Thursday, 23 February 2017

एक औरत की जेल डायरी



दुनिया भर की
महिला कैदियों के लिए
कि उन का जीवन सुंदर हो.


भूमिका

 

एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी

करे कोई, भरे कोई। एक पुरानी कहावत है। एक बात यह भी है कि कई बार आंखों देखा और कानों सुना सच भी, सच नहीं होता। होता तो यह जेल डायरी लिखने की नौबत नहीं आती। लेकिन हमारे जीवन में भी कई बार यह बात और वह कहावत लौट-लौट आती है।

एक वाकया याद आता है।

एक गांव में एक पंडित जी थे। पूरी तरह विपन्न और दरिद्र। लेकिन नियम क़ानून और शुचिता से कभी डिगते नहीं थे। किसी भी सूरत। लोग बाग़ जब गन्ने के खेत में आग लगा कर कचरा, पत्ता आदि जला देते थे, पंडित जी अपने खेत में ऐसा नहीं करते थे। यह कह कर कि अगर आग लगाएंगे तो जीव हत्या हो जाएगी। पत्तों के साथ बहुत से कीड़े-मकोड़े भी मर जाएंगे। पर्यावरण नष्ट हो जाएगा। लेकिन पंडित जी के इस सत्य और संवेदना से उन के कुछ पट्टीदार जलते थे। एक बार गांव में एक हत्या हो गई। उस हत्या में पंडित जी को भी साजिशन नामजद कर दिया उन के पट्टीदारों ने। पुलिस आई तफतीश में तो पंडित जी बुरी तरह भड़क गए पुलिस वालों पर। जो जो नहीं कहना था, नाराजगी में फुल वॉल्यूम में कहा। पुलिस भी खफा हो गई। उन्हें दबोच ले गई और मुख्य मुल्जिम बना कर जेल भेज दिया। सब जानते थे कि इस हत्या में पंडित जी का एक पैसे का हाथ नहीं। पर उन्हें सज़ा हो गई। जो व्यक्ति गन्ने के खेत में पत्ते भी इस लिए नहीं जलाता था कि जीव हत्या हो जाएगी, कीड़े-मकोड़े जल कर साथ मर जाएंगे। उसी व्यक्ति को हत्या में सज़ा काटनी पड़ी। ऐसा होता है बहुतों के जीवन में। सब जानते हैं कि फला निर्दोष है लेकिन क़ानून तो क़ानून, अंधा सो अंधा। यही उस का धंधा।

तो यहां इस डायरी की नायिका भी निरपराध होते हुए भी एक दुष्चक्र में फंसा दी गई। न सिर्फ़ फंसा दी गई, फंसती ही गई। कोई अपना भरोसे में ले कर जब पीठ में छुरा घोंपता है तो ऐसे ही होता है। इस कदर छुरा घोंपा कि एक निरपराध औरत सी बी आई के फंदे में आ गई। फ्राड किसी और ने किया, घोटाला किसी और ने किया और मत्थे डाल दिया इस औरत के। इस औरत के पति को भी इस घेरे में ले लिया। शुभ चिंतक बन कर डस लिया।
विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता का शीर्षक है लिफ़ाफ़ा :

पैग़ाम तुम्हारा
और पता उन का
दोनों के बीच
फाड़ा मैं ही जाऊंगा.

तो इस डायरी की नायिका लिफ़ाफ़ा बनने को अभिशप्त हो गई। एक निरपराध औरत की जेल डायरी की नायिका का सब से त्रासद पक्ष यही है। मेरी त्रासदी यह है कि इस लिफ़ाफ़ा का डाकिया हूं। डायरी मेरी नहीं है। बस मैं परोस रहा हूं। जैसे कोई डाकिया चिट्ठी बांटता है, ठीक वैसे ही मैं यह डायरी बांट रहा हूं। एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी परोसते हुए उस औरत की यातना, दुःख और संत्रास से गुज़र रहा हूं। उस के छोटे-छोटे सुख भी हैं इस डायरी की सांस में। सांस-सांस में। पति और दो बच्चों की याद में डूबी इस औरत और इस औरत के साथ जेल में सहयात्री स्त्रियों की गाथा को बांचना सिर्फ़ उन के बड़े-बड़े दुःख और छोटे-छोटे सुख को ही बांचना ही नहीं है। एक निर्मम समय को भी बांचना है। सिस्टम की सनक और उस की सांकल को खटखटाते हुए प्रारब्ध को भी बांचना है।

यह दुनिया भी एक जेल है। लेकिन सचमुच की जेल ? और वह भी निरपराध। एक यातना है। यातना शिविर है। मैं ने सब से पहले जेल जीवन से जुड़ी एक किताब पढ़ी थी भारतीय जेलों में पांच साल। जो मेरी टाइलर ने लिखी थी। फाइव इयर्स इन इंडियन जेल। इस का हिंदी अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा ने किया था। मेरी टाइलर अमरीका से भारत घूमने आई थीं। पेशे से पत्रकार थीं। लेकिन अचानक इमरजेंसी लग गई और वह सी आई ए एजेंट होने की शक में गिरफ़्तार कर ली गईं। कई सारी जेलों में उन्हें रखा गया। यातना दी गई। इस सब का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण दर्ज किया है मेरी टाइलर ने। दूसरी किताब पढ़ी मैं ने जो मोहन लाल भास्कर ने लिखी थी, मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था। पाकिस्तानी जेलों में दी गई यातनाओं को इस निर्ममता से दर्ज किया है मोहनलाल भास्कर ने कि आंखें भर-भर आती हैं। पॉलिन कोलर की ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’ तीसरी किताब है जो मैं ने जेल जीवन पर पढ़ी है। मूल जर्मन में लिखी इस किताब के हिंदी अनुवाद का संपादन भी मैं ने किया है। मैं हिटलर की दासी थी नाम से हिंदी में यह प्रकाशित है। हिटलर के समय में जर्मन की जेलों में तरह तरह की यातनाएं और नरक भुगतते हुए पॉलिन कोलर ने ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’ में ऐसे-ऐसे वर्णन दर्ज किए हैं कि कलेजा मुंह को आता है। कई सारे रोमांचक और हैरतंगेज विवरण पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पॉलिन कोलर का पति भी जाने किस जेल में है। जाने कितने पुरुषों की बाहों और उन की सेक्स की ज़रूरत पूरी करती, अत्याचार सहती पॉलिन कोलर का जीवन नरक बन जाता है। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। संघर्ष करते-करते हिटलर की सेवा में रहते हुए भी जेल जीवन से वह न सिर्फ़ भाग लेती है बल्कि अपने पति को भी खोज कर छुड़ा लेती है और देश छोड़ कर भाग लेती है।

कई सारे उपन्यासों में भी मैं ने जेल जीवन पढ़ा है। हार्वर्ड फास्ट की आदि विद्रोही जिस का हिंदी अनुवाद अमृत राय ने किया है उस के विवरण भी पढ़ कर मन हिल जाता है। एलेक्स हेली की द रूट्स का हिंदी अनुवाद ग़ुलाम नाम से छपा है। इस के भी हिंदी अनुवाद का संपादन एक समय मैं ने किया था। इसे पढ़ कर यहूदियों की गुलामी और उन की कैद के विवरण जहन्नुम के जीवन से लथपथ हैं। जानवरों की तरह खरीदे और बेचे जाने वाले यहूदी जानवरों की ही तरह गले में पट्टा बांध कर रखे भी जाते हैं। अनगिन अत्याचार जैसे नियमित हैं। लेकिन यह ग़ुलाम अपनी लड़ाई नहीं छोड़ते। निरंतर जारी रखते हैं। मुझे इस उपन्यास का वह एक दृश्य कभी नहीं भूलता। कि नायक जेल में है। उस की गर्भवती पत्नी उसे जेल में मिलती है और पूछती है कि तुम्हारे होने वाले बच्चे से तुम्हारी ओर से मैं क्या कहूंगी ? वह ख़ुश हो कर कहता है, सुनो, मैं ने अपनी मातृभाषा के बारे में पता किया है। मुझे पता चल गया है कि मेरी मातृभाषा क्या है ? लो यह सुनो और पैदा होते ही मेरे बेटे के कान में मेरी ओर से मेरी मातृभाषा के यह शब्द कहना। मोहनलाल भास्कर भी विवाह के कुछ महीने बाद ही अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़ कर पाकिस्तान गए हुए हैं। जासूसी के लिए। एक गद्दार की गद्दारी से वह गिरफ़्तार हो जाते हैं। पर पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में रहते हुए उन की चिंता में भी पत्नी और पैदा हो गया बेटा ही समाया रहता है। ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’ की पॉलिन कोलर का भी जेल में रहते हुए पहला और आखि़री सपना पति और परिवार ही है।

इस डायरी की हमारी नायिका भी जेल में रहते हुए पति और बच्चों की फ़िक्र में ही हैरान और परेशान मिलती है। अपने दुःख और अपनी मुश्किलें भी वह बच्चों और पति की याद में ही जैसे विगलित करती रहती है। सोचिए कि वह जिस डासना जेल में है, उस जेल के पास से ही लखनऊ जाने वाली ट्रेन गुज़रती रहती है। जिस ट्रेन से उस का बेटा गुज़रता है, उस ट्रेन के गुज़रने के शोर में वह अपने बेटे की धड़कन को सहेजती मिलती है। कि बेटा लखनऊ जा रहा है। मेरे बगल से गुज़र रहा है। मां की संवेदना में भीग कर, उस के कलपने में डूब कर उस के मन का यह शोर ट्रेन के शोर से उस की गड़गड़ाहट से अचानक बड़ा हो जाता है, बहुत तेज़ हो जाता है। खो जाती है ट्रेन, उस का शोर, उस की गड़गड़ाहट। एक मां की इस आकुलता में डूब जाती हैं डासना जेल की दीवारें। मां-बेटे के इस मिलन को कोई भला किन शब्दों में बांच पाएगा? बच्चों का कैरियर पति की मुश्किलें उसे मथती रहती हैं। बेटी के कॅरियर और विवाह को ले कर डायरी की इस नायिका की चिंताएं अथाह हैं। वह अपनी चिंताओं को विगलित करने के लिए अपने बच्चों को चिट्ठी लिखती है। चिट्ठी लिखते-लिखते वह जैसे डायरी लिखने लगती है। रोजनामचा लिखने लगती है। अपने आस-पास की दुनिया लिखने लगती है। लिखी थीं कभी पंडित नेहरु ने अपनी बेटी इंदु को जेल से चिट्ठियां। बहुत भावुक चिट्ठियां। महात्मा गांधी भी विभिन्न लोगों को जेल से चिट्ठियां लिखते थे। कमलापति त्रिपाठी की भी जेल से लिखी चिट्ठियां भी मन को बांध-बांध लेती हैं। लेकिन वह बड़े लोग थे। महापुरुष लोग थे। उन की चिंताओं का फलक बड़ा था, उन की लड़ाई बड़ी और व्यापक थी। लेकिन इस डायरी की नायिका एक जन सामान्य स्त्री है। निरपराध है। साजिशन फंसा दी गई है। उस की चिंता में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने रोजमर्रा के छोटे-छोटे दुःख हैं। पति और बच्चे हैं। उन की चिंता है। दिखने में यह सब बातें बहुत छोटी और सामान्य दिखती हैं, लेकिन जिस पर गुज़रती है, उस के दिल से पूछिए। उस का यह दुःख उसे हिमालय लगता है। हिमालय से भी बड़ा।

और जेल की सहयात्री स्त्रियां ?

जेल बदल गई है, समय और यातनाएं बदल गई हैं लेकिन स्त्रियों का जीवन नहीं बदला है। जेल से बाहर भी वह कैद ही रहती हैं। कैदी जीवन उन का बाहर भी होता है। पर वह घर परिवार के बीच रह कर इस सच को भूल जाती हैं। तो महिला बैरक की स्त्रियों की कथा, उन की मनोदशा और दुर्दशा भी साझा करती रहती है हमारी डायरी की यह नायिका। जितनी सारी स्त्रियां, उतने सारे दुःख। जैसे दुःख न हो साझा चूल्हा हो। तमाम सारी स्त्रियों का टुकड़ा-टुकड़ा, भारी-भारी दुःख और ज़रा-ज़रा सा सुख, उस का कंट्रास्ट और कोलाज एक डाकिया बन कर, पोस्टमैन बन कर बांट रहा हूं मैं। स्नेहलता स्नेह का एक गीत याद आ रहा है, थोड़ी धूप, तनिक सी छाया, जीवन सारा का सारा। माया गोविंद ने लिखा है, जीना आया जब तलक तो ज़िंदगी फिसल गई। नीरज ने लिखा है, कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे। हमारी डायरी की यह नायिका भी जेल जीवन में गाती रहती थी और अब बताती रहती है कि यह डायरी लिख कर ही मैं ज़िंदा रह पाई थी जेल में। नहीं ज़िंदा कहां थी, मैं तो मर-मर गई थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की ही एक कविता है झाड़न :

पड़ा रहने दो मुझे
झटको मत
धूल बटोर रखी है
वह भी उड़ जाएगी।

लेकिन इस डायरी ने झाड़न चला दी है। जेल जीवन जी रही औरतों पर पड़ी धूल की मोटी परत उड़ गई है। इस धूल से हो सके तो बचिए। क्यों कि औरतों की दुनिया तो बदल रही है। यह डायरी उसे और बदलेगी। सरला माहेश्वरी की यह कविता ऐसे ही पढ़ी और लिखी जाती रहेंगी :

8150 दिन !

 

- सरला माहेश्वरी

जेल में
8150 दिन !
23 वर्ष !
प्रतीक्षा के तेइस वर्ष !
बेगुनाह साबित होने की प्रतीक्षा के तेइस वर्ष !
जेल के अंदर
एक बीस वर्ष के छात्रा के तैंतालीस वर्ष में बदलने के तेइस वर्ष...!!
एक ज़िंदगी के ज़िंदा लाश में बदलने के तेइस वर्ष....!!!
दो बेगुनाह बेटों की
प्रतीक्षा में रोज़ मरते परिवार के तेइस वर्ष !!!
भाषा, शक्ति, बल, छल के तेइस वर्ष !
बोलने के नहीं
बोलने को थोपने के तेइस वर्ष !
बोलने की ग़ुलामी के तेइस वर्ष !
आज़ादी के पाखंड के तेइस वर्ष !
निर्बल और निर्दोष को
बलि का बकरा बनाये जाने के
सत्ता के सनातन समय के
सनातन सत्य के सनातन तेइस वर्ष !
ओह निसार ! ओह ज़हीर ! ओह सरबजीत !
प्रतीक्षा और प्रतीक्षा !
नहीं छूटती....
ज़िंदगी की प्रतीक्षा !
प्रेम की प्रतीक्षा !!
मुक्ति की प्रतीक्षा !!!
नई सुबह की प्रतीक्षा !!!!
प्रतीक्षा को चाहिए कई ज़िंदगियां ....!!!!!






5/7, डालीबाग़ आफ़िसर्स कॉलोनी, लखनऊ
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एक औरत की जेल डायरी

पृष्ठ सं. 151
मूल्य-400रुपए
आवरण : अरुण सिंह

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2017




डासना जेल, गाज़ियाबाद
29 सितंबर, 2013




मेरे प्यारे बच्चों ,

ढेर सारा प्यार।

कई दिनों से सोच रही थी कि तुम लोगों से बात करुं लेकिन कुछ मनःस्थिति ऐसी रही कि क्या कहें। ज़िंदगी में इतनी तेजी से घटनाएं घट रही हैं कि समझ ही नहीं आ रहा कि अपना बैलेंस कैसे बना कर रखूं। हम चारों लोग चार कोने पर हैं। हम और पापा तो एक ही जगह रहते हुए भी हफ़्ते में सिर्फ़ आधा घंटे के लिए मिल पाते हैं। चौबीस घंटे साथ रहने के बाद ये भी दिन आएगा कि अपने ही पति को सिर्फ़ आधा घंटा के लिए देख पाएंगे। अपने ही बच्चों की आवाज़ सुने दस-दस दिन बीत जाएंगे। जहां रोज घंटा भर बात होती हो वहां दस दिन में पांच मिनट दस मिनट बात होगी। ये भी ज़िंदगी होगी। ऐसा तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था। फिर भी हम जिंदा हैं। भगवान अभी और क्या-क्या दिखाएगा। लेकिन चलो फिर अपने मन को समझाते हैं कि ये भी बीत ही जाएगा। दिन कोई भी नहीं रुकेंगे। सब बीत ही जाएंगे।

25 सितंबर को भंडारे में आग लग गई थी तब से खाना आदमियों की तरफ से आ रहा है। जेल की रोटी क्या होती है अब पता चल रहा है। लेकिन साथ ही इस बात का भी एहसास हो रहा है कि जिंदा रहने के लिये बहुत कम ज़रुरतें हैं। हम अपने शौक के लिए ही सब कुछ करते हैं। दोनों टाइम दो रोटी दाल के साथ खाते हैं तो लगता है इतना ही तो ज़रुरी है जीने के लिए। फिर दस्तरखान याद आता है जहां एक डिनर पर हम लोग दो हजार ढाई हजार खर्च कर देते थे। तब कभी नहीं सोचा कि हम क्यों कर रहे हैं? तब भी जिंदा ही थे और अभी भी जिंदा ही हैं। ज़िंदगी की ज़रुरतें बहुत थोड़ी हैं । आधा लीटर दूध लेती हूं । कल चूल्हा बना कर उस में बोरा लगा कर आग जला कर दूध गरम किया और चाय बनाई। कहां बिना गैस के काम नहीं चलता और कहां पुराना कपड़ा, बोरा, पॉलीथीन सब जला कर चाय बनाई, ये भी ज़िंदगी का एक रूप है। लेकिन देखो काम तो तब भी चला न। तो ये बात समझ आई कि रुकता कुछ नहीं है। काम सब चलते हैं। इंसान अपनी ज़रूरत पूरी कर ही लेता है। यहां जब औरों को देखते हैं तो लगता है हम तो काफी लकी हैं। भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं कि उसने हमें बहुत कुछ दिया है। कितने लोग तो ऐसे हैं जिन से मिलने भी कोई नहीं आता वो पूरी तरह से यहां मिलने वाले खाने पर ही डिपेंड हैं। कैसे वो जीते हैं देख कर रुह कांप जाती है।

तुम लोग पता नहीं कैसे मैनेज कर रहे होंगे? वैसे मुझे पूरा भरोसा है तुम लोगों पर कि हर सिचुएशन का सामना बखूबी कर लोगे। तुम लोगों की ज़िंदगी तो अभी शुरू हुई है। इन हालात की मजबूती तुम लोगों के आगे की ज़िंदगी में बहुत काम आएगी। विषम परिस्थितियों में भी तुम लोगों का हौसला बना रहेगा। कभी भी ज़िंदगी में हालात से परेशान होना तो हम लोगों के इन हालातों का ध्यान करना। तुम लोगों को सब्र आ जाएगा।

जमीन पर सोना, बैठना, खाना इन सब की आदत ही नहीं रही। अब एक-एक चीज़ का महत्व पता चल रहा है। एक हाल में 50-60 महिलाएं रहती हैं। 10-12 ट्यूब लाइट परमानेंट जलती ही रहती हैं। कई रात से रोशनी से नींद ही नहीं आती थी। दो दिन से आंख पर दुपट्टा रख कर सोते हैं। हां नींद की दवा भी खाते हैं। पांच घंटे की नींद आ ही जाती है। 27 तारीख़ को बी.पी. चेक कराया था 170/98 आया तो डाक्टर ने कहा कि स्ट्रेस और नींद न पूरी होने से ऐसा है तो दो चार दिन नींद की दवा ले लीजिए। हां पापा की स्ट्रेसनिल बिलकुल बंद हो गई है। पहले तो दिक्क़त थी लेकिन अब आदत बदल रही है, ज़्यादा दिक्क़त नहीं हो रही। देख लो ऐसा नहीं है कि हम किसी भी चीज़ के बिना जी नहीं सकते। बस इंसान करना वही चाहता है जिस में उसे आराम मिले। अच्छा लगे। रात घर में भी सब दरवाजे बंद करके ही सोते हैं लेकिन यहां जब सात बजे बैरक का ताला बंद होता है तो दिल बिलकुल बैठ जाता है, मजबूरी का एहसास होता है कि अब हम चाहे जो कर लें सुबह छ बजे से पहले यहां से निकल नहीं सकते। लेकिन हम तुरंत ही पूजा पर बैठ जाते हैं और सुंदरकांड पढ़ने लग जाते हैं। एक घंटे में जब तक सुंदर कांड समाप्त होता है मन शांत हो चुका होता है।

आज मेरी अटेंडेंट पेशी पर नोएडा गई है। लाइन में लग कर खाना लेने की न मेरी हिम्मत थी और न ही हाथ इस लायक कि खाना ला सकें तो हम चुपचाप लेटे थे लेकिन बगल वाले बिस्तर पर जो है उसने ज़बरदस्ती उठा कर एक रोटी दाल के साथ खिला दी कि भूखे मत सो आंटी, तो भगवान जहां खुद नहीं पहुंचते अपने बंदों को पहुंचाते हैं। काम कोई नहीं रुकता। पापा कितना परेशान थे कि जेल में टूटे हाथ के साथ तुम कैसे रहोगी देख लो एक दिन भी न बिना नहाये रहें और न ही बिना खाए। खाना चाहे जैसा हो हम एक रोटी दाल के साथ खा ही लेते हैं। आज इस बात को महसूस कर रहे हैं कि तुम लोग घर के बाहर कैसे खाते रहे होंगे? घर घर ही होता है। शायद इसी लिए हम अपनी पूरी ज़िंदगी एक घर बनाने में लगा देते हैं।

आज रात भर नींद नहीं आई। पेन किलर तो 27 से ही नहीं खा रहे थे आज रात नींद की दवा भी नहीं खाई। पूरी रात दर्द ही होता रहा है। खैर अब आज रात से रोज रात में आधी नींद की गोली ज़रूर लेंगे। रात बारिश भी हुई मौसम भी ठंडा हो गया है। पापा को भी टांसिल हो गया था, लेकिन अब ठीक हैं।

नहा धो कर जब पूजा करते हैं तो 108 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी करते हैं। बाक़ी भी पूरी पूजा करते हैं, लेकिन इस मंत्र का जब तक जाप करते हैं आंसू ही नहीं रुकते। रोते-रोते हिचकी बंध जाती है। शंकर जी से सारी शिकायतें कर लेते हैं। लेकिन उस के बाद मन शांत हो जाता है पता नहीं भगवान कहां है और कब सुनेगा? वैसे यहां रहते-रहते इतनी शांति ज़रूर मिल गई है कि यहां से जाना तो है ही बस समय कितना लगेगा ये कोई नहीं जानता। अब तो जेल के नाम से डर भी नहीं लगता। हमारे आस पास जैसे ही लोग यहां भी हैं। किसी की कोई मजबूरी है, किसी की कोई। कल से भंडारा वापस आ गया है यहां की औरतें ही खाना बना रही हैं। अब खाना ठीक है जब तक पहले वाले से बदतर न मिले पहले वाले की कद्र नहीं होती। अब यही खाना नियामत लग रहा है। दाल रोटी में ही बड़ा स्वाद है। क्या है ज़िंदगी ? अब समझ आता है ज़िंदगी इतनी आसान नहीं है लेकिन जीना तो है ही। शाम को जो नई महिलाएं जेल आती हैं हम तो उनके पास जाते ही नहीं। उन्हें रोता हुआ देख कर बड़ा डिप्रेशन होता है। आज कल तीन हिजड़े भी यहां हैं। कहां आधे घंटे को हिजड़े बरदाश्त नहीं होते थे कहां दिन भर का साथ। बस रात में उन लोगों को अलग बैरक में रखा जाता है। ये भी ज़िंदगी का रूप है।

तुम लोगों की कोई भी ख़बर नहीं मिल पा रही। गप्पू का फ़ोन भी नहीं आ रहा। आया भी हो तो पापा बताएंगे कैसे? अब परसों पेशी पर देखते हैं कौन आता है। आजकल पेशी पर सख्ती भी बहुत है। वहां रुकने भी नहीं देते। विधायक जी को भी हवालात में बैठना पड़ता है। हवालात में बैठना बहुत कष्टकारी होता है। हर तरह के मुलजिमों के साथ ताले में बंद रहो। पुलिस वाली के साथ पेशी पर जाओ और लौट कर फिर वहीं हवालात में बंद हो जाओ। बहुत शर्मिंदगी होती है। दिमाग ख़राब हो जाता है फिर वज्र वाहन में बैठ कर आना जाना। उस फीलिंग को कहा ही नहीं जा सकता कि कितना बुरा लगता है। खैर ये भी समय है, बीत ही जाएगा। विधायक जी को 19 महीने हो गए हैं और रमेश चाचा को 11 महीने। खैर हमें भी कल एक महीना हो जाएगा।

कैदी क्या होते हैं आज इस का एहसास हो रहा है। आप सब काम करते हैं बस अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते। जब चाहें तब हाल के बाहर नहीं जा सकते। बाक़ी रहना खाना सब अपने हिसाब से कर ही रहे हैं लेकिन फिर भी एक घबराहट हमेशा रहती है। न चाहते हुए जिन से मन न मिले उन के बीच में रहना पड़ता है। लेकिन अब लगता है कि शायद हॉस्टल इसी का नाम है लेकिन वहां बस आप कैद नहीं होते और आप की एक रिस्पेक्ट होती है। यहां तो साले को कोई इज्जत ही नहीं है सारे मुलजिमों के बीच रहो। कभी-कभी ए.डी.जे. वगैरह आते हैं तो सारे मुलजिम एक लाइन में खड़े होते हैं। वो पूछते हैं कि कोई दिक्क़त तो नहीं है? इतनी शर्मिंदगी होती है कि हम तो आंख ही नहीं उठाते कि क्या सोचते होंगे ये लोग कि 420 में आए हैं हम।

एक और सी.बी.आई की है सुनाली 420 में ही है। बैंक का लोन है। वो पति पत्नी दोनों अंदर हैं। और एक नौ साल का बच्चा बाहर है। और पति ने भी उस पर डायवोर्स फाइल कर रखा है। उसे 15 महीने हो गए हैं जेल में। सोचो वो कैसे रहती होगी? उसने अपने आप को पूरी तरह पूजा में लगा लिया है। भगवान में ही रमी रहती है। फिर अपने पर सब्र करते हैं कि हमारे बच्चे तो बड़े हैं। बुलबुल बेटा बुरा न मानना लेकिन सच यही है कि चिंता मुदित की ही होती है तुम तो मेरा बहुत ही समझदार बच्चा हो मी प्रॉऊड आफ यू। तुमने मुझे आज तक कभी शिकायत का मौक़ा नहीं दिया। इमोशनली भी तुम मजबूत हो। ये छोटा ही रह गया है। लेकिन चलो इन हालात में ये भी मजबूत हो जाएगा तो दुनियादारी आ ही जाएगी। आगे की ज़िंदगी में संभल ही जाएगा। पापा बड़े परेशान होते हैं कि बच्चे कैसे मैनेज कर रहे होंगे। हमने तो कह दिया कि अपनी मर्जी से तुम बैरक से भी नहीं निकल सकते और चिंता दूर बैठे बच्चों की। जहां हो वहां की सोचो। यहां अपनी व्यवस्था बनाओ ताकि जितने दिन यहां हो दिक्क़त न हो। वैसे रमेश चाचा तो हैं ही। तो कहते हैं उनकी ज़मानत हो जाएगी वो चले जाएंगे। अरे उन की हो जाएगी तो धीरे-धीरे सब की ही होगी। सभी चले जाएंगे। वैसे शुरुआत हो गई है। मेरठ के एक डाक्टर की ज़मानत हुई है और बिना पेमेंट बेसिस के। तो अब शुरू तो हुई एन.आर.एच.एम. की जमानत।

कल तो हिम्मत ही नहीं कुछ लिखने की। आज भी समझ नहीं आ रहा। पप्पू की शक्ल आंख के सामने से हट ही नहीं रही। हम सब ने क्या खोया है शब्दों में कहा नहीं जा सकता। लेकिन कल से मन और विरक्त हो गया है। एक पल को तो खुदगर्ज हुए हम कि अब हमारी ज़मानत कौन कराएगा। पता नहीं कितना समय यहां और रहना पड़ेगा लेकिन फिर दिल ने खुद को ही समझा लिया कि कोई फायदा नहीं है परेशान होने से जो होना है वही होगा और जब होना है तभी होगा किसी की मर्जी नहीं चलती। ‘‘अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर को है उधर के हम हैं।’’ शायद हमारा जेल में आना सही ही रहा नहीं तो ये झटका हम कैसे सहते? पहले हम कहते थे भगवान दोनों हाथ तोड़ डाले फिर जेल में डाल दिया। इस से बुरा भी कुछ होगा क्या? देखो हो गया और भी बुरा। गप्पू बेचारा बहुत परेशान होगा। अब सब कुछ उसे अकेले ही मैनेज करना है निर्णय भी लेने हैं सारे। हम दोनों में से कोई एक भी बाहर होता तो हालात कुछ क़ाबू में होते।

एक महीने में कुछ-कुछ मन लगने लगा था, कल से सब फिर बिखर गया है। कहीं भी मन नहीं लग रहा है कुछ भी समझ नहीं आ रहा। दो एक दिन में धीरे-धीरे सब्र भी आ जाएगा।

आज से नवरात्र भी शुरू हो गए। जेल के नवरात्र भी देख लिए। अब देखो भगवान दीवाली यहां न दिखाए। खैर। उस दिन मुदित को देख कर बहुत अच्छा लगा फिर पप्पू की ख़बर ने तो होश ही उड़ा दिया और आखिरी में जब मुदित को छोड़ कर जेल के लिए निकले तो कलेजा कट गया बिलकुल। कैदी क्या होता है ये कदम-क़दमपर एहसास होता है। अपने बच्चे से अलग होने का किस मां का मन होता है? फिर दिल को समझाया कि जब तुम लोग जाते हो तब भी तो ऐसी ही बेबसी होती है लेकिन उस में तुम लोगों का भविष्य छुपा होता है और ये भी तसल्ली होती है कि अरे कोई नहीं हम जब चाहें जा कर बच्चों से मिल तो सकते हैं। यहां तो बिलकुल ही अंजान लोगों के बीच और सब को छोड़ कर रहना मजबूरी का एहसास बहुत ही ख़राब है। फिर साचते हैं पापा तो तुम लोगों को छोड़ने स्टेशन भी नहीं जा पाते थे। उन पर क्या बीतती होगी। लेकिन फिर भी पापा जैसे घर पर थे उस से काफी अच्छी हालत में हैं।

पता है तुम लोग अब समझदार हो गए हो। पप्पू के मर्डर पर मुदित का तुरंत आना बहुत सही फ़ैसला था। ये बहुत ही ज़रुरी था। अब तेरहीं पर तुम रहोगी। हमारे बच्चे वहां हैं तो हम किसी न किसी रूप में वहां मौजूद ही हैं।

आज हमारे बैरक के बाथरूम में कुछ लीकेज है तो पानी बंद कर दिया गया है। और हम लोग 6.30 बजे शाम से अंदर बंद कर दिए गए हैं और अब सुबह 6 बजे ही ताला खुलेगा तभी नीचे बाथरूम जा सकता है इंसान। सोचो ये होती है बेबसी। इंसान की कोई इज्जत, कीमत ही नहीं है। खैर जीवन में एक दिन ऐसा भी। जाने भगवान अभी और क्या-क्या दिखाएगा? आज पापा से भी आधे घंटे की मुलाक़ात हुई जेल के पार्क में। हर शनिवार को होती है। आज पापा काफी ठीक थे। हंस भी रहे थे। पप्पू का सदमा तो है ही अब जो है वो तो है ही। इसी में रहना है। नवरात्र भी शुरू हो गए। आज यहां सब को 5 उबले आलू, दो केले और आधा लीटर दूध दिया गया, जिनका व्रत था। हमने नहीं रखा कि इंसुलिन कैसे लेंगे। तुमने तो रखा ही होगा। आज घर का कीर्तन भी याद आ रहा है। सोचा न था कि कभी इस कीर्तन को भी तरस जाएंगे।

जो कपड़े वाली पन्नी होती है उस में कपड़े भर के उस को तकिए की तरह लगा रहे हैं आजकल। हाथ के दर्द में आराम मिल जाता है। प्लास्टिक की पन्नी का एक सिरा ग्रिल में फंसा कर उस में बरतन रखे जाते हैं। ऐसी ही पन्नी में ब्रश, पेस्ट भी रखा जाता है। प्लास्टिक की भी कोई कीमत होती है? यहां एक-एक पन्नी संभाल कर रखनी पड़ती है।

जब हम सुंदर कांड पढ़ते हैं तो सर पर ही टी.वी. फुल वाल्यूम पर चलता है और सारी महिलाएं आपस में बतियाती हैं या फिर लड़ती रहती हैं। लड़ती हैं तो मां बहन से नीचे तो गरियाती ही नहीं हैं। इतनी फ्रस्ट्रेटेड महिलाएं हैं कि बस पूछो नहीं। इस तरह से लड़ती हैं कि बस। महिलाओं का ऐसा रूप तो कभी देखा नहीं था। कभी-कभी तो ये सब देख कर अपने महिला होने पर शर्म आने लगती है। अपने को बिलकुल ही चुप रखते हैं कि कहीं इन्हीं लोगों की भाषा मुंह से न निकलने लगे।

जेल रेलवे क्रासिंग के बाद है और ये क्रासिंग लखनऊ वाली है। जब भी ट्रेन की आवाज़ आती है मन करता है दौड़ कर इस पर चढ़ जाएं और लखनऊ पहुंच जाएं। जिस दिन मुदित गया है उस दिन तो रात में ट्रेन की आवाज़ बर्दाश्त ही नहीं हो रही थी कि इसी में मेरा बेटा गया। बुलबुल बेटा ऐसा नहीं है कि तुम्हारे लिए नहीं कलपते हैं। दोनों का ही बराबर लगता है।

रात को जब सोते हैं तो सिक्योरिटी के लिए सारी लाइट जलती रहती है और कीड़े आते हैं। लेकिन आप को इसी में सोना है। रात भर शरीर पर कीड़े गिरते रहते हैं इसी को जेल कहते हैं। आज जा कर ऊपर का बाथरूम सही हुआ है। कुछ सुकून मिला है।

उस दिन तुम लोग आए। अच्छा तो लगा ताक़त भी मिली लेकिन मन बहुत उदास हो गया। पराधीन सपनेहु सुख नाहीं इस कहावत का अर्थ हम से ज़्यादा अब और कोई नहीं समझ सकता। तुमने कहा कि तुम कितना रो रही हो। बात तो सही है। इतने सालों बाद अपने भाई से इस हाल में मिलना इसकी तो कल्पना ही नहीं की थी। इस समय तो दिल इतना कमजोर है कि थोड़ी सी तकलीफ और थोड़ी सी ही खुशी में आंसू निकल आते हैं। तुम चाहे जो कहो लेकिन तुम्हारी आंखें बता रही थीं, कि तुम कितनी दुखी हो। खैर दुख का समय तो है ही। तुमसे तो बात ही नहीं हो पाई। खैर हम जानते थे इसी लिए काम की बातें लिख कर ले गए थे। तीन दिन से जब से ये था कि तुम्हें आना ही है तुम्हारी एक ग्रे ब्लू फ्रॉक थी उसी में तुम्हारी शक्ल ध्यान आ रही थी। छोटे-छोटे खुले बाल मुंह पर और दौड़ती भागती सी बुलबुल। वैसे तो अब तुम लोग हम लोगों के लिए सपना ही हो, दो-चार दिन से ज़्यादा कहां मिलते हो और आगे अपनी लाइफ में बिजी ही होते जाओगे। लेकिन हम जब इन समस्याओं से मुक्त होंगे तो अपने को बिजी कर लें। तब ये होगा कि जो भी जहां है निश्चित तो है।

कल पापा कह रहे थे कि देखो मैं ने जो जो कहा था सब हो रहा है। हम ने कहा पप्पू का मरना तुमने कहा था? छोटे गुड्डू इतना साथ देंगे तुम्हें पता था? तो ऐसे ही क्या होना है कोई नहीं जानता। देखो बड़े गुड्डू ने भी छोटे गुड्डू से साफ-साफ कहा है कि उन बच्चों को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। आज हम निश्चिंत हुए कि हमारे बाद भी तुम लोगों की निःस्वार्थ चिंता करने वाला भी कोई है। अपना खून अपना ही होता है। चाहे आप उस से मिलते रहिए या नहीं। लेकिन आप की ज़रूरत में वो आप के साथ ही होगा। यही सब रिश्ते नाते होते हैं। दोनों ही बातें सच होती हैं। अपने बनाए हुए रिश्ते भी और खून के भी। लेकिन ये क़िस्मत भी होती है कि कौन साथ चलता है? तुम्हारी ददिहाल में सोनल से ज़्यादा सगा रिश्ता कोई नहीं है और देखो वो कहां है? अपने बनाए हुए रिश्तों में दादा को देखो एक परिवार होते हुए वो लोग ऐसे मुंह फेर गए जैसे जानते ही नहीं हों। मिले ही न हों कभी। और वहीं पप्पू का परिवार देखो पूरे तन मन धन से खड़ा रहा हमारे साथ। यही सब ज़िंदगी के अनुभव हैं। हम को उम्र के इस पड़ाव में हुआ और तुम लोगों को अभी ही हो गया। कम से कम आगे की ज़िंदगी में तो धोखा नहीं खाओगे।

बस ये समय मजबूती से खड़े हो कर सब के साथ निकाल देना है। बीत ही जाएगा। वो दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे। बस इस बात का पूरी ज़िंदगी ध्यान रखना कि जो इस समय आप के साथ खड़ा है वो ज़िंदगी के किसी भी मोड़ पर आप की वजह ने न छूटने पाए। यही संबंधों को बनाने का परखने का समय है। परखना तो गलत है क्यों कि अभी आप लोगों ने बनाया ही क्या है जो परखेंगे। संबंधों को मजबूती प्रदान करने का समय है और हम जिस के साथ अपने दुख का समय बिताते हैं उसे कभी भूल नहीं पाते।

पुरुषों की तरफ जो लोग नवरात्र व्रत हैं चंदा कर के मेस में हलवा पूरी बनवा कर महिलाओं की बैरक में बंटवाते हैं। क्यों कि यहां महिलाओं के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी हैं तो कन्याओं का भोग भी आता है। कल दिन भर बच्चों के लिए खाना आता ही रहा। हम लोगों के लिए भी लंच में आया था हलवा पूरी। लेकिन हमारा तो पेट अब ऐसा बंध गया है दाल रोटी से, और कुछ हजम ही नहीं होता। और हम खाना भी नहीं चाहते कि इतनी मुश्किल से अपने मन को इस खाने के लिए समझा पाए हैं और कुछ स्वाद मिल गया तो फिर मुश्किल होगा एडजस्ट करना। इस लिए हम पेशी पर भी जाते हैं तो कुछ नहीं खाते बस चाय पी लेते हैं। शुरू में तो मुंह में कोई स्वाद ही नहीं था। न नमक का , न मीठे का। अब धीरे-धीरे जबान और पेट सब एडजस्ट हो गया है। आखिर आज एक महीना 11 दिन हो भी गए हैं यहां रहते-रहते। लेकिन फिर भी मन नहीं लगता। लगता है उड़ कर अपने घर पहुंच जाऊं। है न बचपने की बातें? लेकिन क्या करें मन ही है। कुछ भी सोच लेता है।

बुलबुल बेटा आज सुबह से तुम्हारी शक्ल आंख के सामने से हट ही नहीं रही। ऐसा लग रहा है तुम बहुत उदास हो। तुम्हारे साथ तो नाइंसाफी हो ही रही है। बेटा माफ कर देना हमें, अपनी ज़िम्मेदारी हम नहीं निभा पा रहे, तुम्हें अकेला छोड़ दिया है। मुदित के सर पर तो तुम हो बड़े के रूप में। तुम्हारे ऊपर कोई नहीं है तुम्हें खुद ही सारे निर्णय लेने हैं चाहे गलत हो या सही। तुम तो एक दम से बड़ी हो गई। वैसे हमें पता है हमारा बच्चा बहुत समझदार है। सब बहुत आसानी से हैंडल कर लेगा लेकिन फिर भी आज सुबह से मुदित की नहीं बल्कि तुम्हारी याद आ रही है। चिंता बनी हुई है। पर क्या करें बहुत मजबूर हैं। यही तो जेल है। कुछ भी कर लो बस यहां से निकल ही तो नहीं सकते। पता नहीं भगवान अभी और क्या-क्या दिखाएगा? अब तो कुछ खुशियां भी देनी चाहिए उसे दुख ही दुख दिए जा रहा है। बर्दाश्त की क्षमता भी ख़त्म हुई जा रही है। अब कुछ तो ऐसा हो कि ज़िंदगी में रस आए। वैसे सी.एम.ओ. कलीम की बेल से बहुत शांति मिली है कि हां अब हम लोगों की भी हो ही जाएगी। फिर भी प्रभु की इच्छा। सबहिं नचावत राम गोसाई।

अब जब तारीख़ पर जा कर तुम से फ़ोन पर बात कर लेंगे तभी दिमाग शांत होगा। किसी भी तरह मन ही नहीं लग रहा। ऐसा पहली बार हुआ है कि तुम लखनऊ में हो और हम नहीं। और हम चाह कर भी तुम तक नहीं पहुंच सकते। फिर इसी बार क्यों इतनी बेबसी हो रही है? क्यों कि ये जेल है और तुम्हें छुट्टी भी बहुत मुश्किल से मिलती है। चलो कोई नहीं। निकल कर तुम्हारे पास आएंगे और कई दिन तक साथ ही रहेंगे। अपनी नौकरी ख़ूब मन लगा कर करो। देखो बीनू ने कितना बढ़िया स्विच किया है। वैसे भी अब तुम्हारी नौकरी तुम्हारे लिए बहुत ज़रुरी है। मां बाप के जेल यात्रा होने का कलंक तो साथ लग ही गया है अब इसे कंपनसेट तो तुम्हें अपनी नौकरी से ही करना है। जब तक ये सब परेशानियां हैं अपनी नौकरी ख़ूब अच्छे से मन लगा कर करो। प्रमोशन लेती रहो। शादी तो 2015 में ही हो पाएगी। तब तक तुम्हारी एक पोजिशन हो चुकी होगी तो ससुराल में कोई दबा नहीं पाएगा। जेल का ताना नहीं दे पाएगा।

आज तो पापा का बर्थडे है। यहां पर बंदी महिलाओं के बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल चलता है। जो तुम टॉफीज लाई थी वो बच्चों में बांटी और हैपी बर्थडे गवाया। अपना शिक्षा सेतु बहुत याद आया। भगवान ने उन बच्चों के साथ भी बहुत नाइंसाफी की। स्कूल चल रहा होता तो बच्चे कुछ तो सीखते। अब तो फिर पहले जैसे ही हो गए होंगे सारे।

कल से ऑपरेशन वाले हाथ में बहुत दर्द है। जो रॉड लगी है उस की आखिरी रॉड थोड़ी बाहर आ गई है। तो उतना ही दर्द हो रहा है जितना ऑपरेशन के बाद होता था। आज पेशी पर फाइनल करेंगे और अगले हफ़्ते इसे निकलवा ही दें। सोचा तो यही है देखते हैं होता क्या है? अब तो हम कुछ सोचते ही नहीं हैं जो सामने आ जाए उसे ही सच मानो। प्लानिंग से कुछ नहीं होता। लेकिन तुम लोग ये सब नहीं सोचना। तुम्हारी उम्र में तो प्लानिंग करनी ही पड़ती है ज़िंदगी को चलाने के लिए। हां , लेकिन रिजल्ट की बहुत चिंता नहीं करनी चाहिए। क्यों कि होगा वही जो प्रभु की इच्छा। हमारी उम्र में तो अब बहुत प्लानिंग का कोई मतलब नहीं है। हर दिन को अपनी ज़िंदगी का आखिरी दिन समझ कर जीना है अब तो। मतलब हर पल को जीना है।

यहां पर एक बात और समझ आई कि जेल को आराम से ही काटा जा सकता है। अगर सारी एनर्जी इसी में लगा दो कि कैसे निकलेंगे तो तबियत और ख़राब होगी। और होगा कुछ नहीं। इस लिए ज़िंदगी जीने की जो न्यूनतम आवश्यकताएं हैं उन को पूरा करते हुए सब्र के साथ समय काटना चाहिए। ज़्यादा एनर्जी लगा दो कि यहां मन नहीं लग रहा या कमियां निकालते रहो तो अपना मन ख़राब होगा। शरीर ख़राब होगा। रहना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन रहना तो यहीं है जब तक परवाना न आ जाए आप किसी भी तरह बाहर जा ही नहीं सकते। तो क्यों ताक़त खर्च करो। और आए हैं तो जाना ही है किसी की भी ज़िंदगी यहां नहीं कटती बस समय कितना लगेगा ये कोई नहीं जानता। इसी लिए कहा जाता है कि जेल काट रहे हैं। कोई ये नहीं कहता कि हम जेल में रह रहे हैं।

आज मेरा मूड अच्छा है। शनिवार है न अभी पापा से मिलने जाना है। आधा घंटे के लिए। सुबह से दिन इसी में भाग जाता है। चौबीस घंटे साथ रहो तो ये सब समझ नहीं आता कि एक दूसरे के कितने आदी हैं हम। सब फॉरग्रांटेड लगता है। अब जब हफ़्ते में एक बार आधे घंटे को मिल पा रहे हैं तो समझ आता है कि वो मेरी ज़िंदगी का कितना ज़रुरी हिस्सा हैं। उन के बिना तो हम कुछ हैं ही नहीं। लेकिन हम लोग इस आधे घंटे में भी लड़ ही लेते हैं। क्या करें वो भी उतना ही ज़रुरी है। और दोनों लोग बैठ कर बातें बच्चों की ही करते हैं। तुम्हीं लोगों की चिंता में ज़िंदगी बीत जाएगी हमारी। बच्चे कभी बड़े ही नहीं हो पाते मां बाप के लिए। यहां और कुछ है भी नहीं बतियाने को। किसी और की बात करने का मन भी नहीं करता है। आज कल बुलबुल का बचपन हमेशा आंखों के सामने रहता है। छोटी सी बुलबुल दौड़ती भागती, डांट खाती, रोती गाती। समय कितनी तेजी से भाग जाता है। काश ये समय भी तेजी से बीत जाये। बीत ही रहा है, आज एक महीने सत्राह दिन हो गए डासना आए हुए।

हाथ में बहुत दर्द है। मंगलवार, बुधवार से पहले ये निकल भी नहीं पाएगा। आज मम्मी बहुत याद आ रही है। सोचो कितना दर्द होगा कि मम्मी याद आ गई।

समझ में नहीं आ रहा क्या लिखें? कई सारी फीलिंग एक साथ है। हाथ का दर्द बराबर बना हुआ है। एक रॉड अपने आप ही बाहर आ गई है। उसे यही कंपाउंडर ने निकाल दिया है । सोचो कपाउंडर ने। दूसरी भी आधी बाहर है। लेकिन जब तक पुलिस गार्ड न मिले हास्पिटल जा ही नहीं सकते। रमेश चाचा ने सारी कोशिशें कर ली हैं । अभी तक तो कुछ हुआ नहीं। पता नहीं कब हो पाएगा या ऐसे ही एक-एक कर के सारी रॉड यहीं बाहर आ जाएंगी। ये भी ज़िंदगी है। एक इंजेक्शन लगवाने में हालत ख़राब हो जाती थी कहां एक हफ़्ते से लगातार इसी दर्द में बने हुए हैं इतना ज़्यादा दर्द है कि जेल तारीख़और कुछ भी ध्यान नहीं आ रहा है।

कल करवा चौथ भी था। ऐसे ही बीत गया। एक तो दर्द दूसरे कुछ सोचा भी नहीं कि नहीं तो रहना मुश्किल हो जाएगा। जेल की तरफ से करवा और कैलेंडर सब को मिल गया था। मिठाई दस रुपए की एक पीस मिल रही थी। दिन भर ऐसे ही फल खा कर व्रत कर लिया था। शाम को आधे घंटे को पति-पत्नी मिलाए गए थे। पापा बड़े दुखी थे कि हर करवा चौथ में कितनी रौनक रहती थी । कितना खाना बनता था । फिर उन्हें समझाया कि एक करवा ऐसा भी सही। फिर भी यहां लड़कियों ने घेर कर मेंहदी लगा दी और पैर में रंग भी। शाम को कैंटीन में कढ़ी खरीदी। रात 8: 30 बजे पर बैरक का ताला खोल कर व्रत वाली सारी औरतें एक जगह इकट्ठा हुईं और चांद देख कर पूजा की। फिर वही मिठाई खा कर व्रत खोला और खाने में कढ़ी रोटी खाई। अपने फरे, बरे, पुआ सब बहुत याद आया । लेकिन फिर वही बेबसी। यहां एक महिला भी ऐसी नहीं थी जिस का पैर छू कर आशीर्वाद ले सकते। ये भी एक दिन है।

अंकित के प्लेसमेंट की ख़बर मिली। बड़ी मिक्स सी फीलिंग हुई। उस परिवार के लिए तो बहुत अच्छा हुआ लेकिन हम इतने बदनसीब कि हर पल उस बच्चे के साथ रहते हुए भी इस मौके पर उसे बधाई भी नहीं दे सकते। ज़िंदगी में कौन कितनी देर तक आप के साथ रहेगा कोई नहीं जानता। पूनम की सोचो कैसा करवा रहा होगा उस का इस बार? अपने से नीचे देखो तभी तसल्ली है नहीं तो सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा कि भगवान क्या दिखा रहे हो? बिना कुछ किए इतनी बड़ी सजा? पता नहीं जाने अनजाने क्या पाप हुए हैं? खैर अब तो जो है वो है। यही क्या कम है कि है था में नहीं बदला है। एक दिन संध्या से मुलाक़ात हुई । रमेश बहुत दुखी से थे कि लोग आते हैं तो बहुत अच्छा लगता है। जाते हुए नहीं देखा जाता। उन्हें भी यही कहा कि मानसिक मजबूती बना कर रखिए अपने हाथ में कुछ भी नहीं है। हम तो शारीरिक कष्ट के साथ यहां हैं। आप कम से कम स्वस्थ तो हैं।

उस दिन मौसी भी कोर्ट में भी बहुत रो रही थी। हमारे तो आंसू ही सूख गए हैं कितना रो सकते हैं? आखिर उन्हें ही समझाते रहे कि सब ठीक है। सब सही हो जाएगा। बस बच्चों का ध्यान रखना। गुड़िया भी मुझे समझा रही थी। बस यही तसल्ली है कि भगवान ने जब मुसीबत दी तो तुम लोगों को समझदार बना दिया था। कम से कम एक फ्रंट तो कूल है। तुम लोगों की चिन्ता तो नहीं है। वैसे तो बच्चे हो हमारे हमेशा ही चिंता रहेगी लेकिन हां समझदार हो अपनी ज़िंदगी काट सकते हो। सही निर्णय ले सकते हो।

कल यहां जो छोटा सा स्कूल है बाहर के एक स्कूल के बच्चे वहां दिवाली सेलेबेरेशन के लिए आए थे। उन की सजी धजी टीचर को देख कर बड़ा अजीब लग रहा था कि हम भी कभी ऐसे हो पाएंगे या नहीं। वो लोग बांटने की तरफ थे हम लोग लेने की। ये भी दिन था। हमें नहीं लेना था लेकिन ले-ले कर बच्चों को दिलाना था। पता नहीं भगवान अभी और क्या-क्या दिखाएगा समझाएगा।

ज़िंदगी के भी क्या-क्या रूप हैं? आज जब एक जगह बंद हैं तो समझ आता है कि फेमिली से ज़रुरी कुछ भी नहीं। जब भी मौक़ालगता है बच्चों और पति से बात कर लो । थोड़ा और समय हो तो भाई बहन से। बस इससे ज़्यादा किसी की तरफ ध्यान ही नहीं जाता कि कोई और भी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा कभी रहा है, बस फेमिली और फेमिली ही सबसे ज़रुरी है। सिमट कर कितनी छोटी दुनिया हो गई है मेरी। शायद ज़िंदगी के इसी मोड़ पर आकर इंसान रिजर्व हो जाता है और सिर्फ़ अपनों का ही हो कर रह जाता है। नए संबंधों या फार्मल रिलेशन से दूर हो जाता है।

ये सब इसी लिए लिखते रहते हैं कि हमारे अनुभव हैं, तुम्हारे काम आएंगे। बात तो आज कल हो नहीं पाती तो ऐसे ही लिख कर बात कर लेते हैं। कभी-कभी बिल्कुल मन नहीं करता कुछ भी लिखने का। फिर मन को समझाते हैं कि देश दुनिया में रहो। ऐसे विरक्त होने से काम नहीं चलेगा। आज नहीं कल ये गम के बादल छटेंगे ही।

