Saturday, 31 October 2015

आख़िर मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों की ज़िद से लौटे अशोक वाजपेयी

दुनिया भर में प्रतिरोध लेखक और कलाकार का सब से बड़ा हथियार है । इस लिए भी कि लेखक और कलाकार हिंसक नहीं होता । होना भी नहीं चाहिए । लेकिन अगर आप मुंबई का टिकट ले कर दिल्ली की गाड़ी में बैठ जाने की नादानी भरी ज़िद पर उतर आएं और कहने लगें , मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों ! तो क्या लेखक , क्या कलाकार , क्या देश और क्या समाज किसी भी का भी भला नहीं होने वाला । वह भी तब जब आप बड़े लेखक हों , चिंतक हों , प्रशासनिक सेवा का अनुभव भी आप के पास हो तब भी आप ऐसी बचकानी नौटंकी पर आमादा हो जाएं कि भाई टिकट तो हमारे पास मुंबई का है पर यह ट्रेन हमें दिल्ली क्यों ले आई है ? फिर आप दिल्ली और रेल पर लानत-मलामत करते फिरें ।

अशोक वाजपेयी
बीते दिनों अशोक वाजपेयी एंड कंपनी ने यही किया है साहित्य अकादमी पुरस्कारों की वापसी की नौटंकी कर के । विरोध उन्हें करना था नरेंद्र मोदी और उन की सरकार का , वह विरोध करने लगे साहित्य अकादमी का । वह चलती का नाम गाड़ी फ़िल्म में मज़रूह सुलतानपुरी का लिखा सचिन देव वर्मन की धुन में सजा किशोर कुमार का  गाया हुआ गाना है ना , जाना था जापान , पहंच गए चीन , समझ गए ना ! तो यही हुआ ।  पर कहते हैं कि देर आयद , दुरुस्त आयद। अशोक वाजपेयी इतना भटक-भटका कर मूल मुद्दे पर पहुंच गए हैं । कम से कम कल एक नवंबर को कांसटीट्यूशन क्लब  दिल्ली के मावलंकर हाल में उन की ओर से आयोजित कार्यक्रम के बाबत तैयार कार्ड से यही लगता है । इस में साहित्य अकादमी शब्द का ज़िक्र तक नहीं है । यह प्रतिरोध हर किसी का अधिकार है । इस में किसी को कोई ऐतराज होना भी नहीं चाहिए । अशोक वाजपेयी अगर पहले ही चित्त निर्भय के इस अभियान में इसी तरह खड़े हुए होते और सनसनी के तौर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की नौटंकी के फेर में न पड़े होते तो शायद उन की इस मुहिम को लोग गंभीरता से लिए होते । और वह चीन नहीं ,  जापान ही पहुंचे होते , जो उन का गंतव्य था । लेकिन साहित्य अकादमी को बीच में ला कर वह भारी फजीहत में फंस गए। क्यों कि साहित्य अकादमी सरकार नहीं चलाती ।  न नरेंद्र मोदी को डिक्टेट करती है , न नरेंद्र मोदी से डिक्टेट होती है ।

क्या है कि पहले के समय में जब दो राजा आपस में लड़ते थे तो जब कोई एक राजा हारने लगता था , तब सामने एक गाय खड़ी कर देता था । प्रतिद्वंद्वी राजा फिर उस राजा पर हमला रोक देता था । गाय की सुरक्षा के मद्दे नज़र ताकि कहीं गाय की हत्या न हो जाए और पाप लग जाए । नतीजतन अगला राजा संभावित हार से अपनी जान ले कर बच निकलता था । अशोक वाजपेयी भी जब चुनाव में लेखकों के लाख हस्ताक्षर और अभियान के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री बनने से नहीं रोक पाए तो उन्हों ने इसी गाय रणनीति पर अमल करते हुए साहित्य अकादमी को गाय बना कर खड़ा कर दिया । वह यह नहीं समझ पाए कि लेखकीय चोंगे में राजनीतिक लड़ाई वह हार चुके हैं । साहित्य अकादमी की सनसनी काम नहीं आने वाली । लड़ाई लड़ने का बड़ा औजार है कलम , आंदोलन और विभिन्न मोर्चों पर प्रतिरोध की दस्तक । साहित्य कभी अपनी लड़ाई नहीं हारता । लेकिन साहित्य अपनी रचना धर्मिता से समाज रचता है , समाज को जागरूक करता है , राजनीतिक रूप से भी सजग करना साहित्य की ज़िम्मेदारी है । पर युधिष्ठिर की तरह जुआ खेल कर नहीं , गलत पासा फ़ेंक कर नहीं । अश्वत्थामा मरो , नरो वा कुंजरो कह कर नहीं । 

माफ़ कीजिए अशोक वाजपेयी आप ने यही किया । युधिष्ठिर बन गए । द्रौपदी को दांव पर लगाने और जुए में हारने के बाद अश्वत्थामा मरो , नरो वा कुंजरो भी कर गए । इस सब के लिए आप को साहित्य अकादमी ही मिली थी ?


विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से एक विश्व कविता समारोह का प्रतिशोध लेने के लिए आप ने एक राजनीतिक लड़ाई को साहित्य अकादमी की तरफ मोड़ दिया । और चारो खाना चित्त हो गए । विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को आप क्या समझते थे कि वह लौकी , कद्दू की सब्जी हैं और आप उन्हें इस आसानी से काट खाएंगे ? आप क्या समझते हैं गोटियां खेलना , मोहरे फिट करना ही सब कुछ होता है ? विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गांधीवादी व्यक्ति हैं , साधारण व्यक्ति हैं । साधारण व्यक्ति के पास , गांधीवादी व्यक्ति के पास आत्मिक शक्ति बहुत होती है । जो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी में है । अपनी इसी शक्ति के दम पर वह साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष और फिर अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं । अभी तक इस के पहले साहित्य अकादमी के इतिहास में कोई दूसरा हिंदी लेखक साहित्य अकादमी का उपाध्यक्ष या अध्यक्ष निर्वाचित नहीं हो सका था । हजारी प्रसाद द्विवेदी , अज्ञेय , विद्यानिवास मिश्र , नामवर सिंह और आप जैसे अन्य लेखक भी यह चुनाव लड़ते और हारते रहे हैं । क्यों कि अन्य भारतीय भाषाओं में हिंदी का विरोध बहुत रहा है । और इस पद के लिए किसी व्यक्ति को सभी भारतीय भाषाओं के लेखक मिल कर चुनते हैं । विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अपने दम पर पहले उपाध्यक्ष और फिर अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हो कर भारतीय भाषाओं में इस हिंदी विरोध को दरकिनार किया है । लेकिन एक अदना आदमी विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को इस पद पर निर्वाचित होते देखना दिल्ली के तमाम मठाधीशों को नागवार गुज़रा है । आप जैसे साहित्यिक राजनीतिबाज़ को भी ।  कि गोरखपुर जैसे छोटे शहर का यह आदमी कैसे इस पद पर बैठ गया ? यह बात हिंदी जगत ही नहीं समूचा भारतीय साहित्य जगत जानता है । लेकिन साहित्य हो , राजनीति हो व्यक्तिगत प्रतिशोध की भी एक सीमा होती है । वह आप ने पार कर ली और अंजाम सामने है । आप की लड़ाई कुंद पड़ गई। आप की इस कुत्सित मुहिम से समाज में लेखकों का सम्मान गिरा है , इस का अभी आप को अंदाज़ा नहीं है । आने वाले दिन अभी आप को जब और मुंह चिढ़ायेंगे तब आप को पता चलेगा । अभी इस धूल को समय की दीवार पर बैठ जाने दीजिए ।

दिल्ली के मालवलंकर हाल में आयोजित कार्यक्रम के बाबत कार्ड
युवा पत्रकार आशीष कुमार अंशु की एक सूचना के मुताबिक़ साहित्य अकादेमी पुुरस्कार अब तक एक हजार एक सौ दस लोगों को दिया गया है। जिसमें 536 लोग जीवित हैं। इनमें 26 साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाया है। बाल साहित्य की श्रेणी में 144 लेखकों को पुरस्कृत किया गया। जिनमें 128 लेखक जीवित हैं। इसमें सिर्फ एक लेखक ने अपना पुरस्कार लौटाया है। अनुवाद में 500 लेखकों को सम्मानित किया गया है। सभी अनुवादक जीवित हैं। तीन लेखकों ने पुरस्कार लौटाया है। युवा पुरस्कार 111 लेखकों दिया गया है। उनमें सिर्फ एक लेखक ने पुरस्कार लौटाने की सूचना ई मेल के माध्यम से आकदेमी को दी है। पुरस्कार लौटाया नहीं है। वैसे अकादेमी ने सम्मान लौटाने वाले लेखकों को एक पत्र लिखा है जिसमें उनसे यह आग्रह किया गया है कि वे अपने सम्मान वापसी पर पुनर्विचार करें।

ज़िक्र यह भी जरूरी है कि यह सारी वापसी भी मौखिक ही है। अखबारी बयान के ऐलान पर । धनराशि का ड्राफ्ट तो किसी ने भेजा ही नहीं । ज़्यादातर ने चिट्ठी भी नहीं भेजी । बतर्ज़ नामवर सिंह , मौखिक ही मौलिक है सभी पर तारी है । दिलचस्प यह भी है कि यह सारे लेखक इस तथ्य से भली भांति परिचित हैं कि साहित्य अकादमी के बाईलाज में सम्मान वापस करने का कोई  प्रावधान नहीं है । तो  भी जैसे शादी-व्याह में परिजन मारे ख़ुशी के पैसे लुटाते हैं , ठीक वैसे ही यह कुछ मुट्ठी भर लेखक अपना सम्मान , अगर वह है तो मारे गुस्से में लौटाते जा रहे हैं । यह भूल-भाल कर कि साहित्य अकादमी उन की अपनी संस्था है , सरकारी संस्था नहीं । 

बहरहाल अशोक वाजपेयी और ओम थानवी अब जहां चित्त हो निर्भय के बहाने प्रतिरोध खातिर एक मंच पर हैं । हालां कि जनसत्ता और रज़ा फाउंडेशन के बीच आपसी ज़रूरतों ने उन्हें पहले से नज़दीक किया हुआ है । पर यह तथ्य भी हम सब के सामने है ही कि ओम थानवी अज्ञेय के परम भक्त हैं और अशोक वाजपेयी एक समय अज्ञेय के धुर विरोधी रहे हैं । इतना कि अज्ञेय का नाम लेने से भी कतराते रहे, अज्ञेय को कंडम करते रहे हैं । ख़ैर , ओम थानवी ही क्यों तमाम वामपंथी लेखक भी जो अशोक वाजपेयी से बुरी तरह चिढ़ते रहे हैं , खार खाते रहे हैं और कि अशोक वाजपेयी इन वामपंथी लेखकों से । बिलकुल भारत पाकिस्तान की तरह आपस में लड़ते रहे हैं , वह भी इस मुहिम में गलबहियां डाले दिखे हैं। यह अच्छी बात है। लेखक समाज को छुआछूत से बचना चाहिए और किसी भी जन प्रतिरोध में लेखकों को आपस में कंधे से कंधा मिला कर एकजुट रहना चाहिए । लेकिन अभी यह एक सपना है , एक उम्मीद है जो बहुत क्षीण है । अशोक वाजपेयी जैसे लोगों का स्वार्थ और राजनीति कभी इस मकसद को पूरा होने देगा , मुमकिन नहीं लगता । फिर भी अशोक वाजपेयी के एक कविता संग्रह को ही याद करूं और कहूं कि शहर अब भी एक संभावना है । संभावना है कि मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों ! की जिद से वह फुर्सत लेंगे । एक तरह से अभी ले भी चुके हैं । तो इस बिना पर जापान जाना है तो जापान ही जाएंगे , चीन नहीं ।

क्यों कि समां तो रंगीन ही रहेगा , आप चाहे जापान जाईए चाहे चीन ! इस लिए भी कि साहित्य अब समाज का न तो दर्पण रह गया है ,न ही समाज के या राजनीति के आगे-आगे  चलने वाली मशाल ! जैसे अशोक वाजपेयी आप कांग्रेस के पीछे चल रहे हैं ,वैसे ही कोई भाजपा के पीछे चल रहा है तो कोई वामदल के पीछे । कोई सपा के पीछे , कोई बसपा , कोई जयललिता , कोई नीतीश , कोई लालू आदि के पीछे । कोई किसी के पीछे ,कोई किसी के पीछे । एक बड़ा सच यह भी है कि पुरस्कारों ,यात्राओं , फेलोशिप और पदों आदि के पीछे भागने वाले लेखकों की संख्या इन सब से भी ज़्यादा है ।और आप यही पुरस्कार लौटाने वालों का नेतृत्व कर रहे हैं । ऐसे में आप की इस मुहिम की हवा तो वैसे ही निकली हुई है । ऐसे नाज़ुक दौर में आपने अपना पाठ देर से ही सही दुरुस्त कर लिया है । अच्छी बात है । पर प्रेम  धवन के लिखे और रवि के संगीत में तलत महमूद के गाए उस गाने का भी क्या करें ,सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया ! इस लिए भी कि सम्मान पाने की चीज़ है ,लौटाने की नहीं । वक्त की तरह लौटता नहीं है सम्मान भी ।

यह लिंक भी पढ़ें :

1. साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का तमाशा 

 

2. आंधी फिल्म सिनेमा घरों से उतार उस के प्रिंट जलवा दिए संजय गांधी ने तब क्या किया था गुलज़ार साहब !

