Friday, 26 June 2015

डाक्टर ओमप्रकाश सिंह जैसे भोजपुरी के तपस्वी से मिलना



भोजपुरी को सांस-सांस जीने वाले छपरा के मूल निवासी डाक्टर ओमप्रकाश सिंह बलिया में रहते हैं । पेशे से चिकित्सक हैं लेकिन भोजपुरी के लिए जान छिड़कते हैं। पहले अंजोरिया नाम से भोजपुरी साईट चलाते थे अब उसी को भोजपुरिका नाम से चलाते हैं । भोजपुरी मेरी भी मातृभाषा है। सो मेरे मन में भी भोजपुरी के लिए बहुत मान है। भोजपुरी मेरा स्वाभिमान है। बहुत लोगों को भोजपुरी के लिए जीते , मरते और दुकान चलाते देखा है। लेकिन भोजपुरी के लिए नि:स्वार्थ लड़ते , जीते और मरते डाक्टर ओमप्रकाश सिंह जैसा आज की तारीख़ में दूसरा नहीं देखा । शायद ही देख पाऊं। भोजपुरी भाषा के लिए इतना समर्पण आसान नहीं है । 


लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास के मार्फ़त हमारा परिचय हुआ । इस उपन्यास का भोजपुरी में अनुवाद करने की इच्छा जताई और कहा कि इसे धारावाहिक रूप से अंजोरिया पर छापना चाहता हूं । मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी । मैं ने सहर्ष सहमति दे दी । डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने मेरे उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं का भोजपुरी में अविकल अनुवाद किया और अंजोरिया पर धारावाहिक छापा भी । और कहना चाहता हूं कि बावजूद इस के कि भोजपुरी मेरी भी मातृभाषा है , इतना बढ़िया , इतना डूब कर लोक कवि अब गाते नहीं का ऐसा दुर्लभ अनुवाद भोजपुरी में मैं भी नहीं कर पाता, जैसा कि डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने किया है । ओमप्रकाश सिंह ने न सिर्फ़ लोक कवि अब गाते नहीं का बल्कि मेरे और भी कई लेख और रचनाओं का अनुवाद भी भोजपुरी में किया है। दुर्लभ अनुवाद। मेरे ब्लाग सरोकारनामा के लिए भी वह सर्वदा प्राण वायु बन कर उपस्थित मिलते हैं । मैं सरोकारनामा के मसले पर रात बिरात कभी भी फ़ोन कर उन से कह सकता हूं । कहता ही रहता हूं । पहले मुझे सरोकारनामा पर पोस्ट करने नहीं आता था । डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने फ़ोन पर , लिख कर किसी बच्चे की तरह मुझे सिखाया । एक-एक स्टेप सिखाया । बिना किसी स्वार्थ के । इतना ही नहीं जब कई बार कुछ लोगों ने सरोकारनामा को हैक करने की कई-कई बार कोशिश की तो उस का बैक अप ले कर सुरक्षित किया । और सारी सामग्री एक जगह सुरक्षित करने की गरज से सरोकारनामा नाम से साइट भी बना दी ।


एक लंबा अरसा हो गया था हम लोग सिर्फ़ रचना , अनुवाद , सरोकारनामा , और फ़ोन के मार्फ़त बतियाते रहे थे। मिलना संभव नहीं हो पाया था कभी । लेकिन डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने यह भी संभव बना दिया । वह लखनऊ आ गए। हमारी आत्मीयता मुलाकात में भी तब्दील हुई और हम धन्य-धन्य हो गए डाक्टर ओमप्रकाश सिंह जैसे भोजपुरी के तपस्वी से मिल कर । उन की सादगी और विनम्रता पर और-और मोहित हो गए ।      




Sunday, 21 June 2015

हिंदी के चंबल का एक बाग़ी मुद्राराक्षस



अगर मुद्राराक्षस के लिए मुझ से कोई एक वाक्य में पूछे तो मैं कहूंगा कि हिंदी जगत अगर चंबल है तो मुद्राराक्षस इस चंबल के बाग़ी हैं । जन्मजात बाग़ी । ज़िंदगी में उलटी तैराकी और सर्वदा धारा के ख़िलाफ़ चलने वाला कोई व्यक्ति देखना हो तो आप लखनऊ आइए और मुद्राराक्षस से मिलिए। आप हंसते , मुसकुराते तमाम मुर्दों से मिलना भूल जाएंगे। हिप्पोक्रेटों से मिलना भूल जाएंगे । मुद्राराक्षस की सारी ज़िंदगी इसी उलटी तैराकी में तितर-बितर हो गई लेकिन इस बात का मलाल भी उन को कभी भी नहीं हुआ । उन को कभी लगा नहीं कि यह सब कर के उन्हों ने कोई ग़लती कर दी हो । वास्तव में हिंदी जगत में वह इकलौते आदि विद्रोही हैं। बहुत ही आत्मीय किस्म के आदि विद्रोही। पल में तोला , पल में माशा ! वह अभी आप से नाराज़ हो जाएंगे और तुरंत ही आप पर फ़िदा भी हो जाएंगे । वह कब क्या कर और कह बैठेंगे , वह ख़ुद नहीं जानते। लेकिन जानने वाले जानते हैं कि वह सर्वदा प्रतिपक्ष में रहने वाले मानुष हैं । वह जब बतियाते हैं और अतीत में जाते हैं तो लगता है कि कोलकाता में ज्ञानोदय की नौकरी का समय उन के जीवन का गोल्डन  पीरियड था। हालां कि वह ऐसा शब्द या कोई भावना व्यक्त नहीं करते । लेकिन जब एक बार मैं नवभारत टाइम्स में था तब बातचीत में जो भाव उन के शब्दों में आए , उन से मैं ने यह निष्कर्ष निकाला है । हो सकता है मेरा यह आकलन सही भी हो , हो सकता है मेरा यह आकलन ग़लत भी हो । कुछ भी हो सकता है । पर कोलकाता के ज्ञानोदय और उस में अपनी नौकरी का ज़िक्र वह तब के दिनों बड़े गुमान से करते मिले थे । मुद्राराक्षस ने आकाशवाणी की गरिमामयी नौकरी भी की है । तब के दिनों वह असिस्टेंट डायरेक्टर हुआ करते थे । पर यूनियनबाज़ी में वह गिरिजा कुमार माथुर से मोर्चा खोल बैठे । झगड़ा जब ज़्यादा बढ़ गया तो वह नौकरी से बेबात इस्तीफ़ा दे बैठे । नौकरी में समझौता कर के जो रहे होते मुद्राराक्षस तो बहुत संभव है वह डायरेक्टर जनरल हो कर रिटायर हुए होते । नहीं डायरेक्टर जनरल तो डिप्टी डायरेक्टर जनरल हो कर तो रिटायर हुए ही होते । जैसे कि उन के साथ के तमाम लोग हुए भी । अच्छी ख़ासी पेंशन पा कर ऐशो आराम की ज़िंदगी गुज़ार रहे होते । लेकिन मुद्रा का चयन यह नहीं था । सुभाष चंद्र गुप्ता उर्फ़ मुद्राराक्षस तो जैसे संघर्ष का पट्टा लिखवा कर आए हैं इस दुनिया में । घर में , बाहर , साहित्य और ज़िंदगी में भी । मुद्रा तो जब दिनकर की उर्वशी की जय जयकार के दिन थे तब के दिनों उन्हों ने अपनी लिखी समीक्षा में उर्वशी की बखिया उधेड़ दी थी । नाराज हो कर दिनकर ने उन से कहा कि  कुत्तों की तरह समीक्षा लिखी है । तो मुद्रा ने पलट कर दिनकर से कहा कि कुत्तों के बारे में कुत्तों की ही तरह लिखा जाता है । दिनकर चुप हो गए थे । ऐसा मुद्रा ख़ुद ही बताते हैं ।

मुद्राराक्षस शुरुआती दिनों में लोहियावादी थे । लोहिया के मित्र भी वह रहे । इतना कि  रंगकर्मी इंदिरा गुप्ता जी से मुद्राराक्षस का विवाह भी लोहिया ने ही करवाया। लेकिन यह देखिए बाद के दिनों में लोहिया से मुद्रा का मोहभंग हो गया । मुद्रा वामपंथी हो गए । लोहिया को फासिस्ट लिखने और बताने लग गए मुद्राराक्षस । बात यहीं नहीं रुकी मुद्रा जल्दी ही वामपंथियों के कर्मकांड पर टूट पड़े । माकपा एम को वह भाजपा एम कहने से भी नहीं चूके । सब जानते हैं कि मुद्राराक्षस एक समय अमृतलाल नागर के शिष्य थे । न सिर्फ़ शिष्य बल्कि उन का डिक्टेशन भी लेते थे । नागर जी की आदत थी बोल कर लिखवाने की । बहुत लोगों ने नागर जी का डिक्टेशन लिया है । मुद्रा भी उन में से एक हैं । मुद्रा नागर जी के प्रशंसकों में से एक रहे हैं । लेकिन कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के एक कार्यक्रम में अमृतलाल नागर पर जब उन्हें बोलने के लिए कहा गया तो मुद्राराक्षस ने जैसे फ़तवा जारी करते हुए कहा कि अमृतलाल नागर बहुत ही ख़राब उपन्यासकार थे । उपस्थित श्रोताओं , दर्शकों में उत्पात मच गया । नागर जी के तमाम प्रशंसक मुद्राराक्षस पर कुपित हो गए । लेकिन मुद्रा अड़ गए तो अड़ गए । नागर जी को वह ख़राब उपन्यासकार बताते ही रहे । इसी तरह एक समय मुद्राराक्षस भगवती चरण वर्मा को जनसंघी बताते नहीं थकते थे ।


लेकिन यह वही मुद्राराक्षस हैं जब दिल्ली में उन्हों ने एक समय साहित्य अकादमी को चुनौती दे दी थी । विष्णु प्रभाकर के आवारा मसीहा के छपने का साल था वह । चहुं और आवारा मसीहा की धूम थी । लेकिन आवारा मसीहा को साहित्य अकादमी नहीं दिया गया ।  मुद्राराक्षस ने तब दिल्ली में साहित्य अकादमी के समानांतर एक कार्यक्रम किया । देश भर के लेखकों को न्यौता भेजा । सब लोग अपने खर्चे पर दिल्ली पहुंचे । और विष्णु प्रभाकर को एक रुपए दे कर सम्मानित किया गया । साहित्य अकादमी के मुंह पर कालिख पोत दी थी मुद्राराक्षस ने तब । लेकिन बाद के दिनों में मुद्राराक्षस का नाम भी साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए एकाधिक बार चला । लेकिन हर बार वह कट गए । काट दिए गए । कथाक्रम के आयोजन का वह डिनर वाला रसरंजन कार्यक्रम मुझे आज भी नहीं भूला है । साहित्य अकादमी पुरस्कार की उन्हीं दिनों घोषणा हुई थी । रसरंजन के कुछ दौर के बाद अचानक चर्चा में साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी आ गया । श्रीलाल शुक्ल पर नशा तारी था । उन्हों ने बगल में बैठे मुद्राराक्षस को अचानक बहुत भावुक हो कर अपनी बाहों में मित्रवत भरा और कहा कि अगर मेरा वश चला होता तो अब की का साहित्य अकादमी पुरस्कार मुद्रा तुम्हें ही मिला होता । मुद्रा भी भावुक हो गए थे तब । लेकिन बाद में मुद्रा को जब पता चला कि  उस बार का साहित्य अकादमी तो मुद्राराक्षस को बस मिलते-मिलते रह गया था । नहीं मिला था तो बस इस लिए कि मुद्राराक्षस के नाम का तब ज्यूरी मेंबर के नाते श्रीलाल शुक्ल ने ही सब से ज़्यादा विरोध किया था । और मुद्रा का नाम तब कट गया था । तो मुद्रा बहुत क्षुब्ध हुए। कोई भी हो जाता । मुद्राराक्षस ने अपना यह क्रोध बाक़ायदा एक लेख में लिख कर व्यक्त भी किया । श्रीलाल जी दुनिया कूच कर गए । पर मुद्राराक्षस के उस सवाल का जवाब नहीं दे पाए । मुद्राराक्षस और श्रीलाल शुक्ल के संबंधों में खाई  पहले भी थी अब और भी चौड़ी हो गई थी । मेरे लिए श्रीलाल शुक्ल,  मुद्राराक्षस और कामतानाथ तीनों ही आदरणीय हैं । तीनों ही लोगों का स्नेह का सौभाग्य मुझे मिलता रहा है । लेकिन एक अप्रिय बात मुझे यहां कहने दीजिए कि श्रीलाल शुक्ल ने मुद्राराक्षस और कामतानाथ को अकेला और अपमानित करने के लिए अनेक यत्न किए । इस विशेष काम के लिए उन्हों ने तीन चार पट्ट शिष्य बड़े मनोयोग से तैयार किए । और दुर्भाग्य से अपने इन पट्ट शिष्यों की मदद से इस मकसद में श्रीलाल शुक्ल सौ फ़ीसदी सफल रहे । लेकिन इस सब में लखनऊ के साहित्यिक हल्के में जो तल्ख़ी के बीज पड़े आज वह फूल-फल कर भड़भाड़ के कांटे में तब्दील हैं , नागफनी में तब्दील हैं । मुझे यह भी ज़रूर कहने दीजिए कि कामतानाथ जी तो इस दुष्चक्र और अपमान की आंधी को पी गए , अकेले किए जाने का विष पी गए और कि अपने को बिखरने से बचा ले गए थे । इस लिए भी कि वह रिज़र्व बैंक से रिटायर्ड थे । पेंशनयाफ़्ता थे । भरा-पूरा परिवार भी उन का संबल था । ट्रेड यूनियन में लड़ने और संभलने का अनुभव था । एकला चलो की ज़िद भी उन में नहीं थी । कायस्थीय कमनीयता और मैनेजमेंट भी था उन में । सो वह किसी तरह अपने को संभाल ले गए । अगर कैंसर न हुआ होता उन्हें तो हंसते , मुसकुराते वह आज भी अपनी रचनाओं की तरह हमारे बीच उपस्थित रहते ।

 
लेकिन सब कुछ और सारे जीवट के बावजूद मुद्राराक्षस इस सब में बिखर गए । मुद्रा इस अकेले किए जाने के दुष्चक्र और अपमान की आह में बिन कुछ बोले घुलते गए हैं । तिस पर उन की उलटी तैराकी और धारा के विरुद्ध चलने , और एकला चलो की ज़िद उन्हें निरंतर पथरीली राह पर ढकेलती रही है । जवानी में तो सब कुछ संभव बन जाता है । कैसे भी , कुछ भी हो जाता है । लेकिन उम्र के साथ बदलते समय से मुद्राराक्षस ने आज भी समझौता नहीं किया है । एकला चलो की उन की ज़िद और जीवन शैली उन्हें शायद आज भी कहीं सहेजती है , ताकत देती है उन्हें । पर बिखरने से बचा नहीं पाती । तिस पर उन पर किसिम-किसिम के आक्रमण भी दाएं-बाएं से जब-तब होते ही रहते हैं । ख़ास कर प्रेमचंद को दलित विरोधी कह कर जैसे उन्हों ने बर्रइया के छत्ते में हाथ ही डाल दिया था । फिर तो क्या-क्या नहीं कहा गया । यह भी कि वह सुनार भी हैं ।