बुलबुल बेटा तुम्हारी ज़िंदगी में संघर्ष ही संघर्ष है। एक दिन भी अपनी नौकरी का सुख नहीं उठा पाई। जब हम ही तुम्हारी नौकरी को इंज्वाय नहीं कर पाए तो तुम कैसे कर पा रही होंगी? बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रही होगी। नौकरी की खुशियां किस से बांट रही होगी? बहुत तकलीफ होती है ये सब सोच कर। तुम्हारी ज़िंदगी का गोल्डेन पीरिएड है ये। और ये तुम हम लोगों की वजह से इंज्वाय भी नहीं कर पा रही हो। कुछ दिन बाद शादी हो जाएगी फिर जिम्मेदारियों में ही फंस जाओगी। अपनी ज़िंदगी इंज्वाय कब करोगी? खैर क्या कर सकते हैं तुम्हारी क़िस्मत में यही है। हमारी क़िस्मत से तुम्हारी क़िस्मत भी जुड़ी है तो झेलना तो पड़ेगा ही न बेटा जी।

कल तो पूरा दिन हास्पिटल में ही निकल गया। लेकिन अभी काम नहीं हो पाया है। देखो कब ये रॉड निकलती है?
कल होटल में लंच किया पुलिस वालों के साथ एक नान खाई पनीर और मिक्स वेज के साथ। वापस आ कर जो गैस बनी कि क्या बताएं। रात तक खाली डकारते ही रहे। कुछ समझ ही नहीं आया। सादे खाने की ऐसी आदत हो गई है कि ज़रा भी हैवी खाना खाया ही नहीं जाता । खाया कि तबीयत ख़राब। दो महीने से सन्नाटे में रहने की ऐसी आदत हो गई है। कि सड़क पर इतनी भीड़ लग रही थी इतना शोर था कि घबराहट होने लगी। बाहर आने के बाद हफ़्ता भर लगेगा हमें नारमल लाइफ में आने में।

कल मैं ने सब को मिस कॉल दी थी लेकिन रिप्लाई सिर्फ़ मेरी बेटी का आया । सब से ज़्यादा जिम्मेदार और समझदार मेरी बेटी ही है। मी प्राउड आफ यू बच्चा। पता है इन परिस्थितियों में मुझे ये निश्चिंतता तो हो ही गई कि मेरे बच्चे समझदार हैं और अपनी ज़िंदगी अच्छे से जी सकते हैं। एक मां बाप होने के नाते अपने बच्चों की जो चिंता हमें रहती थी, उससे हम निश्चिंत हुए कि मेरे बगैर भी मेरे बच्चे बहुत अच्छे से रह सकते हैं।

पता नहीं तुम लोगों की दीवाली कैसी रही होगी? हमारी भी बीत ही गई। अपने मन को समझा लिया कि कोई दीवाली नहीं। ये भी जेल का एक आम दिन ही है। मन हटा लिया तो दिन काटना आसान हो गया। जेल में भी दिए और मोमबत्ती जलाई गई। रंगोली बनाई गई। हमने तो एक भी दिया न जलाया। बैरक बंद होते ही सुंदरकांड पढ़ा और लूडो खेला। फिर सो गए । बस पापा के पास जो एक घंटा थे वही रोते रहे। पापा भी दुखी थे। बोले हम लोग मिलते ही क्यों हैं ? रोने के लिए? पिछली दीवाली पर ये जानते थे क्या कि अगली दीवाली डासना में होगी फिर सोचा कि दिवाली के दूसरे दिन भी परेवा का दिन हम लोग जैसे मनाते थे आखिरी बार मना रहे हैं? पप्पू ही नहीं होगा अगली दीवाली पर। अब पटाखे कैसे जलाएंगे? मन करेगा क्या कभी? कितने शौक से हम लोग कहते थे कि दीवाली तो हम लोग दूसरे दिन मनाते हैं। अब वो तो सूना ही हो गया। खैर यही सब ज़िंदगी के उतार चढ़ाव हैं।

चलो ये दीवाली भी तुम लोगों को मजबूती ही दे कर गई होगी। वैसे तुम लोगों के लिए ज़्यादा मुश्किल था दीवाली का दिन काटना। ख़ुश चेहरों के बीच में उदास रह कर भी ख़ुश दिखने की कोशिश करना कितना मुश्किल रहा होगा। हम समझ सकते हैं। हमारे आस पास तो सारे ही उदास चेहरे थे। अपने आप को छुपाने की तकलीफ नहीं उठानी पड़ी। मेहनत नहीं करनी पड़ी। जैसे थे वैसे ही नजर आते रहे। क्योंकि सब यहां एक जैसे ही थे।

अब दीवाली तो निकल ही गई अब चाहे नवंबर में बाहर आएं चाहे दिसंबर में, बराबर ही है। ऐसा तो है नहीं कि यहां सांस नहीं ले पा रहे हैं। दिन तो कट ही रहे हैं। कल अपने भाई बहन भी बहुत याद आए।

तीसरी दीवाली थी जब मेरी बिटिया घर आई और हम ही घर पर नहीं थे। कल तुम लोग अपनी-अपनी जगह चले जाओगे। फिर मुदित तो दिसंबर में आएंगे , बिटिया जी का पता नहीं। देखो बुलबुल तुम्हें नौकरी करते-करते 6 महीना होने वाले हैं। प्रोवेशन पीरिएड भी ख़त्म होने वाला है। ये समय भी बीत ही गया। क्या कभी फिर पहले वाले दिन लौटेंगे? या अब ज़िंदगी ऐसे ही कटेगी? कभी-कभी तो बहुत दिल घबराता है फिर खुद को समझाते हैं, ‘‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत।’’ अपने मन को मजबूत करें सब सही होगा। यहां आने का दिन तय है तो यहां से जाने का भी तय है बस उस दिन के पहुंचने तक हमारी हिम्मत नहीं टूटनी चाहिए यही सबसे ज़रुरी है।

आज कल ठंड होने लगी है। यहां खुला हुआ बहुत है। आस पास आबादी भी नहीं है। शॉल, स्वेटर पहन ही नहीं सकते हाथ की वजह से। लग रहा है कोई नई बीमारी न पकड़ ले। मन भी नहीं लगता आजकल। ठंड की वजह से ज़्यादा निकलना भी नहीं होता। बैरक में ही बैठे रहो। जमीन पर हर समय बैठना घुटने मोड़े रहना बाप रे। सब कितना दुष्कर है। अपना घर, बिस्तर बहुत याद आता है। ‘‘ये सर्द रातें, ये तनहाइयां, ये नींद का बोझ हम अपने शहर में होते, तो घर गए होते।’’ यही बेबसी है अपने घर को तरस गए।

आज कल लिखने का भी मन नहीं करता। कितने निगेटिव हो गए हैं आज कल हम। हर समय शिकायत, शिकायत लेकिन क्या करें पाजिटिव कुछ है ही नहीं। दो दिन से न्यूज पेपर में धनंजय का पढ़ रहे हैं वो भी एक बुरी ही ख़बर है। कहीं कुछ भी अच्छा सुनने को नहीं मिलता तो मन उदास ही रहता है।

कल छठ है। यहां एक बिहारिन है वो पूजा करेगी। लेकिन जेल में क्या छठ, क्या पूजा। वो बहुत गरीब है। हमने पांच सौ रुपए उसे दे दिए कि अपनी पूजा का सामान ले लो। इस तरह से इस बार छठ पूजा में शामिल हुए हम।


आज ममता आई थी। उसे देख कर फिर एहसास हुआ कि हम बाहर क्या-क्या छोड़ आए हैं? कितनी चीजों से कट कर इंसान यहां बैठा है। 10 मिनट ही उसके पास बैठ पाए। ड्यूटी वाली सर पर ही खड़ी रही। कोई बात भी न हो पाई ढंग से। रमेश, मिस्टर जायसवाल की वजह से मुलाक़ात हो गई यही बहुत है। लेकिन उसके आने से तसल्ली हुई कि अभी भी लोग मेरे साथ हैं। हम पास्ट नहीं हुए हैं।

अच्छा इस समय जब लोग तुम लोगों से बात करते हैं, चिंता करते हैं, तुम्हारे साथ होते हैं तो अच्छा लगता है न? तो इसे हमेशा ध्यान रखना जो भी तुम्हारे साथ रहा हो चाहे तीन दिन ही रहा है उस पर बुरा वक्त आए तो उसके साथ ज़रुर हो लेना। ये न सोचना कि इंसान अच्छा है या बुरा इसने मेरे साथ गलत किया है। उस समय इन सब बातों का कोई मतलब नहीं होता बस चुपचाप उसके साथ खड़े होने का मतलब होता है।

पता है आज सोच रहे थे कि अगर बुढ़ापे में हमें वृद्धाश्रम में रहना पड़े तो बुरा नहीं लगेगा। आखिर जेल में भी रह ही रहे हैं। बच्चों से दूर यहां भी हैं, वहां भी। दुनिया से भी कटे हैं। वहां कम से कम फ़ोन तो होगा बात करने को। जब चाहेंगे बाहर भी जा सकेंगे। बंधन तो नहीं होगा। मतलब जेल में रहने के बाद अब कहीं भी रहा जा सकता है। इस से बुरी और कोई जगह नहीं होगी।

एट लास्ट हम फ्री हो ही गए हाथ की रॉड से। बड़ टेंशन था। कि अगर रॉड नहीं निकल पाई तो सेप्टिक न हो जाए। पापा को तो लगने लगा था कि हाथ काटना न पड़ जाए। बहुत मुश्किल है तुम्हारे पापा के पास पॉजिटिव रहना। कभी-कभी तो लगता है हम पागल न हो जाएं। अपने में ही इतना परेशान रहो ऊपर से उनकी निगेटिविटी। सच कभी-कभी तो लगता है इनसे मिलो ही न। बात ही न करो।

खैर छोड़ो आज तो हम रिलैक्स हैं कि डेट आगे बढ़ने का भी टेंशन नहीं हुआ हाथ में ही मगन हैं। शानू ने बहुत ही जिम्मेदारी से सारा काम किया। इतने साल बाहर रहने से जिम्मेदार हो गया है। बहुत तसल्ली मिली। अपना खून, अपने बच्चे अपने ही होते हैं। बुरे समय में आपकी फेमिली ही आपके साथ होती है। लेकिन रेशू चाचा लोग अपवाद भी होते हैं। वेसे ये बात सही है कि आप जिन के लिए करते हैं वो आप के बुरे समय में कभी आप के साथ नहीं होते। जिन की आप ने उम्मीद ही न की हो वही लोग आप के साथ चलते हैं आप के बुरे समय में। लेकिन ये भी सच है कि भगवान किसी को अकेला नहीं छोड़ता। किसी न किसी को आप की मदद के लिए भेज ही देता है। हम कितना परेशान थे कि अनजान शहर, अनजान लोगों के बीच कैसे ऑपरेशन होगा? एक मिनट को भी अकेले नहीं हुए। भाई हर समय फ़ोन पर साथ बना रहा , शानू को गाइड करता रहा, एनेस्थीसिया भी नहीं लेना पड़ा। डाक्टर भी सेट हो गया था। बहुत प्यार से बतियाते बतियाते 20 मिनट में सारा काम कर दिया और हम एक महीने से परेशान थे। अरे अब तो हाथ का मूवमेंट बचा है वो धीरे- धीरे आ ही जाएगा , जितना आना होगा।

कल पता चला मुदित भइया कि आप बिगड़ रहे हैं। घर के बाहर ही खड़े हो कर सिगरेट पी रहे थे। खैर आप समझदार हैं। आप का ज़िंदगी जीने का अपना नजरिया है जो ठीक समझ आए करिए। हम तो वैसे भी ऐसी जगह हैं जहां दूसरों की मोहताजी है हम क्या कर सकते हैं। करिए ऐसी ही बेवकूफियां। आप के बाप की बेवकूफियां भुगतते-भुगतते डासना पहुंच गए हैं। आप की बेवकूफियों से मेरा बुढ़ापा नरक हो जाएगा और क्या? खैर जो ज़िंदगी देगी वो तो लेना ही है।

आज कल वैसे भी बहुत डिटैचमेंट लगने लगा है। विरक्ति भाव मन में आने लगा है। सारी दुनिया चल रही है सब अपने में मस्त हैं। सब के काम चल ही रहे हैं। हमारे बिना कोई काम रुका नहीं है। तो अब फिर से ज़िंदगी के जंजाल में फंसने की क्या ज़रुरत है हम तो अपनी कचहरी और जेल से निपट ले यही बहुत है। आप लोगों के लिए बहुत कर दिया। अब इस से ज़्यादा मेरी ताक़त नहीं है। अपनी-अपनी ज़िंदगी खुद जियें आप लोग। हमारा तो कभी-कभी मन करता है कि हरिद्वार चले जाएं और वहीं बस जाएं। कुछ तो अपने लिए भी जिएं। जेल आ कर ये तो समझ आ ही गया है कि ज़िंदगी की ज़रुरतें बहुत थोड़ी हैं बाक़ीमाया मोह तो जितना बढ़ा लो बढ़ता ही जाएगा। लेकिन क्या ज़रुरत है बढ़ाने की? आप की जेनरेशन अलग है। उस की सोच अलग है, हम ज़बरदस्ती क्यों टांग अड़ाएं? आप सब समझदार हैं जैसे चाहें रहिए हमें मुक्ति दीजिए बस।

मेरी ज़िंदगी तो हमेशा ही ऐसी रही है कि कब क्या होगा नहीं पता। इतने अप एंड डाउन भगवान ने दिए हैं कि कमजोर कलेजे वाला होता तो दिल साथ छोड़ देता लेकिन हम तो बेशरम हैं। वैसे के वैसे ही हैं कोई असर नहीं होता। इतना समझाया आप को लेकिन कोई असर ही नहीं। पिता जी को हमेशा ही ये चिंता रहती है कि मुदित बिगड़ जाएगा। तुम उनके अंदेशों को सच करो बस और क्या? जब सब कुछ बिगड़ ही गया है तो तुम क्यों सुधरे रहो।

कल डाक्टर आए थे उन्हों ने बताया कि आप का हाथ बेस्ट पॉसिबिल पोजीशन में है। बड़ी तसल्ली मिली। देखने में तो हाथ बिलकुल सही है। बस एक्सरसाइज कर-कर के मूवमेंट लाना है और उस की कोशिश जारी है। जेल में रहते हुए जितना हो सकता है कर ही रहे हैं। ठंड ने जान मार रखी है । बिलकुल आदत ही नहीं है इस लाइफ स्टाइल की। बड़ी दिक्क़तहो रही है। ज़िंदगी में पहली बार च्यवनप्राश खरीदा है खुद से । और रोज सुबह एक चम्मच दूध से ले रहे हैं । ताकि कुछ तो गर्मी अंदर रहे। एक सेब भी खाते हैं रोज। शुगर भी कंट्रोल है। अब तो टेस्टिंग मशीन भी ले ली है। हर तीसरे दिन फास्टिंग चेक कर रहे हैं नॉर्मल ही है।


पता है जेल में रहने से ये हुआ कि सरकारी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में 24 घंटे भर्ती रहे लेकिन कोई दिक्क़तनहीं हुई। वहां की गंदगी, नर्सों की बदतमीजी किसी भी चीज़ने असर नहीं किया। जेल में रह कर इतना इंडिफरेंट हो गए हैं कि अब कहीं भी कैसे भी रह सकते हैं कहीं भी एडजस्ट हो सकते हैं। अब तो लोगों की बातें भी बुरी नहीं लगती। कोई कुछ भी कहता रहे। इतनी तरह की महिलाओं को देख रहे हैं कि बस पूछो नहीं। मेरी तो आंखें ही खुल गई है।

अब तो ढाई महीने हो गए धीरे-धीरे यहां रहते हुए। तुम लोग बाहर न हो तो लगता ही नहीं कि बाहर भी कोई दुनिया नहीं है। अब तो यही जेल की चहारदीवारी ही अपनी दुनिया लगती है। बिना फ़ोन के, फेसबुक के, अपने लोगों के भी रह ही रहे हैं। और अब तो शांति अच्छी लगने लगी है इसी में सुकून मिलता है।

आज यहां एक है उसने कहा कि उस ने हमें तिहाड़ जेल में देखा है। हमें बड़ी हंसी आई। फिर हम ने यही कहा कि ये मेरा पहला अनुभव है।

यहां बिमटेक की तरफ से एक हफ़्ते से कंपटीशंस हो रहे हैं। पी.जी.डी.एम. के बच्चे आते हैं कंडक्ट कराने के लिए। उन्हें देख कर अपनी बिटिया बहुत याद आई। हमने तो कहीं भी पार्टीसिपेट नहीं किया। क्यों कि बड़ा गिल्ट लगता है कि हम इस साइड पर हैं। आज तक उस साइड पर रहते रहे हैं। ज़िंदगी ने अचानक क्या मोड़ लिया है। पूरा तहस-नहस कर के रख दिया है। अब तो हम भी निगेटिव होते जा रहे हैं। लग रहा है सब कुछ छूटता जा रहा है। पता नहीं अब वो ज़िंदगी , वो लाइफ स्टाइल कभी वापस मिलेगी भी कि नहीं?

भोपाल की तीन टीचर्स भी फंसी हुई हैं ढाई महीने से। आज कह रही थीं कि लगता है हम हमेशा ही इसी चिल्ल पों में रहते आए हैं। कोई और भी ज़िंदगी कभी हमारी थी समझ ही नहीं पाते। लगता है जेल में कोई जादू टोना है कि कुछ भी याद नहीं आता। घर परिवार कुछ भी। हमने कहा ऐसा न हो तो यहां रहना ही मुश्किल हो जाए। हर समय घर को ही याद करते रहें। अरे जहां भी रहें वहां मन तो लगाना ही पड़ता है।

आज पता है हम अपने आप नहाये। खुद से ही कपड़े उतारे, नहाये और कपड़े पहने। सुमन बाहर खड़ी थी कि ज़रुरत पड़ेगी तो बुला लेंगे। लेकिन ज़रुरत नहीं पड़ी। आज पूरे चार महीने बाद खुद से नहाए। कितना सेल्फ सेटिस्फेक्शन हो रहा है कि बता नहीं सकते। लोग कह रहे हैं कि हाई कोर्ट में स्ट्राइक है। मन बड़ा परेशान है। कि क्या होगा आज तो तारीख़है। पता नहीं क्या होगा? अगर स्ट्राइक हुई तो फिर डेट आगे बढ़ जाएगी। पता नहीं क़िस्मत में क्या है?



हे हे हे! मेरी बेल हो गई। विश्वास ही नहीं हो रहा। विधायक जी ने सुनाली से ख़बर भिजवाई है । डिटेल तो पापा से शनिवार को मिलेगी। बस इतनी न्यूज मिली। सुनते ही रोना आया। अपने दोनों बच्चों की शक्ल आंख के सामने आई कि इस समय तुम दोनों को मेरे साथ होना चाहिए था। बहुत मिस किया तुम लोगों को? दांत ही अंदर नहीं जा रहे थे। बड़ी शांति मिली। अब देखो कितने दिन में परवाना आता है। लेकिन सुकून तो मिल गया। आखिरकार गप्पू की मेहनत सफल हुई। एक इसी ख़बर का तो इंसान दिन रात इंतजार कर रहा था। आज मिली तो विश्वास ही नहीं हुआ। अब और मन नहीं लग रहा। अभी तक तो यही समझा लेते थे कि ज़मानतही नहीं हुई है। अब तो एक-एक दिन काटना भारी हो जाएगा। लग रहा है अब तो बेकार यहां रुके हैं। टाइम वेस्ट कर रहे हैं अपना। जल्दी से अपने घर पहुंचें बस। घर , बच्चे आंखों के आगे से हट ही नहीं रहे हैं। कच्चे आम वाली टॉफी अपने बैरक में बांटी। सब पूछ रहे थे ख़ुश खबरी है क्या? हमने कहा नहीं मीठा खा कर दुआ करो कि ख़ुश खबरी आए। किसी को भी नहीं बताया कि लोगों की हाय लगती है।

कोई भी इंसान भगवान की लीलाओं को समझ नहीं सकता। अब पिछले घटनाक्रम पर नजर डालो तो सब समझ आता है कि जुलाई में अंतरिम बेल इस लिए मिली कि एक्सीडेंट होना था। अगर जेल में होते, एक्सीडेंट होता तो ऑपरेशन की सुविधा मिल पाती? आपरेशन से निपटे तो जेल। घर में तो नहाना धोना कुछ नहीं हो पा रहा था यहां एक दिन भी बिना नहाए नहीं रहे। अगर घर में इस समय होते तो गंधा ही जाते। तो भगवान ने ये बुरा समय यहां उतने अच्छे से निकाला । और अब जब फिजियोथेरेपी की ज़रुरत है तो बेल हो गई। कि जाओ अपना हाथ ठीक कराओ। पहले से सोचने लगो तो सोचते-सोचते पागल हो जाओ कि अब क्या होगा? सब उस पर ही छोड़ दो उस पर भरोसा रखो तो वो सब अपने हिसाब से अच्छा ही करता है। बस धैर्य रखने की ज़रुरत होती है और कुछ नहीं। हिम्मत रखने से ही सब होता है। ये तो मेरे लिए थे। बच्चों के हिसाब से भी ये सही समय था। बुलबुल का प्रोवेशन पीरिएड निपट गया। सिर्फ़ नौकरी ही करती रही तो एक पोजीशन बन गई। जिसके मां बाप जेल में हों वो और कर भी क्या सकता है। तो एक तरह से अच्छा ही हुआ न। मुदित भइया भी थोड़े गंभीर तो हुए ही। पढ़ाई में भी इंप्रूवमेंट आया। बुरे समय में लोगों की पहचान हुई। कुछ अनुभव तो मिला आप लोगों को। दुनियादारी की कुछ तो समझ हुई। बस एक ही गलत बात हुई कि मेरी बेटी की नौकरी करने के बाद पहली दीपावली थी जो बहुत ही धूमधाम से मनानी थी वो उतनी ही सूनी गई। और ये दिन अब दुबारा नहीं आएगा। बस इसी एक चीज़का अफसोस ज़िंदगी भर रहेगा। लेकिन इसमें भी भगवान की कोई मर्जी रही होगी जो हम अभी नहीं समझ पा रहे हैं।

इस चिट्ठी में मैं ने आप लोगों को सिर्फ़ प्रवचन ही दिए हैं। क्या करें जो भी मन में आता गया, लिखते गए कि इतना सारा निश्चिंत समय तो ज़िंदगी में कभी मिल नहीं पाएगा। बच्चों के लिए अपने अनुभव , अपनी हिस्ट्री लिख डालें। मेरे न रहने के बाद भी तुम लोगों के साथ ये रहेगा। कभी ज़िंदगी में दुविधा में पड़ो तो पढ़ लेना कि मम्मी की क्या सलाह हुआ करती थी।

पता है यहां इतने दिन अकेले रहने पर आत्म मंथन कर रहे थे कि आखिर भगवान ने यहां जेल तक पहुंचाया तो उस के पीछे कारण क्या था? इंसान गलतियां करता ही है न करे तो भगवान न हो जाए। लेकिन यहां सुकून से बैठ कर अपनी गलतियों को समझा जाना। उस का एनालिसिस किया और भगवान से मांगा कि इतनी शक्ति देना कि यहां से जाने के बाद दुनियादारी के चक्करों में फंसने के बाद दुबारा वो गलतियां न करूं। अपनी गलतियों को समझने के लिए ही भगवान ने यहां भेजा है कि समझो तुम से क्या बेवकूफियां हुई हैं। जिन की वजह से यहां पहुंचे। और अगर अब भी न सुधरे तो यहां से निकल और कहां जायेंगे? इस से बड़ा नरक क्या होगा। लेकिन ऐसा कम लोग ही सोच पाते हैं 90 प्रतिशत तो यही कहते हैं कि यही एक डर तो था अब ये भी निकल गया। यहां से निकल कर और यही सब करेंगे। ज़्यादा से ज़्यादा जेल ही होगी। फांसी तो चढ़ा नहीं देंगे। लेकिन मैं ने ये निगेटीविटी नहीं ली और भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि इतनी शक्ति देना कि दुबारा कमजोर न पड़ें और कोई ग़लती न हो। इतना मजबूत बना दो, अब तो कम से कम बुद्धि खुले। भांति-भांति की महिलाओं के बीच में इस तरह रहना नरक ही है।

यहां पर वर्चस्व की भी लड़ाई चलती रहती है कि मैं ही बॉस हूं। मैं तो चुप ही रहती हूं। सोचो मेरे स्वभाव के विपरीत है बिलकुल ये। लेकिन अपने मन को इस तरह से समझाते हैं कि नहीं ये तुम्हारा क्षेत्र नहीं है। चुप रहो। लेकिन बड़ा मुश्किल होता है। महिलाओं की मारपीट में जो कमजोर होता है उस की तरफ से न बोल पाने की बड़ी बेबसी होती है। अपने पर गुस्सा आता है लेकिन चर्चा में आना नहीं चाहते। पापा भी कहते हैं कि चुप रहा करो । लो प्रोफाइल पर रहो। किसी से मत भिड़ो। लेकिन बड़ा मुश्किल है । मेरे बगल में जो है बड़ी बदतमीज है तीन बार भिड़ चुकी है अब तक। बाद में अफसोस भी होता है कि क्यों उसके मुंह लगते हैं? अपनी सारी ताक़त खर्च हो जाती है। यहां रह कर यह भी सीख ही लिया कि लोग आपस में भिड़ते रहे और आप इनडिफरेंट रहे।

ज़िंदगी में हार या बुरा वक्त भी उतना ही ज़रुरी होता है जितना जीत या अच्छा वक्त। ये आप को आसमान से जमीन पर लाता है। बताता है कि हर समय जीतते ही रहोगे। ऐसा नहीं है। बुरे समय में अपने आस पास के लोगों को देख कर एहसास होता है कि ये भी एक दुनिया है। इन लोगों की भी ज़िंदगी है। दुखी सिर्फ़ हम ही नहीं है। हमारे जैसे लोग और भी हैं। ये दिन किसी पर भी आ सकते हैं। आप हमेशा ही आगे बढ़ते रहें। जीतते रहें ये नहीं हो सकता। जीत और हार दोनों को अपने दोनों कंधों पर ले कर चलना चाहिए। बैलेंस होना चाहिए आप की हार आप को घमंडी होने से बचा लेती है। शायद अब पापा और हमारी पर्सनालिटी में भी बदलाव आना चाहिए। वैसे पापा शनिवार को ख़ुश थे। कांता कह रही थी कि आज तो अंकल हंस रहे थे। लेकिन पता है अब जमानती की चिंता कि कैसे होगा? हमने कहा तुम तो अंदर हो जैसे सब ने मिल कर ज़मानतकराई है वैसे ही जमानती भी भरे जाएंगे। कभी तो ख़ुश हो लिया करो। लेकिन वो और भला ख़ुश हो लें। सब उन से पार्टी मांग रहे हैं। हमने तो दो तीन लोगों को ही बताया है कि फिर सब चिढ़ने लगती हैं और ये पुलिस वाली सब पैसा मांगने लगती हैं। अभी जाना कब है यह पता ही नहीं। पर अभी से मिठाई के पैसे बांटने लगो तो बांटते ही रहो। देखा जेल यात्रा ने हमें चालाक भी बना दिया है। किस के साथ कैसा व्यवहार करना है ये भी सीख ही रहे हैें।

आखिर चांदनी तलवार भी आ ही गई। शाम से बड़ी गहमा गहमी है। जेलर, सुपरिटेंडेंट सब के सब राउंड लग रहे हैं। वो पहले भी आ चुकी है तो जो लोग उस समय भी यहां थे और अभी भी हैं। उन्हें देख कर तसल्ली रख रही थी कि ये भी तो हैं। बड़ा अजीब लग रहा था उन्हें देख कर। कह रही थी कि मई , 2008 से पहले कभी नहीं सोचा था कि ज़िंदगी में ये दिन भी आ सकता है। एक हम दोनों को छोड़ कर पूरी दुनिया की बेटी हो गई थी वो। सब दुखी हैं एक हम दोनों को छोड़ कर। सही बात है। मां बाप से ज़्यादा बच्चे को कौन प्यार कर सकता है?

चांदनी अपने पति के साथ जेल आई हैं। अपनी बेटी की हत्या के जुर्म में। हाई प्रोफाइल मर्डर बन गया था अनुष्का का मर्डर। चौदह साल की बेटी का मर्डर। आनर किलिंग कहा गया। मीडिया ट्रायल भी ख़ूब हुआ। तब के प्रधान मंत्री के डेंटिस्ट थे चांदनी के पति। लगा कि एक बार सब को दबा ले जाएंगे। सी.बी.आई. जांच में क्लीन चिट भी मिली लेकिन सी.बी.आई. अदालत ने नहीं माना। उत्तर प्रदेश पुलिस के विपरीत थी सी.बी.आई. जांच। सी.बी.आई. जांच में भी दो राय थी। अदालत ने आजीवन कारावास सुना दिया। हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट कहीं से भी राहत नहीं मिली है अभी तक। पैसा, रसूख कुछ भी काम नहीं आया। फ़िल्म भी बनवाई चांदनी के पति ने इस पूरे मामले पर अपने को सही साबित करने के लिए। पर सब बेअसर। लेकिन चांदनी तो चांदनी। मां जो ठहरी। मां बेटी को याद करती रहती है। बिलखती रहती है चांदनी।

मुझे भी दो दिन से अपनी बेटी बहुत याद आ रही है। लग रहा है तुम कुछ अपसेट हो, बराबर तुम्हारा ही ध्यान आ रहा है। मन कर रहा है जब यहां से निकलूं तो तुम सामने हो। तीन महीने से तुम से ढंग से बात ही नहीं हो पाई है। सिर्फ़ काम की बातें ही हो पाई हैं। तुम आई भी तो छोटे गुड्डू साथ थे तो भी तुम से बात नहीं हो पाई। मुदित तो दो तीन बार पेशी पर आ चुके हैं तो उन से हर तरह से बात हो गई है। तो थोड़ी तसल्ली है तुम्हें तो ढंग से देख भी नहीं पाए इतने दिनों से। अब तुम्हारी जिम्मेदारी पूरी करने का समय आ गया था। घर भर के कितने अरमान थे तुम्हारी शादी के। समझ ही नहीं आ रहा कि अब सब कैसे होगा? तुम्हारी ज़िंदगी का सब से बड़ा दिन कैसे क्या हो पाएगा? अपनी शादी के अरमान भी तुम्हारी शादी में निकालने थे। लेकिन पता नहीं भगवान की क्या मर्जी है? हम तो समझ ही नहीं पाते कि भगवान हमें चैन से क्यों नहीं जीने देते। इतने उतार-चढ़ाव और मेरे साथ-साथ तुम भी झेलती हो। तुम्हारे बचपन में जब हम नौकरी करते थे तो घर का सारा काम निपटा कर ताला बंद कर इतनी छोटी सी उमर में अकेले स्कूल जाती थी। थोड़ा और बड़े होने पर अकेले घर के काम निपटाते हुए पढ़ती थी। बोर्ड के पेपर में तुम्हें अकेले छोड़ कर सब गांव चले गए। 17 साल की उमर में ही घर से दूर रहने लगी। और अब इतनी बड़ी जिम्मेदारी कि मां बाप जेल में हैं। छोटे भाई को भी देखना। घर भी देखना और अपनी नौकरी भी करना। हम होते तुम्हारी जगह तो नहीं कर पाते। मी प्राउड आफ यू मेरा बच्चा! भगवान तुम्हें आगे की ज़िंदगी में कोई भी दुख न दे। मेरे हिस्से की भी सारी खुशियां मेरे बच्चों को मिल जाएं। वैसे एक बात तो है तुम लोगों को अपनी ज़िंदगी के बहुमूल्य अनुभव हमारी ज़िंदगी में ही मिल गए। जैसे रिशू को भी सारे अनुभव धीरे-धीरे मिल रहे होंगे। लेकिन अपने बाप की कीमत पर। बाप तो अब नहीं मिलेंगे। इस मामले में तुम लोग भाग्यशाली हो कि दुनियादारी लोगों की समझ भी आ गयी और मां बाप भी साथ ही हैं। ये दिन तो आते जाते रहते हैं। पर ऐसा कोई नुकसान नहीं हुआ जिसकी भरपाई नामुमकिन हो।

बधाई हो बुलबुल बेटा आज आपका प्रोबेशन पीरिएड ख़त्म हो गया। अब आप के पास पक्की नौकरी हो गई। मतलब आप की पढ़ाई ख़त्म हुए 6 महीने हो गए। कितनी तेजी से ये दिन भी बीत गए। अब तो आप मेच्योर लोगों में गिनी जाने लगेंगी। अरे आप ने तो अब तक डेढ़ लाख कमा भी लिए। वाह जी वाह आप तो लखपति हो गई। क्या बात है मेरी लखपति बिटिया। बस ऐसे ही मजबूती से नौकरी किए जाओ। अपनी ज़िंदगी में आगे ही आगे बढ़ते जाओ। भगवान तुम्हें ख़ूब मजबूती दे। अब तो कंपनी में तुम्हारी एक जगह बन गई होगी। बस उसे बनाए रखना। लेकिन नौकरी के साथ ज़िंदगी में और भी बहुत कुछ है। सब सुख साथ में लो ये दिन दुबारा नहीं लौटेंगे। हम ने अगर तुम्हारी शादी कर दी तो फिर मत कहना कि अभी तो हम ने ज़िंदगी जी ही नहीं है।

आज कल दिन बहुत धीमे-धीमे बीत रहे हैं। ज़मानतके बाद का समय नहीं कटता है। कोई ख़बर भी नहीं मिल पा रही है कि बाहर क्या हो रहा है? हम तो यहां बैठे सिर्फ़ परवाने का इंतजार कर रहे हैं। लग रहा है 10 दिसंबर  हो ही जाएगा। पता नहीं कितने दिन लगेंगे। जितने दिन की जेल की रोटी लिखी है खानी ही है। सब कुछ जानते समझते हैं, पर मन अब बिलकुल नहीं लगता। सपने भी घर के ही आते हैं।

समझ ही नहीं आता आज कल समय कैसे कटे? किसी भी चीज़में मन नहीं लगता। बहुत बड़े-बड़े दिन लग रहे हैं। हर चीज़से विरक्ति लगती है।

आज तुम लोगों की बहुत याद आ रही है। रात भर घर के ही सपने आते रहे। अपनी फिगो दिखी रात सपने में। कितनी खुशी हुई गाड़ी देख कर कि बस। छोटी-छोटी चीजें कैसे आप के मन में बसी होती हैं। आप को एहसास भी नहीं होता। जब उन से दूर रहिए तभी समझ आता है। एक दिन तो बहुत गुस्सा आ रहा था कि पेशी पर जाएंगे तो किसी भी बच्चे से बात नहीं करेंगे कि हमारी किसी को चिंता नहीं है। ज़मानतहोने के बाद भी इतना समय लग रहा है। सब अपने में मगन हैं। बीमार मां की चिंता ही नहीं है। लेकिन रविवार को गप्पू आए तो पता चला कि तुम लोग भी उतना ही परेशान हो कि ठंड बढ़ रही है मम्मी को परेशानी हो रही होगी। प्रबल बोले कि हम ने गप्पू को फ़ोन किया कि ज़मानतहुए इतने दिन हो गए हैं जमानती क्यों नहीं भरे गए। मतलब जमानतदार खुद ही परेशान हो रहे हैं। तो तसल्ली हुई कि हां काम चल रहा है एक-एक स्टेप आगे बढ़ रहा है।

अब तो धीमे-धीमे सब की ज़मानत हो रही है। एम.लाल भी चला गया है । मनहूसियत तो दूर हो रही है, रमेश चाचा की शक्ल क्या चमक रही थी। देख कर बड़ा अच्छा लगा। विधायक जी ने तो महिला बैरक में गुलाब जामुन भिजवाए कि हमारी भाभी जी (हा हा) वहां हैं बटवा देंगी। यहां सब मेरी बड़ी तारीफ कर रही थीं कि ये डाक्टर बड़ी अच्छी है। ज़मानतहोने पर गुलाब जामुन खिला रही है। आज कल रोज ही कुछ न कुछ मीठा खाने को मिल रहा है। वैसे भी जब से चांदनी आई है कुछ न कुछ मिल ही जाता है। कल रेडी टू ड्रिंकसूप मिला था पीने को, दिन बीत ही रहे हैं।

जेल से ही एक सरदार लड़की रिहा हो कर गई थी । वो मुझ से मिलने आई थी। ढेर सारा खाने पीने का सामान ले कर, बड़ा अच्छा सा लगा। पापा को किसी लंबरदार ने बता दिया कि आंटी की मुलाक़ात आई थी। बड़े परेशान थे कि कौन आया था। जो सिर्फ़ इन से मिल कर चला गया। हम से नहीं मिला। पापा भी न क्या-क्या सोचते हैं।

रोज इंतजार करते हैं कि आज परवाना आएगा कल ड्यूटी वाली रमेश चाचा से पूछ कर भी आई तो बता रही थी कि कल आएगा परवाना। मिठाई मांग रही थी, मतलब पैसे से ही होता है। चाहे जितना दे दो कम ही होता है इन लोगों के लिए। लेकिन हम ने अभी तक किसी को कुछ भी नहीं दिया है।

पता नहीं क्या हो रहा है हमें समझ ही नहीं आ रहा। एक-एक दिन से बाहर निकलना दूर होता जा रहा है। पता नहीं भगवान क्या चाहते हैं? कब निकालेंगे। यहां से। इस से अच्छा तो ज़मानतही न हुई होती। ये बेचैनी, घबराहट तो नहीं होती। यही कह कर संतोष करते रहते कि ज़मानतही नहीं हो रही। ज़मानतहोने के बाद ये सब समझ नहीं आ रहा। यहां रहना भी मुश्किल होता जा रहा है। राजनीति बढ़ती जा रही है। जहां आप को रहते ज़्यादा दिन हो जाते हैं, वहां जुड़ाव बढ़ ही जाता है। आप का नाम भी आने लगता है। न चाहते हुए भी राजनीति का शिकार बन जाते हैं। हम कुछ ज़्यादा बोलते नहीं हैं कि हाईलाइट नहीं होना है। इस पूरे प्रोसेस में बड़ी ताक़त खर्च हो जाती है। दिमाग ख़राब हो जाता है। हम से बाद-बाद में जिन की ज़मानतहुई है वे सब चले जा रहे हैं हम ऐसे ही बैठे हैं। एक डर ये भी लगा रहता है कि निकलने से पहले दूसरी चार्जशीट आ गई तो बस फिर पता नहीं कितने दिन और रहना पड़े। छोटे गुड्डू बता रहे थे कि अमलेंदु भइया ने कहा है कि 15 दिसंबर से पहले मुश्किल है उस के बाद कोई अड़चन नहीं आएगी। तो अब कल 15 दिसंबर भी आ ही जाएगा। देखें इस के बाद कोई रोक आती है कि नहीं। अब तो हम भी बहुत निगेटिव हो गए हैं। तुम लोगों से किसी से भी बात करने का मन नहीं करता है। अब बस यही इच्छा होती है कि जेल से बाहर निकल कर अपने बच्चों के बीच में बैठ कर उन से बात करें। सब कुछ सपना हो गया है। पता नहीं कब ये दिन आएगा कि पूरा परिवार एक साथ होगा?

बहुत मन कर रहा है तुम लोगों से बात करने का लेकिन हिम्मत नहीं हो रही बिलकुल भी। अब हौसला टूटता जा रहा है। जैसे-जैसे ठंड बढ़ रही है लग रहा है यहां से निकल ही नहीं पाएंगे। अब ज़िंदगी यहां बीतेगी। कल मेरे बैरक से चार-चार लोगों की रिहाई हुई। लेकिन हम यहीं के यहीं हैं। रात के सपने में तुम दोनों ही नजर आते हो।
अभी तक तो अपने आप को दाल रोटी पर एडजस्ट कर रखा था लेकिन अब ठंड में क्या करें। शाम को 5 बजे का खाना अगर आठ बजे भी खाने बैठो तो वो पानी हो चुका होता है, बिलकुल बर्फ जैसा ठंडा। रात में बिलकुल खाना नहीं खाया जा रहा अब सोच रहे हैं आज से रात में इंसुलिन नहीं लेंगे और एक ब्वायल्ड एग और एक ग्लास दूध पी लेंगे। दूध तो गरम करके डिब्बे में बंद कर के शाल में लपेट कर रख लो तो आठ बजे तक गुनगुना तो बना ही रहता है। ज़िंदगी में कितना संघर्ष है। खाना भी कितना मुश्किल है आज समझ आ रहा है। भगवान अभी और न जाने क्या-क्या समझाएंगे? अब तो हम भी पत्थर होते जा रहे हैं।

आज तीन दिन से भंडारा बंद है। चाय, पानी हर चीज़के लिए तरस गए हैं। खाना भी जेल वाला ही आता है। एक रोटी किसी तरह से निगल लेते हैं दोनों समय जिंदा रहने के लिए। कुछ भी समझ नहीं आ रहा। कोई ख़बर भी नहीं मिल पा रही है। ठंड भी इतनी बढ़ गयी है बारह बजे तक कोहरा ही रहता है। शाम को छह बजे बैरक में बंद हो जाते हैं, सुबह सात बजे बैरक खुलता है। 13 घंटे उसी फट्टे पर पड़े-पड़े बिताना पड़ता है। सच है ज़िंदगी आसान नहीं होती।

चलिए जी अब तो नया साल भी यहीं मनाना है। पता नहीं भगवान की क्या मर्जी है? जब 2013 शुरू हुआ था तो किसे पता था कि इस का अंत डासना जेल में होगा। चलिए जी उस की रजा में ही राजी होना है। आप सब अपना 100 प्रतिशत दे रहे हैं। बाक़ीहमारी क़िस्मत से नहीं लड़ सकते न आप लोग। मुदित भइया अपने मामा जी के बड़ा करीब आते जा रहे हैं। अच्छी बात है। अपने खून का जुड़ाव तो होना ही चाहिए। दीदी जी आप भी थोड़ा जुड़िए सब से। चलिए कोई नहीं । आप अपने भाई से ही जुड़ी रहिए काफी है। पता नहीं आप की नौकरी कैसी चल रही है? बताओ अगले महीने तुम 24 साल की जा जाओगी ये साल तो इतनी जल्दी बीत गया चाहे बुरा ही सही लेकिन पता नहीं चला। अब तुम्हारी शादी की चिंता होने लगी है। 25 साल में तो शादी हो ही जानी चाहिए न। एक दिन सपने में भी तुम्हारी सगाई देख रहे थे। झउआ भर-भर के फल और मिठाई का बैना बांट रहे थे।

मैरी क्रिसमस आप सब को। आज पांच दिन बाद सूरज निकला है अच्छा सा क्रिसमस है आज तो। आप लोग क्या कर रहे होंगे? छुट्टी का दिन है आज। ये साल भी ख़त्म हुआ जा रहा है। अब तो जी ऊबने लगा है।

नया साल आप सब को बहुत-बहुत मुबारक हो। चलिए जी 2014 भी शुरू हो गया। शायद 2013 का कोढ़ अब ख़त्म हो। 2014 तो सही से शुरू हो। बहुत बुरा ही सही 2013 लेकिन बीत ही गया। हमने भगवान जी से कहा नया साल आप को मुबाकर हो और हमारा भी मुबारक कराओ।

जेल में आने से ये तो एहसास हुआ कि मेरी दुनिया सिर्फ़ मेरे बच्चे हैं। हर चीज़हर इंसान के बिना जी सकते हैं पर बच्चों के बिना नहीं। हमें भगवान से कोई शिकायत नहीं। उस ने जैसे रखा हम रहे। खाने की कोई शिकायत नहीं, जमीन पर सोने की कोई शिकायत नहीं, इस ठंड में ठंडे पानी से नहाने की भी कोई शिकायत नहीं। ये तो शरीर है इसे जितना तपायेंगे निखरेगा ही। जितना शरीर बर्दाश्त कर पाएगा उतना झेल ही लेंगे। दुनिया समाज से कट कर जीना भी मेरे जैसे सामाजिक प्राणी के लिए बहुत मुश्किल है। लेकिन वो भी चलो भगवान की मर्जी। जिन लोगों के बीच जैसे भी रखोगे रहेंगे ही। लेकिन बच्चों के बिना जीना नामुमकिन है। एक-एक दिन काटना पहाड़ हो जाता है। कहीं भी मन लगाने की लाख कोशिश करो लेकिन लगता ही नहीं तुम ही लोगों पर अटक जाता है। तब भगवान से बहुत शिकायत होती है कि बच्चों को दूर करना ही था तो हमें दिए ही क्यों। कोई कैसे अपने बच्चों के बिना जी सकता है? फिर विवेक चाचा लोगों का ध्यान आता है कि वो लोग कैसे प्रिंसी के बिना जी रहे होंगे। हमारी तो फिर भी 14 दिन में बच्चों से बात तो हो ही जाती है। चांदनी को भी देखते हैं तो लगता है कि बाहर की दुनिया में इन के लिए क्या बचा है? चांदनी के इतने बूढ़े मां बाप हर तीसरे दिन आते हैं मिलने। मां बाप के लिए बच्चे चाहे जितने बड़े हो जाएं बच्चे ही रहेंगे यही सब हर समय दिमाग में चलता रहता है। कभी-कभी तो सर बिलकुल फटने को हो जाता है। चलो जी फिर यही सोचते हैं। उस की रजा में राजी होकर ही ज़िंदगी बिताई जा सकती है। उस से लड़ कर नहीं।

आप लोग पता नहीं कैसे रह रहे होंगे? मुदित भइया इतने दिन की छुट्टी पर घर में अकेले कैसे रह रहे होंगे? अब तो जाने का समय आ रहा है। इन का तीसरा सेमेस्टर भी निकल गया। अब 5 सेमेस्टर और बचे हैं। धीरे-धीरे सब बीत ही रहा है। हमारी बिटिया को नौकरी करते 7 महीने हो गए। बस घूम फिर कर पूरी दुनिया बच्चों में ही सिमट गई है।

आज मुदित भइया आए और मुझसे मिल भी न पाए। इस से ज़्यादा बेबसी क्या हो सकती? इक दीवाल की वजह से न मिल पाई। मेरी छटपटाहट इतनी थी कि चिड़िया बन कर उड़ जाऊं। इक दीवाल के पार मेरा बेटा है और मैं उसे देख भी नहीं सकती। ये जेल अभी और क्या-क्या सिखाएगी। फल देखते ही मुझे समझ आ गया कि मुदित आए होंगे। खैर चलो थोड़ी मजबूती ही और आई। देखें भगवान अभी और क्या-क्या परीक्षाएं लेंगे।

आज पापा से डेट अच्छी रही। पॉजिटिव ही सुनने को मिला। थोड़ा मूड भी उन का अच्छा ही था। चलो देखते हैं, अब और कितने दिनों की जेल बची है। वैसे थोड़ा खट्टा थोड़ा मीठा कर के दिन बीत ही रहे हैं। साढ़े चार महीने हो ही गए।



डासना जेल, गाज़ियाबाद
10 दिसंबर, 2015


आज जेल के फाटक पर पहुंच कर भी कोई फिलिंग नहीं हुई। पहली बार का याद आया कि आंसू थम ही नहीं रहे थे। कि अब क्या होगा? और पांच महीने बाद जब 14 जनवरी, 13 की शाम को बाहर निकल रहे थे तो मन में यही विचार था कि भगवान अब दुबारा यहां न आना पड़े। अगर आना ही पड़ा तो मैं मर जाऊंगी। लेकिन मरना क्या यहां तो एक आंसू भी न था आंख में। तो क्या अब मैं बेशर्म हो चुकी हूं? या कोई भी परिस्थिति आप पर एक ही बार असर डालती है क्यो कि आगे क्या होगा का भय रहता है। इस बार तो सब पता था कि इस के बाद क्या होगा। तो भगवान से यही प्रार्थना थी कि बस इन परिस्थितियों से जूझने का हौसला देते रहना। और बच्चों का ध्यान दिमाग से हटाते रहे थे कि वही एक कमजोर कड़ी है। उन के बारे में सोचते ही आंसू अपने आप ही आने लगते हैं और पिछली बार बिना विचलित हुए उन्हों ने ये समय काटा था तो उन पर भरोसा है कि वो इस बार और भी मजबूती से ये दिन काट लेंगे। और सब से बड़ा विश्वास ये था कि ये बाहर हैं। इन के बाहर रहते मुझे चिन्ता करने की क्या ज़रुरत? ये सब अच्छा ही करेंगे। मेरे रहते ही ये कमजोर रहते थे मेरे बिना तो ये सब अच्छे से संभाल ही लेते हैं। इस लिए मुझे सिर्फ़ अपना समय काटना है धैर्यता से। ज़्यादा सोच विचार की ज़रुरत ही नहीं। बस इनकी हेल्थ की चिंता रहती है।


लेकिन चलो जब अकेले रहेंगे तो अपना भी ख्याल रखेंगे ही। उन्हें भी पता है कि सब कुछ उन्हें ही संभालना है तो उन का ठीक रहना कितना ज़रुरी है।


आज शाम को जब सुंदर कांड पढ़ते-पढ़ते रोने लगे तो पुरानी लड़कियों ने समझाया आंटी आप तो 11 महीने बाहर रह आईं हम तो निकल भी न पाए। तब लगा वाकई हम तो भाग्यशाली हैं कि कुछ दिन तो बाहर रह आए। लेकिन ये बच्चियां तो बाहर दो साल से गई ही नहीं। न ही इतने दिनों तक कोई लगातार मिलने आ सकता है तो बेचारी ये सब भी तो रह ही रही हैं इन के सामने मुझे रोने का कोई हक नहीं और अपने आप ही सब्र आ गया। कि हम अभी बहुतों से अच्छे हैं।

कितने नए चेहरे हैं और कितने ही पुराने चेहरे भी हैं। 75 प्रतिशत पुराने चेहरे नहीं दिखे तो लगा कि सही में कोई भी यहां रह ही नहीं जाता है। बाहर तो सभी निकलते हैं बस हमें पता नहीं होता कि कितना समय यहां रहना है। थोड़ी सकारात्मकता तो बढ़ी।

यहां पर सब कुछ बदल गया है प्रशासन भी, व्यवस्था भी। कुछ कोई भी व्यवस्था स्थायी नहीं है। इस बार चीजें शुरू से ही समझ में आने लगी हैं। सब कुछ पहचाना सा है।

आज शनिवार है। शनिवार महिला बैरक के लिए त्यौहार जैसा होता है, सुबह से ही नहाने धोने नाश्ते-पानी के लिए मार होने लगती है। जिन महिलाओं के घर वाले इसी जेल में पुरुष बैरक में बंद होते हैं जेल प्रशासन उन की हर शनिवार को आधे घंटे की मुलाक़ात कराता है। पिछली बार मैं भी उस मेले का हिस्सा थी क्यों कि मेरे पति उस तरफ थे। शनिवार को मैं भी अपनी धुन में रहती थी। इस बार अलग खड़ी देख रही थी। इन महिलाओं की खुशी, चमकते चेहरे सब अलग-अलग कहानी बताते हैं। ये भी जेल में है लेकिन कुछ न कुछ खाने का साथ बांध कर ले जाती हैं। उन को खिलाने की ललक, जाने की उत्सुकता और लौटने पर इन्हीं महिलाओं में से कुछ संतुष्ट चेहरे कुछ घर वालों से मिलने की खुशी और कुछ उदास चेहरे। रोते हुए लोग कुछ उदासी की ख़बर लिए हुए कि ज़मानतनहीं हुई या जमानती नहीं मिल रहे या घर वाले की तबीयत ठीक नहीं। कुछ दुबले लग रहे थे। कुछ महिलाएं रोती कुछ ख़ुश । और हमारे जैसे लोग निर्विकार भाव से देखते हुए। लोगों की खुशी बांटते, उन के आंसू पोछते हुए उन्हीं का हिस्सा बन जाते हैं।

आज मुस्कान से बात हुई तो पता चला कि उस का पति भी 6 महीने पहले ज़मानतपर चला गया। बेचारी तीन साल पहले आई थी सात महीने का बच्चा पेट में ले कर भाभी की हत्या में। अब तो बच्चा ही तीन साल का हो रहा है। पूरा परिवार अंदर आया था माता , पिता , भाई, पति और मुस्कान। सब की ज़मानतहो गई थी। धीरे-धीरे सभी चले गए । यही रह गई कि जमानती नहीं भर पा रहे हैं। हम लोग ज़मानत के लिए परेशान हैं कि किसी तरह ज़मानतहो जाए और ये लोग ज़मानतहोने के बाद भी दो-दो साल से यहीं पड़े हैं। बच्चे भी बड़े होते जा रहे हैं। हाय रे गरीबी। पिछली बार जाड़े में दो बुढ़िया झांसी से लाई गई थीं। उन की हालत देख कर तरस आता था। झुकी हुई कमर। दुबली पतली दोनों। पहनने को कपड़े भी नहीं। कुल मिला कर बड़ी दयनीय स्थिति थी उन की। और इस बार तो दोनों बुढ़िया इतनी टनाटन लग रही हैं कि क्या कहें। कमर बिल्कुल सीधी, जेल से जाने वाले अपने कपड़े छोड़ जाते हैं तो अच्छे कपड़े पहने हुए और जेल का खाना भी इन्हें रास आ गया है। महिला सिपाहियों के आगे पीछे घूम कर उनकी चापलूसी कर के अपनी जगह भी बना ली है। आज देख लिया कि कैसे लोग परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाते हुए अपने को कंफरटेबल कर लेते हैं। क्यों कि जीना तो हर हाल में है।