 

3. अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर के सिर्फ़ और सिर्फ़ नौटंकी की है

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का तमाशा


 हम सुख़नफ़हम हैं ग़ालिब के तरफ़दार नहीं !



नुमाइश के लिए गुलकारियां दोनों तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियां  दोनों तरफ़ से हैं

जैसे शेर लिखने वाले मुनव्वर राना ने आख़िरकार साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी की घोषणा कर के अशोक वाजपेयी की लिखी इस पटकथा की हवा निकाल कर रख दी है। हालां कि अशोक वाजपेयी की एक कविता है :

हम अपने समय की हारी होड़ लगाएं
और दांव पर लगा दें
अपनी हिम्मत, चाहत, सब-कुछ –
पर एक खिड़की तो खुली रखनी चाहिए
ताकि हारने और गिरने के पहले
हम अंधेरे में
अपने अंतिम अस्त्र की तरह
फेंक सकें चमकती हुई
अपनी फिर भी
बची रह गई प्रार्थना ।

अशोक वाजपेयी की इस प्रार्थना के बावजूद उन की काठ की हांडी अब फिर से भला कहां चढ़ पाएगी ? पर मुनव्वर राना की इसी गज़ल का ही आख़िरी शेर है :

मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है
मिरे कांधे पे ज़िम्मेदारियां  दोनों तरफ़ से हैं ।

लेकिन अशोक वाजपेयी की राजनीति इस बात को कहां समझने वाली है भला ?

सौभाग्य से मुनव्वर राना मेरे महबूब शायर हैं और अशोक वाजपेयी भी मेरे प्रिय कवि हैं । अद्भुत वक्ता और आलोचक भी हैं ।

मुनव्वर राना
खैर उस दिन मुनव्वर राना साहित्य अकादमी लौटाने के बाद अपनी कार में बैठे मीडिया से मुख़ातिब थे । कह रहे थे कि हां , अब इस देश में डर लगता है । कि जाने कब कोई आधी रात मेरा दरवाज़ा खटखटाए । दरवाज़ा खोलने पर कहे कि आप के घर में गाय का गोश्त है। और यह कह कर मुझे मारने लगे । यह सुन कर एक बार मैं भी डर गया । दहशत से भर गया । पूछ रहा था अपने आप ही से कि मेरा महबूब शायर जब इस तरह डर कर इस देश में रह रहा है तो मुझे भी सुकून से रहने , सोने और जीने का हक़ कैसे है भला इस देश में ?

पहली नज़र में देखने पर मामला सचमुच बहुत नाज़ुक लगता है । पर क्या सचमुच ?

हालां कि साहित्य अकादमी प्रति वर्ष चौबीस भाषाओं के दो दर्जन से अधिक लेखकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजती है । इस अनुपात में जाएं तो बहुत काम लेखकों ने अभी यह पुरस्कार लौटाया है । बल्कि चार पांच भाषाओं को छोड़ दें तो ज़्यादातर भाषाओं से साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की बोहनी भी नहीं हुई है । पर देश में यह पहली बार है कि इतनी भारी संख्या में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए गए हैं । यह भी कम चिंता का विषय नहीं है । सरकार के लिए ख़तरे की घंटी है । जाने कब यह सिलसिला थमेगा , यह कोई नहीं जानता। लगता है जैसे कोई भूचाल आ गया है देश में । और यह साहित्यकार इस भूचाल को थाम लेने ही के लिए अपना-अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार कुर्बान किए जा रहे हैं । साहित्य अकादमी पुरस्कार न हो , बच्चों का खिलौना हो । क्या तो यह लेखक सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार न्यौछावर कर रहे हैं । सांप्रदायिकता सचमुच बहुत खतरनाक होती है। वह चाहे हिंदू सांप्रदायिकता हो या मुस्लिम सांप्रदायिकता। दिक्कत यह है कि हमारे राजनीतिक तो राजनीतिक लेखक , पत्रकार और बौद्धिक जन भी हिंदू सांप्रदायिकता पर ख़ूब ज़ोर से बोलते और लिखते हैं। अच्छी बात है। लेकिन मुस्लिम सांप्रदायिकता पर इन के मुंह सिल जाते हैं। कलम थम जाती है। यह बात हमारे मित्र क्यों नहीं समझना चाहते कि उन की इसी चुप्पी ने ही नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधान मंत्री बना दिया है। उन्हें शक्तिशाली बना दिया है । समूची दुनिया इस्लामी आतंकवाद से जूझ रही है , दुनिया तबाह है पर हमारे देश के कुछ लेखक अपनी विचारधारा की आड़ ले कर लंबी ख़ामोशी की चादर ओढ़ कर सो गए हैं । कश्मीर हिंसा , कश्मीरी अलगवावदियों , कश्मीरी पंडितों की समस्या , नक्सली हिंसा आदि पर उन की चुप्पी उन्हें ही रास आती है , देश और समाज  को नहीं । गंगा जमुनी तहज़ीब की बात करते यह लोग नहीं अघाते पर गाय का मांस खाने की पैरवी में जी जान लगा देते हैं । क्या गंगा जमुनी तहज़ीब एकतरफा चलती है । एक आस्था , दूसरी आस्था का सम्मान नहीं करती । गाय का मांस खाना ही धर्मनिरपेक्षता है ? किसी मंदिर की मूर्ति पर पेशाब करना , और फिर उस का बखान करना ही धर्मनिरपेक्षता है ? इस सब से सिर्फ़ साहित्य अकादमी लौटाने से , साहित्य अकादमी को तमाशा बना देने से यह बिगड़ी बात नहीं बनने जा रही। इस ख़तरे को समझना बहुत ज़रुरी है। रेत में सिर धंसा लेने से देश के हालात नहीं बदलने जा रहे। ऐसी नौटंकी से देश नहीं बदलता । न ही समाज। अन्ना आंदोलन की याद आती है ।अन्ना आंदोलन के असमय गर्भपात की  याद आती है । हालां कि अन्ना आंदोलन साहित्य अकादमी के वापसी जैसी नौटंकी नहीं था ,जनांदोलन था । जो बीच राह लुट गया । और फिर साहित्य समाज को जोड़ने का काम करता है , तोड़ने का नहीं । दुनिया का सारा साहित्य मनुष्यता को संवारने का साहित्य है । चाहे वह किसी भी भाषा का साहित्य हो , समाज को हरगिज़ नहीं तोड़ता। साहित्य सर्वदा ही शोषित के पक्ष में होता है , शोषक के नहीं ।

भारतीय भाषा के हर एक लेखक को किसी भी सरकार का विरोध करने का मौलिक , नागरिक और संवैधानिक अधिकार है। भाजपा और नरेंद्र मोदी का भी। लेकिन साहित्य अकादमी किसी भाजपा , किसी कांग्रेस की या किसी नरेंद्र मोदी के पिता जी की जागीर नहीं हैं। यह भारतीय भाषाओं के सभी लेखकों की अपनी जागीर है। दुर्भाग्यवश कुछ लेखक इस तथ्य को भूल-भाल कर सस्ती लोकप्रियता के फेर में पड़ गए हैं। इन सब की मति मारी गई है। विरोध के बेहिसाब तरीक़े हैं लेकिन यह कुछ लेखक तुरंता वाले तरीक़े के चक्कर में पड़ कर अपनी फज़ीहत ख़ुद करते घूम रहे हैं। कहते हैं न कि खरबूजा , खरबूजे को देख कर रंग बदलता है। तो कह सकते हैं कि यह कुछ लेखक लोग भी खरबूजा बन गए हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का ऐलान कर छद्म बहादुरी का तमगा बटोर रहे हैं । वह साहित्य अकादमी पुरस्कार जो लेखकों की ज्यूरी ने ही लेखकों को दिए थे , किसी सरकार , किसी नरेंद्र मोदी ने नहीं । भले आपसी जोड़-तोड़ किया हो। जोड़-जुगाड़ , मान-मनौवल आदि किया हो। अपमान के कई फज़ीहत फेज़ से भी गुज़रे हों। पर राजनीतिक या सरकारी हस्तक्षेप तो नहीं ही कभी रहा है अभी तक। तो गोया कि चुनांचे यह तो अपना ही विरोध हो गया। जिस डाल पर बैठे हैं , वही डाल काटने वाली बात हो गई।

वैसे भी साहित्य में पुरस्कार और सम्मान अब अपमान की अनकही कहानी बन कर रह गए हैं। सरकारी हों , निजी हों या संस्थागत। सब की कहानी एक जैसी है। पुरस्कार और सम्मान वापसी भी अब एक नौटंकी के सिवाय कुछ नहीं है। जो लेखक प्रकाशकों से अपनी रायल्टी लेने का दम नहीं रखते वह समाज बदलने और व्यवस्था को चुनौती देने का दम भरते हैं। हुंकार भरते हैं। डींग मारते हैं । चींटी मारने की हैसियत नहीं , शेर मारने की रणनीति बनाते हैं। क्या तो शिकार करेंगे। समाज बदलेंगे। सवाल है कि आप को पढ़ता भी कौन है , समझता भी कौन है ? किसे बदलना चाहते हैं आप ? पहले ख़ुद को तो बदलिए। भारत की राजनीति एक ज़माने से एक भी रत्ती नैतिक नहीं रह गई है । और हमारे लेखक सरकार पर नैतिक दबाव डालने के लिए अपने वह पुरस्कार लौटाने का शहीदाना अंदाज़ दिखा रहे हैं , जिन पुरस्कारों को पाने के लिए उन्हों ने नैतिकता की सारी किताबें बंगाल की खाड़ी में बहा दी थीं । इतना ही नहीं जो लोग अब तक यह पुरस्कार नहीं पा सके हैं , अभी भी नाक रगड़ रहे हैं। यह पुरस्कार पाने के लिए निर्धारित अपमान के नित नए अभ्यास करते जा रहे हैं। अब न कोई रवींद्रनाथ ठाकुर है , न बंकिम , न शरतचंद्र और न ही भारतेंदु , प्रेमचंद है , न मैथिलीशरण गुप्त , दिनकर , निराला , महादेवी , नेपाली , बच्चन , न ही अज्ञेय , मुक्तिबोध , शमशेर आदि जो जनता से सीधे जुड़ा हो और जनता उस के पीछे चलने को , उस के कहे को , उस के लिखे को सहर्ष स्वीकार करने को तैयार हो। हां, राजनीतिकों के डिक्टेशन पर चलने वाले , अपनी ज़िद , कुतर्क और अहंकार में जीने के आदी लेखक जिन को उन का पड़ोसी भी नहीं पहचानता , न ही कोई पाठक संसार है उन का , ख़ुद ही लिखते हैं , ख़ुद ही पढ़ते हैं । अपठनीय इतने कि चेतन भगत जैसे मसाला लेखक उन की स्पेस ले लेते हैं । जनता और जनता की भावनाओं को समझने में नाकाम यही लोग अकेले क्रांति की बिगुल बजाते हुए , अपने को खुदा मानते हुए , एकतरफा फ़ैसला लेते हुए इतिहास में दर्ज होने को बेताब दीखते हैं । इन की इस ललक कि सजनी हमहूं राजकुमार , के क्या कहने ! 

