Monday, 27 June 2016

प्यार में कभी अंहकार का आकाश नहीं होता

अभिनेत्री असीमा भट्ट


ग़ज़ल
 
फूल को अपनी ख़ुशबू का आभास नहीं होता
प्यार में कभी अंहकार का आकाश नहीं होता 
 
साथ रहें तो प्यार की दूर रहें तो याद की नदी 
ज़िंदगी से प्यार का कभी वनवास नहीं होता 

रूठना और मनाना भी प्यार में बहुत ज़रूरी है
अगर यह न हो तो प्यार का एहसास नहीं होता 

प्यार की नदी में जो एक बार डुबकी मार लेता है
तो कभी कुछ बुरा सोचने का अवकाश नहीं होता 
 
एक प्यार ही है शाश्वत शेष सब कुछ क्षण भंगुर
प्यार छोड़ दुनिया में कुछ भी शाश्वत नहीं होता 
 
राजा रानी इतिहास भूगोल बनते बिगड़ते रहते हैं 
पर प्यार का क़िस्सा कभी इधर उधर नहीं होता
 
[ 27 जून , 2016 ]

Sunday, 26 June 2016

नए दौर की लड़की ग़ुलामी से निकलना चाहती है

फ़ोटो : स्मिता पांडेय

ग़ज़ल 

अभी शादी नहीं कैरियर चाहती है पढ़ना चाहती है
नए दौर की लड़की ग़ुलामी से निकलना चाहती है

कठपुतली काया से निकल बंधन के धागे तोड़ रही 
नचाने वालों की सारी अंगुलियां तोड़ देना चाहती है

तोड़ रही है धीरे धीरे अपने ख़ातिर बने बनाए सारे ढांचे
सिस्टम तोड़ कर अपने दम पर खड़ा होना चाहती है

लड़ जाती है वह परिवार पिता और समाज सब से
मायका ससुराल की पेंडुलम को तोड़ देना चाहती है

बराबरी मांगती नहीं बढ़ कर बराबर होना सीख लिया
समझौते में फंस रोने धोने के बजाय जीना चाहती है

चाहती है अपनी धरती अपना आकाश अपनी सांस
फूल की तरह खिलना पक्षी की तरह उड़ना चाहती है 

बदलती दुनिया में वह अब प्रोडक्ट नहीं फाईटर है 
दुश्मनों को ज़मींदोज़ कर आकाश में हंसना चाहती है

[ 26 जून , 2016 ]

Saturday, 25 June 2016

ठीक सामने होती हो तुम और बात नहीं होती

फ़ोटो : गौतम चटर्जी

ग़ज़ल 

कई बार जैसे चाह कर भी तुम साथ नहीं होती
ठीक सामने होती हो तुम और बात नहीं होती 

वो मंज़र सांझ का हो सकता है या सुबह का भी
आसमान में चांद होता है लेकिन रात नहीं होती

बादल बरखा और भीगती रात फिर तुम्हारा साथ 
देखने वाली लेकिन तुम्हारी वह आंख नहीं होती

मुहब्बत में आती रहती हैं अड़चन और भी बहुत 
हाथ में हाथ होता है लेकिन सामने राह नहीं होती 

जुगनू तारे चांद सितारे गाते घूमते गांव नगर सारे 
प्रेम की नाव थम जाती जब नदी में धार नहीं होती 

[ 25 जून , 2016 ]

Friday, 24 June 2016

तुम्हारे भीतर मैं ख़ुद को खोजता हूं

पेंटिंग : राजा रवि वर्मा

ग़ज़ल

तुम से मिलता हूं ख़ुद को सोचता हूं
तुम्हारे भीतर मैं ख़ुद को खोजता हूं

जैसे खो जाए भीड़ में कोई बच्चा
खो गया हूं भीड़ में तुम्हें खोजता हूं

अंधेरी रात हो घना जंगल और तुम
घने बादलों के बीच चांद खोजता हूं

धूप में जल जल कर छांह पाने के लिए
गुलमोहर की दहकती आग खोजता हूं

रोटी दाल की जद्दोजहद में सपना टूटा
अब तो पुराने गीतों में सुकून खोजता हूं

फूल पत्ती पक्षी आकाश मछली तालाब
पार जाने के लिए कोई नाव खोजता हूं
 
[ 24 जून , 2016 ]

