Friday, 22 September 2017

गोदी मीडिया का स्लोगन दे कर प्रणव रॉय खुद काले धन की गोद में न बैठे होते तो शायद यह दिन न आता


अंध सेक्यूलरिज्म का झांसा राजनीति से उतर कर मीडिया में भी अपनी परिणति पर आ गया है । तो भी एन डी टी वी का इस तरह बिक जाना दुखद है । भारतीय पत्रकारिता का यह दुर्भाग्यपूर्ण दिन है । लेकिन गोदी मीडिया का स्लोगन दे कर प्रणव रॉय खुद काले धन की गोद में न बैठे होते तो शायद यह दिन न आता । एन डी टी वी बिकाऊ तो पहले ही से था । पहले उसे कांग्रेसियों और वामपंथियों ने ख़रीद रखा था अनौपचारिक रुप से । लेकिन अब उस के शेयर बिके हैं । इस कारण उस का मालिकाना हक़ बदल गया है । पहले वह कांग्रेस और लेफ्ट का स्पीकर था अब संभवतः भाजपा का स्पीकर बन जाएगा । किसी भी मीडिया हाऊस का किसी का स्पीकर बनना दुर्भाग्यपूर्ण होता है । उस से भी ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण होता है उस का बिक जाना । एन डी टी वी ने न्यूज़ के नाम पर नमक में दाल इतना खिला दिया कि उस का यह हश्र होना ही था । व्यवसाय करते हुए , मनी लांड्रिंग करते हुए , दुनिया भर के अनाप-शनाप काम करते हुए आप मीडिया के नाम पर सारे अनैतिक काम करें और सरकार से लड़ते भी रहें , और कि कोई आप को छुए भी नहीं , मुमकिन नहीं होता । लेकिन प्रणव रॉय को कोई यह समझाने वाला नहीं रहा कि मनी लांड्रिंग और माइकल टाईसन का मुक्का एक साथ नहीं चल सकता । इस लिए भी कि व्यवसाय और मीडिया दोनों दो चीज़ हैं । अगर एन डी टी वी सिर्फ़ मीडिया होता , व्यवसायी नहीं तो बात कुछ और होती । होशियार व्यवसायी सरकार बदलते ही अपनी दुनिया , अपने सरोकार , अपनी प्रतिबद्धता बदल लेता है । लेकिन मीडिया को नहीं बदलना चाहिए । इस लिए भी कि मीडिया अपने आप में मुकम्मल प्रतिपक्ष होता है । लेकिन दुर्भाग्य से हिंदुस्तान में अब ऐसा मीडिया नहीं रहा जिस के लिए अकबर इलाहाबादी लिख गए हैं :

खींचो न कमानों को न तलवार निकालो 
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो

तो अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए प्रणव रॉय ने रवीश कुमार जैसे सिंसियर रिपोर्टर को नफ़रत का तोपखाना बना दिया । एक समय की जांबाज रिपोर्टर रही प्रभा दत्त की बेटी बरखा दत्त को पूरमपूर दलाल बना कर नीरा राडिया का कैरियर बना दिया । विनोद दुआ जैसे प्रतिभाशील एंकर को नागफनी बना दिया । एन डी टी वी को एकपक्षीय और जहरीली रिपोर्टिंग का अड्डा बना दिया । प्रणव रॉय खुद भी एक प्रतिभाशील टेलीकास्टर रहे हैं लेकिन उन्हों ने अपने आप को भी भड़भूज बना लिया । जब कि वह न्यूज़ चैनल की दुनिया के रामनाथ गोयनका बन सकते थे । अलग बात है कि बाद के दिनों में रामनाथ गोयनका भी अपने व्यावसायिक हितों के मद्देनज़र झुक गए थे । यह राजीव गांधी का समय था । ब्रिटिश राज में नहीं झुके थे गोयनका , न इंदिरा गांधी के इमरजेंसी राज में लेकिन एक एक्सप्रेस बिल्डिंग के अवैध एक्सटेंसन को बचाने के लिए वह राजीव गांधी सरकार के आगे झुक गए । प्रणव रॉय ने पहले दूरदर्शन फिर स्टार न्यूज़ और फिर एन डी टी वी के मार्फ़त भारत की पत्रकारिता को निश्चित रुप से एक मोड़ , एक शार्पनेस दी । एक तेवर दिया । भूत प्रेत और अंधविश्वास नहीं परोसा । खांटी न्यूज़ परोसी । वह जल्दी हिंदी नहीं बोलते हैं कैमरे पर और अंगरेजी में ही सांस लेते हैं । लेकिन हिंदी में लिया पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ का वह लंबा इंटरव्यू मेरे मन में अभी भी किसी तस्वीर की तरह टंगा हुआ है जिस में उन्हों ने परवेज़ मुशर्रफ की तबीयत से धुलाई की थी । बिना किसी चीख़-चिल्लाहट के मुशर्रफ को कई बार निरुत्तर कर दिया था । मुशर्रफ की घिघ्घी बंध-बंध गई थी इस इंटरव्यू में । प्रणव रॉय की समझ पर भी कभी संदेह नहीं रहा लेकिन एकपक्षीय रिपोर्टिंग करते-करवाते उन का एप्रोच बाद के दिनों में ख़ुदा होने का हो गया । हबीब जालिब के एक शेर में जो कहें तो :

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था 

वह गांधी का वह कहा भी भूल गए कि साध्य ही नहीं , साधन भी पवित्र होने चाहिए । ब्लैक मनी की आंधी में ऐसे गिरफ़्त हुए कि पत्रकारिता छोड़ कर गिरोहबंदी पर आमादा हो गए । दूरदर्शन की सरकारी पत्रकारिता की आदत उन्हें भ्रष्ट बना गई । अपने इस भ्रष्ट आचरण को छुपाने के लिए प्रणव रॉय ने सेक्यूलरिज्म की आड़ ली और निगेटिव पत्रकारिता की नदी में बह चले । खबरों की समझ और धार की ख़ुशबू को गैंग के एक पक्षीय गटर में बहा दिया । तरुण तेजपाल ने काले धन की नदी में जैसे तहलका को और ख़ुद को तबाह कर लिया , ठीक वही काम प्रणव रॉय ने एन डी टी वी को तबाह कर , कर दिया है । तरुण तेजपाल और प्रणव रॉय दोनों ही ने सेक्यूलरिज्म को गंगा समझ लिया कि सेक्यूलरिज्म की गंगा में नहा कर सारे आर्थिक पाप , सारे धतकरम धो ले जाएंगे । यहीं फंस गए यह दोनों । तरुण तेजपाल तो शुरू ही से तहलका के दलदल में खड़े थे , झूठ और फरेब के दलदल में थे , प्रणव रॉय बाद में इस दलदल में धंसे । ऐसा फंसे कि फिर निकलना मुश्किल हो गया । हम अभी प्रणव रॉय के आर्थिक अपराधों की गठरी नहीं खोल रहे । यहां यह विषय है भी नहीं । लेकिन सरकार के सुर में सुर मिलाने वाली पत्रकारिता के इस कठिन समय में सरकार के सुर में सुर न मिलाने वाले एन डी टी वी का इस तरह बिक जाना , वह भी भाजपा से संबद्ध व्यवसाई स्पाईस जेट के अजय सिंह के हाथ बिक जाना निश्चित ही भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है । इस लिए भी कि भारत में वर्तमान में विपक्ष वैसे ही मरणासन्न है , ऐसे में मीडिया भी सरकार के साथ मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा ! गाने में व्यस्त है तो कोई तो एक मीडिया होना ही चाहिए जो सत्ता के सुर में सुर न मिला जनता का सुर भी बने । प्रणव रॉय ने काले धन की हवस में खुद को जेल जाने से बचाने के लिए एन डी टी वी का यह सौदा कर के ठीक नहीं किया है । फिर से दुहरा दूं कि गोदी मीडिया का स्लोगन दे कर प्रणव रॉय खुद काले धन की गोद में न बैठे होते तो शायद यह दिन न आता । समय आ गया है कि मीडिया को काले धन की गोद से उतार कर जनता के हितों के लिए खड़ा किया जाए और सत्ता के सुर में सुर मिलाने वाली मीडिया को भी सबक सिखाया जाए । फ़िलहाल तो बशीर बद्र के यह तीन शेर बड़ी शिद्दत से याद आ रहे हैं :

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है ये वही बुतों का निज़ाम है

बड़े शौक़ से मेरा घर जला कोई आँच न तुझपे आयेगी
ये ज़ुबाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है

मैं ये मानता हूँ मेरे दिये तेरी आँधियोँ ने बुझा दिये
मगर इक जुगनू हवाओं में अभी रौशनी का इमाम है 

Tuesday, 12 September 2017

और कई दिन तक मुनमुन मेरे दिल- दिमाग में चहलक़दमी करती रही

दिव्या शुक्ला


आप लोग चाहते हैं कि मैं जियूं और अपने पंख काट लूं । ताकि अपने खाने के लिए उड़ कर दाने भी न ले सकूं। मैं पति छोड़ दूंगी पर नौकरी नहीं ! तल्खी भरे यह सख़्त वाक्य --अपने स्वार्थी भाइयों को दो टूक जवाब एक करार तमाचा सा था । मुनमुन के पास स्वाभिमान से जीने का यही तो एक हथियार था । और साथ ही गांव , कस्बों और शहरों में भी दोहरा जीवन जीती उन हज़ारों औरतों के लिए संदेश भी ---और फिर मां के टोकने पर - बेटी सुहाग के यह चिन्ह मत छोड़ो । चलो पहनो चूड़ी। सिंदूर लगाओ । बोल पड़ी मुनमुन मन का दबा ज्वार फूट पड़ा --जिस चूड़ी सिंदूर की न तो छत है न छांव , न सुरक्षा उसे लगा कर भी क्या करना --अगर यह सुहाग चिन्ह है तो जो पुरुष अपना न हो वो कैसा सुहाग ? उस के चिन्ह क्यों धारण करना -जो हमारे लायक़ नहीं उसे झटक फेंक देना ही उचित --क्यों ढोना उसे ? जिस चुटकी भर सिंदूर ने उस की दुनिया ही नर्क कर दी उसे तिलांजलि देना ही उचित ।

मुनमुन की पहचान पहले बांसगांव के नामी वकील की बेटी फिर उच्च पदों पर आसीन भाइयों की बहन के रूप में सम्मानित बहन बेटी की । फिर जल्दी ही लोगों की निगाहों में ललक भी झलकी परंतु शीघ्र ही वह एक सताई हुई औरत हो गई । लोगों की आंखों में दया करुणा या अकसर उपेक्षा झलकने लगी । पर समाज और परिवार की सताई औरतें मुनमुन में अपनी मुक्ति भी तलाशने लगी उस से सलाह लेती वह इन सब का आदर्श बन गई और अपना रास्ता अपनी मंजिल खुद तलाशी और अपना मुकाम हासिल किया। अपने संघर्ष के बारे वह यही कहती है कि सब कुछ बदलता है कुछ भी स्थाई नहीं न सुख न दुःख न समय। मुनमुन की यह कहानी समाज में संयुक्त परिवार के विघटन और उनमे पनपते स्वार्थो का उदाहरण है । बेटियां मां बाप का सुख दुःख अपने कलेजे में ले कर जीती हैं । वहीं अधिकांश बेटे सफल होते ही उपेक्षित कर देते है अपने माता पिता को ।

दयानंद पांडेय जी का यह उपन्यास गांव कस्बों की तसवीर आईने की तरह सामने लाता है बांसगांव की मुनमुन के रूप में। परिवारों में आगे निकलने की होड़ कितना पतित बना देती है --संयुक्त परिवार का विघटन , पैसा कमाने की होड़ में जहां आगे बढ़ते गए पीछे अपने रिश्तों को दफ़न करते गए । लाचार बेबस माता पिता भले ही दवा और दाने को तरसे परंतु बेटे के ऊंचे पद की चर्चा मात्र से आंखें गर्व से चमक जाती हैं । वहीं बुढ़ौती में पुत्रों पर आर्थिक रूप से निर्भर पिता कितना लाचार होता है। यह उपन्यास पढ़ते हुए मानो कितने मुनक्का राय हमारे इर्द-गिर्द नज़र आने लगते हैं । तो क्या सफलता स्वार्थ भी साथ ले कर आती है?