पंजाबी कवि पाश की जब पंजाब में आतंकवादियों ने हत्या की थी या सुलतानपुर में मान बहादुर सिंह मान की हत्या हुई और फिर गाज़ियाबाद में जब सफ़दर हाशमी की हत्या हुई थी तब कितने लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया था ? ऐसी और भी घटनाओं को जोड़ कर कोई विद्वान , कोई जानकार , कोई क्रांतिकारी अगर मुझे जानकारी दे सके तो आभारी रहूंगा। नहीं मैं बिलकुल नहीं पूछ रहा हूं कि 1984 में सिख दंगों या तमाम अन्य दंगों या फिर भोपाल में यूनियन कार्बाईड में मारे गए लोगों की संवेदना में कितने लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए ? कोलगेट , टू जी टाईप स्कैम आदि पर कितने लेखकों ने साहित्य अकादमी लौटाना तो दूर जुबान भी कितने लेखकों ने खोली। मैं यह भी नहीं पूछ रहा । क्यों कि मैं जानता हूं कि ऐसा किसी ने कुछ किया ही नहीं । सोचा भी नहीं । साहित्य अकादमी लौटाने वाले कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो अमरीकी संस्था फ़ोर्ड फाउंडेशन से फंडिंग पाते रहे हैं । उन की इस फंडिंग पर नरेंद्र मोदी सरकार ने रोक लगा दी है। आज एक चैनल पर गुजराती लेखक गणेश देवी से सीधे यही सवाल जब पूछ लिया गया कि क्या फोर्ड फाऊंडेशन द्वारा आप को हो रही फंडिंग को मोदी सरकार द्वारा रोक लगा देने की प्रतिक्रिया में यह साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी का फैसला आप ने ले लिया है ? यह सवाल सुनते ही गणेश देवी पसीना-पसीना हो गए । कोई जवाब नहीं दे पाए । तो मामला कहीं पे निगाहें , कहीं पे निशाना का भी है ।

अगर समूचे देश में सभी किस्म की किताबों की सरकारों द्वारा थोक ख़रीद बंद कर दी जाए तो कितने प्रकाशक बचेंगे , कितने लोग लेखक बने रहेंगे और कि कितने लेखकों की किताबें छपती रहेंगी ? कम से कम हिंदी में तो लिखना-छपना ठप्प हो ही जाएगा। यह बात मैं पूरी सख्ती से कह रहा हूं। सच यह है कि सरकारी ख़रीद ने लेखक-पाठक संबंध समाप्त कर दिया है। सरकारी ख़रीद के चलते पचीस रुपए की किताब का दाम प्रकाशक पांच सौ रुपए रखते हैं। तो कोई भी पचीस या पचास रुपए की किताब पांच सौ या हज़ार रुपए में क्यों खरीदेगा ? दूसरे , पनचानबे प्रतिशत प्रकाशक किताबें दुकान पर बिकने के लिए नहीं रखते और कहते हैं कि किताब नहीं बिकती। लेकिन हमारी लेखक बिरादरी कभी भी प्रकाशकों की इस प्रवृत्ति का भूल कर भी विरोध नहीं करती। प्रकाशकों से कभी रायल्टी नाम की अपनी मजदूरी की बात नहीं करती । और तो और इन बेईमान , चोर और मक्कार प्रकाशकों को पैसे दे कर चोरों की तरह किताब छपवाती है। समाज में अपनी पहचान और शिनाख्त खो चुकी यही लेखक बिरादरी छद्म क्रांति का बिगुल बजाती है तो देश की जनता इन का मज़ाक उडाती है। लेकिन इस बिरादरी को इस से कुछ बहुत फ़र्क नहीं पड़ता। इस लिए भी कि यह लोग जनता के लिए नहीं , ख़ुद के लिए लिखते हैं । ख़ुद का लिखा ख़ुद पढ़ते हैं और अपना अहंकार दसगुना करते हुए मस्त रहते हैं कि हाय , मैं ने क्या तो ग्रेट लिखा है !

तो साहित्य अकादमी लौटा कर इन लेखकों ने समाज में अपना मजाक ही उड़ाया है । क्यों कि यह लेखक अगर राजनीति भी कर रहे हैं तो इन को राजनीति करने भी नहीं आती । कर्नाटक में कुलबुर्गी की हत्या हुई । वहां कांग्रेस की सरकार है । उत्तर प्रदेश की दादरी में अख़लाक़ की हत्या हुई । दादरी उत्तर प्रदेश में है । कानून व्यवस्था सर्वदा राज्य सरकार का विषय होता है । और कमोबेश सभी लेखकों ने राज्य सरकारों की बजाय मोदी सरकार और मोदी को निशाना बनाया है । यह उन का अधिकार है । मोदी की गलती यह है कि इन घटनाओं की तुरंत निंदा नहीं की और उचित समय का इंतज़ार करने में समय गंवाया । इस बीच भाजपा के छुटभैयों ने अनाप-शनाप बयान दे कर माहौल बिगाड़ा । खैर यह उन की अपनी राजनीति है । वह लेखकों के डिक्टेशन पर राजनीति नहीं करने वाले । पर काशी के लेखक काशीनाथ सिंह क्या कर रहे हैं ? एक लाख का साहित्य अकादमी तो मौखिक बयान दे कर लौटा दिया । लेकिन पांच लाख के यश भारती पर वह क्यों चुप लगा गए ? यह दोहरा मानदंड लेखन में तो नहीं चलता । काशी को भारत भारती भी निश्चित रूप से लौटा देना चाहिए । और मुनव्वर राना ? साहित्य अकादमी लौटाने के एक दिन पहले तक साहित्य अकादमी लौटाने वालों को थका हुआ बता रहे थे । निंदा कर रहे थे । लेकिन अचानक एक चैनल पर वह नाटकीय हो गए । चेक हवा में लहरा दिया । साहित्य अकादमी लौटाने का ऐलान ऐसे कर दिया गोया कोई मुशायरा लूट लिया हो । मुशायरे की ड्रामेबाज़ी नहीं है साहित्य अकादमी मुनव्वर राना । खैर अभी भी मुनव्वर कह रहे हैं कि अगर प्रधान मंत्री कह दें तो वह अपनी साहित्य अकादमी वापस ले लेंगे । सोनिया की चरणवंदना में लोट-पॉट आरती लिखने के बावजूद मुनव्वर राना एक मकबूल शायर हैं पर साथ ही वह ट्रांसपोर्ट का कारोबार भी करते हैं । यह उन की कारोबारी विवशता भी मानी जा सकती है । और अब तो बात इतनी आगे बढ़ गई है कि पी एम ओ से प्रधान मंत्री से मुलाकात करने के बाबत आए फ़ोन के बाद मुनव्वर राना नरेंद्र मोदी को बड़ा भाई मान कर उन का जूता तक उठाने को तैयार हो गए हैं । गोपालदास नीरज जैसे लोकप्रिय कवि खुल कर कह रहे हैं कि यह साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की कवायद सिर्फ़ नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की कार्रवाई है । नरेंद्र कोहली , मैत्रेयी पुष्पा जैसे उपन्यासकार खुल कर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने को गलत बता रहे हैं । प्रेमचंद पर विश्वकोश तैयार करने वाले कमल किशोर गोयनका तक इस साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी पर अशोक वाजपेयी पर निशाना साध गए हैं । हां , अप्रत्याशित रूप से गुलज़ार भी बोल गए हैं और बता दिए हैं कि अब कुछ भी बोलने में डर लगता है। मान लिया गया है कि कांग्रेस द्वारा विगत में उन्हें दिए गए इंदिरा गांधी पुरस्कार का यह ऋण चुका रहे हैं गुलज़ार । नहीं संचार क्रांति के इस युग में कौन मान लेगा भला कि भारत में अब कुछ बोलना डर का विषय हो गया है ? आज़म खान नहीं बोल रहे हैं , कि ओवैसी नहीं बोल रहे हैं ? आदित्यनाथ नहीं बोल रहे हैं , कि साक्षी या साध्वी नहीं बोल रहे ? की अपने स्वनामधन्य लेखक नहीं बोल रहे ? साहित्य अकादमी की नदी में इस बीच बहुत कुछ बह गया है । विरोध , प्रतिरोध और समर्थन के जुलूस , बयान , टिप्पणियों आदि की इतनी सारी लहरें उठ और गिर चुकी हैं कि इन की औपचारिक मिनिट्स भी किसी के पास नहीं है । बन भी नहीं सकती । साहित्य अकादमी ने लेखकों के पक्ष में खड़े होने और लेखकों की हत्या के ख़िलाफ़ अपना ज़रूरी बयान , बैठक , निंदा आदि सारी औपचारिकताएं पूरी निष्ठा से निभा दी हैं । सवाल फिर भी शेष हैं , शेष रहेंगे ।  संसद और साहित्य कभी भी शांत रहने वाली इकाई नहीं रही हैं । यही इन का जीवन और यही इन की ऊर्जा है ।


अशोक वाजपेयी
पर अशोक वाजपेयी ?

सच यह है कि साहित्य अकादमी वापसी की इस नौटंकी की सारी पटकथा ही अशोक वाजपेयी की लिखी हुई है । उन का कांग्रेस से अनुराग किसी से छुपा हुआ नहीं है । [ देखें बॉक्स -1 ] उदय प्रकाश , मंगलेश डबराल आदि इन के पूर्वग्रह के दिनों के लेफ्टिनेंट हैं । और अशोक वाजपेयी कांग्रेस के पुराने और खुर्राट लेफ्टिनेंट । लेकिन कांग्रेस के डिक्टेशन पर यह साहित्यकार इस कदर उतावले हो जाएंगे , देश यह नहीं जानता था । विरोध नरेंद्र मोदी का करना है , विरोध वह साहित्य अकादमी का कर रहे हैं । वह साहित्य अकादमी , जो लेखकों की अपनी है । नेहरू द्वारा स्थापित । राम जाने , साहित्य रचते समय यह लेखक वर्ग शत्रु की शिनाख्त कैसे करते होंगे ? क्या इसी तरह ?  कि  उन्हें मछली की आंख नहीं दिखती , पूरी मछली दिखती है ? क्या साहित्य इसी लिए समाज  कटता जा रहा है ? साहित्य के बजाय सिनेमा समाज का दर्पण बनता जा रहा है । क्या इसी लिए ?

ख़ैर , पुरस्कार लौटने की यह कोई नई कहानी नहीं है । पर सब से मकबूल कहानी है ज्यां पल सार्त्र की नोबल पुरस्कार लौटाने की कहानी । जो आज तक लोग भूले नहीं हैं । बल्कि सार्त्र ने लौटाया भी नहीं था , ठुकराया था नोबल पुरस्कार । उन का वश चला होता तो वह अपने लिए नोबल पुरस्कार का ऐलान भी नहीं होने दिया होता । लेकिन उन्हों ने नोबल न लेने के लिए भी सख्त विरोध दर्ज करने के लिए बहुत ही शालीन भाषा का इस्तेमाल किया था । अपने इन भारतीय लेखकों की तरह नौटंकी की कोई पटकथा नहीं लिखी थी । [ देखें बॉक्स नंबर -2 ] अपने गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने भी जालियां वाला बाग़ में हुई नृशंस हत्याओं के विरोध में नाइटहुड वापस किया था । दुःख में डूब कर । पूरी शालीनता के साथ । किसी नौटंकी में डूब कर नहीं । [ देखें बाक्स नंबर-3 ]। लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले लोगों की भाषा पर गौर कीजिए । और  लेखकों से पूछिए तो भला कि जिस मुद्दे पर आप यह नौटंकी और हिप्पोक्रेसी बघार रहे हैं , इस मुद्दे पर कभी कुछ लिखा भी है ?

वास्तव में यह लेखक साहित्य अकादमी नहीं लौटा रहे । साहित्य अकादमी लौटाने के बहाने नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं । लोकसभा चुनाव में बनारस जा कर बंद कमरे में  बैठक कर यह लेखक नरेंद्र मोदी को चुनाव हराने का असफल उपक्रम भी कर चुके हैं । सुविधाओं और जोड़-तोड़ में आकंठ जीने के आदी हो चले , एक निश्चित माइंड सेट में जीने के आदी हो चले यह लेखक फासिज्म का विरोध करते-करते खुद फासिस्ट हो चले हैं । अपनी विचारधारा से अलग जनता द्वारा एक निर्वाचित प्रधान मंत्री को बर्दाश्त करना अब उन की बर्दाश्त से बाहर हो चला है । इन लेखकों को क्या नहीं मालूम कि राजनीतिक विरोध करने के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है ?  लाठी , गोली और जेल जैसी सख्त चीज़ों का सामना करना पड़ता है ? समाज में इस सब की स्वीकृति पानी होती है ? यह लेखक यह सारी बातें जानते हैं । लेकिन यह सब करना , सड़क पर उतरना , उन के लिए टेढ़ी खीर है । अब मोमबत्ती जुलूस , एक आध घंटा का धरना , या कोई घंटे-दो घंटे का जुलूस वह ज़रूर सौ पचास लोगों का निकाल सकते हैं लेकिन सड़क पर उतर कर लाठी-गोली खाने का माद्दा नहीं रह गया है । यह वह लेखक हैं जो अपनी मज़दूरी रूपी रायल्टी प्रकाशक से ले पाने की  हैसियत भी गंवा चुके हैं । तो इन के लिए सड़क पर उत्तर कर कोई राजनीतिक लड़ाई लड़ने से ज़्यादा आसान है , ड्राइंग रूम में बैठ कर साहित्य अकादमी लौटा देने का मौखिक ऐलान कर देना । वह साहित्य अकादमी जो लेखकों की खुद की है । 