इस ग़ज़ल का मराठी अनुवाद 


तुला भेटतो, माझा विचार करतो
तुझ्या अंतर्यामी, मी मला शोधतो..
जसा गर्दीत हरवतो, कुणी मुलगा
हरवुनी गर्दीत मी तुला शोधतो..
रात काजळी, किर्र वन आणि तू
दाटलेल्या मेघांत चंद्र शोधतो..
दाहलेल्या उष्णतेत,मिळवण्या छाया
धगधगत्या गुलमोहरात, अग्नि शोधतो..
पोळीभाजी च्या धावपळीतच
भंगले स्वप्न
आता तर जुन्या गाण्यांमधे
शांती शोधतो..
फुले पाने पक्षी आकाश मासोळी
जलाशय
पार जाण्यासाठी कुठलीशी होडी
शोधतो..

अनुवाद : प्रिया जलतारे 

Monday, 20 June 2016

अभिधा का कहरः दयानंद पांडेय की ग़ज़लें


सुधाकर अदीब

सुधाकर अदीब
दयानंद पांडेय विभिन्न विधाओं में लिखने के वाले एक समर्थ एवं प्रभूत उर्जावान लेखक हैं। इधर इन की ग़जलें एकदम नई ताज़गी और तेवरों के साथ हिंदी साहित्य फलक पर अवतरित हुई हैं। उन की ग़ज़लों को पढ़ने से यह कहीं नहीं लगता कि उन्हों ने सायास इन्हें गढ़ा है, बल्कि लगता है कि यह कवि मन की बेचैनियों, आवेगों, संत्रासों और आंदोलनों का ऐसा सहज-स्फूर्त-प्रवाह है जो तट पर खड़े  पाठक को उस में उतरते ही अपने साथ तत्काल बहा ले जाने की क्षमता किसी बाढ़मती नदी की भांति रखता है। दयानंद पांडेय का काव्य रूमानी भी है और दुनियावी भी। आदर्श के साथ-साथ, उन की ग़ज़लों में, यथार्थ की कश्मकश देखते ही बनती है। हवाई-आदर्शों के पीछे उन का कवि मन यथार्थ की जमीन को छोड़ नहीं पाता है। वह लिखते हैं :

ग़ुरबत तोड़ देती है बड़े-बड़े सपने तो क्या  
ग़ुरबत का गर्व भी अच्छा है पर कभी-कभी

दयानंद पांडेय, जहां सवेंदनाओं का प्रश्न है, स्वयं एक अतिशय बेचैन आत्मा हैं। उन का एक शेर, जो इस ग़ज़ल संग्रह का शीर्षक-शेर भी है, इसे स्वतः स्पष्ट करता है :


तुम ने मुझे बिगाड़ दिया बहुत है आती तुम्हारी याद अब बहुत है
मन यायावर है ठहरता ही नहीं पारे की तरह फिसलता बहुत है

दयानंद की काव्याभिव्यक्ति में ग़ज़ल का आधुनिक स्वरूप तो देखने को मिलता ही है, उन की अनेक ग़ज़लें माशूक की पंरपरागत प्रशस्ति में बड़ी रूमानियत और विभोरता के साथ सराबोर दिखती हैं। उनकी ग़ज़लों में ‘प्रेम’ एक प्रकार से ‘समर्पण’ का पर्याय ही है :

हर कहीं तेरी महक है , तेल में , दिये में और बाती में 
माटी की खुशबू में तुम चहकती,  शान मेरी तुम कहां हो

प्रेम का वर्णन करते समय कवि ऐसे-ऐसे अछूते बिंब और उपमाएं देता है कि उन्हें पढ़ते समय पहली बारिश से भीगी मिट्टी की सुगंध-सी अनुभूति होने लगती है :