कभी-कभी अभाव खून का रंग सफ़ेद कर देता है । जिस बहन को बचपन में नन्ही परी चांदनी के रथ पर सवार/ गुनगुनाते हुए झुलाते थे उसे जीवन की उबड खाबड़ राहों में धकेल दिया। विवाह का बोझ उतार कर विदा किया और निशचिंत हुए।अपनी लड़ाई लड़ना, अपने घाव से टपकते रक्त को अपनी जिह्वा से चाटना कितना पीड़ादायक है यह वह स्त्री ही जानती है । तब जन्म लेती है एक दूसरी स्त्री जो अपने प्रति किए सारे अपराधों का दंड स्वयं तय करती है। यह उस की अपनी अदालत, अपना मुक़दमा और हाक़िम वही । कटघरे में है कुछ रक्त से जुड़े नाते तो कुछ समाज द्वारा तय किये गए जन्मांतर के नाते, जो कांटे की तरह चुभने लगे ! यह एक नया रूप था पति परमेश्वर की महिमामंडित छवि की खंडित करती नकारती नारी का, जिसे पुरुष समाज पचा नहीं पा रहा था। पर सफलता के आगे सदैव स्वार्थ झुकता है।

समाज ने अंतत स्वीकार किया । पर नायिका का तो प्रेम और रिश्ते नातों से विश्वास उठ गया । लेखक ने इसे बड़ी बखूबी से दर्शाया है । ऐसा लगता है पात्रों के मस्तिष्क में चल रही हलचल भी पाठकों तक पहुंच रही है । यही सफलता होती है एक अच्छे लेखक की। जातिवाद भी है। राजनीति के पहलुओं को भी छुआ है। कुल मिला कर गांव कस्बों के जीवन और एक स्त्री के संघर्ष पर आधारित यह पुस्तक पठनीय है । यह उपन्यास इतना रोचक है कि इसे मात्र तीन दिन में पढ़ा । और कई दिन तक मुनमुन मेरे दिल-दिमाग में चहलक़दमी करती रही।


समीक्ष्य पुस्तक:

बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012

बांसगांव की मुनमुन उपन्यास को इस लिंक पर पढ़ें :

बांसगांव की मुनमुन 






Tuesday, 22 August 2017

तब बुखारी ने अटल जी को धमकी दी थी कि देश में आग लग जाएगी

शाही ईमाम सैयद इमाम बुखारी

तब के दिनों अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री थे राष्ट्रीय महिला आयोग’ की तत्कालीन सदस्या सईदा सैयदेन हमीद ने अपनी रिपोर्ट वायस ऑफ वायसलेस’ में देश की मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का जो ब्यौरा परोसा थाउसे पढ़ कर दिल दहल जाता है। बरबस रूलाई आ जाती है। मुस्लिम महिलाओं पर मुस्लिम पुरूषों द्वारा अत्याचार पढ़ कर। सईदा सैयदेन हमीद ने इस रिपार्ट को सरकार को पेश करते वक्त सरकार से माँग की थी कि दुनिया के और देशों जिनमें कई मुस्लिम देश भी शामिल हैंने द्विविवाह प्रथा और तिहरा तलाक खतम कर सिविल कोड लागू कर दिया हैयहाँ तक कि पाकिस्तान ने भी। इसलिए हिंदुस्तान में भी मुस्लिम समाज के लिए यह तिहरा तलाक और द्विविवाह प्रथा समाप्त कर सिविल कोड लागू कर दिया जाए। लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट पर अमल करना तो छोड़िए गौर करना भी वाजिब नहीं समझा। जानते हैं क्यों? क्यों कि जामा मस्जिद के शाही ईमाम सैयद इमाम बुखारी ने सरकार को यह धमकी दे दी थी कि अगर हिंदुस्तान में यह रिपोर्ट लागू हुई तो देश में आग लग जाएगी। और फील गुड फैक्टर वालेभारत उदय की हुंकार भरने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी सर्द चुप्पी साधी कि सईदा सैयदेन हमीद की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई। इस के पहले मुस्लिम कट्टरपंथियों से डर कर राजीव गांधी शाहबानो मामला संसद में पलट चुके थे । अटल जी डरने वाले लोगों में से नहीं थे लेकिन वह मिली जुली सरकार के प्रधान मंत्री थे सो इस रिपोर्ट को पीठ दिखा गए 

सईदा सैयदेन हमीद
बताइए कि 16 या 18 साल की कोई लड़की तीन बच्चों की मां बन जाए और उस का इसी उम्र में तलाक भी हो जाए। तो उसका क्या होगाउस समाज का क्या होगायह एकतरफा तिहरे तलाक की त्रासदी है। कुछ और नहीं। और यह सिर्फ़ और सिर्फ़ हिंदुस्तान में है। कहीं और नहीं। दुनिया के मुस्लिम देशों में भी नहीं। पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी नहीं। मुस्लिम महिलाओं की सामाजिक और पारिवारिक स्थिति गाँव में भी चौपट है और शहरों में भी। उनकी विपन्नता और त्रासदी देख दिल दहल जाता है और कलेजा मुँह को आता है। लेकिन इस तरफ किसी योजनाकारशासनप्रशासन और समाज का ध्यान बिल्कुल नहीं है। सामाजिक ढाँचा तो जो है वो खैर है हीमुस्लिम पर्सनल लॉ की मार इन पर सबसे ज्यादा है। हालत यह है कि अधिकांश मुस्लिम देशों ने भी समान नागरिक कानून लागू कर द्विविवाह और तिहरे तलाक को तिलांजलि दे दी है। लेकिन मजहब के नाम पर हिंदुस्तान में यह कुरीति आज भी हमारे मुस्लिम समाज में जारी है। भारतीय मुस्लिम समाज में इस कुरीति के चलते हालत यह है कि एक 18 साल की औरत बच्चों की माँ बन जाती है और तलाक भी पा जाती है। अब बताइए उसकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्थिति उसको कहाँ ले जाएगीगरज यह है कि एक मुस्लिम औरत की जिंदगी शुरू होने के पहले ही तबाह हो जाती है। कोई कानून भी उसका साथ नहीं देता। मजहब का आतंक उसे जीने नहीं देता। 

वायस ऑफ द वायसलेस’ यानी बेआवाज़ों की आवाज़ को सचमुच आज तक आवाज़ नहीं मिली थी । आज मिल गई है लेकिन तब यह बात न मौलाना बुखारी समझ पाए थे और न हमारे देश की सत्ता में बैठे समझदार लोग। पाकिस्तान की एक शायरा ने एक बार लिखामेहर की रकम लौटा तो दी है तुमनेसाथ में मेरा शबाब भी लौटा दो!’ इस रिपोर्ट में मुस्लिम औरत की यातना तो दिखती ही हैमुस्लिम समाज के सामाजिक परिदृश्य के आज का बयान भी बड़ी शिद्दत से मिलता है। और मुस्लिम समाज हमारे भारतीय समाज से अलग नहीं है। मुस्लिम समाज की तरक्की हिंदुस्तान की तरक्की है। अगर मुस्लिम समाज पिछड़ा रह गया, मुस्लिम महिलाएँ देश के विकास की धुरी से अलग हो गईं तो समग्र रूप से देश भला कैसे विकास कर पाएगा? जरूरी है कि सभी समाज एक साथ सही दिशा में विकास करें। तभी देश की तरक्की होगी। और साथ ही महिलाओं की भी। महिलाएँ विकास करेंगी, तभी हम एक सभ्य और शिक्षित समाज विकसित कर पाएंगे। लेकिन सलमान रूश्दी या तसलीमा नसरीन और आरक्षण की बहस में उलझा हमारा भारतीय मुस्लिम समाज मुस्लिम औरतों के बेइंतिहा तक़लीफ को भी जाने क्यों परदे में ही रखना चाहता है।

यहां सुविधा के लिए भारत के मुस्लिम पर्सनल लॉ’ तथा अन्य इस्लामिक देशों के मुस्लिम कानून पर तुलनात्मक दृष्टि डालना उचित होगा। प्रोताहिर महमूद ने अपनी किताब फैमली लॉ रिफार्म्स इन द मुस्लिम वर्ल्ड’ में निम्न तथ्यों को उजागर किया है-
  1. तुर्की में परंपरागत मुस्लिम कानून की जगह आधुनिक सिविल कोड ने ली है।
  2. मिस्रसूडानलेबनानजार्डनसीरियाट्यूनिशियामोरक्कोअलजीरियाईरानपाकिस्तान और बांग्लादेश ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में आवश्यक सुधार किए हैं। 
  3. उपरोक्त सभी देशों में तखय्युर (इस्लाम धर्म के विभिन्न संप्रदायों के सिद्धांतों में समानता और विनिमयशीलताकी स्वीकृति के पश्चात परंपरागत कानून का कठोरता से पालन समाप्त हो गया। 
  4. तुर्की और ट्यूनिशिया में मुस्लिम विवाह और तलाक के लिए अलग कानून बनाया गया है।
  5. इंडोनेशियामलेशिया और ब्रूनेई में बहुविवाह प्रतिबंधित कर दिया गया। 
  6. ईरानइराकसीरियापाकिस्तान और बांग्लादेश में बहुविवाह पर न्यायालय और प्रशासनिक संस्थाओं का कड़ा नियंत्रण है। 
  7. तुर्कीट्यूनिशियाअलजीरियाइराकईरानइंडोनेशियापाकिस्तान और बांग्लादेश में एकपक्षीय तलाक पर रोक लगा दी गई है। 
  8. अनेक मुस्लिम देशों में महिलाओं के तलाकगुजारे और बच्चों की अभिरक्षा संबंधी अधिकार और अधिक व्यापक कर दिया गया है। 
  9. मिस्रसूडानजार्डनसीरियाट्यूनिशियामोरक्कोपाकिस्तान और बांग्लादेश में तीन बार तलाक कहने की प्रथा पर रोक है। 
  10. मिस्रसीरियाट्यूनिशियामोरक्कोपाकिस्तान और बांग्लादेश में अनाथ पौत्रों के लिए विरासत संबंधी नए कानून बनाए गए हैं। 
  11. मिस्रसूडानसीरियाट्यूनिशिया में जीवित पत्नी के उत्तराधिकार संबंधी अधिकार और व्यापक कर दिए गए।
पाकिस्तान में फेमली लॉ आर्डिनेंस 1961’ लागू होने के बाद बहुविवाह अब पुरूष का यह अधिकार नहीं रहा जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती है। दूसरे विवाह के लिए पहली पत्नी की लिखित स्वीकृति जरूरी है। क्योंकि सभी विवाह पंजीकृत होते हैं अतः तीन बार तलाक कह देने से वे समाप्त नहीं होंगे। तलाक अब लिखित अधिसूचना पर ही प्राप्त होगा। यह भी तब जब समझौते की सारी कार्रवाइयाँ दंपत्ति का पुनर्मिलन कराने में असफल हो गई हों। गुजारा भत्ता तलाकशुदा स्त्री का अधिकार है और यह केवल इद्दत की अवधि तक ही सीमित नहीं है।। धर्म तंत्री इस्लामिक देश पाकिस्तान में यह परिवर्तन 1950 के महिला आंदोलन की दृढ़ता और दबाव के कारण आया।

आज भारत में भी मुस्लिम महिलाओं की लड़ाई रंग ले आई है । भारत में भी आज तिहरा तलाक़ खत्म हुआ । लेकिन द्विविवाह प्रथा समाप्त कर सिविल कोड लागू किए बिना मुस्लिम औरतों का सामाजिक स्तर नहीं सुधरने वाला 

यही सच है। और जो एक शेर में यही बात कहूँ तो शायद इसे आप और बेहतर ढंग से समझ सकेः

सच तो एक परिंदा है
घायल है पर जिंदा है

मीना कुमारी लेकिन इस हलाला से टूट सी गई थीं


बहुत कम लोग जानते हैं कि मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी भी इस तिहरे तलाक़ में टूट गई थीं । बल्कि तिहरे तलाक़ ने कम हलाला ने उन्हें ज़्यादा तोड़ दिया था । उन का जिस्म और जां तनहा तनहा हो गया था तो अनायास ही नहीं । हुआ यह कि कमाल अमरोही ने एक बार गुस्से में मीना कुमारी को तलाक़ , तलाक़ , तलाक़ कह दिया । बाद में कमाल अमरोही को  इस तलाक़ पर पछतावा हुआ । पर दुबारा निकाह के लिए हलाला करवाना पड़ा मीना कुमारी को । यह हलाला किया मशहूर अभिनेत्री ज़ीनत अमान के पिता अमान उल्ला खान ने । अमान भी तब स्क्रिप्ट राइटर थे । इद्दत यानी फिर पीरियड्स के बाद कमाल अमरोही ने दुबारा निकाह किया । मीना कुमारी लेकिन इस हलाला से टूट सी गई थीं ।

मीना कुमारी ने लिखा है , ' जब मुझे धर्म के नाम पर, अपने जिस्म को, किसी दूसरे मर्द को भी सौंपना पड़ा, तो फिर मुझ में और वेश्या में क्या फर्क रहा ? इस दुर्घटना ने मीना कुमारी को मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था और फिर मानसिक शांति के लिए वह शराब पीने लगीं थी । मानसिक तनाव और शराब ही उन की अकाल मौत की वजह बनी थी और सिर्फ 39 साल की उम्र में 1972 में मीना कुमारी दुनिया छोड़ कर चली गईं ।

वैसे तो अभिनय के लिए मीना कुमारी को ट्रेजडी क्वीन कहा ही जाता है लेकिन इस हलाला ने मीना कुमारी को ट्रेजडी के सागर में डुबो दिया था। उन की ग़ज़लों में उन का यह रंग देखा जा सकता है । जिस में मीना कुमारी ने अपना दुःख , अपनी टूटन साझा की है । मीना कुमारी की ऐसी ही तीन ग़ज़लें यहां पेश हैं :

एक 

चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा,
दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा

बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुआँ तन्हा

ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जाँ तन्हा

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें कहाँ तन्हा

जलती-बुझती-सी रोशनी के परे,
सिमटा-सिमटा-सा एक मकाँ तन्हा

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे ये जहाँ तन्हा।

 दो

पूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती है
रात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है

साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब
दिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है

जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाब
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है

ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है

एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है

दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है

काम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़
तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है.