इस प्रसंग में बार-बार साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की चुप्पी को भी विषय बनाते रहे हैं । उन लोगों को जान लेना चाहिए कि साहित्य अकादमी का अध्यक्ष राजनीतिक व्यक्ति नहीं होता जो बात-बेबात बयान देता फिरे । और जो लोग नहीं जानते , वह लोग यह तथ्य भी ज़रूर जान लें कि गोरखपुर विश्विद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे , साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और प्रसिद्ध कवि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पुराने गांधीवादी हैं। लाल बहादुर शास्त्री , हेमवती नंदन बहुगुणा , शिब्बन लाल सक्सेना जैसे कांग्रेसियों के साथ ज़मीनी स्तर पर काम कर चुके हैं। वह हिंदी के पहले ऐसे लेखक हैं जो लेखकों द्वारा निर्वाचित हो कर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बने हैं। इस के पहले वह हिंदी के पहले निर्वाचित उपाध्यक्ष थे। उन्हों ने हिंदी को साहित्य अकादमी में प्रतिष्ठित किया है। हिंदी का मान बढ़ाया है । एक भी पैसे का कोई दाग उन पर नहीं है। रूस में बरसों से हिंदी पढ़ाने वाले कवि अनिल जनविजय तो लिखते हैं , यही नहीं, तिवारी जी पूरी तरह से निर्लोभ व्यक्ति हैं। साहित्य अकादमी द्वारा अध्यक्ष को उपलब्ध कराई जाने वाली अधिकतर सुविधाएँ उन्होंने त्याग रखी हैं। अकादमी का एक पैसा भी वे अपने निजी कामों के लिए खर्च नहीं करते हैं। बहुत साधारण, सहज और संयमित स्वभाव के तिवारी जी अकादमी का कोई दुरुपयोग नहीं करते हैं। मैं उन्हें निजी तौर पर 38 साल से जानता हूँ। इसलिए मेरी आप सबसे यह अपील है कि उन पर कोई भी आक्षेप या आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए।नामवर सिंह ने अरसे बाद एक संतुलित बात कही कि यह साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाना ठीक नहीं है । पर उन के छोटे भाई काशीनाथ सिंह ने ही उन की नहीं सुनी । तो बाकी का क्या कहना और क्या सुनना ।

साहित्य अकादमी लौटाने वाले यह सूरमा लेखक आगे फिर कौन सा पुरस्कार ले सकेंगे ? सेठों के पुरस्कार ज्ञानपीठ , व्यास वगैरह ? इन पुरस्कारों में भी कारपोरेट की आवारा पूंजी वास करती है ।  बुकर , नोबल वगैरह ? वहां तक दौड़ नहीं है । और फिर अमरीकापरस्त हैं , साम्राज्यवादी आदि हैं यह सब अलग । बाक़ी तो ग़ालिब के एक मिसरे में जो कहूं कि ; हम सुख़नफ़हम हैं ‘ग़ालिब’ के तरफ़दार नहीं ! थोड़ा कहना , बहुत समझना ! आमीन !

 नोबेल पुरस्कार लौटाते हुए सार्त्र का खत 


सार्त्र

मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है कि इस मुद्दे को सनसनीखेज़ घटना की तरह देखा जा रहा है: एक पुरस्कार मुझे दिया गया था और इसे मैंने लेने से इंकार कर दिया.

यह सब इसलिए हुआ कि मुझे इस बात का ज़रा भी इल्म नहीं था कि भीतर ही भीतर क्या चल रहा है. 15 अक्तूबर, ‘फ़िगारो लिट्रेरिया’ के स्वीडिश संवाददाता स्तम्भ में मैंने जब पढ़ा कि स्वीडिश अकादमी का रुझान मेरी तरफ है, लेकिन फिर भी ऐसा कुछ निश्चित नहीं हुआ है, तो मुझे लगा कि अकादमी को इस बाबत ख़त लिखना चाहिए जिसे मैंने अगले दिन ही लिखकर रवाना कर दिया ताकि इस मसले की मालूमात कर लूँ और भविष्य में इस पर कोई चर्चा न हो.

तब मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्तकर्ता की सहमति के  बगैर ही प्रदान किया जाता है. मुझे लग रहा था कि वक्त बहुत कम है और इसे रोका जाना चाहिए. लेकिन अब मैं जान गया हूँ कि स्वीडिश अकादमी के किसी फ़ैसले को बाद में मंसूख करना संभव नहीं.
जैसा कि मैं अकादमी को लिखे पत्र में ज़ाहिर कर चुका हूँ, मेरे इंकार करने का स्वीडिश अकादमी या नोबेल पुरस्कार के किसी प्रसंग से कोई लेना-देना नहीं है. दो वजहों का ज़िक्र मैंने वहां किया है: एक तो व्यक्तिगत और दूसरे मेरे अपने वस्तुनिष्ठ उद्देश्य.

मेरा प्रतिषेध आवेशजनित नहीं है. निजीतौर पर मैंने आधिकारिक सम्मानों को हमेशा नामंजूर ही किया है. 1945 में युद्ध के बाद मुझे लिजन ऑफ़ ऑनर (Legion of Honor) मिला था. मैंने लेने से इंकार कर दिया, यद्यपि मेरी सहानुभूति सरकार के साथ थी. इसी तरह अपने दोस्तों के सुझाव के बावज़ूद भी ‘कॉलेज द फ़्रांस’ में घुसने की मेरी कभी चेष्टा नहीं रही.

इस नज़रिए के पीछे लेखक के जोख़िम भरे उद्यम के प्रति मेरी अपनी अवधारणा है. एक लेखक जिन भी राजनैतिक, सामाजिक या साहित्यिक जगहों पर मोर्चा लेता है, वहां वह अपने नितांत मौलिक साधन- यानी ‘लिखित शब्दों’ के साथ ही मौज़ूद होता है. वे सारे सम्मान जिनकी वजह से उसके पाठक अपने ऊपर दबाब महसूस करने लगें, आपत्तिजनक हैं. बतौर ज्यां-पाल सार्त्र के दस्तख़त या नोबेल पुरस्कार विजेता ज्यां-पाल
सार्त्र के दस्तखतों में भारी अंतर है.

एक लेखक जो ऐसे सम्मानों को स्वीकार करता है, वस्तुतः खुद को एक संघ या संस्था मात्र में तब्दील कर देता है. वेनेजुएला के क्रांतिकारियों के प्रति मेरी संवेदनाएं एक तरह से मेरी अपनी प्रतिबद्धताएँ हैं, पर यदि मैं नोबेल पुरस्कार विजेता, ज्यां-पाल सार्त्र की हैसियत से वेनेजुएला के प्रतिरोध को देखता हूँ तो एक तरह से ये प्रतिबद्धताएँ नोबेल पुरस्कार के रूप में एक पूरी संस्था की होंगी. एक लेखक को इस तरह के रूपांतरण का विरोध करना चाहिए, चाहें वह बहुत सम्मानजनक स्थितियों में ही क्यों न घटित हो रहा हो, जैसा कि आजकल हो रहा है.

यह नितांत मेरा अपना तौर-तरीका है और इसमें अन्य विजेताओं के प्रति किसी भी तरह का निंदा भाव नहीं. यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसे कई सम्मानित लोगों से मेरा परिचय है और मैं उन्हें आदर तथा प्रशंसा की दृष्टि से देखता हूँ.

कुछ कारणों का संबंध सीधे मेरे उद्देश्यों से जुड़ा है: जैसे, सांस्कृतिक मोर्चे पर केवल एक-ही तरह की लड़ाई आज संभव है- दो संस्कृतियों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की लड़ाई. एक तरफ पूर्व है और दूसरी तरफ पश्चिम. मेरे कहने का यह अभिप्राय भी नहीं कि ये दोनों एक-दूसरे को गले से लगा लें- मैं भलीभांति इस सच को जानता हूँ कि ये दोनों संस्कृतियाँ आमने-सामने खड़ीं हैं और अनिवार्य रूप से इनका स्वरूप द्वंद्वात्मक है- पर यह झगड़ा व्यक्तियों और संस्कृतियों के बीच है और संस्थाओं का इसमें कोई दखल नहीं.

दो संस्कृतियों के इस विरोधाभास ने मुझे भी गहरे तक प्रभावित किया है. मैं ऐसे ही विरोधाभासों की निर्मिती हूँ. इसमें कोई शक नहीं कि मेरी सारी सहानुभूतियाँ समाजवाद के साथ हैं और इसे हम पूर्वी-ब्लॉक के नाम से भी जानते हैं; पर मेरा जन्म और मेरी परवरिश बूर्जुआ परिवार और संस्कृति के बीच हुई है. ये सब स्थितियां मुझे इस बात की इज़ाज़त देती हैं कि मैं इन दोनों संस्कृतियों को करीब लाने की कोशिश कर सकूं. ताहम, मैं उम्मीद करता हूँ कि “जो सर्वश्रेष्ठ होगा, वही  जीतेगा.” और वह है –समाजवाद.

इसलिए मैं ऐसे सम्मान को स्वीकार नहीं कर सकता जो सांस्कृतिक प्राधिकारी वर्ग के ज़रिये मुझे मिल रहा हो. चाहें वह पश्चिम के बदले पूर्व की ओर से ही क्यों न दिया गया हो, चाहें मेरी संवेदनाएं दोनों के अस्तित्व के लिए ही क्यों न पुर-फ़िक्र हों, जबकि मेरी सारी सहानुभूति समाजवाद के साथ है. यदि कोई मुझे ‘लेनिन पुरस्कार’ भी देता तब भी मेरी यही राय रहती और मैं इंकार करता...जबकि दोनों बातें एकदम अलहदा हैं.

मैं इस बात से भी वाकिफ़ हूँ कि नोबेल पुरस्कार पश्चिमी खेमे का साहित्यिक पुरस्कार नहीं है, पर मैं यह जानता हूँ कि इसे कौन महत्त्वपूर्ण बना रहा है, और कौनसी वारदातें जो कि स्वीडिश अकादमी के कार्यक्षेत्र के बाहर है, इसे लेकर घट रही हैं –इसलिए सामयिक हालातों में यह सुनिश्चित हो जाता है कि नोबेल पुरस्कार पूर्व और पश्चिम के बीच फांक पैदा करने के लिए या तो पश्चिम के लेखकों की थाती हो गया है, या फिर पूरब के विद्रोहियों के लिए आरक्षित है. यथा, ये कभी नेरुदा को नहीं दिया गया जो दक्षिण अमेरिका के महान कवियों में से हैं. कोई इस पर गंभीरता से नहीं सोचेगा कि इसे लुइ अरागोन को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए जबकि वह इसके हकदार हैं. यह अफ़सोसजनक था कि शोलकोव की जगह पास्टरनक को सम्मानित किया गया था, जो अकेले ऐसे रूसी लेखक थे जिनका विदेशों में प्रकाशित काम सम्मानित हुआ जबकि अपने ही वतन में यह प्रतिबंधित किया गया था.

दूसरी तरह से भी संतुलन स्थापित हो सकता था. अल्जीरिया के मुक्ति संग्राम में जब हम सब “121 घोषणापत्र” पर दस्तखत कर रहे थे, तब यदि यह सम्मान मुझे मिलता तो मैं इसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार कर लेता क्योंकि यह केवल मेरे प्रति सम्मान न होता बल्कि उस पूरे मुक्ति-संग्राम के प्रति आदर-भाव होता जो उन दिनों लड़ा जा रहा था. लेकिन चीज़ें इस दिशा में, इस तरह नहीं हुईं.

अपने उद्देश्यों पर चर्चा करते वक्त स्वीडिश अकादमी को कम-अज-कम उस शब्द का ज़िक्र तो करना चाहिए था –जिसे हम ‘आज़ादी’ कहते हैं और जिसके कई तर्जुमें हैं. पश्चिम में इसका अर्थ सामान्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सन्दर्भों तक सीमित है- अर्थात एक ऐसी ठोस आज़ादी जिसमें आपको एक जोड़ी जूते से अधिक पहनने और दूसरे के हिस्से की भूख हड़प लेने का अधिकार है. अतः मुझे लगा कि सम्मान से इंकार करना कम खतरनाक है बजाय इसे स्वीकार करने के. यदि मैं इसे स्वीकार कर लेता तो यह खुद को “उद्देश्यों के पुनर्वास” हेतु सौंपना होता. ‘फ़िगारो लिट्रेरिया’ में प्रकाशित लेख के अनुसार, “किसी भी तरह के विवादास्पद राजनैतिक अतीत से मेरा नाम नहीं जुड़ा था.” लेख का मंतव्य अकादमी का मंतव्य नहीं था और मैं जानता था कि दक्षिणपंथियों में मेरी स्वीकारोक्ति को क्या जामा पहनाया जाता. मैं “विवादित राजनैतिक अतीत” को आज भी जायज़ ठहराता हूँ. मैं इस बात के लिए भी तैयार हूँ कि यदि अतीत में मेरे कॉमरेड दोस्तों से कोई गलती हुई हो तो बेहिचक मैं उसे कुबूल कर सकूं.

इसका यह अर्थ भी न लगाया जाए कि ‘नोबेल पुरस्कार’ बूर्जुआ मानसिकता से प्रेरित है, लेकिन निश्चित रूप से ऐसे कई गुटों में, जिनकी नस-नस से मैं वाकिफ़ हूँ, इसकी कई बूर्जुआ व्याख्याएँ जरूर की जायेंगी.