सच यह है कि लखनऊ में एक समय यशपाल , भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर की त्रिवेणी कही जाती थी । मतभेद उन में भी थे । होते ही थे । स्वाभाविक है । लेकिन वह लोग अपने मतभेद भी एक गरिमा के तहत ही निपटा लिया करते थे । वाकये कई सारे हैं । पर प्रसंगवश एक वाकया सुनाता हूं यहां । लखनऊ के महानगर कालोनी में भगवती चरण वर्मा का घर तब के दिनों बन चुका था । यशपाल जी का घर निर्माणाधीन था । भगवती बाबू के घर चित्रलेखा में कई सारे लेखक एक दिन बैठे थे । यशपाल और नागर जी भी थे । किसी ने यशपाल जी को सलाह दी कि आप भी अपने घर का नाम दिव्या रख लीजिए । यशपाल जी सुन कर भी टाल गए यह बात । लेकिन जब यह बात फिर से दुहराई गई तो यशपाल जी ने बहुत धीरे से प्रतिवाद किया और कहा कि मैं ने सिर्फ़ दिव्या ही नहीं लिखा है । बात आई , गई हो गई । किसी ने किसी की बात का बुरा भी नहीं माना । और नागर जी के पास तो जीवन पर्यंत अपना घर नहीं हो पाया । किराए के घर में ही वह अंतिम सांस लिए । ख़ैर , मैं मानता हूं की इस त्रिवेणी के विदा होने के बाद भी लखनऊ में एक त्रिवेणी पुनः उपस्थित थी । श्रीलाल शुक्ल , मुद्राराक्षस और कामतानाथ की त्रिवेणी । तीनों ही बड़े लेखक हैं । पर दुर्भाग्य से यह त्रिवेणी अपनी वह गरिमा शेष नहीं रख पाई । जो यशपाल , भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर की त्रिवेणी ने विरासत में छोड़ी थी । इस में श्रीलाल शुक्ल की जो एक्सरसाइज थी , सो तो थी ही , मुद्राराक्षस की एकला चलो की ज़िद , धारा के विरुद्ध चलने की अदा भी कम नहीं रही है । जैसे कि मुझे याद है कि जब कामतानाथ की पचहत्तरवीं जयंती मनाई गई तो उस कार्यक्रम की अध्यक्षता मुद्राराक्षस को ही करनी तय हुई थी । पर ऐन वक़्त पर मुद्रा ने आने से इंकार कर दिया । ऐसे और भी तमाम वाकये मुद्राराक्षस के जीवन में उपस्थित हैं । जैसे कि वह मुद्रा के आला अफसर की बहार के दिन थे । तब सोवियत संघ का ज़माना था । दर्पण के लोगों द्वारा आला अफसर के मंचन का कार्यक्रम सोवियत संघ के कई शहरों में बनाया गया । सोवियत संघ के ख़र्च पर । सभी कलाकारों के पासपोर्ट आदि बन गए । तारीखें तय हो गईं । सब ने जाने की अप्रतिम तैयारी कर ली । ऐन वक्त पर मुद्राराक्षस बिदक गए । सोवियत संघ में एक परंपरा सी थी कि नाटक के मंचन के लिए लेखक की लिखित अनुमति भी ज़रूरी होती थी । मुद्राराक्षस ने लिखित अनुमति देने से साफ इंकार कर दिया । दर्पण के लोगों ने बहुत समझाया । मनुहार किया । कहा कि आप को भी चलना है । मुद्रा बोले , मुझे जाना ही नहीं है । सोवियत संघ में आला अफ़सर का वह मंचन रद्द हो गया । दर्पण के लोग इस बाबत आज भी मुद्राराक्षस को माफ़ नहीं करते । मुद्रा का नाम आते ही किचकिचा पड़ते हैं । गरिया देते हैं । असल में मुद्रा के यहां असहमतियां बहुत हैं और उन से असहमत लोग भी बहुत हैं । बेभाव कहिए या थोक के भाव कहिए । 


लेकिन मुद्राराक्षस तो ऐसे ही हैं । वह अमूमन किसी के शादी - व्याह में  या पारंपरिक कार्यक्रम में भी कहीं नहीं देखे जाते । वह बुलाने पर भी नहीं जाते । एक समय एक फीचर एजेंसी राष्ट्रीय फ़ीचर्स नेटवर्क में मैं संपादक था । इस का कार्यालय तब विधानसभा मार्ग पर आकाशवाणी से सटा हुआ था । एक बार वहां मुद्राराक्षस अचानक आ गए । मैं बहुत ख़ुश हुआ । उन से लिखने का आग्रह किया । वह तुरंत मान गए । यह वर्ष 1994 -1995 का समय था । वह पहले हफ्ते में एक लेख लिखते थे । बाद में दो लेख लिखने लगे । विविध विषयों पर । बस उन की शर्त होती थी कि हर हफ़्ते भुगतान मिल जाना चाहिए । लेख चाहे जब छपे । तो वह हफ़्ते में तीन बार आते । दो बार लेख देने , एक बार भुगतान लेने । मुझ पर प्यार भी बहुत लुटाते । इसी प्यार के वशीभूत एक बार पारिवारिक कार्यक्रम में बुलाते हुए निमंत्रण पत्र दिया उन्हें । उन्हों ने आने से साफ इंकार कर दिया । कहने लगे ऐसे किसी कार्यक्रम में नहीं आता-जाता । मैं चुप रह गया था तब । बहुत बार किसी के निधन आदि पर अंत्येष्टि में भी वह अनुपस्थित होते हैं। हां  , लेकिन तीन बार अभी तक मैं ने उन्हें लोगों के निधन पर ज़रूर देखा है । एक अमृतलाल नागर के निधन पर वह बहुत ग़मगीन मिले भैसाकुंड पर । दूसरी बार राजेश शर्मा की आत्महत्या के बाद उन के घर पर उन के परिवार को सांत्वना देते हुए । और तीसरी बार श्रीलाल शुक्ल के निधन पर फिर भैसाकुंड पर । बहुत विचलित मुद्रा में । मुद्राराक्षस को जितना परेशान और विचलित श्रीलाल शुक्ल के निधन पर  देखा , उतना परेशान और विचलित मैं ने उन्हें कभी नहीं देखा । लगता था कि जैसे उन से , उन का क्या छिन गया है । ऐसे जैसे वह किसी गहरी यातना में हों । उन के चेहरे पर छटपटाहट की वह अनगिन रेखाएं मेरी आंखों में जैसे आज भी जागती मिलती हैं । तो इस का कारण भी है । श्रीलाल शुक्ल और मुद्राराक्षस दोनों का विविध विषयों पर अध्ययन लाजवाब था । विद्वता की प्रतिमूर्ति हैं दोनों । हिंदी , अंगरेजी , संस्कृत और संगीत पर दोनों की ही अद्भुत पकड़ थी , है ही । फ़र्क बस यह रहा कि मुद्राराक्षस ने कई बार अपने अतिशय अध्ययन का अतिशय दुरूपयोग किया है । ध्वंस की हद तक दुरुपयोग किया है । और उसे एकला चलो की ज़िद पर कुर्बान कर दिया है । बारंबार । श्रीलाल जी ने अपने अध्ययन का सुसंगत उपयोग किया है । कहूं कि मैनेज किया है । और इसी ' मैनेज ' के दम पर अनगिन बार मुद्राराक्षस को वह प्रकारांतर से उकसाते रहे हैं और मुद्राराक्षस अतियों की भेंट चढ़ते गए हैं । निरंतर ।

मुद्राराक्षस से जब मैं पहली बार मिला तब बीस साल का था । यह 1978 की बात है । गोरखपुर में मैं विद्यार्थी था । संगीत नाटक अकादमी की नाट्य प्रतियोगिता में मुद्राराक्षस बतौर ज्यूरी मेंबर गोरखपुर गए थे । लखनऊ से विश्वनाथ मिश्र और दिल्ली से देवेंद्र राज अंकुर भी बतौर ज्यूरी मेंबर पहुंचे थे गोरखपुर । अमृतलाल नागर ने उद्घाटन किया था । मुद्रा उन दिनों हाई हिल का जूता , मोटी नाट वाली टाई बांधे छींटदार बुश्शर्ट और कोट पहने मिले थे । सब लोग होटल में ठहरे थे पर मुद्राराक्षस परमानंद श्रीवास्तव के घर पर ठहरे थे । तब मुद्रा से मैं ने एक इंटरव्यू भी किया था । और उन से मिल कर एक नई ऊर्जा से भर गया था । उन दिनों वह रामसागर मिश्र कालोनी में रहते थे, जो अब इंदिरा नगर है । उन से चिट्ठी-पत्री होने लगी थी । वह इंटरव्यू दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर तब के दिनों छपा भी था । उन्हीं दिनों मैं परिचर्चाएं भी बहुत लिखता था । रंगकर्मियों को ले कर एक परिचर्चा खातिर उन्हों ने तब न सिर्फ़ कई सारे नाम सुझाए बल्कि सब के पते भी लिखवाए । बंशी कौल , सुरेका सीकरी , मनोहर सिंह , उत्तरा  बावकर जैसे कई रंगकर्मियों के पते उन्हें तब जुबानी याद थे । कहा कि सब को मेरा नाम भी लिख सकते हैं , जवाब आएगा । सचमुच सब का जवाब आया था तब । बाद के दिनों मैं लखनऊ आता तो शाम के समय काफी हाऊस में प्रबोध मजूमदार , राजेश शर्मा के साथ वह एक कोने की मेज पर बैठे मिल जाते थे ।


मुद्राराक्षस ने राजनीतिक जीवन भी जिया है । दो बार चुनाव भी लड़ा है इसी लखनऊ में और अपनी ज़मानत भी ज़ब्त करवाई है । लेकिन राजनीति में भी कभी उन्हों ने समझौता नहीं किया है । कभी किसी के पिछलग्गू नहीं बने हैं । किसी की परिक्रमा नहीं की है । गरज यह कि साहित्य और ज़िंदगी की तरह वह राजनीति में भी सर्वदा अनफिट ही रहे हैं । नरसिंहा राव तब के दिनों प्रधानमंत्री थे । मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे । डंकल प्रस्ताव की दस्तक थी । पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह लखनऊ के एक सेमिनार में आए थे । सहकारिता भवन में  आयोजित डंकल प्रस्ताव के खिलाफ यह सेमिनार था । तमाम ट्रेड यूनियन के लोग उस में उपस्थित थे । विश्वनाथ प्रताप सिंह तब जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे । मुद्राराक्षस तब के दिनों लखनऊ शहर जनता दल के अध्यक्ष थे । कार्यक्रम शुरू होने की औपचारिकता हो चुकी थी । विश्वनाथ प्रताप सिंह मंच पर उपस्थित थे । अचानक मुद्राराक्षस आए । सुरक्षा जांच के तहत मेटल डिटेक्टर से गुज़रने को उन्हें कहा गया । मुद्रा बिदक गए । सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें समझाया कि पूर्व प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़ी यह प्रक्रिया है । मुद्रा का बिदकना जारी रहा । कहा कि मैं उन की पार्टी का शहर अध्यक्ष हूं , मुझ से भी ख़तरा है उन्हें ? और जब बिना जांच के उन्हें घुसने से मना कर दिया गया तो वह पलट कर कार्यक्रम से बाहर निकल गए । विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंच पर बैठे ही बैठे सब देख रहे थे । उन्हों ने कुछ कार्यकर्ताओं से कहा कि अरे , मुद्रा जी नाराज़ हो कर जा रहे हैं । उन्हें मना कर ले आइए । उन्हों ने पूर्व विधायक डी पी बोरा और उमाशंकर मिश्रा को इंगित भी किया । यह लोग लपक कर मुद्रा के पीछे लग गए । मुद्रा को मनाने लगे । लेकिन मुद्रा तो यह गया , वह गया हो गए । विधान भवन तक लोग मुद्रा को मनाते हुए आए । लेकिन मुद्रा नहीं लौटे तो नहीं लौटे । मैं उन दिनों नवभारत टाइम्स में था । कार्यक्रम की रिपोर्टिंग के लिए आया था । लेकिन कार्यक्रम छोड़ कर मैं भी साथ-साथ लग लिया यह देखने के लिए कि मुद्रा मानते हैं कि नहीं । मैं ने देखा कि मुद्रा किसी की बात सुनने को भी तैयार नहीं थे । लगातार कहते रहे कि अब इस अपमान के बाद लौटना मुमकिन नहीं है । 


मुद्राराक्षस के साथ ऐसी अनगिन घटनाएं उन के जीवन में उपस्थित हैं । भारत में उन दिनों विदेशी चैनलों की दस्तक और आहट के दिन थे । वर्ष 1996 की बात है । मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक ने स्टार में एडवाइजर बनाने के लिए बात करने को बुलाया था । निमंत्रण प्रस्ताव के साथ ही डॉलर वाला चेक भी नत्थी था । उन दिनों मैं राष्ट्रीय सहारा में आ चुका था । एक दिन मुद्रा जी राष्ट्रीय सहारा आए और रूपर्ट मर्डोक की वह चिट्ठी दिखाई सब के बीच और डॉलर वाला चेक भी । कहने लगे कि लेकिन मैं जाऊंगा नहीं । मेरे मुंह से निकल गया कि फिर यह चेक भी क्यों दिखा रहे हैं ? मुद्रा हंसे । और वह डॉलर वाला चेक तुरंत फाड़ कर रद्दी की टोकरी में डाल दिया । मुद्राराक्षस के बहुत से उपकार मुझ पर हैं । पर एक उपकार के ज़िक्र का मोह छोड़ नहीं पा रहा हूं । एक बार नागर जी पर लिखे एक संस्मरणात्मक लेख में संकेतों में ही सही उन की ज़िंदगी में आई कुछ स्त्रियों का ज़िक्र कर दिया था । नागर जी से अपनी एक पुरानी बातचीत के हवाले से । राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर यह संस्मरणात्मक लेख छपा था । उस में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था । लेकिन दफ़्तर के ही कुछ सहयोगियों ने नागर जी के सुपुत्र शरद नागर को भड़का दिया । शरद नागर मेरे ख़िलाफ़ लिखित शिकायत ले कर उच्च प्रबंधन के सम्मुख उपस्थित हो गए । मुझ से स्पष्टीकरण मांग लिया गया । मैं ने स्पष्टीकरण तो दे दिया पर संकट फिर भी टला नहीं था । जाने कैसे मुद्राराक्षस को यह सब पता चल गया । फोन कर के मुझ से दरियाफ़्त किया । मैं ने पूरा वाकया बताया । मुद्रा बोले , इस में ग़लत तो कुछ भी नहीं है । तुम ने कुछ भी ग़लत नहीं लिखा है । बल्कि बहुत कम लिखा है । ऐसे विवरण तो बहुत हैं नागर जी के जीवन में । मुझे बहुत पता है । और फिर कई और सारे वाकये बताए उन्हों ने । मुद्रा यहीं नहीं रुके । बिना मेरे कहे उच्च प्रबंधन से भी वह अनायास मिले और मेरी बात की पुरज़ोर तस्दीक की । कहा कि कुछ भी ग़लत नहीं लिखा है । बात ख़त्म हो गई थी । 