तीन 

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली


Tuesday, 8 August 2017

मत लड़ा करो मेरी जान , मत लड़ा करो

फ़ोटो : अनिल रिसाल सिंह 

पति क्या कम पड़ जाता है
जो तुम मुझ से भी लड़ने लगती हो
बात-बेबात

मधुमक्खी की तरह मत मिला करो
शहद की तरह मिला करो
फूल की तरह खिला करो
मेरी जान , जान में जान बन कर रहा करो

मन में संगीत की किसी तान की तरह बजा करो
जैसे हरि प्रसाद चौरसिया की बांसुरी
जैसे बजता है शिव कुमार शर्मा का संतूर

जैसे लंबा आलाप ले कर
तुलसी का कोई पद गाते हैं भीमसेन जोशी
गाती हैं लता मंगेशकर कोई भजन या कोई प्रेम गीत
गाते हैं ग़ालिब को जगजीत सिंह
और उस में मिलाती हैं धीरे से अपना सुर चित्रा सिंह

जैसे वृक्ष पर बैठी गाती हुई बतियाती है कोई गौरैया
जैसे मां की छाती से चिपटता है किलकारी मारता कोई शिशु
जैसे मिलती हैं कल-कल करती नदियां सागर से
जैसे मिली थी तुम पहली बार सपनों का सागर लिए हुए
वैसे ही मिला करो
सपनों के सागर में डूब कर

जैसे बारिश की कोई बूंद मिलती है धरती से आहिस्ता
प्रेम के इस प्रहर में ऐसे ही धीरे से मिला करो
मिसरी बन कर मन में घुला करो
मत लड़ा करो मेरी जान , मत लड़ा करो

प्रेम के पाग में सान लो मुझ को
किसी नदी के निर्मल जल सी बहो मेरे मन में
गंगोत्री बन कर 

Thursday, 3 August 2017

कभी थीं नीरा यादव भी ईमानदार जब वह नीरा त्यागी हुआ करती थीं

पुलिस हिरासत में नीरा यादव 

कभी थीं नीरा यादव भी ईमानदार जब वह नीरा त्यागी हुआ करती थीं । उन की ईमानदारी के नाम पर चनाजोर गरम बिका करता था । उन दिनों जौनपुर में डी एम थीं । जौनपुर में आई विकराल बाढ़ में वह जान हथेली पर ले कर नाव से गांव-गांव घूम कर लोगों की मदद की थी । वह बेहद लोकप्रिय हुई थीं तब जौनपुर में । उन के पति त्यागी जी सेना में थे । 1971 के युद्ध में खबर आई कि वह वीरगति को प्राप्त हुए । नीरा यादव ने महेंद्र सिंह यादव से विवाह कर लिया । तब यादव जी डी आई जी थे । लेकिन बाद में त्यागी जी के वीरगति प्राप्त करने की खबर झूठी निकली । पता चला वह युद्ध बंदी थे । बाद के दिनों में वह शिमला समझौते के तहत छूट कर पाकिस्तान से भारत आ गए । नीरा यादव से मिलने गए तो वह उन से मिली ही नहीं । उन्हें पति मानने से भी इंकार कर दिया । त्यागी जी भी हार मानने वालों में से नहीं थे । डी एम आवास के सामने धरना दे दिया । कहां तो नीरा यादव के नाम से ईमानदारी का चनाजोर गरम बिकता था , अब उन के छिनरपन के किस्से आम हो गए । खबरें छपने लगीं । किसी तरह समझा बुझा कर त्यागी जी को धरने से उठाया गया । जाने अब वह त्यागी जी कहां हैं , कोई नहीं जानता।

महेंद्र सिंह यादव और नीरा यादव 
पर महेंद्र सिंह यादव ने नीरा यादव को अपनी ही तरह भ्रष्ट अफसर बना दिया । बाद के दिनों में मुलायम सिंह यादव की भी वह ख़ास बन गईं । मुलायम ने उन के भ्रष्ट होने में पूरा निखार ला दिया । अब नीरा यादव को आई ए एस अफसर ही महाभ्रष्ट कहने लगे । दुनिया भर की जांच पड़ताल होने लगी । मेरी जानकारी में नीरा यादव अकेली ऐसी आई ए एस अफसर हैं जिन के भ्र्रष्टाचार की जांच के लिए बाकायदा एक न्यायिक आयोग बना । जस्टिस मुर्तुजा हुसैन आयोग । मुर्तुजा साहब ने नीरा यादव को दोषी पाया । शासन को रिपोर्ट सौंप दी । लेकिन किसी भी सरकार ने उस जांच रिपोर्ट पर पड़ी धूल को झाड़ने की नहीं सोची । हर सरकार में नीरा यादव की सेटिंग थी । बाद के दिनों में तो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें अपना मुख्य सचिव भी बना लिया था । अदालती हस्तक्षेप के बाद उन्हें हटाना पड़ा । अब वह बाकायदा सज़ायाफ्ता हैं । और सब कुछ सब के सामने है ।

मुलायम सिंह यादव और नीरा यादव 
लेकिन दो बात लोग नहीं जानते । या बहुत कम लोग जानते हैं । एक यह कि नीरा यादव की दो बेटियां हैं । दोनों विदेश में हैं । नीरा यादव सारी काली कमाई बेटियों को भेज चुकी हैं । बेटियों की पढ़ाई लिखाई भी विदेश में हुई और दोनों बेटियां वहां की नागरिकता ले कर मौज से हैं । दूसरे , डासना जेल में वह वी आई पी ट्रीटमेंट के तहत हैं । बैरक में वह नहीं रहतीं , स्पेशल कमरा मिला हुआ है , उन्हें । तीसरे डासना जेल ट्रायल कैदियों के लिए है , सज़ायाफ्ता के लिए नहीं । बाकी सरकार जाने और नीरा यादव । वैसे नीरा यादव भजन सुनने कखासी शौक़ीन हैं , खास कर अनूप जलोटा की तो वह बहुत बड़ी फैन हैं । हां , व्यवहार में वह अतिशय विनम्र भी हैं । कम से कम मुझ से तो वह भाई साहब , प्रणाम कह कर ही बात करती रही हैं । मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर नीरा यादव के जीवन में महेंद्र सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव नहीं आए होते तो शायद हम नीरा यादव को एक ईमानदार आई ए एस अफसर के रूप में आज जान रहे होते । कह सकता हूं कि नीरा यादव अपने को चंदन बना कर नहीं रख पाईं , भुजंगों के प्रभाव में आ कर विषैली और भ्रष्ट बन कर रह गईं । अफ़सोस !

Sunday, 30 July 2017

मैं ज़फ़र ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में अपनी घरवाली को एक कंगन दिलाने के लिए


अजी बड़ा लुत्फ़ था जब कुंआरे थे हम तुम , या फिर धीरे धीरे कलाई लगे थामने , उन को अंगुली थमाना गज़ब हो गया ! जैसी कव्वालियों की उन दिनों बड़ी धूम थी ।  उस किशोर उम्र में ज़फ़र की यह दोनों कव्वाली सुन कर जैसे नसें तड़क उठती थीं , मन जैसे लहक उठता था । उन दिनों हम पढ़ते थे और प्रेम की नीम बेहोशी में कविताएं लिखते थे । उन्हीं दिनों ज़फ़र गोरखपुरी से गोरखपुर में ही भेंट हुई गोरखपुर के शायर एम कोठियावी राही के उर्दू अख़बार इश्तराक के दफ़्तर में । ज़फ़र गोरखपुरी की शान में राही ने एक नशिस्त आयोजित की थी । जिस में हम भी गए थे कविता पढ़ने । उस नशिस्त के बाद ज़फ़र गोरखपुरी से एक इंटरव्यू भी किया था जो एक साप्ताहिक अख़बार उत्तरी हेराल्ड में पूरे पेज पर छपा था । अपने संघर्ष , जद्दोजहद और शायरी पर उन्हों ने खूब बतियाया था । शुरुआती दिनों में बंबई में उन्हों अपनी मज़दूरी का ज़िक्र किया था । सड़क निर्माण में मिट्टी ढोने जैसे काम किए थे उन्हों ने । तब वह बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे । लेकिन गांव से वह कमाने गए थे बंबई । घर चलाने के लिए ।  मज़दूरी करते हुए ही पढ़ाई की और फिर यह देखिए वह बंबई नगर निगम के एक स्कूल में पढ़ाने भी लगे । शायरी करने लगे। मुशायरों में जाने लगे , रिसालों में छपने लगे । वह आनरेरी मजिस्ट्रेट भी बन गए ।  शायरी में शोहरत हुई तो अभिनेता और संवाद लेखक कादर खान से भेंट हो गई । 

कादर खान ही उन्हें फ़िल्मी दुनिया में ले गए । गाने लिखवाने के लिए लोगों से मिलवाया । ज़फ़र गोरखपुरी ने फिल्मों में लिखना शुरु किया तो जल्दी ही उन की लिखी कव्वालियां सिर चढ़ कर बोलने लगीं । जैसे धूम मच गई उन की । शोहरत के उन्हीं दिनों में उन से मिलना हुआ था । बाद के दिनों में उन्हों ने एक से एक नायाब गाने लिखे । उर्दू शायरी में भी उन्हों ने अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज की । वह हिंदी लेखकों को भी खूब पढ़ते थे । धर्मवीर भारती के गुनाहों का देवता के जवाब में लिखी उन की पहली पत्नी कांता भारती के उपन्यास रेत की मछली उन्हीं दिनों छप कर आई थी । रेत की मछली की वह बड़ी देर तक चर्चा करते रहे । कहने लगे कि भारती को नंगा कर के रख दिया है कांता ने । बंबई की बातें , गांव और संघर्ष की बातें । वह गोरखपुर नियमित आते थे तब के दिनों । उन का परिवार तब गांव में ही रहता था । संयोग है कि उन का गांव मेरे गांव के पास ही है । हमारी तहसील एक ही है बांसगांव । उन के गांव और मेरे गांव का नाम भी संयोग से एक ही है - बैदौली । बस उन के गांव के नाम के आगे भटौली शब्द लग कर भटौली बैदौली हो जाता है । भटौली बैदौली बाबू साहब लोगों का गांव है तो कुछ लोग उसे बाबू बैदौली भी कहते हैं । खैर आज जब उन के निधन की ख़बर मिली तो जी धक् से रह गया । मन उदास हो गया । बहुत खोजा उन का वह पुराना इंटरव्यू लेकिन नहीं मिला । तो भी उन का पूरा इंटरव्यू मन में जैसे पूरा का पूरा अभी भी उसी तरह बसा हुआ है । तमाम सफलता के बावजूद उन के चेहरे पर संघर्ष की इबारत साफ पढ़ी जा सकती थी । ज़फ़र गोरखपुरी का एक शेर है :


देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे
इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे

ज़फ़र गोरखपुरी अब जब भी याद आएंगे तो वह अपने इस शेर को साबित करते हुए ही याद आएंगे । ज़फ़र के और हमारे दोस्त रहे एम कोठियावी राही का एक शेर है :

मुफ़लिसी में किसी से प्यार की बात ज़िंदगी को उदास करती है 
जैसे किसी ग़रीब की औरत अकसर सोने चांदी की आस करती है 

तो ज़फ़र जैसे राही की बात को और उन के इस शेर के आंच की इस इबारत को और गाढ़ा करते हुए लिखते हैं : 

मैं ज़फ़र ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में
अपनी घरवाली को एक कंगन दिलाने के लिए

Saturday, 29 July 2017

प्रतिबद्धता के नाम पर साहित्यकारों को अपनी इस दोगलई से हर हाल बाज आना चाहिए

‘साहित्य का उद्देश्य’ में प्रेमचंद ने लिखा था, ‘हमें सुंदरता की कसौटी बदलनी होगी।’ तो बदली स्थितियों में भी इस कसौटी को बदलने की ज़रुरत आन पड़ी है। इस लिए भी कि प्रेमचंद इस निबंध में एक और बात कहते हैं, ‘वह (साहित्य) देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्‍चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई सच्‍चाई है।’ इस दोगले समय में प्रतिबद्धता के नाम पर साहित्यकार जिस तरह प्रेमचंद के इस कहे पर पेशाब करते हुए राजनीति के पीछे साहित्य की मशाल ले कर भेड़ की तरह चल पड़े हैं , वह उन्हें हास्यास्पद बना चुका है । पुरस्कार वापसी के नाम पर गिरोहबंदी कर जिस जातीय और दोगली राजनीति के पीछे साहित्यकार खड़े हुए हैं , बीते कुछ समय से साहित्यकारों को भी इस प्रवृत्ति ने दोगला बना दिया है । मुझे अपनी ही एक ग़ज़ल याद आती है :

प्रेमचंद को पढ़ कर  खोजा बहुत पर फिर वह मिसाल नहीं मिली
राजनीति के आगे चलने वाली साहित्य की वह मशाल नहीं मिली