अंत में, मैं उस देय निधि के प्रश्न पर बात करूँगा. पुरस्कृत व्यक्ति के लिए यह भारस्वरूप है. अकादमी समादर-सत्कार के साथ भारी राशि अपने विजेताओं को देती है. यह एक समस्या है जो मुझे सालती है. अब या तो कोई इस राशि को स्वीकार करे और इस निधि को अपनी संस्थाओं और आंदोलनों पर लगाने को अधिक हितकारी समझे –जैसा कि मैं लन्दन में बनी रंग-भेद कमिटी को लेकर सोचता हूँ; या फिर कोई अपने उदार
सिद्धांतों की खातिर इस राशि को लेने से इंकार कर दे, जो ऐसे वंचितों के समर्थन में काम आती. लेकिन मुझे यह झूठ-मूठ की समस्या लगती है. ज़ाहिर है मैं 250,000 क्राउंस की क़ुरबानी दे सकता हूँ क्योंकि मैं खुद को एक संस्था में  रूपांतरित नहीं कर सकता –चाहे वह पूर्व हो या पश्चिम. पर किसी को यह कहने का हक़ भी नहीं है कि 250,000 क्राउंस मैं यूं ही कुर्बान कर दूँ जो केवल मेरे अपने नहीं हैं बल्कि मेरे सभी कॉमरेड दोस्तों और मेरी विचारधारा से भी तालुक्क रखते हैं.

इसलिए ये दोनों बातें- पुरस्कार लेना या इससे इंकार करना, मेरे लिए तकलीफ़देह है.

इस पैगाम के साथ मैं यह बात यहीं समाप्त करता हूँ कि स्वीडिश जनता के साथ मेरी पूर्ण सहानुभूति है और मैं उनसे इत्तेफ़ाक रखता हूँ.




                                                 रवींद्रनाथ टैगोर ‘नाइटहुड’ सम्मान लौटाते हुए            

रवींद्रनाथ टैगोर


कलकत्ता
31 मई, 1919
महामहिम


सरकार ने पंजाब के स्थानीय उपद्रवों को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर जिन उपायों का इस्तेमाल किया है वह हमारे लिए क्रूर सदमे की तरह है और ब्रिटिश शासन के अधीनस्थ हम भारतीयों की बेबसी और स्थिति को भी बयान करता है.

हमें विश्वास हो गया है कि जिस बेतुकेपन और सख्तियों से बदकिस्मत लोगों को दंड दिया गया है  और जिस तरीके से इसे किया गया है वह दूर-दराज़ तक किसी विशिष्ट अपवाद के रूप में भी  इतिहास की सभ्य सरकारों के अनुरूप नहीं. जिस सत्ता का डील डौल ही मानव जीवन की ध्वंस लीला में भीषण रूप से दक्ष है, उसके द्वारा निहत्थे और साधन विहीन लोगों के साथ किये गए इस बर्ताव को देखते हुए हम दृढ़तापूर्वक ये कह सकते हैं कि इनसे किसी तरह के राजनैतिक मुनाफे का दावा नहीं किया जा सकता और नैतिक समर्थन की तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती. पंजाब में हमारे भाइयों के साथ हुए अपमान और कष्टों का लेखा-जोखा धीरे-धीरे इन चुप्पियों से रिसने लगा है और भारत के हर कोने में पहुँच गया है.  इस विश्वव्यापी व्यथा से हमारे लोगों में जागा हुआ आक्रोश शासकों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया है – संभवतः वे  इसे हितकारी पाठ मानकर स्वयं को बधाई दे रहे हैं.  अधिकांश एंग्लो-इंडियन पत्रिकाओं ने इस निर्दयता की प्रशंसा की है और कुछ इस हद तक क्रूर हो गईं कि हमारी त्रासदियों का तमाशा बन गया है. सत्ता ने लगातार इस बात का ख़ास ख्याल रखा है कि कैसे हमारी दर्दभरी चीखों और उन तमाम अभिव्यक्तियों का जो हमारे अंग-अंग से व्यंजित होती हैं, गला घोंट दिया जाए.

हम जानते हैं कि हमारी सभी अपीलें व्यर्थ चली गई हैं और प्रतिशोध की आग ने हमारी सरकार की कुलीन शासन-कला को अँधा बना दिया है जबकि वह यथोचित ताकत और नैतिक परम्पराओं के साथ रहते हुए उदारमना हो सकती थी. मैं अपने देश के लिए कम से कम  इतना कर सकता हूँ कि तमाम नतीजों की ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने लाखों देशवासियों की आवाज़ बन सकूं जो यंत्रणा की इस दहशत में हैरान और आवाक हैं. यह ऐसा समय है जबकि शर्मिंदगी और अपमान के बीच सम्मान के चमचमाते इन पदकों को मैं असंगत पाता हूँ, और अब मैं खुद को सभी विशिष्ट पदवियों से अलग करते हुए, अपने देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूँ, जो अपनी तथाकथित निरर्थकताओं के कारण अपमान को झेलने के लिए मजबूर हैं और जिन्हें मनुष्य कहलाने लायक भी नहीं समझा जाता.

इन्ही कारणों ने मुझे कष्टपूर्वक महामहिम से यथोचित सन्दर्भ और खेद के साथ यह कहने पर मजबूर किया है कि आप मुझे  नाइट की पदवी से भारमुक्त  कर दीजिये, जिसे मैंने  आपके पूर्वजों के हाथों कभी स्वीकार किया था और जिनकी सज्जनता की  अभी भी मैं सत्कारपूर्वक प्रशंसा करता हूँ.

आपका
रवीन्द्रनाथ टैगोर
______ 
[ दिल्ली से प्रकाशित ओपिनियन पोस्ट में बतौर कवर स्टोरी प्रकाशित ]  

   
यह लिंक भी पढ़ें :


1. आंधी फिल्म सिनेमा घरों से उतार उस के प्रिंट जलवा दिए संजय गांधी ने तब क्या किया था गुलज़ार साहब !

 

2. अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर के सिर्फ़ और सिर्फ़ नौटंकी की है

 

 



    


Friday, 30 October 2015

यशोदा बेन ने धरना दे दिया है कि आज वह नरेंद्र मोदी को सामने से देख कर ही करवाचौथ का व्रत तोड़ेंगी

 व्यंग्य

नरेंद्र मोदी और यशोदा बेन

यह देखिए नरेंद्र मोदी की पत्नी यशोदा बेन ने धरना दे दिया है कि आज वह चांद के साथ-साथ नरेंद्र मोदी को भी आमने-सामने देख कर ही करवाचौथ का व्रत तोड़ेंगी । गुजरात की मुख्यमंत्री. आनंदी बेन पटेल मौके पहुंच गई हैं । यशोदा बेन को मना रही हैं । समझा रही हैं कि बहन माण जाईए। साहब बिहार चुनाव में व्यस्त हैं । आप के इस धरने का लालू और नीतीश लाभ उठा लेंगे। लेकिन यशोदा बेन टस से मस नहीं हो रहीं । यह देखिए यशोदा बेन मेंहदी भी लगवा रही हैं । उन्हें पूरा यकीन है कि नरेंद्र मोदी को इस बार करवाचौथ पर झुकाने में कामयाब हो जाएंगी । लेकिन आनंदीबेन पटेल भी अपनी कूटनीति पर पूरा भरोसा जता रही हैं। जहां तक इस मसले पर नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया की बात है वह सर्वदा की तरह हर महत्वपूर्ण घटना पर जैसे चुप्पी साध जाते हैं , मनमोहन सिंह को भी मात दे देते हैं , इस घटना पर भी पारंपरिक रूप से मौन हो गए हैं । 


आनंदी बेन पटेल
अब यह देखिए उधर पटना से लालू यादव बता रहे हैं कि मोदिया पुराना लंपट है। यशोदा बेन बहन के पास ऊ कब्बो नाहीं जाएगा। लेकिन हमारा एक गो सलाह है यशोदा बहन को कि  अब की जब मोदिया सामने आए तो हिक भर थुर दीजिएगा । मारा है बिहार में नरक कर दिया है । थुरने  में मुश्किल आए तो बताइएगा बहन राबड़ी सब सिखा देगी । यह देखिए लालू जी ही-ही कर के हंस रहे हैं और बता रहे हैं कि , लेकिन हमारी वाली तो हम को देख कर ही खाएगी । राबड़ी को वह बगल में बिठा कर बाईट दे रहे हैं ।लेकिन उधर पूर्व मंत्री कांति सिंह भी हुमच रही हैं कि लालू जी यह तो सरासर अन्याय है । हमारा आप का तय हुआ था कि करवाचौथ हमारे साथ , छठ राबड़ी जी के साथ । लेकिन चूंकि हमारा चैनल माताएं-बहने भी देखती हैं और कि यह व्यक्तिगत मसला है सो इस बाईट को हम नहीं दिखाएंगे ।

लेकिन यह देखिए , ज़रा ध्यान से देखिए नीतीश कुमार तो कैमरे से आंख  चुरा रहे हैं । जानते हैं क्यों ? 

आप नहीं जानते तो हम बता देते हैं आप को । लेकिन इस के पहले यह बताईए कि आप ने कभी भी , किसी भी मौक़े पर नीतीश कुमार को सपत्नीक देखा है ? अगर किसी ने भी देखा हो हालिया दस-बीस सालों में तो हमें इस नंबर पर फोन कर के बताईए। हम आप को पाकिस्तान और बांग्लादेश घूमने के लिए एयर टिकट फ्री देंगे । और अगर कोई नीतीश कुमार और उन की पत्नी की साथ में फ़ोटो भी हमें भेज सकता हो तो उसे मिस्र और सीरिया की तीन दिन की यात्रा फ्री करवाएंगे । लेकिन हमारा दावा है कि नीतीश कुमार की पत्नी की फोटो भी लोग नहीं देखे होंगे । लेकिन हम आप को दिखाएंगे। इसी चैनल पर पहली बार दिखाएंगे। बस आप देखते रहिए। 

नीतीश कुमार
वैसे तो एक बार राबड़ी देवी झल्ला कर बता चुकी हैं कि अनंत कुमार सिंह नीतीश कुमार का साला है । इस पर हम कभी फिर तफ्तीश करेंगे और पूरा हाल-हवाल बताएंगे । लेकिन अब आप नहीं जानते हैं तो जान लीजिए कि इस मामले में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार एक जैसे हैं । वैसे ही थोड़े एक समय दोनों ही प्रधान मंत्री पद के दावेदार बन गए थे ! नरेंद्र मोदी जैसे अपनी पत्नी यशोदा बेन के साथ नहीं रहते वैसे ही नीतीश कुमार भी पत्नी से विवाह के बाद बहुत जल्दी अलग हो गए थे । दोनों की पत्नी शिक्षिका रही हैं । मोदी की पत्नी गुजरात के स्कूल में पढ़ाती थीं तो नीतीश कुमार की पत्नी पटना के एक स्कूल में । यशोदा बेन का विवाह अगर नरेंद्र मोदी के साथ बाल विवाह था तो नीतीश कुमार का विवाह मंजू सिनहा से प्रेम विवाह था । नीतीश कुमार कुर्मी हैं , लेकिन मंजू सिनहा जी कायस्थ थीं । शत्रुघन सिनहा भी कायस्थ हैं । शायद इसी लिए वह जब-तब नीतीश कुमार से अपना दोस्ताना निभाते रहते हैं । यह बात भी अपने चैनल पर पहली बार हम बता रहे हैं । नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार एक मामले में थोड़ा अलग हैं । नरेंद्र मोदी चूंकि यशोदा बेन के साथ लगभग रहे ही नहीं सो नि:सन्तान हैं । लेकिन नीतीश कुमार मंजू सिनहा जी के साथ कुछ समय रहे हैं इस लिए वह पुत्रवान हैं । उन के बेटे का नाम निशांत है । पिता नीतीश कुमार की ही तरह निशांत भी इंजीनियर हैं । लेकिन नीतीश कुमार जैसे पत्नी मंजू सिनहा को नहीं पसंद करते थे , अलग रहते थे । ठीक वैसे ही बेटे निशांत को भी पसंद नहीं करते । बेटे को भी साथ नहीं रखते । यह बात भी आप पहले पहल इसी चैनल पर आप देख रहे हैं । यह देखिए मंजू सिनहा की अर्थी उठाए पिता पुत्र ।  बहुत दिनों तक अलग रहने के बावजूद जब मंजू सिनहा जी का वर्ष 2007 में निधन हुआ था तब नीतीश कुमार बहुत रोए थे । इस चैनल पर हम आप को पहली बार बता रहे हैं कि आप निश्चित देखिएगा कि यशोदा बेन के निधन पर नरेंद्र मोदी भी फूट-फूट कर रोएंगे। जैसे कि नीतीश कुमार अपनी पत्नी के निधन पर रोए थे । कारण यह कि लगभग सभी राजनीतिक लोग परम नौटंकीबाज़ हो गए हैं । 

अब यह देखिए सुषमा स्वराज को । वह भी करवाचौथ में चांद के साथ अपने पति स्वराज के साथ..... माफ़ कीजिए उन से हमारा संपर्क टूट गया है । मिलते हैं एक ब्रेक के बाद ।

[ सपने में एक न्यूज़ चैनल पर यह सब देखते हुए ]

Thursday, 29 October 2015

आंधी फिल्म सिनेमा घरों से उतार उस के प्रिंट जलवा दिए संजय गांधी ने तब क्या किया था गुलज़ार साहब !


