Wednesday, 2 April 2014

एक औरत का अकेले हनीमून पर जाना !

पुरुष सत्ता को चुनौती देती और हिंदी सिनेमा में बदलती घर की औरत की दास्तान  !

क्या कोई औरत अकेले हनीमून पर जा सकती है? बिना पुरुष साथी के? जिस को कि पति कहते हैं? हमारे भारतीय समाज में, हिंदी समाज में? हिदी सिनेमा में ? अभी-अभी।  बिलकुल अभी गई है एक औरत अकेली हनीमून पर। और इस औरत का अकेले हनीमून पर जाना न सिर्फ़ दिलचस्प है बल्कि इस बहाने बदलती हुई एक भारतीय स्त्री का एक मानीखेज दर्पण और उस की दुनिया भी हमारे सामने उपस्थित है। उस की यह हनीमून यात्रा एक जोरदार तमाचा है पुरुष सत्ता के चेहरे पर जिस की गूंज बहुत देर तक सुनाई देती है। और कि सुनाई देती रहेगी।

हिंदी सिनेमा में भी घर की औरत अब बदल रही है। जैसे समाज में। जैसे जीवन में। उस की देवी, मां, प्रेमिका, बहन,पुजारिन या पेड़ों के इर्द-गिर्द हीरो के आगे पीछे घूम-घूम गाना गाने, पुरुषों को रिझाने, उन की सेवा करने, पति को परमेश्वर मानने आदि की उस की छवि अब खंडित है। खंडित क्या अब पूरी तरह ध्वस्त है। अब वह इस कैद से जैसे निकल आई है। हालिया कुछ फ़िल्मों में घर की औरतों की इस बदलती तसवीर को और इस तसवीर में उस की बदलती इबारत को साफ पढ़ा जा सकता है। एक है हाईवे और दूसरी है क्वीन। बल्कि दो और फ़िल्मों को भी इस फ़ेहरिस्त में शुमार कर लेते हैं। शुद्ध देसी रोमांस और हंसी तो फंसी में भी इस घर की औरत की बदलती तसवीर की गूंज साफ सुनाई देती है। इन चारो ही फ़िल्मों की कथा और कलेवर अलग है, ट्रीटमेंट और फ़ोकस अलग है पर  ध्वनि सब की एक है। स्त्री के हिस्से का सांघातिक तनाव एक है। गुलाब गैंग और डेढ़ इश्किया और इश्किया जैसी कुछ फ़िल्मों को भी आप इस में जोड़ सकते हैं। इस लिए भी कि इन सभी फ़िल्मों में उन के तनाव और बदलाव के तार एक हैं। पर पुरुषों को चुनौती देती हुई। पितृसत्ता को मटियामेट करती हुई। हाईवे कहीं-कहीं मसाला फ़िल्मों की बुनावट को छूती है पर छू कर ही निकल आती है। लेकिन क्वीन इस मसालेबाजी में नहीं फंसती। बल्कि क्वीन तो न सिर्फ़ हिंदी फ़िल्मों की बल्कि हिंदी समाज की चौहद्दी को भी बदलने की इबारत को पढ़ती और पढ़वाती है। 

बताइए भला कि कोई औरत अकेले भी हनीमून पर जा सकती है? और वह भी बिना शादी के? क्वीन की नायिका तो जाती है। न सिर्फ़ जाती है बल्कि पितृ-सत्ता पर ज़बर्दस्त चोट करती है। पुरुष मानसिकता की इस सोच कि हम ही श्रेष्ठ हैं पर इस कदर जूता मारती है क्वीन कि कोई दूसरा उदाहरण समाज में कहीं हो तो हो, हिंदी सिनेमा में तो बिलकुल नहीं है। विकास बहल निर्देशित और लिखित अनुराग कश्यप की इस फ़िल्म में चमत्कारी जैसा कुछ नहीं है। इसी लिए यह फ़िल्म चौंकाती नहीं, बल्कि एक गहरी सोच और एक बड़े संदेश में हमे लपेट लेती है। बिना किसी बड़बोलेपन या किसी बौद्धिक जुगाली के। दिखने में एक सरल सी फ़िल्म, एक बहुत बड़ी फ़िल्म बन जाती है। शमशेर की उस कविता के अर्थ में कि बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी आप ही। हिंदी में या किसी भारतीय भाषा में मेरी जानकारी में ऐसी पृष्ठभूमि पर मेरी जानकारी में कोई दूसरी कहानी भी नहीं है।