कोई अफ़सर था कोई अफसर की बीवी कोई माफ़िया संपादक
कोई पुरस्कृत तलाश किया बहुत लेकिन कोई रचना नहीं  मिली

किसी ने तजवीज दी कि आलोचना पढ़िए कोई तो मिल ही जाएगा
माफ़िया मीडियाकर लफ्फाज सब मिले पर आलोचना नहीं  मिली

खेमे मिले खिलौने मिले विचारधारा की फांस जुगाड़ और साजिशें
लेकिन इन को पढ़ने खरीदने और जानने वाली जनता नहीं मिली

संबंधों के महीन धागों में बुनी किताबें कैद हैं लाईब्रेरियों में लेकिन
मां को देखते ही बच्चा तुरंत हंस दे ऐसी निश्छल ममता नहीं मिली

रचनाओं पे ओहदेदार थे , ओहदे के साथ यश:प्रार्थी कामनाएं भी
एक सांस पर मर मिटे इन की रचना पर जो वह ललना नहीं मिली

मिले भी कैसे भला ? अगर साहित्यकारों की आंख पर प्रलोभन की चर्बी चढ़ जाए , महत्वाकांक्षा और सनक की एक सरहद तामीर हो जाए तो कैसे मिले ? प्रेमचंद साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहते हैं, तो इस का अर्थ और इस की ध्वनि भी ज़रुर समझनी और सुननी चाहिए। राजनीति और साहित्य के चरित्र में भारी फर्क होता है। राजनीति के बहुत सारे निर्णय फौरी होते हैं। राजनीति ऐसे निर्णय भी लेती है, जो सत्ता प्राप्ति की दृष्टि से ही होते हैं ।राजनीतिज्ञ बहुत दूरगामी परिणाम के बाबत नहीं सोचते , न ही कारगर होते हैं । लेकिन साहित्य में फौरी कार्रवाई का कोई मतलब नहीं होता ।

साहित्य इसी लिए प्रेमचंद की नज़र में राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है । साहित्य को सच ही देखना चाहिए । प्रतिबद्धता के नाम पर साहित्यकार को राजनीति का औजार नहीं बनना चाहिए । बिहार प्रसंग में साहित्यकारों की प्रतिबद्धता के नाम पर जो छीछालेदर हुई है वह अब किसी से छुपी नहीं है । अब से सही , साहित्यकारों को अपनी प्रतिबद्धता समाज और साहित्य के साथ ही रखनी चाहिए । ज़रुरत पड़े भी तो प्रेमचंद के कहे मुताबिक साहित्यकार राजनीति के आगे चलनी वाली मशाल बनें , राजनीति के पीछे चलने वाली दोगली मशाल या औजार नहीं । प्रतिबद्धता के नाम पर साहित्यकारों को अपनी इस दोगलई से हर हाल बाज आना चाहिए । ग़ालिब कहते ही हैं :

रखियो, ग़ालिब मुझे इस तल्ख नवाई में मुआफ
आज कुछ दर्द मिरे दिल में सिवा होता है

Friday, 14 July 2017

सुशोभित सक्तावत के सवालों की आग बहुतों को जला रही है


बहुत कम लोग हैं हमारे जीवन में जिन की भाषा पर मैं मोहित हूं । संस्कृत में  बाणभट्ट और कालिदास । रूसी में टालस्टाय । हिंदी में कबीरदास  , तुलसीदास , हजारी प्रसाद द्विवेदी , अज्ञेय , निर्मल वर्मा , अमृतलाल नागर , मोहन राकेश , मनोहर श्याम जोशी । धूमिल और दुष्यंत की कविता पर अलग से मोहित रहता हूं । अंगरेजी में खुशवंत सिंह पर फ़िदा हूं । उर्दू में मीर , ग़ालिब पर फ़िदा हूं ।  फैज़ और मंटो भी भाते हैं । ब्रेख्त भी । यह फेहरिस्त कुछ लंबी है । और भी भाषाओँ में और लोग हैं । फ़िलहाल कुछ युवा लेखकों को फ़ेसबुक पर पढ़ा है और उन पर मर-मर मिटा हूं । अविनाश मिश्र , अतुल कुमार राय , आलोक शायक ऐसे ही कुछ युवा हैं । 

पर इन दिनों एक और युवा लेखक ने मुझे अपनी भाषा की ताजगी और तुर्शी से मोहित कर रखा है वह हैं सुशोभित सक्तावत। सुशोभित की भाषा में जैसे नदी बहती है । एक नदी से दूसरी नदी के मिलने के जाने कितने प्रयाग हैं , संगम और उस के ठाट हैं । सुशोभित की भाषा में बांकपन है , आग है , नदी है , उस की रवानी और रफ़्तार है  । उन की कहन में , तर्कों में ऐसा ताप है  , तथ्यों के ऐसे तार हैं कि आप उन्हें पढ़ते ही उन की भाषा के जादू में खो जाएंगे । अलग बात है , कुछ फ़ासिस्ट लोग उन की इस भाषा की आग में झुलस गए हैं तो कुछ लोग भस्म हो गए हैं । अफ़सोस कि भस्म हो कर फ़ेसबुक पर इन फ़ासिस्टों ने सामूहिक शिकायत कर दी है । सो फ़ेसबुक ने महीने भर के लिए उन का अकाउंट ब्लाक कर दिया है । 

इस लिए कि भारतीय जनतंत्र की तरह फ़ेसबुक भी संख्या बल और तकनीक पर ही यकीन करता है , सत्य , तथ्य और तर्क पर नहीं। किसी जिरह की तलब नहीं रखता फ़ेसबुक । भीड़तंत्र की यह भूख और प्यास है । संख्या बल के आगे झुकना ही पड़ता है । कोई  भी हो । ठीक है यह भी । यह उस की अपनी परंपरा है , व्यवस्था है । लेकिन फ़ेसबुक फिर भी एक हद तक जनतांत्रिक है । तभी तो पूंजीवाद के प्रबल विरोधी भी पूंजीवाद द्वारा संचालित इस फ़ेसबुक पर पूरे दमखम से उपस्थित हैं । खैर , नए अकाऊंट के साथ सुशोभित फिर से उपस्थित हैं । उन का फिर से स्वागत है । इस लिए भी कि सुशोभित के सवालों की सुलगन समाप्त नहीं हुई है। कभी समाप्त नहीं होगी । सवालों और मुद्दों का अंबार है जैसे सुशोभित के पास । सुशोभित ने अभी अपनी एक पोस्ट में लिखा था :

कई लोग कह रहे हैं कि आप कला-संस्कृति पर लिखते हैं, वही अच्छा है, इन बातों में मत आइए। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि इस तरह की "पेट्रोनाइज़िंग" बातें करने की वैधता वे कहां से प्राप्त कर पाते हैं? यह लगभग "पितृसत्तात्मक" आग्रह है कि आप यह तय करें कि किस व्यक्त‍ि को कला पर लिखना है, किसको राजनीति पर लिखना है और वामपंथी पाखंड के "कौमार्य" को भंग करने के अधिकार से किस-किसको वंचित रखना है!

बहरहाल, मेरी बौद्ध‍िक चिंताओं का आधार इधर सुस्पष्ट रहा है।

मैं दुनिया के इतिहास में इस्लामिक परिघटना के उदय के साथ ही संघर्ष और विभेद की एक प्रवृत्त‍ि को भी एक सुस्पष्ट विचलन की तरह लक्ष्य करता हूं। वैसे ही विचलन साम्राज्यवाद, फ़ासीवाद, साम्यवाद, माओवाद के भी रहे हैं, किंतु किसी और को इतना प्रश्रय नहीं दिया जाता है, जितना कि इस्लाम को, और यह मेरी चिंता के मूल में है।

इस्लाम में निहित आक्रामकता, क्रूरता, असहिष्णुता कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो किसी की नज़र से छिपी हो और पूरी दुनिया में व्याप्त "इस्लामोफ़ोबिया" इसकी बानगी है। अगर आप इस्लाम की समीक्षा करते हैं तो इससे आप दक्षिणपंथी नहीं हो जाते। अगर आप बहुत पढ़े-लिखे इंसान हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि आपको इस्लाम को मौन प्रश्रय देना चाहिए। बहुत ही "प्रोग्रेसिव" क़िस्म के लोग, जैसे अयान हिरसी अली इन दिनों यह कर रही हैं। वह एक अफ्रीकी महिला है, जो जाने किन भीषण संकटों से उभरकर सामने आई हैं। हिंदी साहित्य के अघाए हुए मठाधीश तो उन संघर्षों का अनुमान भी नहीं लगा सकते। नोबेल पुरस्कार विजेता वीएस नायपॉल ने इस्लाम के चरित्र पर किताबें लिखी हैं। सैम्युअल हटिंग्टन ने सभ्यताओं के संघर्ष के मूल में इस्लाम की असहिष्णुता बताई है। वैसे अनेक विमर्श आज उपलब्ध हैं और सर्वमान्य हैं।

फिर तो कुछ लोगों ने बलात सुशोभित के हिंदू होने की , संघी होने की बाकायदा सनद जारी कर दी । आरोप पहले से लगाते रहे थे । अदभुत है यह भी कि आप किसी से असहमत हों , उस के सवालों से मुठभेड़ न कर पाएं तो आप उसे फ़ौरन से पेश्तर हिंदू और संघी होने की सनद जारी कर दें । ऐसे गोया गाली दे रहे हों । फिर कतरा कर अपने वैचारिक राजमार्ग पर स्वछंद विचरण करें । गुड है यह तरकीब भी । खुदा बचाए ऐसी तरकीबों से । क्यों कि किसी जातीय या मज़हबी नफ़रत से भी खतरनाक है यह वैचारिक नफ़रत । इस वैचारिक नफ़रत और स्खलन से तौबा करना बहुत ज़रुरी है ।

सुशोभित उन दिनों अभिनेत्री दीप्ति नवल पर लिख रहे थे , लिख कर गोया उन के अभिनय का नया सिनेमा रच रहे थे । उन की भाषा पर मैं तो क्या दीप्ती नवल भी मर मिटीं । सुशोभित की भाषा में जो सुबह की ओस सा टटकापन है , उन की सूचनाओं में जो दर्प है , उन की कहन में जो ठाट है , तथ्य और तर्क है उस के जाल में आ कर आप उन से बच नहीं सकते । वह स्थापित चीज़ों में तोड़-फोड़ बहुत करते हैं । यही उन की ताक़त भी है । हो सकता है आप उन्हें पूरी सख्ती से नापसंद करें पर अगर आप स्वस्थ मन और दिल दिमाग के मनुष्य हैं तो उन की किसी बात से असहमत भले हों , विरोध भले करें , उन का तुरंत जवाब देना आप  के वश में नहीं रह जाता । यह ताकत मैं ने आचार्य रजनीश में पहले देखी थी , अब सुशोभित सक्तावत में देख रहा हूं । रजनीश को भी आप नापसंद कर सकते हैं , असहमत हो सकते हैं लेकिन पलट कर उन के तर्कों को आप उसी शालीनता से उन्हें निरुत्तर नहीं कर सकते । तो सिर्फ़ इस लिए कि रजनीश कुतर्क नहीं करते , अपने अध्ययन की बिसात पर , अपने तथ्य और तर्क पर आप को ला कर खड़ा करते हैं । और अगर आप अध्ययन में विपन्न हैं , तर्क में दरिद्र हैं , कुछ ख़ास पहाड़ा रट कर सारा गणित निपटा लेना चाहते हैं तो माफ़ करें आप को अभी नहीं तो कभी तो खेल से बाहर निकलना ही पड़ेगा । आऊट होना ही पड़ेगा । सुशोभित भी रजनीश की तरह न सही जबलपुर के , उज्जयनी के हैं , इंदौर में रहते हैं । अध्ययन , भाषा , तर्क , तथ्य और सत्य की पूंजी है सुशोभित के पास । जिरह की उन की ख़ुशबू ही और है । तो सुशोभित के तर्क के कंटीले तार में जब लोग घिर जाते हैं तो हिंदू और संघी कह कर भागने की पटकथा रचते हैं और हुवां हुवां करते हुए भाग लेते हैं । फ़ेसबुक पर सामूहिक शिकायत कर अपना फ़ासिस्ट चेहरा दिखा देते हैं । 

लेकिन विमर्श की भाषा शिकायत की नहीं होती । हिंदू और संघी कह कर कतराने की नहीं होती । यह बात हमारे तमाम दोस्त नहीं जानते । एन जी ओ फंडिंग का विमर्श चलाना या किसी पूर्वाग्रह और ज़िद में फंसे रहना और बात है , सत्य , तथ्य और तर्क और बात है । सुशोभित सच्चा विमर्श जानते हैं , गिरोहबंदी नहीं । सेक्यूलरिज्म का यह नव फासीवाद मत खड़ा कीजिए दोस्तों । हर हिंदू , संघी नहीं होता । आप यह एक नया हिंदू रच रहे हैं , इस से बचिए । कुतर्क , फासिज्म और फ़ेसबुक से आगे भी दुनिया है । समय की दीवार पर लिखी इबारत को पढ़िए और अपने इस छल-कपट से भरसक बचिए । सुशोभित सक्तावत जैसे लेखकों की यातना को , उन के बिगुल को , उन के मर्म को समझने की कोशिश कीजिए । सुशोभित की बातों का तार्किक जवाब बनता हो तो ज़रुर दीजिए । नहीं ए सी चला कर कंबल ओढ़ कर सो जाईए । फ़ेसबुक पर सामूहिक शिकायत कर ब्लाक करने का फासिज्म बंद कीजिए । आप अपने इस अभियान में खुद नंगा हो रहे हैं । हो सके तो ख़ुद को नंगा होने से बचा लीजिए  । सुशोभित के सवालों की आग बहुतों को जला रही है , इस आग से हो सके तो मोर्चा लीजिए नहीं , बच लीजिए वरना जला डालेगी । अपने से असहमत लोगों को भी सुनना सीखिए दोस्तों । कोई विमर्श तभी बनता है जब सहमत और असहमत दोनों साथ हों । नहीं मैं तेरी पीठ खुजलाऊं , तू मेरी पीठ खुजला । तू मेरे लिए ताली बजा , मैं तेरे लिए ताली बजाऊं वाला आप का आज का विमर्श आप में खालीपन भर देगा । खोखला बना कर आप को एक गिरोह में बदल देगा । बल्कि बदल चुका है । आप खाप पंचायत बनने से , वैचारिक तालिबान बनने से भरसक बचिए । सुशोभित की बातों से , सवालों से मुठभेड़ कीजिए न । तू तकार और हिकारत की भाषा नफ़रत की भाषा है , इस से बचिए । आप का बड़प्पन डूब जाता है इस तू तकार और नफ़रत में । सुशोभित की बात के ताप को महसूस कीजिए । सुशोभित कम बोलते हैं , उन की बात ज़्यादा बोलती है ।  शमशेर की कविता याद आती है :

बात बोलेगी,
हम नहीं।
भेद खोलेगी
बात ही।

सत्य का मुख
झूठ की आँखें
क्या-देखें!