यह नया फासिज्म है,  नया ढोंग और नया पाखंड है 

नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी मैं ने बहुत सी टिप्पणियां लिखी हैं । लेख लिखे हैं । जब-तब लिखता ही रहता हूं । कविता आदि भी लिखी है । उपन्यास भी । लेकिन मुझे तो किसी मोदी भक्त ने अभी तक गाली नहीं दी है । न धमकी दी है । वर्ष 2011 में मेरा उपन्यास वे जो हारे हुए छपा था । गोरखनाथ मंदिर के महंत आदित्य नाथ और उन की सांप्रदायिक राजनीति की डट कर धज्जियां उड़ाई हैं इस उपन्यास में मैं ने । कुछ अन्य माफियों की भी । कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है । प्रकारांतर से धमकियां मिलीं मुझे । लेकिन खुल कर कोई सामने नहीं आया । 

हां , मैं ने वर्ष 2001 में छपे अपने उपन्यास अपने-अपने युद्ध में हाईकोर्ट के एक न्यायमूर्ति की कुर्सी पर उपन्यास के नायक द्वारा पेशाब करने का चित्रण ज़रूर किया है , न्यायपालिका के अन्याय से आज़िज आ कर न्यायपालिका की मां-बहन भी की है मेरे चरित्र ने । और यह सब लिखने के लिए मैं ने न्यायालय की अवमानना का मुकदमा झेला है । जिस का मुझे आज तक कोई मलाल नहीं है । क्यों कि मैं ने सच लिखा था । वह आज भी सच है । हां मैं ने मंदिर की किसी मूर्ति पर , किसी मस्जिद , चर्च या गुरद्वारे में जा कर पेशाब नहीं किया है । न ही पेशाब कर अपने लेखन में उस का बखान किया है। इस लिए मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ है । जिस दिन मैं ऐसा करूंगा , तय मानिए मेरे साथ भी कुछ अप्रिय ज़रूर होगा । और मुझे इस के लिए तैयार रहना ही चाहिए । क्यों कि अभी दुनिया का कोई भी समाज इतना सहिष्णु और उदार नहीं हुआ है । कि मैं उस के पूजा स्थल के भीतर मूर्ति पर पेशाब करूं और फिर उस का लिख कर बखान करूं । और वह समाज चुप रहे । बल्कि दुनिया में ऐसे लोग ज़्यादा हैं जो एक कार्टून बना देने भर से ही किसी देश में , किसी शहर में आग लगा देते हैं । कत्ले आम कर देते हैं । संसद ठप्प कर देते हैं । और यही वह लोग हैं कि किसी धर्म स्थल में पेशाब करने की नीच हरकत पर खामोशी की लंबी चादर ओढ़ कर सो जाते हैं , जो लोग अभी भारत में हिटलर का उदय देख रहे हैं । भारत में उन्हें असहिष्णुता ज़्यादा दिखती है । यह नया फासिज्म है। नया ढोंग और नया पाखंड है । विचारधारा , व्यवस्था की लड़ाई लड़ने में कोई हर्ज़ नहीं है , खुल कर लड़िए । हम भी इस लड़ाई में शरीक हैं । कौन रोक रहा है भला ? लेकिन आंख में धूल झोंक कर किसी समाज को , किसी समाज कि भावना को आहत तो मत कीजिए । किसी को आहत कर के अपनी ज़िद , अपनी नपुंसकता को विरोध का बाना मत पहनाइए। विचारधारा के नाम पर अराजकता और एकतरफा बात किसी सूरत में उचित नहीं है । आप पार्टी बन कर लिखना भी चाहेंगे , पार्टी बन कर मलाई भी खाएंगे,  निष्पक्ष हो नहीं पाएंगे और चाहेंगे की आप को निष्पक्षता की माला पहना दी जाए तो यह दौर अब निश्चित ही नहीं रहा है । वैसे भी लेखक , लेखक होता है । भाजपाई , कांग्रेसी और वामपंथी नहीं । विचार , विचारधारा , प्रतिबद्धता भी लेखक की अपनी पसंद है । वह जो चाहे अख्तियार करे । यह लेखक  का अपना विवेक है । लेकिन अगर श्रीमान क , श्रीमान ख की विचारधारा और प्रतिबद्धता  सहमत नहीं हैं तो छुआछूत बरतेंगे , दुनिया में आग लगा देंगे , यह कौन सा विवेक है ? यह तो ठेकेदारी वाली बात हो गई । कि  हम को ठेका नहीं मिला , हमारा टेंडर नहीं खुला तो हम अगले को गोली मार देंगे । साहित्य और समाज ऐसे तो नहीं चलता । और फिर साहित्य तो समाज का सेतु है । सब को जोड़ने का काम करता है , तोड़ने का नहीं । तो यह गैंगबाज़ी लेखकों के बीच नहीं होनी चाहिए ।

कुछ दिन पहले मेरे प्रिय गीतकार और फिल्मकार गुलज़ार ने कहा था कि अब कुछ बोलने में भी डर लगता है। गुलज़ार साहब से पूछने का मन होता है कि आपातकाल में जब आप की आंधी जैसी मकबूल फिल्म भी संजय गांधी ने सिनेमा घरों से उतरवा दी थी , फिल्म के प्रिंट जलवा दिए थे , तब आप ने कौन सा बयान जारी किया था ? संजय गांधी को लगा था कि सुचित्रा सेन वाली भूमिका में इंदिरा गांधी का चित्रण है। ठीक है एक निर्वाचित सरकार का सम्मान करना नहीं सीख सकते तो गलतबयानी करनी भी ज़रूरी है क्या ? जनता पर भरोसा करना भी इतनी बुरी बात नहीं है । 

ज़िद और नपुंसकता की भी एक हद होती है। पुरस्कार वापसी की इस नौटंकी का क्या मोल है ? लेखकों की नौटंकी ज़रा थमी तो फिल्मकारों की नौटंकी शुरू हो गई। सवाल है कि आप की इस नौटंकी की नोटिस भी कौन ले रहा है ? जिन के खिलाफ आप यह नौटंकी बघार रहे हैं , वह आप से बड़े नौटंकीबाज़ हैं । उन की नौटंकी के आगे आप टिकने वाले भी नहीं हैं । लेकिन हां फासिज़्म का यह नया चेहरा आप ने परोस दिया है। एक निर्वाचित सरकार को बर्दाश्त करने का माद्दा आप में नहीं है । बंद कीजिए अपनी इस ज़िद और नपुंसकता का बेहूदा प्रदर्शन। यह अतिवादी लेखक ऐसे ही चूकते-चूकते चुक गए । न यह पाठक के रहे न पाठक इन के हुए । बहुत नुकसान किया है इन लोगों ने साहित्य और समाज का।

यह लिंक भी पढ़िए :

1 . तुम्हें यह तुम्हारा ज़माना , यह ओबामा मुबारक़ !

 

2 . वे जो हारे हुए

3.  मोदी ने परित्यक्ता बनाया, लोगों ने द्रौपदी !

 4 . अब उत्तर प्रदेश में जातियों का वोट बुनने लगे नरेंद्र मोदी भी

5 . जनता की आंख में धूल झोंकने वाली यह सरकारें सिरे से जनता की दुश्मन हैं !

6 . सिर्फ़ फेंकू कला से ही मुमकिन नहीं हुआ है नरेंद मोदी के महाविजय का एक साल

7 . तो क्या वायदा कारोबार पर लगाम लगा कर मंहगाई काबू करेगी मोदी सरकार ?

8 . कांग्रेस मुक्त भारत की दहाङ लगाने वाले नरेंद्र मोदी आहिस्ता-आहिस्ता उसी रहगुज़र के आशिक हो चले

 

Wednesday, 28 October 2015

प्रेम का यह शुक्ल पक्ष



समंदर उफनता है पूरे चांद को देख कर
रात देखा नदी उफन रही थी
तुम को देख कर

तो क्या मैं नदी हो गया था
तुम्हारे प्रेम में
प्रेम के इस शुक्ल पक्ष में
क्या तुम चांद हो गई थी
पूरा चांद

कहीं नदी भी उफनती है भला
चांद को देख कर
लेकिन मैं तो उफन रहा था
तुम्हें देख कर

ऐसी ही किसी एक पूर्णमासी की रात
गेहूं और सरसो के खेत में खड़ा
तुम्हारी याद में झुलसता
घने कोहरे में खोए पूरे चांद को देखा था

देखता ही रह गया था
लगा था जैसे गेहूं का खेत उफन रहा हो
मेरे स्पर्श से , मेरी अकुलाहट और चाहत से
गेहूं का खेत भी जैसे समंदर हो गया था
तो क्या तुम तब भी चांद बन गई थी
अपनी याद की उपस्थिति मात्र से

हम बीच नदी में खड़े थे
पूर्णमासी का पूरा चांद देखते हुए
चांद , नदी और तुम
जैसे खो गए थे
पुल के उस पथ पर खड़े
एक दूसरे को जीते हुए
डूब गए थे प्रेम में
जैसे डूब गया था चांद नदी के जल में

लोगों की आवाजाही थी
रौशनी की चकाचौंध थी
सिहरती-सकुचाती चांदनी सी लजाती
मेरा हाथ थामे तुम थी चांद को निहारती

लेकिन इस पूरे चांद को निहारने को
किसी और के पास फुर्सत कहां थी
बस आती-जाती मोटरें थीं

प्रेम नहीं था किसी के पास

कि अपनी प्रेयसी के साथ खड़ा हो कर
पूरा चांद निहारे
करे प्रेम और डूब जाए
प्रेयसी के देह जाल में
चूम ले ऐसे
कि चांदनी लजा जाए
नदी नहा जाए

मेरे भीतर का समंदर उफनता है
तो उफन जाए तुम्हारे प्यार में
हो जाए धराशाई

मैं हूं , तुम हो 
नदी की बीच धार है,  पूरा चांद है
हम दोनों डूब रहे हैं
आहिस्ता-अहिस्ता
जैसे चांद नदी के जल में

अलमस्त बुदबुदा रही हो तुम
पूरे चांद का प्रेम से बड़ा गहरा रिश्ता है
हमारा प्यार अमृत बन गया है
चांदनी की इस रात में

प्रेम का यह शुक्ल पक्ष है
कि पूरा होता हुआ कोई सपना है
तुम्हारा 
शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में 

प्रेम के इस खीर की मिठास को 
वह मोमो बेचने वाला क्या जाने 
जो पुल पर खड़े-खड़े  
कनखियों से हमें देख रहा था

उस के हिस्से में देखना ही था 
हमारे हिस्से में जीना 
प्रेम का यह शुक्ल पक्ष 
सब के हिस्से में नहीं होता 

[ 28 अक्टूबर , 2015 ]


समाज के चेहरे से मुखौटा नोचती कहानियां


स्निग्धा श्रीवास्तव

व्यवस्था चाहे देश की हो, समाज की हो, राजनीति की हो या फिर घर, स्कूल से लेकर सभी छोटी-बड़ी इकाइयों की हो, अगर मामूली सी भी गड़बड़ी आई, तो पूरी व्यवस्था चौपट ही समझो। प्रसिद्ध पत्रकार, कहानीकार और उपन्यासकार दयानंद पांडेय की 'व्यवस्था पर चोट करती सात कहानियां' में यही बात उभर कर सामने आई हैं। ये सात कहानियां सिर्फ कहानियां नहीं हैं, बल्कि समाज के वे सात चेहरे हैं, जो पूरे समाज का खाका खींचते हैं। इन कहानियों में अलग-अलग पात्रों के जरिये लोंगो की विवशता को दर्शाने की कोशिश की गई है, सामाजिक अव्यवस्था के शिकार होते हैं। कहानीकार दयानंद पांडेय ने यह भी बताने की कोशिश की है कि समाज का हर व्यक्ति अच्छाई-बुराई के भंवरजाल में फंसा छटपटा रहा है। पहली कहानी है, मुजरिम चांद। कहानी में एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए कई तरह की जिल्लत बर्दाश्त करनी पड़ती है क्योंकि उसने नेचुरल कॉल के चलते राज्यपाल का ट्वायलेट इस्तेमाल कर लिया था। इस कहानी में ग्रामीण पत्रकारों की व्यथा-कथा के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवस्था का चेहरा भी बेनकाब होता है। कहानी 'फेसबुक में फंसे चेहरे' बताती है कि अब दुनिया धीरे-धीरे नहीं, बल्कि बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। पहले लोग घरेलू झगड़ों, आस-पड़ोस की बातें तथा पंचायत में व्यस्त रहते थे, मगर अब लोग इंटरनेट, व्हाट्सअप और फेसबुक में उलझ गए हैं। खाना खाएं या नहीं, व्हाट्सअप पर स्टेटस बदलने की जल्दबाजी जरूर रहती है। साथ ही यह चिंता रहती है कि स्टेटस क्या दें? फेसबुक पर तो लोग कमाल करते है, वे अपने स्टेटस कुछ ऐसे देते हैं-स्लीपिंग विद रवि, राम, राधा, राजेश ईटीसी। या फिर फीलिंग लव विद अनुरंजन, भावेश, श्याम, ईटीसी। ऐसे ही एक महोदय हैं राम सिंगार जी। राम सिंगार जी फेसबुक पर लड़कियों की फोटो पर कमेंट आने से और अपनी फोटो पर कमेंट न आने से परेशान हैं। उन्हें खुद फेसबुक खोलना नहीं आता, लेकिन वे इसके बिना रह भी नहीं सकते हैं। अजीब विडंबना है। इससे बचने के लिए वे अपने गांव जाते है, मगर फिर वापस वहां से फोटो खिंचवाकर फेसबुक पर ही अटक कर रह जाते हैं।