विकास बहल की यह क्वीन कहानी एक मध्यवर्गीय परिवार की है। दिल्ली की एक लड़की जिस का नाम रानी है की शादी तय होती है उस के ही प्रेमी विजय से। शादी की सारी तैयारियां पूरी हैं। दो दिन बाद शादी है। रानी की मेहदी की रस्मे चल रही हैं, नाच-गाना हो रहा है, नात-रिश्तेदार सब इकट्ठे हैं। गहमागहमी है। और इसी सब में विजय का फ़ोन बार-बार रानी को आता है। वह रानी से मिलना चाहता है। रानी अपने छोटे भाई के साथ एक रेस्टोरेंट में जाती है मिलने। विजय मिलता है। बिलकुल तना हुआ। जैसे कि कलफ़ लगा कर आया हो पूरी देह में। विदेश में नौकरी करने और रहने की यह अकड़ है। रानी शादी की तयारियों के छोटे-छोटे डिटेल्स बताती है। अ्पना और उस का नाम लिखा बोर्ड याद करती है। रानी वीड्स विजय। और खुश हो जाती है। बात-बात में दो मिनट में ही विजय अपनी शादी को रद्द करने का ऐलान कर देता है। रानी के साथ ही दर्शक भी अवाक है। रानी मनुहार पर मनुहार करती है, गिड़गिड़ाती है। पर विजय की अकड़ पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। और वह बता देता है कि अब वह उस के लायक नहीं रही। रानी सारी तैयारियों के पूरी हो जाने की दुहाई देती है। अपने पुराने प्यार के दिन याद दिलाती है, अपने प्यार का वास्ता देती है। कहती है आप जैसे कहोगे मैं वैसे ही रहूंगी। पर विजय है कि टस से मस नहीं होता। फिर रानी कह देती है कि आप मेरे पेरेंटस से बात करो इस बारे में। रानी लुटी-पिटीे रेस्टोरेंट से बाहर आ जाती है। बाहर खड़ा छोटा भाई पूछता है कि क्या हुआ? रानी अफना जाती है भाई के इस सवाल से। वापस फिर रेस्टोरेंट में जाती है। विजय से फिर मनुहार करती है। पर विजय अपनी अकड़ में तर-बतर है। रानी लौट आती है भाई के साथ आटो में अपने घर। घर पर भी मुर्दनी छा गई है। विजय का फ़ोन आ चुका है। रानी घर में आती है, सामान्य दिखने की कोशिश करती है। पर लुटे-पिटे घर में सब की आंखों का कैमरा उस एक रानी पर ही एक साथ टिक जाता है। सब की लाचार नज़रें उस पर सहानुभूति के अंदाज़ में टिक गई हैं। वह अचानक दौड़ लगा देती है अपने कमरे की ओर। तनाव भरी दौड़। माता-पिता सब दौड़ पड़ते हैं उस के पीछे। लेकिन वह फटाक से कमरा बंद कर लेती है। पिता आवाज़ देते हैं, मां आवाज़ देती हैं, परिजन, रिश्तेदार सब के सब आवाज़ देते हैं एक सुर में। पर रानी खामोश है। दरवाज़ा नहीं खोलती। दादी आती हैं। बाहर से ही बताती हैं कि पाकिस्तान में उन का भी एक ब्वाय फ्रेंड था। बंटवारे के साथ सब छूट गया। यहां तेरे दादा जी मिल गए। सब ठीक हो गया। ज़िंदगी ऐसे ही चलती है। तेरा भी सब ठीक हो जाएगा। पर रानी चुप है। टेंट वाले अपना सामान समेट रहे हैं। रिश्तेदार विदा हो रहे हैं। अजब मुर्दनी छा गई है समूचे घर में। कि कलेजा मुंह को आता है। लेकिन रानी है कि चुप है। बेसुध और बदहवास।

लेकिन वह रह-रह कर अपने प्रेम केफ़्लैशबैक में भी जाती जा रही है।

कि कैसे तो विजय उस का पीछा करते-करते उस के स्कूल, लाइब्रेरी पहुंचता रहता है। प्रेम के कई दृष्य उस की यादों और आंखों में तिरते रहते हैं। दिन-रात बीत चुके हैं। सब रिश्तेदार लोग जा चुके हैं। रानी नीम बेहोशी में कमरे से बाहर निकलती है। डायनिंग टेबल पर कुछ खाती हुई सी बैठी है। घर के लोग उस की मिजाजपुर्सी में हैं। कि वह अचानक कहती है, ' मैं हनीमून पर जाऊंगी !' घर के लोग अवाक ! पूछते हैं अकेले? वह कहती है कि, ' हां ! अकेले !' फ़्रांस की टिकट वगैरह उस की पहले ही से बुक है। सो वह घर से निकल पड़ती है अकेले हनीमून पर। घर वाले एयरपोर्ट तक छोड़ने आते हैं।