सत्य का रूख़
समय का रूख़ हैः
अभय जनता को
सत्य ही सुख है
सत्य ही सुख।

दैन्य दानव; काल
भीषण; क्रूर
स्थिति; कंगाल
बुद्धि; घर मजूर।

सत्य का
क्या रंग है?-
पूछो
एक संग।
एक-जनता का
दुःख : एक।
हवा में उड़ती पताकाएँ
अनेक।

दैन्य दानव। क्रूर स्थिति।
कंगाल बुद्धि : मजूर घर भर।
एक जनता का - अमर वर :
एकता का स्वर।
-अन्यथा स्वातंत्र्य-इति।

Thursday, 13 July 2017

तो क्या कुमार विश्वास के परोसने से बच्चन की कविताओं का स्टारडम गड्ढे में जाता रहा था


मुझे लगता है कि कुमार विश्वास द्वारा यू ट्यूब पर हरिवंश राय बच्चन की कविता परोसने से हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का स्टारडम गड्ढे में जाता रहा था , इसी लिए अमिताभ बच्चन ने ऐतराज जताया होगा । ऐसा उन को लगा होगा । लेकिन क्या कविता का भी क्या कोई स्टारडम होता है भला ? अगर होता है तो फिर कबीर और तुलसी जैसे कवि का क्या स्टारडम है ।  इन कवियों को तो हर कोई गाता , बजाता और पढ़ता मिलता है । जन-जन के मन में हैं वह । कवि या कोई भी रचनाकार जन-जन का होता भी है । पर अगर स्टारडम तौलें भी तो तुलसी , कबीर के स्टारडम के आगे बच्चन की क्या बिसात ? 

खैर कोई यह तो बताए कि अगर हरिवंश राय बच्चन की ज़िंदगी में मधुशाला , तेजी बच्चन और अमिताभ बच्चन नाम के तीन तत्व न होते तो हरिवंश राय बच्चन को कोई क्या आज भी याद रखता ऐसे और इस तरह ही ? शुरु में लोगों ने बच्चन को मधुशाला के नाते जाना और याद रखा । फिर उन के जीवन में तेजी आ गईं तो उन की कविता पीछे हो गई , तेजी बच्चन के नाते लोग उन्हें जानने लगे । नेहरु और नेहरु परिवार से उन के रिश्तों के लिए जानने लगे । तेजी बच्चन का तूफ़ान और लावण्य विदा हुआ तो अमिताभ बच्चन के हिंसक अभिनय का तूफ़ान आ गया । लोग अमिताभ बच्चन के पिता के रुप में उन की कविता को जानने लगे । कहूं कि अपने अभिनय की दुकान में अमिताभ अपने पिता के कवि को बेचने लगे । ठीक वैसे ही जैसे किसी सफल व्यक्ति की गरीबी भी गर्वीली हो जाती है , बिकने लग जाती है । हरिवंश राय बच्चन का जब निधन हुआ तो टी वी चैनलों पर अमरीश पुरी , सुभाष घई जैसे तमाम फ़िल्मी लोग श्रद्धांजलि के बयान देते दिखे थे , कोई कवि , लेखक या आलोचक नहीं । गरज यह कि यह श्रद्धांजलि अमिताभ के पिता के लिए थी , कवि हरिवंश राय बच्चन को नहीं ।

हो सकता है बच्चन जी की मधुशाला गा कर अमिताभ बच्चन को अच्छा पैसा मिलता हो ।  तो उन को लगा होगा कि कुमार विश्वास कैसे हरिवंश राय बच्चन की कविता को बेच कर कमाई कर सकते हैं । दुकानदार दोनों ही हैं । सो अमिताभ ने आनन फानन कुमार विश्वास को न सिर्फ़ लीगल नोटिस थमा दी बल्कि बच्चन की कविता से हुई कमाई को भी मांग लिया । अमिताभ बच्चन ने यहीं गलती कर दी और गेद कुमार विश्वास ने लपक लिया । कुमार विश्वास ने न सिर्फ़ यू ट्यूब से बच्चन की परोसी कविता को डिलीट कर दिया बल्कि बच्चन की कविता से कमाए बत्तीस रुपए भी उन्हें लौटा दिए , ऐलानिया । अमिताभ बच्चन ने यह कर के न सिर्फ़ अपना , अपने पिता का बल्कि अपने पिता की कविता का भी अपमान कर दिया । अमिताभ बच्चन को यह जानना चाहिए कि यह निर्मम और हिंसक समय किसी कविता या कवि का नहीं है । बाज़ार का है और इस बाज़ार में न तो किसी कविता के लिए जगह है , न अभिनय के लिए । हां , अगर कविता में हिंसक बाजारुपन है , आप के अभिनय में हिंसक अभिनय है तो इस बाज़ार में इस के लिए पर्याप्त जगह है । दुर्भाग्य से बच्चन की कविता में यह हिंसक बाजारुपन नहीं है । तो उसे कुमार विश्वास क्या अमिताभ बच्चन के पिता जी , हरिवंश राय बच्चन भी जो आ जाएं तो नहीं बेच सकते । अमिताभ बच्चन से अगर लोग पुलक कर बच्चन की मधुशाला या कोई कविता सुन लेते हैं , विह्वल हो कर तो वह अमिताभ बच्चन को सुन रहे होते हैं , हरिवंश राय बच्चन की कविता नहीं । अमिताभ फिल्मों में हैं तो क्या वह फ़िल्मी लेखकों की दुर्दशा और अपमान क्या नहीं देखते हैं ? आंख मूंद लेते हैं ?

निदा फाजली ने एक जगह लिखा है कि मुंबई में साहिर लुधियानवी , मुहम्मद रफ़ी और मधुबाला की कब्र एक ही कब्रिस्तान में है । अगर साहिर लुधियानवी की कब्र खोजेंगे तो जल्दी नहीं दिखेगी । हो सकता है आप को न भी मिले । लेकिन मुहम्मद रफ़ी की कब्र खोजेंगे तो जल्दी ही मिल जाएगी । पर मधुबाला की कब्र दूर से ही चमचमाती हुई दिख जाएगी । निदा ने जाने किस तकलीफ़ में आ कर यह बात लिखी होगी , मैं नहीं जानता । लेकिन उन का यह लिखा अपने भारतीय समाज में लिखने पढ़ने वालों की हैसियत तो बता ही देता है । साहिर लुधियानवी न सिर्फ़ हिंदी फ़िल्मों के सरताज़ गीतकार थे बल्कि उर्दू के मकबूल शायर भी हैं । पर समाज और कब्रिस्तान में जो कदर मधुबाला और मुहम्मद रफ़ी की है , उन की बिलकुल नहीं है । और साहिर ही क्यों भारतीय भाषाओँ के कमोवेश सभी लेखकों और कवियों की भारतीय समाज में यही दयनीय स्थिति है । हरिवंश राय बच्चन भी इसी दयनीयता में शुमार हैं । यह बात अमिताभ बच्चन की मूर्खता में एक बार फिर साबित हो गई है कि उन की कविता को यू ट्यूब पर सिर्फ़ बत्तीस रुपए ही मिले । इस लिए भी कि बाज़ार और समाज में नाम बिकता है , काबिलियत नहीं । यह बात बार-बार साबित हुई है । सानू निगम का भिखारी बन कर मुंबई में एक बार दिन भर गाना गा कर भीख मांग कर दो सौ रुपए का कमाना याद आता है । सोचिए कि अगर यही सोनू निगम बजाय भिखारी के मेकअप के सीधे सोनू निगम बन कर गा कर भीख मांगे होते तो करोड़ो नहीं तो लाखो तो कमा ही लिए होते । पर गायक वही था , गाना वही था , बस पहचान भिखारी की थी सो सिर्फ़ दो सौ मिले , भीख में ।

इसी तरह जब अमिताभ जब अपने पिता की कविता का पाठ करते हैं , मधुशाला का गायन करते हैं तो भारी पैसा और नाम पा जाते हैं क्यों कि बाज़ार में कविता नहीं , अमिताभ का अभिनेता खड़ा होता है । 

हम सभी जानते हैं और देखते भी हैं कि अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का पाठ बडे़ मन और जतन से करते हैं। खास कर मधुशाला का सस्वर पाठ कर तो वह लहालोट हो जाते हैं। अपने अशोक वाजपेयी भी अमिताभ के इस बच्चन कविता पाठ के भंवर में जैसे डूबे ही नहीं लहालोट भी हो गए।

अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती पर उन्हों ने योजना बनाई कि इन कवियों की कविताओं का पाठ क्यों न अमिताभ बच्चन से ही करवा लिया जाए। उन्हों ने अमिताभ बच्चन को चिट्ठी लिखी इस बारे में। और सीधा प्रस्ताव रखा कि वह इन कवियों की कविताओं का पाठ करना कुबूल करें। और कि अगर वह चाहें तो कविताओं का चयन उन की सुविधा से वह खुद कर देंगे। बस वह काव्यपाठ करना मंजूर कर लें। जगह और प्रायोजक भी वह अपनी सुविधा से तय कर लें। सुविधा के लिए अशोक वाजपेयी ने हरिवंश राय बच्चन से अपने संबंधों का हवाला भी दिया। साथ ही उन के ससुर और पत्रकार रहे तरुण कुमार भादुडी से भी अपने याराना होने का वास्ता भी दिया। पर अमिताभ बच्चन ने सांस नहीं ली तो नहीं ली।

अशोक वाजपेयी ने कुछ दिन इंतज़ार के बाद फिर एक चिट्ठी भेजी अमिताभ को। पर वह फिर भी निरुत्तर रहे। जवाब या हां की कौन कहे पत्र की पावती तक नहीं मिली अशोक वाजपेयी को। पर उन की नादानी यहीं खत्म नहीं हुई। उन्हों ने जनसत्ता में अपने कालम कभी कभार विस्तार से इस बारे में लिखा भी। फिर भी अमिताभ बच्चन नहीं पसीजे। न उन की विनम्रता जागी। इस लिए कि कवितापाठ में उन के पिता की कविता की बात नहीं थी, उन की मार्केटिंग नहीं थी, उन को पैसा नहीं मिल रहा था।

अशोक वाजपेयी आईएएस अफ़सर रहे हैं, विद्वान आलोचक और संवेदनशील कवि हैं, बावजूद इस सब के वह भी अमिताभ बच्चन के विनम्रता के टूल में फंस गए। विनम्रता के मार्केटिंग टूल में। तो हम आप क्या चीज़ हैं? पता नहीं क्यों मुझे कई बार लगता है कि अमिताभ उतने ही विनम्र है जितने कि वह किसान हैं। बाराबंकी में उन की बहू ऐश्वर्या के नाम पर बनने वाला स्कूल उन के किसान बनने की पहली विसात थी। किसान नहीं बन पाए तो स्कूल की बछिया दान में दे दी। स्कूल नहीं बना तो उन की बला से। वह तो फिर से लखनऊ में किसान बन गए। और विनम्रता की बेल ऐसी फैली कि यह देखिए वह अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर फ़ोटो भी खिंचवा कर अखबारों में छपवा बैठे। अब जो संतुष्टि उन्हें अपने पिता की कविताओं का पाठ कर के या अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर मिलेगी, उन की विनम्रता को जो खाद मिलेगी वह अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन या केदार की कविताओं के पाठ से तो मिलने से रही। ठीक इसी तरह कुमार विश्वास द्वारा परोसी गई उन के पिता की कविता का स्टारडम भी जाता रहता है , यही बात अमिताभ बच्चन ने जान ली , कुमार विश्वास नहीं जान पाए ।