बैरक में रहना बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे आप प्लेटफार्म पर बैठ कर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं। कि कब ट्रेन आएगी? डेढ़ हाथ की जगह मिलती है जिस पर अपना बिस्तर बिछाना होता है। इसे फट्टा कहते हैं। जेल की तरफ से एक कंबल बिछाने को और एक कंबल ओढ़ने को मिलता है। और इसी की सीध में सीखचों के सामने अपना सामान रखना होता है। बस इतनी ही जगह आप को मिलती है। और इस को बनाए रखने का संघर्ष भी रोज का है। अगला आप की तरफ अपना सामान बढ़ाता ही जाता है कब्जा करने के लिए।

45 लोगों के बीच में एक वाशरूम है। दिन में तो कोई बात नहीं, बैरक खुला रहता है आप बाहर के वाशरूम में भी जा सकते हैं लेकिन बैरक बंद होने के बाद उसी एक वाशरूम का सहारा होता है। सुबह आंख खुलने पर चुपचाप लेटे-लेटे वाशरूम को देखते रहते हैं उस के आगे लाइन लगी होती है लेकिन लेटने से क्या होता है? आप को भी उस लाइन का हिस्सा बनना पड़ता है तभी नंबर आएगा नहीं तो लेटे-लेटे देखते रहो। वाह रे ज़िंदगी , रोज जिंदा रहने का संघर्ष।

दहेज हत्या अधिनियम का कितना दुरुपयोग हो रहा है ये जेल आ कर ही पता चला। लड़की वाले अपनी लड़की की मौत को भुनाते हैं और उस पर राजनीति करते हैं, अपना इगो संतुष्ट करते हैं। इधर लड़की मरी नहीं, उधर लड़के का पूरा परिवार जेल के अंदर चाहे वो बुजुर्ग पिता हो या कम उम्र ननद। शादीशुदा ननद जो साथ में न रहती हो वो भी अंदर आ जाती है। कोई सुनवाई ही नहीं है और सेशन से ज़मानतभी नहीं है। हाईकोर्ट से ही ज़मानतमिलती है। वो भी लंबे समय बाद। इस बीच लड़के वाले उन सब परेशानियों से घबरा कर लड़की वालों से समझौता कर लेते हैं। लड़की वाले मोटी रकम मांगते हैं और लड़के वाले जेल कचहरी की भागदौड़, समय और उस में खर्च होने वाली राशि को ध्यान में रख कर, जो रकम लड़की वाले मांगते हैं दे ही देते हैं। और इस तरह ये केस ख़त्म होता है। इस तरह के एक नहीं पचासों केस देखे हैं इस जेल में। जो पैसे नहीं दे पाते उन के पूरे के पूरे परिवार ख़त्म हो जाते हैं। बच्चे यहीं पैदा हो के बड़े भी हो जाते हैं। बच्चों का बचपन ख़त्म होते देख अच्छा नहीं लगता। जिन्हें जेल का मतलब भी नहीं पता वो चार पांच साल जेल में गुज़ार देते हैं। आखिर उन की ग़लती क्या है? ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई से वो बचपन से ही अवगत होने लगते हैं।

आज पूरे एक हफ़्ते बाद पतिदेव की शक्ल दिखी। घर के हाल चाल मिले। सब की कुशल मंगल जान कर दिल को तसल्ली हुई। जेल में रहते हुए सब के हाल मिलना भी एक नियामत है। मेरा तो सात दिन में ये हाल हो गया और यहां महिलाओं को महीनों से कोई हाल ही नहीं मिलता है। ऐसी ही एक महिला है वनिता जो अपनी साढ़े तीन महीने की बेटी ले कर जेल आई थी। आज वो बेटी साढ़े चार साल की हो गई है। उस पर आरोप है कि डिलीवरी टाइम पर उस की चचेरी बहन सेवा के लिए आई थी जिस को इसी के पति के साथ प्रेम हो गया उन के संबंध बन गए। पता चलने पर वनिता ने अपनी बहन की हत्या कर दी। अब बेचारी अपने पति के साथ जेल में है। उस की बड़ी बेटी अपनी दादी के पास है जिसे इस ने चार साल से देखा ही नहीं है। ससुर का देहांत हो गया है पति ही सब से बड़े थे। सारी जिम्मेदारी उन्हीं के ऊपर थी। पूरा परिवार बिखर गया। वनिता के पिता 70 साल के हैं। वो तो बेचारे कचहरी की भाग दौड़ भी नहीं कर सकते। कोई मिलने तक नहीं आता। छोटी बेटी का बचपन यहीं बीता जा रहा है। केस फाइनल स्टेज पर पहुंच गया है। फ़ैसलाचाहे जो हो लेकिन पूरा परिवार तो बिखर ही गया है। उस मां की सोचें जिस का आदमी जवानी में ही नहीं रहा और बेटा 302 का मुजरिम हो कर चार साल से जेल में है और जुर्म साबित हो जाने पर आजीवन कारावास की सज़ाभी हो सकती है। भगवान तेरी दुनिया में क्या-क्या होता है।

पिछले जेलर काफी अनुशासन प्रिय थे। अनुशासन प्रिय तो ये भी हैं लेकिन खुले दिल विचारों के हैं। सभी बंदियों तक उन की पहुंच है। बीच में कोई भी बाधा नहीं है। कोई भी अपनी बात उन तक पहुंचा सकता है। पेश होने की ज़रुरत नहीं पड़ती। दिन में कम से कम दो चक्कर तो महिला बैरक के लगाते ही हैं। बड़ा ही सुखद लगता है जब सुबह-सुबह आ कर वो महिला बैरक खुलवाते हैं कि चलो अपनी जिम्मेदारी का एहसास है और कहीं न कहीं हम से जुड़े हुए हैं। ड्यूटी वाली भी सब सही से काम करती हैं कि जेलर कभी भी आ सकते हैं और बंदियां कुछ भी कह सकती हैं। जेलर सिर्फ़ उन की ही बात नहीं सुनते। सब की सुन गुन कर अपना निर्णय देते हैं।

आज वंदना आई बहराइच से। बिलकुल मेरा ही केस है। लेकिन उस बेचारी को तो कुछ पता ही नहीं है। कुल 26 साल की है। दो छोटी बच्चियां हैं। इतनी सीधी है। घर से निकल कर सीधे जेल। बीच की कोई दुनिया ही नहीं देखी। और जेल की दुनिया तो बाप रे।

जेल में नेतागिरी नहीं चलती बिल्कुल भी। सुकेश ने मुलाक़ात कम समय कराने के पीछे अधीक्षक से बवाल किया। अधीक्षक के इशारे पर लंबरदारों ने उसे पीट दिया। बेचारी वंदना ये सब देख कर घबरा गई। उस ने अपने पति को हमेशा नेता (राजा) के रूप में ही देखा था। यहां पर पराधीन, बेबस पिटते हुए देखना उस के लिए कितना मुश्किल था। बेचारी की हिम्मत बिल्कुल ही टूट गई।

बड़ी मुश्किल से उसे समझा बुझा कर शांत किया। तब तक आज मुलाक़ात से लौट कर रिया ने उस से कहा कि तुम्हारे पति के साथ कोई हादसा हो गया है। अब फिर वो रोने लगी। किसी तरह उसे शांत किया। फिर रिया से पूछा तो पता चला वही पुरानी बात उसे लंबरदार ने बताई थी मुलाक़ात पर जाते समय और रिया ने वंदना को सिर्फ़ परेशान करने के लिए कहा। किस-किस के स्वभाव के होते हैं लोग।

ये रिया वही रिया है जिसने अपने सोते हुए पति की हत्या उस की ही पिस्तौल से कर दी थी। उस का पति पुलिस में था। इस की गवाही उस के बच्चे ने दी है। कि मम्मी ने ही पापा पर गोली चलाई थी। क्या कारण था? रिया ने ऐसा क्यों किया ये तो वही जाने। बाक़ीसब तो सुनी सुनाई बातें हैं। इस अप्रैल में उसे यहां आए दो साल हो जाएंगे। उस की सास ही उस की ज़मानतनहीं होने दे रही है। हर पेशी पर मजबूत वकील के साथ खड़ी जो जाती है। ठीक भी है उस ने अपना जवान लड़का खोया है। उसे कैसे सब्र आएगा? रिया के बच्चे भी दादी के पास हैं। अब रिया का परिवार समझौते के लिए लगा हुआ है कि किसी भी तरह ये लोग मान जाएं। लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा। रिया को अपनी किसी बात का कोई पश्चाताप भी नहीं है। उस की मुलाक़ात के लिए उस के पुरुष मित्रों के अलावा कोई भी नहीं आता है। ससुराल से तो कोई भी नहीं। अपने दो छोटे-छोटे बच्चों को जिसने दो साल से देखा भी नहीं। उन की आवाज़ भी न सुनी हो वो किस तरह से हंस बोल सकती है। वही जाने। लोगों के चेहरे पर कितने चेहरे होते हैं। सुबह चार बजे ही उठ कर उतनी ठंड में नहा धो कर एक घंटे पूजा करना और मन में हमेशा दूसरों को परेशान करने के विचार रखना।

आज कल इतनी ठंड पड़ रही है कि दिन भर इंसान ठिठुरा ही रह रहा है। न बैरक में चैन है , न बैरक के बाहर। कोहरा इतना ज़्यादा है कि रात होते ही पूरी बैठक में कोहरा भर जाता है। सारे बिस्तर सीले-सीले हो जाते हैं। गनीमत है कि बैरक के सभी जंगलों पर दो तिहाई पन्नी लगी है। अगर न लगी होती तो इस ठंड में क्या हाल होता? कितने भी कंबल ओढ़ लो और कितने क्या , एक बिछाया और एक ओढ़ा इतना ही तो रख सकते हैं। यहां ज़्यादा सामान भी नहीं कर सकते। मोजा, स्वेटर सब पहन कर सोते हैं तब भी पूरी रात में न तो बिस्तर ही गर्म हो पाते हैं, और न ही हाथ पैर सीधे हो पाते हैं। पांच बजे का बना हुआ खाना नौ बजे तक खाते हैं। तब तक वो ठंड के मारे बर्फ हो चुका होता है। लेकिन कर भी क्या सकते हैं? जीना तो हर हाल में है।

आज तो भइया एग करी खाई गई। कितना जुगाड़ किया। लेकिन मजा आ गया। दोपहर से इसी संघर्ष में लग गए कि किसी तरह से एग करी बन जाए। चूल्हे पर लकड़ी जला कर एग फ्राई किए गए। भंडारे में जा कर करी बनाई गई। सारी बाधाओं के बाद भी। एक खाने के पीछे इतना संघर्ष। लेकिन ये भी है कि आज का दिन इसी सब में जल्दी से बीत गया।

आज मुझे यहां आए 16 दिन हो गए। घर वाले भी लगता है इस बार निश्चिंत हैं। किसी को कोई चिंता ही नहीं है। 16 दिन में एक दिन पतिदेव मिलने आए बस। यहां भी किसी चीज़की कोई ज़रुरत हो सकती है। इन सब बातों से कोई मतलब ही नहीं है। रमेश भी अस्पताल चले गए हैं तो सोनू भी नहीं आ रहा है। लेकिन करें भी तो क्या पतिदेव भी अकेले ही हैं कहां-कहां दौड़े? तारीख़भी आने के 25 दिन बाद की है उसे भी अलग-अलग नहीं करा सकते कि ये हर तारीख़पर कहां तक भाग-भाग कर आते रहेंगे। तो हर हाल में ज़्यादातर समय जेल में यहीं काटना है। यहीं मन लगाना है। लेकिन इस बार बाहर की बहुत उत्सुकता नहीं है कि बाहर की दुनिया भी अब रंगीन नहीं बची है मेरे लिए। वहां भी इतना ही संघर्ष है बस यही तसल्ली होती है कि आप कैद नहीं हैं। बाक़ीमानसिक परेशानियां तो उतनी ही हैं। और इस बार इनके बाहर रहने से घर, बच्चे की भी चिंता नहीं है कि ये सब देख ही रहे होंगे। और मुझ से अच्छा ही देख रहे होंगे।

जेल में हर सामान की इतनी चेकिंग होती है इस के बावजूद वंदना के साथ मोबाइल भी अंदर आ गया था। किसी को पता ही नहीं था। सुबह 5.30 बजे जब अलार्म बजा तो पहले तो समझ ही नहीं आया कि क्या है कि थोड़ी देर बाद चांदनी ने पूछा अलार्म बजा क्या? हमने कहा हां लगता है। वंदना अलार्म क्लाक लाई है। वंदना से पूछा तो बोली मोबाइल है। जल्दी से उसे चुप रहने का इशारा किया। पूरी बैरक सोई पड़ी थी। सब के सर कंबल में थे पता ही नहीं चला कि किस ने सुना किस ने नहीं? तब तक वंदना पास आई और बोली ये अभी फिर बजेगा। हमने बोला आफ कर दो। बोली ऑफ है तब भी बजेगा अब घबराहट के मारे किसी के समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? न बैटरी निकल पा रही थी न कुछ। चांदनी ने बोला बैरक के बाहर फेंक दो। मित्रा दी ने कहा ड्यूटी पर जो पुलिस वाली है उसे दे दो। अंजना उसी में कह रही कि लाओ बात करें। फिर एक राय हुई कि कपड़ों के बीच में दबा कर बैग में रखा जाए ताकि आवाज़ धीमी सुनाई दे। वंदना ने यही किया। उस ने बताया लास्ट अलार्म 6.30 बजे पर बजता है। 6.25 पर जेलर आ कर उसी के जंगले के पास खड़े हो गए। सब की सांसें रुक गई। लेकिन खैर जेलर साहब को पता नहीं चला। जब बैरक में लोग जग गए तो उन की आवाजों के बीच में उस की आवाज़ सुनाई भी नहीं दी। लेकिन जब मुलाक़ात आने पर वंदना मोबाइल छुपा कर अपने घर वालों को दे आई तभी सांस में सांस आई। अगर मोबाइल उस के पास से मिल जाता तो उस की ज़मानतहोने में लाले पड़ जाते। वो बेचारी तो इतनी सीधी है कि उसे ये भी नहीं पता कि उस की कितनी चार्जशीट है, कितने लोग उस के केसवार हैं? केसवार मतलब चार्जशीट में और कितने लोग आरोपी हैं? उस की डेट कब है? उस पर कौन-कौन धाराएं हैं कुछ भी नहीं जानती और वो जानना भी नहीं चाहती। यहां भी उसे अपने पति की ही चिंता रहती है कि वो कैसे रहते होंगे क्या खाते होंगे? उसे समझाया कि जब तुम्हारा सब एडजस्टमेंट हो गया है तो वो तो आदमी हैं और वो भी विधायक तो मैनेज करना उन्हें अच्छे से आता है। सब कर लेंगे। कल शनिवार की मुलाक़ात के लिए बेचारी बहुत एक्साइटेड है कि क्या होता है? कैसे होता है? आधे घंटे की मुलाक़ात होगी पति से। पता नहीं वो आएंगे भी कि नहीं। बिल्कुल बच्चों जैसे बातें करती है।

किरन बेदी की एन.जी.ओ. इंडिया विजन ने डासना जेल को एडाप्ट कर लिया है। वो लोग हर शुक्रवार को आ कर बच्चों के लिए, औरतों के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं। आज औरतों को क्रोशिया सिखा रहे थे। उन में से एक लड़की ने मुझ से बात की कि इन औरतों के लिए हेल्थ कैंप करना है क्या-क्या इशू रखें। मैं ने उस से कहा यहां हेल्थ सर्विसेज बहुत अच्छी है। थोड़ी लिटरेसी की ज़रुरत है। और इन महिलाओं के लीगल इशू देखने वालों की ज़रुरत है। अगर आप को सिर्फ़ पब्लिसिटी चाहिए तो सामान बांटिए, फ़ोटो खिंचवाइए और जाइए लेकिन अगर सच में काम करना है तो इन्हें लीगल हेल्प दिलाएं। इन लोगों के वकील से कोआर्डिनेट करिए। क्यों कि बहुत सी महिलाएं सिर्फ़ इस लिए जेल में हैं क्यों कि बाहर उन की भागदौड़ करने वाला कोई नहीं है। अगर ये लखनऊ होता तो मैं खुद ही यही काम करती। वकीलों की उपलब्धता कराती जेल में। इस काम में तुरंत नाम नहीं मिलता, लेकिन जब महिलाएं बाहर निकलेंगी उन के काम हो जाएंगे तो वो आप का नाम लेंगी। आप की माउथ पब्लिसिटी होगी। कुछ मेरी बात उन को समझ तो आई ऐसा उन के चेहरे से लग रहा था, बाक़ीकाम करने की व्यावहारिक परेशानियां तो हैं ही। लेकिन ये भी सही है कि इस तरह का काम करने के लिए जेल उपयुक्त जगह है। लेकिन मैं ने देखा सामान्य तौर पर लोग जेल में सामान बांट कर फ़ोटो खिंचवाने में ज़्यादा विश्वास करते हैं। बंदियों की परेशानियों से उन का कोई मतलब नहीं होता है।

इतनी राजनीति तो संसद में भी नहीं होती होगी। जितनी जेल में है। और अपनी पढ़ाई लिखाई समझदारी सब यहां बेकार है। कदम-क़दमपर राजनीति। एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश। चुगलखोरी आदि औरतों के सारे गुण यहां मौजूद हैं। हम तो भइया आदमी के गुण से भरपूर हैं। महिला टाइप कुछ भी नहीं हैं मुझ में। बिलकुल मिसफिट है। इस माहौल में। सब के बीच में बेवकूफ लगते हैं। सारा दिमाग यहां का माहौल ही समझने में लग जाता है। समझ के इसी हिसाब से रिएक्ट करने में ही थक जाते हैं और कुछ लोग दिन भर इसी में लगे रहते हैं। ज़िंदगी में सब से बड़ी चीज़खाना ही रह गया है। सुबह से यही संघर्ष शुरू हो जाता है कि आज ढंग का खाना कैसे मिले? हे भगवान किस नरक में डाल दिया है तूने। जीते जी का नरक शायद यही होता है। इस से बचने का कोई उपाय नहीं। और पता नहीं कितनी बार यहां आना है और ये नरक झेलना है। बहुत कोशिश करते हैं कि इस तरफ से ध्यान हटा कर ‘‘तू रखे जिस हाल में दाता हर पल शुक्र मनाता रहे’’ के हाल में रह लें। लेकिन नहीं हो पाता। और उस भगवान से शिकायत हो ही जाती है कि आखिर इतना बड़ा कौन सा गुनाह कर दिया है कि यही नरक बार-बार देखने को मिल रहा है। पता नहीं प्रभु कहां सो गए हैं? कभी-कभी सोच लो तो आगे अंधेरे के अलावा और कुछ दिखाई ही नहीं देता। शायद ज़िंदगी के सारे सुख अब मुझ पर ख़त्म । और यही डासना का नरक अब ज़िंदगी भर झेलना है। दूसरों को देख-देख कर कब तक सब्र करें, कि इन से तो अच्छी ज़िंदगी है। और बहुतों की ज़िंदगी हम से भी ज़्यादा अच्छी है और उस पर मेरा हक क्यों नहीं?

अब तो बिटिया की भी बहुत चिंता होती है , 25 साल की हो जाएगी अब। लेकिन उस की शादी की कोई सुगबुगाहट ही नहीं है अभी तक। पता नहीं उस के नसीब में क्या लिखा है? हम उस की जिम्मेदारी निभा भी पाएंगे या नहीं? कुछ समझ ही नहीं आता। उस की ज़िंदगी में नौकरी के सिवा और कुछ है ही नहीं। कितनी जल्दी समय से पहले ही बड़े हो गए मेरे बच्चे। भगवान उन्हें तो सुख दो। हमारे हिस्से का भी सारा। हम उसी में ख़ुश रह लेंगे। अब बस चुपचाप बैठ कर बुरा समय काटने के अलावा और कोई उपाय भी नहीं।

तीन दिन से भंडारा दूसरे ग्रुप को दे दिया गया है। वो ग्रुप हम लोगों से रिजिड है कि इन्हें तो जेल का ही खाना देना है। थोड़ा अलग जो ढंग का खाना बनता है उसमें से नहीं। तो रोज शाम को बैरक के पीछे चूल्हा जला कर कुछ न कुछ बना ले रहे थे हम लोग। कल उस के पीछे भी बवाल हो गया। ये महिला पुलिस भी सब बहुत वाहियात होती हैं। कुछ भी कहो सुनो अपनी मूर्ख बुद्धि से ही चलती हैं। हम तो कल से किसी से भी बात नहीं कर रहे। लेकिन करनी तो पड़ेगी ही। जब यहां ही रहना है तो इन से दुश्मनी तो कर नहीं सकते।

सांस का मतलब जान नहीं है


आज 2014 का आखिरी दिन भी आ गया। 2013 का आखिरी दिन भी यहीं बिताया था और 2014 का भी यहीं बीत रहा। मोहिनी चिढ़ा भी रही कि इन्हें भी कोई जगह नहीं मिलती जेल चली आती हैं , न्यू ईयर सेलीबेरेट करने। अब क्या करें ? लखनऊ में मुदित भइया और उन के पापा होंगे। पता नहीं कैसे मनाया जा रहा होगा? मेरे बिना मेरा घर कैसा होगा? अब तो घर का मोह त्यागना ही होगा। पता नहीं कितने दिन अपने घर में रह पाएंगे? फिर यही डासना। खैर चलो जो भी प्रभु की इच्छा। मेरे मित्रों के अनुसार ‘‘ये भी बीत जाएगा।’’ कल से 2015 शुरू हो जाएगा। हैपी न्यू ईयर टू इवरी बॉडी ! भगवान सब का ये साल अच्छा-अच्छा बिताए।

चलिए जी नया साल भी शुरू हो गया। साल का पहला दिन भी सकुशल बीत गया। पता नहीं बाहर कैसा रहा होगा? लेकिन चलो नो न्यूज , गुड न्यूज। कल जेलर की भलमनसाहत का एक रूप और दिखा। ऊपर वाली बैरक में एक पागल महिला है। इतनी ठंड में भी कंबल नहीं ओढ़ रही थी। ड्यूटी वाली, डाक्टर सब कह-कह कर परेशान हो गए लेकिन उस ने नहीं ओढ़ा। जेलर भी रात 12 बजे तक यहीं चक्कर काटते रहे। वो तो डाक्टर ने नींद का इंजेक्शन दिया तो उस के सोने के बाद उसे कंबल उढ़ाया गया। जब वो ओढ़ कर सो गई तब रात 12.30 पर जेलर घर गए। अपना नया साल यहीं मरीज महिला की सेवा में बिता कर। अच्छा लगा देख कर। ऐसे ही एक दिन रुबीना उस आग को जो कि हाथ सेंकने के लिए जलाई जाती है थाली में ले कर अपने बैरक में चली गई। पता चलने पर जेलर ने उसे बहुत डांटा लेकिन दूसरे ही दिन पानी गरम करने की रॉड मंगा दी कि बच्चों को गरम पानी से नहलाया जाए। बच्चे बीमार, औरतों और बूढ़ी महिलाओं को गर्म पानी मिलता रहे। और ये सब वो बिना लालच के सिर्फ़ मानवता के लिए करते हैं।

आजकल मुझे बच्चों से ज़्यादा बच्चों के पापा की याद आती है कि बच्चे मुझे मिस करते होंगे तो उन्हें संभालने के लिए पापा हैं लेकिन जब पापा परेशान होते होंगे तो उन्हें कौन देखता होगा? आज तक तो कभी भी इस तरह की जिम्मेदारी उठाई नहीं है और अब 52 साल की उम्र में ये सब भी सीखना पड़ रहा है। कैसे मैनेज करते होंगे? खैर वक्त सब सिखा देता है। हमने ही कौन सी जेल देखी थी? क्या जानते थे यहां के बारे में। आज सब मैनेज कर ही रहे हैं और रह भी रहे हैं। ऐसे ही वो भी सब कर ही रहे होंगे। अब तो डेट का समय भी पास आ रहा है। पांच को तारीख़है। पूरे छब्बीस दिन हो जाएंगे, पांच को। छब्बीस दिन बाद हम इस महिला बैरक से बाहर निकलेंगे कोर्ट जाने के लिए। पता नहीं बाहर जाने के लिए कब यहां से निकलेंगे?

दो दिन से पानी बरस रहा है बड़ा डिप्रेसिंग सा मौसम है। बैरक के बाहर भी नहीं निकल सकते कि कहां जाएं । सब जगह पानी ही पानी है। तो उसी बैरक में अपने फट्टे पर पूरे दो दिन से पड़े हैं कोई भी चेंज नहीं।



मोहिनी ही सब का ध्यान रखती है। समय-समय पर चाय पानी दे कर। ये वही लड़की है जो पिछले साल भी थी। 2013 की फरवरी में आई थी। अपने मामा के लड़के की हत्या में 302 की मुजरिम हो कर। ये नर्स है।। हांगकांग, चीन आदि जाती रहती थी काम के सिलसिले में। इस के मामा के लड़के को भी जाना था। उस ने इस से फ़ोन पर बात की। इसने अपने एक अंकल का नंबर दे दिया। अंकल उस के मामा (जिन का बेटा था) के साथ नौकरी करते थे। अंकल ने वो आफिस भी दिखा दिया जहां बाहर जाने का काम होता था। उसी रात में वो लड़का अपने दोस्त के साथ खा पी रहा था। और रात बारह बजे उस की हत्या हो गयी। उस के मामा ने इसे और अंकल जी को फंसा दिया कि ये नर्स थी तो नींद की गोली आमलेट में मिला कर खिलाई और अंकल ने गला दबा दिया। इस पूरी कहानी में बहुत झोल था लेकिन कोई पैरवी करने वाला नहीं था तो ज़मानतही नहीं हो पाई। अब तो गवाही भी शुरू हो गई हैं तो जल्दी ज़मानतकी कोई उम्मीद भी नहीं है। मामा अंकल से 15 लाख रुपए मांग रहा था समझौता करने को। लेकिन अंकल ने मना कर दिया कि इतना पैसा नहीं है और अब वो बूढ़े अंकल और मोहिनी 23 महीने से जेल काट रहे हैं। इस की मुलाक़ात भी कम आती है। राजस्थान की रहने वाली है। तो जल्दी-जल्दी कौन आए मिलने? लेकिन इस का व्यवहार इतना अच्छा है कि इसे कोई दिक्क़तनहीं होती। हर कोई इस के लिए दिलोजान से खड़ा रहता है। ड्यूटी वालों के भी कई काम फ्री आफ कास्ट करती रहती है। और 23 महीने से यहां है तो यहां के सारे रंग ढंग जान गई है। पूरी तरह से रच बस गई है। लेकिन अपनी डिगनिटी बनाए रखते हुए। और अभी मुश्किल से 28 साल की होगी और इतनी दुनिया देख ली । बता रही थी कि वकील ने कहा था कि बस 14 दिन। 15 वें दिन आप बाहर होंगी। 14 दिन के हिसाब से जो जेल आया हो और उसे दो साल हो रहे हों तो उस की मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है लेकिन तब भी वो काफी बैलेंस है। चांदनी का तो बहुत ख्याल रखती है। चांदनी को उस की वजह से जेल काटनी आसान हो गई है। वैसे भी चांदनी 10 या 11 बजे तक सुपरिटेंडेंट के आफिस चली जाती है। फिर शाम के 5 से 5.30 बजे तक लौटती है। क्यों कि 6.30 बजे तक बैरक बंद होता है। लेकिन उस के बाद भी बहुत सी समस्याएं होती हैं। जिन्हें मोहिनी ही मैनेज करती है। चांदनी आफिस में फाइल्स आदि का काम करती है। दांत का मरीज आता है तो हास्पिटल भी जाती है दिन भर इसी में बिजी रहती है, तो थोड़ा माइंड डाइवर्ट रहता है। एक साल में सब लोग उसे जानने भी लगे हैं सारे लंबरदार, राइटर उस की बहुत इज्जत करते हैं।

लंबरदार पीली वर्दी पहने हुए वो लोग होते हैं जो सजायाफता होते हैं। सारा प्रशासन इन के हाथ में होता है। सब पर निगरानी रखने का काम इनका होता है और ज़रा भी गड़बड़ होने पर इन्हें हाथ छोड़ देने का पूरा अधिकार होता है। एक तरह से अधिकारियों के पाले हुए गुंडे होते हैं जिन्हें सब छूट होती है। कई लंबरदार तो ऐसे होते हैं जो जेल से हर महीने अपने घर खर्चा भेजते हैं। हजारों में इन की कमाई होती है। बंदियों की मजबूरी के सौदागर जो होते हैं ये लोग।

राइटर वो होते हैं जो हवालाती होते हैं मतलब विचाराधीन कैदी जिन के केस का फाइनल न हुआ हो इन से क्लर्की का सारा काम लिया जाता है। जितना भी लिखा पढ़ी का काम सब इन के जिम्मे। आवेदन पत्र लिखने से परवाना बनाने तक परवाना मतलब रिलीजिंग आर्डर। जेल की भाषा के कुछ प्रचलित शब्द हैं। (1) फट्टा (2) खटका (3) पेशी (4) परवाना आदि।

फट्टा मतलब वो डेढ़ हाथ की जगह जो हम लोगों को सोने के लिए मिलती है।

खटका वो होता है जो सुबह बैरक खोलने के लिए गेट बजाया जाता है या खाना बांटने के लिए बरतन पीटा जाता है। मतलब अटेंशन दिलाने के लिए जो आवाज़ की जाती है उसे खटका कहते हैं।

पेशी का मतलब आज तक हम यही जानते थे कि आप की ग़लती की सज़ाजहां मिले उसे पेशी कहते हैं। लेकिन यहां पेशी का मतलब पेश होना और जेलर या सुपरिटेंडेंट के पास जा कर अपनी बात कहना या कोई समस्या बताना। उसे पेश होना कहते हैं।

परवाना मतलब जेल से बाहर निकलने के रिलीज आर्डर। सब से ज़्यादा खुशी जेल में इसी एक शब्द की होती है। सब के चेहरे खिल जाते हैं। जैसे ही चीफ आ कर बताते हैं कि परवाना आया है।

चीफ यहां पर सेकेंड नंबर का स्टाफ होता है। सब से ऊपर अधीक्षक, उस के नीचे जेलर, जेलर के नीचे डिप्टी जेलर, उस के बाद चीफ और सब से नीचे सिपाही। कुल यही इतना स्टाफ होता है जेल का। बाक़ीका सारा जेल का इंतजाम जेल के कैदी ही संभालते हैं। जिस कैदी को जो काम आता है उसे वो करना ही होता है। बिजली का काम जानने वाला बिजली का काम करता है, पुताई का पुताई वाला, नाई का नाई, यहां तक कि डाक्टर को भी अस्पताल में बैठ कर मरीज देखने पड़ते हैं। पूरे जेल का निजाम कैदियों से ही चलता है।

हम लोगों को तो दिन भर में दो चार बार सुनने को मिल जाता है कि घोटाले वाले चार सौ बीस। पहले पहल तो बड़ा बुरा लगता था। अब तो बेशर्म हो गए हैं। खुद ही हंस लेते हैं कि हां हम लोग 420 हैं। वैसे भी इस समय महिला बैरक में एन.आर.एच.एम. के काफी लोग हो गए हैं। डाक्टर, एन.जी.ओ. वाली हम और वंदना दो सप्लायर और 5 ए.एन.एम.। कुल मिल कर हम नौ महिलाएं हैं, एन.आर.एच.एम. की।

आदमियों की तरफ तो सुनते हैं पूरा एक हाता ही एन.आर.एच.एम. को दे दिया है। ऊपर नीचे की दोनों बैरक मिला कर पूरा हाता। मिनिस्टर साहब का स्टाफ बच्चा बैरक में है। विधायक जी और सारे डाक्टर सी.एन.डी.एस. के लोग एन.आर.एच.एम. बैरक में। दो हिस्से में बंटा हुआ है पूरा एन.आर.एच.एम.। मिनिस्टर साहब भले जेल में हैं पर उन का प्रमुख सचिव जो आई.ए.एस. है, बीमारी के बहाने सुप्रीम कोर्ट से बेल करा कर बाहर है। नौकरी कर रहा है। अपने बैच का आई.ए.एस. टापर है। और इस पूरे एन.आर.एच.एम. घोटाले का भी टापर है। सोचिए कि तीन-तीन विभागों के कैबिनेट मंत्री तीन थे पर इन सब का प्रमुख सचिव एक ही जो यही थे। सारे घोटाले के जनक यही। यह आगे-आगे , मंत्री विधायक पीछे-पीछे। अजब जुगाड़, अजब दिमाग। बीवी भी आई.ए.एस.। पूरा परिवार आई.ए.एस.। लेकिन पैसे की हवस नहीं गई। तब के प्रधान मंत्री कार्यालय में इन के एक रिश्तेदार आई.ए.एस. तैनात थे। मतलब कि पी.एम.ओ. का भी जोर था। लेकिन फिर भी बच नहीं सके।

जो भी हो जब कभी कचहरी में व्हील चेयर पर उन्हें बैठे देखती हूं, तो उन पर बहुत तरस आता है। कभी यह गाजियाबाद के जिलाधिकारी हुआ करते थे। बतौर जिलाधिकारी इस पूरी कोर्ट का शिलान्यास इन के ही हाथों हुआ है। पत्थर पर इन का नाम लिखा हुआ है। जिस कोर्ट का शिलान्यास किया, उसी कोर्ट में मुजरिम। और तो और जिस डासना जेल में वह बार-बार आते जाते रहते हैं बतौर कैदी। उस डासना जेल का शिलान्यास भी बतौर डी.एम. यही जनाब कर गए थे। वहां भी इन जनाब का नाम पत्थर पर लिखा हुआ है। जहां यह बतौर कैदी दिन गुज़ारते हैं। समय क्या-क्या न करवा दे। क्या गुज़रती होगी उन के दिल पर यह सब सोच कर? पर फिर सोचती हूं कि वह यह सब सोच भी पाते होंगे भला? याद भी आता होगा अपना वह शिलान्यास? रेड रोज फिल्म की याद आ जाती है। जिस में राजेश खन्ना कुछ इसी तरह जेल पहुंचते हैं। कई हत्या करने के बाद। हत्या के जुर्म में। जब कि पहले इसी जेल में वह कैदियों को फल, कंबल आदि बांटने आते थे।

आज पता चला दो महिलाएं एच.आई.वी.पाजिटिव भी हैं। घर वालों ने भी उन्हें छोड़ रखा है। इसी जेल के भरोसे वो जिंदा हैं। एक काफी बूढ़ी महिला दहेज में बंद है। अभी तक उस के केस का फ़ैसलाभी नहीं हुआ है। उस की तबियत बहुत ख़राब है। डाक्टर बताते नहीं हैं लेकिन लगता है दिमाग की कोई दिक्क़तहै। क्यों कि हाथ पैर हिलते रहते है। पैर रखती कहीं हैं , पड़ते कहीं हैं। नाक से पानी आ रहा है। मतलब बहुत बीमार है। लेकिन उन की तारीख़भी आती है तो डाक्टर मेडिकल नहीं देते और वो बेचारी ऐसे ही हिलते डुलते हुए लोगों के सहारे से वज्र वाहन में बैठ कर कचहरी जाती है। मानवता नाम की कोई चीज़ही नहीं है। कल बेचारी जेलर के सामने हाथ जोड़ कर रो रही थी कि मुझे बाहर निकलवा दो। वो बेचारे क्या कहते, चुप ही रहे। लेकिन अच्छी चिकित्सीय सुविधा तो दिला ही सकते हैं।

कल एक महिला साल भर के बच्चे के साथ आई है। उस का देवर लड़की ले कर भाग गया है। लड़की वालों ने पूरे परिवार का नाम दे दिया। सब से पहले पुलिस ने इसे ही पकड़ा। उस का बच्चा नई जगह और ठंड की वजह से पूरी रात रोता रहा। सुबह उस की तबियत ख़राब हो गई। पुलिस वालों ने उसे बच्चे की दूध की बोतल भी साथ नहीं रखने दी और बच्चा बेचारा ऊपर का दूध पीता है। आज वो पूरे दिन एक-एक पुलिस वाली के सामने रोती रही कि कोई दूध की बोतल ला दो। बच्चा भूख से बीमार हो गया। वो पैसा भी दे रही थी पर किसी ने न सुनी। हाय रे ये बेबसी।

आज पूरे 26 दिन बाद बाहर निकले। मुदित और इन से मुलाक़ात हुई। मुदित तो काफी मेच्योर लग रहे थे। उन के पिता जी का ही समझ नहीं आ रहा था कि कैसे हैं? मेरे सामने तो यही जाहिर कर रहे थे कि बिलकुल ठीक हैं। लेकिन इतना तो हम भी इन्हें जानते ही हैं कि आंखें कुछ और कह रही हैं और जबान कुछ और। मुदित से पूछा तो बोला मम्मी इन का पहली बार है न हम लोगों का तो दूसरी बार है। तो आदत हो गई है। इन्हें तो समय लगेगा ही। ये भी सही है। लेकिन चलो ये भी घर गृहस्थी दुनियादारी सब जान गए। पिछली बार हम आए थे तो पप्पू नहीं रहा और इस बार उस की बहन निर्मला नहीं रही। पता नहीं ये कौन सा संबंध है मेरा उस परिवार से। ऐसे दुख के क्षणों में हम इतनी दूर और बेबस होते हैं। पूनम का चुनाव भी है पता नहीं कैसे सब मैनेज हो रहा होगा? चलिए हम सोच के भी क्या कर लेंगे।

पचास बावन दिनों से वकीलों की हड़ताल के चलते पूरा जेल ठसाठस भरा हुआ था। महिला बैरक में ही 148 कैदी हैं। दोनों ही बातें हैं। ठंड में ज़्यादा लोगों के होने से बैरक गर्म रहता है लेकिन सब को जेल वाले कंबल भी नहीं मिल पाते। दो-दो लोगों को एक कंबल में सोना पड़ता है। अमीरों की तो कोई नहीं घरों से कंबल आ जाते हैं। मुसीबत तो गरीबों की होती है। इस समय तो बस आग का ही सहारा है, लेकिन वो भी सुख बैरक बंद होने के बाद नहीं मिलता। उसी ठंड में ठिठुरते रहो रात भर। जाड़े की रात कितनी लंबी होती है अब पता चला।

जेल में कपड़ा सुखाने को रस्सी नहीं मिलती। पुराने दुपट्टे फाड़ कर जोड़-जोड़ कर रस्सी बनाई जाती है और कपड़े सुखाने होते हैं। सब की जगह तय है कि किस की रस्सी कहां बंधेगी? रस्सी पर कहां तक किस के कपड़े सूखेंगे। कोई दूसरा अपने कपड़े उस जगह नहीं सुखा सकता है। जो लोग ज़्यादा समय से यहां रह रहे हैं ये सारी व्यवस्थाएं उन के हाथ में ही होती हैं। नए लोगों को तो लड़ना ही पड़ता है। इस बात का भी संघर्ष।

यहां लोगों की औकात उस की मुलाक़ात आने से नापी जाती है। मुलाक़ात मतलब आप से मिलने कितने लोग और कितनी बार आते हैं? और आप के लिए कितना सामान लाते हैं। जिन की झोला भर-भर मुलाक़ात आती है और पुराने लोग जिनकी मुलाक़ात नाम मात्र को आती है वो लोग ऐसे लोगों के पीछे-पीछे घूमते हैं जिन की मुलाक़ात ज़्यादा आती है। कमला ने शबीना का काम करने से इसी लिए मना कर दिया था कि इस की मुलाक़ात तो आती नहीं। ये मुझे भला क्या देगी? शबीना एन.आर.आई है। जार्डन में उस का ओलिव आयल और भी कई चीजों का बिजनेस है। पति की कंपनी में वो डायरेक्टर थी। पार्टनर से कुछ डिस्प्यूट हो गया, उस ने डेढ़ करोड़ के घोटाले में इन्हें फंसा दिया। पति तो जार्डन में था तो बच गया लेकिन ये मुंबई से पकड़ कर लाई गई। ये अक्टूबर , 2013 में आई थीं पति तो बाहर ही था। बेटी 14 साल की है वो हॉस्टल में है। बूढ़ी मां थी जिन का देहांत इसी बीच में हो गया। एक बहन है जो लंदन में है। इस की पैरवी करने वाला भी कोई नहीं है। पति से शायद बनती नहीं है क्यों कि वो तो कोई प्रयास ही नहीं कर रहा। बहन इतनी दूर से क्या करें ? और केस अभी चार्ज तक पर नहीं लगा कि जल्दी केस निपटे और ये सज़ाकाट कर बाहर जाए। इसे शुगर है, अस्थमा है। पैर की भी कोई दिक्क़तहै। मोड़ नहीं सकती। रात में उठो तो फट्टे पर बैठी हुई ही मिलती है। दमे की वजह से सांस फंसने लगती है तो उठ के बैठ जाती है। बहुत तरस आती है उसे देख कर। लेकिन क्या करें जेल ऐसे ही बेबस लोगों से भरी हुई है।

मुदित भइया जो मेरे लिए पान केक लाए थे उस को खा कर चांदनी ने कहा कि एक राजेश को भी खिलाने का मन है उन्हें बहुत पसंद है। तीन बचे थे हमने तीनों उस के साथ बांध दिए। लौट कर उस ने बताया उस में से एक मंत्री जी ने खाया। इसे कहते हैं दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। न खरीदने वाला सोच सकता था कि इसे कौन खाएगा? न खाने वाला ही जान पाएगा किस ने खरीदा न पहचान पाएगा। वाह रे भगवान की लीला।

महिला बैरक पर पूरी जेल की नजर होती है। कई जवान लड़कियां भी यहां काफी समय से बंदी हैं। उन की भी अपनी इच्छाएं हैं। लेकिन यहां तो कुछ भी संभव नहीं है। तो इन लोगों ने उस का रास्ता निकाला है राइटर लंबरदारों के जरिए। राइटर और लंबरदार ही किसी न किसी काम के बहाने आ सकते हैं महिला बैरक में या फिर जेलर और अधीक्षक। ये लोग तो खैर अधिकारी हैं। लेकिन ये लड़कियां राइटर , लंबरदार को सेट कर लेती हैं। शनिवार को मुलाक़ात की पर्ची लगाती हैं। प्रेम पत्र लिखती हैं और चीफ या कैंटीन वाले के माध्यम से उधर आदमियों की तरफ भिजवा देती हैं। बस पत्रों का ही आदान प्रदान हो पाता है। इस से ज़्यादा और कुछ नहीं। जाने कौन से सपनों की दुनिया में खोई रहती हैं ये लड़कियां। वो सोचती हैं ये लोग बाहर निकल कर उन्हें भी निकालेंगे बाहर निकल कर भला कौन किस को पहचानता है। कहावत भी है जेल की यारी गेट पर मारी। हां ये है कि ये लड़कियां इसी तरह से अपना टाइम पास करती हैं। बहुत तरस आता है इन पर कि अभी तो इन्हों ने दुनिया भी नहीं देखी और यहां फंस गई। यहां से निकलने के बाद की ज़िंदगी कितनी कठिन है इस का भी अंदाजा नहीं है इन लड़कियों को। खैर इसी का नाम ज़िंदगी है।

आज हमारी तारीख़थी। हर चौदह दिन पर जेल से कचहरी जा कर जज के सामने पेश होना पड़ता है। कि हां हम ठीक ठाक हैं और उसी तारीख़पर अगर केस थोड़ा आगे बढ़ता है तो बढ़ता है नहीं तो वहीं का वहीं ठप्प। हमारी जैसी 12 महिलाओं की और तारीख़थी। तारीख़विचाराधीन कैदियों की होती है। सज़ायाफ़्ता तो बड़ी हसरत से तारीख़पर जाने वाली बंदियों को देखती हैं उन को लगता है कि जैसे पिकनिक पर जा रहे हों। पिकनिक तो नहीं लेकिन जेल में रहते हुए खुली हवा में सांस लेने जैसा तो होता ही है। उस बैरक और मैदान के अलावा भी कुछ दिखता है। सड़क, आदमी, गाड़ियां ये सब दिखना भी नियामत हो जाता है, ये बाहर रहने वाला क्या जाने? हमारे आस पास कितनी चीजें होती हैं जिनके हम आदी होती हैं। कभी ये भी नहीं सोच पाते कि हम इन के बगैर भी जी पाएंगे या नहीं।


तारीख़ पर जाने का सब से दुखद पक्ष वज्र वाहन होता है। मिनिस्टर साहब ने तो वज्र वाहन के अपमान से बचने के लिए जेल को एक एंबुलेंस ही डोनेट कर दी है। अपनी बीमारी के बहाने वह जेल से कचहरी पेशी पर एंबुलेंस से ही आते जाते हैं। लेकिन हम या हमारे जैसे लोग? वज्र वाहन पर चढ़ते ही आप आम आदमी से अलग हो जाते हैं। लोगों की नजरों में अपराधी बन जाते हैं। वो महिला पुलिस कर्मी जो हमें जेल से कचहरी ले जाती और ले आती है वो भी हमारी तरह औरत ही होती है। भावनाओं और संवेदनाओं से भरी हुई। लेकिन करें भी क्या उन की भी नौकरी है। हमारे साथ कड़ाई और रुखाई से पेश आना उन की मजबूरी है। खैर इन सब बातों की तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता। जेल से निकलते ही मन कचहरी पहुंच जाता है, और सोचने लगता है कि घर से कौन आया होगा। महिला पुलिस के साथ चलते-चलते ही घरवालों से बात करनी होती है, हां अगर कचहरी में जज के सामने पेश होने में थोड़ा समय होता है तो वही समय हमें घर वालों से, वकील से, बात करने को मिल पाता है। और वही अपनी पिकनिक हो जाती है। पति सोचते हैं ये जेल से आई है क्या-क्या खिला पिला दें। इसे और यहां तो इन को देखते ही मन और पेट सब भर जाता है। इंसान एक ट्रामा की स्थिति में चला जाता है। दिमाग काम करना बंद कर देता है। बस यही लगता है कि इन क्षणों को बारीकी से आंखों में कैद कर लो। क्यों कि वापस जेल जाने के बाद जीने का सामान यही यादें होती हैं। कचहरी का पूरा दिन इतनी जल्दी बीत जाता है कि पता ही नहीं चलता। यही समय एहसास दिलाता है कि हम बाहर एक दुनिया छोड़ आए हैं मजबूरी में। जिन के बिना जीने की कभी सोची भी नहीं थी। क्या कभी अपनी उस दुनिया में लौट पाएंगे? कभी-कभी तो मन करता है तारीख़पर ही न जाएं। इकट्ठे ही जेल से निकलें। हर बार तारीख़से वापस जेल आना भी किसी यातना से कम नहीं होता कि आप बिल्कुल भी वापस नहीं जाना चाहते। आप को जाना पड़ता है। हमारी क़िस्मत तो ऐसी है कि बार-बार बाहर से भी जेल आना पड़ता है। इंसान अपने अंदर कितनी हिम्मत लाए। जब तारीख़पर जाने लगो तो सज़ावाली औरतें अपने घरों के फ़ोन नंबर और संदेश कागज पर लिख कर देती हैं कि इनके जवाब लेती आना। हम जाते ही सारी पर्चियां जो मिलने आया होता है उसे दे देते हैं और जवाब ले आते हैं। जिनके फ़ोन उठ जाते हैं और कोई संदेश मिल जाता है वो औरतें तो ख़ुश हो जाती हैं और जिनके फ़ोन नहीं उठते उन्हें लगता है कि हमने कोशिश ही नहीं की। हम झूठ बोल रहे हैं, क्यों कि अपनी उम्मीद कोई नहीं तोड़ना चाहता। वहां उम्मीद ही तो उन के जीने का आसरा होती है। और कितनी औरतें तो ऐसी हैं जो खुशी-खुशी तारीख़पर जाती हैं और घर से कोई आया ही नहीं होता। सारी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। इस मामले में हम भाग्यशाली हैं कि हर तारीख़पर हम से मिलने कोई न कोई आता ही रहता है। जो आप को ये एहसास भी दिलाता है कि बाहर की दुनिया में भी लोगों को आप की ज़रुरत है। आप उन के लिए महत्वपूर्ण हैं। हमारा होना न होना भी मायने रखता है। लेकिन इस के साथ ही बड़ा मुश्किल होता है। अंदर से दुखी होते हुए भी घर वालों के सामने ख़ुश दिखने का नाटक करना। लेकिन ये सारी जद्दोजहद जेल पहुंचते ही ख़त्म हो जाती है। वहां आप जैसे हैं जैसा आप का मन है वैसे ही रहिए। क्यों कि वहां तो सभी हमारे जैसे हैं दुखी। सब के दुख साझे हैं। तारीख़पर कचहरी जाना कुछ खुशियां कुछ तकलीफें साथ लाता है। शायद यही ज़िंदगी भी है। कुछ खुशियों और तकलीफों के बीच सामंजस्य बिठाते हुए अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जी लेना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है।

ज़िंदगी में जब जेल कचहरी आदि परेशानियां आती हैं तो मौत का भय ख़त्म हो जाता है। ज़िंदगी जब पल पल पर भारी होने लगे। रोज के संघर्ष ख़त्म ही न हों तो मौत आसान लगने लगती है। जेल में इतना संघर्ष है रोज-रोज का कि क्या कहा जाए। तब लगता है भगवान मौत ही दे दो। अगर इस से किसी और तरह छुटकारा नहीं है। सब कहते हैं ये भी बीत ही जाएगा, अब तो लगता है इस के साथ हम भी बीत ही जाएंगे। अब हिम्मत टूटने लगी है।

जेल में पर्ची कटती है। मतलब जब कोई नया कैदी आता है तो उसे जेल का काम करना पड़ता है, हर तरह का। जो नहीं करना चाहता उसे पर्ची कटवानी होती है। पुरुषों में ग्यारह हजार की पर्ची कटती है। महिलाओं में बारह सौ की। जो महिलाएं पर्ची नहीं कटवातीं उन्हें झाडू , पोछा, बरतन धोने आदि का काम करना पड़ता है। रोटी भी बनानी पड़ती है। इस बार देख रहे हैं पुलिस वाली पीछे ही पड़ जाती हैं कि पर्ची कटवाओ। क्यों कि इस का हिस्सा सभी पुलिसवालियों में बंट जाता है। ये पर्ची कटवाना बिलकुल गैर क़ानूनीहै, लेकिन फिर भी हर जगह होता है। पर्ची कटवाने के बाद भी रोटी बनाने में नंबर आ ही जाता है तो तीस रुपए दे कर किसी से भी रोटी बनवा लेते हैं। कई महिलाएं जो ज़रुरतमंद हैं, जिन की मिलाई नहीं आती वो दोनों समय के उन लोगों के नंबर ले लेती हैं जो रोटी बनाना नहीं चाहती। और पैसे कमाती हैं। इस से उन का समय भी कटता है। दिन भर व्यस्त रहती हैं। फालतू के परपंच से दूर।

आज हम को पूरा एक महीना हो गया इस जेल में। सब कह रहे हैं कि अरे एक महीना हो गया पता ही नहीं चला। कोई मुझ से या मेरे घर वालों से पूछे कि ये एक महीना कैसे बीता है? पल-पल भारी था। एक महीना एक साल के बराबर लग रहा है। लेकिन फिर भी बीत ही गया। अब तो लगता है इन सब बातों से ऊपर उठते जा रहे हैं। पता नहीं क्या लिखना चाह रही हूं। और क्या लिखती जा रही हूं?