अब रानी फ़्रांस की यात्रा पर है। हनीमून यात्रा पर। अकेले। अनजान देश, अकेला सफ़र जो यातना देता है, दे सकता है, दे रहा है। लेकिन वह अब चुप नहीं है, बोल रही है। बोल रही है पर भाषाई दिक्कत रह-रह सामने खड़ी हो जाती है। दिल्ली की यह रानी अंग्रेजी भी जानती है पर भाषाई बीहड़ में खो जाती है। क्यों कि वह फ़्रेंच नहीं जानती। पुरुष फ़्रांस के भी अलग नहीं हैं। भारत के जैसे ही हैं। कम से कम औरतों के मामले में। पर औरत वहां की भारतीय औरतों जैसी तो नही हैं। यह उस की पड़ोस में ठहरी औरत को देख कर पता चलता है। वह अविवाहित है और मां भी है। अपने किसी भी पुरुष मित्र से संबंध बना सकती है, संभोग कर सकती है मन मर्जी से। और उस के साथ मार पीट भी कर सकती है। गुलाम बन कर नहीं रहती वह। एक क्लब में डांसर है वह। पर अपनी मां को अपना पता नहीं देती। किसी और के पते के मार्फ़त वह मां से खतो-किताबत करती है और उसे पैसे भेजती रहती है। आदि-आदि कई सारे संत्रास हैं उस के भी। लेकिन वह अपने को आज़ाद महसूस करती है। और कि आज़ादी से रहती भी है। धीरे-धीरे वह रानी की दोस्त हो जाती है। रानी अब क्वीन बन चुकी है। वह सब को रानी नाम बताती है तो लोग नहीं समझते तो वह उस का अंगरेजी बताती है क्वीन ! फिर वह क्वीन की पहचान लिए घूमती है। रानी अपने उस पड़ोसन के साथ जीवन के नए-नए शेडस सीखती और जीती है। उस के साथ क्लब भी जाने लगती है।

वहां अचानक हिंदी गाने सुनाई पड़ते हैं तो वह विह्वल हो जाती है। हिंदी-हिंदी उच्चारती हुई वह विभोर हो कर नाचने लगती है। इस क्लब में उस को कुछ पुरुष मित्र भी मिलते हैं। रास्तों में चोर-उचक्के भी। पुलिस भी पकड़ती है। तरह-तरह के शेडस भी मिलते हैं। लेकिन ज़्यादातर लोग उसे अपना लेते हैं और वह भी। पर एक भारतीय परिवार में भी वह जाती है एक दिन। जो उस का परिचित परिवार है। मां के कहने से वह जाती है मिलने। उस परिवार तक भी उस की शादी टूटने की खबर पहुंच चुकी है। और वह लोग उसे देखते ही अनमने हो जाते हैं। पर चलते वक्त उस को विदाई देते वक्त जो परंपरा है कुछ व्यवहार देने की उस में उस परिवार की दकियानूसी भी देखते बनती है। रानी वीडियो चैट से भारत में अपनी मां-पिता और भाई से भी बात करती रहती है। कई बार साथ में उस की पड़ोसन दोस्त भी होती है। उसे देख कर उस के पिता और भाई खुश हो जाते हैं। खास कर उस के उभरे वक्ष और उस के कम कपड़ों के मद्देनज़र। दादी अचानक देखती हैं तो हट जाती हैं यह कहते हुए किे एडल्ट मूवी चल रही है। और जब कभी किसी चैट में पिता और भाई उस औरत को नहीं देखते तो उदास होते हुए विकल हो जाते हैं और पूछते हैं उत्सुकता में कि वह कहां है?

इसी बीच रानी यह शहर छोड़ कर दूसरे शहर जाने लगती है तो वह पड़ोसन दोस्त स्टेशन पर उसे सी आफ़ करने आती है। तो रानी उस से कहती है कि और सब तो ठीक है पर यह जिस-तिस के साथ सेक्स ठीक नहीं है। यह छोड़ दो। खैर अब वह दूसरे शहर आती है तो पता चलता है कि जिस कमरे में उसे ठहरना है उस में तीन पुरुष भी हैं। उन के साथ उसे कमरा शेयर करना है। पहले तो वह बिदकती है पर बजट के मद्देनज़र चुप हो जाती है। तीनो पुरुष तीन देश के। तीनों के मिजाज अलग। और इन के बीच एक अकेली भारतीय मध्यवर्ग की लड़की। शुरुआती हिच और संकट के बाद चारो न सिर्फ़ अच्छे दोस्त बन जाते हैं, दुख-सुख के साथी भी। तमाम भाषाई झमेले और परंपरा आदि के बैरियर के बावजूद। एक दृष्य नहीं भूलता। बाथरुम में अचानक आए एक चूहे से सब के सब न सिर्फ़ एक साथ चीख पड़ते हैं बल्कि एक साथ उस से बचने के लिए शरण भी लेते हैं। चारो साथ-साथ घूमने भी लगते हैं।