Tuesday, 11 July 2017

अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता

जिस कश्मीर में मानवाधिकार के नाम पर ज्यूडिशियली खुद संज्ञान ले कर एक पत्थरबाज आतंकी को दस लाख का मुआवजा देने की सरकार को सिफ़ारिश करती हो उस कश्मीर में अगर अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में गल्फ फंडिंग और क्रिश्चियन मिशनरी फंडिंग पर पल रहे एन जी ओ बात बेबात देश को गृह युद्ध में धकेलने को लगातार युद्धरत हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।
जिस देश में लेखक और पत्रकार अपना जमीर बेच कर विचारधारा के नाम पर कश्मीरी पंडितों के विस्थापित होने पर बरसों से चुप्पी साध कर सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के पालन - पोषण में दिलोजान से लगे हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश के राजनीतिज्ञ सिर्फ़ वोट बैंक के लिए देश और समाज बांटने के लिए हर क्षण तैयार खड़े मिलते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।
जिस देश में किसी भ्रष्ट राजनीतिज्ञ को सेक्यूलरिज्म के नाम पर तमाम सारे लोग सेफगार्ड बन कर , दीवार बन कर रक्षा में खड़े हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में लोग सिर्फ़ हिंदू मुसलमान , आरक्षण की राजनीति को ही प्रोग्रसिव होना मान लेते हों तो तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।
जिस देश में कुछ लोग गाय का मांस खाने के लिए ही पैदा होते हों , जान दे कर भी गाय का मांस खाने का ज़ज्बा रखते हों , गाय बचाने के नाम पर इंसान की जान ले लेना ही धर्म समझते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । जिस देश में केरल , बंगाल हों , बशीर हाट और मालदा की सांप्रदायिकता पर फैशन और पैशन की हद तक ख़ामोशी हो तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता । कश्मीर के पत्थरबाज आतंकियों को जो लोग नादान बच्चा कह कर सीना फुला कर बैठते हों तो अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं होता ।
आश्चर्य हो भी भला क्यों । अब तो इन घटनाओं पर मुझे दुःख भी नहीं होता । संवेदनहीनता की नाव में बैठ गया हूं मैं । आप क्या कर लेंगे मेरा ?
जम्मू कश्मीर की समस्या अगर सचमुच सुलझानी है तो अब जितनी जल्दी हो सके वहां राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए । और कि अजीत डोभाल जैसे व्यक्ति को राज्यपाल बना कर पूरी कमान सेना को सौंप देनी चाहिए । सारे मानवाधिकार आदि ताक पर रख कर जितने भी अलगाववादी कश्मीरी नेता हैं लाइन से खड़ा कर गोली मार देनी चाहिए । या टैंक के नीचे लिटा कर कुचल दिया जाना चाहिए । अगर फसल बचाने के लिए नीलगाय को गोली मार सकते हैं तो देश और मनुष्यता को बचाने के लिए इन अलगाववादी , अराजक और आतंकवादियों को गोली मारने में क्यों परहेज ? पाकिस्तानी दूतावास भी कुछ समय के लिए ही सही बंद कर पाकिस्तान से सारे राजनयिक और वाणिज्यिक संबंध भी मुल्तवी कर दिया जाना चाहिए । वहां चल रहे टेररिस्ट कैंपों को हवाई हमला कर नेस्तनाबूद कर देना चाहिए । हाफिज , लशकर आदि सभी को इस की जद में ले कर समाप्त कर देना चाहिए । एक घंटे में सब हो जाएगा । बहुत हो गया यह संवाद और कूटनीति वगैरह । संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी नख दंत विहीन और नपुंसक संस्थाओं की शरण में जाने का भी कोई मतलब नहीं है । इस सब को फ़िलहाल गोली मार दीजिए । तय मानिए साल दो साल में कश्मीर समस्या निपट जाएगी।
कश्मीर घाटी में सरकारें बेमतलब होम्योपैथी दवा की मीठी गोलियां दे रही हैं । जब कि कश्मीर घाटी को अब किसी बड़ी सर्जरी की दरकार है । भाई वहां कोई रहा नहीं और यह लोग भाई चारा का चूरन खिला रहे हैं । बरसों पहले से कश्मीरी पंडित वहां रहे नहीं । बीते महीनों में बाहर से पढ़ने गए विद्यार्थी सारे भगा दिए गए हैं तिरंगा लहराने के जुर्म में । बाहरी सरकारी कर्मचारी तक वहां गिनती के हैं , हथेली पर जान ले कर । बस वहां सेना है , अर्द्ध सैनिक बल हैं और पाकिस्तान परस्त लोग हैं । जो हर जुमे को मस्जिदों से निकल कर पाकिस्तानी झंडा ज़रूर लहराते हैं और पुलिस पर पत्थर बरसाते हैं । पाकिस्तान के समर्थन में नारा लगाते हैं । बम चलाते हैं । तो काहे का भाई चारा का चूर्ण चटा रहे हो मूर्खों ! कश्मीर को सीरिया मत बनाओ , कड़ा फ़ैसला ले कर जहन्नुम को मिटा कर उसे उस की ज़न्नत बख्श दो । उन को तो बहत्तर हूरें ऐसे भी मिलेंगी और वैसे भी । तो उन की फिकर किस बात की ? देश और कश्मीर ज़रूरी है । कश्मीर का देश में रहना ज़रूरी है । मुकुट है हमारे देश का यह कश्मीर ।
कश्मीर को इस कदर और बरसों से जलते हुए देख कर बार-बार इंदिरा गांधी याद आ जाती हैं । पंजाब में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में ब्लू स्टार जैसा उन का कड़ा फ़ैसला याद आ जाता है । कश्मीर को आज ऐसे ही किसी कड़े फ़ैसले की ज़रुरत है । आतंकियों और पाकिस्तान का फन कुचलने का फन तो वह ही जानती थीं । काश कि वह होतीं तो शायद कश्मीर इस तरह नहीं जलता ।

Friday, 7 July 2017

किसी मुस्लिम या दलित के साथ हादसा या हत्या होने पर पूरे देश में एक आंदोलन क्यों खड़ा हो जाता है ?

किसी भी के साथ कोई हादसा या किसी भी की हत्या सर्वदा दुखद ही होता है । वह चाहे किसी भी समाज का , किसी भी वर्ग का हो । लेकिन आप ने कभी गौर किया है कि किसी मुस्लिम या किसी दलित के साथ हादसा होने पर या हत्या होने पर देखते ही देखते पूरे देश में एक आंदोलन खड़ा हो जाता है तो क्यों और कैसे ? नहीं जानते हों तो अब से जान लीजिए । यह सब सिर्फ़ एन जी ओ फंडिंग का प्रताप है । उन एन जी ओ का , जिन को किश्चियन मिशनरी और गल्फ फंडिंग की बहार हासिल है । कहीं-कहीं सरकारी बहार भी । मीडिया से जुड़े कई लोग भी इस तरह के एन जी ओ चलाते हैं । कभी खुद तो कभी परिवारीजनों के मार्फ़त । एक नहीं कई , कई एन जी ओ । सो सामाजिक आंदोलन चलता रहता है ।
यही हाल बहुत सारे बुद्धिजीवियों , लेखकों और रंगकर्मियों का भी है । यह तमाम बुद्धिजीवी , लेखक और रंगकर्मी भी कई-कई एन जी ओ चलाते हैं या प्रकारांतर से जुड़े रहते हैं । सो तमाम मीडिया में खबरें चलने लगती हैं , बुद्धिजीवियों और लेखकों की बयान बहादुरी नफ़रत की सारी हदें पार करने लगती हैं । जगह-जगह नाच , गाने और नाटक होने लगते हैं । पूरे देश में एक खौफनाक मंज़र रच दिया जाता है । फिर इस खौफनाक मंज़र के मद्देनज़र तमाम लोग फैशनपरस्ती में भी उतर आते हैं । फ़ेसबुक पर सक्रिय एन जी ओ गिरोह के तमाम लोग कमर कस कर ऐसे उतर लेते हैं गोया पानीपत या गाजापट्टी की लड़ाई आन आ पड़ी हो । सो दिल्ली में जंतर मंतर सहित देश में तमाम ऐसी जगहें सज जाती हैं ।
आप गौर कीजिए कि अभी उत्तर प्रदेश के रायबरेली में एक साथ पांच लोग जला दिए गए । लेकिन कायदे से यह देशव्यापी खबर तो छोड़िए प्रदेश स्तर की भी खबर नहीं बन सकी। क्या यह घटना जघन्य नहीं थी कि मनुष्य विरोधी नहीं थी । पर फ़ेसबुक या ट्विटर पर भी यह घटना अभियान नहीं बनी । इस घटना के विरोध में नाटक , नाच , गाना और जलसा होना तो दूर की बात है । तो सिर्फ़ इस लिए कि यह सभी पांच के पांच लोग ब्राह्मण लोग थे । क्रिश्चियन मिशनरी या गल्फ फंडिंग प्रायोजित एन जी ओ को इस घटना पर यह सब करने से कोई भुगतान नहीं होता तो यह लोग कोई धरना , प्रदर्शन भी कैसे करते ? लेकिन एक मुख्यमंत्री को शैंपू , साबुन देने के लिए दुनिया भर का नाटक यह एन जी वाले कर लेते हैं । न्यूज की हाइक भी ले लेते हैं ।
इसी तरह बीते हफ़्ते बिहार में महादलित बावन मुसहर और मुरहू मुसहर की हत्या भीड़ ने मिल कर कर दी। इस की चर्चा भी किसी ने नहीं की । न न्यूज में , न फ़ेसबुक पर । किसी दलित गिरोह या सेक्यूलर गैंग ने भी इस की नोटिस नहीं ली । फेसबुक और ट्विटर पर भी सन्नाटा छाया रहा। घटना पिछले सप्ताह पटना से 170 किमी दूर रोहतास के कोचास थानान्तर्गत परसिया में घटी । दोनों महादलित युवकों पर चोरी का आरोप है, इन्हें कथित तौर पर शौकत अली के घर में घुसते हुए पकड़ा गया था लेकिन पुलिस ने अज्ञात लोगों पर हत्या का मामला दर्ज किया है। लेकिन चूंकि यहां दलित और मुस्लिम के बीच का पेच फंस गया तो इस बिना पर इन एन जी ओ के संचालकों का पेमेंट फंस जाता इस लिए ख़ामोश रहे ।
ठीक यही पेंच उत्तर प्रदेश के रामपुर में भी बीते दिनों फंसा था । रामपुर में दलित लड़कियों को आजम खान पोषित कुछ मुस्लिम लोगों ने न सिर्फ़ दिन दहाड़े उठा लिया , उन के साथ बदसलूकी की बल्कि इस सब की वीडियो बना कर फ़ेसबुक पर पोस्ट कर दिया । लेकिन इस घटना पर भी सिरे से चुप्पी बनी रही । देश भर में कोई धरना , कोई प्रदर्शन , कोई नाटक , कोई गाना , बजाना या कोई जंतर मंतर नहीं हुआ । तो सिर्फ़ इस लिए कि एन जी ओ वालों को यहां भी पेमेंट नहीं मिलना था । यह और ऐसी बहुतेरी घटनाएं हैं । जिन की तफ़सील में यह और ऐसे पेंच निरंतर सक्रिय हैं ।
आप गौर कीजिए कि कश्मीर में हो रही तमाम मुस्लिमों की हत्या पर भी , आए दिन आतंकवादी घटनाओं पर भी देश में कोई आंदोलन कहीं क्यों नहीं होता ? क्यों नहीं होता कोई धरना , कोई प्रदर्शन , नाच , गाना , नाटक , जलसा आदि नहीं होता । न जंतर मंतर , न कहीं और । तो सिर्फ़ इस लिए कि इस बाबत भी किसी एन जी ओ को कभी कोई पेमेंट नहीं मिल सकता । इस लिए भी कि एन जी ओ को क्रिश्चियन मिशनरी और गल्फ फंडिंग का मुख्य मकसद देश को गृह युद्ध में झोंकना ही है । और कश्मीर में उन का मकसद पहले ही से कामयाब है ।