हज़रतगंज के काफी हाऊस में उन के साथ बैठकी के तमाम वाकये हैं । लेकिन एक वाकया भुलाए नहीं भूलता।  एक जर्मन स्कालर आई थी । वह भारतीय नाटकों और संगीत के बारे में जानना चाहती थी । वीरेंद्र यादव , राकेश , आदि कुछ और लोग भी थे । हिंदी उस की सीमा थी । अंगरेजी और संस्कृत लोगों की सीमा थी । अचानक मुद्राराक्षस ने हस्तक्षेप किया । और जिस तरह बारी-बारी संस्कृत और अंगरेजी में धाराप्रवाह बोलना शुरू किया , वह अद्भुत था । हम अवाक् देखते रहे मुद्रा को । एक बार ऐसे ही कैसरबाग़ के कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में संस्कृत के कोट दे-दे कर भरत मुनि के नाट्य शास्त्र की धज्जियां उड़ाते मैं मुद्रा को देख चुका था । लेकिन काफी हाऊस में मुद्रा की यह विद्वता देख कर मैं ही क्या सभी दंग थे । काफी हाऊस में पिन ड्राप साइलेंस था तब । भारतीय नाटकों और संगीत पर ऐसी दुर्लभ जानकारियां मुद्रा जिस अथॉरिटी के साथ परोस रहे थे , जिस तल्लीनता से परोस रहे थे वह विरल था । वह जर्मन स्कालर जैसे गदगद हो कर गई थी । उस की गगरी भर गई थी , ज्ञान के जल से । मुद्रा के लिए उस के पास आभार के शब्द नहीं रहा गए थे । निःशब्द थी वह । और हम मोहित । बाद के दिनों में एक दोपहर रस रंजन के समय इस घटना का ज़िक्र बड़े सम्मोहन के साथ मैं ने श्रीलाल शुक्ल से एक बैठकी में किया । श्रीलाल जी अभिभूत थे यह सुन कर। फिर धीरे से बोले अध्ययन तो है ही उस आदमी के पास । मैं ने जोड़ा , और शार्पनेस भी । श्रीलाल जी ने हामी भरी, सांस ली । और अफ़सोस के साथ बोले पर इस सब का तो वह लगभग दुरूपयोग ही कर रहे हैं ! लखनऊ मेरा लखनऊ में मनोहर श्याम जोशी ने आज के मुद्राराक्षस को तब के सुभाष चंद्र गुप्ता को जिस तरह उपस्थित किया है वह भी अविस्मरणीय है । 


स्त्री और दलित विमर्श के लिए झंडा भले राजेंद्र यादव के हाथ में चला गया था लेकिन मुद्राराक्षस के ज़रूरी हस्तक्षेप को हम भला कैसे भूल सकते हैं ? हां , यह भी ज़रूर है कि मुद्रा इस विमर्श में अति की हद तक निकल जाते रहे हैं । शायद इसी लिए वह कई बार बहुत लोगों को हजम नहीं हो पाते । उन की बात लोगों को चुभ-चुभ जाती है । मुद्रा का मकसद भी यही  होता है कि उन की बात लोगों को चुभे और ख़ूब चुभे । लेकिन इस फेर में वह दाल में नमक की जगह नमक में दाल भी ख़ूब करते रहे हैं । और बहुतेरे लोगों के लिए जहरीले बन कर उपस्थित होते रहे हैं । लेकिन मुद्रा ने कभी इस सब की परवाह नहीं की है । शायद करेंगे भी नहीं । उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने के लिए भी उन के संघर्ष को कैसे भूला जा सकता है ? कई-कई दिन तक उन्हें विधान भवन के सामने हमने धरना देते देखा है । बार-बार इस के लिए लड़ते देखा है । एक समय दलित मुद्दों को ले कर वह बहुत सक्रिय थे । मायावती उन्हीं दिनों मुख्यमंत्री बनीं । लोग कहने लगे कि हिंदी संस्थान की कुर्सी हथियाने का उपक्रम है यह । मैं ने लोगों से कहा कि फिर आप लोग मुद्राराक्षस को नहीं जानते । वह कैसे बन सकते थे ? बाग़ी और किसी कुर्सी पर ? नामुमकिन ! समाज के और ज़रूरी मसलों पर भी उन्हें जूझते देखा ही है लखनऊ की सड़कों ने , लोगों ने । मुद्रा चुप मार कर बैठ जाने वालों में से नहीं हैं । हार शब्द तो जैसे उन की डिक्शनरी में ही नहीं है । अख़बारी कालमों में उन की आग की तरह दहकती टिप्पणियां अभी भी मन में सुलगती मिलती हैं । वैसे भी वह कहानी , उपन्यास , नाटक आदि की जगह विचार को ज़्यादा तरजीह देते रहते हैं । घर की उन की लाइब्रेरी में भी साहित्य से ज़्यादा वैचारिक किताबें ज़्यादा मिलती हैं । रंगकर्मी राकेश उन्हें बुद्ध , कबीर और ग़ालिब का समुच्चय मानते हैं । राकेश ठीक ही कहते हैं । हां , यह ज़रूर है कि ग़ालिब और कबीर उन में ज़्यादा हैं । बुद्ध कम । ऐसा मेरा मानना है । राकेश ग़ालिब का एक क़िस्सा सुनाते हैं । कि ग़ालिब मस्जिद , नमाज़ , वमाज के फेर में नहीं पड़ते थे । पर एक बार शराब का टोटा पड़ा तो वह नमाज़ के लिए मस्जिद गए । अभी वजू कर ही रहे थे कि उन का एक साथी उन्हें पुकारते हुए , बोतल दिखाते हुए बोला कि , ग़ालिब साहब , ले आया हूं ! ग़ालिब बिना नमाज़ के लौटने लगे तो मौलवी ने टोका कि बिना नमाज़ के क्यों जा रहे हैं ? ग़ालिब बोले , जब वजू में ही क़ुबूल हो गई तो नमाज़ का क्या करना ! और मस्जिद से बाहर आ गए । मुद्रा के साथ भी यह सब है । मुद्रा के साथ रस-रंजन के भी कई क़िस्से हैं । लेकिन अभी एक ताज़ा क़िस्सा सुनिए । कथाक्रम में डिनर की रात शैलेंद्र सागर ने मुद्रा को घर पहुंचाने का जिम्मा मुझ पर डाल दिया । मैं ने सहर्ष स्वीकार लिया । अब हम दुर्विजय गंज की गलियों में भटक गए । मुद्रा जी भी अपनी गली नहीं पहचान पा रहे थे । भटकते-भटकते हम लोग मोती नगर की गलियों में बड़ी देर तक घूमते रहे । खैर किसी तरह पहुंचे 78 दुर्विजय गंज । अब दूसरे दिन भी लंच के बाद शैलेंद्र सागर ने फिर मुझे मुद्रा जी को घर पहुंचाने का जिम्मा दे दिया । मैं अचकचाया । उन्हें रात का क़िस्सा बयान किया । और बताया कि कल तो रात थी , अब दिन है , कार को बैक करने मोड़ने में भीड़ के कारण मुश्किल होगी । गलियां पतली हैं । शैलेंद्र सागर नहीं माने । एक सहयोगी ज़रुर साथ दे दिया । मदद के लिए । कि अगर घर तक कार न भी पहुंच पाए तो यह सहयोगी घर तक मुद्रा को पहुंचा देगा । अब यूनिवर्सिटी पेट्रोल  पंप पर पेट्रोल डलवाते समय मुद्रा ने उस सहयोगी से कुछ कहा । कहा कि पुल पार करते ही बाईं तरफ दुकान है । अब पुल पार करते ही उन्हों ने रुकने को कहा । मैं रुक गया । अब वह सहयोगी कार से उतरने को तैयार नहीं हो रहा था । मुद्रा बुदबुदाते हुए ह्विस्की की बात कर रहे थे । मैं ह्विस्की को बिस्किट सुन रहा था । मैं ने कहा भी कि आगे भी बहुत दुकानें मिलेंगी । मुद्रा बोले , यहीं ठीक रहेगा ।  मैं ने कहा कि कोई खास ब्रांड का बिस्किट है क्या ? साथ में एक कवियत्री भी थीं । वह बोलीं , बिस्किट नहीं , ह्विस्की कह रहे हैं । तब मैं अचकचाया । उस सहयोगी का कहना था कि मेरे गांव का या कोई परिचित देख लेगा तो क्या कहेगा ? और उस ने शराब की दुकान पर ह्विस्की लेने जाने से साफ इंकार कर दिया । मैं शराब आदि कभी ख़रीदता नहीं । सो मैं ने भी मना कर दिया । रास्ते में मुद्रा लगातार कहते  रहे अब तुम  मेरे दोस्त नहीं रहे । बुदबुदाते रहे , तुम कितने अच्छे दोस्त थे । लेकिन अब दोस्त नहीं रहे । आदि-आदि । मैं चुपचाप सुनता रहा । खैर इतवार होने के नाते बहुत भीड़ नहीं थी । सो कार कहीं फंसी नहीं । उन के घर आराम से पहुंच गए हम लोग । मुद्रा को कार से उतार कर उन के घर में दाखिल करते हुए  लगभग उन से माफ़ी मांगते  हुए कहा कि  माफ़ कीजिए , आप की फरमाइश पूरी नहीं कर पाया । मुद्रा ने मेरी पूरी बात सुने बिना कहा कोई माफ़ी नहीं , मुझे आग्नेय नेत्रों से देखा और फिर दुहराया कि अब तुम मेरे दोस्त नहीं रहे , भाग जाओ ! और घर में अकेले घुस गए । बाद में उन कवियत्री ने शिकायत भी की थी क़ि ऐसा कुछ हो सकने की संभावना थी तो आप मुझे पहले ही बता देते । मै कैसे भी आ जाती ? मैं ने उन से कहा अब यह सब मुझे भी कहां पता था ? लेकिन कल जब मुद्रा जी अपनों के बीच कार्यक्रम में वह मिले तो लपक कर गले लगा लिया मुझे । वैसे ही बच्चों की तरह निश्छल हंसी में मुदित । सर्वदा की तरह । 

कल उन के  जन्म-दिन की पूर्व संध्या पर यह कार्यक्रम सचमुच मुद्रा जी के लिए ही नहीं , लखनऊ के लिए भी सौभाग्य बन कर आया । जिस तरह तमाम लेखक , रंगकर्मी मुद्रा जी से सारे भेद-मतभेद बुला कर इकट्ठा हुए वह बहुत ही सैल्यूटिंग है । पूरा कार्यक्रम सब को ही इतना भावुक कर देने वाला था कि पूछिए मत । धाराप्रवाह बोलने वाले , बोलने में हरदम कठोर रहने वाले मुद्रा कल किसी मोमबत्ती की तरह पिघलते रहे , किसी बर्फ़ की सिल्ली की तरह गल-गल कर बहते रहे भावनाओं में । इतना कि जब उन के बोलने का समय आया तो वह ठीक से बोल नहीं पाए । कहा भी कई बार कि मैं आज ठीक से बोल नहीं पा रहा । लोगों ने समझा कि अस्वस्थता के कारण , कमजोर हो जाने के कारण वह नहीं बोल पा रहे । लेकिन सच यह नहीं था । सच यह था कि वह बहुत भावुक हो गए थे अपने सम्मान में बिछे सब को देख कर । इतना अपनत्व पा कर । अब तक उपेक्षित चले आ रहे व्यक्ति को अगर समूचा लखनऊ एक साथ सैल्यूट करने उतर आया हो तो कोई भी हो  , भले ही वह मुद्राराक्षस जैसा बाग़ी ही क्यों न हो , भावुक तो हो ही जाएगा । वह तो मुद्राराक्षस थे , उन की जगह जो कोई और होता तो वह मारे ख़ुशी के विह्वल हो कर रो पड़ता । सच मुद्रा को मैं ने जाने कितनी गरमी , बरसात , जाड़ा भोगते देखा है । जाने कितने संघर्ष , जीते-मरते और लड़ते देखा है । पर जितना भावुक होते कल उन्हें देखा है , कभी नहीं देखा । इस तरह तो नहीं ही देखा । एक बाग़ी भी भावुक हो सकता है , फिल्मों में तो बहुत बार देखा है , जीवन में पहली बार कल देखा है । हिंदी जगत के इस चंबल के बाग़ी को बयासी बरस का होने पर बहुत बधाई , बहुत प्रणाम ! वह शतायु हों , सकारात्मक विचार और जीवन जीएं अपने समूचे बागीपन के साथ यही कामना है ।

राजीव मिश्र की बनाई मुद्राराक्षस की पेंटिंग

मुद्राराक्षस की यह विभिन्न छवियां उन के बेटे रोमेल मुद्राराक्षस के सौजन्य से  


Wednesday, 10 June 2015

ऋषितुल्य , तपस्वी दिवाकर त्रिपाठी से मिलना


दिवाकर त्रिपाठी के साथ मैं

प्रशासनिक अधिकारी दिवाकर त्रिपाठी लखनऊ के विकास की सांस-सांस में उपस्थित हैं। विभिन्न विभागों की अपनी सेवा में कोई पैतीस साल लखनऊ में ही उन्हों ने गुज़ारे हैं। नया लखनऊ बनाने में उन का बहुत योगदान है । दिवाकर त्रिपाठी के लिए निःसंकोच कहा जा सकता है कि हम फ़िदाए लखनऊ , लखनऊ हम पर फ़िदा ! वह सिटी मजिस्ट्रेट रहे हों , नगर निगम में रहे हों , लखनऊ विकास प्राधिकरण या सूडा में , उत्तर प्रदेश पर्यटन में या ए डी एम सिटी रहे हों , ए डी एम सिविल सप्लाई , डिप्टी लेबर कमिश्नर रहे हों या सचिवालय में शासन के किसी विभाग में विशेष सचिव या सचिव , लखनऊ के लिए निरंतर काम करते रहे हैं। लखनऊ विकास प्राधिकरण में तो उन का दो बार का कार्यकाल बहुत ही सैल्यूटिंग रहा है । गोमती नगर में विकास प्राधिकरण का नया कार्यालय , गोमती नगर विस्तार , इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान, रमा बाई मैदान , अंबेडकर  स्मारक ,  अंबेडकर पार्क, कांशीराम पार्क आदि जैसे तमाम उपक्रम दिवाकर त्रिपाठी की ही प्लैंनिग और निर्माण का नतीज़ा हैं । यहां तक कि गोमती नगर का गांधी सेतु भी दिवाकर त्रिपाठी ने बनवाया और प्राधिकरण का नाम रोशन किया। बिना किसी विवाद या जांच के,  बिना किसी कालिख के पूरी नौकरी कर लेना आसान नहीं होता। दिवाकर त्रिपाठी ऐसे ही दुर्लभ प्रशासनिक अधिकारी हैं जिन्हों ने बिना किसी कालिख के प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों का सरलता पूर्वक निर्वहन किया है। अवकाश प्राप्ति के बाद भी वह दो साल एक्सटेंसन पा कर बतौर ओ एस डी काम करते रहे थे। अभी भी एक मंत्री उन्हें बार-बार बुलाते रहते हैं । पर उन्हों ने दैनंदिन नौकरी से अब हाथ जोड़ लिया है । अब वह पूरी तरह अवकाश प्राप्त हैं, हनुमान भक्ति में लीन हैं । लेकिन लखनऊ की 100 किलोमीटर की आऊटर  रिंग रोड और नए लखनऊ के विकास का मानचित्र फिर से बनाने की ज़रूरत पड़ी तो लोगों को फिर दिवाकर त्रिपाठी की याद आई। और उन्हें ही इस की ज़िम्मेदारी सौपी गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने । उन्हों ने तय समय में पूरी योजना बना कर दे भी दी । दरअसल किसी योजना को बनाना , उस को इम्प्लीमेंट करना किसी को सीखना और देखना हो तो दिवाकर त्रिपाठी एक मिसाल हैं । वैसे भी प्रशासनिक काम-काज को ले कर दिवाकर त्रिपाठी के पास एक से एक नायाब क़िस्से हैं किसिम-किसिम के। दिलचस्प और दुर्लभ क़िस्सों का खज़ाना । राजनीतिक , प्रशासनिक और सामान्य जन के भी । वह जब मूड में होते हैं तो पूरा रस ले-ले कर सुनाते हैं । लोगों के नाम ले-ले कर ।