अब विजय को पता चलता है कि रानी फ़्रांस में है। वह उसे लगातार फ़ोन पर फ़ोन करता है। वह कभी उठाती है कभी नहीं। वह मिलना चाहता है रानी से। रानी टालती रहती है। और एक दिन अपने रुम मेट्स के साथ घूम कर आती है होटल तो पाती है कि विजय बाहर ही उस की प्रती्क्षा में खड़ा है। वह साथ ले जाना चाहता है। मिलना चाहता है, बतियाना चाहता है। वह अपने फ़ैसले पर पछताता है। माफ़ी मांगता है। रानी सिरे से सब कुछ से इंकार कर देती है। पूरी दृढ़ता से। कहती है इंडिया में ही मिलेंगे। वहीं बात करेंगे। लेकिन बात-बात में विजय उग्र हो जाता है तो उस के रुम मेट विजय पर एक साथ आक्रामक हो जाते हैं। टूट पड़ते हैं। रानी उन्हें रोकती है, समझाती है। तीनो मान जाते हैं। अदभुत दृष्य है। फिर जब विजय पूछता है कि यह सब कौन हैं? तो वह बताती है कि यह सब हमारे साथ रहते हैं। रुम मेट्स हैं। वह बिदकता है और उन सब को हिकारत से देखते हुए पूछता है कि इन सब के साथ रहती हो? वह कहती है हां। विजय असहाय हो कर लौट जाता है।

रानी लौटती है इंडिया। एयरपोर्ट पर मां-पिता. भाई उसे लेने आए हैं। सभी बहुत उत्साहित हैं। खैर रानी को एयरपोर्ट से ले कर चलते हैं माता-पिता। रास्ते में विजय का घर पड़ता है। वह कार चला रहे पिता से कहती है कि वह विजय के घर जाएगी। थोड़ी ना नुकर के बाद वह मान जाते हैं। और उसे विजय के घर छोड़ कर चले जाते हैं। रानी अब विजय के घर में है। अकेली पहुंची है। विजय की मां दरवाज़ा खोलती है। उसे देख कर नकली चहक उस के चेहरे पर आ जाती है। वह रानी से चिकनी-चुपड़ी बातें करने लगती है। कहती आ जाओ, हम लोग मां-बेटी की तरह रहेंगे। रानी कहती है विजय से मिलना है। वह विजय को बुलाती है। विजय आता है तो रानी से गले मिलता है। रानी ऐतराज नहीं करती। पर गले मिलने के बाद सगाई की अंगूठी चुपचाप उस की हथेली पर रख देती है। मां-बेटे अवाक देखते ही रह जाते हैं। नि:शब्द ! उन के चेहरे पर इतने जूते हैं कि गिने नहीं जा सकते। और रानी चुपचाप उन के घर से सड़क पर निकल आती है। और कदम बढ़ाते हुए ऐसे चलती है खुश-खुश कि उस के चेहरे पर रानी होने, क्वीन होने का एहसास, इस की इबारत साफ-साफ पढ़ने में आ जाती है। बिना किसी संवाद के। क्वीन फ़िल्म की सारी कामयाबी इसी एक अंदाज़ में है। बस एक कमी रह गई जो कई बार दर्शक को भी भाषाई बैरियर पर ला खड़ी कर देती है। अगर फ़्रेंच और अंगरेजी में बोले गए संवाद को वायस ओवर कर क्र हिंदी में कर दिया गया होता तो ज़्यादा बेहतर होता। क्यों कि कई चीज़ें सर से ऊपर निकल जाती हैं, भाषाई बैरियर के नाते। और कि अगर इस का गीत-संगीत भी मीठा और कर्णप्रिय होता तो क्या बात होती !

एक समय वंस अपान ए टाइम इन मुंबई में कंगना रानावत को देख कर लगा था कि हिंदी सिनेमा में वह एक नई संभावना हैं। क्वीन में रानी की भूमिका में उन्हें देख कर लगा कि अब वह अभिनय के और भी कई प्रतिमान गढ़ेंगी। रानी को जिस तरह अपने अभिनय में कंगना रानावत ने जिया है, जिस सादगी और सरलता से रानी की तड़प, उस के अपमान, उस के जीवन, उस के तनाव, संत्रास और बदलती स्त्री के मानस को बिना चीखे-चिल्लाए परदे पर परोसा है वह अविरल ही नहीं, दुर्लभ भी है। कहूं कि अप्रतिम है। जाहिर है अनुराग कश्यप की इस फ़िल्म में विकास बहल की कहानी, उन का निर्देशन और उन की पूरी टीम का काम भी इसी लय में है और कि सैल्यूटिंग भी। काश कि इस फ़िल्म के संवाद, गीत और संगीत पर भी यही ध्यान गया होता तो क्या बात होती। और तकलीफ़देह यह कि स्त्री विमर्श वाली इन सभी फ़िल्मों का गीत और संगीत पक्ष बहुत ही रद्दी और बेसुरा है।