हमारे खेत के मेड़ पर बिछी है तेरे क़दमों की हर आहट
प्यार के फागुन में खिल कर कचनार होना चाहता हूं

एक ही ग़ज़ल में दयानंद कभी-कभी कितने भाव भर देते हैं। काम और राम दानों एक ही ज़मीन पर खड़े  नज़र आते हैं। वह  कहते हैं  :

खजुराहो की मूर्तियां तुम्हारे आगे बेकार हैं
तुम्हारे साथ गुज़री जो अनगिन नशीली रातें हैं


वहीं दूसरे एक शेर में कहते हैं :

इश्क पाक़ीज़ा बना देता है जीना सिखा  देता है
मीरा का भजन है अमीर खुसरो कबीर की बातें हैं


इन ग़ज़लों की तासीर कहीं-कहीं ओशो रचित ‘संभोग से समाधि तक’ का स्मरण करा देती है। समसामयिक विसंगतियों और लोगों के दोगले व्यवहार पर दयानंद अपनी ग़ज़लों में करारा प्रहार करते हैं :


पाखंड के दरबान तुम्हारी ऐसी-तैसी
सहिष्णुता के शैतान तुम्हारी ऐसी तैसी
 

दयानंद पांडेय काव्य लेखन में कूटनीति अथवा संकोच का परिचय नहीं देते। उन्हें कोई ‘वोट बैंक की राजनीति’ भी नहीं करनी है। कबीर की भांति वह खरी-खरी बात कहते हैं । छद्म को बेनक़ाब करते हैं । कट्टरता के वह सख़्त विरोधी हैं। यह उन का स्वभाव भी है :

तुम्हारी अक़्ल में मज़हब से ज़्यादा क्या है
आख़िर तुम्हारी ज़न्नत का तकाज़ा क्या है


अपनी बात कहने में वह यहीं तक नहीं रूकते। वह कहते हैं :


दुनिया दहल गई है तुम्हारी खूंखार खूंरेजी से
तुम्हारी सोच में ज़ेहाद का यह ज़ज़्बा क्या है


कवि मन दुनिया के क्रूर चेहरे से आक्रांत होकर कभी-कभी मां का आंचल तलाशने लगता है। कहते हैं :

बचपन गुहराता बहुत  है बच्चा हो जाने को जी करता है
अम्मा तुम्हारी गोद में दौड़ कर छुप जाने को जी करता है

कृत्रिमता  किसी सुकवि को भला कहां रास आने वाली। दयानंद दो-टूक लिखते हैं :

ड्राइंग रूम भी कोई बैठने मिलने की जगह है भला
गांव वाले घर के ओसारे में बैठने को दिल करता है

उन के ऐसे ही शेर हमारे समय की जड़ता का तोड़ते हैं। हमें मशीन से फिर से मनुष्य बनने की हिदायत देने लगते हैं। विज्ञापन के बेरहम दुनिया में औरत आज एक स्वाद में बदल गई है। ग़ज़लकार लिखता है :

जैसे औरत नहीं मिठाई हो और आदमी बेरहम कसाई
औरत को बाज़ार में बेच कर अपना प्रोडक्ट बनाते हैं

भ्रष्टाचार आज के युग की नंगी हक़ीक़त है। इसे सभी जानते हैं। कवि उसे वेदना के साथ व्यक्त करता है :


माथा ईमानदारों ने अब फोड़ लिया बहुत है यह दलालों के दिन हैं
गीदड़ों की चांदनी है शेर सारे पिंजरे में कैद रंगे सियारों के दिन हैं


मूल्यों की गिरावट में सभी धाराशायी हो चुके हैं। हुंकार के स्वर में कवि कहता है :


कुछ बिक गए कुछ बाक़ी हैं पर बिकने को सारे होशियार खड़े हैं 
संसद मीडिया अदालत अफ़सर सब सज धज कर तैयार खड़े हैं