दिवाकर त्रिपाठी के साथ मैं , मेरी छोटी बेटी पुरवा और पत्नी

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र से भी प्रशासनिक बारीकी सीखने वाले दिवाकर त्रिपाठी हनुमान भक्त भी बहुत बड़े हैं। लखनऊ में अगर वह हैं तो हनुमान सेतु मंदिर पहुंच कर पूजा अर्चना करना उन का अनिवार्य जीवन है। चाहे जैसे हों , जिस भी पद पर वह रहे हों , कितना भी व्यस्त रहे हों , हनुमान सेतु मंदिर वह रोज ही जाते रहे । आज भी नियमित जाते ही हैं । बीते पैतीस सालों से उन का यह क्रम कभी टूटा नहीं है , आगे भी भला क्या टूटेगा ! अब तो वह जैसे इस हनुमान मंदिर के लिए ही जीते हैं। आप हनुमान मंदिर अगर जाएंगे तो वह कोई साधारण काम भी करते दिख सकते हैं , वहां की सफाई जैसे काम भी , जूठे पत्तल अदि उठाते भी देख सकते हैं। और जो इस हनुमान मंदिर का नवीनीकरण और इस का बदला स्वरूप , बदली व्यवस्था आप को अच्छी लगे तो आप एक बार दिवाकर त्रिपाठी को ज़रुर याद कर लीजिए । यह सब उन का ही किया-धरा है। लखनऊ का विकास और हनुमान भक्ति जैसे उन की सांस है , उन की आत्मा है । यह मेरा सौभाग्य ही है कि बीते तीस बरस से मैं भी उन का मित्र हूं। मेरे हर दुःख सुख में वह बहुत ही विनय पूर्वक उपस्थित मिलते हैं , ऐसे जैसे मुझे सांस दे रहे हों। मैं किसी भी संकट में पडूं, बिना कोई एहसान जताए, मुझे वह उबार लेते हैं। वह हैं ही ऐसे । और सब के ही साथ । वह चुपचाप आप का काम भी कर देते हैं और शो ऐसे करते हैं गोया वह काम करने को कह कर आप ने ही उन पर कोई एहसान कर दिया हो । उन की यही विनयशीलता उन्हें हर किसी से अलग कर देती है । और मैं ही क्यों मेरा पूरा परिवार ही, मेरे सारे छोटे भाई भी उन की कृपा और स्नेह की अनमोल डोर में बंधे हुए हैं । और कि शायद लखनऊ में अनगिन लोग उन की कृपा और स्नेह की अनमोल डोर में बंधे आप को मिल जाएंगे । वह हैं ही ऐसे । सागर की तरह सब को अपने प्यार , स्नेह और सेवा में समोते हुए । जैसे वह कोई व्यक्ति नहीं धरती हों , सब को शरण देते हुए । जैसे कोई वृक्ष हों , सब को एक समान छांव देते हुए । जैसे कोई सूरज हों ,सब को रौशनी देते हुए। जैसे कोई चंद्रमा हों ,सब को शीतलता देते हुए । बिना किसी से कोई अपेक्षा किए सब को ही तथास्तु कहते हुए , कोई ऋषि हों जैसे। सच वह ऋषितुल्य ही हैं, मेरी नज़र में। असाधारण तपस्वी। मैं ने उन्हें किसी जायज काम के लिए कभी किसी को नहीं कहते या करते देखा । काम चाहे जितना भी पेचीदा हो , अगर जायज है तो वह बिना समय गंवाए हां कर देते रहे हैं । मैं ने उन से एक बार कहा भी कि,  'अच्छा हुआ कि ईश्वर या प्रकृति ने आप को स्त्री नहीं बनाया ।' वह ज़रा चौंके और किंचित मुस्कुराए और बोले, 'क्यों ?' मैं ने कहा , ' नहीं सर्वदा आप के पांव भारी रहते , क्यों कि आप तो किसी को न करना जानते ही नहीं । ' वह हंसने लगे । कहने लगे कि, ' लेकिन मेरे पांव कभी थकते नहीं किसी का काम करने के लिए ।' और सच तमाम अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की तरह वह टाल -मटोल नहीं करते मिले कभी भी । उन से तो कोई मूंगफली वाला , कोई ठेले वाला , खोमचे वाला , निर्बल , दबा-कुचला भी बेरोक-टोक मिल सकता था । मिलता ही था । और वह उस की पीड़ा , उस की तकलीफ से भरसक उबार भी ज़रूर लेते थे । बहुत कम अधिकारी होते हैं जिन्हें जनता अपना हमदर्द समझ कर उन के पास जाती है । उन को नाम से जानती है । उन को पहचानती है और अपना मानती है । उस के कहे को आंख बंद कर मान भी लेती है । दिवाकर त्रिपाठी ऐसे ही अनमोल और दुर्लभ प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं । 

रास्ते चलते भी अगर उन्हें कोई आवेदन ले कर मिल जाए तो वह बिना किसी हिच के फौरन निस्तारित कर देते बार-बार दिखे हैं । वह चाहे कोई परिचित हो या अपरिचित । इस से उन को फ़र्क़ नहीं पड़ता । अनिल कपूर अभिनीत फ़िल्म नायक में जैसे एक दिन का मुख्यमंत्री रास्ते चलते आदेश जारी करता दीखता है , कुछ-कुछ वैसे ही । दिवाकर त्रिपाठी अगर किसी मीटिंग में न हों तो उन के कार्यालय का कमरा हर किसी सामान्य जन के लिए सर्वदा खुला मिलता । ऐसे जैसे जनता दरबार लगा हो , ऐसी भीड़ उन के कमरे में सर्वदा उपस्थित मिलती । किसी राजनीतिज्ञ के जनता दरबार में क्या भीड़ होती होगी , जैसी दिवाकर त्रिपाठी के कार्यालय में मैं ने देखी है । बारंबार देखी है इस लिए भी कि वह कभी किसी को निराश नहीं करते थे । लोग-बाग़ बड़ी उम्मीद से उन के पास पहुंचते थे । लोगों की उम्मीद पूरी भी होती थी । तभी तो भीड़ पहुंचती थी उन के पास । कभी कभार यह भी हो सकता था कि प्रशासनिक पेचीदगियों के कारण आप का काम भले न हो पाए पर आप दिवाकर त्रिपाठी से नाराज फिर भी नहीं हो सकते थे। क्यों कि उन के सदप्रयास में आप को कभी कोई कमी नहीं दिखती थी । दिवाकर त्रिपाठी के काम काज को ले कर , उन की सदाशयता को ले कर इतने सारे क़िस्से हैं , इतनी सारी नज़ीरें हैं कि उन को वर्णित करने के लिए कोई क़िताब भी कम पड़ जाए । और मैं तो जैसे उन का चिर ऋणी हूं ही । 

दिवाकर त्रिपाठी के साथ बेटा उत्सव और मैं

सच यह कहने में मुझे एक पैसे का भी संकोच नहीं है कि अगर बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखते हुए भी लखनऊ में मैं इतने समय तक रह गया हूं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक दिवाकर त्रिपाठी के कारण। यही दिवाकर त्रिपाठी अभी एक पारिवारिक पार्टी में मिल गए । लखनऊ में हमारे ऐसे ही दुःख-सुख के साथी एक और मित्र हैं असित चतुर्वेदी जो हाईकोर्ट में मशहूर वकील हैं , बीते दिनों हाईकोर्ट में वह सीनियर एडवोकेट का दर्जा पा गए हैं । इसी ख़ुशी में आयोजित पार्टी में दिवाकर त्रिपाठी भी उपस्थित थे अपनी सादगी, विनम्रता, कृतज्ञता और स्नेह की उसी अनमोल डोर के साथ । कुछ चित्र दिवाकर त्रिपाठी के साथ :

एक और चित्र

और एक यह सेल्फ़ी भी

Monday, 8 June 2015

लोक संस्कृति , बाज़ारवाद और राजनीति की संघर्षगाथा

 राजकुमार 


दयानंद पांडेय ने अपने नवीनतम उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं’ में एक कलावंत ‘मोहना’ यानी ‘लोक कवि’ को रचना का विषय बनाया है। पिछले कुछ वर्षों में हिंदी में ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी लोक कलाकारों को रचना का विषय बनाया गया है। मराठी उपन्यासकार आनंद यादव ने ‘नटरंग’ उपन्यास में लोक कलाकार ‘गुनवत’ को, संजीव ने ‘सूत्राधार’ उपन्यास में ‘भिखारी ठाकुर’ को, मंगलेश डबराल ने ‘आवाज भी एक जगह है’ कविता-संग्रह में ‘केशव अनुरागी’ समेत अनेक कलाकारों को रचना का विषय बनाया है। इस कड़ी में अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी समेत और भी लेखकों के नाम गिनाए जा सकते हैं। अब सवाल उठता है कि यह साहित्यिक फैशन बन गया है, कोई ट्रेंड चल गया है या किसी संकट का सूचक है। क्या होरी, शेखर, कालीचरण, बाबनदास सरीखे औपन्यासिक पात्रों की जरूरत खत्म हो गयी या इस तरह के पात्र अप्रासंगिक हो गये हैं जो ‘कलावंतों’ को रचना का विषय बनाया जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है ? यह ‘क्यों’ एक साथ अनेक सवालों को पैदा करता है। मसलन क्या साहित्य की रचनात्मक ऊर्जा का हृास हो रहा है जो वह कला के ही दूसरे माध्यम, रूप और शिल्प को रचना का विषय बना रहा है ? या फिर साहित्य और भाषा के लेखकों का कला-प्रेम उमड़ा पड़ा और उनकी चेतना का विस्तार हो गया है ? या फिर यह समाज के बदल जाने का सूचक है ? ध्यान देने की बात है कि लोक संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य आदि के गायक, उन्नायक और निर्माता ये सभी पात्र-गुनवंत, भिखारी, केशव अनुरागी और मोहना निम्न जाति से संबंधित हैं। कहीं ये सामाजिक-राजनीतिक चेतना में आये बदलाव के सूचक तो नहीं हैं ? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं है कि इन ‘कलावंतों’ के माध्यम से आज भारतीय सभ्यता और संस्कृति के ठेकेदार बन चुके फासीवादी ताकतों को चुनौती दिया जा रहा है ? ये सवाल निश्चित रूप से सामाज शास्त्रीय अध्ययन की मांग करते हैं। अगर इन सवालों की तफसील दयानंद पांडेय के उपन्यास ‘लोक कवि अब गाते नहीं’ में किया जाए तो लेखक का सारा विमर्श उघड़ जाता है।

पांडेय के यहां ‘कलावंत’ का विषय बनना महज पात्र या विषय का बदलना नहीं है बल्कि इसके माध्यम से नये विमर्श पैदा करना है, नयी चुनौतियों एवं संकटों का सामना करना है, बिखर रहे समाज का चित्र खींचना है और एक तरह से कलावंत की त्रासदी, पीड़ा एवं संघर्ष की गाथा लिखना है। पांडेय का लेखक भूमंडलीकरण, बाजारवाद, बांझ हो चुकी राजनीति, कानून व्यवस्था और समाज के भीतर आंतरिक उपनिवेशवाद कायम रखने वाली शक्तिशाली संस्था व संरचना जातिवाद/वर्णवाद से टकराता है। समाज की यह संस्थाएं एवं संरचनाएं इतनी ताकतवर है कि यह ‘पैराडाइम शिफ्ट’ भी उसके सामने लाचार नजर आता है।

पांडेय ने भी इस उपन्यास में दिखाया है कि बाजार की ताकत के  सामने सब बौने पड़े जाते हैं। ‘लोक’ में भी यह क्षमता नहीं है कि वह बाजार का मुकाबला कर सके। ‘लोक’ की ताकत एकजुटता में है लेकिन भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद का जहर इस एकजुटता में बाधक हैं ऊपर से भ्रष्ट अवसरवादी, अतार्किक राजनीति के पास भी कोई योजना इनसे लड़ने की नहीं है। तब तो पराजय निश्चित है। लेखक ने इस उपन्यास में ‘लोक कवि’ की पराजय दिखा कर इसे साबित भी किया है।

पांडेय दिखाते हैं कि गांव का निर्धन, पिछड़ी जाति का गली-गूची में चंग बजाने वाला मोहना अनथक संघर्ष कर लोकगीतों को स्वर देता है। धाना के प्रेम में वशीभूत होकर ‘आव चली ददरी क मेला, आ हो धाना’ गाने वाला मोहना गांव में सामाजिक कुप्रथाओं, सामंती व्यवहारों, जमींदारी अत्याचारों और गरीबों को बंधुआ बनाने की साजिश के खिलाफ गीत लिखता और गाता है। मार भी खाता है लेकिन गायकी नहीं छोड़ता है। धीरे-धीरे वह अपनी गायकी से ‘फेमस’ होने लगता है। फिर एक कम्युनिस्ट नेता इलेक्शन में उसकी गायन कला का राजनीतिक इस्तेमाल करता है। जीतने के बाद वह मोहना को लखनऊ ले आता है और उसका नया नामकरण करता है- ‘लोक कवि’।

‘लखनऊ लोक कवि के लिए नयी जमीन थी। अपरिचित और अनजानी। चौतरफा संघर्ष उनकी राह देख रहा था।’ लेकिन लोक कवि ‘रइ-रइ-रइ-रइ’ गुहार कर अवधी की जमीन पर भोजपुरी में कहरवा सुनाने लगा और भोजपुरी लोक गीत, लोक संगीत, लोक भाषा, लोक नृत्य को शिखर पर पहुंचा दिया। पारंपरिक धुनों, छंदों को जोड़-घटा कर नया बनाता साथ ही सोहर, गारी, कजरी, लचारी भी निराले ढंग से गाता। धीरे-धीरे उस की ख्याति लखनऊ की ज़मीन छोड़ कर बिहार तक फैल गयी। उसके कैसेट रिलीज जुए तो हिंदी प्रांतों की सीमा भी टूटने लगी। इस प्रसिद्धि को राजनीति ने भी ‘कैस’ करना शुरू कर दिया और लोक कवि ने भी। इस क्रम में राजनीति और कला ने एक-दूसरे की शक्ल बिगाड़ दी।