खैर साजिद नाडियावाला की इम्तयाज अली लिखित और निर्देशित हाईवे भी स्त्री मुक्ति की ही कहानी है। पर इस का ट्रीटमेंट और कथ्य बिलकुल अलग है। महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट ने इस फ़िल्म में वीरा त्रिपाठी नाम की लड़की के चरित्र को जिस मासूमियत और तल्खी से  परदे पर परोसा है और जिस तरह अभिनय की चादर को पूरी मासूमियत के साथ बुना है, वह भी देखने लायक है। हालां कि यह फ़िल्म उतनी कसी हुई नहीं है, जितनी कि इसे होनी चाहिए थी और कि इस में बहुत सारे उबाऊ प्रसंग भी हैं, बावजूद इस के यह फ़िल्म उल्लेखनीेय है। और कि इस के कई सारे दृष्य भाऊकता में सराबोर हैं। बताइए कि खुली हवा में सांस लेने निकली एक लड़की अपने एक दोस्त के साथ हाइवे पर है। घर में  किसी शादी की तैयारियां हैं और वह घर से ऊब कर हवाखोरी के लिए बाहर निकली है। रास्ते में वह अपने दोस्त से कहती है कि कहीं पहाड़ पर चलना। तुम भेड़ बकरियां चराना, मैं तुम्हारे लिए खाना पकाऊंगी ! वह ऐसे बोलती है जैसे कि यह कितना अमूल्य सपना हो उस का। वह अचानक एक पेट्रोल पंप पर कार से बाहर निकल कर खड़ी है और कह रही है कि ऐसी खुली हवा ही तो चाहती हूं। उस का दोस्त कहता भी है कि अंदर आओ ! बाहर मत इस तरह खड़ी रहो ! पर वह है कि अपनी ही धुन में है। कि अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच उस का अपहरण हो जाता है। उस का कायर दोस्त खामोश यह सब देखता रहता है। हलका प्रतिवाद तो छोड़िए वह कार से बाहर भी नहीं निकलता। अब उस का अपहरण करने वाला अपने गैंग के बास के पास ले कर उसे जाता है। तमाम रास्ते और कारें बदलता हुआ। लेकिन गैंग का बास लड़की की शिनाख्त होते ही भड़क जाता है। कहता है त्रिपाठी की लड़की लाए हो ! जानते हो उस को? हम सब को बरबाद कर देगा। बहुत बड़ा आदमी है। कितना बड़ा नेता है। लेकिन महावीर भाटी हार नहीं मानता और कि गैंग के बास की ऐसी-तैसी करते हुए वीरा त्रिपाठी को अपने साथियों के साथ ले कर निकल जाता है। हर कोई महावीर भाटी को आगाह करता है लेकिन वह मानता नहीं। अड्डे पर अड्डा बदलता भागता फिरता है। तरह-तरह की जगहें, तरह-तरह के लोग ! जीवन जैसे हाईवे पर ही गुज़रने लगता है। उस का एक साथी वीरा त्रिपाठी की मदद के बहाने उस लाइन मारते हुए उसे जब-तब छूता रहता है। एक दिन उस से बलात्कार की कोशिश पर आमादा हो जाता है तो महावीर भाटी न सिर्फ़ वीरा को बचाता है बल्कि साथी को पीटता भी है और आगाह करता है कि आइंदा यह नहीं हो। वीरा लगातार भागने की फ़िराक में होती है पर भाग नहीं पाती। एक दिन असफल कोशिश में पकड़ जाती है। आजिज आ कर महावीर भाटी उसे मुक्त कर देता है कि जा भाग जा। पर वह भागते=भागते भी भाग नहीं पाती। लौट आती है। अपहरणकर्ता के पास। फिर ऐसा भी समय आता है कि वह् भागना नहीं चाहती। अतिशय सुविधाओं में जीने वाली यह लड़की अब असुविधा में जीने की कायल हो जाती है। क्यों कि उसे खुली हवा मिल गई है। घर के घुटन से मुक्ति मिल गई है। अपने अपहरणकर्ता के साथ ही वह घूमते रहना चाहती है। घर से ऊबी हुई यह लड़की टुकड़ों-टुकड़ों में अपनी यातना-कथा बांचने लगती है महेंद्र भाटी से। वह बताती है कि कैसे बचपन ही से घर में ही उस का यौन शोषण निरंतर होता आ रहा है। मां से बताया तो वह भी चुप रहने की सलाह देने लगीं। क्यों कि वीरा का बचपन से ही यौन शोषण करने वाला आदमी शुक्ला उस के घर आता-जाता रहता है और कि काफी रसूखदार आदमी है। कई सारे मोड़ और व्यौरे में जाती यह फ़िल्म और भी कई सारे  व्यौरे बांचती है। पर मूल यातना घरेलू यौन शोषण ही है। जिस से घबरा कर वह घर नहीं लौटना चाहती। भाटी के साथ ही घूमते रहना चाहती है। ट्रक की सवारी है और हाइवे है। एक जगह पुलिस चेकिंग में वह खुद छुप जाती है ट्रक में। यह दृष्य बहुत सुंदर बन पड़ा है। एक और दृष्य है जिस में वह एक सुनसान जगह नेचुरल काल के फेर में किसी ओट में चली जाती है। भाटी परेशान है। और जहां वह है उधर उस के जाते ही वह डांट देती है, पीछे मुड़ जाओ ! भाटी के बचपन की याद और उस की मां का हिस्सा भी बेहद सुंदर है। पर फ़िल्म को जिस तरह संभालना चाहिए था निर्देशक इम्तयाज अली को, वह संभाल नहीं पाए है। खास कर फ़िल्म के अंतिम हिस्से में जब पुलिस भाटी को मार कर वीरा को छुड़ा लेती है और वह घर आ कर समूचे परिवार की उपस्थिति में शुक्ला के बलात्कारी चेहरे से नकाब उतार देती है सार्वजनिक रुप से। यह पूरा दृष्य इतना हलका हो गया है कि फ़िल्म भहरा जाती है। हालां कि फ़िल्म जिस नोट पर खत्म होती है वह ज़रुर फ़िल्म को संभालती है। वीरा सब कुछ के बाद फिर से घर से निकल कर हाईवे पर आती है उसी जगह जिधर से उसे भाटी ले कर गया था। वह उस हाईवे पर उतर कर महावीर, महावीर गुहारते हुए उस की याद में रो पड़ती है। नहीं वीरा यहां महावीर भाटी के प्रेम में नहीं है, उस के साथ के सुरक्षाबोध में है।  वह सुरक्षा जो वह घर में नहीं पा सकी कभी। यही कहानी का मुख्य प्रस्थान बिंदु भी है।