आज रोटी बनाते समय अर्चना और टीना में लड़ाई हो गई। टीना रिया का काम करती है और रिया आज कल भंडारे का काम देखती है तो टीना भी अपने को डॉन समझने लगी थी। इस झगड़े के बाद पुलिस वाली ने टीना को डंडे-डंडे ही ख़ूब मारा। उस के हाथ पैर सूज गए, उसी समय डाक्टर भी आए थे तो वो उसे दर्द की सुई लगाते गए कि नहीं तो बाद में दुबारा आना पड़ेगा। सुई भी कमर पर कपड़ों के ऊपर से ही लगा दी। जानवर ही समझा जाता है बंदियों को। टीना बेचारी से तो उठा ही नहीं जा रहा, और जेलर ने अदालत में उस की पेशी भी लगा दी है। पेशी का मतलब अदालत को ये बताना कि जेल में इस का आचार व्यवहार सही नहीं है। अदालत में पेशी लग जाने से ज़मानतमिलने में दिक्क़तहोती है। टीना वो लड़की है जो अपने पति के प्राइवेट पार्ट को जख्मी करने के जुर्म में जेल आई है। इस का पति इसे बहुत परेशान करता था। इस का चेहरा भी एक तरफ से एसिड से जला दिया है। वो अपनी लड़की पर भी गलत नजर डालता था। इसी लिए उस ने अपने पति से इस तरह बदला लिया और जेल चली आई। ड्यूटी वाली ने इसे इतना मारा कि इस से हिला भी नहीं जा रहा था। और वो कह रही थी कि ऐसा लगा जैसे मेरे पति ने मुझे मारा है। ये महिलाएं भी कैसी होती है कि पति से अलग कोई दुनिया ही नहीं। और ये ड्यूटी वाली भी बंदियों को जानवर ही समझते हैं।

जेल में ‘सब सुनो और मुंह मत खोलो’ का ही सिद्धांत चलता है। अगर आप ने बिना सोचे समझे मुंह खोल दिया और किसी का नाम ले कर कहा तो आप की फजीहत तय है। और कहने वाला तो अपनी बात से मुकर ही जाएगा। 150 तरह की महिलाएं रहती हैं यहां पर। 150 विचारधारा। सब से सामंजस्य बैठाना असंभव। इसी माथा पच्ची में ही पूरा दिन निकल जाता है। कुछ महिलाएं जिन की मुलाक़ात नहीं आती , वो अपने को असुरक्षित महसूस करती हैं , हमेशा ही लोगों के बीच गलतफहमी पैदा करने में ही लगी रहती हैं। कभी-कभी तो ये सब देख कर अपने महिला होने पर ही अफसोस होने लगता है कि क्या है ये सब ? हम कहां जा रहे हैं ? सिर्फ़ अच्छा खाना , दूसरे के सामान पर अपना हक जताना क्या यही ज़िंदगी का उद्देश्य रह गया है ? बुरे घर में रहने के बाद भी हम अपनी बुराइयों को छोड़ने की कोशिश नहीं करते बल्कि और बुराइयां अपनाने में लगे रहते हैं। जब कि होना ये चाहिए कि भगवान ने हमें यहां रख कर जो खाली समय दिया है कि अपने बारे में सोचो, अपनी बुराइयों को पहचानो और उन्हें दूर करने का प्रयास करो। कुछ तो इस समय का सदुपयोग हो। लेकिन नहीं हम अपनी सारी ताक़त यहां , दूसरे को कैसे परेशान या दुखी करें इसी में लगा देते हैं।



आज बच्चों के पापा की बहुत याद आ रही है। आज तक मुझे ये लगता था कि मैं अपने बच्चों को सब से ज़्यादा प्यार करती हूं लेकिन अब पता चला कि पति के आगे सब बेकार हैं। सब से पहले यही हैं। पिछली बार बच्चों को याद कर-कर के जो दिल घबराता था हौल दिल होता था वो सब इस बार इन के लिए होता है। बच्चों का तो ध्यान ही नहीं आता बस इन्हें ही मिस करते रहते हैं। कहने को तो ये मेरे पति हैं लेकिन 25 सालों से इन्हें भी बच्चे की ही तरह पाला है। सब से पहला बच्चा तो यही है। अपनी हर ज़रुरत के लिए मुझ पर आश्रित। अपनी नौकरी और नेतागिरी के अलावा हर बात पर मुझ पर निर्भर। अब अकेले कैसे सब संभालते होंगे। यही सब सोच कर कलेजा मुंह को आता है। सही बात है लंबे समय तक साथ रहने पर पति पत्नी को एक दूसरे की आदत हो जाती है। एक दूसरे की कमी महसूस होती है। उन का तो पता नहीं लेकिन मेरा मन नहीं लगता बिलकुल भी उन के बिना। लखनऊ में भी अगर ये दो चार दिन को कहीं चले जाते थे तो एक दिन तो आजादी अच्छी लगती थी लेकिन उस के बाद इन के लौटने का ही इंतजार रहता था। जब कि इन के अलावा सब कुछ मौजूद रहता था। तो यहां तो कुछ भी नहीं है मन लगाने को। दिन रात बस घर वालों को याद करना है। सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना काम है नहाना और खाना। लोगों के बीच में स्टैंडर्ड बनाए रखने के लिए काम वाली भी रखनी पड़ती है जो कपड़े धोती है, बरतन साफ करती है और बाक़ीके सारे काम भी करती है तो करने को भी कुछ नहीं। और पढ़े तो कितना पढ़ें। हर समय पढ़ना , मन ठीक न हो तो पढ़ना भी अच्छा नहीं लगता। मन ही नहीं लगता पढ़ने में। मन करता है भाग कर घर पहुंच जाऊं अपने घर। लेकिन कहां संभव है। मन मसोस के चुपचाप बैठे रहते हैं। आजकल माइंड कंट्रोल की एक किताब पढ़ रहे हैं। लेकिन सब किताबी बातें हैं। मन कहीं भी नहीं रुकता। भाग कर अपने बच्चों , पति में पहुंच जाता है। बच्चों की क्या सब की ज़िंदगी ही चल रही है। अगर मेरे जेल आने से कोई प्रभावित है तो वो बस पतिदेव ही हैं। उन्हीं की ज़िंदगी उदास हो गई है मेरे बिना। उन्हें तो कोई शौक , आदत भी नहीं है । पता नहीं कैसे अपना समय काटते होंगे ? किस चीज़में अपना मन लगाते होंगे ? चलो ये भी समय कट ही रहा है और हमारे संबंधों को और मजबूती दे रहा है। एक दूसरे की अहमियत पता चल रही है। मुझे याद है एक बार इन्हों ने कहा था  ‘नीरू मुझ से पहले मत मरना। मुझे तो कुछ भी नहीं पता।’ लेकिन देखो ज़िंदगी ने उन्हें मेरे बिना रहना सिखा दिया। पहली बार हम लोग इतने लंबे समय के लिए अलग हुए हैं। पंद्रह-बीस दिन से ज़्यादा कभी भी अलग-अलग नहीं रहे हम लोग, इन पच्चीस सालों में। लेकिन ज़िंदगी ने ये दिन भी दिखा दिया, अलग-अलग रह रहे हैं, जिंदा भी हैं। सारे काम भी कर रहे हैं। ज़िंदगी तो चल ही रही है रुका तो कुछ भी नहीं। ज़िंदगी हर हाल में चलती ही है।

जेल में रहने पर इंसान को कितना बेशर्म बनना पड़ता है। हर बात बर्दाश्त करनी पड़ती है। हर किसी का मुंह देखना पड़ता है। अपने घर पर होते तो शायद आज अंजना का दिमाग सीधा ही कर देते। इतनी बेइज्जती और फिर भी हम चुप रहे अपने को कंट्रोल किये हुए हैं। मेरे ही फट्टे पर आ कर मेरे ही आस पास बैठे सभी को मीठा ऑफर करना और मेरी तरफ देखना भी नहीं। बुरी तरह से इग्नोर किया मुझे। ये भी एन.आर.एच.एम. में ही अंदर है। एन.जी.ओ. वाली है। नसबंदी के आपरेशन में इस की चार्जशीट आई है। 3 महीने हो गया है इसे जेल आए हुए। चांदनी, वंदना, मित्रा, अंजना और हम एक साथ ही रहते हैं। हम ही बिलकुल सामान्य तरीके से यहां रहते हैं और सामान्य ही हैं हम। कोई मुलाक़ात भी नहीं आती हमारी। तो हमें ये किसी गिनती में ही नहीं रखतीं। चांदनी तो खैर बड़े आदमी हैं और वंदना विधायक की पत्नी है। वंदना के ही आगे पीछे चमचागिरी करती रहती है। मुलाक़ात तो इस की भी कोई नहीं आती। लेकिन ये मित्रा के साथ काम कर चुकी है तो उन्हीं के साथ रहती है। मित्रा दी यहां की लोकल हैं । उन के पति सी.एम.ओ. नोएडा हैं । हर रविवार इन की मुलाक़ात आती है। किसी भी सामान की कमी नहीं है इन्हें। तो अंजना इन्हीं के साथ लगी रहती है। मुझे ही कुछ नहीं समझती। शादी नहीं की है इस ने। बड़ा ही खड़ूस स्वभाव है। हर समय हांकती रहती है। गलत बात मुझे बर्दाश्त नहीं होती। हम टोक देते हैं। तो हम से चिढ़ती है। अब तो हम उस से बोलते ही नहीं है। तब भी इतना तो है ही कि साथ ही खाते पीते हैं सब लोग। तो एक दूसरे को ऑफर भी करते हैं। लेकिन ये दो बार ऐसा कर चुकी है। अब इस बात का बवाल करने से कोई फायदा नहीं, अपनी ही बेइज्जती है। लेकिन चलो इस से मैं ने अपने गुस्से पर काबू पाना सीख लिया। उस का व्यवहार उस के साथ, मेरा मेरे साथ। बुरे घर में बैठ कर भी चुगली करना, दूसरे की बुराई करना, पंचायत करना बिलकुल भी सकारात्मक सोच न रखना। कम से कम यहां तो इंसान को अपने अंतर्मन में झांक कर सही आचरण करना चाहिए। कोई नहीं हम सब को सुधार नहीं सकते। अपने को ही ठीक रख लें। यही बहुत है।

महिला बैरक में जब नई बंदी आती है तो उसे लगता है कि वो तो निर्दोष फंस गई है और बाक़ीजो अंदर हैं वो सब तो जुर्म कर के ही आई हैं। ऐसी हिकारत की दृष्टि से बाक़ीसब को देखती है कि क्या बताएं। दो चार दिन में फिर कोई नई आती है और यही व्यवहार उस के साथ होता है तो उसे समझ आता है कि सभी दोषी नहीं होते। अब तो ये सब देख कर हंसी ही आती है। भगवान की ही मर्जी है कि वो जिस को जहां चाहे पटक दें और हमें उस की मर्जी के आगे सिर झुकाना है। उस की रजा में ही राजी रहना है। वैसे ये भी एक दुनिया ही है बिलकुल अलग। 150 महिलाएं अलग-अलग घरों की एक साथ रहते हुए एक परिवार की तरह। कभी सुख-दुख साझे करते हुए तो कभी आपस में ही लड़ते हुए। एक दूसरे के खून के प्यासे होते हुए।

सांस का मतलब जान नहीं है
जीना कोई आसान नहीं है।

आज मेरी तारीख़थी। 15 महिलाएं गई थीं। कुल मिला कर चार बच्चे भी थे। उन बच्चों को देख कर बड़ा तरस आया कि ये बच्चे बेचारे इन्हों ने ज़िंदगी में कुछ भी नहीं देखा है। वज्र वाहन से जाते हुए रास्ते में जो भी गाड़ियां दिखती थीं बड़े आश्चर्य से देखते थे सब। गाड़ियों की आवाजें लोगों की चिल्ल-पों सब सुन कर बच्चे चकरा रहे थे। दम साधे गाड़ी से बाहर देख रहे थे। हवालात में बच्चे बैठे थे तभी पेड़ पर बंदर आ गए। उन के लिए वो बड़ी अनोखी चीज़थी। सब उसे उछलते कूदते देख कर इतना ख़ुश हो रहे थे कि क्या बताएं? यही हाल कुत्तों को देख कर भी हो रहा था। ये बच्चे जिन्हों ने आंखें खुलते ही महिला बैरक जेल गाजियाबाद ही देखा है। बाहर की दुनिया वो बेचारे क्या जानें? पेशी , तारीख़, जेल , कचहरी यही उन के जाने पहचाने शब्द हैं। आपस में सब एक-दूसरे से पूछते हैं कि मैं तो हत्या में हूं , तू किस में है? एक ने तो अपनी मां से कहा कि मैं तुम्हारी वजह से जेल काट रहा हूं। इतनी सी उम्र में इस तरह की बातें ? इन का बचपन तो ख़त्म हो गया। ख़त्म क्या लगता है कभी आया नहीं। ये बच्चे सीधे बड़े हो गए हैं। बेचारे रास्ते में, कचहरी में ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे चिड़ियाघर से जानवर छूट कर आए हैं। अपनी सुरक्षित दुनिया से निकल कर , ज़िंदगी में कुछ देखा ही नहीं है। एक़दमसे सब देख कर बौरा गए हैं। इन बच्चों की मांओं की सज़ाख़त्म होने के बाद इन बच्चों का भविष्य क्या होगा? क्या ये सामान्य जीवन जी सकेंगे कभी भी ? या अगली पीढ़ी अपराधी की तैयार हो रही है ? मां बहन की गालियां देना तो इन बच्चों के लिए आम बात है। जो गालियां हम सोचने में भी संकोच करते हैं ये बच्चे वो गालियां धड़ल्ले से देते हैं। जिन बातों का , गालियों का मतलब भी ये नहीं जानते हैं , उसे भी बड़ी सहजता से बोलते रहते हैं। फट्टे पर सोना , लाइन में लग कर खाना , शाम को छह बजे ही बैरक में बंद होना , खटका सुनना , पुलिस वालियों की गालियां सुनना इन के लिए आम बात है। इस में कुछ भी गलत नहीं है। जेल का इन को कोई भय नहीं है। पता नहीं आगे की ज़िंदगी में ये बच्चे इस चीज़को किस तरह लेते हैं? इस से कुछ सीखते हैं या जेल का भय ही इन की ज़िंदगी से निकल जाता है। क्या पता ? शायद इन बच्चों की क़िस्मत इसी तरह से लिखी गई होगी ? सही बात है भगवान पहले से ही तय रखते हैं कि किस को आगे चल कर कैसा बनना है ? अपने बच्चे सही से बचपन बिता कर संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के साथ ज़िंदगी में एक मुकाम पर पहुंच सके हैं तो ये भगवान का ही आशीर्वाद है। उस की मेहर है हम पर।

नए डी.आई.जी. जेल के आने से और मथुरा जेल में हत्या होने से डासना में भी बहुत सख्ती हो गई है। कभी भी डी.आई.जी. तलाशी करा सकते हैं , इस का हल्ला कई दिन से हो रहा था। रविवार को पुरुषों की तरफ तलाशी हुई थी। हमने भी कभी तलाशी नहीं देखी थी तो मन में ये उत्सुकता भी थी कि चलो ये भी देखा जाए। कल जेलर ने आ कर कहा कि जिस के पास भी एक हजार रुपए से ज़्यादा रुपए हों वो जमा करा दे। उसे रसीद मिलेगी और जब भी ज़रुरत होगी उसे पैसा मिल जाएगा। तीन बैरक मिला कर मतलब 150 महिलाओं में डेढ़ लाख रुपए इकट्ठे हो गए। बाप रे इतना पैसा और जिन के पास उम्मीद नहीं थी उन के पास से दसियों हजार रुपए निकले।

आज तीनों बैरक की तलाशी हुई। एक-एक सामान झाड़-झाड़ कर देखा गया। एक महिला के पास मोबाइल भी मिला जो उस ने अपने झोले के अंदर कपड़े के नीचे सिल रखा था जो झोला झाड़ने पर जमीन पर टन्न से बोला। पूरी बैरक में हल्ला मच गया। इतना शोर और इतनी अफवाहें पांच मिनट में फैल गई कि पूछो नहीं। जिस महिला की कोई मुलाक़ात नहीं आती उसके पास से मोबाइल और दस हजार रुपए मिले। पुलिस वालियां तो घबरा गईं। तुरंत बात को दबाने लगी कि बात ज़्यादा फैली तो उन्हीं लोगों पर कार्यवाही होगी। लेकिन फिर वो लोग इतना सजग हो गईं कि एक-एक के फट्टे की सघन तलाशी ली गई। पूरा सामान फैला दिया। 6.30 बजे शाम तक यही सब चलता रहा। उस के बाद दो घंटे सब समेटने में लग गया। बुरी तरह पस्त हो गए सब लोग। एक-एक के सामने कितना सारा सामान इकट्ठा हो जाता है। पूरा बैरक फैला पड़ा था। देख कर ही दहशत हो रही थी। मन में बिलकुल सन्नाटा फैल गया था कि क्या है ज़िंदगी ? कितने करवट बदलेगी और क्या-क्या रूप दिखाएगी ? हम लोगों की कोई भी इज्जत नहीं है। ज़रा सी भी प्राइवेसी नहीं है। इस तरह से ये पुलिसवालियां सारा सामान चेक कर रही थीं। जैसे हमारी इज्जत ही लूटे ले रहे हों। हम लोगों की हैसियत कीड़े मकोड़ों से ज़्यादा नहीं है। जब चाहे , जो भी चाहे दुत्कार दे। जैसे चाहे बात करे जैसे चाहे डील करें। क्या अब ज़िंदगी में यही सब है ? पहले वाले दिन क्या कभी नहीं लौटेंगे ? सुख के दिन बीत गए क्या ? अब ये ज़िंदगी ऐसे ही कट जानी है। ये सब जब हमारे साथ होता है तो ज़िंदगी से विरक्ति होने लगती है। मन करता है कि भगवान से कहें कि इस से अच्छा तो तू मुझे उठा ही ले ! इस तरह की ज़िंदगी भी भला कोई ज़िंदगी है ? आत्महत्या करने की हिम्मत तो खैर नहीं है मुझ में लेकिन भगवान से तो मौत मांग ही सकते हैं। अब तो सारे कष्टों का अंत कर दो प्रभु। ऐसी ज़िंदगी से तो अच्छा है उठा ही लो।

बंदी, बंदी ही होता है। जेल प्रशासन ऊपर से चाहे जितना प्यार दिखाए। आप के पैसे और प्रभाव के कारण आप से दबे। लेकिन मन से वो आप को एक कीड़े मकोड़े से ज़्यादा नहीं समझता। और यही हकीकत भी है। इन की चाहे जितनी इज्जत करो इन का सम्मान करो लेकिन कुछ नहीं हो सकता। हम इन की नजरों में अपराधी ही हैं। एक बार आप जेल पहुंच गए तो आप की इज्जत दो कौड़ी की हो जाती है। लोग इंसान समझना ही बंद कर देते हैं।

आज ऊपर वाली बैरक की वनिता/विमल से बात हुई। जेल में आप का नाम आप के पति के नाम के साथ लिया जाता है। जैसे उपमा/विनय। और जिस की शादी नहीं हुई है उस के नाम के आगे पिता का नाम जैसे वनिता/विमल बस यही आप की पहचान रह जाती है। वनिता पर केस है कि उस ने अपने भाई के साथ मिल कर लड़की पर एसिड डाला। जिस लड़की पर एसिड पड़ा था उस के घर वालों ने रिपोर्ट की थी कि चार लोगों ने लड़की पर एसिड डाला जिसमें एक अज्ञात लड़की भी थी। वनिता का भाई नामजद था। पुलिस जब इस के घर पहुंची तो वनिता घर पर ही थी तो पुलिस अज्ञात लड़की की जगह वनिता को ले आई। साल भर हो गया इसे जेल आए हुए। इस का भाई जो नामजद है जब तक वो आत्म समर्पण नहीं करेगा इस की ज़मानतनहीं होगी। वो भगा-भगा फिर रहा है और ये लड़की यहां जेल में सड़ रही है। एसिड डालते हुए किसी ने नहीं देखा न इस के हाथ पर कोई निशान हैं न ही कोई चश्मदीद गवाह। लेकिन जब तक भाई सरेंडर नहीं करेगा इसे यहीं जेल में रहना होगा। बेचारी 20-22 साल की लड़की बिना किसी ग़लती के साल भर से जेल में है। इस का तो भविष्य ही बरबाद हो गया। इसी तरह से पचासों लोग पड़े हुए है यहां।

आजकल इतनी ठंड पड़ रही है कि क्या बताया जाए ? और इसी में कचहरी की हवालात में तीन चार घंटे बैठना। ठंड के मारे हालत ही ख़राब हो जाती है। वकीलों की हड़ताल के चलते डेट का सिगनेचर कर के हवालात में लौट आना होता है तुरंत ही। किसी तरह रुक भी पाए तो ज़्यादा से ज़्यादा आधा घंटा। फिर तो वापस हवालात में ही आना होता है। और सब की डेट लगते-लगते पांच बज जाता है। उस ठंड में ज़रा सी जगह में हवालात में बैठ कर हालत ही ख़राब हो जाती है। बिलकुल अकड़ ही जाता है इंसान। लेकिन क्या करें और कोई दूसरा उपाय भी नहीं है। और फिर वही बात कि हम लोगों को इंसान समझता ही कौन है जो हम लोगों की तकलीफ किसी को नजर आए। चलो भगवान जब तक सह सकते हैं सह ही रहे हैं। आगे तुम्हारी मर्जी।

आज वज्र वाहन में आगे ड्राइवर के साथ बैठ कर जाना पड़ा क्यों कि सुबह मेरी तारीख़ही नहीं आई। बाद में जब कचहरी से फ़ोन आया तो महिला गाड़ी जा चुकी थी तो मुझे पुरुषों की गाड़ी में आगे बैठ कर जाना पड़ा। आज ये अनुभव भी लिया। दीवान जी बेचारे बहुत शरीफ थे। कहने लगे कि जब आप लखनऊ से यहां तारीख़लगाने आएंगे, यहां आप का कोई नहीं है तो आप पति पत्नी के लिए हमारा घर खुला हुआ है, यहां आइए अपनी तारीख़कीजिए और वापस लखनऊ जाइए। देर से पहुंचने पर डर ही रहे थे कि ये लौट न जाएं। लेकिन ये थे। आज हम इन का हाथ पकड़ कर ख़ूब रोये कि तुम्हारी बहुत चिंता रहती है। ये बोले, धैर्य रखो। समय बहुत ख़राब है। लेकिन धीमे-धीमे सब ठीक हो जाएगा। मुदित भइया ये जानने के बाद कि हम 20 वाली तारीख़पर रो रहे थे और उन से बात भी नहीं हो पाई थी तो वो आज कॉलेज ही नहीं गए कि मम्मी से बात करनी है। और मुझे समझा रहे थे कि मम्मी हिम्मत रखो। मेरी ज़िंदगी भर की कमाई, मेरी जमा पूंजी मेरे आदमी और बच्चे ही हैं जो इस बुरे समय में भी मेरे साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हैं। मुझ से ज़्यादा मेरी चिंता करते हैं। यहां आ कर हर तरह के लोगों से मिल कर ये लगता है कि अगर बाहर आप की पैरवी करने वाला कोई है तो आप जेल में नहीं रह सकते। आप की ज़मानतहो ही जाती है और आप बाहर चले जाते हैं। तो मेरा तो पूरा परिवार ही मेरे साथ है। तो मुझे किस बात की चिंता? हम भी बाहर जाएंगे ही। लेकिन क्या अंदर क्या बाहर? सी.बी.आई. से पीछा तो छूटेगा नहीं। इसी में ज़िंदगी बीत जानी है। समझ ही नहीं आता कि बाहर जाने की प्रार्थना करें या और चार्जशीट आने की। कि जब तक अंदर है और भी आ जाएं। इकट्ठे ही ज़मानतकराएं। फिर सोचते हैं चलो छोड़ो जो भगवान की मर्जी होगी वो जो मेरे लिए सही समझेंगे, करेंगे। हमें चिंता करने की क्या ज़रुरत?

चलिए जी आज पता चला कि मेरी ज़मानतहो गई। पूरा सच तो पता नहीं पर चांदनी ने इतना ही बताया। बाक़ीडिटेल तो बाद में ही पता चलेगा। लेकिन एक तसल्ली तो हुई। वैसे भगवान की माया भगवान ही जाने। अंजना को तो जैसे सदमा लग गया, सुन कर। पूरी बैरक ने बधाई दी एक अंजना को छोड़ कर पता नहीं कैसे-कैसे लोग होते हैं। दूसरे की खुशी ज़रा भी बर्दाश्त नहीं होती। ये भी एक तरह की विशेषता होती है लोगों की।

आज जेल अधीक्षक से मुलाक़ात हुई। रमेश ने उन्हें मेरे बारे में बताया था तो मिलने को बुलाया था कि कहीं कोई दिक्क़ततो नहीं ? करीब 15-20 मिनट तक बात करते रहे कि कोई दिक्क़तहो तो बताइएगा। काफी सभ्य इंसान लगे। इस बार जेल अधीक्षक और जेलर दोनों ही अच्छे इंसान हैं पहले वाले की अपेक्षाकृत।

इस बार हमारी बैरक में एक किन्नर भी है। वैसे तो इन लोगों के लिए तनहाई होती है। लेकिन ये अकेली थी और थोड़ी बच्ची सी भी है। तो यहीं महिला बैरक में रह रही है। वैसे उस से किसी को भी कोई परेशानी नहीं है। अपने में ही रहती है कुछ भी ऐसा नहीं करती जो अलग से दिखे। लेकिन फिर भी एक किन्नर के साथ रहना अपने आप में बहुत अजीब सा लगता है। उसी के साथ मायावती रहती है। मायावती को यहां आए तीन महीने हो गए हैं। उस का पति तो साल भर से यहां है, पिछले दिसंबर से। सारे 420 के मामले हैं चेक बाउंस आदि के। पूना, चंडीगढ़ और गाजियाबाद। ये तीसरी जेल है मायावती की। चार केस तो यहीं गाजियाबाद में हैं उस के। दोनों पति-पत्नी अंदर हैं। बहनें लगी हुई हैं उस की ज़मानतमें। बच्चे अनाथों जैसे पड़े हुए हैं । कभी किसी रिश्तेदार के घर कभी किसी के। इन सब को देखो तो खुद को बहुत तसल्ली होती है कि चलो हमारे साथ इतनी दिक्क़तनहीं है। बच्चे बड़े ही समझदार हैं । मुझे कम से कम उन की चिंता तो नहीं करनी पड़ती है। भगवान कहीं न कहीं तो बैलेंस रखते ही हैं।

डाक्टर मित्रा बता रही थीं कि मेरी बेल नहीं हुई है। जज ने कोई कागज मांगा है। ये अनिश्चय की स्थिति बहुत खतरनाक होती है कि बेल हुई कि नहीं और आप किसी से पूछ कर कनफर्म भी नहीं कर सकते। ये बेबसी का एहसास और भी तोड़ डालता है। कि इतनी ज़रा सी बात जानने के लिए भी हम दूसरों पर निर्भर हैं। कल तो और भी बुरी हालत थी। सुबह ही मेरी तारीख़बोली गई। तारीख़तो मेरी परसों थी। हमने कहा मेरी तारीख़नहीं है। लेकिन कोई माना नहीं सर्किल के जेलर से पुछवाया तो उन्हों ने भी यही कहा कि तारीख़है और जब जेलर कहेगा कि तारीख़है तो जाना ही पड़ेगा। और तारीख़तो है नहीं। तो कचहरी तो जाते नहीं। वहीं हवालात में ठंड में बैठना पड़ता। सोच कर ही रूह कांप रही थी। न चाहते हुए भी जाना पड़ता। वो तो बाद में कनफर्म हुआ कि नहीं मेरी तारीख़नहीं है। तब जा कर जान में जान लौटी। क्या है ये सब कितनी मानसिक परेशानियां मिलनी बाक़ीहै अभी।

जेल में रात में पहरा रहता है। सिपाही गश्त लगाते हैं। सिपाही अपने बैरक की गश्त हर दस मिनट में पूरी करते हैं। फिर उन्हें गेट बुक में टाइम डाल कर साइन करना होता है और चीफ को दो घंटे में पूरे जेल का चक्कर ले कर गेटबुक में साइन करना होता है। उसी बीच में वो महिला बैरक का गेट भी खटखटाते हैं तो महिला सिपाही कहती है ‘‘हां सब ठीक है।’’ हम लोग तो रात में जगते ही रहते हैं तो सब सुनते रहते हैं। आज ड्यूटी बदलते समय सुबह 6.30 बजे बैरक खुलवाने को जब महिला पुलिस आई तो जेलर साहब साथ में थे। वो गेट खटखटा रहे थे और अंदर से महिला पुलिस नींद में बोल रही हां सब ठीक है। उन्हें लग रहा था कि रात के डेढ़ दो बज रहे हैं। वो तो मायावती ने अंदर से कहा सब ठीक नहीं है 6.30 बज रहा है उठिए आप लोग। तब महिला पुलिस उठी। फिर जेलर साहब बैरक खुलवा कर चले गए। ये तो नियम है जेल के।

आज दमयंती आंटी ने कहा मेरा मन है कि आप लोगों को कुछ खिलाऊं। फिर जब कैंटीन आईं तो उन्हों ने गुलाब जामुन खिलाए हम सब को। दमयंती आंटी भी दहेज हत्या में आई हैं। उन की बहू जल कर मर गई थी। चार साल पहले। तो जेल आई थीं। फिर ज़मानतपर चली गई थीं लेकिन बेटा नहीं जा पाया था। फिर इसी बीच में इन के पति का देहांत हो गया और इन्हें आजीवन कारावास हो गया। एक बेटी ही है वही भाग दौड़ कर के ज़मानतकरा चुकी है। बस अब जमानती भरने बाक़ीहैं। लेकिन बेटे की ज़मानतनहीं हुई वो चार साल से जेल में ही हैं। एच.सी.एल. में नौकरी करता था वो। तो जेल का कंप्यूटर से संबंधित सारा काम वही देखता है। बड़ा मेहनती है। जेलर साहब बहुत मानते हैं। अब इंसान क्या करे? पांच-पांच साल तक ज़मानतन होने पर अगर कुछ कार्य भी न करे और खाली जेल में समय काटे तो कट भी नहीं सकता। ऐसे दिन भर बिजी रहने से समय कट जाता है और इंसान जब थक कर रात में बिस्तर पर जाता है तो बेसुध सोता है और काम करते रहने से पूरे जेल में कहीं भी घूम सकता है बिलकुल फ्री। एक जगह बैठने का बंधन नहीं होता। तो समय भी कट जाता है। नहीं तो इतने दिनों में तो इंसान पागल ही हो जाए। जिन भी लड़कों की पत्नियों ने आत्म हत्या की है तो परिवार की ज़मानतचाहे हो जाए लेकिन उस लड़के की ज़मानततो नहीं ही होती है। ऐसे लड़कों से जेल भरी पड़ी है। सारे जवान लड़के। उन का भविष्य यहां चौपट हो रहा है।

आज कई दिन बाद लिखने बैठे हैं। बड़ी संशय की स्थिति है हमारी ज़मानतकी भी। कि हुई कि नहीं? वैसे बहुत अपने मन को समझाते हैं फिर भी लगता है कि पता तो चले कि सच क्या है? उसी तरह से अपना मेंटल स्टेटस रखें लेकिन हो नहीं पा रहा। इसी लिए कुछ लिखने का भी मन नहीं कर रहा था। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा। चलो अब तो सोमवार को तारीख़है। तभी पता चलेगा। बच्चों का भी बड़ा ध्यान आ रहा है हर समय दिमाग वहीं भागता रहता है। लेकिन क्या करें, न कोई ख़बर आ सकती है न जा सकती है। ठंड और बारिश के मारे बुरा हाल है। बैरक में ही बैठे रहते हैं दिन भर। कहीं निकलने को जगह ही नहीं। पानी भरा हुआ है सब जगह। अब तो न लूडो खेलने में मन लगता है न ताश में। लेकिन करें भी क्या? और पढ़ें भी तो कितना। चलो कभी-कभी मन ऐसा भी रहता है और जब हालात हमारे वश में नहीं होते तो करें भी क्या ?

अब तो लगता है कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है पता नहीं। सारी दुनिया से कट कर इंसान यहां बैठा है। बराक ओबामा आ के चले गए हम ने देखा भी नहीं। हां बस कोली की सज़ाफांसी से आजीवन में बदल गई बस यही पता चला। यही कल की गरमागरम ख़बर थी।

ड्यूटी पर जो पुलिसवालियां होती हैं वो भी सब बस ऐसी ही हैं देहाती सी, जिन्हें दीन दुनिया से कोई मतलब नहीं बस जेल की औरतों के प्रपंच और पैसा कैसे निकलवाया जाए बस इसी में सारा दिमाग चलता है। जरा-ज़रा सी बात के पैसे बना लेती हैं। आप के घर वालों को मिसकॉल देंगी। वो उधर से फ़ोन करेंगे। सिर्फ़ मिसकाल देने के पचास रुपए ले लेती है। ये तो कमाई के तरीके हैं ।

यहां भी लोग कमाई के धंधे ढूंढ़ लेते हैं। हम जैसे कुछ लोग है जो लाइन में लग कर खाना नहीं लेते बर्तन नहीं मांजते , उन लोगों के लिए ऐसी कई औरतें मिल जाती हैं , जो आप का खाना ला देती हैं , बर्तन साफ कर देती हैं , आप का बिस्तर झाड़ देती हैं। कपड़े धो कर, सुखा कर, तहा कर रखती हैं इस काम के एक हजार रुपए महीने लेती हैं तो उन का खर्चा आराम से निकल जाता है। रोटी बनाने का नंबर आता है तो तीस रुपए ले कर उन के हिस्से की रोटी बना देती हैं तो ऐसे दोनों वक्त का मिला कर साठ रुपए कमा लेती हैं। जो गर्भवती महिलाएं हैं , या छोटे बच्चे हैं हर एक को जेल की तरफ से आधा लीटर दूध पैकेट वाला आता है। बीमार महिलाओं का भी आता है। तो उसे ये औरतें बेच देती हैं। इन लोगों के लिए अंडे भी आते हैं वो अंडे भी ये लोग बेचते हैं। इस तरह से अपनी छोटी मोटी ज़रुरतों के लिए पैसे इकट्ठा करती हैं। हाय ये मजबूरी।

इंसान अपनी ज़िंदगी में पढ़ता लिखता है , मेहनत करता है , पैसा कमाता है अपनी ज़िंदगी व्यवस्थित करता है , सुख सुविधाएं इकट्ठा करता है कि उसे आगे चल कर ज़िंदगी में कष्ट न हो। रोज का संघर्ष न हो। आज इन बातों की अहमियत पता चली जब दैनिक कार्यों का भी संघर्ष है। रोज सुबह उठने के साथ ही संघर्ष शुरू, कि रोजमर्रा के सब काम सुचारु रूप से अपने समय से हो सकें।

ये बात भी सही है कि दो महिलाएं एक साथ सुख पूर्वक नहीं रह सकतीं और यहां तो 160 महिलाएं हैं। अलग-अलग स्वभाव की। कैसे एक साथ सब की निभी। और यहां कोई काम भी नहीं। तो ताक़त भी बहुत बची रहती है सब में। तो कहां उसे खर्च करें एक दूसरे के प्रपंच में ही लगी रहती हैं हर समय। हमें तो बिलकुल भी आदत नहीं है। बड़ा मुश्किल हो रहा है उन सब के बीच में समय काटना। और मुंह भी बंद रखें तो कब तक रखें। एक न एक वाक्य निकल जाता है और हंगामा शुरू। अब देते रहो सब को जवाब।

हमारी ज़िंदगी में प्रकृति का कितना महत्व है। ये यहां रह कर पता चला। अपने घर में तो इंसान मौसम की मार से बचने का हर इंतजाम रखता है। प्रकृति के पास भी घूमने जाता है तो रहने खाने की सहूलियत ध्यान रखता है। घूमने जब जाता है तभी मौसम पता चलता है। मौसम ख़राब हो तो अपने कमरे में बैठता है। यहां जेल में मौसम के मिजाज का पता चल रहा है कि आज सूरज थोड़ा ज़्यादा निकला तो मौसम गर्म हो गया। उस दीवाल पर धूप ज़्यादा पड़ी तो वहां हवा रुक गई। हवा रुकने से कितनी राहत हो गई, एक-एक बात का पता यहां चलता है।

आज मन बहुत परेशान रहा। रात भर सपना देखते रहे बुरा-बुरा सा। और सुबह-सुबह तो पतिदेव को ही बीमार अस्पताल में भर्ती देखा। तब से एक पल भी चैन नहीं आ रहा। किसी भी तरह समय नहीं कट रहा। अब कल तारीख़है। तभी कोई खोज ख़बर मिलेगी सब की। तब तक तो किसी न किसी तरह सब्र करना ही है। मजबूरी भी क्या चीज़होती है। कितने बेबस हैं हम यहां। चाह कर के भी किसी से बात नहीं कर सकते। बात क्या करना खोज ख़बर भी नहीं ले सकते। ज़िंदगी में ये दिन भी आयेंगे कभी सोचा भी न था।



मजबूरी इंसान से क्या-क्या करा देती है। कल योगिता यादव से बात हुई उसने बताया कि उस के भाई की हत्या हुई थी दस साल पहले। जिन लोगों ने हत्या कराई थी उन्हें सज़ाभी हुई। आपसी रंजिश बढ़ती गई। दूसरी पार्टी के घर के किसी सदस्य की हत्या हो गई, तो उन्हों ने एफ.आई.आर. की इन के भाई और अज्ञात लोगों के खिलाफ। योगिता के बेटे को गिरतार कर लिया और कहा कि भाई बचा लो या बेटा। बेटे को भी ऐसे ही मार-मार कर कबूल करवाया कि हां मैं ने हत्या की है। बेटा नाबालिग था तो उसे मेरठ के किशोर सुधार गृह भेजा गया। दूसरी पार्टी ने पैसे खिला कर अपने कुछ गुंडे वहां भिजवा दिए वो तो उसे मार ही डालते लेकिन दो दिन बाद उस की तारीख़थी। जज के सामने उसे पेश करना था इस लिए संभल-संभल कर मारा था। पेशी पर जब बच्चा गया तो उस ने किसी के फ़ोन से अपनी बहन को मेसेज किया कि ये लोग मुझे मार डालेंगे। उस बच्चे के पापा भी पुलिस में दीवान हैं और दादा इंस्पेक्टर रह चुके हैं तो पुलिस ने बहुत साथ दिया। उस बच्चे ने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए अपनी उम्र बढ़ा कर लिखाई थी जिस से उस को बालिग साबित किया जा सकता था। लेकिन फिर भी मां को घर पर नकली मार्क्सशीट बनाने के जुर्म में जेल जाना पड़ेगा। दूसरी पार्टी का कहना था कि मां जेल जानी चाहिए , चाहे दो घंटे को जाए। इस के लिए बहुत पैसे खिालाए थे। योगिता बोली मुझे जेल पहुंचा दो लेकिन मेरा बच्चा बचा लो। तो वो ड्राइविंग लाइसेंस लगा कर उसे बालिग बता कर रात डेढ़ बजे डासना जेल लाया गया। जेल ने इतनी रात में लेने से मना कर दिया तो रात भर मसूरी थाने में रखा गया और सुबह जेल लाया गया। तब जा कर उस बच्चे की जान बची। लेकिन इन की फेमिली पुलिस वाली थी तो सारे पुलिस वाले एक हो गए तब जा कर वो बच्चा बचा पाए और सपाइयों से इन का तगड़ा कनेक्शन था। कोई आम आदमी होता तो उस का बच्चा मर ही जाता। लेकिन आम आदमी होता तो इतनी दुश्मनी ही क्यों होती? ये भी बात है। योगिता की ज़मानतसेशन से ही हो जानी है लेकिन जब से आई है वकीलों की हड़ताल चल रही है तो तीन महीने से ज़्यादा हो गया है उन्हें यहां रहते-रहते।

आज सुपरिंटेंडेंट के पास कुछ हिंदी में काम की बात थी तो चांदनी ने मेरा नाम लिया और बोली कि वो पढ़ती रहती है और अच्छा बोलती है तो उन्हों ने तुरंत फार्मासिस्ट से पूछा कि उन की ब्रेड की प्राब्लम साल्व हुई कि नहीं ? उन्हें इतना याद रहा वही बड़ी बात है। जेल में रोज रात में एक घंटे कुछ अच्छी-अच्छी चीजें टेलीकास्ट की जाएंगी तो उसी क्रम में सब से पहले पार्वती खान को शो दिखाया जाना था। तो पार्वती खान के बारे में एक पेज हिंदी इंग्लिश में बोलना था तो हिंदी का अनुवाद मेरे जिम्मे था। कर के तो दे दिया था। लेकिन आज तो टेलीकास्ट नहीं हुआ। सुपरिंटेंडेंट कहीं बिजी थे। शायद कल से शुरू हो। इसी सिलसिले में गमन और बंदिनी पिक्चर भी दिखाई जानी है। काफी प्रगतिशील विचारों के हैं अधीक्षक और रचनात्मकता भी है। सब से बड़ी बात है बंदी को भी इंसान समझते हैं। जब मुझे मिलने को बुलाया था तो सब से पहले कुर्सी आफर की कि बैठिए आराम से। फिर बताइए आप को कोई परेशानी तो नहीं। यही बड़ी बात है। इतना सम्मान तो हम बंदियों को मिला। ये दो कौड़ी के सिपाही बेइज्जती कर देते हैं लेकिन साहब इज्जत देते हैं।

आज बुलबुल ने फ़ोन पर डांटा कि रोती क्यों हो? अब कौन बताए कि इतने-इतने दिन बाद जेल से कचहरी जाने पर बच्चों की आवाज़ सुन कर उन की बचपन की ही तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है और लगता है मेरे छोटे-छोटे बच्चे कैसे रहते होंगे। जब डांट पड़ती है तो समझ आता है कि अरे ये तो बड़े हो गए हैं। हमें ही संभालने लगे हैं। है न बिलकुल सही बात। अपने बच्चों पर फख्र होता है। मेरे प्यारे-प्यारे बच्चे। आज मेरी तारीख़पर घर से किसी को नहीं आना था तब भी दो लोग मेरे साथ थे। सोनू अस्पताल से आ गया था और कांता को हमने बुलाया था। भगवान कितना सहायक है वरना तारीख़पर आप का कोई अपना न हो तो इतना बुरा लगता है कि आप का इस दुनिया में कोई भी नहीं है। कि आप जेल जैसी जगह से आए हैं और कोई आप का हाल पूछने वाला भी नहीं है। लेकिन मेरा तो भगवान सहायक है। अभी तक कोई भी तारीख़खाली नहीं गई है।

आज पूरी बीस ए.एन.एम. बिजनौर से आ गईं। सब पचास के ऊपर की हैं। लगता भी नहीं कि ये हाईकोर्ट का केस लड़ पाएंगी। और इतनी भोली हैं सब कि अपना केस भी नहीं मालूम है इन को। पता नहीं क्या होगा अब ? दिन पर दिन भीड़ बढ़ती जा रही है। जब हम आए थे तो 126 महिलाएं थीं जेल में। अब 169 हैं। पूरी महिला बैरक ठसाठस भरी हुई है। एक ए.एन.एम. पैर मोड़ भी नहीं पाती है। एक को ऊंचा सुनाई देता है। लेकिन रहती सब साथ में ही हैं। लगता है जैसे पिकनिक पर हों। एक साथ ही नहाने की लाइन लगाती हैं। एक साथ ही खाना खाती हैं बड़ा एका है सब में। लेकिन तीनों बैरक में अलग-अलग रखा गया है सब को तो रात में सोते समय एका टूट ही जाता है।

मध्य प्रदेश से सी.आर.पी.एफ. के एक आई.जी. अपनी पत्नी के साथ जेल में हैं। आय से अधिक संपत्ति के मामले में। उन की पत्नी रंजना हमारी ही बैरक में है। तीन बेटियां ही हैं उन की। आखिरी बेटी की शादी थी दो दिसंबर को। उस से पहले ही उन्हें आत्म समर्पण कर के जेल आना पड़ा। बेटी की शादी भी पोस्टपोन हो गई। 30 तारीख़को आंटी की बेल हो गई हाईकोर्ट से। आई.जी. साहब की कैंसिल हो गई। आंटी बहुत परेशान थीं कि इन की हो गई होती तो ज़्यादा अच्छा था। बाहर का सब कुछ तो इन्हें ही करना था। मैं अकेले बाहर क्या करूंगी? हाय रे ये औरत। अपनी कोई ग़लती न होने पर भी जेल में रहने को तैयार है कि मैं तो किसी लायक नहीं हूं चाहे जेल रहूं या बाहर। और पति पर हद से ज़्यादा भरोसा। खैर आज आंटी का परवाना आ गया और आंटी चली भी गईं। थोड़ी तसल्ली तो हुई कि लोग आते हैं तो लोग जाते भी हैं।

कल दमयंती आंटी भी चली गईं। पर उन का लड़का नहीं गया। उस को देख कर बहुत बुरा लगता है कि बेचारे का चौथा साल चल रहा है यहां। सात साल की तो कुल सज़ाही है उस की।

आज विधायक जी से मुलाक़ात हुई। काफी परेशान लग रहे थे। 15 मार्च को तीन साल पूरा हो जाएगा उन्हें। कह रहे थे दुर्भाग्य साथ ही नहीं छोड़ रहा। हम क्या कहते ? बस यही कहा धैर्य रखिए, सब ठीक होगा। तीन साल में तो अच्छे अच्छों की हिम्मत टूट जाती है और जब घर का मुखिया ही अंदर हो। यही हाल रमेश का भी है। लेकिन बलिहारी है सोनू की जो 27 महीने से लगातार लगा हुआ है। एक भी दिन का नागा नहीं किया पूरी तरह से रमेश को समर्पित है। भगवान कहीं न कहीं तो सहायक है ही। आप का सब कुछ नहीं बिगाड़ता। कहीं न कहीं तो राहत देता ही है। हम तो यही सोच कर तसल्ली कर लेते हैं। अपने से नीचे वालों को देखो तो सब्र आ ही जाता है। ए.एन.एम. सारी इतनी उम्र की हैं उठना बैठना मुहाल है इन सब का। उन को देख कर बड़ा तरस आता है। अपना केस भी बहुत मालूम नहीं है उन्हें । कभी गांव से निकल कर ब्लाक तक जाने की नौबत नहीं आती है उन्हें। और कहां बिजनौर छोड़ कर गाजियाबाद आना पड़ा है। और इलाहाबाद जाना पड़ेगा ज़मानतके लिए। और कितना पैसा लगेगा ये भी नहीं पता। और कहां से लाएंगी बेचारी इतना पैसा। कम से कम भगवान का इतना एहसान तो है मुझ पर। ये सब फ्रंट नहीं देखने पड़ते हैं। भगवान कहीं न कहीं तो सहायक है।

आज फिर सुपरिटेंडेंट से मुलाक़ात हुई। दस मिनट तक बात हुई। मेरे पार्वती खान पर लिखे हुए हिंदी के आर्टिकल की तारीफ की। अच्छे से बात करते हैं। उन्हें पता चला कि हमें हिंदी साहित्य पढ़ते हैं तो तीन नई किताबें जो इस बार पुस्तक मेले में आई थीं । महिला बैरक में भिजवा दीं पढ़ने के लिए। उन का टेस्ट भी बहुत अच्छा है। यहां पर रहते हुए भी किताब पढ़ने का सुख है। और यहां का पुस्तकालय भी समृद्ध है। तो अच्छी किताबों का अकाल नहीं है और पढ़ते रहने से अपना मन भी लगा रहता है। सोच के नए-नए दायरे खुलते हैं।

आज योगिता भी चली गई। वो फर्जी मार्कशीट में थी। लेकिन जाते-जाते भी बहुत दुखी थी कि बेटा तो यहीं है। अपनी तो कोई खुशी ही नहीं है। ये मां ही होती है जो अपने बच्चे के सुख दुख से जुड़ी हुई। उन्हीं में ख़ुश होना और उन्हीं में रोना। फिर भी चलिए कोई तो गया।

रिश्ते कितने स्वार्थी होते हैं आज मीना से बात हुई पिछली बार भी ये यहीं थी। मुश्किल से बेचारी बाइस तेईस साल की है। मां बेटी दोनों अंदर हैं। इस का रिश्ता जिस लड़के से हुआ था वो फांसी लगा कर मर गया था। लड़के के घर वालों ने इन के खिलाफ रिपोर्ट कर दी। इस का भाई छोटा था। पिता जी थे नहीं। एक बहन बस शादी-शुदा थी। और कोई पैरवी करने वाला भी नहीं। इन दोनों बेचारों को आजीवन कारावास हो गया। ज़रा सी बच्ची अभी तो पूरी ज़िंदगी बाक़ीहै इस की। जब किसी ने केस की पैरवी ही नहीं की तो ज़मानतकराने की उम्मीद भला किस से? बस तो क्या इस बच्ची की ज़िंदगी यहीं बीत जाएगी?