दयानंद पांडेय ग़ज़ल लिखते समय, भावनाओें में बह कर शेर कहते हैं। उन की बहुत सी ग़ज़लें ग़ज़ल के उस परंपरागत स्वरूप को तोड़ती हैं जिस में विषय की दृष्टि से सभी शेर एकतरफ़ा न हो कर अलग-अलग भाव भूमि के हुआ करते हैं। दयानंद किसी एक ख़ास मूड में होते हैं तो उन की ग़ज़ल के सारे शेर उसी मूड और उसी विषय-विशेष की तर्जुमानी करते हैं। उदाहरण के लिए जब वह कहते हैं :

बेटी का पिता होना आदमी को राजा बना देता है 
शादी खोजने निकलिए तो समाज बाजा बजा देता है


तो इस ग़ज़ल के सारे शेर वैवाहिक-संबंधों की खोज और उस मार्ग में बिछे असंख्य काटों की पड़ताल में बहुत शिद्दत के साथ खुलते जाते हैं। तब शायद ही इस विषय से जुड़ा कोई विद्रूप ग़ज़लकार की कलम से बच कर जाने पाए।

फुटकर’ के बजाय यह ‘थोकपन’ दयानंद की तमाम ग़ज़लों की विशेषता है। उदाहरण के लिए अपनी एक ग़ज़ल में दयानंद पुस्तक मेला, किताबों की दुनिया, प्रकाशक, लेखक, पाठकों के बिखरे हुए संसार को ‘वामन अवतार’ की तरह ‘ चंद शेरों रूपी कदमों   से नाप लेने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। वह पाठकों को भी नही बख्शते :

थोड़े से लोग किताब ख़रीद कर पढ़ते हैं कुछ  दुम हिलाते रहते हैं
ठकुरसुहाती का ज़माना है  मालिश पुराण के अब यह नए नुस्खे हैं


लेाकतंत्र में वोट की ख़ातिर सारे दंद-फंद अपनाना सफलता की गांरटी समझा जाता है यहां प्रचार में व्यक्तियों का चयन भी सुविधा की राजनीति के अनुसार ही किया जाता है :

अंबेडकर वोट और नोट देता है तो वह गांधी को भूल जाते हैं 
लीगी जिन्ना तो याद रहता है पर सीमांत गांधी को भूल जाते हैं


अपने सारे आंतरिक आवेगों और विचारों को कविवर दयानंद पांडेय अपनी ग़ज़लों के माध्यम से  लक्षणा और व्यंजना जैसी चकमा देने वाली शब्द शक्तियों को बुहार कर, अनेक स्थलों पर ठेठ अभिधा में व्यक्त करते हैं । वह खुल कर अपनी बात कहते हैं । उन्हें शायद घुमा फिरा कर बात कहना न तो आता है और न ही पसंद है। अभिधा का कहर ढाना जैसे उन की फितरत है । वस्तुतः यह लेखक दयानंद पांडेय की शुरू से ही विशिष्टता रही है। अब इस ट्रेडमार्क को यदि उन्होंने अपनी काव्याभिव्यक्ति में भी अपना लिया है तो इस में आश्चर्य की कोई बात नहीं । क्रिकेट की भाषा में कहें तो वह ‘गुगली’ या ‘स्पिन’ की जगह ‘बाउंसर्स’ में ही यक़ीन रखते हैं। हैरानी की बात यह अवश्य है कि जो बेबाकी उनकी लेखों में मिलती है, उन की ग़ज़लों में वह आग और उन की लपटें और भी कई गुना तेज़ हैं।

मन यायावार है’ ग़ज़ल संग्रह स्वंय में देखें तो एक मुकम्मल आग है। लीक से हट कर हैं ये ग़ज़लें । प्रेम और समर्पण से भरपूर एक तरफ खुद्दारी और आक्रोश को स्वयं में समेटे दूसरी ओर। इस उत्तर आधुनिक युग के यंत्र-तंत्र को ध्वनित करती हुई :

सब कुछ आन लाइन है आन लाइन लव की भी दरकार है उसे 
फ़ेसबुक पर वह प्यार करती है सब कुछ यहीं स्वीकार है उसे