स्निग्धा श्रीवास्तव
इस कहानी संग्रह की एक विचारणीय कहानी है 'देहदंश।' कहानी देहदंश राजनीति में महिलाओं की स्थिति का बेहद कटु किंतु साफगोई से किया गया विवेचन है। नेता जी राजनीति में सब कुछ पा लेना चाहते हैं। सत्ता का लालच उन्हें अच्छाई-बुराई का भी आभास नहीं होने देता है।  यहां तक की उनकी पत्नी एक मंत्री की अभद्रता का शिकार हो जाती है, लेकिन उन्हें कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हां, पत्नी यानी मिश्राइन जरूर इसे सदमे की तरह लेती हैं, लेकिन फिर वे भी माहौल में ढल जाती हैं। असल में मिश्रा- मिश्राइन सिर्फ कहानी के दो पात्र ही नहीं है, अपितु वे राजनीति के स्याह-सफेद पहलुओं के जीते-जागते उदाहरण हैं जिनसे आज समाज गुजर रहा है। राजनीति में ऐसे कई नेता हैं, जो न सिर्फ औरतों का इस्तेमाल करते है, उन्हें बुरी तरह भोगते हैं, बल्कि अपनी सद्चरित्रता का चोला भी पहने रहते हैं।  मिश्रा और मिश्राइन के घावों को कुरेदने में मीडिया भी पीछे नहीं रहता है। राजनीति, पत्रकारिता की शवपरीक्षा करती हुई यह कहानी समाज के चेहरे से छद्म मुखौटा खींच लेने का दुस्साहस करती है। राजनीति और पत्रकारिता के लिए स्त्री की हैसियत एक देह से बढ़कर नहीं है, यह कहानी 'देहदंश' बांचती हुई चलती है।
कहते हैं कि इन्सान चाहे जितनी कामयाबी हासिल कर ले, रोजी-रोटी के लिए दूर देश में बस जाए, लेकिन उसके मन में कहीं न कहीं बचपन में वापस जाने की इच्छा मौजूद रहती है। ऐसा ही है कुछ, कहानी 'सुंदर लड़कियों वाला शहर' में। इसके दो पात्र शरद और प्रमोट को सालों बाद परिस्थितियां अपने गांव वापस ले आती हैं। बचपन से पढऩे में होशियार शरद शहर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, लेकिन प्रमोद शुरू से ही लड़कियों पर ही अटका रहता है। दोनों इस कहानी में अपने बचपन की यादों में, लड़कियों में डूबते उतराते हैं। 
कहानी 'हवाई पट्टी के हवा सिंह' चुनावी दौरे पर गए एक नेता के हवाई दौरे की कहानी है। हवाई पट्टी के क्षतिग्रस्त होने के बावजूद पायलट के हवाई जहाज उतारने और अनियंत्रित भीड़ के व्यवहार की कहानी बयां हुई है इस कहानी में। कहानी 'प्लाजा' इस संग्रह की अच्छी कहानियों में से एक है। यह वर्तमान समाज में फैली बेरोजगारी से पीडि़त राकेश व्यथा-कथा ही नहीं, पूरे समाज की व्यथा कथा बनकर रह जाती है। 'संगम के शहर की एक लड़की', 'चना जोर गरम वाले चतुर्वेदी जी' जैसी कहानियां काफी मार्मिक हैं। कुल मिलाकर पूरा कहानी संग्रह पठनीय है।

दैनिक न्यू ब्राइट स्टार ,  से साभार ]

समीक्ष्य पुस्तक :

कहानी संग्रह : 
व्यवस्था पर चोट करती सात कहानियां
कहानीकार : दयानंद पांडेय
प्रकाशक : शाश्वत प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स
1/10781, पंचशील गार्डन, 
नवीन शाहदरा, दिल्ली-32
मूल्य : 400 रुपये 




Sunday, 25 October 2015

धर्म की धज्जियां उड़ाने के बाद कालीचरण स्नेही का घुटने टेक , शीश नवा कर पुरी मंदिर में दर्शन करना !

हमारे समाज में ऐसे बहुतेरे लोग हैं जो सामाजिक जीवन में कुछ हैं और व्यक्तिगत जीवन में कुछ और। एक समय तिलक और टोपी की राजनीति में प्रासंगिकता बताने वाले समाजवादी विचारों की राजनीति की दावा करने वाले नीतीश कुमार अगर तांत्रिक की बाहों में दिख रहे हैं तो यह कोई नई बात नहीं है । सिद्धांत में कुछ , व्यवहार में कुछ वाले बहुतेरे हैं । 


जैसे कि हमारे लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में एक आचार्य हैं कालीचरण स्नेही। वह दलित हितों के लिए राष्ट्र के ख़िलाफ़ जाने की हिमायत भी करते हैं। यह उन की कांस्टीच्वेंसी है। किसी मंच से जब बोलते हैं तो विषय कोई भी हो ब्राह्मण और हिंदू धर्म उन के ख़ास निशाने पर आ जाते हैं। लगभग आग लगा देते हैं अपने तेजाबी भाषण से । इतना कि कई बार वह पिटते-पिटते बचते हैं। आयोजक बमुश्किल उन्हें बचाते हैं। यह आए दिन की बात है । लेकिन कुछ दिन पहले वह पुरी गए एक सेमीनार में। सर्वदा की तरह वह वहां भी हिंदू धर्म और ब्राह्मण को निशाने पर ईंट से ईंट बजाने लगे। लगभग गाली-गलौज की हद तक। लोग उन्हें पीटने के लिए मंच पर पहुंच गए। आयोजकों को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी उन्हें बचाने के लिए। खैर कार्यक्रम खत्म हो गया। तो बाहर से आए वक्ता पुरी मंदिर जाने के लिए इकट्ठा होने लगे । आयोजकों ने गाड़ी आदि की व्यवस्था की । जाने वालों की संख्या गिनी । और मान कर चले कि कालीचरण स्नेही तो किसी हाल में नहीं जाने वाले। फिर भी औपचारिक रूप से उन से चर्चा करते हुए पूछा कि आप तो जाएंगे नहीं। लेकिन कालीचरण स्नेही ने ही-ही करते हुए कहा कि वह भी जाएंगे पुरी मंदिर के दर्शनार्थ ! सुन कर लोग चकित हो गए। लेकिन कालीचरण स्नेही न सिर्फ़ पुरी मंदिर गए , पूरे भक्ति भाव से पंक्तिबद्ध हो कर , घंटों अपनी बारी की प्रतीक्षा की। घुटने टेक कर , शीश नवा कर दर्शन किए। लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष सूर्य प्रसाद दीक्षित के पीछे-पीछे चलते हुए सारे पूजन आदि कार्य किए । मैं ऐसे कई अन्य वामपंथी मित्रों को जानता हूं जो सार्वजनिक मंचों से पूजा आदि , ब्राह्मण आदि , धर्म आदि की ऐसी-तैसी करते हैं। पूरी चीख़-पुकार के साथ। लेकिन व्यक्तिगत जीवन में ख़ूब पूजा-पाठ नियमित तौर पर करते हैं। आरती-पूजन और तमाम अन्य षटकर्म पूरे विधि-विधान से करते मिलते हैं । किस-किस का नाम लें , किस-किस का न लें । लेकिन यह हिप्पोक्रेसी निन्यानबे प्रतिशत लोगों को करते देखता , पाता हूं। पितृपक्ष या मलमास में नहीं देखा आज तक किसी भी को विवाह आदि मांगलिक कार्य करते हुए । कोर्ट मैरिज तक नहीं । जीवन में कुछ , जेहन में कुछ ? जित देखो , तित कालीचरण स्नेही ।

यह लिंक भी पढ़ें : 

1. तो दलित हितों के लिए वह राष्ट्र के खिलाफ़ भी जाएंगे 

 

2. तो दंभी भंगी कालीचरन स्नेही दलित आतंकवादी हैं ?


Saturday, 17 October 2015

किताबें छापने के नाम पर लोगों को ठगने और लूटने वाले इस अरुण चंद्र राय को ठीक से पहचान लीजिए


अरुण चंद्र राय

इस व्यक्ति को ठीक से देख लीजिए । नाम है अरुण चंद्र राय । दरभंगा का रहने वाला है । अपने को भारत सरकार में सहायक निदेशक बताता है । इंदिरा पुरम , गाज़ियाबाद में रहता है । फ़ेसबुक  पर कंटिया लगा कर भोले-भाले लोगों को फंसाता है । सरकारी नौकरी में रहते हुए भी जाने कैसे प्रकाशन का कारोबार करता है । ज्योति पर्व प्रकाशन नाम से । रायल्टी तक देने की बात करता है । और अच्छी-अच्छी, मीठी-मीठी बातें कर के पैसा ऐंठता है किताब छापने के नाम पर और फिर रफ़ूचक्कर हो जाता है । आप करते रहिए फ़ोन और भेजते रहिए संदेश । वह सांस नहीं लेता ।
 
आज कल कुछ क्या ज़्यादातर प्रकाशकों ने धंधा ही बना लिया है यह। क्या छोटा प्रकाशक , क्या बड़ा प्रकाशक । सभी इस राह के राही हैं । होता यह है कि पंद्रह हज़ार , बीस हज़ार से पचास हज़ार रुपए तक ऐंठ कर यह प्रकाशक रफ़ूचक्कर हो जाते हैं । महिलाएं इन का सब से आसान शिकार होती हैं । विदेशों में रहने वाली महिलाएं भी । क्यों कि वह एक हद से ज़्यादा लड़ नहीं सकतीं । भारत नहीं आ सकतीं लड़ने के लिए । इन से गाली-गलौज नहीं कर सकतीं । यह प्रकाशक यह भी समझते हैं कि लंदन - अमरीका आदि में रहने वाले सभी लोग पैसे में लोटते हैं। ख़ैर , हालत यह है कि हज़ार-पांच सौ रुपए के खर्च में आज कल किसी किताब की पचीस - पचास या सौ प्रतियां लेज़र प्रिंट से निकाल कर बाईंड हो जाती हैं । और यह प्रकाशक यही और इतनी ही प्रतियां छाप कर संबंधित लेखक को दे देते हैं । बाक़ी सरकारी खरीद में दस-बीस प्रतियां सबमिट कर देते हैं । ऑर्डर मिल जाता है जितनी किताब का , उतनी ही किताब छाप कर , सप्लाई कर सो जाते हैं । ऑर्डर मिलता जाता है , किताब छापते जाते हैं । लेखकों के पैसे से अपनी लागत लगाते हैं और लेखक को अंगूठा दिखा देते हैं । एक-एक किताब के लिए तरसा देते हैं ।

मेरी बड़ी बहन शन्नो अग्रवाल जी , लंदन में रहती हैं । बहुत सीधी और सरल महिला हैं । उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में पूरनपुर की रहने वाली हैं । लखनऊ में पढ़ी-लिखी हैं । शौक़िया कविताएं लिखती हैं । उन्हों ने फ़ेसबुक पर अपनी कविताओं के प्रकाशन के बाबत सार्वजनिक रूप से अपनी वाल पर 12 नवंबर , 2013 को कुछ चिंताएं जताईं । बस अरुणचंद्र राय ने उन्हें लपक लिया और उन्हें इन बाक्स संदेश भेजा और लिखा :

''आप बिलकुल ठीक कह रही हैं। कई गलतियां मुझसे भी हुई हैं। लेकिन चूँकि मैं स्वयं लेखक/कवि हूँ मैं लेखक का पक्ष पहले सोचता हूँ , प्रकाशक मेरी दूसरी प्राथमिक है। कुछ बाते जो मुझे औरों से अलग करती हैं : मैं भारत सर्कार में सहायक निदेशक हूँ इसलिए प्रकाशन मेरा पैशन है , व्यापर या दाल रोटी का साधन नहीं। अच्छा साहित्य पढ़ना मेरी रूचि में शामिल है इसलिए ही संजीव स्वयं प्रकाश सुधा अरोड़ा असगर वजाहत जैसे समकालीन कहानी और साहित्य के बड़े नामो को प्रकाशन शुरू होने के प्रथम वर्ष में ही प्रकाशित करना सम्भव हो सका है क्योंकि मैं उनका पाठक पिछले बीस वर्षो से हूँ। मेरी कवितायेँ हंस, पाखी, वसुधा, वागर्थ में प्रकाशित होती रही हैं। मेरी कहानी और समीक्षाएँ भी प्रकाशित हुई हैं। 