वीरा त्रिपाठी की भूमिका में आलिया भट्ट तो आपने अभिनय की आंच देती ही हैं, महावीर भाटी की भूमिका में रणदीप हुड्डा भी आलिया के मुकाबले अभिनय में बीस हैं। बिना लाऊड हुए ही वह अपने अभिनय का जो पाग इस फ़िल्म में पग-पग बांचते हैं, वह उन की बलैया लेने के लिए काफी है। बस काश कि पटकथा और निर्देशन ने भी इन दोनों का अगर साथ दिया होता तो फ़िल्म भी उन्नीस नहीं, बीस हो गई होती जो कि होते-होते रह गई। फिर भी समूची फ़िल्म हिंदी सिनेमा में बदलती हुई स्त्री की आहट की भरपूर दस्तक तो दे ही देती है।

करन जौहर की विनील मैथ्यू निर्देशित हंसी तो फंसी फ़िल्म एक नज़र में न तो उतनी कसी हुई है न ही वह धार है, न कोई दिशा। पर हिंदी सिनेमा में, घर में बदलती स्त्री और उस के विद्रोह की दस्तक और उस के विद्रोह की गूंज इस फ़िल्म में भी साफ सुनाई देती है। परिणिति चोपड़ा मीता की भूमिका में घर की एक विद्रोहिणी बेटी की भूमिका में हैं। मीता विद्रोह करते-करते एक गहरे अवसाद में कैसे तो घिर जाती है पर अपने कैरियर का लक्ष्य वह फिर भी नहीं भूलती। यह फ़िल्म अपनी फ़िल्मोग्राफ़ी में है तो बहुत औसत दर्जे की और कई बार वह बोझिल और बोर करने की हद तक चली जाती है। इतना कि कई-कई बार लगता है कि हाय , यह फ़िल्म क्यों देख रहा हूं। कई सारे बेतुके प्रसंग, बेहूदे दृष्य इस फ़िल्म को पूरी तरह चाटू बना देते हैं तो इस लिए कि हर्षवर्धन कुलकर्णी की कहानी ही बेसिर पर की है। निर्देशन और लचर। बस तुक्के में ही यह फ़िल्म फिसलती जाती है तो फिसलती ही जाती है। और दर्शक की हालत भी फ़िल्म के नाम अनुरुप हंसी तो फंसी के सलीब पर फंसने वाले जैसी हो जाती है। बावजूद इस सब के हिंदी सिनेमा में औरत की बदलती इबारत को इस फ़िल्म में भी साफ पढ़ा जा सकता है।