गरज यह कि लोक कवि कला से निकल कर बाजार का रुख कर रहे थे। बाजार को समझ-तौल रहे थे। बाजार भी लोक कवि को तौल रहा था। इसी तौल में वह समझ गये कि अब सिर्फ पारंपरिक गाने और बिरहा के बूते बाजार में नहीं टिका जा सकता। सो लोक कवि ने पैंतरा बदला। पहले लोकगीतों की मिक्सिंग की, फिर डबल मीनिंग गानों का घालमेल किया। डबल मीनिंग गानों ने बाजार में ऐसा चढ़ाया कि बड़े-बड़े गायक पीछे छूट गये लीेकिन बाजार ने उनके ‘लोक कवि’ की छवि को भी झुलसा दिया। मार्केट से गायब होने के डर से लोक कवि ने बाजार का इस्तेमाल किया और उसने ‘बिरहा पार्टी’ को ‘म्यूजिकल पार्टी’ फिर ‘आर्केस्ट्रा पार्टी’ में तब्दील कर दिया। साथ ही उसमें लड़कियों की इंट्री अंग्रेजी भाषा के साथ कर दी। ऐसा नहीं है कि लोक कवि इसे नहीं समझते थे लेकिन बाजार की ताकत और दर्शकों की पतनशील अभिरुचियों के सामने विवश थे- ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला।’ बाजार ने एक तरफ लोक कवि को ‘पैसा’ और ‘प्रसिद्धि’ दिया तो दूसरी तरफ लोक संस्कृति, लोक भाषा, लोक परंपरा, लोक गीत, लोक नृत्य, लोक संगीत, आदर्श, मूल्य और नैतिकता सबका गला घोट दिया। उसकी आदर्श, मूल्य और नैतिकता सबका गला घोंट दिया। उसकी शक्ल बिगाड़ दी। अस्तित्व मिटा दिया। बाजारू ‘टोटका’ अपनाने वाले लोक कवि ऐय्याशी के गर्त में ऐसे गिरे की फिर नहीं निकल पाये। बाजार के दलदल में धंसे तो धंसे रह गये। शराब, तानाशाही, ग्रुप सेक्स स्थायी आदत बन गयी।

उपकथा के माध्यम से पांडेय ने गांव की विद्रूपता को ठकुराइन और गणेश तिवारी के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है। जातिवाद के रंग को भी लेखक ने दिखाया है। गांव में पंडित जी के सामने भोजपुरी के शिखर गायक लोक कवि की हैसियत महज ‘नचनिया पदनिया’ से अधिक नहीं है। लोक कवि गांव में लड़कियों का दलाल भी माना जाता है। उजड्ड, कलाहीन, अ-संस्कारी समाज भी उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है। यह कलाकार की त्रासदी की कथा को कहता है।

इस उपन्यास में सबसे अधिक शोषित पात्र महिलाएं हैं। इसमें अनेक तरह की महिला पात्र हैं और सभी किसी न किसी रूप में शोषित हैं। पत्नी, बेटी, बहू, रखैल, कलाकार हर रूप में चाहे वह शहर की हों या गांव की सभी शोषित है। पांडेय के लेखक ने भोजपुरी भाषा और उसकी अस्मिता के संकट का सवाल उठा कर जहां उपन्यास को राजनीतिक आयाम दिया है वहीं लोक कवि की पीड़ा, दुःख को भी दिखाया है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि उपन्यास में बाजारवाद के सामने लोक कला की त्रासदी पाठकों को दृष्टि देने वाली है।

[ राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ]



समीक्ष्य पुस्तक :
 लोक कवि अब गाते नहीं
पृष्ठ सं.184
मूल्य-200 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2003


सामाजिक सरोकार के बावजूद

 धनंजय कुमार 
आज के उपभोक्तावादी समय में निःसंदेह बाहरी चमक-दमक और अर्थ (कीमत) को अधिक महत्व देने तथा अपने खाल में ही सिमटते जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐसे में पत्राकारिता के दायित्व का यथासंभव ईमानदारीपूर्ण निर्वाह और उसके साथ ही आम जन के प्रति प्रतिबद्धता वाले लेखन की कोशिश निश्चय ही प्रशंसनीय कही जाएगी। परंतु इसके लिए जरूरी है कि भूमिका में दिए गये वक्तत्वयों का रचना में भी निर्वाह हो। पेशे से पत्रकार दयानंद पांडेय के नवीनतम कहानी संग्रह ‘सुंदर लड़कियों वाला शहर’ को इस दृष्टि से पढ़ना काफी रोचक है। संग्रह में कुल नौ कहानियां है। पहली कहानी जो कि संग्रह के नामकरण का आधार है, दो युवाओं विपरीत लिंगी आकर्षण और उनकी कुंठाओं का दस्तावेज है। स्त्रियों के प्रति पुरुषवादी मानसिकता को यह कहानी भलीभांति दर्शाने का प्रयास करती है। लेकिन मानसिक अवसाद को कन्विंसिंग तरीके से कहने के प्रयास में कहानी अपनी दिशा खो देती है।

संग्रह की दूसरी कहानी ‘मन्ना जल्दी आना’ निश्चित तौर पर संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी है, जिसमें अब्दुल मन्नान को अचानक पाकिस्तानी घोषित कर देश निकाले का हुक्म थमा दिया जाता है। अपनी जमी-जमायी गृहस्थी और रोजगार से बेदखल होने तथा अपनों से बिछुड़ने का दर्द और संघर्ष इस कहानी को मजबूत जमीन देते हैं। ‘बड़की दी का यक्ष प्रश्न’ में आज के बेरहम होते समाज में रिश्ते के ऊपर भारी पड़ते जायदाद के मोह का बयान है। ‘प्लाजा’ कहानी दफ्तरी जिंदगी की खट-पट, प्रबंधन के तानाशाही रवैये और यूनियन के लोगों की स्वार्थ केंद्रित तोलमोल की भावना को स्पष्ट करती है, हालांकि यह कहानी अपने कमजोर शिल्प के कारण बिखर-सी गयी है।

सामंतवाद को खत्म कर देने की उद्घोषणाएं भले ही कागजों पर बार-बार हो चुकी हैं, लेकिन असलियत तो यही है कि आजादी के लगभग छह दशकों में भी इसका मानसिक प्रभाव खत्म नहीं हो पाया। यहां औरत आज भी बच्चा पैदा करने की मशीन मात्रा है। एक मशीन सफल न हो तो दूसरी ले आओ। दिखावे की जिंदगी जहां कमाई भले न हो खर्च तो होंगे ही, बाहरी दिखावों के चोंचले रहेंगे ही- यही सब कुछ आधार है कहानी ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ का। यहां प्रदर्शन है, झूठ है, दगा है, अवैध संबंध हैं, खस्ताहाली के बावजूद हाथ से काम न करने का ‘बड़कापन’ है, यानी वह सब कुछ है जो आज भी हमारे गांवों में पतनशील सामंती अवशेषों के खंडहरों के सबूत हैं।

राजनीति आज के समाज का ऐसा विषय है, जिसकी चर्चा के बिना अभिव्यक्ति का पूरा होना असंभव है सो इस संग्रह में काफी राजनीति भी है। ‘मन्ना जल्दी आना’, ‘भूचाल’, ‘प्लाजा’, ‘मुजरिम चांद ओर देह-दंश आदि कहानियों में अलग-अलग शेड्स में राजनीति देखने लायक है। यहां राजनीति हो वहां भ्रष्टचार, भाई-भतीजावाद, अपराध और अवैध संबंध की बात न हो तो संदर्भ पूरा नहीं होता। राजनीति के इसी बियावान और काजल की कोठरी को चित्रित करने का प्रयास करती है संग्रह की अंतिम कहानी ‘देह-दंश’। इस कहानी में राजनीति और देह के अंतर्गुफित साहचर्य को लेखक ने सामने रखा है।

हालांकि अत्यधिक प्रतीकात्मकता और दर्शन बघारने के चक्कर में यह कहानी भी पटरी से उतरती जान पड़ती है। राजनीतिज्ञों और अफसरशाही के आपसी संबंधों और अफसरों को चमचागिरी तथा उनकी कार्यशैली को ‘मुजरिम चांद’ कहानी ने सजीव कर दिया है।

इसमें भूलवश नेचुरल कॉल के लिए राज्यपाल के टॉयलेट में प्रवेश करने का खमियाजा एक वरिष्ठ पत्रकार को दिन भर की पुलिस हिरासत और अपमानजनक पुलिसिया व्यवहार के रूप में भुगतना पड़ता है। ‘फोन पर फ्लर्ट’ कहानी आज के शहरी जीवन की नैतिकता को प्रश्नों के घेरे में ला खड़ा करती है। वहीं ‘भूचाल’ संग्रह की सबसे कमजोर कहानी है जिसका अभिप्राय ही स्पष्ट नहीं हो पाता। संग्रह की कहानियों के विषय निश्चित तौर पर ‘सामाजिक सरोकारों से युक्त कहे जा सकते हैं, लेकिन अधिकांश कहानियों से खुलेपन के चक्कर में ऐसे शब्द तथा वाक्य धड़ल्ले से प्रयुक्त हुए हैं जो अश्लीलता की हद तक पहुंच जाते हैं। वैसे भी आज के दौर में ‘अकहानी’ के दौर की कहानियों के ट्रेंड पर कहानी लिखने को सही नहीं ठहराया जा सकता हैं। जाहिर है, सिर्फ सार्थक विषय चयन ही पर्याप्त नहीं होता, उसका शिल्प और विधागत निर्वाह भी उतना ही जरूरी है।

[ राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ] 

समीक्ष्य पुस्तक :
सुंदर लड़कियों वाला शहर
पृष्ठ-192
मूल्य-200 रुप॔ए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2003

पहचाना संसार


नवनीत मिश्र 

इस संग्रह की कहानियों से गुजरना अपने आसपास की उस दुनिया से गुजरना है, जो या तो हमारे जीवनानुभव का हिस्सा रह चुकी होती है या जो परानुभूत के दायरे से निकल स्वानुभूत हो जाती है। दयानंद पांडेय के कथा-चरित्र क्रांति का परचम उठाए नकली पात्र नहीं हैं, वे हाड़-मांस से बने साधारण मनुष्य हैं जिनकी पीड़ाएं और जीवन व्यापार सामान्य लोगों जैसे हैं। ये पात्र दिखने में सामान्य लग सकते हैं लेकिन इनकी पीड़ा से उपजे सवाल सामान्य नहीं हैं। पांडेय का रचना संसार हमें अपने आसपास के संसार का स्मरण कराता चलता है, यही उनकी विशेषता है।

शीर्षक कहानी समाज में विधवाओं की स्थिति पर कई प्रश्न उठाती है, तो ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ सामंती जीवन की रस्सी के जल चुकने के बाद भी बाकी बची रह गई ऐंठन को रूपायित करती है। ‘देह दंश’ राजनीति की शतरंज का ही उद्घाटन नहीं करती, बाजी जीतने के लिए खेले जाने वाले खेलों को भी परत-दर-परत खोलती है। ‘प्लाजा’ कहानी मैनेजमेंट, कर्मचारी यूनियन और कर्मचारियों के बीच चलने वाली सौदेबाजी और उठापटक के जरिए मजदूर नेताओं के नकाब खोलती है। ‘मुजरिम चांद’ पुलिस तंत्र की उस जड़ता की कहानी है जिससे किसी प्रकार की समझदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। पिता-पुत्रा को संवादहीनता की कहानी ‘संवाद’ की स्थितियां और उनके बीच व्याप्त जड़ता के कारण थोड़ा और स्पष्ट रूप से सामने आ पाते तो पत्र लेखन शैली की यह कहानी और भी मार्मिक बन जाती। ‘मेड़ की दूब’ गांव में सूखे की कथा है।

संग्रह में ‘प्रतिनायक मैं’, ‘सुंदर भ्रम’, ‘वक्रता’ जैसे कहानियां भी हैं जो कथाकार की उस उम्र में लिखी गई जान पड़ती हैं जब हर घटना, हर विचार कहानी का प्लॉट लगता है। और अंत में ‘फोन पर फ्लर्ट....’ क्या जरूरी है कि लेखक अपने हर जीवनानुभव को कहानियों में ढाले ही।

[ इंडिया टुडे में प्रकाशित ]


समीक्ष्य पुस्तक :

 बड़की दी का यक्ष प्रश्न
पृष्ठ- 175
मूल्य-175 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2000

स्थान बनाती कहानियां


 वीरेंद्र सारंग 

दयानंद पांडेय नए कथाकार नहीं हैं। चार उपन्यास और इतने ही कहानी संग्रह उनके प्रकाशित हो चुके हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘सुमि का स्पेस’ पांचवां संग्रह हैं इस संग्रह की कई कहानियां पूर्व के संग्रहों में भी आ चुकी हैं। बावजूद इसके कहानियां बरबस ध्यान खींचती हैं और एक-एक शब्द पढ़ाए बिना मानती नहीं। 

दयानंद पांडेय की कहानियों की खूबी है कि यह कोई विचार नहीं लादतीं। एक कथा चलती है और एक संवाद होता है, जो टूटता नहीं। संवादों में कंजूसी नहीं है, पाठक खूब बतियाता रहता हैं कारण यह कि पात्र पाठक के साथ चलता है। आधुनिक दबाव और खुलेपन के बीच एक किस्म की छटपटाहट है। आज सब  कुछ बदल गया है चाहे हमारी परम्परा हो या सोच ‘सुमि का स्पेस’ इस दायरे में भी देखा जा सकता हैं कहानियों में पात्रों की अपनी-अपनी कठिनाइयां हैं, संघर्ष और समस्याएं हैं। चाहे ‘सुमि का स्पेस’ हो, या ‘मैत्रेयी की मुश्किलें।’

दयानंद भावुकता और समर्पण में जीते हैं- ‘वह ऐसे समर्पित होती हैं जैसे पानी नदी को और नदी सागर को।’ वह कहानी की पौराणिक कथा से जोड़कर संवेदना का सतर बनाते हैं। ‘मन्ना जल्दी आना’ और ‘संवाद’ अच्छी कहानी है जहां सम्बन्धों का संघर्ष हैं एक मानसिक प्रकरण है जहां नई जमीन दिखाई देती है। ‘मुजरिम चांद’ की अपनी जमीन है तो ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ के व्यवहार को समझने की जरूरत है। यहां व्यवहार के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। संघर्ष, संवाद और चेतना के स्तर पर दयानंद पांडेय अपने चरित्रों को समझने की खूब क्षमता रखते हैं। ‘मेड़ की दूब’ में पात्र गांव छोड़ना नहीं चाहता। गांव के संस्कार बरबस खींचते हैं।

और उसके मुंह से अंत में निकल जाता है- ‘भिनसहरा हो गया है। मां जाग गई है। शहर चलने की तैयारी में जुटी है। ....चुपचाप बैठते नहीं बनता....सोचता हूं कि अगर मैं भी शहर न जाऊ तो कैसा रहे।’

दयानंद अपने साथ घटे हुए सच को कथा-कहानी में ढालने की अद्भुत क्षमता रखते हैं चाहे वे उपन्यास लिख रहे हों या कहानी। कहानियों में एक प्रवाह है जो वर्तमान के जीवन से जुड़ता है। जिसे पढ़े बिना रहा नहीं जा सकता। शायद यही कारण है कि कहानियों की पुर्नप्रस्तुति हुई है।

