast he . pahale din may bhi vaha per tha . mere bagal may ek patrakar the kisi paper ke note book liye the . Mene unse prsan kiya kathakaram ke bare may vah bole Vampanthiyo ka karyakram he. Mene pun: poocha esa kese ? Vah bole yaha bethe sare Lekhak vampanthi he Ek bhi sahityakar nahi he .Mene kaha may bhi Lekhak hoo aur vampanthi nahi hoo .. to vah bole ek aadh ko chhodkar 99% yaha vampanthi he aap bataye kya Lucknow may etne hi lekhak he? jabki yaha kam se kam 10 sahitiyik sansthaye he jo kai karyakarm karati he hum log vaha jate he vah kyo nahi aate yaha ya bulaye hi nahi jate? bada rosh tha us uva patrakar may. khair kuch baten he jo atyant vichar karne yogya he Lekhak vichardhara se jude achchi baat he per koop mandoop na bane .. kuch bhi munch per aaker bolne se bache kyoki aam pathak usper vishvash karta he aur badi umeed se sahityakar ko padhata va sunta he ... shesh fir yah aalekh padhakar mun khatta to hoga hi per bura na manate hue khel bhavana ki tarah esper vichar karen va agali bar jab Kathakram per milen to sankirdata se door rahe fir chahe vah Snehi ji ho ya Ravindra Vermaji

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  3. dhanyavad bhai dayanand ji. bahut saargarbhit aur jaankariyon se bhara lekh . madhya pradesh ke chunavi dangal ka prekshak banaya gaya hun . atah kathakram-2013 me pratibhag na kar saka is baar. par aapne bhumadlikaran vishay par aayojit shuturmurgi ada se hue mahabharat ki achhi sanjay drishti di. uttar pradesh hindi sansthan par kiye gaye anavashyak dron hamale ki bhi jaankari mili . aapko saadhuvad .

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