क्या फ़ेसबुक की लोकप्रियता भुनाते हुए इस का इस्तेमाल देश को गृह युद्ध के मुहाने पर बैठाने की कुछ लोग कोशिश नहीं कर रहे ? मेरा मानना है कि हां । एन जी ओ बनाना , विदेशी फंडिंग बटोरना और फिर सामाजिक विषमता का झंडा ले कर , सेक्यूलरिज्म शब्द का दुरूपयोग करते हुए उस के कंधे पर बैठ कर , मनुवाद , ब्राह्मण आदि का नाम लेते हुए दलित और पिछड़े होने की जातीय अस्मिता के नाम पर जहर उगलना , आग मूतना, अल्सेशियन बन कर लगातार भौकना कहां तक गुड है ? यह देश को गृह युद्ध की तरफ धकेलने की विदेशी चंदे के दम पर एक क्रूर साजिश है । इस बात को समझना बहुत ज़रुरी है । मित्रों , फ़ेसबुक पर बहुत सारे लोग भी इसी जाल में आप को लपेट कर एक्सपर्ट बने हुए हैं ।
अपनी आई डी से भी , पचास ठो फर्जी आई डी बना कर भी। चाहें तो आप चेक कर लें कि जो कुछ लोग इस काम पर लगे हुए हैं उन की पोस्ट पर टिप्पणियां करने वाले भी कौन लोग हैं ? अनाम पहचान वाले लोग उन्हीं की भाषा और तेवर में बोलते हुए पचासियों लोग कौन लोग हैं ? बॉस ने छींका नहीं कि मिजाज पुर्सी में तुरंत पांच , दस मिनट में सैकड़ो लाइक , धकाधक पचासियो कमेंट आख़िर कैसे आ जाते हैं ? फिर सैकड़ो , हजारों पर आते देर नहीं लगती। और अगर गलती से कोई एक व्यक्ति भी घुस गया उस जमात में अपना निर्दोष प्रतिवाद जताने , विरोध जताने तो कुत्तों की तरह काटने के लिए यही अनाम पहचान वाले लोग कुतर्क लिए , लगभग गालियां देते हुए , अबे-तबे करते हुए टूट पड़ते हैं। जैसे किसी गली के कुत्ते किसी अनजान व्यक्ति पर टूट पड़ते हैं । अंतत: कटहे कुत्तों की इस खौफनाक गली में झांकना भी लोग बंद कर देते हैं। यही यह लोग चाहते भी हैं। इन के जनमत संग्रह का कारोबार बढ़ता जाता है । देश को गृह युद्ध की तरफ धकेलने का कारोबार दिन दूना , रात चौगुना बढ़ने लगता है ।
वैसे ही जैसे कश्मीर में अलगाववादियों की ढिठाई और जनमत संग्रह की बात होती है , पाकिस्तान के समर्थन में । और इस तरह इन के एन जी ओ की बल्ले-बल्ले होने लगती है। इन की फंडिंग बढ़ती जाती है । यह लोग इसी बिना पर दूसरी पोस्टों पर भी यह जहर उगलना , आग मूतना पूरी बेशर्मी से बेधड़क जारी रखते हैं । कुतर्क की चाशनी लगा कर । अच्छा यह बताईए कि आप मित्र लोग भी पोस्ट लिखते हैं । पर कुछ सेलिब्रेटी को छोड़ कर कितने ऐसे मित्र हैं जिन की पोस्ट पर दस पांच मिनट में सैकड़ो लाइक और कमेंट ऐसे गिर जाते हैं जैसे बरसात में शाम को लाईट जलते ही उस पर बेशुमार पतंगे गिर-गिर पड़ते हैं । यह सब विदेशी फंडिंग से चलने वाले एन जी ओ का कमाल है , देश को गृह युद्ध की ओर धकेलने की कोशिश है , कुछ और नहीं । इन से सतर्क रहना , इन को नंगा करना और इन की साज़िश को नाकाम करना हम सभी का दायित्व है।


कश्मीर और केरल की घटनाओं पर तो हमारे एन जी ओ धारी आंदोलनकारी चुप रहते ही थे , पश्चिम बंगाल की घटनाओं पर भी चुप रहना सीख गए हैं । वह चाहे मालदा हो , गोरखालैंड आंदोलन का मामला हो या चौबीस परगना । क्यों कि इन मुद्दों पर भी गल्फ फंडिंग या क्रिश्चियन फंडिंग वाले पेमेंट नहीं मिलते । फिर यहां मनुष्यता की चीख में सेक्यूलरिज्म का तड़का भी नहीं है । सो फ़ेसबुक से लगायत जंतर मंतर तक नो नाच गाना , नो जलसा , नो सेमिनार आदि-इत्यादि ।


पट्टीदार और पड़ोसी जैसे भी हों , कोई भी हों , चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश-भूटान-नेपाल आदि-इत्यादि सरीखे ही होते हैं। चुभते हुए और चिढ़ते हुए । चिकोटी काटते , पिन चुभोते , लड़ते-झगड़ते हुए । आप उन के लिए शीश कटा दें लेकिन उन को मज़ा नहीं आता तो नहीं आता । इन से दोस्ती कभी नहीं हो सकती । दोस्ती के लिए अमरीका , रूस , इजराइल , जापान , जर्मनी आदि दूर के लोग ही गुड रहते हैं । पड़ोसी या पट्टीदार नहीं । इन से सर्वदा सतर्कता और सावधानी बरतना ही गुड रहता है । शिष्टाचार वाली नमस्ते तक ही रहना गुड रहता है ।

Monday, 3 July 2017

आज की तारीख़ में कौन समाज है जो मनु स्मृति से भी चलता है ?

मनु राजा थे। क्षत्रिय थे । मनुस्मृति भी उन्हों ने ही लिखी । लेकिन यह जहर से भरे कायर जातिवादी, मनुवाद के नाम पर ब्राह्मणों को गरियाते हैं। जानते हैं क्यों ? इस लिए कि ब्राह्मण सहिष्णु होता है , सौहार्द्र में यकीन करता है। गाली गलौज में यकीन नहीं करता। अप्रिय भी बर्दाश्त कर लेता है। करता ही है । दूसरे , यह कायर , नपुंसक , जहरीले जातिवादी अगर क्षत्रिय को मनुवादी कह कर गरियाएंगे तो क्षत्रिय बर्दाश्त नहीं करेगा , गिरा कर मारेगा। सो इन जहरीले जातिवादियों के लिए ब्राह्मण एक बड़ी सुविधा है अपने नपुंसक विचारों को डायलूट करने के लिए। किसी सिद्धांत , किसी विचार के लिए सिस्टम से , सत्ता से लड़ना बहुत ज़रुरी है । लेकिन किसी सिद्धांत या किसी विचार के लिए जनमत से लड़ने के दिन अगर आ जाएं तो ? लड़ने वालों को अपने विवेक को चेक ज़रुर कर लेना चाहिए । उन्हें भीड़ और जनमत का फ़र्क भी ज़रुर समझना चाहिए । भीड़ का कुतर्क रचने से भी बाज आना चाहिए ।

अब कुछ मूर्ख कहेंगे कि मैं तो बड़ा जातिवादी हूं , कैसा लेखक हूं? कैसे इतनी अच्छी कविताएं लिखता हूं , उपन्यास लिखता हूं आदि-आदि ! कहते ही रहते हैं । अच्छा यह नपुंसक और कायर जो लगातार ब्राह्मणों को गरियाने का शगल बनाए हुए हैं , यह सब कर के बड़ी-बड़ी दुकान खोल कर समाज में क्या संदेश दे रहे हैं ? आप उन को क्या मानते हैं ? कभी सांस भी लेना जुर्म क्यों समझते हैं उन के जहरीले बोल के खिलाफ ? इतने नादान और बेजान क्यों हैं आख़िर आप ? दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है , इस घोर वैज्ञानिक युग में भी यह मूर्ख ब्राह्मण-ब्राह्मण के पहाड़े से आगे निकलना ही नहीं चाहते ! अजब है यह भी ! अच्छा कोई मुझे यह भी तो बता दे कि आज की तारीख़ में कौन समाज है जो मनु स्मृति से भी चलता है ? मनुस्मृति की ज़रूरत भी किसे है अब ? सिवाय इन गाली गलौज वालों के ? यह विज्ञान , यह संविधान , यह क़ानून अब समाज चलाते हैं , मनुस्मृति नहीं ! 

क्या यह बात भी लोग नहीं जानते ? अच्छा कुछ लोग जान दिए जाते हैं इस बात पर कि दलितों को मंदिर में घुसने नहीं दिया जाता ? अच्छा आप जो मनुवाद के इतने खिलाफ हैं तो मंदिर जाते भी क्यों हैं ? दूसरे ज़रा यह भी तो बता दीजिए कि किस मंदिर में आप को नहीं घुसने दिया गया ? किस मंदिर में घुसते समय आप से पूछा जाता है कि आप किस जाति से हैं ? किस मंदिर में यह पूछने का समय है ? और डाक्टर ने कहा है कि आप अपने काम काज में ब्राह्मण बुलाइए ? कि संविधान में लिखा है ? कौन सी कानूनी बाध्यता है आख़िर? क्यों बुलाते हैं आप ? मत बुलाईये , अपना काम जैसे मन वैसे कीजिए लेकिन आंख में धूल झोंकना बंद कीजिए ! 

अच्छा डाक्टर ने कहा है कि किसी क़ानून ने कि शादी में या मरने में भी पंडित बुलाइए ? बैंड वाला , कैटरिंग वाला या और भी तमाम जोड़ लीजिए अपनी हैसियत से तो पंडित से ज़्यादा पैसा लेते हैं , लेकिन वहां प्राण नहीं निकलता ? अच्छा जब जमादार बुलाते हैं मरने में ही सही , तो क्या उसे उस की मजदूरी नहीं देते ? श्मशान के डोम को पैसा नहीं देते कि लकड़ी वाले या कफन वाले , या वाहन वाले को पैसा नहीं देते ? इलेक्ट्रिक शवदाह गृह की फीस भी नहीं देते ? कि डाक्टर को फीस नहीं देते ? वकील को नहीं देते ? तो पंडित को देने में प्राण निकलते हैं ? मत बुलाइए पंडित को ! क्यों बुलाते हैं पंडित ? पंडित की गरज से ? कि अपनी गरज से ? मनुस्मृति या कर्मकांड में इतना जीते क्यों हैं , बाध्यता क्या है ? फिर घड़ियाली आंसू भी बहाते हैं ! गोली मारिए मनु स्मृति को , मत मानिए मनु स्मृति और कर्म कांड को ? यह डबल गेम कब तक ? यह दोगला जीवन कब तक और क्यों ? किस के लिए ? बंद कीजिए यह व्यर्थ का रोना-धोना और लोगों को गुमराह करना , समाज में जहर घोलना , समाज तोड़ना !


एन डी टी वी मतलब जहर और नफ़रत की पत्रकारिता

एन डी टी वी का एजेंडा अब न्यूज़ नहीं है । एन डी टी वी का एजेंडा अब कभी मुस्लिम , कभी दलित के बहाने समाज में जहर और नफ़रत घोलना है ।
एन डी टी वी की तमाम रिपोर्टें बता रही हैं कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं । भारत के हर किसी हिस्से में चुन-चुन कर मुसलमान मारे जा रहे हैं । ट्रेन में , यूनिवर्सिटी में , कश्मीर में , हरियाणा में , झारखंड में , उत्तर प्रदेश में , राजस्थान में , दिल्ली में । यहां , वहां हर कहीं मुसलमान मारे जा रहे हैं । भीड़ मार रही है ।
यह भीड़ गोरक्षकों की भीड़ है । तीन चार घटनाओं के व्यौरों में लथपथ आधे-आधे घंटों की इन रिपोर्टों में सिर्फ मुसलमानों के मारे जाने की खबर दो , तीन दिन से देख रहा हूं । खास कर रवीश की एक रिपोर्ट तो भयानक तस्वीर पेश करती है । रवीश की इसी रिपोर्ट के व्यौरे बाकी रिपोर्टों में भी हैं । रवीश की रिपोर्ट लेकिन डाक्यूमेंट्री की कलात्मकता से सराबोर है । रिपोर्ट में लगातार ट्रेन चलती रहती है तरह-तरह से । लेकिन मन में डर बोती हुई , भय का भयानक तसवीर प्रस्तुत करती रवीश की रिपोर्ट की मानें तो भारत में मुसलमान अब हरगिज सुरक्षित नहीं हैं ।
हिंदुओं की भीड़ उन्हें मारती जा रही है । गोया यह हिंदुओं की भीड़ नहीं , मुहम्मद गोरी या महमूद गजनवी की खूंखार और आक्रमणकारी सेना हो । हिंदी , अंगरेजी में लिखे कैप्शन , वायस ओवर , नैरेशन और पीड़ित परिवारों के बयान के बीच चलती ट्रेन , ट्रेनों के बदलते ट्रैक की आवाज़ बहुत डराती है । रवीश कुमार खुद भी बहुत डरे दीखते हैं इस रिपोर्ट को पेश करते हुए ।
मिस्टर रवीश कुमार यह कौन सा भारत है , भारत की यह कौन सी पत्रकारिता है , यह कौन सी तसवीर पेश कर रहे हैं आप । यह कौन से मुसलमान और कौन से हिंदू , कौन से गोरक्षक और कौन सी भीड़ है जो पूरे देश में कोहराम मचाए हुए हैं । पत्रकारिता के नाम पर यह कर क्या रहे हैं आप ? जहर और नफ़रत की कौन सी खेती है यह ? देश को गृह युद्ध की तरफ ढकेलने के लिए ऐसी रिपोर्ट पेश करना इतना ज़रुरी है ? शर्म कीजिए रवीश कुमार , शर्म करो एन डी टी वी । अति की भी एक सीमा होती है । भारत के मुसलमान क्या गाजर , मूली हैं , जो इस तरह कटते जा रहे हैं और हिंदू उन्हें काटे जा रहे हैं ।
फिर भी रवीश और एन डी टी वी की रिपोर्टों की आंख से देख कर एक सवाल यह भी बनता है कि अगर देश में मुसलमानों के खिलाफ इतना ख़राब माहौल बना है तो आखिर क्यों ? क्या सिर्फ़ इस लिए कि भाजपा सरकार है । या कुछ और भी है ? सभ्य समाज और देश के लिए यह सोचना बहुत ज़रूरी है । मुसलमानों को भी सोचना चाहिए कि उन के खिलाफ भारत में ही नहीं , दुनिया भर में माहौल क्यों बन गया है । क्या उन को अपने भीतर सुधार की ज़रूरत नहीं है ।