इसलिए मैं समझता हूँ कि लेखन क्या है और एक लेखक की क्या उम्मीदें होती हैं प्रकाशक से। मैंने कई रचनाकारो को अग्रिम रूप से रॉयल्टी दी है , जिन्हे इनकी जरुरत थी। ओम प्रकाश वाल्मीकि हिंदी के प्रमुख लेखक हैं। उनकी कोई किताब अभी नहीं आई लेकिन मैंने उनकी यथा सम्भव सहायता की हैं क्योंकि वे कैंसर से पीड़ित हैं। इस लिए आप निश्चिन्त रहे। आपकी रचना पाठको तक पहुचेगी। प्रोडक्शन के लिए पंद्रह हज़ार रूपये की सहायता लूंगा। जो मैं आपको अधिक से अधिक एक वर्ष के भीतर लौटा दूंगा। चाहे किताबें बिके न बिके। ये मैं बाल पुस्तक के लिए कह रहा हूँ। इस राशि के साथ साल भर में बिकी किताबो के प्रिंट मूल्य पर आपको १०% की रॉयल्टी दूंगा। आम तौर मैं ५०० किताबे प्रकाशित करता हूँ। भविष्य में भी बिकी पुस्तको पर आपको बिन बोले रॉयल्टी मिलेगी। और यही मुझे स्थान दिलाएगी हिंदी प्रकाशन जगत में। २०१४ में किताब मेला जिनमे मैं भाग ले रहा हूँ वे हैं - दिल्ली, शिमला, मुम्बई , लकनऊ, जयपुर , चंडीगढ़, पटना, भोपाल, विलासपुर , रायपुर आदि 

 नोट : प्रोडक्शन में सहायता इसलिए ले रहा हूँ कि मुझे थोड़ी सहूलियत हो जायेगी और आपके लिए यह अफोर्ड करना बहुत बड़ी बात नहीं है। हिन्द युग्म से प्रकाशित आपके कविता संग्रह को मैंने ख़रीदा हुआ है। इसलिए मैं आपसे बहुत पहले से परिचित हूँ।''

शन्नो अग्रवाल जी , अरुण चंद्र राय की इन लच्छेदार बातों में आ गईं । फिर 13 जनवरी , 2014  को इस चार सौ बीस अरुण चंद्र राय ने शन्नो अग्रवाल जी को अपने बैंक का डिटेल्स बताते हुए लिखा :

आदरणीय शन्नो जी 
 नमस्कार
 किताब प्रकाशित होने के लिए तैयार है। कवर बनाना शेष है। बाबूजी के निधन के कारन थोडा विचलित हूँ। लेकिन जीवन में तो लौटना होता ही है। आप फ़ोटो और परिचय भिजवाइये जल्दी। खामोश ख़ामोशी और हम की पांच प्रतियां भिजवा दी थी। मिल गई होगी। आप दिखवा लीजियेगा। पूर्व में जैसी बात हुई थी , हो सके तो १५,००० रूपये भिजवा दीजिये। बैंक डिटेल संलग्न है। यदि बाबूजी का निधन न हुआ होता तो शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ती लेकिन अभी बैकफुट पर हूँ। पुस्तक मेले के बाद मार्च में इसे लौटा दूंगा। किताबे बिकी तो रॉयल्टी भी।'' 

आपका अरुण 

Arun Chandra Roy state bank of india, indirapuram branch saving account no. 32395214006
Bank: STATE BANK OF INDIA
Address: PLOT NO. 13, NITIKHAND FIRST, INDIRAPURAM, GHAZIABAD 201010 State: UTTAR PRADESH District: GHAZIABAD Branch: INDIRAPURAM Contact: BM MOB-9911063011

अरुण चंद्र राय की इन लच्छेदार बातों में आ कर शन्नो अग्रवाल जी ने  17 जनवरी 2014 को उन के बैंक अकाउंट में उन्हें 15000 रुपए  भेज दिए ।

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शन्नो अग्रवाल
अब पैसा पाने के बाद इस अरुण चंद्र राय ने शन्नो अग्रवाल के इन बाक्स संदेश  का जवाब देना और फ़ोन उठाना बंद कर दिया । शन्नो जी , कुछ दिन पहले यह व्यथा मुझे बताई और कहा कि यह व्यक्ति फ़ेसबुक पर मेरी भी मित्र सूची में है , क्या मैं इस व्यक्ति को जानता हूं ? मैं ने कहा कि नहीं । पर आप लिंक दीजिए , फ़ोन  नंबर दीजिए । मैं बात करने की कोशिश करता हूं । फिर मैं ने अरुण चंद्र राय से फ़ोन पर इस बाबत बात की । यह जून , 2015 के शुरुआत में किसी ताऱीख को बात हुई । अरुण चंद्र राय ने कहा कि लंदन तो नहीं पर पूरनपुर , लखीमपुर के उन के पते पर जुलाई के पहले हफ़्ते में किताब हर हाल में भेज दूंगा । पर अगस्त आ गया , किताब उन्हों ने नहीं भेजी । फिर मैं ने उन्हें फ़ोन किया और उन की लानत-मलानत की । जो-जो नहीं कहना चाहिए , वह भी कह दिया । फुल वॉल्यूम में मैं ने बात की । फिर वह बेशर्मों की तरह माफ़ी मांगने लगे और बोले अगले हफ़्ते  हर हाल में किताब भी भेज दूंगा और कि उन का पैसा भी लौटा दूंगा । लेकिन बीत गया , फिर भी किताब नहीं भेजी । अब अरुण चंद्र राय ने मेरा भी फ़ोन उठाना बंद कर दिया । फ़ेसबुक पर मैं ने इनबाक्स संदेश दिया। बातचीत देखें :

  • Conversation started August 27
  • Dayanand Pandey
    8/27, 3:41pm
    Dayanand Pandey

    namaskar
    shanno ji ki kitab bhej di kya ?
  • Arun Chandra Roy
    8/27, 3:43pm
    Arun Chandra Roy

    namaskar
    bheji nahi hai
    agle saphtah bhej dunga
    is pure mahine dilli me nahi tha
    abhi aayaa hoon
  • Dayanand Pandey
    8/27, 3:43pm
  • September 3
  • Dayanand Pandey
    9/3, 6:45pm
    Dayanand Pandey

    नमस्कार
    शन्नो जी को किताब भेज दी क्या ?
  • September 7
  • Dayanand Pandey
    9/7, 3:23pm
    Dayanand Pandey

    shanno ji ki kitab kab tak bhej rahe hain ?
  • September 17
  • Dayanand Pandey
    9/17, 6:40pm
    Dayanand Pandey

    नमस्कार
  • September 18
  • Dayanand Pandey
    9/18, 4:22pm
    Dayanand Pandey

    shanno ji ki kitab ka kya huwa?
  • September 19
  • Dayanand Pandey
    9/19, 10:43pm
    Dayanand Pandey

    आप तो साँस ही नहीं ले रहे ?
  • Friday
  • Dayanand Pandey
    10/16, 4:50pm
    Dayanand Pandey

    shnno ji ko kitab abhi tak nahin mili hai. aur ki aap ph bhi nahin utha rahe
    kuch kahna chahenge ?
  • Dayanand Pandey
    10/16, 6:48pm
    Dayanand Pandey

    किताब नहीं मिली शन्नो जी को
  • Today
  • Dayanand Pandey
    12:13pm
    Dayanand Pandey

    आप अब अति कर रहे हैं , झूठ पर झूठ बोल रहे हैं . किताब भेजी ही नहीं. शर्म कीजिए. मुझे लगता है कि किताब छापी भी नहीं है . अब इतना भी मजबूर मत कीजिए कि थाना पुलिस करनी पड़े आप के खिलाफ . आखिर शन्नो अग्रवाल जी से पैसा लिया है आप ने किताब छापने के लिए. बहुत हो गई चार सौ बीसी आप की. फोन करने पर फोन उठाएंगे नहीं आप . किताब छापेंगे नहीं . पैसा लौटाएंगे नहीं . अब जब पुलिस के साथ आप के घर आऊंगा तभी आप की समझ में आएगा.
  • Dayanand Pandey
    1:06pm
    Dayanand Pandey

    bahut besharm hain aap
  • Today
  • Dayanand Pandey
    7:21pm
    Dayanand Pandey

    चोर आदमी ! फोन उठाता नहीं , फेसबुक पर दिए मेसेज का जवाब देते नहीं . पब्लिकली नंगा करूँ और पुलिस में मामला दर्ज करूँ ?
  • Dayanand Pandey
    7:31pm
    Dayanand Pandey

    कमीनेपन की भी हद होती है


    अरुण चंद्र राय
    अब जब भी फ़ोन करता हूं तो अरुण चंद्र राय फोन नहीं उठाते । फ़ेसबुक पर किसी संदेश का जवाब नहीं देते । जब फ़ोन बहुत हो जाता है तो एस एम एस आता है कि मैं बाद में फ़ोन करता हूं । लेकिन आज तक कभी फोन पलट कर नहीं किया अरुण चंद्र राय ने । फोन पर भी ऐसे बहुत से एस एम एस पर उन की लानत-मलानत की । अंट -शंट लिखा । जो-जो नहीं लिखना चाहिए लिखा । लेकिन यह बेशर्म अरुण चंद्र राय चोरों की तरह मुंह छुपाता घूम रहा है । शन्नो जी को आज सारी स्थिति बताई । फिर लंदन से उन का फ़ोन आया । विस्तार से बात हुई । लेकिन अभी देखा कि बहुत व्यथित हो कर उन्हों ने एक पोस्ट लिखी है । उस पर मैं ने अरुण चंद्र राय को टैग कर एक कमेंट लिखा । लेकिन इस बेशर्म ने फिर कोई सांस नहीं ली । शन्नो जी की पोस्ट देखें :

    खाली राजनीती ही नहीं बल्कि और जगह भी डकैत और भ्रष्ट लोग मिलेंगे l प्रकाशन भी इससे अछूता नहीं है l बात कड़वी पर सच है l
    -शन्नो अग्रवाल
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    Nishant Gupta
    Nishant Gupta Kya ho gaya mam...
    Mukutdhari Agrawal
    Mukutdhari Agrawal आज तो कई प्रकाशक लेखको से शोषक बने हुये हैं ।रायल्टी के नाम पर कुछ देना नहीं उल्टे पुस्तक प्रकशन का खर्च भी लेखक बरदास्त करे ।
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    Dayanand Pandey
    Dayanand Pandey Arun Chandra Roy नाम का यह व्यक्ति ही तो वह डकैत नहीं है ? Ajit Rai जी , ध्यान दीजिए l यह आदमी जो अपने को आप का मित्र बताता है , आप के साथ अपनी फ़ोटो दिखाता है , बिहार , दरभंगा और प्रकाशन जगत को बदनाम कर रहा है l भारत सरकार में अपने को सहायक निदेशक बताता है , पैसे ले कर भी किताब नहीं छाप रहा है l दो साल से टरका रहा है l जाने कितनों को फ़ेसबुक के मार्फ़त लूट चुका है l चंद्रेश्वर पाण्डेय जी , आप भी गौर कीजिए l और इस आदमी को आईना दिखाईये l
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    Brijendra Dubey
    Brijendra Dubey जी मैम.... जित देखो तित लाल वाला मामला है
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    Kavita Vachaknavee
    Kavita Vachaknavee आपके वाला तो चोर है पक्का
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    Kanta Patel
    Kanta Patel सच कहा शन्नोजी …तू डाल डाल , मै पात पात ।
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    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल सच्ची कडवी हकीकत .....
    Dayanand Pandey

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    अब यह सारा व्यौरा आप मित्रों के सामने परोसने का मक़सद इतना भर है कि इस चोर और मक्कार अरुण चंद्र राय जैसे लुटेरों से बाक़ी लोग तो बच लें । क्यों कि किताब छापने के नाम पर चिकनी-चुपड़ी बातें कर फ़ेसबुक पर उपस्थित लोगों को लूटने वाला यह अरुण चंद्र राय अकेला नहीं है । बहुतेरे हैं । लोग इन मक्कारों , चोरों और चार सौ बीसों से सावधान रहें । हो जाएं । और जान लें कि पैसा दे कर किताब छपवाने की प्रवृत्ति गलत है , अपराध है । और कि इन डकैतों के चंगुल से बच सकें । इन की ठगी से बच सकें । बाद इस के भी अगर कोई आंख पर पट्टी बांध कर रहना चाहता है तो उसे उस का यह चयन मुबारक़ ! लेकिन अरुण चंद्र राय के ख़िलाफ़ तो गाज़ियाबाद जा कर मैं जल्दी ही पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने वाला हूं , शन्नो अग्रवाल जी के बिहाफ़ पर । फिर क़ानून अपना काम करेगा । जनता-जनार्दन और आप मित्रों की अदालत में तो यह रिपोर्ट आज लिख ही दी है । जनता और आप मित्र अपना काम करें । आमीन !



    एकदम बाएं अरुण चंद्र राय