आदित्य चोपड़ा की महेश शर्मा निर्देशित फ़िल्म शुद्ध देसी रोमांस भी हिंदी सिनेमा में बदलती औरत का मिजाज बताती है। एक खिलंदड़ भाव फ़िल्म के हर फ़्रेम में उपस्थित है। पर पूरी फ़िल्म अगर टिकी है तो ऋषि कपूर के कंधे पर। बाकी फ़िल्म तो लिव-इन- रिलेशनशिप की डोर में बंधी पतंग की तरह है। जो जब मन करता है उड़ने लगती है, जब मन करता है कट कर ज़मीन पर आ गिरती है। इस फ़िल्म में ऋषि कपूर अगर न हों तो किसी कच्ची दीवार की तरह भरभरा कर सेकेंड भर में गिर जाए। फिर भी इस फ़िल्म में औरत करवट बदल रही है। और बहुत ही दिलचस्प ढंग से। इसी लिए यह फ़िल्म भी मानीखेज हो जाती है। न सिर्फ़ मानीखेज बल्कि स्त्री के विद्रोह, उस की बगावत के इबारत तो दर्ज करती ही है, पुरुष सत्ता पर एक गहरी चोट भी करती है यह फ़िल्म।  ऋषि कपूर इस फ़िल्म में गोयल की भूमिका में हैं। जो हैं तो पान के दुकानदार पर शादी व्याह के तमाम इंतज़ाम भी करने का ठेका लेते रहते हैं। न सिर्फ़ तमाम इंतजाम बल्कि रिश्तेदारों तक का प्रबंध वह सुविधा के हिसाब से करवाते रहते हैं। वह रघुराम की शादी की व्यवस्था तो करवाते ही हैं, उस के लिए किराए की बहन की व्यवस्था भी करवाते हैं। इस बहन गायत्री की ही भूमिका यहां परिणिति चोपणा ने की है। वह बारात वाली बस में दुल्हे के साथ बैठती भी हैं। बारात पहुंचती है और व्याह के ऐन समय पर दुल्हा रघुराम जिस कीे भूमिका सुशांत सिंह राजपूत ने की है, बाथरूम जाने के बहाने शादी छोड़ कर भाग लेता है। गायत्री के फेर में। वापस आ कर उस से गायत्री टकरा भी जाती है। वह गायत्री के ही साथ रहने लगता है। लिव-इन में। खुल्लमखुल्ला। चर्चा का केंद्र है अब वह मुहल्ले में। खैर, बाद में जिस दुल्हन को वह छोड़ कर भागा होता है तारा यानी वानी कपूर को , वह मिल जाती है जयपुर में उसे। अब वह फिर उस के फेरे में पड़ जाता है। कहानी उलटते-पलटती फिर उस की शादी तक पहुंचती है। अब की बार भी सारा इंतजाम ऋषि कपूर के भरोसे है। पर अब की ऋषि कपूर चौकन्ने हैं पूरी तरह और पूरी चाक-चौबंद व्यवस्था किए हुए हैं कि दुल्हा भागने न पाए। बाथरुम पर खास चौकसी है। पर अब की बाथरुम के बहाने दुल्हन गायत्री भाग जाती है। हासिल यह कि अगर दुल्हा भाग सकता है तो दुल्हन भी कोई कम नहीं है। वह भी नहले पर दहला दे सकती है इस पुरुष सत्ता को। वह भी अपनी मनमानी का जूता मार सकती है पुरुष को और कि अपना जीवन अपने ढंग से जी सकती है। अगर कोई पुरुष उस की ज़िंदगी से खेल सकता है, उस का अपमान कर सकता है तो वह भी उसे हरगिज-हरगिज छोड़ने वाली है नहीं। ईंट का जवाब पत्थर से देना वह भी सीख रही है। भले सिनेमा के रुपहले परदे पर ही सही।

इस बीच एक फ़िल्म और आई है इसी स्त्री के बदलते रुप रंग को ले कर। अनुभव सिनहा की गुलाब गैंग। सौमिक सेन द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म हालां कि समूची मसाला फ़िल्म है और कि माधुरी दीक्षित और जूही चावला जैसी अभिनेत्रियां आमने-सामने हैं। पर है यह फ़िल्म भी हिंदी फ़िल्मों में बदलती औरतों की दास्तान लिए ही। यह फ़िल्म यह भी बताती है कि माफ़ियागिरी और दबंगई में भी स्त्रियां पुरुषों से किसी भी मायने में पीछे नहीं हैं। जूही चावला का शेड इस फ़िल्म में बिलकुल अलग शेड लिए हुए हैं। एक महिला राजनितिज्ञ-माफ़िया का चरित्र उन्हों न सिर्फ़ पूरी ताकत से जिया है बल्कि कुछ बोल्ड संवाद भी उन के हिस्से हैं। जूही चावला और उन की सरल मुसकुराहट किसी खलनायिका की भी हो सकती है यह वह बता देती हैं अपने अभिनय को उस के अंगार में लपेट कर। माधुरी दीक्षित भी गुलाब की भूमिका में किसी दबंग महिला को इस तरह जीती हुई यह इबारत लिख देती हैं कि दबंगई और हिंसा पर पुरुषों का कोई एकाधिकार नहीं है। डेढ इश्किया में भी माधुरी ने लगभग यही इबारत बांचते हुए पुरुष सत्ता को चुनौती भरा अभिनय परोसा था।