[ हिंदुस्तान में प्रकाशित ]


समीक्ष्य पुस्तक :

सुमि का स्पेस
पृष्ठ-200
मूल्य-200 रुप॔ए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2006

दृष्टि की सीमा


ओम निश्‍चल

दयानंद पांडेय ने अपने उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं में एक लोक गायक के पतन की कहानी ठेठ देशज मुहावरे में लिखी है। 

उपन्यास में एक जाति का भर लोकगायक गांव से उभरता है। कुछ ही दिनों बाद एक सभा में सुन कर एक एम.एल.ए. उसे लखनऊ ले आते हैं जहां वह लोक कवि अपने मूल लक्ष्य से भटककर सत्तारूढ़ दल के प्रचार का भोंपू बन जाता है कुछ ही दिनों में सूबे के मुख्यमंत्राी से अपने संबंधों और एक पत्रकार से मैत्राी के बल पर लखटकिया पुरस्कार पाकर गांव-शहर में एक हीरो की हैसियत पा लेता है। किंतु इस बीच धीरे-धीरे उसकी मौलिकता बाजारू गवैयेपन और आर्केस्ट्रा संस्कृति की भेंट चढ़ चुकी होती है।

लखनऊ में एक रिटायर्ड चेयरमैन की छत्रछाया और एक पत्रकार के सान्निध्य से वह लोकगायन को उस अधोगति तक पहुंचा देता है जहां चेयरमैन, पत्रकार तथा लोककवि सभी संगीत मंडली की कन्याओं से अपनी दुष्ट वासनाओं को बरज नहीं पाते।

पांडेय भले ही कुछ और कहें, भोजपुरी गायकी और समाज का यह क्षरण दरअसल उपन्यासकार को तयशुदा दृष्टि और एक गायक मात्र की चरितचर्चा को केन्द्र में रखकर देखा गया क्षरण है, समाज और संस्कृति का क्षरण नहीं। बल्कि ऐसे किसी गहरे विजन का उत्खनन भी इस उपन्यास में नहीं है जिससे भाषा की संस्कृति पर मंडराते खतरे की निशानदेही की जा सके। हां, खास तरह की दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए यह उपन्यास किसी ‘अंगड़ाई लोक’ से कम नहीं।

[ आऊटलुक में प्रकाशित ]


समीक्ष्य पुस्तक :
 लोक कवि अब गाते नहीं
पृष्ठ सं.184
मूल्य-200 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2003

देह की छांह तलाशते लोक कवि


नवीन मठपाल 

लोक जीवन और शहरी जीवन का कंट्रास्ट एक साथ बांचना हो तो दयानंद पांडेय का नया उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं जरूर पढ़ना होगा। दरअसल लोक कवि अब गाते नहीं सिर्फ एक भोजपुरी गायक का संघर्ष, उत्थान और फिर पतन की गाथा भर नहीं है। भोजपुरी समाज के बहाने समूचे समाज के क्षरण की भी गाथा है। लोक जीवन में दिन-ब-दिन बदलाव और आर्केस्ट्रा में समाती जाती लोक गायकी के बहाने दयानंद पांडेय ने इस उपन्यास में कई ऐसी असंगतियों, विसंगतियों और त्रासदी के ऐसे कई तार छुए हैं जो हम सबके सामने होते हुए भी अपरिभाषित हैं। संवादों की एक बानगी देखिए-

‘अच्छा जो वह लड़की बोती है अंगरेजी में आप समझते हैं ?’

‘हां समझता हूं।’ लोक कवि बड़ी सर्द आवाज़  में बोले।

‘का ? आप अब अंगरेजी भी समझने लगे ?’ पूछने वाला भौंचकिया गया। बोला, ‘कब अंगरेजी भी पढ़ लिया लोक कवि जी आपने?’

‘कब्बो नहीं पढ़ा अंगरेजी!’ लोक कवि बोले, ‘हिंदी तो हम पढ़ नहीं पाए अंगरेजी का पढ़ेंगे?’

‘पर अभी तो आप बोल रहे थे कि अंगरेजी समझता हूं।’

‘पइसा समझता हूं’ लोक कवि बोले, ‘और ई अंगरेजी अनाउंसर ने हमारा रेट हाई कर दिया है तो ई अंगरेजी हम नहीं समझूंगा तो कवन समझेगा? (पृष्ठ 20, 22) एक संवाद और गौर करें- ‘उनका चेला मिनिस्टर उन की बात सुन कर मुस्कुराया। बोला, ‘पंडित जी, आप के पास एक साइकिल तक तो है नहीं, ये ट्रक के टायर का क्या करेंगे?’

‘पेट भरुंगा।’ त्रिपाठी जी बम-बम स्टाइल में बोले, ‘मिनिस्टर बन गए हो तो दिमाग खराब हो गया है। नहीं जानते ट्रक के टायर का क्या करुंगा ? (पृष्ठ 81)

लोक कवि अब गाते नहीं के यह और ऐसे कई संवाद, कई दृश्य बरछी की तरह घाव करते चलते हैं। कई दृश्य तो ऐसे बन पड़े हैं कि लगाता है जैसे कोई सिनेमा देख रहा हो। जैसे घटनाएं बिल्कुल सामने घट रही हों। गांवों में भी फैल रहे एड्स जैसी विपदाएं और हरिजन एक्ट के दुरुपयोग के दुर्निवार दृश्य भी लोक कवि अब गाते नहीं में पूरी ताकत से उपस्थित हैं।

न्योता खाने वाले भुल्लन पंडित और विलेज बैरिस्टर गणेश तिवारी इस उपन्यास के जीवंत चरित्रा हैं। पर इन सबसे भी ज्यादा जीवंत चरित्र हैं चेयरमैन साहब। वह चेयरमैन साहब जो लोक कवि के गार्जियन हैं और अपनी बेबाक लंपटाई के लिए कुख्यात भी। गांव में धाना और मिसराइन जैसी नायिकाएं भी हैं लोक कवि की जिंदगी में। तो मीनू जैसे ढेरों डांसरों में भी देह की छांह तलाशते लोक कवि भटकते मिलते हैं। अपने-अपने युद्ध उपन्यास के मार्फत दयानंद पांडेय कोई दो साल पहले चर्चा में आये थे। हंस में राजेन्द्र यादव ने चार पेज का संपादकीय लिखा तो जनसत्ता में राजकिशोर ने अपने कालम का विषय बनाया। यत्र तत्र समीक्षाओं, टिप्पणियों की बाढ़ सी आ गई थी। तो इस लिए कि अपने-अपने युद्ध को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में इस उपन्यास के खिलाफ कंटेप्ट आफ कोर्ट का मुकदमा दायर हो गया था। तो लोक कवि अब गाते नहीं में भी अदालती दांव पेंच तो हैं पर कंटेंप्ट आफ कोर्ट के स्वर में नहीं, यातना की आग में सने हैं।

अपने-अपने युद्ध में न्यायमूर्तियों और न्याय व्यवस्था की खबर ली गई थी, लोक कवि अब गाते नहीं में विलेज बैरिस्टरों और वकीलों की खबर ली गई है। अपने-अपने युद्ध पर एक बड़ा आरोप अश्लीलता का भी लगा था। और सारी कथा पर ‘देह’ भारी बतायी गयी थी। लोक कवि अब गाते नहीं भी देह से बरी नहीं है। पर उस घनत्व में तो नहीं हैं। हैं और फिर जरा सलीके से हैं- ‘दोनों मदमस्त पड़े रहे। एक-दूसरे को भींचते हुए। भींगते रहे सावन की तेज बौछारों में। बौछारें जब फुहारों में बदलने लगीं तो मोहन का पुरुष फिर जागा। धाना की स्त्री भी सोई हुई नहीं थी। एक देह की बारिश दूसरी देह में और घनी हो गई। और जब मोहना धाना के भीतर फिर बरसा तो धाना उसे दुलारने सी लगी।’ देह के और भी कई प्रसंग यत्र तत्र पसर पड़े हैं। पर जो बात सबसे ज्यादा छन कर सामने आती है वह है भोजपुरी भाषा और उसकी लोक गायकी के बिलाते जाने की विलाप था ही है लोक कवि अब गाते नहीं में। और आखिर में तो वह हिला कर रख देती है- फिर भोजपुरी ही क्यों ?

यह विलाप कथा तो हर किसी लोकभाषा की है। हमारी लोक भाषाएं, हमारी लोक गायकी और हमारा ‘लोक’ जिस तरह विलुप्त हो रहा है, उसे बचाने की छटपटाहट ही लोक कवि अब गाते नहीं को महत्वपूर्ण बनाती है और बहस तलब भी। उपन्यास के फ्लैप पर एक बात सच ही दर्ज की गयी है कि लोक गायकी पर निंरत चल रहा है यह जूता ही तो ‘लोक कवि अब गाते नहीं का शोक गीत है। और संघर्ष गीत भी !

[ राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ] 


समीक्ष्य पुस्तक :

 लोक कवि अब गाते नहीं
पृष्ठ सं.184
मूल्य-200 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2003

अप्रासंगिक होते पात्रों की पैरवी


ब्रजेश्वर मदान 

‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ दयानंद पांडेय का नया कहानी संग्रह है। पिछले अढ़ाई दशकों से वह निरंतर लिख रहे हैं और इससे पहले उनके तीन उपन्यास और तीन कहानी संग्रह ‘बड़की दी का यक्ष प्रश्न’, ‘संवाद’ और ‘सुंदर लड़कियों वाला शहर’ प्रकाशित हो चुके हैं। इसके बावजूद उनकी कहानियों का पर्याप्त चर्चा न मिलने का कारण यह हो सकता है कि उनकी कहानियों में वे शिल्पगत प्रयोग नहीं मिलते, जिनके कारण साहित्य में कहानियां चर्चित और प्रशंसित होती रही है। यह अलग विषय है कि उन प्रयोगों के चलते कहानी में कहानी कम और शिल्प ज्यादा रह गया है और उनके पाठक भी ज्यादातर लिखने वाले ही रह गये हैं।

दयानंद पांडेय ने मृणाल पांडेय के संदर्भ से कहानी के इस वर्तमान परिदृश्य की ओर भूमिका में संकेत भी किया है- ‘खुदै लिख्या था, खुदै ही छपाये, खुदै उस पर बोल्ये थे।’ इसलिए यह कहा जा सकता है कि उन्होंने अत्यंत ही सचेत स्तर पर कहानी को आम पाठकों से दूर करने वाले अति बौद्धिक प्रयोगों से दूर रहते हुए ‘पापुलर स्पेस’ के लिए क़िस्सागोई को अपनाया। यहां यह बताना आप्रासंगिक नहीं होगा कि क़िस्सागोई को पिछली शताब्दी में नयी कहानी आंदोलन में खारिज कर दिया गया था और उसके बाद चले व्यापक आंदोलन में वह साहित्यिक हल्कों में ही पढ़ने-लिखने की चीज हो गयी है। यही नहीं कहानियों से कहानी के साथ-साथ चरित्र ही गायब हो गये हैं जिनके लिए हम पिछली सदी में अमृतलाल नागर के कथा-उपन्यासों को याद करते हैं।

दयानंद पांडेय की इन कहानियों का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनके चरित्र प्रधान होने में है। कहानी के वर्तमान परिदृश्य में जो कहानियां आ रही हैं, उनमें हमें ऐसे चरित्र नहीं मिलते जो इस संग्रह की ‘चनाजोर गरम वाले चतुर्वेदी’ और रामावतार बाबू में है। इन कहानियों का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि समाज और साहित्य से इन चरित्रों के गायब होने के व्यवस्थागत कारणों में जाकर वे पाठक को आज के उस यथार्थ से रू-ब-रू करते हैं, जहां जीवन की कद्र कीमतों में बदल गयी है।

चनाजोर गाम वाले चतुर्वेदी जी एक ईमानदार आई.ए.एस. ऑफीसर है और इस ईमानदारी के कारण ही वह लगातार भ्रष्ट होती जाती व्यवस्था में न केवल समाज बल्कि अपने परिवार के लिये अप्रासंगिक हो जाते हैं। कहानी पढ़ते हुए लगता है कि कहानीकार आजादी के बाद के उस समय को याद कर रहा है, जब आदमी कुछ अच्छे मूल्यों के साथ जी सकता है। लेकिन यहां तो चतुर्वेदी जी अपने घर में ही अल्पसंख्यक हो जाते हैं।

इस कहानी को पढ़ते हुए हम आज की राजनीति के बदलते हुए जातीय समीकरणों को भी देखते हैं जहां कहानीकार समाज में रूढ़िवाद के खिलाफ एक स्पष्ट दृष्टि के साथ सामने आता है। ‘राम अवतार बाबू’ इस संग्रह की एक अद्भुत कहानी है। इस कहानी में हम देखते हैं कि किस तरह जानवरों के प्रति अतिसंवेदनशील व्यक्ति अंत में जानवरों के साथ ही रह जाता है। इस कहानी को हम आज की दुनिया के रूपक के तौर पर देख सकते हैं जहां मनुष्य की पीड़ा में उसके साथ मनुष्य नहीं होते। यहां तक की जानवरों के प्रति अंतिसंवेदनशील व्यक्ति स्वयं भी अपनी पत्नी के प्रति कितना संवेदनहीन हो जाता है कि उसकी मृत्यु में भी उसके साथ नहीं रहता।

‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ और ‘भूचाल’ हमें समाज में अवैध यौन समस्याओं से होने वाली मनुष्य की परिणति का त्रासद पक्ष दिखाती है। जीनियस अपनी मृत्यु के पीछे एक विवाद छोड़ जाता है और ‘भूचाल’ की नायिका को हम एक सिजोफ्रेनिक चरित्रा के तौर पर देखते हैं।

दयानंद पांडेय की इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता इनकी पठनीयता है। संग्रह की कहानियां पाठक को अंतिम शब्द तक अपने साथ लेकर चलती हैं। कहानी और पाठक के बीच की खाई को पांडेय जी किस्सागोई के तत्वों के प्रबल इस्तेमाल के साथ पाटते हैं। लेखक की सबसे बड़ी चिंता समाज में व्यक्ति के असंवेदनशील होते जाने का है।

‘सुंदर लड़कियों वाला शहर’, ‘मेड़ की दूब’, ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’, ‘मुजरिम चांद’ भी संग्रह की रोचक कहानियां हैं। शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि उनकी कहानियों में रोचकता के आधारभूत तत्व किस्सागोई भी हैं। उसे कहानी के वर्तमान परिदृश्य में किसी लेखक की पाठक की तरफ वापसी की कोशिश भी कहा जा सकता है। इन कहानियों के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि लेखक की समाज पर हर टिप्पणी में जजमेंट नहीं वकालत है। वे हमें समाज में व्यवस्थागत कारणों से अप्रासंगिक होते पात्रों की एक वकील की तरह पैरवी करते नजर आते हैं। यह बात उन्होंने पुस्तक में अपने आत्म कथ्य में भी कही है।

[ राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ] 



समीक्ष्य पुस्तक :

एक जीनियस की विवादास्पद मौत
पृष्ठ-200
मूल्य-200 रुप॔ए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2004