शाम को जेलर साहब आए तो एक काफी बुजुर्ग और बीमार महिला उन के सामने पेश हुई। बोलीं जेलर साहब मैं निर्दोष हूं। मेरी ज़मानतकरा दीजिए। जेलर बोले मैं जानता हूं माता जी आप निर्दोष हैं। यहां आई हुई आधी से ज़्यादा महिलाएं निर्दोष हैं। लेकिन किसी न किसी वजह से यहां आ गई हैं। मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता। यहां रहने में आप को कोई तकलीफ न हो आप बीमार न पड़ें। बीमार पड़ने पर आप को दवाइयां और इलाज मुहइया करा सकूं। ये मेरी जिम्मेदारी है जिसमें कोई कोताही नहीं होगी। इस से संबंधित कोई परेशानी हो तो मैं दिन में दो बार आता हूं आप मुझ से सीधे कहिए। आप के रहने को यहां आसान बनाना मेरा काम है। ये सुन कर ही बड़ी तसल्ली मिली कि चलिए आप को भी इंसान समझते हैं।

कल शाम को छह लड़कियां आई एक साथ। आज पता चला कि ये सब लड़कियां एक क्लब में थीं। वहां से 72 लड़के भी पकड़ कर आए हैं। वहां पर वर्ल्ड कप पर सट्टा लग रहा था और जुआ चल रहा था। पुलिस की रेड पड़ी और सब पकड़े गए। छह बिलकुल बच्चियां सी हैं। बुलबुल से भी छोटी लेकिन परिस्थितियां सब सिखा देती हैं। इतनी तेज और चालाक हैं सब कि मेरी बच्ची तो इन के आगे पानी मांगे। बोलीं सब कि हम लोग तो डांसर हैं और जुआ खिलवाते हैं। तीन पत्ती और मांग पत्ती सिखाया मुझे कि कैसे खेलते हैं ? हम तो देखते ही रह गए। ऐसा लग रहा था कि जितनी मेरी उम्र है उतने साल का इन्हें अनुभव है। एक का तो दस महीने का बच्चा भी है। उस की छातियों में दूध उतर रहा है। छातियां अकड़ी पड़ी हैं। बेचारी बहुत परेशान हैं। शायद कल तक बच्चा कचहरी के जरिए आ जाएगा यहीं पर। बाक़ीलड़कियां पैसों पर बहुत कूद रही हैं। कि हम लोग एक रात में इतना-इतना कमा लेते हैं। मतलब उन की ज़िंदगी का मकसद सिर्फ़ पैसा ही पैसा है। कोई नैतिक मूल्य नाम की चीज़नहीं है। शायद आज की जेनरेशन ऐसी है। पता चला इन में से दो तो तिहाड़ भी रह आई हैं। सही है हम लोग तो कूप मंडूक ही रह गए। जेल वालों की तो चांदी है। 72 आदमी और 6 लड़कियां एक साथ इतनी पर्ची कटेंगी। होली अच्छी तरह से मनेगी अब। ये लोग तो यही मनाते हैं कि लोग आते ही रहें। वैसे लोग आएं चाहे जाएं इनकी तो चांदी ही है। आएंगे तो पर्ची कटाएंगे, जाएंगे तो रिहाई देंगे। इन का तो दोनों ही तरफ फायदा है।

यहां पर औरतों में कितनी असुरक्षा की भावना है। एक दूसरे की जड़ खोदती रहती हैं कि अपनी जगह बना सकें। दूसरे की लकीर मिटा कर आप अपनी लकीर बड़ी नहीं कर सकते। जितना समय आप दूसरे की लकीर छोटी करने में लगाते हैं उतना ही समय अगर अपनी लकीर को बढ़ाने में लगाएं तो लकीर बढ़ेगी भी और स्थायी भी होगी। दूसरे की लकीर बड़ी होने का भय भी नहीं होगा। लेकिन इतना समय कहां ? सभी सफलता का शार्टकट ढूंढ़ते हैं।

आज जब कचहरी में पतिदेव ने कहा कि परेशानी आई है तो मैं परेशान नहीं होऊंगा तो और कौन होगा ? तो मेरे तो आंसू ही नहीं रुके। कि इन को भी इस उम्र में क्या-क्या झेलना पड़ रहा है। फिर तो जज के सामने भी मेरे आंसू नहीं रुके। हम थोड़ा पीछे हो गए कि किसी की नजर न पड़े। एक बार तो ऐसा लगा कि आवाज़ ही निकल जाएगी तो जल्दी से मुंह खोल कर सांस लेने लगे। बाहर निकले तो मित्रा दी ने चिपका लिया कि पति को देख कर रो रही हो , देखो वो भी रो देंगे। नागेंद्र पांडेय की पत्नी भी बड़े ध्यान से देख ही थी पता नहीं शर्म आई कि नहीं कि उन के पति की वजह से हम भी जेल काट रहे हैं। बाद में जब पुलिस वाली बोली कि अब चलिए। तो पति उन के सामने हाथ जोड़ कर बोले कि दस मिनट और रुक जाइए तो इतना बुरा लगा कि क्या बताएं। कि भगवान ने क्या दिन दिखा दिया कि ऐसे-ऐसे लोगों के सामने हाथ जोड़ना पड़ रहा है। उन की चिरौरी करनी पड़ रही है। पति या पत्नी की क्या अहमियत होती है अब पता चल रहा है। एक दूसरे के बिना आदमी अधूरा है।

आज सुरेखा से बात हुई। वो मेरठ से हैं। आज से पांच साल पहले उस के पति को कुछ लोगों ने लोन का लालच दिया था। इसने कुछ पेपर पर हस्ताक्षर भी किए थे। इन लोगों को लोन भी नहीं मिला। दो साल पहले इस के पति की हार्ट अटैक से मृत्यु होे गई थी। अब इस के पास गैर जमानती वारंट गया सी.बी.आई. कोर्ट से। इस के चार छोटे-छोटे बच्चे हैं। सब से बड़ा लड़का ग्यारह साल का है। 80 साल की बूढ़ी मां है बेचारी, कोई दौड़ भाग करने वाला भी नहीं है। बेचारी के पास पैसा भी नहीं है। बेचारी जेल में लोगों का काम कर- कर के पैसा कमा रही है। कुछ लोगों ने एक समूह बना कर कि आप को मकान दिलाएंगे कुछ कागजात पर हस्ताक्षर करा लिए और इन लोगों के नाम पर लोन ले लिया लगभग तीन करोड़ का। जब घपला पकड़ा गया तो सी.बी.आई. जांच हुई और बेचारे निर्दोष लोग पकड़े जा रहे हैं। मास्टर माइंड तो बाहर है। इस के केस की तीन औरतें अंदर आ चुकी हैं और उधर कई आदमी भी। अभी कई और लोग आएंगे इन्हीं के केस में। बताओ इन बेचारों को तो कुछ पता ही नहीं। इन के नाम से लोन स्वीकृत हो गया। मलाई काटें और लोग, और जेल काटें बेचारे ये लोग। आदमी अपनी भलमनसाहत में ही मारा जाता है कि हमने तो कुछ किया ही नहीं। हमें भला क्यों जेल होगी? ये तो यहां आ कर ही समझ आता है कि हमारे साथ ये हो गया। उस के बाद जिस के पास पैरोकार हैं वो बाहर चला जाता है बाक़ीयहीं रह कर अपना केस लड़ते हैं और सज़ापूरी कर के ही बाहर निकलते हैं। चाहे जितना भी समय लग जाए। सब कुछ पैरोकारी पर निर्भर करता है। और पैसा तो मुख्य मुद्दा है ही। चाहे जेल हो चाहे कचहरी। इसी पैसे के बल पर गीता के पति आज ज़मानतपर चले गए। चार सौ बीसी में कुछ फ्लैट बेचने के आरोप में आए थे। बीवी के नाम से फर्म थी। तो दोनों ही लोग अंदर थे। वो खुद तो रेलवे में टी.टी. हैं। काम बीवी के नाम से करते हैं। सब जज और वकील को सेट कर के यहीं सेशन कोर्ट से ज़मानतकरा के शर्मा जी आज निकल गए। अब गीता को भी निकाल ही लेंगे। गीता आज बहुत ख़ुश है कि ये निकल गए हैं तो हमें तो निकाल ही लेंगे। सारा इंतजाम तो आदमियों को ही करना होता है। हाय रे हम औरतें। पति के हिस्से की जेल काटने को भी खुशी खुशी तैयार रहती हैं। अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है। पति है तो हम हैं। हम हो न हों पति का होना ज़रूरी है। यही संस्कार हम लोगों को घुट्टी में पिलाए जाते हैं। जेल में आधी से ज़्यादा महिलाएं अपने पति का किया ही भोग रही हैं।

गांव पर धीरज की शादी है। किसी का भी कोई काम रुकता नहीं है। आप कहां हैं , कैसे हैं , इस से लोगों को बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। सब अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं। बस आप पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। ये उन का जन्म सिद्ध अधिकार है। आप चाहे उन की ज़िंदगी में कोई महत्व रखते हों या न रखते हों, लेकिन टिप्पणी करना उन का अधिकार है। सही बात है हम अपने दुख से उतने दुखी नहीं हैं जितना दूसरे के सुख से।

आज सीमा से बात हुई, सीमा एक हिजड़ा है। लेकिन उस में लड़कियों वाले गुण ज़्यादा हैं। हाथ पैर पतले-पतले हैं। मुंह भी लड़कियों की तरह कोमलता लिए हुए सुंदर सा है। उस की आवाज़ और हाथ पैर चलाने की अदा ही बस हिजड़ों जैसी है। उस ने बताया कि उन के यहां जो हिजड़े होते हैं वो गुरू के साथ शादी कर के रहते हैं। अगर गुरू उम्र में बहुत बड़ा होता है तो बेटी बन कर रहते हैं फिर गुरू ही उन की पूरी जिम्मेदारी उठाता है। सब के अपने-अपने इलाके बंटे होते हैं। उन्हीं में वो बधाई गाने जाते हैं और पैसा कमा कर लाते हैं। पैसे की इन के पास कोई कमी नहीं होती। इस ने अपने गुरू को छोड़ दिया था। अपना काम अलग करने लगी थी। सुंदर होने के नाते लोग पीछे पड़े ही रहते थे। गुरू के ग्रुप से दूसरे ग्रुप की लड़ाई हुई जिस में इस ने एक लड़के के पेट में सरिया मार दिया। लड़का बच गया। उसे गोली भी लगी है। उस ने सीमा का और जिस ने गोली मारी थी उस का नाम भी दे दिया। अब ये हत्या के प्रयास मतलब 307 धारा के तहत अंदर आ गई।


वैसे तो हिजड़ों को तनहाई में रखने का नियम है। तनहाई एक कोठरी जैसा बैरक होता है। जिस में उसी के कोने में बाथरूम भी होता है और बंदी को अकेले ही रहना होता है। लेकिन चूंकि इस में महिलाओं के गुण ज़्यादा थे तो महिलाओं ने बैरक में अपने साथ ही रख लिया कि अकेले बेचारी कहां रहेगी ? डरेगी भी। वैसे सीमा सीधी है। ज़्यादा उलझती भी नहीं है। उसे पता भी है कि अगर कुछ भी बवाल हुआ तो उसे तनहाई में फेंक दिया जाएगा। उस की मिलाई भी हर दूसरे दिन आती है। ढेर सारा सामान आता है। वो बांटती भी रहती है। इसी लिए सब महिलाएं उसे हाथों हाथ भी लिए रहती हैं। पुलिस वालियों को भी ख़ूब खिला पिला कर अपनी तरफ किए रहती है। पुलिसवालियों को तो वैसे भी सिर्फ़ पैसे ही से मतलब होता है। चूंकि हत्या के आरोप का केस है तो उस की ज़मानतसेशन से खारिज हो कर इलाहाबाद हाईकोर्ट चली गई है। देखो कब होती है इस की जमानत?

ये जो छह लड़कियां आई हैं सब के लिए अजूबा बनी हुई है। हर कोई इन के दीदार करना चाहता है। सारे समय उन के बैरक में नाच ही चलता रहता है। सब ने अपने नाम पते गलत लिखाए थे तो इन की मुलाक़ात ही नहीं हो पा रही थी क़ानूनीरूप से। तो सब सेटिंग कर के इन के लोगों ने तीन-तीन हजार रुपए दे कर मुलाक़ात की। पैसा सब कुछ करा देता है। जेल में तो पैसा ही सब कुछ है। वी.आई.पी. मुलाक़ात गैर क़ानूनीहै। कैंटीन गैर क़ानूनीहै। पर्ची कटवाना गैर क़ानूनीहै । लेकिन ये सब काम यहां होते हैं। और बंदी की हैसियत जैसी होती है वैसा पैसा उस से लिया जाता है। वैसे भी डासना उत्तर प्रदेश की सब से मंहगी जेल है। मुझे तो लगता है सब मिला कर अधीक्षक की ही कमाई रोज की एक लाख से ऊपर ही होती होगी। बाक़ीअसलियत तो वो ही जाने। क़दमक़दमपर पैसे की ही माया है। लेकिन पिछले जेलर और अधीक्षक के समय ये हाल नहीं था। अब तो सब कुछ खुले तौर पर पैसा दे कर हो रहा है।

अपने चारों तरफ नजर डालें तो हम अपने ऊपर रो भी नहीं सकते। आज के बाद चार शुक्रवार बेंच नहीं बैठनी थी और आज सरकारी वकील अनुराग खन्ना आया ही नहीं। हमारा केस 23 नंबर पर लगा था। हम अपने लिए उतना शॉक नहीं हुए जितना रमेश के लिए। कितना कुछ मैनेज कर के उन्हों ने अपना केस शुक्रवार को जहां अरुण टंडन बैठते हैं , वहां पहले नंबर पर लगवाया था। क्यों कि बृहस्पतिवार की काज लिस्ट में उन का नंबर ही नहीं था। तो सब कुछ मैनेज कर के आज शुक्रवार को लगवाया था। और आज सरकारी वकील ही नहीं आया। इस 17 को 27 महीने पूरे हो जाएंगे उन्हें। कैसे इंसान जेल , अस्पताल , घर मैनेज कर रहा है और यहां महिला बैरक में मेरे अगल बगल में मोहिनी और चांदनी जिन्हें दो साल, 15 महीने यहां हो गए हैं उन के आगे अपने ढाई महीने को क्या रोयें। अपने आप ही सब्र आ जाता है। चांदनी का सोचते हैं तो और लगता है पति-पत्नी दोनों यहीं हैं। बाहर वाले अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं। बस चांदनी के मां बाप हैं और वो बेचारे इतने बूढ़े हैं फिर भी हफ़्ते में दो दिन वहीं आते हैं मिलाई पर। वही इन की ज़रुरतों का सामान भी दे जाते हैं। उन बेचारों से आदमी भला किस मुंह से कुछ कहें। वो जो कर दे रहे हैं वही बहुत है। उन का दुख क्या कम है कि उन के बेटी दामाद आजीवन कारावास काट रहे हैं। लेकिन भगवान कहीं न कहीं तो सहायक होता ही है। ये अधीक्षक इन दोनों को बहुत मानते हैं तो बहुत सी सहूलियतें भी दे रखी है। इनकी वी.आई.पी. मुलाक़ात फ्री में होती है। चांदनी दिन भर आफिस में रहती हैं। अधीक्षक के आफिस में लिखा पढ़ी का काम करती रहती है तो दिमाग बंटा रहता है तो दिन कट ही जाता है। मन भी बहल जाता है। सभी अपना समय काटने का कुछ न कुछ रास्ता खोज ही लेते हैं।

शबीना की तबियत इधर ख़राब ही चल रही थी। उसे शुगर और दमा भी है। रात-रात भर बेचारी बैठी ही रह जाती है। कल से उस की तबियत ज़्यादा ख़राब है। दोनों पैर सूजे हैं। टॉयलेट तक जाना मुहाल हो गया है। आज डाक्टर आए तो बहुत गुस्सा हो रहे थे। बोले अस्पताल में भर्ती करा देता हूं। सरकारी अस्पताल में जब कोई देखभाल नहीं होगी तब पता चलेगा। लेकिन वो अस्पताल जाने को तैयार ही नहीं हुई कि कोई भी घर से आने वाला नहीं है तो अस्पताल में तो दुर्गति हो जाएगी। और कहां लोग लाखों रुपए खर्च करके सारे जुगाड़ लगा कर अस्पताल जाते हैं। तो इंजेक्शन आदि दे कर उसे बैरक में ही छोड़ गए। व्हील चेयर पर बैठ कर फट्टे पर कंबल रख कर ऊंचा कर उस पर पैर रख कर बेचारी पूरी रात बैठी रही। उसी में सोती जगती रही। सुबह बैरक खुलने पर जो एक कमरे का अस्पताल है उसी के बिस्तर पर लिटा दी जाती है और जब तक बैरक बंद नहीं होता शाम को , वो वहीं रहती है। बैरक बंद होते समय आती है और पूरी रात फिर व्हील चेयर पर ही बैठी रहती है। आज कुछ आराम सा दिख रहा था उस के चेहरे पर। लेकिन बुखार भी था। वैसे भी ऐसे देखने में कुछ समझ नहीं आता कि क्या हालात हैं , घर का कोई पूछता ही नहीं। मुलाक़ात भी नहीं आती। बड़ी दुर्दशा है बेचारी की। लेकिन इस जगह पर आ कर सब बंदियां एक हो जाती हैं। एक बंदी है पिंकी जो उस की पूरी देखभाल करती है। बिस्तर पर ही टॉयलेट भी कराती है। सब साफ करती है। भगवान कोई न कोई सहारा भेज ही देता है। ये पिंकी वो है जो नकली नोट के चक्कर में आई थी। पुलिस की पकड़ से दो बार भाग चुकी है। जब डासना आई थी तो गर्भवती थी। वैसे वो कुंआरी थी। बच्चा होने के बाद दो दिन ही जिंदा रहा फिर मर गया। इस की भी कोई मुलाक़ात नहीं आती है। यहीं पर लोगों के काम कर-कर के अपना खर्च निकालती है।

जेल आने पर ही पता चला कि आप के नाम के आगे पति का नाम लगाया जाता है जैसे उपमा/विनय और आदमियों के नाम के आगे पिता का नाम लिखा जाता है जैसे विनय/रामसागर। यही आप की पहचान रह जाती है। कहीं भी बुलाया जाए उपमा/विनय के नाम से ही बुलाया जाएगा।

आज सुबह एक घटना और पता चली । ऊपर की बैरक में दो महिलाएं हैं रीता और कुसुम। दोनों आपस में अप्राकृतिक सेक्स कर रही थी रात में। रीता ने कुसुम का गाल काट लिया। पूरा काला-काला निशान पड़ गया। किसी ने ड्यूटी वाली से शिकायत कर दी। ड्यूटी वाली ने दोनों को बुलाया और मैदान में ले जा कर बहुत मारा। डंडे से भी मारा। उस समय चार ड्यूटी वाली थीं। चारों ने मिल कर बहुत मारा। जेलर साहब आए। दोनों को पेश किया गया। उन्होंने भी बहुत डांटा और दोनों का बैरक बदल दिया। अब बेचारे आदमी हो कर इस से ज़्यादा महिलाओं से क्या जूझते? सारे चीफ, लंबरदार और कमान जो उस समय महिला बैरक में सफाई का काम कर रहे थे। (कमान वो पुरुष बंदी कहलाते हैं जिन्हें जेल के विभिन्न कामों में लगाया जाता है। जैसे भंडारा, सफाई करना, पुताई करना, गल्ला गोदाम, केंटीन आदि)। सब को पता चल गया। सब ने अपनी आंखों से देखा। अब पूरी जेल में ये बात फैल जाएगी। कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी। इन्हीं सब जिल्लतों को न सहना पड़े इसी लिए आदमी जेल के नाम से घबराता है। कुसुम को कम मार पड़ी। क्योंकि वो जब जेल आई तो गर्भवती थी। उस का देवर लड़की ले कर भाग गया था। लड़की वालों ने पूरे परिवार का नाम लिखा दिया था तो सब जेल आ गए। अभी हफ़्ता भर पहले ही उस को ब्लीडिंग होने लगी तो सरकारी अस्पताल ले जा कर उस का गर्भपात कराना पड़ा। एक दिन वहां रुकना भी पड़ा। एक छोटा बच्चा दस महीने का उस के पास है भी। तो इन्हीं सब कमजोरियों के चलते उसे कम मार पड़ी। बंदी महिलाओं ने बचा लिया कि कहीं कुछ गलत जगह चोट न लग जाए तो ज़्यादा गड़बड़ हो जाएगी। लेकिन रीता को बहुत मार पड़ी। रीता अपने पति की हत्या में बंद है। धीरे-धीरे दो साल हो रहे हैं। उस तरफ उस का यार भी बंद है। वो मुसलमान है। इस की कोई मिलाई भी नहीं आती है। लोग बताते हैं कि जब ये आई थी तो सुबह उठते ही नहा धो कर पूजा करने बैठ जाती थी। और अब ये हाल है तीन-तीन दिन नहाये बिना हो जाता है। कुबेर (सुर्ती) के बिना काम ही नहीं चलता है। हर समय मुंह में कुबेर चाहिए। मुलाक़ात न आने के कारण अपना खर्च निकालने के लिए लोगों के काम करती है। हर शनिवार को अपनी फर्जी मुलाक़ात यार से करने के लिए सौ रुपए भी देती है ड्यूटी वाली को। पूरी तरह से बरबाद हो चुकी है। बाहर दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। उन की भी चिंता नहीं है इसे। इसी तरह की महिलाओं से जेल बदनाम होती है। ड्यूटी वालियों ने इस का बैरक तो बदल दिया लेकिन कुसुम से पैसे ले कर उसे वहीं ऊपर वाली बैरक में रहने दिया। सुबह इतना मारा। जेलर साहब बैरक बदलने का आदेश दे गए तब भी पैसे ले कर उस का बैरक नहीं बदला। हाय रे पैसा कमाने के नायाब तरीके।

माला जब हम पिछली बार यहां थे तो मेरे सामने ही जेल आई थी। वो ‘ब्रह्म कुमारी’ को मानती है। सफेद कपड़े ही पहनती है गुजरात की रहने वाली है। शादी भी नहीं की है। उस पर आश्रम की दो ढाई लाख रुपए की चोरी का केस है। दुश्मनी में उस पर केस लगाया गया है। बहुत बड़ा केस नहीं है। ढंग से पैरवी करने वाला कोई होता तो महीना भर में ही छूट जाती। लेकिन भाई वगैरह सब जाम नगर (गुजरात) में रहते हैं। उस की मिलाई पर आ जाएं वही बहुत है। पैरवी क्या खाक करेंगे? वो भी अब केस ख़त्म होने का इंतजार कर रही है। गवाही चल रही है उस के केस में देखो क्या होता है ? सज़ामिलती है या बरी होती है ?

मेरी जो ब्रेड आती है उस की रिसीविंग देनी होती है। आज जब हम हस्ताक्षर कर के कागज गल्ला गोदाम से आए हुए आदमी को दे रहे थे तो कमला ड्यूटी वाली बोली ये क्या लेटरबाजी चल रही है। वो आदमी घबरा गया सफाई देने लगा। हमने उस से कहा आप जाओ। फिर कमला से पूछा आप को क्या प्रॉबलम है मुझ से। वो चिल्ला-चिल्ला कर बोलने लगी। मैं ने कहा धीमे बोलें। तो बोली बंदी ऐसे ही लेटरबाजी करते हैं। मेरा तो पारा ही गरम हो गया। बस इतना ही बोला कि शक्ल भी देख लिया करो। इतने में चीफ साहब आए कमला को डांटा और मुझे समझाने लगे कि आप शांत हो जाएं। आप की तबियत ख़राब हो जाएगी। वाकई मुझे इतना गुस्सा आ रहा था कि लग रहा था कि हार्ट बीट तो कान में सुनाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था कि अगली सांस आएगी ही नहीं। पूरा मुंह लाल और आंसू रुक ही नहीं रहे थे। चीफ साहब बिलकुल डर गए कि आप की तबियत बिगड़ जाएगी। मोहिनी आ कर मुझे बैरक में ले आई। पानी पिलाया और बोली आप चुप बैठिए। बाहर निकल कर ख़ूब मां बहन एक करी उसने सब की। मुझे तो लग रहा था कि मेरा शरीर मेरे वश में ही नहीं है। अब बस जान निकल ही जाएगी। इतना ज़्यादा सीने में भारीपन लग रहा था कि घबराहट के मारे बुरा हाल था। 11 बजे जब चीफ वार्डन आए तो उन्हें जैसे ही मैं ने कुछ कहना चाहा वो बोले मुझे सब पता है। बाहर ही पता चल गया था कमला कहां है ? मैं ने आते ही पूछा था । वो है नहीं जैसे ही मिलेगी मैं उसे डाटूंगा। ग़लती उसी की है। कमला एक-एक को कह रही कि मेरी ड्यूटी है कि कोई आदमी अंदर न आए मैं तो सिर्फ़ ड्यूटी कर रही थी। मैं जितनी बार ये सुनूं मेरे आंसू निकलने लग रहे थे। समझ नहीं आया कि क्या करूं? फिर मैं ने कमला की शिकायत करते हुए एक अप्लीकेशन लिखी और जब जेलर शाम को आए तो उन्हें दी। कमला वहीं खड़ी थी। उन्हों ने पूछा क्या है ? आप की बीमारी से संबंधित है क्या ? मैं ने कहा नहीं पर्सनल है। तो बोले बता दीजिए अभी चश्मा नहीं है मेरे पास। मैं ने कहा मैं कह नहीं पाऊंगी रोने लग जाऊंगी इतनी हर्ट हुई हूं। तब तक कमला बोली साहब मुझ से ही परेशानी है। मैं तो अपनी ड्यूटी कर रही थी ऐसा कह कर सारी बात अपनी तरीके से कहा। जेलर ने पूछा यही बात है? हम बोल ही नहीं पा रहे थे कमला फिर कुछ बोली तो जेलर ने कहा आप चुप हो जाइए बल्कि यहां से चली ही जाइए। तब चीफ बोले साहब मैं मौकाए वारदात पर था। ग़लती कमला की है। जेलर गुस्सा हुए कि आप को जब सब पता था तो अभी तक क्यों नहीं बताया ? फिर मुझे समझाने लगे कि आप परेशान न होइए। ये लोग ऐसे ही लोगों से दिन रात डील करते हैं। सामने वाली की शक्ल भी देखनी चाहिए। मेरे ये कहने पर बोले कि हां ये उस की ग़लती है। मैं उसे अपने तरीके से समझाऊंगा। फिर 15 मिनट तक मुझ से बात करते रहे। समझाते रहे कि शारीरिक कष्ट तो आप लोगों को यहां कोई नहीं है और मानसिक शांति भी बनी रहे यही मेरा पूरा प्रयास रहता है। आप लोग तो समझदार हैं। उन से बात कर के मन थोड़ा हलका हुआ। लेकिन रात में जब लेटे और दिन भर के घटना क्रम को सोचा तो इतनी जिल्लत और बेबसी का एहसास हुआ कि भगवान अभी और क्या-क्या देखना बाक़ीहै? कितने बुरे कर्म हैं हमारे। रोने लगे। रोते-रोते फिर उतनी ही तबीयत ख़राब हुई कि लगा सांस ही नहीं आएगी। उठ कर बैठ गए। फिर अपने मन को समझाया कि मेरे परिवार को मेरी ज़रुरत है। उन के लिए मेरा स्वस्थ रहना ज़रुरी है। फिर एक नींद की गोली खाई और लेट गए। आज सुबह उठने पर कुछ तबीयत ठीक लग रही है। अब जा कर कुछ राहत मिली है। यही होता है ज़िंदगी में आप न चाहते हुए भी लोगों की सियासत का हिस्सा बन जाते हैं। अपनी सारी समझदारी धरी रह जाती है और आप भी उसी चक्र में फंस कर, जैसा लोग चाहते हैं वैसे ही रिएक्ट करने लगते हैं। फिर भी मैं ने धीरे-धीरे नियंत्रण कर ही लिया और कमला को सब ने ही, उस के साथ की महिला सिपाहियों ने भी डांटा कि ग़लती तुम्हारी ही है। इंसान देख कर बात किया करो। अब कोई चाहे कुछ भी कहे हमने तो जो कल दिन भर जो झेला उसे तो अपनी ज़िंदगी में कभी भी भूल नहीं पाएंगे। ऐसी ही जिल्लत और बेइज्जती उस दिन हुई थी जब मड़ियांव वाले डाक्टर ने मेडिकल बनाने से मना कर दिया था। हम घर तक रोते हुए ही आए थे। लेकिन अपने परिवार में अपने बच्चे के पास थे तो बर्दाश्त कर गए। तबियत नहीं ख़राब हुई लेकिन कल तो ये लग रहा था कि इतनी बड़ी दुनिया में हम बिलकुल अकेले हैं और अभी बस जान निकल ही जाएगी। इतनी घबराहट, इतनी बेचैनी की सांस ही आनी मुश्किल हो गई थी। वो तो अपने पति, बच्चों परिवार की तरफ ध्यान ले गए, उन को याद करने लगे तब जा कर कुछ शांति मिली। भगवान किसी की भी ज़िंदगी में ऐसा दिन न लाए।

आज गीता की शादी की सालगिरह थी। उस के पति रिहा हो चुके हैं। बहुत उदास थी बेचारी। लेकिन दिन भर उस के घर वाले आते रहे कभी कोई , कभी कोई इस से मन और परेशान होता गया। शाम को पति आए उन से मिल कर जब रो ली तब उस का मन कुछ हल्का हुआ। बहुत सारी खाने पीने की चीजें ले कर आए थे बेचारे। अधीक्षक छुट्टी पर थे तो सब रोक लिया गया। बस बरगर और रसगुल्ला किसी तरह अंदर आ गया। रात उसी का डिनर किया हम लोगों ने। जेल में रहते हुए ये बेस्ट पासिबल था। ये सालगिरह भी उसे ज़िंदगी भर याद रहेगी। एक महीना और रह गए तो हमारी भी शादी की सालगिरह यहीं पड़ जाएगी। मित्रा दी का जन्मदिन भी यहीं पड़ा था। उन का तो पिछली बार पचासवां जन्मदिन भी यहीं पड़ा था। लोगबाग कितनी प्लान से, धूमधाम से अपना गोल्डेन जुबिली इयर मनाते हैं। उन का यहां पड़ा। खैर ये भी यादगार ही रहेगा। कम लोग ऐसे मना पाते हैं। रमेश का भी यहीं पड़ा था। क्या-क्या सोचता है इंसान और क्या होता है? यही जीवन है। ‘‘सबहिं नचावत राम गोसाईं’’।

आज सुबह बताया गया कि मेरी तारीख़आई है। मैं ने सब से कहा मेरी तारीख़आज नहीं परसों 25 को है। चिल्ला-चिल्ला कर कहा। लेकिन किसी ने नहीं सुना। चीफ साहब बोले तलबी आई है कचहरी से, तो जाना ही पड़ेगा। इसे कहते हैं ज़बरदस्ती का काम। मरता क्या न करता, गए कचहरी। हवालात पहुंचते ही सी.बी.आई. कोर्ट गए। तारीख़तो थी नहीं। दीवान साहब हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगे कि ग़लती से तलबी चली गई थी। उन की तो ग़लती हमारी दिन भर की फजीहत। घर से भी किसी को नहीं आना था। मेरे लिए तो कोर्ट खाली ही था। वो तो वकील साहब आ गए थे तो दो मिनट पति से फ़ोन पर बात हो गई। तो थोड़ी तसल्ली हुई। दस मिनट में ही कोर्ट से हवालात आ गए और फिर पूरा दिन उसी हवालात में बदबूदार शौचालय के बगल में 13 औरतों और पांच बच्चों की कचर- कचर में बैठे रहे। एक बहुत ही ख़राब दिन था आज का। घर से कोई आता है तो उत्साह में हवालात में समय कट जाता है आज तो वो भी उत्साह नहीं था। हवालात में समय काटना भी भारी हो गया था। इतनी थकान लग रही है आज कि बस, मन भी थका और शरीर भी।

यहां आ कर पता चला कि मेरे ही बैरक की सुरेखा के भाई की मृत्यु हो गई थी तीन चार दिन पहले। आज उस की मुलाक़ात आई तो उसे पता चला। इतना रोयी है वो बच्ची कि क्या बातएं। पूरे बैरक में इतनी उदासी का माहौल है कि ये हादसा तो किसी के भी साथ हो सकता है। सब लोग ही यहां बेबस पड़े हुए हैं। सब को अपनी-अपनी हालत पर रोना आ रहा है। वो बेचारी तो छटपटा रही है। अपनों के बीच तो कोई भी दुख सहा जा सकता है। अपनों से दूर रह कर दुख की तकलीफ अपनों के पास न होने की तकलीफ उसे दुगना कर देती है। सुरेखा वो है जो अपने पति के अपहरण में आई है। उस के पति का अपनी मामी से अवैध संबंध था। घर वालों ने ज़बरदस्ती शादी करा दी। सुरेखा के विरोध करने पर उस की मामी ने इस के पति को गायब कर सुरेखा पर उस के अपहरण का झूठा इल्जाम लगा दिया। और उसे जेल भिजवा दिया। उस का पति छुपा-छुपा फिर रहा है। सुरेखा के घर में उस का यही भाई पैरवी करने वाला था। घर का अकेला कमाई करने वाला था। अब तो उस की पैरवी करने वाला भी कोई नहीं बचा। बेचारी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि उस का अब क्या होगा ? ज़िंदगी बर्बाद हो गई उस की। घर वाले भी सब कुछ जानते हुए क्यों शादी करा देते हैं। अगली की क्या ग़लती ? उस की तो कोई उम्र भी नहीं है अभी। क्या सुख मिला उसे शादी कर के ?

आज पेशी पर विशू आए थे। बहुत अच्छा लगा उसे देख कर। अपने तो अपने ही होते हैं। बच्चों से भी अच्छे से बात हो गई। कुल मिला कर आज का दिन अच्छा रहा। नागेंद्र पांडेय भी मिले। उन का हाथ टूट गया है। कह रहे थे कि आप के दोनों हाथ टूटे थे और मेरा एक। हमने कहा चलिए आप को हमारी तकलीफ का कुछ तो एहसास हुआ होगा। रमेश भी मिले। काफी देर तक बात होती रही। हर आदमी परेशान है, कोई थोड़े में कोई ज़्यादा में, लेकिन परेशान सभी हैं। मेरठ से दो लेडी डाक्टर आई हैं ? दोनों रिटायर हैं। एक तो डी.जी. रही हैं डायरक्टरेट में। पतिदेव को अच्छे से जानती हैं। लेकिन अभी थोड़ी ऐंठ में है। समझ नहीं आ रहा है कि जेल कैसे काटी जाती है। लचक तो है ही नहीं और पैसे से ही हर काम नहीं हो जाता। कुछ तो अपना आचार-विचार भी नरम रखना पड़ता है। चलो कोई बात नहीं कुछ दिन में लाइन पर आ ही जाएंगी। कोई इतनी जल्दी बेल तो होनी नहीं है। तीन महीना तो लगेगा ही।


हमने भी यहां रह कर इस बार सूडोकू खेलना सीख लिया। अब रोज आधा घंटा इसी में निकल जाता है। दिमाग की एक्सरसाइज भी हो जाती है। उस के बाद कुछ फ्रेश सा लगता है। आज चांदनी ने शतरंज भी मंगा दिया है। किसी को खेलना ही नहीं आता तो सिखाते-सिखाते ही दिमाग खाली हो गया सारा। लेकिन सब बहुत दिलचस्पी से सीख रहे हैं। अच्छा ही है इसी बहाने फालतू बातों से दिमाग हटा रहता है। नहीं तो दिन भर सिवाय डिप्रेशन के कुछ नहीं होता। इन सब में कम से कम दिन तो कट जाता है।

मेरठ के बैंक लोन के सी.बी.आई. केस में जो आई हैं उनमें एक ललिता है। अपना ब्यूटीपार्लर चलाती थी। अभी एक महीना नहीं हुआ है उसे आए हुए। लेकिन यहां भी उसने अपना पार्लर खोल लिया है। औरतें भी यहां खाली ही रहती हैं तो सब कुछ न कुछ कराती ही रहती हैं। उस का पार्लर अच्छा खासा चलने लगा है। इसे कहते हैं जिजीविषा जो कहीं भी किंही परिस्थितियों में भी आप को संघर्ष करना सिखा ही देती है। आदमी जीने ही लगता है।

वनिता के 315 के बयान होने हैं 3 तारीख़को। आजकल बहुत परेशान है तो , अपनी बिटिया का पानी गरम करने के चक्कर में उस से गैस खुली रह गई। बहुत हंगामा हुआ। उस का तो कहना है कि उस ने याद से बंद किया था। लेकिन पांच साल से वो यहां है तो जलने, कुढ़ने वाले भी बहुत हैं। उन्हीं में से किसी ने खोल कर छोड़ दिया था कि जेलर साहब से डांट पड़ेगी। वो तो ड्यूटी वाली भी वनिता की तरफ से बोल रही थी तो उस की पेशी बच गई। नहीं तो लिखित शिकायत कचहरी तक जाती। बहरहाल एक हादसा टल गया।

आज लखनऊ की सेंट्रल जेल से एक अम्मा आईं। काफी बूढ़ी हैं। दो साल यहां रह कर लखनऊ चली गई थीं और बारह साल से लखनऊ जेल में थीं। अब यहां आई हैं। सुन रहे हैं अच्छे चाल चलन पर इन की रिहाई यहीं से होनी है। इन्हें देख कर और घबराहट होती है कि क्या लोग इतना समय जेल में काट देते हैं? क्या हम लोगों की ज़िंदगी भी ऐसे ही जेल में बीत जाएगी। इन पर अपने देवर के बेटे की हत्या का आरोप है। ये और इन के दो लड़के जेल में थे। एक की बेल पिछले साल हो गई थी। ये था कि वो बाहर निकल कर भाग दौड़ कर के मां और भाई की बेल करवाएगा। लेकिन बाहर निकलते ही उस की हत्या कर दी गई। तब से बेचारी अपने दूसरे लड़के के लिए बहुत चिंतित है कि जेल में है तो सुरक्षित है। पर बाहर निकल कर तो उस की जान का खतरा है। चौदह पंद्रह साल जेल काटने के बाद भी हाथ क्या आएगा? उन के लिए अब बाहर की दुनिया में बचा ही क्या है? भला बाहर अब किसे इन की ज़रूरत है? लोग ऐसे भी जिंदा रहते हैं। पूरी ज़िंदगी जेल में खपा देते हैं। कभी बाहर रहते हुए ये सब नहीं सोचा था कि लोगों की ज़िंदगी ऐसी भी हो सकती है।

सुन रहे हैं नया डी.आई.जी. जो आया है वो बड़ा सख्त है। आज सुबह से हल्ला है कि सज़ावालों को लखनऊ जेल भेजा जा रहा है। ये नियम है कि जिन्हें सज़ाहो गई है उन्हें सेंट्रल जेल भेज दिया जाए। पिछले साल भी अगस्त में पंद्रह महिलाएं लखनऊ सेंट्रल जेल गई थीं। आज फिर से हल्ला है। चांदनी बहुत परेशान है कि यहां तो पंद्रह महीने से रहते-रहते सब व्यवस्था बन गई थी और अगर लखनऊ जाना पड़ा तो वहां घर का कोई सदस्य नहीं है। कैसे सब हो पाएगा ? लेकिन अब नोएडा भी सेंट्रल जेल हो गई है तो एक संभावना ये भी है कि नोएडा ही भेज दें। अगर नोएडा जाते हैं तो घर वालों के आने की समस्या तो हल हो जाएगी। लेकिन नई जगह सब व्यवस्थाएं बनाने का संघर्ष तो रहेगा ही। भगवान भी चैन नहीं लेने देता कि जहां पड़े हो वहीं पड़े रहो। जीवन में हलचल मचाता ही रहता है। ज़िंदगी का संघर्ष ख़त्म होने को नहीं आता। अभी और जाने क्या-क्या झेलना बाक़ीहै। इन लोगों को। ये तो फिर भी नार्मल कर लेंगी लेकिन और जो सज़ावाले हैं बेचारे बड़े गरीब हैं। उन का परिवार यहीं गाजियाबाद या उस के आसपास ही रहता है। वो लोग भला क्या करेंगे ? लखनऊ जा कर तो उन लोगों की हालत ही बिगड़ जाएगी। कोई पूछने वाला ही नहीं होगा। इतनी दूर से भला मिलाई करने कौन जाएगा ? घर परिवार की ख़बर, रुपए पैसे, सामान हर चीज़को तरस जाएंगी बेचारी। जेल आना ही काफी नहीं था अभी ये सब कष्ट भी झेलने बाक़ीहैं इन बेचारियों को। सब बहुत उदास हैं। बड़ा तरस सा आ रहा है इन सब को देख-देख कर। लेकिन कर तो कोई भी कुछ नहीं सकता।

जेल की बैरक में जो जंगले होते हैं उन में लोहे की सलाखें होती हैं और पास-पास होती हैं महीने दो महीने में एक बार लोहे की छड़ से सारे जंगले खड़का के देखे जाते हैं कि कहीं कोई सलाख कमजोर तो नहीं हो रही है। जेल की सुरक्षा के लिए ये कार्य किया जाता है। लेकिन महिलाओं में ये भ्रम है कि ये कार्य जेल को बांधने के लिए किया जाता है कि कोई महिला निकलने न पाए। जेल भरी रहेगी तो स्टाफ की चांदी रहेगी कमाई के मामले में इस लिए मंत्रों के द्वारा ये सरिया मंत्रित कर के हर बैरक के जंगले में छुआई जाती है कि बैरक बांध दी गई। अब कोई बाहर नहीं निकलेगा। इसी लिए जैसे ही लंबरदार बंदी के साथ सलाखें खड़काने आता है सारी महिलाएं बैरक के बाहर निकल आती हैं और जो महिला मासिक धर्म से होती है वो उस के पीछे-पीछे सारी छड़ छूती हुई चलती है कि इस से काट हो गयी, और अब मंत्र का कोई असर नहीं होगा। और जेल बंधी हुई नहीं होगी। कितनी तरह की भ्रांतियां और अंधविश्वास जेल में फैले होते हैं। लेकिन यहां पर सब इंसान बंदी होते हैं तो सब जानते समझते भी इन सब की काट कराते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि हम यहीं रह जाएं।

शबीना आज तीन दिन से मेरठ मेडिकल कालेज में भर्ती है। उस की सांस की दिक्क़तबहुत बढ़ गई थी और दोनों पैर भी बहुत सूज गए थे। पहले तो गाजियाबाद सरकारी अस्पताल ले गए उसे लेकिन उन्हों ने दिल्ली रेफर कर दिया। दिल्ली में डाक्टरों की हड़ताल थी तो मेरठ ले गए। सुन रहे हैं उस की तबीयत ज़्यादा ख़राब है। और घर का कोई पास भी नहीं है। ड्यूटी वाली तो सब ऐसे ही हृदयहीन हैं उन्हें तो सिर्फ़ अपनी नौकरी से मतलब है। और मेडिकल कालेज में तो मरीज सब्जेक्ट हो जाता है। पूरी रिसर्च ही कर डालते हैं उस पर। पता नहीं क्या होगा शबीना का।

ज़िंदगी नरक होती जा रही है। जेल का खाना तो वैसे ही नहीं खाया जाता। कैंटीन के भरोसे इंसान रहता है कि सब्जी ले लेंगे तो कुछ तो खा लेंगे। लेकिन सुन रहे हैं अब केंटीन भी बंद होने वाली है। केंटीन में बाक़ीसब तो बंद हो ही गया है। सिर्फ़ चाय और शाम को सब्जी आती है। अब वो भी बंद हो जाएगी। वो जो होटल से 72 बच्चे पकड़ कर लाए गए थे सट्टा खिलवाते हुए , तो होटल पार्थ इन का मालिक भी पकड़ कर आया था। उस की जेल वालों ने बहुत दुर्दशा की। ज़्यादा पैसा ऐंठने के चक्कर में बहुत कष्ट दिए। दस दिन में वो बेल पर चला गया और कोई बहुत कड़ी धाराएं तो है नहीं उस पर तो सज़ाहोने की भी संभावना नहीं है। उस के केजरीवाल से अच्छे संबंध हैं उस ने जेल का सारा कच्चा चिट्ठा उन्हें बताया था। उन्होंने डी.आई.जी. से शिकायत कर दी। अब डी.आई.जी. जेल वालों के पीछे पड़ गया है। हर दूसरे दिन यहीं दौरा करता है। मुजफरनगर और मेरठ जेल में तो छापा भी पड़ चुका है। अभी यहां और नोएडा में नहीं पड़ा है। इस लिए और भी इन लोगों की हालत ख़राब रहती है। लेकिन इन सब के बीच में पिसते तो हम बंदी ही हैं। जब लगता है कि ज़िंदगी एक ढर्रे पर आ रही है तभी कुछ न कुछ हो जाता है और नए सिरे से संघर्ष शुरू हो जाता है। एक दिन भी सुकून से नहीं जी सकते। चलिए जी ये भी बीत ही जाएगा।

कल रात के खाने में पूड़ी बननी थी। और सुबह से बारिश रुकी ही नहीं थी तो पूड़ी बनने में देर हो गई और भंडारा नौ बजे रात तक बंद नहीं हो पाया। फिर जेलर आ कर बैठ गए और साढ़े नौ बजे सब बंद करा कर ही गए। जब तक महिला बैरक बंद न हो जाए जेलर साहब जेल से घर नहीं जाते।

आज शबीना को मेरठ मेडिकल कालेज गए 6 दिन हो गए। मेरठ से दो डाक्टर आई हुई थीं। उन्हें ऊपर के बैरक में जगह मिली थी बेचारी बहुत परेशान थी। वहां उन का एडजस्टमेंट ही नहीं हो पा रहा था। जेलर साहब से रिक्वेस्ट की उन लोगों ने तो आज ड्यूटी वाली ने शबीना का फट्टा समेट कर उन्हें नीचे ही जगह दे दी। कि शबीना जब वापस आएगी तो उसे भी कहीं एडजस्ट कर देंगे। बहुत बुरा लगा ये देख कर कि एक तो वो वैसे ही बीमार है। हम उसे उस का घर तो दे नहीं सकते और जिस फट्टे पर वो डेढ़ साल से रह रही थी, वो फट्टा भी उस से छीन लिया गया। इतने समय से एक जगह रहते-रहते इंसान उस का आदी हो जाता है। अपनी सहूलियत खोज लेता है। अब उसे नई जगह दी जाएगी। बीमारी की हालत में कैसे बेचारी नई जगह में, नए पड़ोसियों के बीच में एडजस्ट करेगी और उस पर अगर उस का बैरक ही बदल दिया तो भगवान ही मालिक है। इन लोगों के मन में दया भाव तो बिलकुल है ही नहीं।

आज दोनों बच्चे लखनऊ पहुंच गए होंगे। घर कितना भरा-भरा लग रहा होगा। पापा जी को भी अच्छा लग रहा होगा। हमें भी सब मिस कर रहे होंगे। क्या भगवान क्या दिन दिखा रहा है तू। पूरे परिवार के होते हुए भी कैसे अलग-अलग सब पड़े हुए हैं। त्यौहार भी अलग-अलग मना रहे हैं। और हम तो बिलकुल अकेले हैं। कैसे कटेगा ये समय ? शायद ऐसे ही सब झेलते-झेलते इंसान पत्थर हो जाता है। फिर कोई भी परिस्थिति उस पर कोई असर नहीं डाल पाती है। आज बुलबुल दीदी मेरी भेजी हुई चिट्ठी पढ़ रही होंगी। पता नहीं उस का जवाब भी भेजा जाता है या नहीं। इतनी अक्ल तो होगी नहीं कि वहां जेल में मम्मी अकेली है तो कुछ उन के लिए लिख भी दें कि पढ़-पढ़ कर उन का समय कटे।

दोनों डाक्टर जो मेरठ से आई हैं रिटायर हैं। बच्चे सेटल हैं। लेकिन उन की उम्र जेल झेलने की नहीं है। एक 66 साल की हैं एक 68 साल की। उठने बैठने, हर काम में तकलीफ ही तकलीफ है। उन दोनों ने मिल कर गीजर लगवाया है गरम पानी के लिए और दो लैट्रिन को वेस्टर्न स्टाइल में बदलवाया कराया है। ये सब इन की तरफ से दान किया गया है। लेकिन नीचे बैठना, सोना सब मुश्किल है उन के लिए। सुना है चार प्लास्टिक की कुर्सियां भी दान की हैं। लेकिन कुर्सियां तो अभी आई नहीं हैं महिला बैरक में। उन लोगों को देख कर ये तसल्ली तो होती है कि चलो हम तो हाथ पैर के रहते ही जेल काट ले रहे हैं और बुढ़ापे में तो मुश्किलें बढ़ती ही जाती हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है पिछली बार जो जेल मैं ने काटी थी। दोनों हाथों के बिना वो भी बहुत बड़ा नरक था, इस बार तो रामेंद्र मोहन जायसवाल जी सब लोग यही कहते हैं कि इस बार तो आप को बहुत आराम है कोई दिक्क़तही नहीं है। अब कौन समझाए इन लोगों को। जेल तो फिर जेल ही है। दोनों डाक्टर बेचारी बहुत सीधी हैं। आज पूरे एक हफ़्तेबाद जा कर उन्हें रहने का सही ठिकाना मिला। उनका फट्टा हम लोगों के बीच में आ गया। कम से कम एक जैसी मानसिकता वालों के बीच में आ गई। उस के लिए भी कितना संघर्ष करना पड़ा उन्हें। इतना तो भगवान के आभारी हैं कि उस ने मुसीबत तो डाली है लेकिन उस को काटने के लिए सुविधाएं भी दी हैं। संघर्ष कम रखे हैं इस राह में। अच्छे साथी मिला देता है तो राह थोड़ी आसान हो जाती है। वैसे भी इस बार चांदनी की वजह से काफी सहूलियत है। सारा सेटअप बना बनाया है।

लोग स्वार्थ के कैसे-कैसे रिश्ते बनाते हैं और काम होते ही मुंह फेर लेते हैं। जब तक विधु दीदी भंडारा चला रही थी , मायावती की सुबह जब चाय बनती थी तो वो चाय दे कर विधु दीदी को उठाती थीं कि गुरू जी उठिए। मने मॉर्निंग टी देती थीं। क्यों कि फिर वो भंडारे की सारी सुविधाएं उन से लेती थी, और जैसे ही विधु दीदी की टीम को भंडारे से हटाया गया बेड टी सब बंद हो गई। अब तो चौबीस घंटे में भी पांच मिनट भी मायावती विधु दीदी को नहीं देती हैं कहां पूरा-पूरा दिन साथ ही रहती है। ये है सुविधाजनक रिश्तों के चेहरे।

आज हमने गुड बेकरी की गुझिया खाई। वंदना के घर से आई थीं। होली का शुभ भी हो गया। आगे देखें क्या-क्या होता है? अब तो लग रहा है नवरात्र भी यहीं पड़ेगा। यही तो नहीं पता चलता कि अभी और कितने दिन यहां रहना है तभी तो ये जेल है कि और आप यहां बंद हैं। बेबस हैं। अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकते।

आज शबाना की तबियत बहुत ख़राब थी, अस्थमा का अटैक पड़ा था। सांस ही नहीं आ रही थी, शबाना जेल में सिलाई का काम करती है। बंदियों के सूट आदि सिलती है। बंदियों से तो 150 रुपए सूट की सिलाई लेती है लेकिन ड्यूटी वाली सब फ्री में सिलाती हैं। अपना तो अपना पूरे घर खानदान के भी सिलवाती हैं। और डाक्टर की रिपोर्ट लगवाने में मरी जा रही थी। ख़ूब बड़बड़ा रही थी। ज़रा भी मानवता नहीं है। अरे इतना ही अहसान मान लेती कि इस से कितना काम तो फ्री कराती हैं तो थोड़ी दवा दारू ही मुहैया करा दें। ये शबाना वो है जो अपनी बहन की बहू की दहेज हत्या के केस में जेल आई है। इन की बहन और उन का पोता भी अंदर है। बहुत ही प्यारा बच्चा है और सीधा भी। सुन रहे हैं कि लड़की वालों से समझौता हो गया है पैसे के लेने देन से। जल्दी ही चली भी जाएगी वो।

आज सुबह-सुबह पांच परवाने आए हैं। सब बहुत ख़ुश हैं कि एक साथ पांच-पांच लोग जाएंगे इन लोगों की होली अच्छे से घर पर मनेगी। हम लोग तो यहीं हैं जेल में। सब बहुत दुखी हैं। घर की बहुत याद आ रही है सभी को। लेकिन सभी लोग मन में अपना दुख दबा कर ऊपर-ऊपर से हंस रहे हैं। समझदार जो बनते हैं तो रो कैसे सकते हैं ? क्या हो रहा होगा घर पर ? अपनी ज़िंदगी में शादी के बाद ये पहली होली है जो इतने खाली हैं हम। कहां तो दम मारने की भी फुर्सत नहीं रहती। कहां एक़दमही खाली हैं , आज कोई काम ही नहीं है। किसी चीज़में मन भी नहीं लग रहा। किताब खोल तो रहे हैं लेकिन एक भी अक्षर दिमाग में नहीं जा रहा। मन कहीं भी नहीं लग रहा। लेकिन हां मन मजबूत भी हो रहा है कि कैसी भी परिस्थिति आए इंसान झेल ही लेगा। पतिदेव क्या कर रहे होंगे ? बिना बीवी के मन लग रहा होगा या नहीं ? बच्चों में अपने को बहला रहे होंगे। दीवाली का सामान खरीदने जब हम बाजार गए थे बच्चों के साथ और सामान गिना रहे थे कि ये भी लेना है , वो भी ज़रुरी है तो दोनों यही बोले कि सब पता है। पिछली बार भी दीवाली मनी थी घर में और आप दोनों ही लोग नहीं थे त्यौहार में तो इस बार यही बहुत है कि आप लोग साथ हैं। आज सुबह से रह-रह कर मुझे यही बात ध्यान आ रही है और मन परेशान हो जा रहा है कि फिर एक बार त्यौहार में हम चारों साथ नहीं हैं , फिर जब अपने आस पास देखो तो सब्र आ ही जाता है। रमेश की तो जेल में तीसरी होली है। आखिर उन का परिवार भी तो धैर्य रखे ही है।

आज सभी लोग 50-50 रुपए इकट्ठे कर रहे हैं कि कल त्यौहार पर अच्छा खाना बनाया जाएगा। जेलर साहब को सब ने घेर लिया कि पनीर मंगा दीजिए। बेचारे बड़े परेशान कि अब आखिरी समय पर कहां से व्यवस्था करूं , कल तो सब बंद ही रहेगा। देखें क्या होता है ? वंदना ने अपने बैरक के दो लड़कों के लिए पिचकारी मंगा दी। अब बाक़ीसब बच्चे इतनी हसरत से उन पिचकारियों को देख रहे हैं कि क्या कहें ? लेकिन ये जेल ऐसी जगह है कि चाह कर भी व्यवस्था नहीं कर सकते। उन में से कितने बच्चे तो ऐसे हैं, जिन्होंने जेल की ही होली देखी है। उन के लिए दुनिया ही इतनी है महिला बैरक और उस का हाता। नीता पुलिस वाली की ड्यूटी इस हफ़्ते तलाशी पर है तो मुलाक़ात ख़त्म होने के बाद वो बैरक में आई होली खेलने के लिए और एक-एक बंदी के गुलाल लगाया। आज 167 महिला बंदी थीं। हर एक के पास जा कर उसे गुलाल लगाना , उसे बधाई देना। और कहीं भी ये नहीं लग रहा था कि व्यावसायिक मुस्कुराहट है। सब से पर्सनल टच लग रहा था। इसी लिए तो सारे बंदी उस की इज्जत करते हैं। उस से बात करने पर पता चला कि मुलाक़ात में जो बाहर से लोग आते हैं वो तयशुदा समय से ज़्यादा बात करने के लिए 100 रुपए ज़्यादा देते हैं। ऐसे कई लोग होते हैं तो लगभग दो हजार रुपए रोज हो जाते हैं लेकिन पांच या छह सिपाही होते हैं तो सब में बंटता है और मुलाक़ात के सामान में से फल या सब्जी, बिस्कुट आदि सामान या जो सामान अंदर नहीं आता है वो सब भी इन लोगों में बंट जाता है। कितने तरीके होते हैं पैसे कमाने के बस दिमाग होना चाहिए इंसान के पास।



 होली , होली , होली !