गरज यह कि हिंदी सिनेमा में औरत न सिर्फ़ बदल रही है, अपनी भूमिका बदल रही है बल्कि पुरुष सत्ता को जहां-तहां चुनौती देती हुई अपनी उपस्थिति निरंतर दर्ज कर रही है। तो क्या हिंदी सिनेमा में औरतों की इस बदलती तसवीर को क्या समाज का सच भी नहीं मान लिया जाना चाहिए? एक समय कहा जाता था कि साहित्य समाज का दर्पण है। पर जाने-अनजाने साहित्य आज की तारीख में समाज में अपनी उपयोगिता और आवाज़ दोनों ही को बुरी तरह खोता जा रहा है। अब इस नए अर्थ में अगर मुझे यह कहने की इजाजत दी जाए तो मैं कहना चाहता हूं कि सिनेमा भी समाज का दर्पण है। और जो इस दर्पण को हम ठीक से देखें तो पाते हैं कि स्त्री हमारे सिनेमा ही नहीं, समाज में भी बदल रही है। लगातार बदल रही है और कि पुरुष सत्ता को निरंतर चुनौती दे रही है। यह सिलसिला थमने वाला है नहीं। तब तक जब तक पुरुष सत्ता को यह स्त्री मटियामेट कर ध्वस्त नहीं कर देती। मुझे लगता है यह कहीं अब बहुत ज़रुरी भी हो गया है। स्त्री के इस बदलाव की पदचाप सिर्फ़ हिंदी सिनेमा में ही नहीं, समाज और घर में ही नहीं, फ़ेसबुक आदि तमाम अन्य माध्यमों पर भी निरंतर दर्ज की जा सकती है और कि इस की गूंज भी साफ-साफ सुनी जा सकती है। यकीन न हो तो फ़ेसबुक पर ही दर्ज तमाम-तमाम कविताएं, टिप्पणियां देखी जा सकती हैं। जहां स्त्रियां अपने पंख खोल कर न सिर्फ़ उड़ पड़ी हैं बल्कि अपनी बात भी खुल कर ऐसे कह रही हैं गोया उन्हें पहली ही बार खुली हवा और खुली सांस मिली है, इस का एहसास भी वह न सिर्फ़ कर रही हैं बल्कि खुल कर करवा रही हैं। इन्हीं तमाम कविताओं और टिप्पणियों में से  अर्चना राज़ की एक कविता पर गौर कीजिए और जानिए कि स्त्री क्या चाहती है? और यह भी कि अब बहुत दिनों तक उस की इस आवाज़ को अनसुना कर पाना पुरुष सत्ता के लिए मुश्किल ही नहीं असंभव है। स्त्री अब सिर्फ़ संभावना ही नहीं, सुलगता संसार भी है। अभी वह अकेले हनीमून मनाने जा रही है। आने वाले दिनों में वह संतान भी अकेले पैदा कर लेगी। विज्ञान यह सुविधा अगर अन्य जीवों को दे चुका है तो स्त्री भी कब तक इस सुविधा को नज़रंदाज़ करेगी? पुरुषवादी सोच नहीं बदलती तो न बदले, अपनी बला से, स्त्रियां तो बदल रही हैं। स्त्री अब सिर्फ़ स्त्री नहीं, व्यक्ति और व्यक्तित्व बनना चाहती है। इस अर्थ में अर्चना राज़ की यह कविता यहां गौरतलब है, जो उन के फ़ेसबुक की वाल पर दर्ज है:

आ गया है वक्त अब ऐलान का
कि मै नहीं स्त्री हूँ केवल
व्यक्ति भी हूँ
व्यक्ति ही हूँ ,

अब जिउंगी श्वांस भर
तृप्तता के छोर तक
भीग जाए जब मेरा मन
और तन ,

मै नहीं मोहताज़ अब ज़र्रे बराबर
मै हवा हूँ
मै खुशी हूँ
मै ही हूँ संतोष भी ,

है मुझे खुद ही बहकना और संभलना
मै ही कोठा
मै ही मंदिर
मै ही हूँ अब धर्म भी ,

मै करूंगी अब नियत खुद को खुदी से
मै अभय हूँ
मै ही जय हूँ
मै ही हूँ उद्घोष भी ,

अब करो स्वीकार तुम कि वक्त है ऐलान का
मै नहीं स्त्री हूँ केवल
व्यक्ति हूँ
व्यक्तित्व हूँ !!

7 comments:

  1. कविता बहुत अच्छी लगी

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  2. क्वीन देखी थी सो क्वीन की समीक्षा शब्द-शब्द पढ़ता गया। विजय को कैसे पता चला रानी के बारे में यह आपने नहीं लिखा..वो फोटो वाली बात। दूसरी फिल्म नहीं देखी है। कुल मिलाकर सुंदर समीक्षा, सुंदर कविता..वाह! सोने पर सुहागा।

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  3. प्यारे दयानंद भाई,
    `एक औरत का अकेले हनीमून पर जाना' मुझे ऐसे समय में पढ़ने को मिला , जब रमणिका गुप्ता और उनकी गुलाबी गैंग ने 25 खंडों में केवल स्त्री लेखन को संकलित करने की ठानी है और इसे अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित भी किया जा रहा है । मैं उस समाचार के दूरगामी परिणामों की बात सोचकर अवाक् था, कि अचानक आपने उसे वाणी दे दी । आभारी हूँ ।

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  4. बहुत ही सुंदर विवेचन किया है दयानंदजी...क्वीन और हाईवे फिल्म का तो कहना ही क्या ये मेरी भी फेवरेट फिल्म रही हैं...कभी मेरे ठिकाने पर भी आईये..
    www.filmihai.blogspot.com

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  5. बहुत दिनों से कोई फिल्‍म नहीं देख पाया हूं।
    लेकिन अब एकसाथ तीन-तीन फिल्‍में देखने जाऊंगा।
    कुमार सौवीर
    लखनऊ

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