इन सब के बावजूद दयानंद जी की खुद्दारी उन के सृजन की ताक़त भी है और उन की सांसारिक कमज़ोरी भी। इसे वह भली-भांति समझते हैं :


मुश्किलें बहुत हैं और ख़रीददार भी बहुत 
लेकिन मुझे बाज़ार में बिकना नहीं आता


दुनिया से लड़ने-भिड़ने की मुद्रा में अकसर दिखने वाला यह कवि जब-जब प्रेम की ओर लौटता है, उसे अपने आप को संयत करने में कुछ समय लगता है। उस के भीतर का अधिनायक अपनी प्रेयसी की प्रशंसा करते हुए भी अपने जिरह -बख्तर से एक बारगी बाहर नहीं आ पाता। तभी तो वह कहता है :

इक ग़ज़ल ही है जहां ख़ुद को शहंशाह लिखता हूं
लिखना है तुम्हारी आंख लेकिन कटार लिखता हूं

दयानंद का एक रूमानी शेर है :


सरे राह दौड़ कर आना चने का साग खोंट कर खाना 
बचपन की रेल अकसर तुम्हारे साथ यादों में गुज़रती है

उन का यह शेर मुझे दुष्यंत कुमार के इस शेर की याद दिलाता है :

तू किसी रेल सी गुज़रती है 
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं

परंतु यहां मैं फिर कहूंगा कि आज के इस फ़रेबी और हिप्पोक्रिटिक संसार में ग़ज़ल कहते समय अभिधा में बात करने की ताकत और दुस्साहस दुष्यंत में भी नहीं था। धूमिल में था। अदम गोंडवी में बेहद था और अब वही दयानंद पांडेय की ग़ज़लों में मौजूद है। मेरा हृदय से साधुवाद।      

[ जनवाणी  प्रकाशन , दिल्ली से शीघ्र प्रकाश्य ग़ज़ल-संग्रह मन यायावर है की भूमिका ]


ग़ज़लें पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक करें 


1 . ग़ज़ल

2. दयानंद पांडेय की ग़ज़लों में उपमाएं तो देखते ही बनती हैं

 

Monday, 13 June 2016

आत्मीयता का सूखता झरना




 किताबघर प्रकाशन , दिल्ली की पत्रिका समकालीन साहित्य समाचार के संपादक 
सुशील सिद्धार्थ ने बढ़ता संपर्क , घटती आत्मीयता विषय पर एक परिचर्चा में 
मुझ से भी शिरकत करने को कहा और जून अंक में उसे प्रकाशित किया। प्रस्तुत है 
समकालीन साहित्य समाचार की उक्त परिचर्चा में प्रकाशित मेरी टिप्पणी :
 
बढ़ता संपर्क , घटती आत्मीयता । घटती खुद्दारी , बढ़ती दलाली । मुझे दोनों बात एक ही लगती है । पहले यह बीमारी सिनेमाई मानी जाती थी । फिर व्यवसायियों में परिचित हुई । राजनीति में आई और अब यह सामान्य प्रवृत्ति बन गई। हर हलका , हर समाज , हर घर , हर व्यक्ति की बीमारी के रुप में हमारे सामने उपस्थित है ।  उगते सूरज को प्रणाम की परंपरा तो सर्वदा से है पर भारतीय समाज में तो डूबते सूर्य को भी प्रणाम करने की परंपरा साथ-साथ रही है जो अब डूब गई है । या डूब रही है ।