होली , होली , होली ! आज होली भी निपट गई। साल का सब से बड़ा त्यौहार अपने परिवार के बिना मना लिया और हम जिंदा भी हैं। इंसान कितना बेशर्म होता है किसी भी हाल में जिंदा रह ही लेता है और ख़ुश होने का दिखावा भी कर लेता है। लेकिन आज का दिन ठीक ही बीत ही गया। सुबह से मन परेशान था, सब से पहले सुबह 6.30 बजे जो ड्यूटी वाली जेल खुलवाने आई तो छोले और गुझिया ले कर आई हम कुछ लोगों के लिए। उस के बाद नौ बजे से अंबीर की होली शुरू हुई। सब लोग सभ्य इंसानों की तरह सूखा गुलाल ही खेल रहे थे तब तक मित्रा दी ने पानी की होली शुरू कर दी। वो मथुरा की हैं। उन के यहां तो भयंकर होली होती है। तो पानी से बैरक के सामने मैदान में कीचड़ हो गया हम लोग आपस में खेल ही रहे थे कि जेलर, डाक्टर लोग आ गए। अबीर की होली खेल कर वो चले गए। कि सब पानी की होली खेलने लगे और एक दूसरे को उस कीचड़ में ढकेलने लगे। हमें जब खींचा तो हम चुपचाप जा कर कीचड़ में बैठ गए कि हाथ तो वैसे ही टूटा हुआ है और कुछ न टूट जाए। सब लोग देर तक ऐसे ही खेलते रहे तभी फ़ोन आया कि अधीक्षक आ रहे हैं। सब ने तैयारी कर ली और जैसे ही वो आए उन्हें कीचड़ में खींच लिया जाए। फिर हमने और चांदनी ने उन्हें गुलाल लगाया। जेलर, डिप्टी जेलर सभी को कीचड़ में खींचा। वो अपने साथ ढोल भी लाए थे। ढोल पर ख़ूब नाच भी हुआ। [ जब ढोल बजने लगा तो सीमा (किन्नर) अपने वश में ही नहीं रही और ख़ूब नाची। सब रंगे-पुते थे तो पता भी नहीं चला कि कौन नाच रहा है। अधीक्षक आए तो उन को उठा कर रंग भरे गड्ढे में डाल दिया। वह बहुत ख़ुश हुए। ] दूसरे दिन अधीक्षक ने चांदनी से पूछा वह कौन औरत थी ? तो चांदनी ने बताया औरत नहीं किन्नर थी। तो वह खिसिया गए। साथ में राकेश तलवार भी आए थे। उन्हें तो हम लोगों ने ख़ूब रंग डाला। कीचड़ में भी घसीटा। चांदनी ने जब उन्हें रंग लगाया तो सच बड़ा अजीब लगा कि भगवान क्या दिन दिखाता है। पति पत्नी इस तरह से जेल में होली खेल रहे हैं क्या किसी ने भी ऐसे दिन की भी कल्पना की थी ? सब भगवान की मर्जी। ड्यूटी वाली ने जब कैंटीन आईं और दरवाजा खुला तो जिन लड़कियों के ब्वाय फ्रेंड उस तरफ थे सब को बुला कर इन लोगों की मुलाक़ात कराई और एक दूसरे को रंग लगवाए, और इस बात के ख़ूब पैसे बनाए पुलिस वालियों ने। सारी महिलाओं ने चंदा कर के पैसा जोड़ा कि मटर पनीर बना लेते हैं। जेलर साहब को पता चला तो उन्हों ने मटर पनीर अपनी तरफ से भिजवा दिया तो जो पैसा इकट्ठा हुआ था उस से गुझिया मंगवाई गई। और हर महिला बंदी को एक-एक गुझिया मिली। तो इस तरह से होली मनी। आज जेल में होली मना कर पता चला कि कितने तरह से होली मनती है। सब को घर की होली नसीब नहीं होती।



अपनी मर्जी से कहां अपने सफ़र के हम हैं


अभी तक होली पर लगता था सब लोग हमारी तरह ही होली मनाते होंगे लेकिन इस बार पता चला कि एक ही त्योहार के अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग रूप होते हैं। कोई कैसे मनाता है कोई कैसे। इसी जेल में बंदी-बंदी के होली मनाने के अलग ढंग हैं अधिकारियों की तो बात ही अलग है।

आज सुबह जेलर साहब आए तो देर तक बात करते रहे होली की। सब की तारीफ कर रहे थे कि एक साथ सब ने मिल कर इतने अच्छे से संयमित ढंग से होली खेली। अच्छा लगा सब को।

आज हमने अपने बैरक की दो चार महिलाओं के साथ मिल कर 108 बार हनुमान चालीसा पढ़ी। दोपहर में दो बजे बैठ गए और आठ बजे पूरा कर के ही उठे। और लोग तो एक दो बार उठे भी लेकिन हम तो पूरा कर के ही उठे। माला तो हम ही कर रहे थे। पूरा करने के बाद मन इतना हल्का लग रहा था कि बस दो रोटी खा कर 8.30 बजे तक सो ही गए।

तीन दिन से हमारे फट्टे का माहौल ख़राब था। मोहिनी को लगता है कि वो जो कह रही है वही सही है। वो अपने हिसाब से चलाना चाहती है। चांदनी को तो सांस लेना मुहाल है। लेकिन चांदनी का सारा कुछ वही मैनेज करती है। सारी व्यवस्थाएं देखती है। वैसे हैं तो ये सब ज़रुरत के ही रिश्ते। उसे भी चांदनी की ज़रुरत है। उस की मुलाक़ात कम आती है तो हर चीज़के लिए वो चांदनी पर आश्रित है । इस के बदले में वो चांदनी का ख्याल रखती है। लेकिन अब ऐसा है कि चांदनी बिना उस से पूछे किसी के लिए कुछ कर नहीं सकती। वो जिस से न चाहे चांदनी उस से बात नहीं कर सकती , अगर ऐसा हो गया तो वो नाराज हो जाएगी और फिर एक़दमसे अलग हो जाएगी। न उन का कोई काम करेगी, न साथ खाएगी, बोलेगी भी नहीं। सब लोग जान जाएंगे कि मोहिनी नाराज है और चांदनी पीछे-पीछे घूमती रहती है उसे मनाती हुई। सब तमाशा देखते हैं। अपनी परेशानियां कम हैं कि हर चौथे दिन ये समस्या भी खड़ी हो जाती है। हम से तो इतना तनाव झेला नहीं जाता। और एक बात ये भी है कि कोई चांदनी की तरफ से मोहिनी को समझा भी नहीं सकता। सीधे कह देती है कि हम दोनों के बीच में कोई नहीं बोलेगा। लेकिन हम साथ में रहते हैं तो असर हम पर भी आता है। बेचारी चांदनी कैसे झेलती है ? दो दिन बाद आ कर खुद ही सॉरी बोलती है कि क्या करूं ये मेरा स्वभाव है। ऐसा स्वभाव भला कौन झेलेगा ? वो भी जेल में। हमने तो कहा भई हमें तो सुकून चाहिए चैन से जेल काटने दो। हम इतना प्रेशर ले कर नहीं जी सकते। लेकिन चांदनी को न तो वो छोड़ती है और न ही जीने देती है। सारा एहसान अपना ही दिखाती है कि हम न हों तो ये ऐसे ही रह जाएं। लोग उन को बेवकूफ बना लें। मतलब हम अपने लिए नहीं इन के लिए इन के साथ रहते हैं। चांदनी भी कहती है कि चलो यही सही। कैसे भी कटे, जेल तो कटे। ड्यूटी वाली भी सब मोहिनी से बहुत नाराज रहती है लेकिन चांदनी की वजह से कोई कुछ कह नहीं पाता है। इस बार जब तमाशा हुआ तो चांदनी ने खुद ही ड्यूटी वाली से कहा मेरा फट्टा वहां से कहीं और कर दो। अब वो सब तुरंत एक्टिव हो गईं कि मोहिनी से अलग करो इसे। तुरंत मोहिनी का गुस्सा उतर गया। अपनी असलियत समझ आ गई उसे। फिर चांदनी को मनाने लगी। अब जा कर माहौल शांत हुआ। इसी लिए कल हम हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे कि इसी में ध्यान बंटा रहेगा और समय भी कट जाएगा। कितने तरीके से अपने मन को समझाना पड़ता है। न चाहते हुए भी इन्हीं लोगों के बीच मुसकुरा-मुसकरा के बात करनी होती है। सही बात है-

अपनी मर्जी से कहां अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

आज तारीख़पर बाप बेटे दोनों आए। हम तो उतनी देर हवाओं में थे जब तक उन के साथ थे। मुदित भइया कहते रहे , हम सुनते रहे बस। सब सपना ही लग रहा था पति और बच्चों का साथ भी टाइम बांड मिलता है। बिटिया को मिस करते रहे कि वो भी होती साथ में तो पूरा परिवार तो एक साथ रह लेता थोड़ी देर। लेकिन उस का पासपोर्ट का इंटरव्यू भी ज़रुरी था। पिता जी भी ख़ुश -ख़ुश दिख रहे थे। बाक़ीहम तो मगन थे ही। सच है कोई भी दिन हमेशा नहीं रहते। जब परिवार के साथ रहते थे तो कभी नहीं सोचा था कि ये दिन सपना हो जाएंगे। इंसान तरस जाएगा अपने परिवार के लिए। परिवार के साथ से बड़ी दौलत और कोई नहीं होती। मोबाइल पर घर की फ़ोटो देख कर बड़ा अजीब सा लग रहा था। कब अपनी आंखों से अपना घर देख पाएंगे। आज तीन महीना हो गया जेल आए हुए। अब तो दिन कटने भी भारी हो गए हैं। बिटिया ने चिट्ठी भेजी थी मेरे लिए। ज़िंदगी में पहली चिट्ठी थी उन की मेरे लिए। ये बच्चे भी न। चिट्ठी भी हिन्दी की अंग्रेजी में लिखी थी। सारे इमोशंस का कबाड़ा कर देते हैं बच्चे भी। लेकिन उन का अपना यही स्टाइल है। मुझे समझाने के लिए बुलबुल ने पूरी चिट्ठी मजाक में लेते हुए लिखी है। लेकिन हम भी उनकी मां हैं। सब समझते हैं। होली पर बुलबुल ने पुआ बनाया था। मेरे लिए भी भेजा था। अच्छा बना था पर मुलायम कम था। लेकिन पहली बार के हिसाब से बहुत अच्छा बना था। मेरी बिटिया ने मुझे ध्यान में रखते हुए मेरे लिए शॉपिंग की थी। सब देख कर इतना अच्छा लग रहा था कि मेरे बच्चे छोटी-छोटी बातों का कितना ध्यान रखते हैं। मेरे बारे में इतना सोचते हैं बच्चे। यही बहुत है मेरे लिए। दिन तो इन्हीं चीजों के भरोसे कट जाते हैं चाहे जेल हो या बाहर रहें। यही सब से बड़ी दौलत है मेरी। पति देव तो नकारात्मक ही सोचते हैं। अभी भी कह रहे हैं यहां से बेल खारिज होकर सुप्रीम कोर्ट जाएगी। अब ठीक है जो भगवान की मर्जी होगी वही होगा। हमारे चाहने से कुछ होता तो हम यहां आते ही क्यों ?



मुदित से मिल कर आते हैं तो दूसरा दिन काटना मुश्किल हो जाता है। बहुत ध्यान आता रहता है उस का। पिछली बार भी यही हुआ था। हम ख़ूब रोए थे। आज रोए तो नहीं लेकिन मन बहुत परेशान है। लग रहा है भाग जाएं कहीं। लेकिन जा भी नहीं सकते कहीं। और अब तो दिन भी बड़े होने लगे हैं। काटे नहीं कटते। पति से मिल कर उतना परेशान नहीं होते जितना बेटे से मिल कर होते हैं। मन ही नहीं लगता। यहां आ कर तो वही हाल है। हर चेहरा परेशान है। किसी के भी पास बैठ कर अच्छा नहीं लगता मन और परेशान हो जाता है। चंदा जो हमारा काम करती है, उस के देवर की बहू जल कर मर गई थी, उसी के केस में आई है। चार साल हो गए हैं यहां पर उसे। और सात महीने पहले उस के केस की सब गवाही हो गई थी। केस फैसले पर लग गया था और सात महीने से फैसले की नौबत ही नहीं आ पा रही है। कभी हड़ताल रहती है, कभी जज छुट्टी पर होता है, कभी वकील नहीं आता। आखिर कोई कितना सब्र करेगा। उस का बेटा भी उस के साथ है, वो कभी-कभी अपनी मां से कहता है कि तुम्हारी वजह से मैं जेल काट रहा हूं और बदमाश भी होता जा रहा है। एक बार फ़ैसलाहो जाए तो आर पार हो जाए कि बच्चे को कहां रखना है, क्या करना है? किरन बेदी की एन.जी.ओ जेल के बच्चों का डी.पी.एस. स्कूल में दाखिला करा रही है और हास्टल सुविधा भी दिला रही है। महिला कैदी के और बच्चे जो घर पर हैं उन्हें भी ये सुविधा दिला रही है। लेकिन तब भी ये महिलाएं अपने बच्चे नहीं भेज रही हैं कि हमारे बच्चे अनाथ नहीं हैं जो अनाथालय भेजें। इन लोगों की सोच भी , कोई नहीं बदल सकता। एक बार इस का फ़ैसलाहो जाए तो फिर समझाएंगे कि बच्चे को तो भेज ही दो। उस का भविष्य यहां न चौपट करो। पहले जब हम सड़क पर अपराधी बच्चे को देखते थे तो यही सोचते थे कि आखिर ये बच्चे ऐसे क्यों हैं? इन के मां बाप ध्यान क्यों नहीं देते। अब समझ आया कि ऐसे ही ब्रोकेन फेमिली या अपराधी महिलाओं के बच्चे ही अपराधी बन जाते हैं। अब जो बच्चे बचपन से ही जेल देख रहे हैं उन्हें जेल का क्या डर ? और हर अपराधी का अंत जेल से ही डर होता है। जब यही भय ख़त्म तो अपराधी तो बनना ही है।

आज कैसर से बात हुई तो पता चला कि उस का आदमी एक राज मिस्त्री था और घर में ही काम करते हुए उस की मौत हो गई। वो अपने पिता की पहली बीवी की संतान था। बीवी के मरने पर उन्हों ने दूसरी शादी कर ली थी। दूसरी बीवी भी मर गई थी। कैसर के ससुर ने कहा कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं उन की मां नहीं है और तेरा आदमी मर गया है तो तू मुझ से ही शादी कर ले तो मैं तेरे पक्ष में गवाही दे कर तुझे छुड़ा लूंगा। कैसर बहुत सुंदर है। उस ने साफ मना कर दिया कि तू मेरे बाप की उम्र का है। मैं तुझ से शादी नहीं कर सकती। जब मैं ने मारा ही नहीं है तो मुझे क्या डर ? मैं बरी हो जाऊंगी। दो साल हो गए हैं उसे यहां। अभी केस की गवाही ही चल रही है। पता नहीं अभी कितना समय और लगेगा उसे यहां ? मुश्किल से 25 साल की है।

आज डी.आई.जी. साहब जेल दौरे पर आए थे। कई दिन से उन का दौरा सुन रहे थे आज हो गया। महिला बैरक में एक कमरे का छोटा सा अस्पताल है। जिस में हर दूसरे दिन एक डाक्टर या फार्मासिस्ट आते हैं। और एक बंदी है अब्दुल जो आजीवन कारावास में बंद है, वो कंपाउंडर के रूप में आता है। उसे यहां चार पांच साल हो गए हैं। तो वो धीरे-धीरे डाक्टर ही हो गया है। इंजेक्शन देना , ड्रिप लगाना आदि सारे काम वो बखूबी कर लेता है। उसे महिला बैरक के बारे में भी पूरा अंदाजा है। बीमार महिला को जेल की तरफ से दूध, ब्रेड, फल, अंडा सब मिलता है लेकिन ये डाक्टर के कहने पर ही होता है तो इस में अब्दुल मुस्लिम महिलाओं को प्राथमिकता देता है। इस के अलावा जो सुंदर, अच्छी लड़कियां होती हैं उन्हें प्रेम पत्र भी देता रहता है। ऐसे ही एक लड़की ज़ोया ऊपर वाली बैरक में आई है। ऊपर की बैरक में ही सोफिया भी है जो सज़ामें है और 29 अप्रैल को वो रिहा भी हो जाएगी। तो अब्दुल उसी के जरिए लड़कियां सेट करता है तो उसने ज़ोया को कहलवाया कि वो उस की मरी हुई बीवी की तरह लगती है और भी बहुत कुछ कहता रहता था। वो परेशान हो गई थी।

उस दिन उस का पति मुलाक़ात पर आया था। वो अपने पति को सब बता रही थी। तभी डी.आई.जी. जेलर के साथ मुलाक़ात घर में पहुंच गए और पूछने लगे कि किसी को कुछ कहना है ? कोई शिकायत हो तो बताइए। तो उस के पति ने कहा हां मुझे कहना है और सब बता दिया। डी.आई.जी. ने वहीं जेलर को ख़ूब डांटा। जेलर साहब ने अब्दुल की डांट लगाई और शाम को आ कर ज़ोया से बात की , कि जब मैं यहां दिन में दो बार आता हूं तो आप ने मुझ से क्यों नहीं कहा ? अब वो बेचारी क्या कहती ? वो तो सिर्फ़ अपने पति को बता रही थी अब उस की क़िस्मत ही ख़राब थी कि डी.आई.जी. वहीं आ गया। सारी ड्यूटी वाली उसी पर नाराज हो रही हैं। क्यों कि बात उन की नौकरी पर आ जाएगी कि जब ये सब हो रहा था तो आप कहां थीं ? ड्यूटी वाली कह रही है कि पहले हम से क्यों नहीं कहा ? यहां की बात तो हम से करनी चाहिए पति क्या कर लेंगे ? तुमने बात बाहर कही है इस लिए तुम महिला बैरक की सारी नाली दोनों समय साफ करोगी और महिलाओं ने जब विरोध किया कि अगर आप लोग ऐसे करेंगी तो ये फिर आगे शिकायत करेगी कहीं बात बिगड़ न जाए। ड्यूटी वाली बोली ये 376 के केस में आई है (मतलब लड़की को बरगला कर भगाने में) और यहां लड़का बरगला रही है तो जेल से ही एक धारा और लग जाएगी और इस की ज़मानतन हो पाएगी। इस तरह धमकी दे रही थी। एक ड्यूटी वाली है नीता जो बंदियों की भी सुनती है तो उस से जा कर हम लोगों ने कहा कि ये गलत है। सज़ादेनी है तो तीनों को दें। सिर्फ़ सुनने वाले को ही क्यों ? जिसने कहा जिस के जरिए कहा, जिस ने सुना तीनों को सज़ादें। तो बोली इस ने बैरक की बात बाहर कही इस लिए इसे सज़ा मिलेगी। हम ने कहा ज़रा धमका दीजिए। कि यहां पर तुम्हारी किसी भी समस्या का समाधान हम ही करेंगे बाहर से कोई कुछ नहीं कर पाएगा। इतना काफी है आगे कुछ नहीं होगा। लेकिन इस तरह से एक को नाली की सफाई पर लगा दो और दोनों को कोई सज़ानहीं , ये तो ठीक बात नहीं। बात उन की समझ में आ गई और उसे बुला कर ज़रा धमका कर छोड़ दिया। इस तरह ये मामला सुलझा।

आज हाईकोर्ट में वकील को गोली मार दी गई। अभी तो एक ही दिन की हड़ताल है देखें आगे क्या होता है? कल रमेश की तारीख़ है वो तो हड़ताल में गई है परसों हमारी है। वैसे वकील तो सारे एक हो जाते हैं सोमवार से पहले क्या हड़ताल खुलेगी ? अपनी क़िस्मत इतनी अच्छी नहीं है कि हड़ताल एक ही दिन में कॉल ऑफ हो जाए। वैसे भी यहां बैठ कर सब्र करने के अलावा और कर भी क्या सकते हैं ? बाहर रहते हुए कभी वकीलों की हड़ताल की अहमियत नहीं पता थी कि इस से भी लोगों की ज़िंदगी पर असर पड़ता होगा। लेकिन यहां रह कर देख रहे हैं कि कितनी बुरी तरह असर डालती है हड़ताल भी।



आज कोर्ट में हड़ताल थी तब भी अमीना खाला का फ़ैसलाहो गया। खैर फ़ैसलाहोने के लिए वकील की ज़रुरत भी नहीं होती। सिर्फ़ जज ही काफी है। 9 मार्च को ही उन्हें दोषी करार दिया और आज 13 मार्च को चार दिन बाद उम्र कैद की सज़ा सुना दी? अमीना खाला और उन का बेटा दोनों दहेज के केस में तीन साल से बंद हैं। आया तो पूरा परिवार था लेकिन बाक़ीसब की ज़मानतहो गई। यही दोनों मां-बेटे अंदर थे। लड़की वालों से समझौता भी हो गया था। उन्होंने सारी गवाही इन्हीं लोगों के पक्ष में दी थी। पैसा ले कर के। लेकिन जज ने कहा कि हत्या तो हुई है चाहे दहेज हो या न हो तो सारी धाराएं हटा कर सिर्फ़ 302 रहने दिया और 302 की तो सज़ाही उम्र कैद है। तो आज दोनों को सज़ा हो गई। ये दोनों तो ट्रायल के दौरान भी बाहर नहीं गए थे और अब तो उम्र कैद हो गई। इतना माहौल ख़राब है। शाम से डिप्रेशन सा लग रहा है। जिन-जिन के केस फैसले पर लगे हैं सब एक दम से सहम गए हैं कि पता नहीं अब हम लोगों का क्या होगा? ये जगह ही ऐसी है बड़ी डिप्रेसिस की। सब अपने आप में हैरान परेशान हैं कि पता नहीं हमारे केस का क्या होगा?

आज किसी एन.जी.ओ. से एक महिला आई थी। जागरूकता फैला रही थी, बच्चों के बारे में बता रही थी कि उन्हें इस माहौल से दूर रखें। कौन सी नई बात बता रही थी। सब यहां जानते हैं। लेकिन मानसिक रूप से इतना परेशान हैं कि ये सब भाषण अच्छा नहीं लगता। कुछ हमारे लिए कर सकते हो तो क़ानूनी सहायता दिलाओ , बाहर निकल कर सब लोग खुद ही मैनेज कर लेंगे। लेकिन अंदर ये सब कहां संभव है ? अब समझ आया कि जब हम भी एन.जी.ओ. की तरफ से जाते थे तो लोग ध्यान से क्यों नहीं सुनते ? उन की प्राथमिक आवश्यकताएं जब तक पूरी नहीं होंगी उनका ध्यान और चीजों की तरफ नहीं जाएगा। कुछ भी समझाना बेकार ही रहेगा। जब तक उन परिस्थिति में खुद न आ जाओ ये सब बातें समझ नहीं आती।

उस दिन जब डी.आई.जी. आए थे तो उन्हों ने अपनी बातचीत में महिलाओं के सवाल के जवाब में कहा था कि बाहर कोई भी आप के लिए परेशान नहीं है। लोगों की दिनचर्या चल रही है। ये तो आप लोग यहां हैं तो परेशान हैं बाहर सब अपने आप में मस्त हैं। अब बताओ भला इस बात का क्या मतलब है ? एक तो इंसान यहां वैसे ही परेशान है ऊपर से आप अपनी नकारात्मक सोच उन पर डाल कर उन्हें और मानसिक रूप से परेशान कर रहे हैं। भला ये कौन नहीं जानता कि सब की ज़िंदगी चल रही है। हमारी ही ज़िंदगी अंदर आ कर कौन सा रुक गई है ? क्या हम खा नहीं रहे हैं कि सो नहीं रहे हैं कि हंस नहीं रहे हैं ? क्या नहीं कर रहे हैं लेकिन मन से तो ख़ुश हैं। नहीं वैसा ही हाल हमारे परिजनों का बाहर है। ऐसे ही एक बार नेहरू जी के जेल में होने पर उनके पिता जी ने पत्रा लिखा था कि ,  ‘‘जवाहर, बाहर मैं उतना ही ख़ुश हूं जितना तुम जेल के अंदर हो।’’ तो वही बात है लेकिन उस का मतलब ये तो नहीं है कि परिवार वाले हमें भूल गए हैं। उन्हीं के भरोसे तो इंसान यहां जेल काट रहा है अगर वही हमें भूल जाएंगे तो बाहर निकलने का मतलब ही क्या है ? कुछ लोग कितने निष्ठुर होते हैं बिना कुछ सोचे, दूसरे की भावनाओं का ख्याल किए बिना ही कुछ भी कह देते हैं।

आज सुना कि नागेंद्र पांडेय के पिता जी नहीं रहे और दोनों भाई यहां जेल में बंद हैं। सिर्फ़ बड़े भाई भगवती बाहर हैं। उन्हों ने ही दाह संस्कार किया था। इन लोगों ने बहुत कोशिश की कि पैरोल मिल जाए लेकिन जज नहीं माना। कितना मुश्किल है ऐसे हाल में अपने को संतुलित रखना। रमेश के पिता जी भी जब ख़त्म हुए थे तो वो भी अंदर ही थे। ये बता रहे थे कि दसवें को ये और मिस्टर सिंह रमेश के साथ नाई के पास गए और रमेश ने अकेले दाढ़ी बाल बनवाए। ये लोग साथ में चुपचाप खड़े रहे। यही कह रहे थे कि जब मुझे इतना ख़राब लग रहा था तो रमेश को कैसा लग रहा होगा ? किस तरह से उन्हों ने अपने को कंट्रोल किया होगा। यही परिस्थितियां ही इंसान को निष्ठुर बना देती हैं, उस की भावनाएं मर जाती है। इंसान पाषाण हृदय हो जाता है। भगवान भी कैसी-कैसी परिस्थितियों में डालता रहता है।

आज साहबजादे सुबह ही पूना के लिए गाड़ी पकड़ लिए होंगे। इतनी सुबह कैसे उठा होगा , कैसे तैयार हुआ होगा ? हमारे बिना भी सारे काम हो ही रहे हैं। कुछ भी नहीं रुका है। हमारी ज़रुरत ही क्या है किसी को भी ?

लीजिए आज मुरादाबाद की भी चार्जशीट आ गई। बड़ी मिक्स सी फीलिंग है एक तरफ तो दुख है कि अब कम से कम तीन महीना तो और जेल में रहना ही पड़ेगा दूसरी तरफ ये तसल्ली भी है कि चलो अंदर रहते ही आ गई। नहीं तो पता चलता बाहर निकले और 15 दिन बाद ही फिर आना पड़ता कि चार्जशीट आई है तो चलिए। फिर से अंदर चलिए और इस की भी ज़मानतकराइए। सही बात है भगवान जो भी करता है अच्छे के लिए ही करता है। उस की महिमा वही जाने। वकीलों की हड़ताल भी नहीं ख़त्म हो रही है। पता नहीं कब तक चलेगी। लेकिन हम तो अब आराम से बैठे हैं। देखें दोनों केस की ज़मानतकब तक होती है। अब तो यही मन लगाना है।

आज यहां राजू और करुणेश की मुलाक़ात पर मोनू आया था। मोनू यहां का राइटर था। काफी समय से जेल में था। इन लोगों का आपस में कुछ प्रेम पत्रों का रिलेशन भी था और वो उस को बाहर से भी बनाए रखे हैं। इसी लिए मुलाक़ात करने को आया। इन लोगों के घर वाले तो आते नहीं हैं ये लोग ऐसे ही टाइम पास हैं। अब तो फर्जी मुलाक़ात भी बंद कर दी गई है। नहीं तो ये लोग ऐसे ही फर्जी मुलाक़ात हर शनिवार को अलग-अलग लोगों के साथ कर के सेटिंग किया करते हैं और जितने दिन चल जाए टाइम पास करते हैं। क्या करें और कोई तो आता नहीं है मुलाक़ात पर। घर वाले पूछते ही नहीं हैं। तो कैसे भी समय तो काटना ही है।

आज पता चला कि एन.आर.एच.एम. के एक केस में चार्जशीट के दौरान जज ने एक धारा 409 बढ़ा दी और चार लोग जो कि बेल आउट थे सब अंदर आ गए। अब उस धारा की ज़मानतपहले यहां से खारिज होगी फिर पूरे प्रोसेस से इलाहाबाद जा कर उन की ज़मानत होगी। सब धाराओं में बेल आउट है तो इस धारा में भी ज़मानतहो ही जाएगी लेकिन डेढ़ दो महीना तो कम से कम लग ही जाएगा। बाक़ी उन की क़िस्मत। जब तक का दाना पानी लिखा होगा रहेंगे ही। ऐसी-ऐसी घटनाएं देख सुन कर तो और मन पक्का हो जाता है कि आप चाहे जो कर लें, जो होना है वो हो कर रहेगा। जितनी बार लिखा होगा उतनी बार जेल आना ही है। एक बार एन.आर.एच.एम. में फंसने के बाद आप अपनी ज़िंदगी में और कुछ नहीं कर सकते। पूरी ज़िंदगी जेल और कचहरी के बीच में सिमट कर रह गई है ? जेल आइए , ज़मानतकराइए , कचहरी में तारीख़ लगाइए बस और भी दुनिया में कुछ होता है पता ही नहीं चलता। फिर भी ‘‘तू रखे जिस हाल में दाती, हर पल शुक्र मनाता रहे।’’ इसी फार्मूले पर चलो तभी ज़िंदगी कट सकती है। नहीं तो रोते रहो अब ज़िंदगी भर।

दो दिन पहले रात में सुनीता आई थी। पता चला कि उस के लड़के ने लव मैरिज कर ली थी लड़की के घर वालों ने आरोप लगाया कि लड़की से मार पिटाई करते हैं। लड़के की मां नाराज है इस शादी से। और उस बेचारी को जेल भिजवा दिया। अब तो लड़के की मां होना भी अपराध हो गया। अगर लड़की वाले नाराज हो जाएं तो आप किसी भी तरह से जी नहीं सकते। हर समय गरदन पर तलवार लटकी रहती है। खैर आज उस की यही लोअर कोर्ट से बेल हो गई। चली गई अपने घर। तीन दिन की जेल यात्रा लिखी थी उस की कुंडली में। वो भी काट ही ली उस ने। खैर मायावती ने बहुत सपोर्ट किया उसे। जेल की परेशानियां उसे झेलनी नहीं पड़ी। जब तक जेल का वीभत्स रूप उसके सामने खुलता वो घर ही चली गई। भगवान इतनी अच्छी क़िस्मत सब की क्यों नहीं करता ? लोग पांच-पांच साल से इसी जेल में सड़ रहे हैं।

कल रानी का जन्मदिन था। एक नई फ्राक हमने मंगा दी थी और एक टॉफी का पैकेट था। बस दिन भर फ्राक पहने इतराती रही रानी। लेकिन बड़ी प्यारी लग रही थी। वनिता इसी में परेशान रही दिन भर कि रानी के पापा से मुलाक़ात हो सके। शाम को बैरक बंद होने से पहले आधे घंटे की मुलाक़ात हुई। बड़ा अजीब लगता है ये सब देख कर कि एक ही जगह रहते हुए भी अपने ही पापा से मिलने को बच्ची तरसे। लेकिन क्या करें यही तो जेल है। लेकिन उसी जगह जेल वालों का ये चेहरा भी है कि नीता ड्यूटी वाली रानी के लिए स्कर्ट टॉप ले कर आई अपने पैसे से। उस के लिए तो हम लोग कैदी ही हैं और हजारों आते रहते हैं उस में भी भावनात्मक रूप से किसी से जुड़ना उन लोगों का, आश्चर्य ही लगता है कि इन में भी इतनी इंसानियत तो है। ऐसे-ऐसे चार जन्म दिन बीत चुके हैं रानी के इसी जेल में। उसे तो पता ही नहीं कि बाहर जन्मदिन कैसे मनता है। केक कैसा होता है ? कैसे घर सजाते हैं। इस बच्ची ने तो कुछ भी नहीं जाना। बस खटका, तारीख़ , गवाही। यही सब सुना है उस ने अपनी ज़िंदगी में।

आज किरन बेदी की एन.जी.ओ. ने दो बच्चों का दाख़िला करा दिया है। रानी और कासिम का इतना अच्छा सा लग रहा है ये सुन कर कि चलो इन बच्चों की क़िस्मत तो बदली। रानी छह महीने की थी जब जेल आई और कासिम साल भर का। दोनों ने कुछ भी नहीं देखा था बाहर की दुनिया का। बहुत अच्छा हुआ कि प्राइवेट स्कूल में उन का दाखिला हुआ और हॉस्टल में बच्चे रहेंगे। एक भी पैसा नहीं खर्च करना पड़ेगा इन लोगों को। और जेल से बाहर निकलने के बाद भी नॉमिनल खर्चे पर ये लोग अपने बच्चों को वहां पढ़ा सकते हैं। थैंक्स टू सुपरिटेंडेंट कि ऐसे इनोवेटिव आइडियाज लाते हैं और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ते हैं। और इस में जेलर साहब उन का क़दम से क़दम मिला कर साथ देते हैं।

आज बैरक के पंखे चलाए गए। 15 अक्टूबर से 15 मार्च तक पंखे बंद रहते हैं। लेकिन इस बार तो हद ही हो गई। आज नवरात्र के पहले दिन पंखे चलाए गए। पंखे का स्विच बैरक के बाहर है। और 15 नवंबर को उस का कनेक्शन काट दिया जाता है। फिर बाहर से आदमी आता है पंखे का कनेक्शन जोड़ने को। इतनी सी चीज़भी आपके हाथ में नहीं है कि आप अपनी मर्जी से पंखा भी चला सके। इतने दिनों से मच्छर खाए लिए जा रहे थे। ऑडोमांस लगाया, मार्टिन भी लगाया, गुड नाइट का फास्टकार्ड भी जलाया। लेकिन कोई भी फर्क नहीं पड़ा। आज जब पंखा चला तो राहत मिली और इंसान बिना मच्छर के पूरी रात सो तो सका। इतनी छोटी-छोटी चीजों के लिए भी हम कैदी हैं। अपनी मर्जी से कुछ भी नहीं कर सकते। घर में रहते हुए इस बात का एहसास कभी नहीं किया जा सकता कि पंखा चला पाना भी हमारे वश में नहीं है।

आज नवरात्र के पहले दिन लगभग सभी महिलाओं का व्रत था। सब को व्रत में खाने के लिए पांच-पांच आलू मिले और आधा लीटर दूध बस दिन भर के लिए यही खाना था। जिन महिलाओं के पास टमाटर, मिर्च, रिफाइंड था उन्हों ने पांच-पांच के ग्रुप में आलू भून लिए और जिन के पास ये भी नहीं था , उन्हों ने उबले आलू खा कर बस दूध पी लिया। किस को रोये इंसान ? अपने को कि साझे में आलू भूनने पड़े और जितना मिला उतना ही खा कर संतोष करना पड़ा या उन को , जिन्हें आलू भूनने को भी नहीं मिले , उबले ही खा कर संतोष कराना पड़ा। ये भी ज़िंदगी का ही रूप है।


इतने दिनों से कहते-कहते आज मच्छर मारने की दवा का छिड़काव हुआ। कुछ तो राहत हुई मच्छरों से। सरकारी कामकाज कैसे होता है ? और उस से हम कैसे प्रभावित होते हैं ये अब समझ में आ रहा है। प्रशासन को क्या फर्क पड़ता है कितने मच्छर हैं या कितनी दिक्क़त है , मच्छरों से ? उन का तो सरकारी रवैया ही होता है किसी भी काम को निपटाने का।


आज मुझे ततैया ने काट लिया। पूरा हाथ हथेली से कोहनी तक सूज गया। बहुत दर्द है। टूटा वाला ही हाथ है। तो और भी दर्द हो रहा है। मुट्ठी नहीं बंध रही। अजीब सी झनझनाहट हो रही है। खैर ये सब तो लगा ही रहेगा। इन्हीं में जीना मरना है।


आज तारीख़पर जाने पर पता चला कि मुरादाबाद की चार्ज शीट में नागेंद्र पांडेय का नाम ही नहीं है। ये है भगवान का इंसाफ। सब कुछ कर धर कर भी आदमी साफ बच गया और हम जिसे ए बी सी डी भी नहीं मालूम अभियुक्त बन गए। समझ नहीं आ रहा कि इसे कैसे लें ? इस के पीछे भगवान की क्या मंशा है वही जाने। हमें तो याद नहीं पड़ता कि इतनी बड़ी ग़लती कोई हम से हुई है कि भगवान इतनी बड़ी सज़ादे रहा है कि चार-चार चार्ज शीट आ चुकी हैं और कितनी आनी हैं ये भी नहीं पता। और धीरे-धीरे हम ही अकेले आरोपी बनते जा रहे हैं और किसी ने कुछ नहीं किया , बस सारा गुनाह हम ही करते रहे हैं। सब के पाप कम होते जा रहे हैं। उन के दुखों का अंत होता जा रहा है एक हम ही हैं जिस के पाप कम ही नहीं हो रहे न ही दुखों का कोई अंत दिख रहा है। सारी सी.बी.आई. जांच हमारी ही होनी है , भगवान भी जाने क्या दिखाना चाह रहे हैं ? हमारे अंदर कितनी कमियां हैं जिन्हें सुधारने के लिए भगवान दंड दिए ही जा रहे हैं। क्या करूं मैं कि मेरे भी दुखों का अंत हो। हे भगवान इतनी शक्ति ही दो कि ये सब हम बर्दाश्त कर सकें। हमारा मानसिक संतुलन बना रहे। अब तो लग रहा है कि ये डासना जेल ही मेरी ज़िंदगी है। बाहर कुछ भी नहीं बचा है मेरे लिए। बस यहीं जीना है और यहीं मरना है।

आज तारीख़ पर ए.एन.एम. की भी तारीख़थी। 20 हैं सब तो 21 तो हम सी.बी.आई. वाले ही थे। तो एक ड्यूटी वाली दो-दो को ले कर हवालात से कचहरी तक आईं। हाथ पकड़ कर ही ले गईं किसी से बात भी नहीं करने दी। बीनू आया था बड़ी मुश्किल से दो मिनट बात हो पाई। वकील के पास भी नहीं खड़े होने दे रही थी। जल्दी-जल्दी में पंकज शर्मा ने इतना ही बताया कि नागेंद्र पांडेय का नाम नहीं है , और फिर तुरंत ही साइन करा कर वापस हवालात में ले आईं हाथ पकड़ कर के ही। मुश्किल से पंद्रह मिनट ही लगे इन सब काम में ही और हम हवालात में वापस आ गए। इतना बुरा लग रहा था हाथ पकड़ कर जाने आने में कि हम ही सब से बड़े अपराधी हैं। आतंकवादी हैं सारे लोग देख रहे हैं कि इतना बड़ा मुज़रिम पुलिस वालों ने पकड़ा है कि हाथ भी नहीं छोड़ रहे हैं कि कहीं भाग ही न जाए। और वापस हवालात में आ कर उस छोटे से आठ बाई आठ के कमरे में उनतीस महिलाओं के साथ बैठना। एक दूसरे की पीठ सटी हुई थी। इतना गर्म लग रहा था और पसीने और सांसों की बदबू झेलना मुहाल था। अकसर रेल में भी यही हाल होता है लेकिन रेल के चलने पर हवा अंदर आती है तो सब बदबू चली जाती है और सांस लेते बनता है। यहां तो पंखा भी नहीं है। जीते जी का नरक शायद यही सब होता है। और चार बजे तक वहीं बैठना पड़ा। जब सब की तारीख़ लग गई तब पांच बजे वापस जेल पहुंचे। लोग जेल से बाहर निकलने को परेशान हैं लेकिन इतनी सारी दुर्दशा के बीच हमें तो यही लग रहा था कि जल्दी से वापस जेल ले चलो तो सुकून मिले।


वापस आए तो रमेश से मुलाक़ात हुई। पूछ रहे थे कि मुरादाबाद की चार्जशीट का संज्ञान हुआ कि नहीं ? मेरे न कहने पर बोले कि जल्दी हो जाता तो ठीक था। नहीं तो आप बाहर निकलें और दस दिन बाद ही फिर आना पड़े। हम ने कहा नहीं अब जब तक मुरादाबाद की ज़मानतनहीं हो जाती , हम बाहर नहीं जाएंगे। सुलतानपुर की हो जाए तो भी दस दिन बाद दुबारा आना मुश्किल है। तो रमेश बोले हमें मौक़ा मिले तो हम दस दिन के लिए भी बाहर चले जाएंगे। दुबारा फिर आ जाएंगे। दस दिन तो बाहर की दुनिया देख लें। हमने कहा दुबारा आ कर फिर उतनी जिल्लत सहना , अपने को स्थापित करने के लिए संघर्ष करना , सारी व्यवस्थाएं फिर से बनाना आसान नहीं है। इतने के लिए अगर दस दिन ज़्यादा रहना पड़े तो हम तैयार हैं और हम ग्यारह महीने बाहर भी रह चुके हैं। कोई बहुत सुकून भी नहीं है बाहर। लेकिन उन्हें आए तो अट्ठाइस महीने हो गए हैं तो उन की छटपटाहट भी ज़्यादा है। और वो पुरुष है तो उन्हें ही बाहर का सारा मैनेज भी करना है। तो उन का तो बाहर निकलना बहुत ज़रुरी है। हम उन की बेचैनी समझ सकते हैं।


वहीं पर चांदनी की मम्मी भी आई हुई थीं। उन से भी मिले। बहुत ही अच्छी महिला लगीं मुझे तो। 72 साल की उम्र है लगभग लेकिन लगती नहीं बिलकुल। इतने अच्छे से अपने को संभाला है उन्हों ने। हफ़्तेमें एक बार मिलने भी ज़रुर आती हैं। राकेश के घर वाले मुकदमें की पैरवी करते हैं और जेल में इन लोगों की देखभाल और आर्थिक मदद वही करती है। इस उम्र में जब इंसान सारी जिम्मेदारियां निपटा कर सुकून चाहता है तो उन्हें ये सब झेलना पड़ रहा है। चांदनी और उन का गम साझा है। दोनों को ही बेटी की तरफ से दुख मिला। चांदनी की तो बच्ची नहीं रही। सब ख़त्म हो गया , पति पत्नी दोनों जेल आ गए और उन की बेटी को ये सारा दुख मिला। उन की बेटी सुखी नहीं है। उन का ये दुख है , बाक़ीसारे रिश्ते तो मतलब के होते हैं। एक भाई है वो स्पेन में नौकरी करता है। भाभी यहां रहती थी वो भी होली के बाद बच्ची ले कर स्पेन चली गई। बूढ़े मां बाप अकेले यहां हैं। उन्हें खुद देखभाल की ज़रुरत है और वो इन दोनों की देखभाल करते हैं। आखिरकार बूढ़े मां बाप हैं। क्या करें ? छोड़ भी तो नहीं सकते। पापा तो 80 के करीब हैं। कल को भगवान न करे उन्हें कुछ हो जाए तो इन लोगों का क्या होगा ? जाडे़ का कुछ सामान देते हुए चांदनी ने कहा कि इन्हें संभाल कर रख देना ताकि अगली बार ज़्यादा ढूंढ़ना न पड़े , तो वो गुस्सा होने लगी कि अगले साल भी यहीं रहोगी क्या ? और हम क्या जिंदा ही रहेंगे। तब तक तुम्हारे सामान को संभालने को। ये सब सुन कर चांदनी बहुत परेशान थी कि क्या होगा मेरा ? खैर जिस का कोई नहीं उस का तो भगवान होता है।


आज रात आंधी आई। सारी धूल मिट्टी बैरक में भर गई। और सारे मच्छर भी अंदर आ गए। उस के बाद रात भर बिजली नहीं आई। पूरी रात उसी धूल मिट्टी में मच्छरों के साथ बैठे रहे। एक हाथ का पंखा झलते हुए। एक मिनट भी आंख न लगी। पूरी रात आंखों में ही कट गई। अभी तो ये गर्मी की शुरुआत है। आगे-आगे देखिए होता है क्या?


जब 1995 में बैंडिट क्वीन देखने गए थे तो सिनेमा ख़त्म होने से पंद्रह मिनट पहले ही हॉल के बाहर निकल आए थे कि सिनेमा ख़त्म होने पर जब लाइट जले तो कोई हमें न देखे कि हम भी पिक्चर देख रहे थे क्यों कि उस में इतनी गाली थीं कि शर्म आ रही थी और अजीब लग रहा था। अब तो चौबीस घंटे उस से कहीं ज़्यादा भयंकर गालियां धारा प्रवाह कान में पड़ती रहती हैं और हम कहीं भाग भी नहीं सकते। उन्हीं गालियों के बीच आराम से बैठे रहते हैं। पता नहीं शायद बेशर्म हो गए हैं या और कोई उपाय भी नहीं है। लेकिन महिलाओं को इस तरह से देख कर लगता है कि कोई क्या ऐसे भी आराम से बोल सकता है। और इतनी इन की जानकारी है। हमें तो ढंग की दो गाली भी नहीं आती।


कल नवमी थी। सुबह से ही व्रत खोलने वालों की गहमागहमी थी। सारे बच्चों की तो पिकनिक हो रही थी। सीमित साधनों में जिस तरह से संभव था सब लोग कन्याओं को जिमा रहे थे। पुरुषों की तरफ से भी कन्याओं के लिए भोग आ रहा था। आलू की रसेदार सब्जी , पूड़ी और हलवा। फिर सारी महिलाओं के लिए भी आया। उस तरफ तीन लोगों ने व्रत रखा था , कुछ लोगों ने मिल कर चंदा कर के अलग-अलग भोग बनवाया था और इधर भिजवाया था। बनवाया तो अलग था लेकिन बना तो एक ही जगह था। कैंटीन में। तो स्वाद में कोई अंतर नहीं था। सारा हलवा सब्जी सब एक जैसे ही लग रहा था और इतना सारा खाना हो गया था कि दोनों टाइम भंडारा में खाना नहीं बना। उसी से सारा काम चल गया। तब भी औरतें , जब खाना आया तो ऐसी धक्का-मुक्की कर रही थीं कि अब नहीं मिला तो कभी पूड़ी सब्जी नहीं मिलेगी। पूड़ी सब्जी जैसी चीजें भी यहां नियामत हो जाती हैं। ज़रा सा भी लोगों में सब्र नहीं होता। हर दिन हर चीज़का संघर्ष ही बना रहता है।


आज वंदना की बेल हो गई। बाहर से ये ख़बर सुन कर वह रोती हुई अंदर आई और इतना रोई कि सब लोग घबरा गए कि क्या हुआ ? कहीं कोई बुरी ख़बर तो नहीं। जब उस ने बताया कि बेल हो गई। तो रोई क्यों। तो बोली कि इन की नहीं हुई। मैं ने पूछा बहस हुई थी क्या ? खारिज हो गई ? बोली पता नहीं। अब ऐसी बेवकूफी की बात पर रोना जब कुछ पता ही न हो। फिर पूछा रोई क्यों ? तो बोली ये यहां रहेंगे फट्टे पर सोएंगे , प्लास्टिक के गिलास में पानी पियेंगे तो हम बाहर भला सुकून से कैसे रहेंगे। अब इस बात पर कोई क्या समझाए बिलकुल भी प्रैक्टिकल नहीं है ये बच्चे ? कम से कम बच्चों के पास कोई एक तो रहेगा। बाक़ीसब तो मैनेज हो जाता है , लेकिन बच्चों के मन में मां बाप का जो खालीपन होता है वो मां बाप ही भर सकते हैं। हम तब ही न जेल काट पा रहे हैं कि बच्चों के पापा बाहर हैं तो बच्चों को कोई तकलीफ न होने देंगे। मां बाप जैसी बच्चों की देखभाल कोई और नहीं कर सकता। वैसे हम तो भाग्यशाली थे। एक साथ आए थे और एक साथ ही बाहर निकले थे। ये सब हमें नहीं सोचना पड़ा था। वैसे सब वंदना पर हंस ही रहे थे कि पागल है।


आज एक ए.एन.एम. को पता चला कि उन के पति का एक्सीडेंट हो गया है वो पंद्रह दिन से मिलने नहीं आए थे। कल उन की बहन आई थी। उन्हों ने बताया कि जीजा जी का एक्सीडेंट हो गया था। हाथ में चोट आई है तो वो परेशान थी कि हाथ में चोट है तो क्या हुआ आ तो सकते थे। घर पर ड्यूटी वाली से फ़ोन कराया तो बच्चों ने कहा पापा बाहर गए हैं , तब से बेचारी बहुत परेशान है कि सब झूठ बोल रहे हैं। कुछ छुपा रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में जेल काटनी बहुत मुश्किल हो जाती है कि आप को सच पता ही नहीं चल पाता। ऐसी बेबसी होती है कि पक्षी ही होते तो उड़ कर पहुंच जाते। अपनी आंखों से तो देख लेते कि सच क्या है ? लेकिन फिर जेल तो जेल ही है।


आज रात भर फिर आंधी पानी होता रहा। ओले भी गिरे। मौसम फिर से बदल गया और बारिश से जगह-जगह पानी जमा हो गया। और इतने मच्छर हो गए हैं जो किसी भी कछुआ छाप , फास्ट कार्ड या ओडोमास से नहीं जा सकते। एक बैरक में 16 जंगले हैं , हर चार फुट पर एक जंगला है। और जंगला भी चार फुट का है जिन में सिर्फ़ सलाखें लगी हैं। वेंटीलेशन के हिसाब से तो बहुत अच्छा है। साठ-साठ महिलाएं भी हो जाती हैं तो उमस नहीं होती , घबराहट नहीं होती। लेकिन धूल , मिट्टी और मच्छर , हवा , ठंड , गर्म दोनों तरह की थोक भाव से आती है। इन से नहीं बचा जा सकता।


आज सुरेखा की मुलाक़ात आई थी। बेचारी मुलाक़ात से रोती हुई आई। पूछने पर पता चला कि छोटी बेटी मुलाक़ात को आई थी। बच्ची की उम्र मुश्किल से दस साल की है। उस के पति की मृत्यु हो गई है। तीन बेटियां ही हैं बड़ी की उम्र चौदह साल है। तीनों बेटियों को वह अपनी सास के पास छोड़ कर जेल आई थी। उस की सास बच्चों को छोड़ कर अपनी बेटी के पास चली गई है। तीनों बेटियां अकेले मकान मालिक के भरोसे हैं। भगवान भी क्या-क्या मुसीबतें डालता है। ये बेचारी बच्ची को सौ रुपया दे रही थी तो उस ने कहा मैं इस पैसे से ख़ुश नहीं होऊंगी। मुझे आप चाहिए। आप अगर दो दिन में बाहर नहीं आईं तो मैं खाना पीना सब छोड़ दूंगी। अब उस बच्ची को कौन समझाए कि बाहर आना अपने हाथ में नहीं है सुरेखा कह रही थी, बच्चों की वजह से इंसान कमजोर हो जाता है। अपने लिए चाहे कितनी ताक़त इकट्ठा कर लो क्यों कि जेल काटना भी आसान नहीं है। लेकिन जैसे ही बच्चे सामने आते हैं इंसान कमजोर पड़ जाता है। सारी बहादुरी धरी रह जाती है।



आज जेल में एक बाबा जी आए थे प्रवचन देने। पुरुषों की तरफ सर्किल में उन्होंने प्रवचन दिया और इधर महिला बैरक में टी.वी. पर उस का सीधे प्रसारण दिखाया गया। हम लोगों ने टी.वी. पर ही देखा। पूरी जेल को दो लड्डू दो मठरी का प्रसाद भी मिला। बाबा जी ने सभी को आशीर्वाद दिया। उन की कही एक बात मुझे बहुत समझ में आई कि , यदि आप ग़लती कर के अंदर आए हैं तो समझिए भगवान ने आप को यहीं प्रायश्चित का मौक़ा दिया है। और अगर बिना ग़लती के आप यहां आ गए हैं तो समझिए भगवान ने आप को विशेष समझा है और कठिन साधना के लिए चुना है। तो अपने आप को तपाते हुए धैर्यपूर्वक अपनी बुराइयों को छोड़ते हुए अपना समय यहां काटिए। भगवान आप को इस का फल ज़रुर देगा। जो बात समझ आ जाए उसी को मानते हुए जेल काटी जा सकती है और कोई तरीका नहीं है।


आज फरजाना से बात हुई तो पता चला कि वो देवर के लड़के के केस में है। वो स्वयं सहायता समूह का काम करती है तो बैंक गई हुई थी। उस का पति गाड़ी चलाता है तो गाड़ी पर था। संयुक्त परिवार के कारण सब साथ ही रहते थे। देवर का लड़का ननिहाल गया हुआ था। वो ननिहाल से कब आया और गायब भी हो गया उसे कुछ मालूम भी नहीं। उस के ननदोई ने बताया कि नहर के पास लड़का था। वहीं इन लोगों ने डुबो दिया है। पुलिस ने नहर के पास बच्चे की चप्पल बरामद की। और ननदोई के कहने पर उन दोनों का भी नाम लिखा दिया और दोनों बेचारे जेल आ गए। तीन बच्चे हैं इन के। तीनों बच्चे मामा के पास हैं और घर में ताला बंद है। तीन महीने हो चुके हैं, इन लोगों को जेल आए हुए। पति-पत्नी दोनों यहीं हैं। कोई भाग-दौड़ करने वाला भी नहीं है। ये दोनों ही मौक़ा-ए वारदात पर नहीं थे पर ये साबित करने वाला कोई नहीं है। यही है अंधा क़ानून।


अब आजकल बैरक में पंखे के पीछे झंझट होता है। कुछ लोगों को ठंड लगती है कुछ को गर्मी। कुछ को मच्छर काटते हैं तो हर समय पंखा बंद होता और चलता रहता है और इसी पर बहस होती रहती है और जो जबर होता है वो ही जीतता है। आज संध्या तोमर ख़ूब चिल्ला रही थी। ताना कस रही थी तो चांदनी ने कहा इन की बेल भगवान जल्दी करा दे , और इन्हें बाहर करो। जब हमारी बेल नहीं करा रहे हो तो कम से कम हमारा यहां समय काटना ही आसान करो। प्रभु इतनी कृपा तो करो।


आज मीना नाम की एक किन्नर आई। इन का पूरा गिरोह पकड़ा गया है। ये लोग रेल में पैसा मांगते थे। न मिलने पर मारपीट चाकूबाजी भी करते थे। शाम को सात बजे थाने से पांचों जेल पहुंचे। चार आदमियों जैसे थे एक मीना ही औरत जैसी थी। जेल में डाक्टर ने दसियों स्टाफ के सामने इनके कपड़े उतरवा के चेक किया कि आदमी हैं या औरत ? कितने निर्दयी होते हैं ये लोग ? किसी की भी भावनाओं से कोई मतलब नहीं। बाहर कोई चाहे जो कर ले लेकिन अंदर आ कर सारी गुंडई धरी रह जाती है। इतनी दबी सहमी सी है मीना कि क्या कहा जाए। पुलिस वालों ने मारा भी बहुत है बेचारी को। सारे नील दिखा रही है।


कल मीना को कोई भी अपने फट्टे पर सुलाने को तैयार नहीं था कि किन्नर है , दारू पी रखी है वगैरह-वगैरह। आज जब उस की बहुत अच्छी मुलाक़ात आई मतलब ढेर सारा सामान आया तो सारी औरतें उस के आगे पीछे घूम रही हैं कि हमारे साथ रहो। कुछ दिन तो हमारा खर्चा इस के साथ निकले और अच्छा-अच्छा खा सकें। जेल में ज़्यादा समय से रहने वालों की यही हालत हो जाती है। हर चीज़ के लिए तरस ही जाते हैं। और कोई एक ठीक-ठाक इंसान अंदर आता है तो सब गुड़ में चींटे की तरह उस से चिपक जाते हैं।


आज कृष्णा और अंकित दोनों हास्टल चले गए। दोनों बच्चे बहुत ख़ुश थे। एक नई दुनिया बाहर उन के लिए थी। ये किरन बेदी की बहुत अच्छी पहल है। सिर्फ़ स्कूल की प्रिंसिपल ही जानती हैं कि ये बच्चे कहां से आए हैं और कोई नहीं। यहां तक कि क्लास की टीचर भी नहीं जानती कि कहीं पता होने पर वो कोई भेदभाव न करने लगें और बच्चों का व्यक्तित्व दब जाए। इस तरह से इन बच्चों का विकास भी सामान्य बच्चों की तरह होगा। कृष्णा की मां चांदनी का सारा काम करती है और अंकित की मां हमारा। तो ये दोनों तो आज दिन भर रोती रहीं। बहुत समझाना पड़ा कि तुम चाह कर भी इतना अच्छा भविष्य अपने बच्चों को नहीं दे सकती थी। हम लोगों ने तो अपने बच्चे घरों से सारी सुख सुविधाओं के बीच से निकाल कर हास्टल भेजे थे। तुम लोगों के बच्चे यहां से तो बहुत अच्छे ही माहौल में जा रहे हैं। इसी बात से ख़ुश हो जाओ। तुम लोग यहां परेशान होंगे तो बच्चे भी वहां परेशान होंगे। तो जा के कुछ तसल्ली मिली उन लोगों को।


कुछ दिनों पहले महज़बीन आई थी। बच्चों के लड़ाई झगड़े में। बच्चों ने बहुत मारा था। पति पत्नी दोनों ही अंदर आए हैं। इतनी निरीह दीन नजर आ रही थी कि क्या बताएं ? दया ही आ रही थी उस पर। लेकिन तीन दिन बाद देखा तो इस जेल में पूरी तरह रच बस गई है। सारे नाटक उसे आ गए हैं। ड्यूटी वाली को भी नचा देती है। आज रोटी की लाइन में लगी थी। उसे नीचे वाली रोटी मिली जो भाप से थोड़ी नरम हो गई थी। उसने वापस टब में रोटी फेंक दी। ड्यूटी वाली ने एक झापड़ मारा तो वहीं जमीन में लोट-लोट कर रोने लगी। तभी हल्ला हुआ कि डी.आई.जी. आ रहे हैं । ड्यूटी वाली घबरा गई। कि कहीं बात बिगड़ न जाए। तीन चार बंदियों से पकड़वा कर उसे ऊपर उस  की बैरक में भेजा गया। तब जा कर शांति हुई। अब ड्यूटी वाली खुद ही उस से डरती है। शनिवार की मुलाक़ात पर गई थी तो डिप्टी जेलर को कह आई कि ड्यूटी वाली मारती हैं। उन्होंने ड्यूटी वालियों को बुला कर डांटा। अब सब उस से खार खाई हुई हैं। लेकिन उस का कुछ बिगाड़ नहीं पा रहीं। और वो चौड़े से डॉन बनी हुई है। लेकिन ये जेल है। जल्दी ही जैसे ही मौक़ामिलेगा सारी ड्यूटी वाली एक हो कर इसे सही कर देंगी। बस मौके का इंतजार है।



आज मेरी शादी की सालगिरह है। शादी को 26 साल हो गए। क्या 26 साल पहले शादी करते समय से सोचा था कि कोई सालगिरह जेल में भी पड़ेगी ? इस बार तो लग रहा है सब कुछ यहीं जेल में पड़ेगा। लेकिन ये भी जेल का रुख है कि सुबह जगने पर गिनती करने आई ड्यूटी वाली ने ही सब से पहले बधाई दी। फिर औरों ने भी दी। ड्यूटी वाली से कुर्ती का कपड़ा मंगवा कर मोहिनी ने खुद सिल कर मुझे दिया कि ये पहनना है। ड्यूटी वाली नीता ने एक डिपो और चाकलेट दी। जब नहा धो कर नया सूट पहन कर आए तो जरीन ने बैठा कर पूरा मेकअप किया। हम हंस भी रहे थे कि रामलीला की सीता की तरह न बना देना कि सब देख कर हंसें। लेकिन उस ने अच्छे से तैयार किया। ये सारी हरकतें ये लोग इसी लिए कर रहे थे कि आंटी उदास न हों। मंगलवार को नाश्ते में उबले चने मिलते हैं। मरीना ने सब के चने इकट्ठे कर के अच्छी चटपटी सी भेलपुरी बनाई नमकीन , टमाटर , प्याज आदि डाल कर कि ये मेरा गिफ़्ट है। एक ने तो बाक़ायदा गुलाबों को इकट्ठा कर के बुके बनाया , बहुत ही प्यारा सा। मतलब सब ने ही कुछ न कुछ किया मेरे लिए। बच्चों ने भी एक कुर्ती पापा से भिजवा दी थी डेट पर। सब इतना ख्याल रख रहे थे फिर भी घर का ध्यान एक बार भी नहीं हटा। भगवान अभी और क्या-क्या दिखाओगे?