विवादों की ज़मीन पर खड़ा एक उपन्यास : अपने-अपने युद्ध


अंजू उपाध्याय 

‘अपने-अपने युद्ध’ उपन्यास काफी चौकाने वाला उपन्यास है। प्रिंट मीडिया को फ्रेम करके लिखा गया यह उपन्यास स्त्री-प्रसंगों और न्यायपालिका प्रसंगों के बाबत न सिर्फ कई सवाल खड़े करता है बल्कि उनका एक जीता-जागता नरक भी उपस्थित करता है। दुनिया भर की ख़बर लिखने वाले अख़बार कर्मियों का अपनी ही खबर से बेखबर रहना, रोज नये-नये नरक जीना, घुट-घुटकर रहना फिर भी बाहर खिल-खिल करना, ऐसा बहुत कुछ इस उपन्यास में उभर कर आता है। थिएटर, दहेज, मनुवाद, गांधी, लोहिया और रजनीश जैसे कई विषय इस उपन्यास को बहस तलब बनाते हैं। लेकिन जो कहते हैं सिर चढ़ कर बोलना तो सिर चढ़ कर बोलने का काम यहां सिर्फ दो प्रसंगों ने किया है। एक है स्त्री प्रसंग, दूसरा न्यायपालिका प्रसंग।

यह अजब नहीं होगा जो इस उपन्यास को विवादित करार दे दिया जाये। इस उपन्यास में वर्णित न्यायपालिका प्रसंग का ब्यौरा समूची न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा कर देता है। और एक तरह से न्यायपालिका की प्रासंगिकता पर न सिर्फ कड़े सवाल उठाता है बल्कि उसके अस्तित्व पर गहरी चोट भी करता है। बहुत संभव है न्यायपालिका से जुड़े लोग चाहें वकील हों, चाहे न्यायमूर्ति या न्यायाधीश या अन्य लोग इस पर कड़े ऐतराज जतायें इस उपन्यास को भी न्यायिक हलकों से इस उपन्यास को प्रतिबंधित करने की भी मांग उठे क्योंकि इस उपन्यास में वर्णित न्यायपालिका के ब्यौरे काफी तल्ख तो है ही, कई जगह वह न्यायपालिका की प्रक्रिया की हवा भी निकाल देते हैं। उपन्यास में बताया गया है, ‘हाईकोर्ट जो रावणों का घर है। जहां हर जज, वकील रावण है। न्याय वहां सीता है और कानून मारीच। जैसे रावण अपने मामा मारीच को आगे कर सीता को हर ले गया ठीक वैसे ही हाईकोर्ट में जज और वकील कानून को मामा मारीच बना कर न्याय की सीता को छलते हैं। फिर वह व्यक्ति राम की तरह ‘तुम देखी सीता मृगनयनी’ कहता हुआ यहां-वहां तारीखों के मकड़जाल में भटकता रहता है। ऐसा भी नहीं कि न्याय वहां नहीं मिलता। न्याय मिलता भी है पर राम को नहीं। रावण को और उसके परिजनों को। हत्यारों, डकैतों को जमानत मिलती है। हां, राम को तारीख़ मिलती है।’ (पृष्ठ 241) यह और ऐसे तमाम प्रसंग तथा संवाद न्यायपालिका की छाती चीर कर रख देते हैं। इस उपन्यास में एक चरित्रा है। रामकेवल। जो तारीखों के मकड़जाल में उलझा कोर्ट में बैठे-बैठे ही मर जाता है, लेकिन उसे उसके केस का फैसला नहीं मिल पाता।

संजय इस उपन्यास का केन्द्रीय चरित्र है। ‘यह लड़ाई है दिये की और तूफान की’ गाना गुनगुना कर वह खुद भी न्यायपालिका के चक्कर काटता है लेकिन ‘इन्टरप्रेटेशन’ और ‘प्रोसीडिंग’ की चकरघिन्नी में तारीखों के तंत्रा उलझा हुआ वह भी टूट जाता है और उसे भी न्याय नहीं मिलता है। इस उपन्यास में वर्णित न्यायपालिका के कई प्रसंग दिल हिला कर रख देते हैं और भारतीय न्याय व्यवस्था को न सिर्फ मुंह चिढ़ाते हैं बल्कि उसकी कलई खोल, उसकी बेईमान होने का चीख-चीख कर ऐलान करते हैं। एक दृश्य में तो उपन्यास का नायक संजय मारे विरोध में हाईकोर्ट में पेशाब कर देता है। तो कथ्य और तल्खी और ज्यादा चुभन पैदा करती है।

‘अपने-अपने युद्ध’ उपन्यास न्यायपालिका के अलावा अगर विवाद में आयेगा तो अपने स्त्री प्रसंगों के लिये भी। हो सकता है कुछ ‘सती सावित्री ’ टाइप सुधी समीक्षक इस उपन्यास पर अश्लीलता का भी आरोप लगा दें।

इस उपन्यास का केन्द्रीय चरित्र संजय जो जुझारू भी है और लंपट भी। कई बार लगता है वह दिग्भ्रमित भी है। अकसर वह नैतिकता और सिद्धांत की लड़ाई लड़ता दिखता है। लेकिन स्त्री प्रसंगों के मामले में उसकी सारी नैतिकता हवा हो जाती है। पारम्परिक और दुनियावी अर्थों में संजय का जो चरित्र छन कर सामने आता है। उसे ‘चरित्रहीन’ कहा जाता है। वह लगातार एकाधिक स्त्रिायों के फरे में रहता है। ऐसे गोया वह कोई प्लेव्यॉय हो। स्त्रियां उसके जीवन में ऐसे हैं जैसे किसी लॉन में घास। लेकिन वह स्त्रियों को बराबर आदर व मान देता है। शायद इसलिए भी कि उसके आस-पास की सभी स्त्रियां पढ़ी-लिखी और विदुषी हैं। इस बहाने जैसे एक डाल से दूसरी डाल पर होते हुए स्त्री प्रसंगों को जिस तरह से वर्णित किया गया है उपन्यास में पठनीयता का ‘रस’ तो जोड़ता ही है कथा को आगे बढ़ाने में भी बहुत काम आता है। इन स्त्री प्रसंगों में कई बार समाज और उससे जुड़े कई खौलते हुए सवाल उठ खड़े होते हैं। बड़ी तल्खी और तुर्शी के साथ। जैसे एक महिला पात्र है रीना। वह एक जगह संजय से पूछती है ‘सेक्स और पत्रकारिता, पत्रकारिता और सेक्स। इस के अलावा भी तुम्हें कुछ आता है?’

तो संजय कहता है ‘जिस को सेक्स की समझ हो, पत्रकारिता की समझ हो, समझो वह दुनिया जानता है।’ (पृष्ठ 130)

और सचमुच इस उपन्यास में यह और ऐसे तमाम बहानों के बहाने कई ऐसी सच्चाईयां उद्घटित हुई हैं जिनका ब्यौरा हिन्दी में कहीं अन्यत्र मिलना मुश्किल है। रीना, नीला, चेतना और साधना इस उपन्यास के मुख्य स्त्री  चरित्र हैं और संजय इन सबका ‘साथी’ है बारी-बारी। लेकिन वह किसी के साथ छल नहीं करता। यह उसकी लम्पटता का प्लस प्वाइंट है। शायद इसीलिए इस उपन्यास की स्त्रियां उस पर ‘यकीन’ भी करती हैं और खूब।

‘अपने-अपने युद्ध’ की शुरुआत थिएटर प्रसंगों से होती है। दिल्ली के नेशनल स्कूल आफ ड्रामा से लेकर लखनऊ तक के थिएटर के कई सवाल उपस्थित  हैं। और अपनी पूरी तल्खी के साथ। इस उपन्यास में दहेज जैसे विषयों को भी उठाया गया है और पूरी निर्ममता से। एक दारोगा का परिवार अपनी बहू को जलाकर जो यातना देता है उसके ब्यौरे पढ़ कर दिल दहल जाता है।

यह उपन्यास चूंकि प्रिंट मीडिया पर केंद्रित है। इसलिए इस उपन्यास में पत्रकार, लेखक और कवि चरित्रों की भरमार है। अजब-गजब चरित्र है। लड़कियों से लाइनबाजी करने वाले वृद्ध सुरेंद्र मोहन तल्ख हैं तो वेश्यावृत्ति के शौकीन सुजान पुरिया जैसे लोग भी हैं। वेश्याओं के कोठे पर सुजान पुरिया वाला दृश्य हंसाता भी है। और खीझ भी दिलाता है। आलोक जैसा चरित्र भी गौरतलब है। सुरेश, उमेश, प्रकाश और मनोहर जैसे चरित्र उपन्यास की कथा को बढ़ाने में तो सहायक हैं ही, पत्रकारिता और उसके दोगलेपन को भी तार-तार करते हैं। सरोज जैसे भडुआ पत्रकारों का चरित्रा भी इस उपन्यास में उपस्थित है तो मधुकर और शेखर जैसे चार सौ बीस कवियों की जमात भी खड़ी मिलती है। सरोज और मधुकर के चरित्र ‘व्यक्ति चित्र’ के लिहाज से अनूठे बन पड़े हैं।

[ हिंदुस्तान समाचार फ़ीचर्स नेटवर्क द्वारा जारी ]


पृष्ठ सं.264
मूल्य-250 रुपए

प्रकाशक :
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.

30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2001

बड़की दी का यक्ष प्रश्न : क़िस्सागोई की लयबद्धता और कहानियों में टटकापन


अंजू उपध्याय 

दयानंद पांडेय का दूसरा कहानी संग्रह ‘बड़की दी का यक्ष प्रश्न’ एक साथ कई खिड़कियां खोलता है। कुल ग्यारह कहानियां इस संग्रह में संग्रहीत हैं और सभी कहानियों की जमीन न सिर्फ अलग-अलग हैं। शिल्प में भी बहुत अलग-अलग हैं। दरअसल दयानंद पांडेय की कहानी को पढ़ कर हर पल एक नये अनुभव से गुजरना है। उनकी कहानियों का टटकापन और किस्सागोई की लयबद्धता पाठक को कहानी छोड़ने नहीं देती क्योंकि वह अपने पात्रों के मन में जैसे बैठ जाते हैं और उनके चरित्र का रेशा-रेशा सामने रखते जाते हैं। उनके छोटे-छोटे विवरण छोड़ने का मोह वह नहीं छोड़ पाते। तो यह कहीं इन कहानियों की ताकत बन जाता है। कहानी संग्रह के फ्लैप पर लिखा है कि ‘कि इन कहानियों की खूबी कहिए या खामी, कमोवेश इनके सभी ‘क्रिएटेड’ नहीं ‘एडाप्टेड’ लगते हैं। सच यही है और शायद इसी लिए इन कहानियों का पढ़ना ऐसा लगता है जैसे सामने किसी फिल्म का दृश्य रील दर रील गुजरता जा रहा है।

संग्रह की पहली कहानी ‘बड़की दी का यक्ष प्रश्न’ जिस वृद्धा के वैधव्य जीवन से साक्षात्कार कराती है वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला है। वैधव्य की चुनौती और वृद्ध होने की दहशत दोनों सवालों का जवाब जब वह अपनी इकलौती बेटी में ढूंढ़ती है तो जैसे वह अपने को सवालों के नागफनी में घिरी पाती है। मायका और ससुराल दोनों में ही जैसे उसके लिए कटीले वाण लिए खड़ी हो जाती है। ऐसे में उसका बेटी के घर पर जाकर रहना सामाजिक सवाल कम उसकी बेटी के लिए आर्थिक सवाल ज्यादा बन जाता है। लेकिन इस कहानी में लेखक अंततः कोई परिणाम बताने के बजाय सारे सवालों का जवाब पाठक पर ही छोड़ देता है और जानना बाकी रह जाता है कि आखिर बड़की दी का हुआ क्या ?

जिगर मुरादाबादी का एक शेर है कि, ‘दीदार रोज होता है मगर गुफ्तगू नहीं होती।’ लेकिन बशीर बद्र का एक शेर है- ‘गुफ्तगू रोज होती है, दीदार नहीं होता।’ इन दोनों शेरों में खास फर्क यह है कि जिगर मुरादाबादी के समय में फोन नहीं था और बशीरबद्र के समय में फोन आ गया है।

इस संग्रह की दूसरी कहानी ‘फोन पर फ्लर्ट’ फोन पर बातचीत की शिल्प में है जरूर पर वह एक भटकी स्त्री  और बहके हुए पुरुष का संलाप भर नहीं है यह समाज और परिवार में गिरती हुई नैतिकता की भी कहानी है। कहानी यह भी स्पष्ट करती है कि फोन पर किसी से भी बेलाग बतियाना कितना घातक होता है।

संग्रह की तीसरी कहानी ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ सामंतवाद और जमींदारी के अवशेष खण्डहरों की व्यथा तो है ही संतानहीनता के तकलीफ को भी यह कहानी बड़ी शिद्दत से बांचती है। कहानी में गूंथा गया गंवई परिवेश और बाऊ साहब का घोड़े का शौक जब बदल कर बैलगाड़ी में तब्दील हो जाता है तो कहानी बदलती आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को इंगित करती है। कहानी में पट्टीदारी, अंधविश्वास और सामंती ऐंठ की भी इबारत साफ दिखती है। लेकिन कुल मिलाकर ‘घोड़े वाले बाऊ साहब’ के गोधन सिंह का व्यक्ति चित्र जो हमारे सम्मुख उपस्थित होता है, वह अविरल है। उनके साथ सहानुभूति भी उपजती है।

‘देहदंश’ संगीत, संस्कृति और राजनीति का ऐसा भयावह कोलाज है जिसको पढ़ कर आंखें चौंधिया जाती हैं। राजनीति की ऐसी दरिद्रता खासकर राजनीति में महिलाओं का शोषण इस कहानी में बहुत स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है। अतः ‘नितम्बों पर भीड़ और उरोजों पर मुख्यमंत्राी’ जैसे वाक्य इस कहानी की चुभन को और नुकीला बनाती है। विधायिका के साथ का व्यवहार या एक समलैंगिक विधायक का चरित्र, मुख्यमंत्री और मंत्री  की जोड़-तोड़ और इस सबमें फंसी नायिका निर्मला का चरित्र बराबर उफनाता मिलता है। और वह बेबस, ‘घट-घट में पंछी डोलता, आप ही डंडी आप तराजू आप ही बैठा तोलता।’ गाते-गाते कबीर के शरण में चली जाती है तो समझना कुछ नहीं बहुत कठिन हो जाता है।

‘प्लाजा’ कहानी ‘ट्रेड यूनियन’ के ‘ट्रेड’ में बदलते जाने की कथा को बड़ी बारीकी से बयान करती है। ‘प्लाजा’ के राकेश की बेचैनी, बेरोजगारी का तनाव और महेश जी का उसका साथ देना कहानी में ऐसा तनाव बुनता है जिससे बेरोजगारी की आंच को बांचा जा सकता है।

‘मुजरिम चांद’ इस संग्रह की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण कहानी है। प्रशासनिक दोगलेपन और पुलिसिया हेकड़ी को प्याज की तरह बेपर्दा करती यह कहानी एक साथ में गुंथे व्यंग्य और ब्यौरों को पढ़ कर श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ के रंगनाथ की याद आ जाती हैं तो भी यह कहानी ‘राग दरबारी’ के मुकाबिल तो नहीं पर उदय प्रकाश की कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ के पाये की कहानी तो है ही। इस कहानी में दिलीप कुमार जैसे अभिनेता की कैसी दुर्गति होती है यह देखना भी दिलचस्प है। इस कहानी में बन गया माहौल भी काफी महत्वपूर्ण है। एक बानगी दृष्टव्य है:

‘दिलीप कुमार के आंगन में पहुंचते ही उन औरतों का रुन-झुन शोर यकायक थम कर खामोशी में तब्दील हो गया। सभी आंखें ख़ामोश लेकिन जैसे बहुत कुछ बोलती हुई। बुरके से टुकुर-टुकुर ताकती हुई। एक खुशी भरी खामोशी जैसे पूरे जनानखाने में तारी हो गई। अजब यह था कि इस खामोशी  में पैंट की जेब में एक हाथ डाले खड़े दिलीप कुमार भी जरा देर खामोश रहे। ऐसे गोया झील की बल खाती लहरें उड़ते हुए हंस के पंखों को थाम लें। हंस को उड़ने न दें।

‘आदाब !’ अचानक खामोशी तोड़ती हुई। दिलीप कुमार की हाथ उठाती आवाज क्या गूंजी एक साथ कांच की सैंकड़ों चूड़ियां और पचासों पायलें बज गईं। ऐसे, जैसे पंडित शिवकुमार शर्मा का संतूर बज गया हो, ऐसे जैसे कोई जल तरंग सोए-सोए जाग गया हो। आंखों के संकोच में सने दर्जनों हाथ उठे और जबान बोली, ‘आदाब !!!’ मिठास ऐसी जिसे मिसरी फूट कर किसी नदी में बह चली हो। राजीव को लगा जैसे कमाल अमरोही की किसी फिल्म का शॉट चल रहा हो। बिना कैमरा, बिना लाइट, बिना साउंड-म्यूजिक और बिना डायरेक्टर के, गुरुदत्त की किसी फिल्म के किसी भावुक दृश्य की तरह। हालांकि उसने देखा कि ‘आदाब’ के पहले भी बिन बोले उन औरतों और दिलीप कुमार के बीच एक अदृश्य सा संवाद उपस्थित था जिसे ठिठका हुआ समय दर्ज भी कर रहा था। पर दिलीप कुमार बिना निर्देशन के इस दृश्य की संवेदनशीलता, कोमलता और उसके औचक सौंदर्य को शायद समझ नहीं पाये या वापस जाने की हड़बड़ी में अकुलाए उन्हें जाने क्या सूझा कि वह घबरा कर ‘आदाब’ बोल बैठे, जैसे किसी ठहरे हुए पानी में कोई कंकड़ फेंक दे। यही किया दिलीप कुमार ने। लेकिन कांच की चूड़ियों की खन-खन और पायलों की रुन-झुन में भीग कर जो ‘आदाब’ जवाब में उधर से आया लगा कि दिलीप कुमार उसमें भीज कर भहरा गए हैं। उसने देखा वह सचमुच मुंह बा कर, माथे पर बालों की लटों को थामे क्षण भर तो खड़े रह गए । पर आगे ख़ामोशी की फिर एक सुरंग थी। लंबी सुरंग।

‘संवाद’ कहानी में दो पीढ़ियों के बीच का जो जेनरेशन गैप है वह काफी तल्खी से सामने उभर कर आता हैं पत्र शैली में लिखी गयी यह कहानी पीढ़ियों में आए टकराव को ऐसे बयान करती है। गोया कोई दिमाग पर हथौड़ा मार रहा हो। ‘प्रतिनायक मैं’ टीनएजर की मीठी यादों की कहानी है लेकिन इसमें बहुत कसाव नहीं है। ‘सुन्दर भ्रम’ कच्चे प्यार की कहानी कहती है। जबकि ‘वक्रता’ सुन्दर भ्रम का दोहराव लगती है। ‘मेड़ की दूब’ सूखे जैसी विपदा के बहाने गांव के आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था को ‘आदमी के जीवन-संघर्ष, को रेखांकित करती है। खासकर इसका यह संवाद कहीं गहरे तक हिला जाता है, ‘दम तो मेड़ की दूब में है काकी ! कितना सूखकर हरे हो गये। सूखना और फिर हरा सोना, यही तो जिंदगानी है।’ कुल मिला कर इस संग्रह की कहानियों पठनीयता का ऐसा चुंबक है कि जिनको एक बार शुरू करने पर खत्म किये बिना छोड़ा नहीं जा सकता है।

[ हिंदुस्तान समाचार फ़ीचर्स नेटवर्क द्वारा जारी ] 


समीक्ष्य पुस्तक :

बड़की दी का यक्ष प्रश्न
पृष्ठ- 175
मूल्य-175 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2000

लेखक को जैसी सज़ा मिलनी चाहिए

राजकिशोर 

इस न्यायालय को यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि प्रतिवादी दयानंद पांडेय के साथ क्या किया जाए, इस बारे में वह पूरी तरह विभ्रम की स्थिति में है। न्याय-प्रक्रिया का कायदा तो यही है कि प्रतिवादी को जरूरी सजा दी जाए, क्योंकि उसने अपने वादग्रस्त उपन्यास ‘अपने-अपने युद्ध’ में निश्चित रूप से हाईकोर्ट की अवमानना की है। कोई भी अदालत अपने बारे में इस तरह का कथन कैसे स्वीकार कर सकती है कि ‘हाईकोर्ट जो रावणों का धर है। जहां हर जज, हर वकील रावण है। न्याय वहां सीता है और कानून मारीच।’ (पृष्ठ 241) और ‘हाईकोर्ट कोई पढ़े-लिखों की जगह नहीं है।’ (पृष्ठ 242), आगे न्याय व्यवस्था पर और कटुतर टिप्पणियां की गई हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद भारत के न्यायालयों में जनसामान्य की अनास्था और बढ़ सकती है। शुक्र यही है कि लोग, विशेषतः हिंदी क्षेत्र के लोग, उपन्यास कम पढ़ते हैं। हमें बताया गया है कि ‘अपने-अपने युद्ध’ की सिर्फ ग्यारह सौ प्रतियां छापी गई हैं और इनमें से आधी भी अभी तक नहीं बिकी हैं। बहरहाल, इस उपन्यास की सौ-डेढ़ सौ प्रतियां भी बिक गई हैं, तो यह भी इस उपन्यास के लिए चिंता करने का पर्याप्त कारण है।

‘फिर हमारी दुविधा या विभ्रम का कारण क्या है ? उच्च न्यायालय के लिए इतनी असंगत, अपमानजनक और असंतुलित भाषा का प्रयोग देखने के बाद हम क्रोध में कांपने के बजाए दुखी और संतप्त क्यों हैं ? वह क्या चीज है, जो उदाहरण बन जाए, वैसी सजा प्रतिवादी को देने से हमें रोक रही है ? क्या हमने यह बात भुला दी है कि जिस समाज में न्याय-व्यवस्था को संदिग्ध ही नहीं, भ्रष्ट और अन्यायपूर्ण बताया और माना जाने लगता है, वह समाज भयंकर अराजकता का शिकार हो जाता है। ऐसे समाज में सभी लोग असुरक्षित अनुभव करने लगते हैं। हमें तो लगता है, अराजकता की इस वन्य-स्थिति से वह समाज फिर भी बेहतर है जहां लोगों में कोर्ट-कचहरी का डर बना हुआ है। शायद हमारे समाज की स्थिति उस समय ऐसी ही है। यह और बात है कि, जैसा कि उपन्यासकार ने लिखा भी है, न्यायालय का डर गरीब और मध्य वर्ग में ज्यादा है, उच्च और शक्तिशाली वर्ग में बहुत कम। अन्यथा देश के उच्चतम न्यायालय के आदेश की धज्जी उड़ाते हुए राम जन्मभूमि मंदिर-मस्जिद के ढांचे  को खुलेआम, राज्य सरकार की सहायता से नहीं गिराया जाता। इस न्यायालय को इस कटु तथ्य का अहसास है कि उसके आदेश पर अमल कितना होता है और किस रूप में होता है। सच तो यह है विश्व के सभी न्यायालयों को कुछ सीमाओं के भीतर ही काम करना पड़ता है। क्या संयुक्त राज्य अमेरिका का उच्चतम न्यायालय अपने देश के मतदाताओं को आदेश दे सकता है कि वे अगले चुनाव में किसी अश्वेत या महिला को राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित करें ? क्या यह न्यायालय किसी याचिका पर यह आदेश दे सकता है कि एक महीने बाद से उत्तर प्रदेश के किसी भी क्षेत्र में कोई भिखारी नहीं दिखाई पड़ना चाहिए कि वे रामराज्य ला देंगे, तो हम तो यही कहेंगे कि हर मूर्ख को अपने स्वर्ग में रहने का अधिकार है। ‘यह देखकर हमें भारी कष्ट हुआ है कि प्रतिवादी दयानंद पांडेय ने कुछ ऐसी ही बातें बहुत ही भोंडे, अशालीन और सड़कछाप ढंग से कही है। वह एक अनुभवी लेखक है-हमें बताया गया कि इसके पहले उसकी पांच-छह किताबें छप चुकी हैं। वह पत्रकार भी हैं और उसके द्वारा दाखिल किए गए शपथयुक्त बयान में बताया गया है कि वह 21 वर्षों से विभिन्न अखबारों में नौकरी करता रहा है। लेखक और पत्रकार जिम्मेदार व्यक्ति होते हैं। वे जो कुछ लिखते हैं, उसे गौर से पढ़ा जाता है। इसलिए उन्हें लिखते समय भरपूर संयम का परिचय देना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास ने अपने विश्व-विश्रुत ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ में कैकेयी, मारीच, रावण आदि खल पात्रों का चित्रण करते हुए एक भी स्थान पर मर्यादा का अतिक्रमण नहीं किया है। क्या प्रतिवादी तुलसीदास से भी महान लेखक है, जो वह साहित्य का कोई भी नियम मानने को बाध्य नहीं है ?

‘हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रतिवादी दयानंद पांडेय एक विकृत मस्तिष्क का स्वामी है। इस उपन्यास में, उसके नायक संजय के माध्यम से, उसने यौन क्रिया के प्रति जो उन्मादपूर्ण लगाव दिखाया है, उसका एकमात्र निष्कर्ष यही है कि वह मनोरोगी होने की दुखद-स्थिति में पहुंच चुका है और उसे काफी समय तक किसी मनःचिकित्सक की सहायता की जरूरत है। सेक्स का चित्रण इसी शहर के महान लेखक यशपाल जी, अश्क जी कभी किया करते थे और खुल कर किया करते थे। लेकिन उन्हों ने भी कामुकता का ऐसा तूफान नहीं खड़ा किया है कि सभ्य जीवन की न्यूनतम शर्तें भी भुला दी जाएं। हमें इस पर और भी सख्त एतराज है कि उपन्यास में स्त्रियों को भी भयावह रूप से दिखाया गया है। एकाध स्त्री ऐसी हो सकती है, पर ‘अपने-अपने युद्ध’ को पढ़ कर ऐसा लगता है कि यह तो स्त्री जाति का स्वाभाविक गुण है या आजकल हो गया है। हमारे सामने कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है, जिसके आधार पर हम विकृत वर्णनों को वास्तविक या यथार्थ-विमुख करार दे सकें। लेकिन हम यह अनुभव जरूर करते हैं। यदि यह वास्तविकता हो, तब भी इस गोपनीयता का परदा बने रहना चाहिए। स्त्री भारतीय-संस्कृति की धुरी है। अतएव स्त्रियों के बारे में कोई भी अमर्यादित बात न लिखी जानी चाहिए न कही जानी चाहिए।

‘यह लेखक की मनोरोगिता का ही प्रमाण है कि उसने एक जगह स्त्री और हाईकोर्ट को एक करने की कोशिश की है। उपन्यास का नायक चेतना की फुंफकार की परवाह किए बगैर उसे फिर से चूमने लगता है, तो वह कहती है, ‘कुछ तो सुधरिए और समझिए कि मैं हाईकोर्ट नहीं हूं।’ (पृष्ठ 244) यह तो अति ही है। इस से भी जाहिर होता है कि लेखक का दिमाग किस तरह सेक्स और हाईकोर्ट से आक्रांत है। गनीमत यही है कि पत्रकारिता की भी उस ने ऐसी ही भयावह तस्वीर खींची है। चूंकि प्रतिवादी स्वयं लंबे समय से पत्रकारिता में रहा है, इस लिए उस के द्वारा खींची गई यह तस्वीर उस के अपने अनुभवों पर ही आधारित होगी। अगर पत्रकारिता का भी कोई अपना हाईकोर्ट होता, तो हमारा विश्वास है कि उपन्यासकार वहां भी प्रतिवादी के रूप में खड़ा होता।

‘फिर भी, हम प्रतिवादी दयानंद पांडेय को जेल नहीं भेजना चाहते हैं। जेल में कुछ समय गुजारने के बाद उसकी विकृतियां और बढ़ सकती हैं। साथ ही, उसने न्याय-व्यवस्था की गंभीर विकृतियों को उजागर कर न्यायालय और समाज, दोनों की सेवा की हैं सच लिखना न्यायालय की मानहानि करना नहीं है। लेकिन हम पांडेय को यों ही छोड़ भी नहीं सकते, क्योंकि उसने भ्रष्टतम भाषा का प्रयोग किया है। अतः हम आदेश देते हैं कि (1) प्रतिवादी दयानंद पांडेय अदालत के सामने एक घंटा मौन खड़ा रहे और इस दौरान विचार करे कि क्या इन्हीं बातों को शालीन ढंग से नहीं लिखा जा सकता; और (2) राज्य सरकार किसी योग्य मनःचिकित्सक से प्रतिवादी की दिमागी जांच कराए और मानसिक चिकित्सा की जरूरत हो, तो तुरंत उसका प्रबंध; और (3) प्रतिवादी के उपन्यास ‘अपने-अपने युद्ध’ की सभी अनबिकी प्रतियां बाजार से वापस ले ली जाएं एवं जजों और वकीलों में बिना कोई कीमत लिए बांट दी जाएं।’

तो प्रिय पाठक, यह रहा फैसला जो अभी किया नहीं गया है, हालांकि मुकदमा लंबित है। इस फैसले की भाषा या इसमें व्यक्त विचारों का वास्ता स्तंभकार के निजी विचारों से कम और न्याय की मर्यादा और न्यायाधीशों के परिकल्पित आग्रहों से ज्यादा है। अलबत्ता यह स्तंभकार चाहता है कि वास्तव में ऐसा ही फैसला जारी हो। आखिर लेखक वही होता है जो एक वैकल्पिक जीवन व्यवस्था का सुंदर और व्यावहारिक चित्र खींच सकता है। हम जानते हैं कि न्यायालय कानून की सीमाओं से बंधा होता है। पर कानून की सीमाओं को रेखांकित करना भी इसी न्यायिक मर्यादा का हिस्सा है।

 [ अपने-अपने युद्ध लिखने पर इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में जब कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का मुकदमा हुआ तो उस संदर्भ में राजकिशोर  ने जनसत्ता  के 17 फ़रवरी , 2002 अंक के अपने कालम में यह टिप्पणी लिखी थी । ]


पृष्ठ सं.264
मूल्य-250 रुपए

प्रकाशक :
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.

30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2001