किसी सिद्धांत , किसी विचार के लिए सिस्टम से , सत्ता से लड़ना बहुत ज़रुरी है । लेकिन किसी सिद्धांत या किसी विचार के लिए जनमत से लड़ने के दिन अगर आ जाएं तो ? लड़ने वालों को अपने विवेक को चेक ज़रुर कर लेना चाहिए । उन्हें भीड़ और जनमत का फ़र्क भी ज़रुर समझना चाहिए । भीड़ का कुतर्क रचने से भी बाज आना चाहिए ।

Sunday, 2 July 2017

धर्म भले ही अफ़ीम हो मगर आस्था तो जलेबी है


अपने गांव में पूजा-पाठ करते मैनेजर पांडेय

हिंदी के मार्क्सवादी लेखक और जे एन यू में प्रोफेसर रहे मैनेजर पांडेय के पूजा पाठ की एक फ़ोटो फ़ेसबुक पर विमर्श का बढ़िया माध्यम बनी है । बहुत से मित्रों सहित मैंने भी अपनी वाल पर यह फ़ोटो शेयर की थी । इस बहाने अपनी वाल पर और अन्य मित्रों की वाल पर भी बहुत से मित्रों की टिप्पणियां पढ़ीं । कईयों के घायल , विकृत और जिद्दी चेहरे सामने आए , उन का अंतर्विरोध और उन के मन का दुचित्ता पाठ भी । पढ़ कर समझ में आ गया कि हिंदी साहित्य की इतनी दुर्दशा क्यों है । इतना अपठनीय क्यों है हिंदी साहित्य और पाठकों से कटा हुआ क्यों है । हिप्पोक्रेसी का मारा यह हिंदी लेखक जड़ों से इस तरह कट कर लिखेगा भी क्या । ऐसे तमाम लेखकों को जानता हूं जो दुनिया भर का सेक्यूलरिज्म और दलित फलित बघारते फिरते हैं । क्रांति और सामाजिक बदलाव की चिंगारी उगलते फिरते हैं । गोया ज्वालामुखी का ढेर हों । लेकिन जब बच्चों की शादी करनी होती है तो अपनी ही जाति खोजते हैं । सवर्ण ही खोजते हैं । दहेज भी खोजते हैं । अगर बच्चों की सुविधा से अंतरजातीय विवाह भी करते हैं बच्चों का तो अपने से अपर कास्ट में । अपने से छोटी जाति , दलित या मुस्लिम में नहीं । अंतर्विरोध बहुत है , हिप्पोक्रेसी बहुत है अपने लेखक समाज में भी ।

बताना चाहता हूं कि हिंदी में ही नहीं भारतीय भाषाओं के तमाम लेखक इसी हिप्पोक्रेसी के शिकार हैं । कहते कुछ हैं , लिखते कुछ हैं , करते कुछ हैं । मैं यहां विभिन्न भारतीय भाषाओं के कुछ लेखकों का ज़िक्र करना चाहता हूं । कन्नड़ भाषा के यू एस अनंतमूर्ति जो संस्कार उपन्यास के लिए जाने जाते हैं । संस्कार उपन्यास में उन्हों ने श्रेष्ठ ब्राह्मण होते हुए भी वैदिक संस्कारों की जम कर धज्जियां उडाई हैं । लेकिन कितने लोग जानते हैं कि इस संस्कार उपन्यास के लोकप्रिय होने के बाद भी यही यू एस अनंतमूर्ति बिहार और झारखंड के बार्डर पर फाल्गु नदी के तट पर स्थित गया जा कर अपने पुरखों का पिंडदान भी करने गए थे । इसी तरह दुर्दांत मार्क्सवादी लेखक विशंभरनाथ उपाध्याय भी गया अपने पुरखों का पिंडदान करने गए थे ।
राजेंद्र यादव ने अपनी वसीयत में सब कुछ लिखा था लेकिन अपने अंतिम संस्कार के बाबत कुछ नहीं लिखा था । राजेंद्र यादव का अंतिम संस्कार वैदिक मंत्रों के साथ किया गया । नामवर सिंह ने भी अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार न सिर्फ़ वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ किया बल्कि उन की अस्थियां भी वह काशी ले कर गए और मंत्रों के साथ ही प्रवाहित किया । ऐसे ही तमाम ख्यातिलब्ध लेखकों के तमाम किस्से हैं जो लोग जानते हैं । बहुत से कामरेड दोस्तों को मैं जानता हूं कि मंच पर अपने भाषणों में वैदिक संस्कारों में , धर्म में , पूजा-पाठ में आग लगा देते हैं लेकिन अपने घर में पूजा-पाठ , घंटी बजा-बजा कर आरती-भजन भी रोज करते हैं । लखनऊ में एक दलित अध्यापक कालीचरण स्नेही हैं , वह आग नहीं लगाते बम फोड़ते हैं मंचों पर धर्म को ले कर । इतना कि कई बार पिटते-पिटते बचते हैं । लेकिन मौका मिलते ही मंदिरों में लाइन लगा कर , मत्था टेक कर दर्शन करते हैं । पुरी के मंदिर का इन का एक किस्सा बहुत मशहूर है । उर्दू के तमाम लेखकों और शायरों को मैं जानता हूं जो कम्युनिस्ट हैं और हज भी बहुत अरमान और शान से गए हैं । अपनी हज यात्रा की फोटुवें भी खूब खिंचवाई हैं । उन के यहां तो कोई बखेड़ा नहीं होता कभी । लेकिन मैनेजर पांडेय पर बखेड़ा हो गया है । रमजान उन के यहां पवित्र है , लेकिन नवरात्र आदि यहां पाखंड है । यह कौन सा पाखंडी मानदंड है दोस्तों । माना कि धर्म अफीम है लेकिन यह पाखंडी मानदंड क्या है । फिर तो अगर यह कुतर्क इसी तरह परवान चढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं कि लोग अपने पिता से अपना डी एन ए मैच करते फिरेंगे । अपने बच्चों का भी ।

मैं उन दिनों दिल्ली में नया-नया था । 1981 की बात है । फ़िराक साहब एम्स में भर्ती थे । अंतिम समय में थे । सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी के साथ उन्हें देखने मैं भी एक बार गया था । सर्वेश्वर जी का हाथ पकड़ कर फ़िराक साहब अचानक कहने लगे , सर्वेश्वर देखना मैं हिंदू हूं , कहीं लोग मुझे मुसलमान समझ कर दफना न दें ! और सर्वेश्वर जी बहुत भावुक हो कर उन्हें यकीन दिला रहे थे कि चिंता मत करें , आप को दफनाया नहीं जाएगा । सोचिए कि फ़िराक जैसे कालजयी शायर की आखिरी चिंता अपने हिंदू होने की थी । और अपना लेखक समाज अपने हिंदू होने को अब गाली होने की तरह पेश करने लगा है । यह नई सनक और नया फैशन है । जो ऐसा नहीं करता , वह सांप्रदायिक है , संघी है । यह और ऐसे बेशुमार किस्से हैं। यह ठीक है कि आप धर्म और कर्मकांड को मत मानिए , हिंदू भी मत रहिए , काट डालिए अपनी जड़ और अपनी पहचान । यह आप का व्यक्तिगत है लेकिन किसी और की आस्था पर चोट नहीं कीजिए । कुलबर्गी की तरह मूर्तियों पर पेशाब कर उस पेशाब का बखान भी लिख कर मत कीजिए । यह क्या कि सार्वजनिक जीवन में कुछ , व्यावहारिक जीवन में कुछ । अगर घर में पूजा करते हैं तो मंच पर इस पूजा - पाठ को ले कर गाली गलौज कैसे कर लेते हैं आप । आप निजी जीवन में , परिवार में , परिवार के दबाव में जो चाहे कीजिए , न कीजिए यह आप का अपना फ़ैसला है । पर अपने शौक और सनक के लिए समाज में जहर तो मत घोलिए । मेरा कहना सिर्फ़ इतना है कि पाखंड का विरोध ज़रुरी है , चौतरफा विरोध कीजिए लेकिन इस पाखंड विरोध के नाम पर नया पाखंड करने से , हिप्पोक्रेसी से बचिए । ज़रूर बचिए ।


बकौल सुधाकर अदीब , धर्म भले ही अफ़ीम हो मगर आस्था तो जलेबी है । यह अपने मार्क्सवादी आलोचक आदरणीय मैनेजर पांडेय जी हैं । अपने गांव में पूजा-पाठ करते हुए । पूजा - पाठ तो मैं भी करता हूं पर पूजा पाठियों को गरियाता नहीं हूं । विचार अपनी जगह है आस्था अपनी जगह । बुरा क्या है । बहुत से लोग नमाज पढ़ कर , चर्च जा कर भी मार्क्सवादी हैं तो अपने मैनेजर पांडेय पूजा-पाठ कर के भी मार्क्सवादी क्यों नहीं रह सकते । ध्यान रहे कि मैनेजर पांडेय जे एन यू में पढ़ाते रहे हैं ।



भारत में कम्युनिस्ट और सेक्यूलर दो तरह के होते हैं । एक हिंदू कम्युनिस्ट और सेक्यूलर । दूसरा मुस्लिम कम्युनिस्ट और सेक्यूलर । हिंदू वाला कम्युनिस्ट और सेक्यूलर ग़लती से भी पूजा पाठ , आरती आदि कर ले तो वह भटक जाता है । गालियां और जूता खाने का हकदार हो जाता है । कहा जाता है कि भटक गया , हिंदू हो गया , कम्युनल हो गया आदि-इत्यादि । लेकिन मुस्लिम कम्युनिस्ट और सेक्यूलर रमजान , रोजा , इफ़्तार , नमाज , मोहर्रम , गाय का मांस आदि-इत्यादि डंके की चोट पर कर सकता है । हरामखोर और भ्रष्ट नेताओं की हराम की इफ़्तार खा कर भी रोजा पाक कह सकता है । कोई हर्ज नहीं है । वह कभी नहीं भटकता । उलटे नया-नया सेक्यूलर बना हिंदू भी इबादत कर के रोजा इफ़्तार कर के , करवा के कम्युनिस्ट और सेक्यूलर होने की अपनी डिग्री बढ़ा लेता है । लगे हाथ गाय का मांस खाने की पैरवी भी कर ले तो क्या कहने ! औरतों पर तीन तलाक़ के जुर्म की पैरवी कर के शरियत ख़ातिर , पर्सनल ला ख़ातिर खून बहाने को सर्वदा तैयार रहे तो और बढ़िया ! कोई नुक्ता-ची करे तो उसे संघी घोषित कर देने की , कम्युनल कह देने की समृद्ध परंपरा है ही । करना क्या है ? खैर अपनी-अपनी आस्था है , अपना-अपना चयन है , अपना-अपना भटकाव है । मुझे इस पर कुछ नहीं कहना । भारत एक आज़ाद देश है । सभी को अपनी-अपनी करने की छूट है । जो जैसा चाहे करे , दिन रात करता रहे । हमें क्या । फ़िलहाल तो यहां कुछ फ़ोटो लुक कीजिए और मज़ा लीजिए । और हां , एक बात सर्वदा याद रखिए धर्म एक अफीम है । लेकिन सुविधानुसार। सब के लिए नहीं । 
फ़ोटो परिचय भी ज़रूरी है । मज़ा लेने में आप को आसानी होगी ।

पहली फ़ोटो में आरती करते कामरेड अतुल अनजान । इस फ़ोटो के सार्वजनिक होते ही उन्हें बेहिसाब गालियां मिली थीं । बरास्ता धर्म अफीम है । खैर , दूसरी फ़ोटो मुलायम सिंह के दगे कारतूस आज़म खान की है जो नमाज में हो कर भी जाने किस हिसाब किताब में मशरूफ हैं। और सजदा उन के लिए हराम हुआ जाता है । तीसरी फ़ोटो में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया रोजा इफ़्तार करते हुए । चौथी फ़ोटो में जे एन यू में भारत तेरे टुकड़े होंगे , इंशा अल्ला , इंशा अल्ला का नारा लगाने वाले कामरेड ख़ालिद हैं । पांचवीं फ़ोटो पत्रकार रहे आप में जा चुके इबादत करते आशुतोष हैं ।
 
आरती करते कामरेड अतुल अनजान

नमाज में हो कर भी जाने किस हिसाब किताब में मशरूफ आज़म खान

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्य मंत्री मनीष सिसोदिया रोजा इफ़्तार करते हुए
जे एन यू में भारत तेरे टुकड़े होंगे , इंशा अल्ला , इंशा अल्ला का नारा लगाने वाले कामरेड ख़ालिद

 इबादत करते आशुतोष