आज वंदना घर चली गई। हम से दस दिन बाद आई थी। हमारे ही केस में थी। एन.आर.एच.एम. में। और वो भी प्रोप्राइटर। और वो आज चली गई हम यहीं पड़े हैं। सब पैसे की माया है। हमारे पास भी इतना पैसा होता तो हम भी अब तक निकल गए होते। यहां न सड़ रहे होते। क़ानून भी पैसे पर ही चलता है। विधायक की बीवी थी। हमारे जैसी आम इंसान तो थी नहीं। तीन केस थे उस पर। हमारे पर एक ही है। और हम पहले से भी बेल आउट थे। वकील ने कहा था हद से हद फरवरी में आप बाहर होंगी। अभी तक यहीं हैं और निकट भविष्य में जुलाई अगस्त से पहले निकलना संभव भी नहीं दिख रहा। हे प्रभु संकट हरो हमारा भी। या अब धैर्य छोड़ दें ? कब सुनोगे हमारी ? और वंदना तो इतना रोते हुए गई कि कोई ग़लती हो तो माफ कर दीजिए। ये सब देख सुन कर और मन ख़राब हो गया। खैर उस की दो साल की बच्ची है जिसे मां की बहुत ज़रुरत है। वैसे हर उम्र के बच्चों को मां की ज़रुरत होती है। बच्चे को भले ही न हो , मां को तो हर समय बच्चे की ज़रुरत होती है। लगता है कि जब चाहे तब अपने बच्चे को देख लें। उस की आवाज़ सुन ले। क्या ये भी बहुत बड़ी इच्छा थी हमारी जो भगवान ने छीन लिया कि लो अब तरसो अपने बच्चों की आवाज़ तक सुनने को।


कल एक महिला आई थी जो अपने को डाक्टर बताती थी , मुस्लिम थी और चौधरी से शादी की थी। फ्लैट की चार सौ बीसी में आई थी। उस को देख कर लगता था कि पहले भी जेल आ चुकी है। इतनी लंबी-लंबी हांक रही थी कि हमें चवन्नी कम ही लग रही थी। चांदनी और मायावती से कह रही थी अपने पैरोकारों का नंबर दे दो हम तुम्हारी पैरवी करेंगे। हम लोग तो हंस ही रहे थे लेकिन सच में वो चौबीस घंटे से पहले ही चली गई। बैरक बंद हो गया था। चीफ ने कहा भी कि अगर परवाना आया भी तो आप सुबह ही जा पाएंगी। लेकिन आजम खां का फ़ोन अधीक्षक के पास आया। वो कहीं बाहर थे उन्हों ने जेलर को फ़ोन किया। जेलर खुद बैरक खुला कर उन्हें अपने साथ बाहर ले कर गए। तब हम लोग समझे कि अरे ये तो जो कुछ कह रही थी सब सच ही था।


आज शुक्रवार है। एन.आर.एच.एम. की सुनवाई का दिन। और हमारा तो 99 नवंबर पर लगा है कोई उम्मीद नहीं सुनवाई की। और मित्रा दी और अंजना का नंबर तो हम से भी पीछे है। तो ये शुक्रवार भी गया। कल मेरा मन अजीब सा हो रहा था। चांदनी से रमेश को कहलवाया कि हमें बुला लें। तो उन्होंने बुलवाया था। लगभग डेढ़ घंटे बैठ कर आए। कुछ मन तो बदल ही गया। वाई सिंह भी आए हुए थे। उन से भी बात हुई। यूनिवर्सिटी में हमारे क्लासमेट थे। बेचारे समझाते ही रहे कि परेशान मत होइए। समय है कट ही जाएगा। थोड़ा हंसी मजाक भी हुआ। मन बहल गया और समय भी कट गया। लौट कर आए तो फ्रेश-फ्रेश थे। नींद भी आ गई ठीक सी। अब क्या करें किसी न किसी तरह समय तो काटना ही है।


आज तरन्नुम भी चली गई। तरन्नुम यहां पर लगभग डेढ़ साल से थी। घर में किसी का मर्डर हो गया था। उसी में पूरा परिवार आया था। उस की बहन और मां भी आई थी। बहन तो चली गई थी। मां अभी भी है। पिछली बार जब हमारा परवाना आया था तो तरन्नुम ने ही आ कर बताया था कि आंटी आप का परवाना आया है और आज मैं ने ही उस से कहा कि तरन्नुम तेरा परवाना आया है। इतनी ख़ुश थी कि क्या कहें। दोपहर में बैठी रो ही थी कि आंटी मेरे घर वाले तो मुझे भूल ही गए हैं। उस का मन बहलाने के लिए फिर हम लोग काफी देर तक ताश खेलते रहे। कल जब एक महिला वापस जा रही थी तो तरन्नुम बड़ी हसरत से उसे देख रही थी। उसे क्या पता था कि अगले चौबीस घंटे में वो भी चली जाएगी। सच है जाने का समय भी सब का निश्चित है, बस हमें पता नहीं होता। अगर यही पता हो तो जेल काटनी इतनी मुश्किल न हो।


आज वंदना आई थी, अपने पति से मिलने। चांदनी बता रही थी कि ख़ूब आंखें सूजी हुई थी उस की। जैसे रात भर रोती ही रही हो। सच भी है जब आप यहीं से निकलें हों तो पति का यहां रहना एक टार्चर के अलावा और कुछ नहीं है। लेकिन उस ने किसी को मने अंजना को मिलने भी नहीं बुलाया जब कि यहां तो अंदर उस के बिना सांस भी नहीं ली जाती थी। यही दुनिया है बाहर निकल कर सब भूल जाते हैं।


आज रानी भी हास्टल चली गई। बहुत ख़ुश थी। बार-बार कह रही थी मेरा परवाना आ गया है मैं जा रही हूं। मम्मी का बाद में आएगा तो मम्मी भी आ जाएगी। उस बेचारी की तो दुनिया ही मम्मी , पापा , जेल और कचहरी थी। उस के अलावा उस ने कुछ देखा ही नहीं। वो जानती ही नहीं। जेल के हिसाब से उस की दिनचर्या थी। सुबह 6 बजे बैरक का खुलना खटका लगने पर लाइन में लग कर खाना लेना शाम को सात बजे बैरक में बंद हो जाना। यही वो जानती थी। इस लिए हास्टल का अनुशासन उसे बुरा नहीं लगेगा और उस के अलावा और भी दुनिया देखने को मिलेगी। लेकिन वनिता को बहुत बुरा लग रहा है। रानी जब से पैदा हुई थी वनिता से एक मिनट भी अलग नहीं हुई थी। छह महीने की रानी ले कर वह जेल में आई थी और मार्च में रानी पांच साल की हो गई। जेल में हर समय रानी साथ थी और वनिता का सहारा भी थी। तो वनिता को बहुत बुरा लग रहा है। लेकिन बच्चे के भविष्य के लिए तो कुछ भी किया जा सकता है। जेल में क्या भविष्य होता उस बच्ची का। अब कम से कम पढ़ लिख तो लेगी।


आज वनिता ने शनिवार की मुलाक़ात ही नहीं लगाई थी अपने पति की। वो तो हम सब ने ज़बरदस्ती भेजा। ड्यूटी वाली उधर से सुमित को ले आई तब मुलाक़ात हुई। वनिता ने कहा कि हम रोते ही रहते इस लिए नहीं जाना चाह रहे थे। तो हमने कहा सुमित की सोचो उस की बेटी चली गई और पत्नी भी मिलने नहीं आ रही। अरे दोनों लोग साथ बैठ कर रो लेते। पति पत्नी को तो दुख सुख सब आपस में ही बांटने होते हैं। अगर आप का संबंध अच्छा हो तो पति पत्नी को किसी तीसरे की ज़रुरत ही नहीं होती। आपस में ही अच्छे दोस्तों की तरह सब बांट लेते हैं।


आज संध्या तोमर और संध्या सिंह की बेल हो गई। कुल तीन केस सुने शाही जी ने। हमारा तो नंबर ही 99 पर था। आना ही नहीं था। ये लोग दो महीने में निकल जाएंगे। पूजा भी चार महीने से पहले ही निकल गई। ए.एन.एम. भी लगभग सब चली गईं। चार या पांच ही बची हैं। एन.आर.एच.एम. में अब हम , मित्रा दी और अंजना ही बचेंगे। सौ से ऊपर तो नंबर आता है हम लोगों का लिस्ट में। पता नहीं कब नौबत आएगी कि हमारा भी केस सुना जाए और हम भी यहां से निकलें। अब तो मन बड़ा परेशान रहने लगा है। बात बेबात रोना आता रहता है।

मीना किन्नर जो आई है धीरे-धीरे उस ने भी रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। सीमा वैसे भी पूरा सिखा पढ़ा कर गई है। लूटपाट में आए हैं ये लोग। अब तो इस की मुसीबतें और बढ़ रही हैं। दरोगा आया था बयान लेने। अब उस इलाके में जितनी भी लूटपाट की वारदातें हुई हैं सब इन्हीं लोगों पर खोली जा रही हैं। अब तक तैंतीस केस लगा चुके हैं ये लोग। इतनी ज़मानत कैसे होगी ? लंबा रहना पड़ेगा अब तो इसे। इसी लिए बेचारी यहां के रंग में रंग रही है।


आज सुषमा आई है अपनी साल भर के बच्चे के साथ। पति हत्या में है। बहुत ही सुंदर है। आंखें बहुत प्यारी-प्यारी हैं। उस का पति इंजीनियर था। तीन महीने से पति घर नहीं आया था। ठेकेदार कहता था कि साहब साइट पर हैं। छुट्टी नहीं मिल रही है , काम बहुत ज़्यादा है। तीन महीने बाद पता चल रहा है कि वो तो तीन महीने पहले ही मर चुका है। ये और ठेकेदार दोनों उस की हत्या में अंदर आ गए। इस कहानी पर कौन भरोसा करेगा कि जिस का पति तीन महीने से घर न आया हो वो खाली ठेकेदार के कहे पर निश्चिंत हो कर घर में बैठी रहे। खुद पति की खोज ख़बर भी न ले। तो दोनों को अंदर आना ही है। ठेकेदार से इन का अफेयर चल रहा था और इसी चक्कर में पति को मरवा दिया। कैसे लोग होते हैं। वैसे इस जेल में पति हत्या वाली औरतें बहुत ज़्यादा हैं।


कल सकीना को लड़का हुआ। आज वो अस्पताल से भी आ गई। बिलकुल नार्मल डिलीवरी हुई। सकीना बलात्कार के केस में आई है। उस की ननद ने आरोप लगाया था कि अपने ब्वाय फ्रेंड से मिल कर भाभी ने मेरा रेप कराने की कोशिश की। इस चक्कर में सकीना और उस का दोस्त दोनों ही अंदर आ गए। लगता था कि शायद पहले ज़मानतहो जाएगी। लेकिन नहीं बच्चा यहीं हो गया उस का। कोई नहीं बैरक को एक रौनक मिली।
मोहिनी की ज़मानत हाईकोर्ट से खारिज हो गई। हम सब बिलकुल भौचक थे कि दो साल बाद तो नंबर आया और वो भी खारिज हो गई। अब क्या होगा ? अगर अंदर से ही ट्रायल फेस करना पड़ा तो सज़ा होना तय है। क्यों कि पैरोकारी अच्छे से नहीं हो पा रही है। राजस्थान से आ-आ कर तो मुश्किल है पैरोकारी करना। लेकिन मोहिनी ने बहुत हिम्मत से इस पूरे हालात का सामना किया। बिल्कुल भी रोई नहीं , परेशान नहीं हुई। अब क्या करना है यही चर्चा करती रही। वाकई बहुत हिम्मती बच्ची है।


आज जेलर ने सकीना के लिए जेल की तरफ से सारे मेवे भेजे जिस के लड्डू बनाए गए कि उस को कुछ तो ताक़त मिले और जो भी वो खाना चाहे उपलब्ध संसाधनों में जो भी भंडारे में है , उसे बना कर दिया जाए। और बच्चे के लिए कुछ कपड़े भी भिजवाए नीता ने। छोटी मच्छरदानी मंगवा कर दी। चांदनी ने भी बच्चे का टावल सेट आदि मंगा कर दिया। हमने एक बंदी को उस की और बच्चे की मालिश करने को लगाया। सब ने अपनी तरफ से कुछ न कुछ कर के मां बच्चे का ध्यान रखा।


बैंक के लोन वाले सी.बी.आई. केस में आज एक महिला आई जो चल भी नहीं पा रही उसे गोद में ले कर आया गया। ये तो हमारा क़ानून है। सी.बी.आई. का केस है छह महीने से तो पहले ज़मानत भी नहीं होनी है। पता नहीं उन की जेल कैसे कटेगी ? इसी केस में एक छह महीने की गर्भवती महिला भी आई है। उस की तो डिलीवरी भी यहीं हो जाएगी। उस बच्चे की क़िस्मत में जेल में पैदा होना लिखा है सकीना के बच्चे की तरह। वैसे जेल के नियम में गर्भवती , बच्चे वाली और बीमार महिला को आधा लीटर दूध , दो अंडे और एक फल देने का नियम है। ये न्यूनतम पौष्टिक आहार है जो ऐसी महिलाओं को मिलना ही चाहिए। बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें बाहर ये सब भी नसीब नहीं होता। ऐसे ही जो शरणार्थी बंगलादेशी होते हैं वैसी दो महिलाएं चोरी के इल्जाम में आई हैं। अंजना और फातिमा। फातिमा आज कह रही थी कि पक्का फर्श , सर पर छत दोनों समय पौष्टिक भर पेट भोजन बस इस से ज़्यादा क्या चाहिए। जेल तो स्वर्ग है , हम लोगों के लिए। बात भी सही है , जेल तो हम जैसों के लिए है जो घर परिवार सारी सुख सुविधाएं छोड़ कर यहां पड़े हैं। इन का क्या, इन का तो पूरा परिवार ही एक साथ उठ कर यहां आ जाता है और साथ ही जाता है और झोपड़ पट्टी से ज़्यादा सुख सुविधाएं मिलती हैं।


आज कल हम लोगों ने पूजा-पाठ को अपनी दिनचर्या में और बढ़ा लिया है। रोज की पूजा-पाठ के अलावा हर मंगलवार से शनिवार तक पच्चीस बार हनुमान चालीसा दोपहर में पढ़ते हैं और दुर्गा सप्तसती का पाठ चालीस दिन तक ठाना है जो शाम को सात बजे से शुरू होता है एक दिन छह अध्याय और दूसरे दिन सात से तेरह अध्याय तक पूरा पाठ और फिर तीसरे दिन से पुनः शुरू। ये इक्कीस मई को समाप्त होगा।


करुणेश ने ऊपर वाली बैरक में अखंड रामायण का पाठ कराया और पूरी महिला बैरक को न्यौता दिया सिर्फ़ हम तीन लोगों को छोड़ कर मोहिनी, चांदनी और मुझे। और फिर पूरी महिला जेल में प्रसाद भी बांटा सिर्फ़ हम तीन को छोड़ कर। इतनी छोटी सोच हो गई है सब की। यहां आ कर इतनी पूजा पाठ कर के भी इंसान अपनी सोच न बदल पाया तो सब किया धरा बेकार है। खैर हम लोगों ने तो औरों से मांग कर प्रसाद खा लिया। प्रसाद के लिए क्या संकोच।


इतनी गर्मी पड़ने लगी है आजकल कि क्या बताया जाए ? पसीना ही नहीं सूखता दिन रात और मच्छर का तो ये हाल है कि मुंह खोलते भी डर लगता है कि कहीं मुंह में ही न घुस जाए। किसी भी तरह चैन नहीं है। अभी तक इंसान जाड़े से लड़ने के लिए ताक़त इकट्ठा कर रहा था और अब गर्मी से लड़ने की ताक़त इकट्ठा करो। बस जूझते ही रहो हमेशा। इसी संघर्ष में एक-एक करके दिन बीत ही रहे हैं।


आज वनिता के केस का फ़ैसला हो गया। पति पत्नी दोनों को आजीवन कारावास हो गया। क्या उम्र है दोनों की ? दो छोटी-छोटी बच्चियां हैं उन की। रानी तो अभी मार्च में यहीं से हास्टल गई। अच्छा ही हुआ जो रानी चली गई। कम से कम एक बच्चे की चिंता तो कम हुई। अब अपना ही संघर्ष करना है इन दोनों को। लेकिन भगवान का भी क्या न्याय है ? पांच साल से बेचारे दोनों वैसे ही जेल में हैं और अब आगे भी अंधेरा ही अंधेरा है। घर वाले जब पहले बेल न करा पाए तो अब क्या करेंगे ? वैसे भी हैदराबाद से आ कर केस की पैरवी करना आसान भी नहीं है। ऐसे हालात में अपने को सामान्य रख पाना आसान नहीं होता। लेकिन फिर भी बहुत हिम्मत कर रही है। वो तो अच्छा है कि भंडारे का चार्ज उस के पास है तो काम में व्यस्त होने पर मन बहल जाता है हर समय वही नहीं सोच पाता इंसान कुछ तो मन बदल ही जाता है।


आज जेठ का पहला मंगल है। लखनऊ में आज से बड़े मंगल शुरू हो गए। सबेरे से लखनऊ का ही ध्यान आ रहा है कि कैसे सारी सड़कों पर भीड़ होगी सब लोग मंदिर जा रहे होंगे। मंदिरों में ख़ूब लंबी-लंबी लाइनें लगी होंगी। दिन भर कानों में हनुमान चालीसा सुंदर कांड की आवाजें आएंगी। यहां तो मंदिर के घंटे की आवाज़ को भी इंसान तरस जा रहा है। सही बात है आप के अवचेतन मन में कितनी चीजें होती हैं आप को पता ही नहीं होता। हम तो अपने होश संभालने के बाद शायद पहला जेठ होगा जब हम लखनऊ में नहीं होंगे। पूरे दिन की गहमागहमी दिमाग में चल रही है कि क्या-क्या होता है आज। इंसान भूलता कुछ भी नहीं है। किसी न किसी रूप में दिमाग में रहता है। सच है आज हम लखनऊ को बहुत याद कर रहे हैं । आज समझ में आ रहा है कि जब लखनऊ आने पर मुदित भइया चारबाग़ की फ़ोटो अपलोड करते हैं तो और बच्चे गुस्सा क्यों होते हैं ? वाकई लोग अपने शहर को भी मिस करते हैं।


संध्या तोमर और संध्या सिंह भी चली गईं। सही बात है जब आप के केस के लोग आप के साथी , आप के पीछे आ कर आप से पहले आप के सामने चले जाएं तो बुरा तो लगता है कि आज हमारे पास भी पैसा होता तो पैसा जमा करके हम भी निकल जाते। कि केस चलता रहता। ये पैसा आखिर जमा ही तो है। हमारा ही रहेगा। लेकिन जमा करने के लिए पैसा होना भी तो चाहिए।


चार्जशीट के दौरान कोई एक धारा बढ़ाने पर जज साहब लोगों को अंदर कर देते थे कि ज़मानतपर होते हुए भी चलिए फिर से एक धारा में ज़मानतकराइए और वो ज़मानतभी सेशन नहीं देगा। हाई कोर्ट से ही मिलेगी। मगर उस में दो तीन महीने लगने ही हैं लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट से आदेश आया है कि चार्जशीट के दौरान धारा बढ़ाने पर दुबारा ज़मानत कराने की ज़रुरत नहीं है। चलिए बहुतों को राहत मिली। वैसे अब तो सेशन से ही ज़मानत हो जानी चाहिए। बहुत हो चुका आख़िरकार साढ़े तीन-तीन साल से लोग अंदर हैं।


सारी ए.एन.एम. चली गईं। अब एन.आर.एच.एम. वाले सिर्फ़ हम तीन रह गए। अंजना , मित्रा दी और मैं। पता नहीं अपना नंबर कब आएगा ? एक नंबर पर केस लगवाने के बाद भी नंबर नहीं आ पाया तो इस से ज़्यादा बुरी क़िस्मत मेरी और क्या होगी ? अब तो कभी-कभी लगता है ज़िंदगी यहीं न बीत जाए।


आजकल फिर से बहुत गर्मी पड़ने लगी है। जेलर साहब से कूलर की बात की तो कह रहे हैं अब आप लोग जाइए यहां से। अब कौन समझाए अपने हाथ में है क्या ? अगर होता तो कोई अंदर ही नहीं आता। हम लोग सोच रहे हैं कि जैसे मिल कर सब ने गीजर लगवाया जाड़े में , उसी तरह मिल कर कूलर भी मंगवा लें और अपने कोने पर लगवा लें। कम से कम कुछ तो राहत मिलेगी जब तक लाइट रहेगी। गर्मी में तो लाइट की भी दुर्दशा है।


आज विधायक जी ने सुबह ही सुबह सुंदर कांड का पाठ करा कर बिरयानी का प्रसाद बांटा। बच्चा बैरक, बूढ़ा बैरक और महिला बैरक में भी। दो बाल्टी बिरयानी आई थी कि उपमा से कहिए कि अपने हिसाब से बंटवा दें। हमने भी अपने बैरक में बंटवाई अच्छे से और भंडारे वालों और ड्यूटी वालों को भी ख़ूब मन से बांटी की खाओ सब लोग ख़ूब छक कर खाओ।


सकीना के लड़के को फिट पड़ने लगे। यहां जब डाक्टर कुछ समझ ही नहीं पाए तो सरकारी अस्पताल भेजा। उन लोगों ने भी नहीं लिया और मेरठ मेडिकल कालेज भेज दिया। उन्हों ने भी नहीं लिया और दिल्ली भेज दिया। एम्स में बेड खाली नहीं था तो उसे कलावती अस्पताल भेज दिया। वहां उसे वेंटीलेटर पर रखा गया है। बच्चे की हालत गंभीर है। बेचारा बच्चा पता नहीं कैसी क़िस्मत ले कर पैदा हुआ है ? घर वाले पूछ ही नहीं रहे। जेल में अलग से हैं और अब भगवान ये सब बीमारियां भी दिए दे रहे हैं। पता नहीं क्या होगा उस का ?


किरन बेदी की संस्था जो यहां काम कर रही है उस के एक कार्यक्रम में आज किरन बेदी यहां आई थीं। पहली बार किरन बेदी को इतने पास से देखा और उन से मिली। बहुत अच्छा लगा। अद्भुत महिला हैं बहुत ही शार्प एण्ड पॉजिटिव। उन्हों ने एक बात कही समय बीतता है और खर्च हम होते हैं। अतः हर क्षण का उपयोग करें। बात सही है धीमे-धीमे समय तो बीत ही रहा है अच्छा या बुरा। लेकिन अगर इसी में जूझे रहे तो पता चला हम तो वो नहीं रहे जो पहले थे। समय के चक्कर में जूझ कर हमने अपने को भी गंवा दिया। समय तो फिर भी ठीक हो जाएगा लेकिन हम अपने को कहां से वापस लाएंगे। हम तो खर्च हो ही गए। और बोलीं यहां कोई हमेशा नहीं रहता। मैं ने अपनी पूरी नौकरी में एक भी कैदी ऐसा नहीं देखा जो जेल में ही रह गया हो। आए हैं तो जाना भी है। तो उस में परेशान होने के बजाए अपना दिमाग सकारात्मक जगह लगाएं। ऊर्जा मिलेगी। काफी पॉजिटिव बातचीत थी उन की।


आज हमारा पांच दिन का आर्ट ऑफ लिविंग का कोर्स ख़त्म हुआ। ये पांच दिन पता ही नहीं चले। बहुत ही अच्छा लगा। सुबह ही नहा धो कर तैयार हो जाना। आठ साढ़े आठ तक वो लोग आ जाते थे और फिर ग्यारह बजे तक सिखाते थे। सुदर्शन क्रिया करने से मन बहुत हल्का-हल्का और शांत रहता था। पूरे मन से पांच दिन तक सीखा। बाहर तो कभी समय ही नहीं मिला कि फीस दे कर भी इन का कोर्स कर पाते। भगवान ने यहां मौक़ादे दिया कि लो अब आराम से करो ? चलो जी जैसी उस की मर्जी। अब रोज चालीस दिन तक लगातार सुदर्शन क्रिया करने का वायदा किया गया है। देखें कल से क्या होता है ? अभी तक तो इंसान उर्जा से भरा हुआ है कि हां अब करना ही है। लेकिन कब तक ये ऊर्जा बनी रहती है पता नहीं।


आज पति आए थे अचानक बिना किसी प्रोग्राम के। पता चला सी.बी.आई. ने बुलाया था। बता रहे थे प्रेशर गेम है। कुछ करो तो आप को रोकने की कोशिश तो की जाती है डराने धमकाने की। लेकिन हम तो हिल गए कि अगर ये भी अंदर आ गए तो क्या होगा ? भगवान जाने क्या-क्या दिखाना चाहता है। अब कोई नया बवाल झेलने की ताक़त बची नहीं है। मन और तन दोनों बड़ा कच्चा हो गया है। हम पर शायद जेल का असर आता जा रहा है।


आज मरीना की मुलाक़ात की पर्ची आई थी। तीन महीने बाद। लेकिन कोई मुलाक़ात को नहीं आया, फ़ोन से पर्ची लगा दी होगी। मुलाक़ात के समय तक पहुंच नहीं पाए। बेचारी फिर बहुत दुःखी हो गई कि तीन महीने बाद आई तो सिर्फ़ पर्ची , कोई मिलने तक नहीं आया। हमने समझाया इतना ही बहुत है लोग तुम्हें याद कर रहे हैं। बिलकुल भूले नहीं हैं। सिर्फ़ सज़ाकाटने के लिए तुम्हें यहां छोड़ नहीं दिया है। बाक़ीतो समय है कट ही जाएगा धीरे-धीरे। वही किरन बेदी वाली बात कि आए हैं तो जाएंगे भी।


अब वनिता थोड़ी-थोड़ी नार्मल हो रही है। उस को भंडारे का चार्ज दिला दिया था कि उसी में थोड़ी बिजी रहेगी। बाक़ीयहां करने को कुछ है ही नहीं। तो दिन भर दिमाग में सब उल्टा सीधा ही घूमा करता है और मन परेशान रहता है। अब भंडारे के काम में बिजी रहती है तो समय का पता ही नहीं चलता और शाम तक इतना थक जाती है कि बस खाना खाया और सो गई। पहले तो उसे नींद भी नहीं आती थी गोली खा कर सोती थी। एक दिन हमने और आनंदी ने कस कर डांट लगाई और उस के फट्टे से सारी नींद की गोलियां ढूंढ़-ढूंढ़ कर फेंक दी। कि अब सोओ चाहे न सोओ लेकिन गोली नहीं खानी है। बहुत नाराज रही दो दिन तक। लेकिन धीरे-धीरे सब नार्मल हो गया। केस का फ़ैसलाहोने के बाद दो रात मेरे बैरक में मेरे ही पास सोई। पूरी रात सोने नहीं दिया उस ने। हम भी उसे अपने से चिपकाए ऐसे ही लेटे रहे कि ये सहारा भी बहुत है। तीसरे दिन ड्यूटी वाली ने उसे वापस उस की बैरक में कर दिया। बैरक चेंज करने की बात हुई तो मना कर दिया। जेलर भी बोले कि नहीं दिन भर तो आप लोग साथ ही रहते हैं सिर्फ़ सोने की ही तो बात है। इसे यहां पांच साल हो गया है। उस बैरक में भी एक समझदार जिम्मेदार और सीनियर होना चाहिए। इस लिए इन्हें वहीं रहने दीजिए। ठीक है, कहने के अलावा और कोई चारा भी तो नहीं हमारे पास। तो अब वो दिन भर अपने भंडारे में रहती है और मौक़ामिलने पर हमारे पास और रात में अपनी बैरक में। सज़ाहोने के बाद से उस की कोई मुलाक़ात भी नहीं आई। मायके से तो कोई आया ही नहीं। सज़ावाले दिन दोनों देवर कचहरी में मौजूद थे बस और कोई भी नहीं। घर वाले किसी को ऐसे कैसे जेल में सड़ने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसे भी निष्ठुर परिवार वाले होते हैं। जेलर साहब भी कह रहे थे कि पांच साल जेल काटना किसी महिला के लिए यही सब से बड़ी सज़ाहै। इस के बाद भी कचहरी आजीवन कारावास दे देती है। ये कैसा पाप है। नाहिदा से कह कर दो सूट बाहर से मंगाये हैं और नाहिदा ही उन्हें सिल भी रही है। वनिता के लिए। यही छोटी-छोटी मदद जो हम कर सकते हैं कर रहे हैं। वो कह रही थी आप का भावनात्मक सपोर्ट ही बहुत है मेरे लिए। अब उतना तो हम कर ही सकते हैं अपना मानसिक संतुलन बनाए रखते हुए तो उतना कर रहे हैं। बाक़ीप्रभु की इच्छा।

आज हम लोगों का कूलर लग गया। कुछ तो राहत मिली। भगवान ऐसे ही छोटी-छोटी सहूलियतें देता रहे तो यहां भी समय कट ही जाएगा। जीना थोड़ा आसान हो जाएगा। 27 हजार का कूलर आया है। पांच हजार सब के हिस्से में आए। पांच लोगों ने दिए हैं पैसे। बाक़ीलोग ऐसे ही ठंड का मजा लेंगे। चलो और कुछ नहीं तो हम लोगों को दुआएं तो देंगे। लेकिन जहां जेलर चाह रहे थे वहां न लगवा कर हम लोगों ने जो अड़गड़ा (खिड़की) हम लोगों को कवर करता है वहां लगवा लिया , बस जी उन का तो इगो हर्ट हो गया। इतनी जरा-ज़रा सी बात पर इगो हर्ट हो जाता है , डाक्टर संध्या तोमर ने जो बेंच डोनेट की थी उस पर कुछ महिलाएं बैठी थीं और जेलर साहब आए तो उन लोगों ने ध्यान नहीं दिया। बैठे ही रह गईं। बस जी जेलर साहब का इगो हर्ट हो गया और बेंच अपने आफिस में मंगवा ली , उन्हों ने कि अब बैठे रहो जमीन पर सब लोग। इसी चक्कर में आज गीता का सामान भी चेक हो गया। हर बार ऐसे ही सब आ जाता था , खाने पीने का सामान भी मंत्री जी के जरिए। आज जब वो मुलाक़ात से सामान ले कर चलने लगी तो लंबरदार ने टोक दिया कि सामान चेक करा दीजिए। खाने का सामान था घर का खाना और भी कई चीजें तो जेलर के सामने पेश कर दिया। जेलर ने सब अंदर आने दिया लेकिन अपना अधिकार दिखा दिया। गीता बहुत रो रही थी कि इतनी बेइज्जती हुई। लेकिन क्या किया जाए। यही जेल का तरीका है जब सब ठीक चलने लगता है तो ये एक झटका दे कर आप को एहसास दिला देते हैं कि आप बंदी हैं। आजाद नहीं।


आज भी पति अचानक चले आए थे। बिना बताए। बड़ा सरप्राइज था। जहां चौबीस घंटे साथ रहते हों वहां पति का इस तरह अचानक आधे-आधे घंटे को मिलना भी कितना सुकून दे सकता है इस का अहसास अब हुआ। सच ही है हमेशा साथ चलने से कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में क्या महत्व रखते हैं ये उन से कुछ समय के लिए दूर जाने पर ही पता चलता है। आज मेरी किसी बात पर उन की आंखों में आंसू थे। तो वो चेहरा ही मेरे दिमाग से नहीं हट रहा। बहुत बुरा लग रहा है। क्या भगवान क्या बना दिया तुम ने मेरी ज़िंदगी को ?
 
आज पता चला प्रियंका की बेल हो गई। 302 में आई थी। इस ने और इस के ब्वाय फ्रेंड ने मिल कर किसी अंकल को मारा था जो इस पर बुरी नजर रखता था। पेपर में भी ख़ूब आया था इस के बारे में। इस की और इस के फ्रेंड दोनों की ही बेल हो गई। अब एक दो दिन में परवाना आ जाएगा, चली जाएगी। हम लोगों का अपराध हत्या से भी बड़ा है, हे भगवान।


आज हमने भी जेल की जाली की मुलाक़ात की। कांता मिलने आई थी। अपनी मम्मी के साथ-साथ उस ने मेरी भी पर्ची लगाई थी। बीस मिनट की मुलाक़ात होती है। एक हाल जैसा होता है जिस में जाली लगी होती है और बीच-बीच में बाहर से एक छोटा सा स्लोब बना रहता है जिस से सामान अंदर आता है। जाली के उस तरफ मिलने वाले खड़े रहते हैं और इस तरफ जेल वाले। आप चाहें भी तो किसी का हाथ तक नहीं पकड़ सकते। बस अपनों को देखते रहिए। और सभी बात कर रहे होते हैं तो इतना शोर हो रहा होता है कि कोई बात सुनाई ही नहीं देती। कोई फीलिंग ही नहीं आती और बस बीस मिनट बाद घंटा बज जाता है। फिर पुलिस वाले इतनी जोर-जोर से जाली पीटने लगते हैं कि कुछ सुनाई ही नहीं देता और आप को चुपचाप चले आना होता है। और इस मुलाक़ात के पचास रुपए हर किसी को देने होते हैं ये आप से सुविधा शुल्क लिया जाता है। वाह रे जेल और जेल की दुनिया।


आज मदर्स डे था। दिन भर बच्चे ही याद आते रहे। वैसे तो हर समय याद आते रहते हैं लेकिन आज तो सारा पेपर इसी मदर्स डे से भरा पड़ा था तो जहां देखो वहीं बच्चों की बातें। लेकिन मदर्स-डे का केक तो हमने खा ही लिया। गीता की बेटी मिलने आई थी तो वही लाई थी और गीता अंदर ले आई तो हम सभी ने मिल कर खाया। और दिन भर बच्चों की बातें करते रहे। एक बार रोने को हुए तो सब ने चुप करा दिया कि आप को देख कर चांदनी भी शुरू हो जाएगी। फिर उन्हें चुप कराना मुश्किल हो जाएगा। तो भइया रो भी नहीं पाए बच्चों के लिए। वैसे ही कौन सा बच्चे मेरे साथ थे ? दोनों ही बाहर हैं। दिन साथ नहीं बिताने थे पर कम से कम फ़ोन पर तो बात हो ही जाती थी। जेल में ये तो किसी तरह भी संभव नहीं था तो बस बच्चों को याद ही करते रहे। लोकल वालों के बच्चे तो आ कर मिल भी गए। हम लोगों को तो बस याद ही करना था किसी तरह।


आज चार औरतें आई हैं बेटी, मां, मौसी और नानी। इन लोगों ने दामाद को दहेज के केस में फंसा कर अंदर कर दिया था। दामाद जब जेल से निकला तो उसने अपनी बीवी को घर से निकाल दिया। इन लोगों ने बड़ा धरना प्रदर्शन किया इसी चक्कर में मार-पीट हुई और दामाद ने एफ.आई.आर. कर इन लोगों को जेल भिजवा दिया। लड़की की पिटाई भी हुई थी। उस के शरीर पर चोट के निशान भी थे तो डाक्टर त्यागी ने उस के सारे कपड़े उतरवा कर सिर्फ़ अंडर गारमेंट्स में उस का मुआयना किया कि चोट कहां-कहां है ? जब कि क़ानून ये है कि महिला पुलिस वाली देख कर बताएगी कि कहां और कितना बड़ा घाव है। लेकिन जेल तो फिर जेल ही है। मुआयना होने के बाद महिला पुलिस वाली को बुलाया गया। लड़की इंजीनियर है , पैंसठ हजार रुपए वेतन है उस का। बिलकुल बच्ची सी लगती है देखने में। इतनी कम उम्र में क्या-क्या देख डाला इस ने भी। हमारा इरादा और भी पक्का हुआ कि जब तक हमारी बिटिया पूरी तरह सेटल नहीं हो जाएगी हम उस की शादी नहीं करेंगे।


आज सी.बी.आई. वाले आए थे बुलंदशहर के लिए मेरा बयान लेने। हवालाती आफिस में जा कर बयान दिया। यही एक काम बाक़ीथा। वो भी आज हो गया। उन के सवालों का जवाब तो दिया लेकिन जब आप का सच सामने वाला झूठ समझे तो फिर रोना ही आता है बस और कुछ नहीं। लेकिन मेरे पास सच्चाई की ताक़त के अलावा और है क्या ? उतना ही बयान है मेरा सवाल चाहे जितने घुमा फिरा के पूछ ले कोई।


जेल के संबंध भी ऐसे बन जाते हैं कि क्या कहें। मोहिनी ने आते ही पकड़ लिया कि रोई क्यों ? जब कि हम पूरी तरह नॉर्मल होने के बाद ही आए थे। मना करने पर बोली इतना तो हम समझते हैं आप को। वनिता अलग चिल्ला रही थी कि पांडेय जी अब चुप बैठ जाइए बस। बोलने की ज़रुरत नहीं बस। तो बताना पड़ा कि सी.बी.आई. के सवालों से परेशान हो गए थे। फिर तो आधा घंटा धाराप्रवाह दोनों का प्रवचन चला। हम चुपचाप सुनते रहे। कि सफाई क्या देना और सवालों से क्या घबराना ? तब तक रमेश ने बुलवा लिया कि सी.बी.आई. वाले आए हैं आप को क्या-क्या कहना है। हमने कहा हम तो हो आए हैं। फिर वहीं एक घंटा बैठे रहे। विधायक जी का परवाना आ गया था। वो जाने की तैयारी में थे। रमेश को कितना बुरा लग रहा होगा। अकेलापन भी लग रहा होगा। लेकिन इंसान कर क्या सकता है ? जाएगा तो तभी जब परवाना आएगा।


आज मंदिरा से बात हुई। पति हत्या में आई थी। उस का अपने जेठ के लड़के के साथ चक्कर था। उस का एक पैर भी ख़राब है। वो अपने दो दोस्तों के साथ रात में इस के घर में घुसा और इस पर चाकू रख कर अपने चाचा को पाइप से गला घोंट कर मार डाला और लाश को तीन टुकड़ों में काट कर बोरी में भर कर स्कूटी से जा कर नदी में छोड़ आया और लौट कर स्कूटी खड़ी कर दी। घर धो कर साफ कर दिया। लेकिन जब पकड़ी गई तो अपने को निर्दोष बताते हुए सारा कुछ उस लड़के पर डाल दिया कि पारिवारिक रंजिश के चलते इसने अपने चाचा को मारा। खैर फिलहाल तो दोनों ही अंदर हैं चाची और भतीजा।


आज गीता का परवाना आया। गीता चार महीने से यहां थी। न उस की कोई मुलाक़ात आती थी न कोई पैरवी करने वाला था। बस सीधे उस का परवाना ही आ गया। यही होता है जिस के काम कराने वाले हैं उन का काम ही नहीं होता और जिन की कोई ढंग से पैरवी भी नहीं करता वो लोग आराम से और जल्दी ही निकल जाते हैं। पता भी नहीं चलता। सब समय की बात है। जब जाने का समय आएगा तो हम भी जाएंगे ही। आखिरकार पांच महीने से ऊपर हो गए हैं अब तो।


दो दिन पहले सुनंदा आई है। पता चला कि पति हत्या में आई है। पति शराब पीता था। दो बच्चे भी हो गए थे। अब वो औरत भी घर ले कर आने लगा था। ये परेशान हो गई थी। एक दिन जब इस तरह के हालात थे तो उस ने पुलिस को फ़ोन करना चाहा अपने बचाव के लिए। बस पति ने फ़ोन के केबिल से उसका गला घोंटने की कोशिश की। जब इस को लगा कि ये मर ही जाएगी तो पास में ही चाकू रखा था इस ने वही उठा कर उस की पीठ पर दो बार लगातार वार किया। वो गिर गया। घाव तो बहुत गहरा नहीं था लेकिन वो शराब पिए हुए था और खून बहुत ज़्यादा बह गया था तो अस्पताल जाते-जाते उस की मौत हो गई। और ये बेचारी यहां आ गई। दो छोटे-छोटे बच्चे बाहर हैं। पति की हत्या में है तो ससुराल वाले तो बच्चे को देख नहीं रहे, बूढ़े मां बाप हैं वही बच्चों के पास हैं। अभी भी इसे अपने लिए तकलीफ नहीं है कि जेल आ गए हैं। आजीवन कारावास होगा या क्या कैसे रहेंगे ? जेल कैसे कटेगी कुछ नहीं , बस बच्चों की ही सोचती रहती है कि मेरे छोटे- छोटे बच्चे अब कैसे और किस के भरोसे जिएंगे।


आज मुदित भइया आए थे। दिन भर उन्हीं के साथ रहे। समय भी नहीं पता चला कैसे पूरा दिन बीत गया। मेरा बच्चा सब कुछ मुझ से कहता रहा अपनी परेशानियां , अपनी खुशियां। हम तो बस उसे निहारते ही रहे। जब जेल वापस आए तो ये बाप बेटे मुझ से पहले ही रमेश से मिलने के लिए यहां आ चुके थे। तो हम सारी महिलाएं जो अदालत से आई थी तलाशी के लिए वहीं खड़ी थीं। और सब ऐसी ही थीं। बल्कि दो तो उन में से बांग्लादेशी चोरनी भी थीं गंदी सी। मुदित ने पूछा , ये सब तुम्हारी बैरक में हैं ? क्या कहते ! कहना ही पड़ा कि हां ये सब हमारे ही बैरक में हैं , लेकिन पास में नहीं थोड़ी दूर पर हैं। इस बार आस पास तो ठीक-ठाक लोग हैं जिन से बातचीत भी की जा सकती है कुछ शेयर भी किया जा सकता है। सुख-दुख बतलाया जा सकता है। लेकिन बस ऐसे पांच छह ही लोग हैं। बाक़ीतो पूरा बैरक ऐसे ही लोगों से भरा पड़ा है।


आज जब हम तारीख़से लौटे तो पता चला पीछे से तीनों बैरक की तलाशी हो गई ? हमारे फट्टे से हम और मोहिनी तो तारीख़पर ही थे। चांदनी बाहर आफिस में ही होती है तो हमारे फट्टे की तलाशी नहीं हो रही थी और बंदियों ने आब्जेक्शन उठाया तभी चांदनी आई जब उसे पता चला तो उसने नीता दी से कहा कि मेरे फट्टे की ज़रुर तलाशी लीजिए फिर मरीना ने हम लोगों का भी सारा सामान चेक कराया। नीता का कहना था कि इस फट्टे पर खाने पीने के अलावा और कौन सा सामान मिलेगा ? वैसे भी ये तलाशी इस लिए हुई थी कि पुलिस वाली जो बाजार अंदर महिला बैरक में चलाती हैं। हर बैरक में उन के दो चार बंदी सेट होते हैं जो उन का सामान थोक में रखते हैं और बंदियों को जब ज़रुरत होती है उन से ले लेते हैं। दुगने दाम पर मिलता है पर मिल जाता है। जैसे बीड़ी , सिगरेट , गुटखा , डाई , मेंहदी , चाय की पत्ती , लूडो , मैगी इत्यादि। नाईटी और सूट भी होते हैं। यहां तो सभी ज़रुरतमंद होते हैं। उन के लिए तो यही बहुत है कि सामान मिल जाता है। मैं ने खुद डाई और मोजे खरीदे थे। आज सारा सामान थोक में पकड़ा गया। जो उन के खिलाफ थे वो भी नजर में आ गए। अब देखें आगे जेलर साहब क्या एक्शन लेते हैं ? वैसे इस में बंद कुछ नहीं होगा थोड़े दिन बाद फिर सब सामान बिकने लगेगा। हां होगा ये कि हर चीज़का रेट और बढ़ जाएगा कि इतना रिस्क लेकर सामान लाना पड़ रहा है। मतलब हर तरफ से झेलना तो हम बंदियों को ही पड़ता है।


आज एक महिला आई डॉली, पांच महीने की बच्ची ले कर। चोरी का केस है। वो किसी के यहां मिलने गई थी। पड़ोस के घर में ताला लगा था। तो उस ने अपने दोस्त को बुला कर उस घर का ताला तुड़वा कर साढ़े पांच लाख की चोरी करवा दी। ऐसा पुलिस का कहना है। वो तो यही कहती है कि झूठा केस बना कर फंसा दिया है। उस की बच्ची बहुत प्यारी है। हर समय हंसती रहती है। एक्टिव सी बच्ची है भोंदू नहीं है। वनिता कहती है इसे देखते ही मुझे रानी याद आती है और मुझे बुलबुल का बचपन याद आता है। मैं तो रोज दोपहर में उसे अपने फट्टे पर ले आती हूं। कूलर के सामने सुला देती हूं। ख़ूब मजे से बच्ची सोती रहती है। उस को जब खिलाओ तो उसे हंसता मुस्कराता देख कर सारी थकान सारा तनाव भाग जाता है। सारे दिन उसे कोई न कोई खिलाता ही रहता है। उस की मां को ज़्यादा चिंता नहीं करनी पड़ती। वैसे तो और भी बच्चे हैं यहां , लेकिन इतने गंदे रहते हैं कि छूने का भी मन नहीं करता। इस से पहले एक प्रकाश था जिसे सब खिलाते रहते थे और अब ये सलोनी। जिस के पीछे सब लगे रहते हैं।