मेरे एक पड़ोसी वकील थे । प्रैक्टिस कुछ ख़ास नहीं थी । पर मार्निंग वाक उन का बहुत ख़ास था । वह रुट बदल-बदल कर मार्निंग वाक करते थे । आई ए एस अफ़सरों और मंत्रियों के रुट पर ही वह टहलते । प्रणाम-प्रणाम करते हुए । मार्निंग वाक करते-करते वह हाई कोर्ट में स्टैंडिंग काउंसिल बन गए । देखते ही देखते वह हाई कोर्ट में जस्टिस बन गए । मार्निंग वाक के बहाने दलाली की दुकान उन की फिर भी बंद नहीं हुई । वह चीफ जस्टिस हो कर अवकाश प्राप्त हो गए हैं । पर क़ानून किस चिड़िया का नाम है , वह यह भी नहीं जानते । क़ानून जगत के लोग भी उन्हें नहीं जानते । उन के ज़्यादातर निर्णय सुप्रीम कोर्ट में पलट जाते थे । पर उन को शर्म नहीं आती थी । वह तरस जाते हैं अब एक सलाम भर के लिए । क़ानून भले नहीं जानते थे पर क़ानून बेचना उन्हें ख़ूब आता था । बेचा और ख़ूब पैसा कमाया ।  पर अपने घर में भी वह अब अजनवी हैं ।  उन के परिजन भी उन से कतराते हैं । हां उन के फार्म हाऊस और कोठियां बहुत हो गई हैं । दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों पर भी उन के आशियाने हैं ।

बाक़ी किसी की बात क्या करूं , अपनी ही बात करता हूं। बहुतेरे ऐसे लोगों से साबक़ा पड़ता रहता है । अकसर पड़ता रहता है । अगर फला जान गए कि मुझ से उन का काम बन सकता है तो वह मेरा चरण धो कर  पीने लगते हैं । लेकिन काम हो जाते ही वह न सिर्फ़ भूल जाते हैं बल्कि सामने पड़ने पर भी पहचान नहीं पाते । बिना देखे निकल जाते हैं । और जो फिर कोई काम पड़ गया तो मैं फिर उन का भगवान । रिपीट अगेन एंड अगेन की यह चिरंतन कथा है । और जो आप ने भूल कर भी कभी उन की बात को नज़र अंदाज़ कर दिया तो वह क्या क्या न कह और कर गुज़रेंगे।

गिव एंड टेक की इस दुनिया में इसी लिए मैं या मेरे जैसे लोग चारो खाने चित्त हैं । बेईमान बहादुरों की इस दुनिया में पानीदार आदमी पागल घोषित है ।

मंज़र तो यह है कि आप जितने बड़े दलाल हैं , जितने बड़े हिप्पोक्रेट हैं , जितने बड़े कमीने , कांईयां और भ्रष्ट हैं उतने ही बड़े आदमी हैं , उतने ही सफल आदमी हैं । यह दुनिया आप की ही है । आप की योग्यता , आप की असफलता की बहुत बड़ी कुंजी है ।

जीवन में पहले छोटी-छोटी इच्छाएं थीं । पूरी हों तो भी न पूरी हो तो भी पहाड़ी झरने सी आत्मीयता तो समुद्र सी आत्मीयता भी थी । मां की तरह आंचल फैलाए आत्मीयता में डूब जाने का सुख भी अनिर्वचनीय था । अब बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं हैं । इन महत्वाकांक्षाओं के आगे आत्मीयता का झरना सूख गया है । संपर्क का कातिलाना वार तारी है ।  दिक्कत यह है कि आप हर किसी को जानते हैं लेकिन कठिन यह कि आप को कोई नहीं जानता। उस से भी कठिन यह कि कोई किसी को नहीं जानता। निदा फाजली का वह जो एक शेर है कि 

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी

आप कभी सोशल साईट पर फोटुओं की भरमार का मंज़र देखिए। कोई पिद्दी जैसा मसखरा भी सेलिब्रेटी बना बैठा है । फ़ोटोशाप के कमाल से आप दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों के साथ अपनी फ़ोटो चिपका कर छाती फुला सकते हैं । अगला आप को जानता है या नहीं जानता है तो क्या हुआ उस फला के साथ आप की फ़ोटो तो है।  बेकल उत्साही का एक शेर याद आता है
 
बेच दे जो तू अपनी जुबां अपनी अना अपना जमीर
फिर तेरे हाथ में सोने के निवाले होंगे

मंज़र तो यही पेश है हमारे सामने । आप के सामने क्या नहीं है ?




[ समकालीन साहित्य समाचार से साभार ]