आज रीना गौतम के इंस्पेक्टर जीजा मिनिस्टर साहब का बयान लेने आए थे। काम निपटाने के बाद उन्होंने मंत्री जी के जरिए ही मुझे मिलने के लिए बुलवाया था। बड़ा तसल्ली दे रहे थे। बोले हमारे लायक कोई काम। हम क्या कहते ? दोनों हाथ जोड़ कर खड़े थे कि आप यहां तक आए , मुझ से मिले यही बहुत है , बस। रीना से कहिएगा इन का ख्याल रखेंगी। बहुत अच्छा लगा कि उन्हें हमारा इतना ध्यान तो था। फिर वहीं कुमकुम और रोली भी आ गईं , रमेश के पास तो हम जीजा के जाने के बाद भी बैठे रह गए देर तक। मंत्री जी की पर्ची थी तो कोई सिपाही बुलाने भी नहीं आई कि वापस चलो। आराम से बैठे रहे। दोनों बच्चियों से बतियाते रहे। रोली को लखनऊ जाना था। वो लोग चले गए। रामेंद्र मोहन की पत्नी आई थी उन के पास बैठे रहे सब बतियाते रहे। सुकेश का परवाना आना था वो भी चिंतित वहीं बैठे थे। खैर शाम तक उन का परवाना आ भी गया। पांच बजे जब अदालत वाली महिलाएं लौटीं तो हम खड़े हो गए कि अब हम भी जा रहे हैं तो इन लोगों के साथ ही बैरक में आए। पूरा दिन पता ही नहीं चला कि कैसे बीत गया। अब समझ आया कि चांदनी कैसे यहां इतने लंबे समय से अपने आप को बैलेंस रख पाती है। पूरा दिन तो बाहर अधीक्षक के आफिस में ही कट जाता है। बस सुबह शाम की ही किचकिच यहां झेलनी होती है तो वो उतना पढ़ के , पूजा कर के कट ही जाता है।


आज भी रमेश ने बुलवा लिया था पनीर पकौड़ा और सफेद रसगुल्ला खाने को। तो आज भी दो तीन घंटा आराम से कट गया। वहीं पता चला कि आज नागेंद्र पांडेय के जमानती भी हाथ खड़ा कर दिए तो आज कल में वो भी निकल जाएंगे। बताओ हम यहीं के यहीं हैं और ये साहब सब कुछ कर के भी बाहर निकल जाएंगे। और ऐश से रहेंगे और हम यहीं रहेंगे। सही बात है पैसे वालों की ही दुनिया है। उन के लिए कोई नियम कायदा क़ानून नहीं है। सब हम लोगों को ही झेलना है। खैर जिस की क़िस्मत में जो लिखा है वो वही झेलेगा। हमारा भी जब दाना पानी यहां का ख़त्म हो जाएगा तो हम भी निकल ही जाएंगे। यही कह कर सब्र कर लेते हैं।


आज अनुष्का का जन्म दिन था। अभी एक हफ़्ते पहले ही 16 तारीख़को उस की पुण्यतिथि भी थी। उस दिन तो सुबह ही न्यूज पेपर में भी निकला था उस की याद में। दिन भर चांदनी का मूड ख़राब था। लेकिन बहुत ही हिम्मती औरत है। एक आंसू भी नहीं देखा किसी ने उस का। वैसे तो हम लोग खुद भी बचा ही रहे थे कि ऐसा कोई माहौल ख़राब न होने पाए , ऐसी कोई भी बातचीत न हो उस को अपने में ही रहने का पूरा मौक़ादिया गया कि वो शांत रह सके। लेकिन आज तो कुछ करना भी था। सुबह ही वो मोहिनी से भिड़ी लेकिन मोहिनी चिलपिल करके निकल गई। हमारी महिला बैरक में बीस बच्चे हैं। तो बीस पेपर प्लेट ले कर उस पर कुछ नाश्ता रख कर बच्चों को खिलाया और वनिता ने भंडारे में दूध मंगा कर खीर बना दी तो सब बच्चों को एक-एक कटोरी खीर भी खिलाई गई और फिर अपनी बैरक में तो सब को ही खीर दी गई। इस पर भी बड़ी कंट्रोवर्सी थी कि मरने के बाद पुण्यतिथि मनाई जाती है न कि जन्म दिन। हमने तो कहा कि मरने का दिन कौन याद करना चाहता है ? उस के पैदा होने की खुशी थी तो वो ही मनानी चाहिए। चांदनी तो खैर दिन भर बाहर ही थी। जब शाम को वो लौटी तो बस बच्चों को बांटना ही बाक़ीथा , उस को हम लोगों ने कुछ बताया भी नहीं था। उस के लिए भी सरप्राइज था। फिर मरीना, मोहिनी और वनिता के साथ फट्टे-फट्टे जा कर चांदनी ने बांटा। जेलर साहब को भी खीर खिलाई गई बिना बताए कि वजह क्या है ? उन्हों ने भी नहीं पूछा बस खा ली।


आज सुबह जब कैंटीन आई तो महिला बैरक का गेट खुला था। और गेट से जो एरिया अंदर का दिख रहा था वहां पर दो चार लड़कियां खड़ी थीं। और कैंटीन वाले से इशारेबाजी हो रही थी। चीफ ने बुला कर नीता दीदी को दिखाया। पहले तो उन्होंने उन लड़कियों को डांट कर भगाया फिर बहुत देर तक चिल्लाती रही कि कोई इस एरिया में नहीं दिखेगा वगैरह-वगैरह। हमने कहा शांत हो जाइए और एक बात बताइए कि क्या आप को ये बात पहले से नहीं पता थी। बोली , नहीं , बिलकुल नहीं। हम लोग ख़ूब हंसे कि फिर तो आप का महिला बैरक में नौकरी करना ही बेकार है। सब को पता है यहां। और आप जानती ही नहीं हैं। कोई एक्सपीरिएंस ही नहीं है आप को।



आज मुदित भइया का जन्म दिन था। दिन भर दिमाग में बना रहा। लेकिन हम बिलकुल भी उदास नहीं हुए। क्यों कि हम दुखी होते हैं तो उसे पता चल जाता है कि मां परेशान हैं। तो फिर उस का मूड ख़राब हो जन्म दिन पर। ये हम नहीं चाहते। इसी लिए दिन भर अपने को बहलाए रहे और शाम को तो नीता दीदी ने ऐसे ही बंदियों को इकट्ठा कर के ढोलक बजवाई तो पांच मिनट नाचे भी। और जब कैंटीन आई तो पंद्रह गुलाब जामुन ले कर अपने लोगों को बांटे भी कि चलो इसी तरह हम भी मना लें उन का जन्मदिन। वो भाई-बहन तो एक साथ रहे होंगे आज तो अच्छे से मनाया ही होगा।


रोली का रिजल्ट आया, 90 प्रतिशत नंबर आए। कितनी खुशी की बात है कि जिस बच्ची का बाप ढाई साल से जेल में हो वो बच्ची उसी घर में, उसी माहौल में रह कर और लोगों के ताने सुन-सुन कर भी विचलित नहीं हुई और पूरी मेहनत से पढ़ कर ये नंबर ले कर आई। चांदनी अंदर आ रही थी तो रोली ने एक रसगुल्ले का डिब्बा देते हुए कहा कि आंटी उपमा आंटी को भी खिला दीजिएगा। हम सब लोगों ने रसगुल्ले खा के उस बच्ची को उज्ज्वल भविष्य की शुभ कामनाएं दी। और आज जब मिलने गए रमेश से। रमेश से क्या , हमने चांदनी से कहलवाया था कि जब बच्चे आएं तो हमें बुलवा लेना , वही उन्हों ने बुलवाया था। और इतने ख़ुश हो रहे थे। रोली का हाथ ही पकड़े रहे सारे समय। दोनों बच्चियां भी ख़ुश -ख़ुश बैठी थीं। रमेश थोड़ा भी विचलित होते तो कुमकुम उन्हें समझाने लगती कि सब ठीक होगा पापा। इतने बड़े खुशी के मौके पर भी इंसान अपने बच्चों से दूर है। इस समय रोली को पापा की गाइडेंस की कितनी ज़रुरत है ? कैरियर डिसाइडिंग इयर है उस का। लेकिन क्या करें ? पापा जेल के अंदर से भला क्या कर सकते हैं ? उसे ही तय करना है कि अब आगे उसे क्या पढ़ना है और कहां से पढ़ना है ? अब तो बस यही दुआ है कि भगवान इन्हें जल्दी से जल्दी यहां से निकाले ताकि अपने बच्चे को ये अपने हाथ से सेटल कर सकें। भगवान कुछ तो खुशियों के मौके साथ में जी लेने दो उन्हें भी। इंसान आखिर कब तक धैर्य रखेगा।


मायावती का एक केस चंडीगढ़ में भी चल रहा है। कल उस की तारीख़थी। इन पति-पत्नी को गारद के साथ यहां से भेजा गया था। कल शाम को वह वापस आई। उस की तबियत ख़राब थी। आज सुबह जब हाल पूछा तो रोने लगी कि यहां से पुलिस गारद के साथ जाना, उन का पूरे रास्ते मुजिरमों की तरह ट्रीट करना , सुनील को हथकड़ी लगा कर कचहरी में ले जाना , शारीरिक कष्ट से ज़्यादा मानसिक कष्ट झेलना पड़ा। एक तरह से मानसिक बलात्कार ही था। कह रही थी कि अब समझ आया कि बलात्कार की शिकार महिला को कैसा लगता होगा ? शरीर को कष्ट और मन का भी कष्ट। और मन का कष्ट शरीर के कष्ट पर भारी है। बोली मेरी आंखों के सामने से ये सीन हट ही नहीं रहा है कि हथकड़ी लगाए सुनील कचहरी में। बच्चों से फ़ोन पर बात हुई तो बेटी बोली आप कसम खा कर बोलो कि आप मेरी मां ही बोल रही हो। बोली कानों में यही गूंज रहा है। बताओ इतने दिन बच्चों से फ़ोन पर बात किए हो गए हैं कि वो अपनी मां की आवाज़ ही भूल गई। उसे भरोसा ही नहीं था कि कभी उस की मां से फ़ोन पर बात हो भी पाएगी ? सही है एक तो जेल में और अपने बच्चों से दूर और बीच-बीच में ऐसे झटके कोई अपना मानसिक संतुलन बना कर भी रखे तो कैसे रखे ? चलो फिर भी सब की कट ही रही है चाहे रो कर चाहे हंस के।


आज यहां से जो बच्चे हास्टल गए थे गर्मी की छुट्टियों में डेढ़ महीने के लिए वापस आए हैं। बच्चों की शक्ल ही बदल गई है। बाहरी दुनिया से सामना होने से कितना आत्म विश्वास बढ़ गया है , उन लोगों का। कितना अच्छा लग रहा है उन्हें देख कर। मन ही नहीं लग रहा है यहां बच्चों का। बस इसी सोच में हैं कि कितनी जल्दी यहां से वापस हास्टल पहुंचे। रानी को वनिता ने यहां नहीं बुलाया कि फिर उसी माहौल में लौटने का क्या मतलब है ? उस के चाचा उसे हास्टल से ही दादी के पास ले गए। अब किसी दिन मां बाप से मिलवाने के लिए ले आएंगे। और फिर घर से ही जुलाई में हास्टल वापस भी भिजवा देंगे। सही भी है जो दो महीने बच्चों के ऊपर मेहनत की है वो दो महीने वापस यहीं रहने से बेकार हो जाएंगे। जुलाई में फिर नए सिरे से जूझना पड़ेगा।


मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आता कि मेरे ही साथ क्या ? दो बार बर्रे मुझे काट चुकी हैं। एक बार तो हाथ पर काटा तो चलो ठीक था। दवा भी लगा ली। खुजली भी कर ली। अब पीठ पर काट लिया। हाथ पीछे जाता ही नहीं है। तो न दवा लगाने के और न ही खुजलाने के। जब बहुत तेज खुजली होती है तो कंघी से खुजलाने की कोशिश करते हैं। कभी हाथ पहुंच जाता है कभी नहीं। और शीशा तो कोई है नहीं जो पीछे देख कर दवा लगा सकें। ये भी दिन हैं।


यहां पर बीमारी के नाम पर भी मूर्ख बनाया जाता है। नाहिदा को माउथ अल्सर है और वो समय-समय पर डिप्रेशन में भी चली जाती है। तो डाक्टर कह रहे हैं कि दस हजार रुपए खर्च करो तो ऐसा मेडिकल बना देंगे कि तुम्हारी हाईकोर्ट से बेल बहुत आसानी से हो जाएगी। आज उस की हाईकोर्ट में तारीख़है। बेचारी रिक्वेस्ट ही करती रह गई लेकिन किसी ने भी मेडिकल बना कर न दिया। डाक्टर ने कहा कि जेलर छुट्टी चले गए हैं। मेडिकल बना रखा है पर जेलर के साइन नहीं हो पाए हैं। अरे जो एक्टिंग जेलर हैं वो साइन करता। ये सब बेवकूफ बनाने के धंधे हैं। 5000 रुपए एडवांस और ले लिए। वो भी वापस नहीं मिलने। मूर्ख बने सो अलग।


आज भंडारे के सिलेंडर में आग लग गई। सिलेंडर में लीकेज था और रेगुलेटर भी कुछ ढीला था तो सब मिल कर एक़दमसे सिलेंडर से लपटें निकले लगी। तीन सिलेंडर वहां और रखे थे। वो तो निर्मला और प्रेमा ने बड़ी हिम्मत से काम लिया और लगातार पानी से भिगो-भिगो कर बोरियां सिलेंडर पर डालती रही तो आग बुझ गई। तब तक जेलर, डिप्टी जेलर, सारे चीफ, दस पंद्रह लंबरदार सब भागते हुए आए। चेक करने पर पता चला कि सिलेंडर में लीकेज है। और रखे हुए तीनों सिलेंडर भी लीक कर रहे थे। इस लिए भंडारे वाले बच गए नहीं तो सब एक साथ लाइन हाजिर कर दिए जाते। हम जब पिछली बार यहां थे तब भी भंडारे में आग लगी थी , तब तो फायर ब्रिगेड बुलानी पड़ी थी लेकिन हां नुकसान तब भी कुछ नहीं हुआ था।


आज नाहिदा और शबीना को मेरठ चेकअप के लिए भेजा गया। आदमियों की तरफ से पांच छह आदमी गए थे। नाहिदा को तो दस मिनट में दिखा कर वापस गाड़ी में ले आए। शबीना बेहोश हो गई वहां , तो उसे एडमिट कराना था। पुलिस वाली दो ही थीं तो नाहिदा को उन आदमियों के साथ वज्र वाहन में बंद कर के दोनों पुलिस वाली उसे एडमिट कराने में लग गई। शबीना के साथ फर्जी पासपोर्ट का भी मामला है तो एक पुलिस वाली सारे समय उस के साथ खड़ी रही और एक ने भाग दौड़ कर उसे अस्पताल में भर्ती कराया। इसे पूरे काम में ढाई तीन घंटे लग गए और इतनी देर नाहिदा अकेले उन आदमी अपराधियों के साथ इस भयंकर गर्मी में भूखी प्यासी रह कर गाड़ी में बंद रही। अब इस से ज़्यादा मानसिक अत्याचार क्या हो सकता है ? और किसी को इस का अहसास भी नहीं कि उन की जो ड्यूटी थी वो कर रही थी। पर्सनल अटेंशन कोई कैसे दे सकता है ? भला ये भी कोई बात हुई।


आज पति झटके में बोल गए कि शाहनी में बुलबुल की नौकरी ख़त्म हो गई थी। हम सोच रहे हैं कि दो साल हो गया है एक ही जगह तो नौकरी ढूढ़ी जा रही है। चलो कोई बात नहीं लेकिन यहां तो किस्सा ही दूसरा था। और सब इतने बड़े हो गए हैं कि हमें बताने की ज़रुरत भी नहीं समझी। कारण यही रहा होगा कि मम्मी परेशान हो जाएंगी। वो वैसे ही परेशान हैं। सही बात है आज के बच्चे बहुत समझदार हैं। हम तो उन लोगों की आवाज़ सुनते ही रोने लगते हैं और वो इतनी समझदार हो गई हैं कि इतने प्रेशर में रहने के बाद भी जब भी हम से बात हुई उतने ही जोश से और हंसी खुशी से बात हुई। कितना छिपाना जान गए हैं आजकल के बच्चे। लव यू बच्चा।


आज कल मोहिनी ने इतना परेशान कर रखा है कि क्या बताएं ? जब वो अवसाद में होती है तो छोटी-छोटी बातें भी उसे बहुत बुरी लगने लगती है। हर किसी से नाराज हो जाना , झनकना , पटकना सब लगा रहता है। साथ खाना पीना छोड़ देगी। सब को पता चल जाता है कि मोहिनी नाराज है। चांदनी की तो बजाती ही रहती है। बहुत इंसिक्यूरिटी रहती है उसे चांदनी को ले कर। उस का सारा खर्चा चांदनी के भरोसे चलता है। खाना-पीना , कपड़ा लत्ता , सारी तैयारी सब चांदनी के उस से ही होता है और किसी महिला बंदी से भिड़ भी जाती है तो चांदनी की वजह से कोई पुलिस वाली कुछ बोलती ही नहीं है। तो उसे हमेशा यही लगता है कि कोई और चांदनी के करीब न आ जाए। और इस बार तो हम तीनों ही एक साथ रह रहे हैं तो बस हम से ही उसे सारी परेशानी है। और इतनी बच्चों जैसी बातों पर रिएक्ट करती है कि समझ ही नहीं आता कि इस पर क्या रिएक्ट करें ? लेकिन परेशान तो हो ही जाते हैं। आस पास वाले और मजा लेते हैं कि अच्छा मोहिनी फिर नाराज हो गई है। मरीना तो आज मुझे समझा रही थी कि आंटी जब इस का गुस्सा ख़त्म हो जाए और ये नॉर्मली आप से बात करे तो भी आप कम ही बोलिए इस से। सिर्फ़ ज़रुरत की बात करिए। अब क्या करें ? है तो बच्चा ही जब प्यार से बोलती है हमारी इतनी केयर करती है तो हम भी दुलार करते हैं। लेकिन जब नाराज होती है तो एक़दमझटक के किनारे हो जाती है कि अब आप से कोई मतलब नहीं है उस का। अब इतने डिफरेंट मूड के साथ कैसे निभाए कोई ? बाहर होते तो हम भी सही कर देते। लेकिन ये जेल है। इन्हीं लोगों के साथ रहना मजबूरी भी है। आज तो हम सुबह नहाते समय ख़ूब रोए और भगवान से शिद्दत से मांगा कि ये मानसिक तनाव अब और नहीं झेला जाता मुझ से। मुक्ति दो मुझे।
अरे आज तो भगवान ने मेरी शिद्दत महसूस कर ली। मेरी बेल हो गई। 5 लाख रुपए जमा करना है। पर बेल तो हुई। कितना सुकून सा मिला। शाम को जब मित्रा दी अदालत से लौट रही थीं तो रमेश ने रास्ते में रोक कर बताया कि हमारी बेल हो गई है। मित्रा दी चिल्लाते हुए बैरिक में घुसी उपमा पांडेय तुम ने हमारा साथ आधे रास्ते में छोड़ दिया। हम तो इतना कस कर उन के चिपके कि वो दब ही गईं । बेल से ज़्यादा इस बात की तसल्ली हुई कि अब हम मोहिनी के बंधन से आजाद हो जाएंगे। जेल के अंदर एक और जेल से तो मुक्ति मिलेगी। जब वो गले लगी तो हमने इतना ही कहा कि कितना टेंशन देते हो बच्चा ! तो बोली इतना परेशान न करते तो भगवान सुनता भी नहीं। और हमें भी तो ढाई साल हो रहा है यहां हम अपना फ्रस्ट्रेशन ले कर कहां जाएं। अब इस का कोई क्या जवाब दे ? फिर मैं ने रमेश को कहलवाया कि मुझे बुला लें। जब गए तो उन्हों ने कंफर्म किया कि तीन बजे ही विनय का फ़ोन आ गया था। चलिए आप को तो यहां से मुक्ति मिली। हम ने पूछा आप का आर्डर आया तो बोले नहीं , अभी तक तो नहीं आया । बहुत ही परेशान थे कि सारे एक्सपेरिमेंट भगवान मेरे ही साथ कर रहा है अब तो कभी-कभी लगता है कि ऐसा तो नहीं कि मैं यहीं रह जाऊंगा , बहुत निगेटिव ख्याल आते हैं। बात तो सही है हमें तो एक वंदना के जाने के बाद ही इतना बुरा लग रहा था कि हम से पीछे आई थी और ये जा रही है और हम यहीं हैं तो ढाई साल में उन के पीछे तो जाने कितने आए और गए तो उन के लिए कितना मुश्किल होता है अपने को संभालना। हम भी चुपचाप सब सुनते रहे। क्या कह कर उन्हें तसल्ली देते। अपनी बेल का भी यही लग रहा था कि चलो पतिदेव की इलाहाबाद की भाग दौड़ ख़त्म हुई बाक़ीहम तो काट ही रहे थे। वापस लौटे तो वनिता ने गुलाब जामुन खिलाए। बोली अब हम निश्चिंत हो कर मेरठ जा सकेंगे कि आप चली जाएंगी। आप को खाने पीने की कोई दिक्क़तनहीं होने पाएगी। अब हम क्या कहते ? उस के गले ही लग गए कि पागल हो तुम।


आज तारीख़पर ये नहीं आए थे कि जमानतदारों को ले कर सोमवार को सीधे आएंगे , फिर यहीं से सब करा कर साथ ही चलेंगे। सोनू आया था बेल आर्डर की नेट कापी ले कर। पक्का हो गया कि हां बेल हो ही गई है। बच्चों से बात हुई । सब बहुत ख़ुश थे कि अब कोई भी टेंशन नहीं है। तुम बाहर रहोगी तो सब मैनेज हो जाएगा। शनिवार की वजह से कोर्ट खाली ही था तो जल्दी ही एक बजे तक लौट भी आए। रमेश मिल गए तो हमने कहा आर्डर मिल गया है उन्हों ने पढ़ने के लिए मांगा वहीं रामेंद्र मोहन भी बैठे थे , उन्हें भी पढ़ने को दिया। रामेंद्र मोहन हमें बधाई दे रहे थे और उन की बेल खारिज हो गई है तो हम समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे रिएक्ट करें ? आप की क्यों खारिज हुई आखिर ? दो-दो बार हाईकोर्ट से ज़मानतखारिज होना आखिर मामूली बात नहीं है । तो बोले दुदुआ हम पे विपदा तीन बड़े-बड़े में नाम वाली कहावत चरितार्थ हो रही है मेरे साथ एक आई.ए.एस. अफसर , विधायक और मंत्री चार्जशीटेड हैं भला मुझे कैसे बेल मिलेगी ? दो साल हो गया है उन्हें भी यहां रहते हुए। वे बोले आप बहुत हिम्मती महिला हैं। हमने कहा जब पड़ता है तो हिम्मत अपने आप आ जाती है। बोले नहीं तभी तो देखा जाता है हिम्मत को। सामान्य परिस्थितियों में नहीं देखा जाता। आप विनय से ज़्यादा हिम्मती हैं। पिछली बार जिस तरह से आप के दोनों हाथ टूटे थे और आप ने अपना समय काटा वो काबिले तारीफ है।


आज मायावती का , डा. राकेश तलवार का और गीता के लड़के का जन्म दिन है। मायावती को तो मैं ने एक अखरोट का पैकेट दे कर विश किया कि ले मोटी खा। बोली ड्राई फ्रूट गिफ़्ट है ये जेल में मेरे लिए। डाक्टर साहब के लिए पान केक का पैकेट भेजा। गीता ने समोसे और गुलाब जामुन खिलाए। चांदनी शाम को थोड़ा केक और मंचूरियन और फ्राईड राइस लेकर आई जिस को खा कर हम लोगों ने डाक्टर साहब का बर्थ-डे सेलेब्रेट किया लेकिन मायावती ने कुछ भी नहीं खिलाया। कितना भी उस को चिढ़ा लिया कोई फर्क नहीं। मुस्कुराती रही लेकिन खिलाया नहीं।


सारे बंदियों को पढ़ने लिखने की सुविधा होती है। स्नातक और डिप्लोमा के कोर्स इग्नू के जरिए कराए जाते हैं तो कई महिलाएं पढ़ाई करती हैं। दो जून से पेपर हैं , और पेपर मेरठ जेल में होने हैं तो यहां से सारे विद्यार्थियों का चालान मेरठ जेल के लिए कटेगा एक महीने के लिए। इम्तहान ख़त्म होने के बाद 27 जून को ये लोग वापस आएंगे। पुलिस गारद और वज्र वाहन मिलने पर भी निर्भर करता है इन लोगों का जाना आना। तो जो थोड़ी चंचल महिलाएं हैं और काफी समय मतलब दो तीन साल से यहां बंद हैं वो लोग तो जाने के लिए इतनी उत्सुक हैं कि जैसे पता नहीं कहां घुमाने ले जा रहे हैं इन लोगों को। इतनी तैयारियां हो रही हैं , सूट बनवाये जा रहे हैं। मैचिंग जूतियां खरीदी जा रही हैं। इतना-इतना सामान ले जाने को इकट्ठा हो जा रहा है कि शायद वज्र वाहन भी कम पड़ जाए। रोज चर्चा होती है कि अब क्या रह गया है और उस का इंतजाम कैसे किया जाए ? पढ़ाई की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं है। सब तैयारियों में व्यस्त हैं। सही बात है हर इंसान अपने ख़ुश होने के मौके ढूंढ़ ही लेता है।


इंसान छोटी-छोटी बातों में ही खुशियां ढूंढ़ लेता है। यहां कोई महिला बंदी अगर पार्लर का काम जानती है तो सारी महिलाएं उस के पीछे पड़ जाती हैं। तो बैंक लोन के सी.बी.आई. केस वाली ललिता का तो पार्लर ही था उसे ही बढ़ाने के लिए उसने लोन लेना था। तो वो यहां सब का काम किया करती है। लेकिन कैंची आना यहां मुश्किल था तो कटिंग रह जाती थी। लेकिन डाक्टर मित्रा ने जेलर से बात की तो वो पूरे दिन भर के लिए कैंची भेज देते हैं तो सब की कटिंग हो जाती है जो कटिंग वाली नहीं हैं वो भी कोई न कोई स्टाइल कटवा कर ख़ुश हो लेती हैं। लेकिन हां कैंची को बहुत संभाल कर रखना होता है कि कहीं कोई मानसिक तनाव वाली महिला कैंची न पा जाए और कोई हादसा न हो जाए।


एक बूढ़ी सी अम्मा हैं जिन को देख कर मम्मी की याद आती है बहुत ही वात्सल्य वाला चेहरा है उन का। ख़ूब प्यार से बतियाती हैं। उन को शुगर है। सुबह शाम इंसुलिन लगना होता है तो दोनों टाइम आ कर गेट पर बैठ जाती हैं। सोम आ कर इंसुलिन लगा जाता है। कभी उसे आने में देर हो तो बेचारी ड्यूटी वाली से कहती रहती हैं रिक्वेस्ट करती हैं कि बुलवा दो सोम को। भूख के मारे चक्कर आ रहे हैं। फ्रिज में इंसुलिन रखी होनी चाहिए इस लिए बेचारी मजबूर हैं। पराधीन हैं कि अस्पताल से आए तो हम लगाएं। तब लगता है हमारे लिए ये छोटी-छोटी सहूलियतें ही बहुत हैं। अपना पेन है छोटे से करवा में वाटर कूलर का पानी भर कर उसमें पेन डाले रहते हैं पन्नी में डाल कर और पानी दोनों टाइम बदल देते हैं तो किसी की मोहताजी तो नहीं है । जब खाने का टाइम हुआ इंसुलिन लगाई और खा लिया। थैंक टू गॉड।

अभी जिस सोम की बात की , उस की बीवी शांता इधर है। पिछली बार जब हम आए थे तो महिला बैरक की राइटर थी। उस का और सोम का घर अगल बगल था। कानपुर के रहने वाले हैं ये लोग। बारह साल की उम्र से ही इन लोगों का अफेयर चल गया था। दोनों के परिवार में दुश्मनी थी इस लिए शादी तो हो नहीं सकती थी। सोम की शादी दूसरी जगह हो गई। उस से एक बच्चा भी हो गया। फिर भी सोम ने इस से शादी कर ली और एक बच्चा इस से भी हो गया। इसे भी सोम गाजियाबाद ले आया और तीनों साथ रहने लगे। ये टेक महेंद्रा में नौकरी करती थी। दिन भर घर में नहीं रहती थी। पीछे से पहली वाली ने अपने आप को जला लिया और शांता के खिलाफ बयान दे दिए। सोम और शांता दोनों जेल आ गए। ज़मानतदोनों की नहीं हुई और दोनों को आजीवन कारावास की सज़ाहो गई। सज़ाहोने से पहले ही इस का अफजल नाम के एक लड़के से चक्कर चल गया। सोम तो अस्पताल का राइटर बन गया था और धीरे-धीरे उस ने राकेश तलवार के साथ डेंटल का काम सीख लिया और उन को असिस्ट करने लगा। अफजल को जेल में पांच साल हो गए हैं। वो आल इन वन है। उसे सारे काम आते हैं। महिला बैरक में कुछ भी बिगड़ जाए गैस का चूल्हा ख़राब हो , नल ठीक न हो , मच्छर की दवा छिड़कनी हो , खिड़कियों में पन्नी लगानी है , अफजल ही आता है। इतना तो उस ने जेलर और अधीक्षक को सेट कर ही रखा है। इधर शांता भी पहले अच्छी थी , सब का ध्यान रखती थी तो धीरे-धीरे महिला बैरक की राइटर बन गई थी। सब कुछ उस के हाथ में था। पूरी जेल उसे पहचानती थी ख़ूब पैसा भी कमा रही थी। अफजल के आने पर उस से मिलना भी आसान था। एक ड्यूटी वाली थी प्रतिभा गौतम वो भी इस का ख़ूब साथ देती थी। आउट आफ दि वे सपोर्ट करती थी। शांता फिर किसी को कुछ नहीं समझती थी। बदतमीजी से बात करना , बड़े छोटे का कोई लिहाज नहीं , ड्यूटी वाली पर हाथ उठा दिया था। सोम को भी कुछ नहीं समझती थी। शनिवार की मुलाक़ात में सब के बीच में इन दोनों का झगड़ा हुआ , सोम ने इसे दो झापड़ भी लगाए। ये सब तो हम जब पिछली बार आए थे , तभी हुआ था। इस बार आने पर पता चला कि उसे सज़ापड़ गई है। सब ड्यूटी वाली ने एक हो कर उस की राइटरी छीन ली और उसे ऊपर वाली बैरक में फेंक दिया है। वो बिलकुल साइको हो गई है। हां अफजल से अफेयर खुले आम चल रहा है। बाक़ीमहिलाएं अब उस से कोई नहीं डरतीं। लेकिन वो रोज ही किसी न किसी से भिड़ी रहती है। रोज एक अप्लीकेशन भी ज़रुर लिखती है। मेरी तो खैर उस से बात भी नहीं होती। बीच में चार महीने रिया और इस ने भंडारा चलाया था तो हम ने भंडारे का खाना खाया भी नहीं था। इतना उस ने सब को परेशान कर रखा है कि पुलिस वाली सब मिल कर इस का चालान कटवा कर लखनऊ सेंट्रल जेल भिजवाना चाहती हैं। लेकिन दिक्क़तयही है कि फिर सभी सज़ावाली जाएंगी। जिन का घर बार यहां है उन के लिए तो लखनऊ में जेल काटनी मुश्किल हो जाएगी। इस से पहले भी दस बारह महिलाओं को भेज चुके हैं। तो एक के चलते सब का नुकसान क्यों हो इसी लिए सब चुप हो जाते हैं और इसी का वो फायदा उठाती है और सब को परेशान करती रहती है। खैर सब का अपना-अपना जेल काटने का तरीका होता है। रमन एक राइटर था यहां पर लगभग पांच साल से। किसी यूनियन का लीडर था। फैक्टरी में बम फटा था उसी में जेल आया था। दो बार हाईकोर्ट से बेल खारिज होने के बाद अब उस की तीसरी बार में बेल हुई। उस ने अपने आप को बिजी कर लिया था। मुलाक़ात का राइटर था तो सभी से उस का परिचय था। व्यवहार का भी अच्छा था। अभी पंद्रह दिन पहले ही वो बाहर निकला और आज उस की मौसी की बेटी, और उन का लड़का, दहेज में आ गए। रमन ने बाहर से फ़ोन कर के उन की सिफारिश की तो पता चला कि ये रमन की बहन है। मतलब कोई न कोई इन के खानदान का अंदर रहेगा ही।


आज कल महिला बैरक की राजनीति जोरों पर है। ड्यूटी वालियों में आपस में एका नहीं है। सारी एक दूसरे से जलती हैं और शिकायत लगाती रहती हैं अपने-अपने बंदी सेट करती हैं और उन को चढ़ा-चढ़ा कर अपना उल्लू सीधा करती रहती हैं। बंदी तो मजबूर हैं। जैसा ये लोग नचाएंगी नाचना ही है। बैरक की तलाशी उसी का ही एक हिस्सा था। अब उस ने भयंकर रूप धर लिया है। इन लोगों ने बंदियों को चढ़ा कर अब सीधे अधीक्षक को शिकायत लिखी है कि भंडारे का खाना अच्छा नहीं है। ड्यूटी वाली राशन घर ले जाती हैं वगैरह-वगैरह। अधीक्षक ने बुला कर जेलर को डांटा। जेलर ख़ूब गुस्से में आए और ड्यूटी वालियों को डांटा और तीनों बैरक से दो-दो महिलाएं चुन कर खाना चखने की जिम्मेदारी दी। हम लोगों ने कहा कि आप तो रोज ही चखते हैं । तो बोले हां मुझे तो पता ही है कि बहुत अच्छा बनता है । लेकिन अब शिकायत हम से भी ऊपर गई है तो कुछ न कुछ कार्यवाही तो होनी ही है। फिर खुद ही बैरक बंद कराने चले गए। वैसे बैरक बंद होते समय सब लोग अपनी-अपनी जगह बैठ जाते हैं और पुलिस वाली गिनती कर लेती हैं । लेकिन आज जेलर बोले कि सब लोग बाहर निकलें और एक-एक की गिनती कर के अंदर भेजो। और ये कह कर वो ऊपर वाली बैरक बंद कराने चले गए। बाहर निकले तो पता चला कि जेलर ने कहा है कि सुबह सब को बाहर बिठा कर जोड़े में गिनती देनी पड़ेगी। कुछ महिलाएं नाराज होने लगीं तो मित्रा दी ने कहा जब जेल में आ ही गए हैं तो क्या इज्जत और क्या बेइज्जती। और सब को बैरक के रास्ते की ईंटों की मेड़ पर बैठा दिया। जब जेलर नीचे आए तो पूरी बैरक ईंटों की मेड़ पर बैठी थी, बोले अरे ये सहयोग है या विरोध ? तो ये कहा गया विरोध कैसा सहयोग ही है और सब गिनती दे कर अंदर आए। अब जब जेल में हैं तो ये सब तो झेलना ही पड़ेगा चाहे हंस के झेलो या रो के। तो हंस के झेल लेना ही सही है।


आज शबीना के मरने की ख़बर आई। उस की तबियत ख़राब चल रही थी। उस का मेरठ मेडिकल कालेज से इलाज भी चल रहा था। किडनी 60 प्रतिशत डैमेज थी। लेकिन फालोअप ढंग से नहीं हो पा रहा था। कभी गारद नहीं है तो चेकअप को नहीं जा पाई। कभी इंजेक्शन ख़त्म हो गए तो मंगाए नहीं गए। है तो सरकारी काम काज ही। उस के घर वाले भी उसे पूछ नहीं रहे थे। कोई मिलने भी नहीं आता था। जो फ़ोन या मेल आई.डी. दी थी उस पर भी कोई जवाब नहीं मिल रहा था। उस का हौसला टूट गया था। इस बार जब चेकअप के लिए मेरठ गई तो उन्हों ने एडमिट कर लिया। हफ़्ते भर बाद जवाब दे दिया तो उसे जेल की तरफ से दिल्ली में कोई जी.टी.वी. अस्पताल है वहां उसे भेजा गया , वहीं उस की मौत हो गई। मौत तो उस की शनिवार को ही हो गई थी , यहां बैरक में आज तीन दिन बाद बताया गया है कि शांति बनी रहे। मरने के बाद भी उस के सारे पते ठिकानों पर ख़बर की गई। लेकिन सब ने कह दिया हम शबीना को नहीं जानते। तो आज जो एन.जी.ओ. लावारिस लाशों का दाह संस्कार करते हैं उन्हें बुला कर लिखा पढ़ी में लाश दे दी गई। और उस की कोर्ट को सूचना दे दी गई। बैरक में वो सब से ज़्यादा रिया के करीब थी तो रिया को बुला कर उस का फट्टा हटाने को बोल दिया गया। उस ने भी फट्टा बाहर हटा कर उस का सारा सामान बांट दिया। इस तरह से शबीना का प्रकरण ख़त्म हुआ। उस की मौत पर दो आंसू बहाने वाला भी कोई नहीं मिला , इतनी ख़राब मौत मिली उसे। हां , सारी मुसलमान औरतों ने इकट्ठा हो कर उसका फातिहा ज़रुर पढ़ लिया। कम से कम कुछ तो हुआ उस के नाम से। इतनी ख़राब मौत। पचास पचपन की उम्र में कोई मरे और उस के पास कोई एक इंसान भी ऐसा न हो जिसे उस के मरने का दुख हो। हे प्रभु ज़िंदगी की और कितनी कड़वी सच्चाइयों से सामना कराओगे।


कल यहां पर एक और मां बेटी आईं कांता और संभावना शर्मा। पहले तो यही समझे कि दहेज में आई हैं फिर पता चला कि नहीं हत्या में आई है। पति के दोस्त की हत्या हो गई है उस के घर वालों ने इनके पूरे घर का नाम लिखा दिया है। आज उन्हें थाने रिमांड पर भी ले गए थे। दोनों बहुत डरी हुई थीं कि पता नहीं थाने में क्या होगा। तो उन्हें समझाया गया कि आप जेल से जा रही हैं कोई आप को छू भी नहीं सकता है। जेल प्रशासन की पूरी जिम्मेदारी है। तो शाम को जब लौटीं तो बातचीत में पता चला कि पति का ट्रेडिंग  का बिजनेस है। जिस दोस्त के साथ काम करते थे उस का फ़ोन आया कि जी अभी ज़रुरत नहीं है जब ज़रुरत होगी हम खुद ही माल लाने को कह देंगे। उस के बाद उन का मर्डर हो गया। लॉस्ट काल इन्हीं की थी और उन के घर वालों ने बयान भी दिया कि जो इन से उनके अवैध संबंध थे इसी लिए इन लोगों ने उन की हत्या करा दी। और जिस फ़ोन पर लास्ट काल अटेंड की गई उस का सिम बेटी के नाम है। इसी लिए बेटी भी अंदर आ गई। और वकीलों ने ऐसा बेवकूफ बनाया हुआ है कि देख कर तरस ही आ रहा है।


आज शगुफ़्ता मुझ से पूछ रही थी कि दीदी सुप्रीम कोर्ट में डालें तो क्या मेरी बेल हो जाएगी ? मैं ने पूछा केस क्या है तो पता चला कि ये चार बच्चों की मां अपने सारे गहने जेवर और नकदी ले कर सात बच्चों के बाप के साथ उस के घर रहने चली आई। उस की बीवी बच्चों के साथ। इस के आदमी ने दो एक बार उस से लौटने की बात भी की लेकिन ये नहीं मानी। दूसरे वाली की बीवी चाय में सल्फास घोल कर पी कर मर गई। मरने से पहले बयान दिया कि शगुफ़्ता ने जहर दिया। यही बयान उस के बच्चों ने भी दिया। फंसा तो वो आदमी भी। ये दोनों जेल आ गए। लेकिन 302 सिर्फ़ इसी पर लगी। उस आदमी पर नहीं। शगुफ़्ता ने अपने पहले आदमी को मुलाक़ात पर बुलवाया कि मुझे यहां से निकालो। इस बात से दूसरा वाला नाराज हो गया। उस की बेल भी जल्दी हो गई। क्यों कि 302 तो था नहीं उस पर। वो निकलने के बाद इस की मुलाक़ात पर आया और बोला पहले को छोड़ आई थी तो वो तो तुझे निकालेगा नहीं। और मेरे जेल में रहते हुए तूने पहले वाले को मिलने के लिए बुलाया इस लिए मैं भी तुझे नहीं निकालूंगा। अब तू यहीं सड़ और जेल से निकलने के पंद्रह दिन के अंदर तीसरी शादी कर ली। पहला वाला कितनी भाग दौड़ करता इस की बेल हाईकोर्ट से भी कैंसिल हो गई। चश्मदीद गवाह होने के कारण। सब सुनने के बाद हम ने तो यही कहा कि फास्ट ट्रैक पर लगवा लो केस और जल्दी केस ख़त्म कर सज़ाके बाद हाईकोर्ट से ज़मानतलो। बस यही एक तरीका है बाक़ीतुम्हारी मर्जी। सुप्रीम कोर्ट जाने से सिर्फ़ पैसे की बरबादी ही होगी। जब चश्मदीद गवाह है तो ज़मानतकोई भी नहीं देगा।


जेल में रह कर मेरा गाना ख़ूब निखर गया है। हमें तो लगता था कि बस काम चलाऊ है। लेकिन यहां तो सब फरमाइश कर-कर के गाना सुनते रहते हैं। और कोई मनोरंजन तो है नहीं तो सब हम से ही फरमाइश करते हैं।  आजकल टी.वी. भी ख़राब है। तो बैरक बंद होने के बाद शाम को भी काफी समय रहता है । अब तो ड्यूटी वाली भी फरमाइश करती रहती हैं और हम गाते रहते हैं। गाना गाने से तो हम कभी थकते नही। चाहे जितने गवा लो। लेकिन इस समय पर हमें यशवंत सिंह का ध्यान आ जाता है । उन्होंने जाने मन जेल जो कि डासना पर ही लिखी गई है , उस में लिखा है कि अकसर बंदी घेर कर बैठ जाते थे कि गाना सुनाओ और मैं शुरू हो जाता था। और एक साथ तीन चार गाने तो सुना ही देता था। वही हाल मेरा भी है। अच्छा ही है कुछ समय इस तरह भी कट जाता है।


आज एक उर्मिला नाम की महिला आई है , उस का पति शराबी था। घर , गहने सब दारू के लिए बेच आया था। कल रात में जब शराब पी कर घर लौटा तो नशे में अपनी बेटी के साथ ही बदतमीजी करने लगा। चौदह पंद्रह साल की लड़की बेचारी चिल्लाए जा रही थी , इस से नहीं बर्दाश्त हुआ तो गुस्से में आ कर इस ने अपने पति का गला दबा कर हत्या कर दी और खुद ही ये बात सब को बता रही कि हां , मैं ने ही मारा है उसे। मैं ने पहली बार कोई ऐसी महिला देखी जो खुद कबूल रही कि हां मैं ने हत्या की है।


क्या है जिदंगी। थोड़ी देर बैरक से निकल कर बाहर जाने पर थोड़ा मन बहल जाता है। इंसान फ्रेश हो जाता है इस लिए जाने कितने एप्रोच लगा कर तो चांदनी ने सेटिंग की और सुपरिटेंडेंट आफिस में जा कर बैठने लगी। थोड़ा-बहुत अधीक्षक का इंग्लिश क्रास्पॉडेंस देखती है और उन के पर्सनल ई-मेल वगैरह का जवाब देती है। बच्चों के छोटे-छोटे काम जैसे प्रोजेक्ट बनाना , फार्म भरना आदि। और उन के नाश्ते पानी का भी ध्यान रखती है कि बनाता तो लंबरदार ही है बस ये गाइड करती है। चूंकि अधीक्षक डायबेटिक हैं इस लिए और ध्यान देना होता है। आज उन्होंने सूप बनवाया था। इस ने लंबरदार को गाइड कर दिया और वो बना कर दे आया। अधीक्षक ने चांदनी को अंदर बुलाया। जेलर भी अंदर ही बैठे थे। अधीक्षक बोले ये सूप है , पी कर देखिए जरा। अपना जूठा सूप चांदनी को पीने के लिए बोल रहे थे। अब ये क्या करती। चुप खड़ी थी फिर गुस्से में उन्हों ने सूप हटा दिया। जेलर चुपचाप सब देखते रहे। चांदनी को बहुत बेइज्जती लगी। आ कर सब बता रही थी। बहुत दुखी थी कि ये दिन आ गए हैं कि अब इन का जूठा सूप हम चखें। अब इस पर हम क्या समझाते ? बस इतना ही कहा कोई नहीं तुम ने तो झेल लिया अब राकेश से शेयर मत करना नहीं तो उन्हें अपनी बेबसी का एहसास और ज़्यादा होगा। और डेढ़ साल से जेल काट रहे हो दोनों लोग दिन पर दिन सब्र कम ही होता जाता है। और अपने ऊपर बीते तो इंसान झेल लेता है। अपनों के साथ नहीं देखा जाता। तकलीफ और बढ़ जाती है। तुम ने तो हमसे कह लिया मन थोड़ा हल्का हो गया। आदमी तो ये भी नहीं कर पाते। तो उसे मेरी बात समझ आई कि हां , ठीक है। उन से शेयर कर के क्या फायदा। अब तो जो होना था हो ही गया। उन्हें भी तकलीफ में क्यों डालूं। किस-किस तरह से अपने मन को समझा कर जेल काटनी पड़ती है।


इंसान की ज़िंदगी में अच्छा खाना ही एक उद्देश्य रहता है क्या ? भंडारा , भंडारा , भंडारा। परेशान हो गए हम तो इस की राजनीति से और हमारा फट्टा ही बैरक के शुरू में है। सारी पंचायत हमारे ही अड़गड़े पर होती है। न चाहते हुए भी। सब कान में जाता है और बहुत कोफ़्त होती है। कितनी ताक़त और दिमाग है यहां सब के पास। बस हम क्या खा रहे हैं इस से कोई मतलब नहीं है। लेकिन अगला क्या खा रहा है सारी सिरदर्दी इसी बात की है। भंडारे की मेन हेड वनिता मेरठ गई हुई है इम्तहान देने। बाक़ीभंडारे में जो महिलाएं हैं वो सब सीधी सादी हैं। तो इस से पहले जो ग्रुप लगा था भंडारे में वो वापस भंडारा पाने के लिए खाने की शिकायत करने लगे। जेलर दोनों समय आ कर खाना चखने लगे। खाने की क्वालिटी अच्छी थी और वाकई ये हम ही नहीं सभी महिलाएं कह रही हैं [ उस ग्रुप को छोड़ कर ] कि खाना अच्छा बन रहा है। मित्रा दी तो कह रही थीं  कि आठ महीने में अब हम भंडारे का खाना खाने लगे हैं। दाल , सब्जी , चावल सब। रोटी तो खैर हमेशा कामवाली ही बना कर लाती है तो अच्छी ही होती है। बल्कि रमेश तो कह रहे थे कि महिला बैरक में तो पूरे जेल में सब से अच्छी रोटी बनती है। तो जेलर भी संतुष्ट थे। तो इन लोगों ने अब अधीक्षक को लिखित शिकायत देनी शुरू कर दी। दो एक ड्यूटी वाली भी इस में शामिल हैं जिन्हें दाल , चावल आदि कच्चा राशन घर ले जाने को नहीं मिल रहा है। अधीक्षक ने बुला कर जेलर को डांटा कि एक महिला बैरक आप से नहीं संभल रही। अब वो गुस्से में आए और सब का चाय दूध बंद कर दिया कि अलग से कुछ नहीं मिलेगा। सिर्फ़ भंडारे का खाना खाओ। नहीं तो एक दो चूल्हे वाली गैस जिस पर दोनों टाइम रोटी सिंकती है। बाक़ीसमय उस पर सब की चाय बनती रहती है या दूध गर्म होते रहते हैं। अब एक-एक बैरक की चाय मतलब साठ महिलाओं की चाय एक साथ बनती है और एक बड़े भगोने में पानी खौला कर सब की दूध की थैलियां डाल दी जाती हैं और दो मिनट गरम कर के निकाल दी जाती हैं। अब चलिए इस में संघर्ष करिए। हमारी काम वाली तो भंडारे में ही लगी है लेकिन फिर भी हमारा चाय दूध सरकारी तरीके से हो रहा है। इतनी आफत है। शाम को जेलर के आने पर हमने और मित्रा दी दोनों ने बात की तो वो अपना ही रोना रो रहे थे कि क्या करूं अधीक्षक को सीधे शिकायत की जा रही है तो कुछ एक्शन तो लेना ही पड़ेगा। मित्रा दी कह रही थी ज़्यादा दिन रह जाओ तो ये सब दिक्कतें बढ़ जाती हैं । चलिए कोई बात नहीं जैसी प्रभु की इच्छा।


आज गुलबहार को भी आजीवन कारावास की सज़ापड़ गई। इस का हापुड़ का केस था। इस का पति जल कर मरा था और मरते-मरते बयान दे गया था कि इस ने ही मुझे जलाया है। जब कि ये भी जली थी और इस का पैर भी टूटा था। लेकिन ये जेल आ गई। इस के पांच बच्चे हैं। तीन लड़के और दो लड़कियां। चार बच्चे तो इस के पापा के पास हैं और एक बच्चा दो महीने का ले कर ये आई थी। दो साल पहले। इस के केस की पैरवी भी इस के पापा ही कर रहे थे। लेकिन कल सज़ापड़ ही गई। शाम को ये बाहर से जोर-जोर से रोती हुई आई और यहीं फर्श पर लोट गई। डाक्टर ने आ कर नींद का इंजेक्शन दे दिया। बस काम ख़त्म । कल से फिर सब की अपनी दिनचर्या शुरू हो जाएगी। लेकिन किसी एक की तो ज़िंदगी ही बरबाद हो गई। अब इस छोटे से बच्चे का भविष्य क्या होगा ? दो साल का बच्चा रोये ही जा रहा है उसे क्या समझ कि क्या हो गया है। वो तो बस उस की मां रो ही है इस लिए रोये चला जा रहा है। इन बच्चों की ज़िंदगी अपने मां बाप के कर्मों की वजह से बरबाद हो गई है।


लोग भूल जाते हैं


डासना जेल, गाज़ियाबाद
2 फरवरी, 2016

जब से हमारी बेल हुई है हम अपने आप को इस जेल से अलग कर के देख पा रहे हैं। शायद इसी लिए ज़्यादा लिख ले रहे हैं नहीं तो हिम्मत ही नहीं होती थी। हमें समझ ही नहीं आता कि ज़िंदगी मुझे क्या सिखाना चाह रही है। घुमा-घुमा के वहीं ला कर खड़ा कर देती है। कोल्हू का बैल हो गए हैं हम। तो चाहे जो भी जतन कर लें फिर वहीं पहुंच जाते हैं। लोग अपनी ज़िंदगी में जेल के नाम से डरते हैं और यहां हम डासना जेल का तीसरा चक्कर लगा रहे। और किसी बार भी दिल ने काम करना बंद नहीं किया। कितना बेशर्म है ये। अभी तीन महीने पहले जब ये साफ हो गया कि फिर जेल जाना ही पड़ेगा तो रातों की नींद उड़ गई। वहीं के सपने भी आने लगे। अब वो कोई अनजानी जगह तो रह नहीं गई उस का पॉजिटिव निगेटिव सब पता है , भयावहता मेरे सामने है। अनजाने में तो आप मुसीबत का सामना कर सकते हैं। लेकिन जब सब पता हो तो कौन जानबूझ कर कुएं में कूदता है ? बहुत सोचा। हर तरह से मन को समझाया। कभी-कभी तो आत्महत्या का भी मन किया। लेकिन फिर तुरंत ही संभल गए कि इतने बहादुर नहीं है कि अपनी ज़िंदगी दे दें। हम तो बेशर्म हैं जिसे हर हाल में अपनी ज़िंदगी प्यारी है। अपने परिवार का साथ चाहिए तो वह भला क्या आत्म हत्या कर पाएगा। तो आज हमने गाजियाबाद कचहरी में एक बार फिर से आत्म समर्पण कर दिया।


कचहरी पहुंचते ही मन आश्चर्यजनक रूप से शांत हो गया। हालांकि वकील कह रहे थे कि अंतरिम ज़मानतमिल जाएगी। लेकिन हम इस के लिए बिलकुल भी परेशान नहीं थे। मन ने समझ लिया था कि अब तो डासना की रोटी लिखी है।


कचहरी और जेल के बीच में जो कचहरी के हवालात का समय होता है वह बहुत भारी होता है। एक छोटे से जेल जैसे कमरे में 10-15 औरतें जो जेल से कचहरी तारीख़लगाने आती हैं बैठती हैं फर्श पर। उस हवालात के एक कोने में शौचालय भी होता है जिस की बदबू पूरे हवालात में फैली होती है। वहीं आप को एहसास होता है कि आप बंदी हैं। आज मोहिनी की भी तारीख़थी तो वो हवालात में ही मिल गई। हवालात से जेल तक उस ने बड़ा मानसिक संबल दिया। उस की हालत और भी ख़राब हो रही है। मुझे तो 2013 की मोहिनी याद आ रही थी कि कितना ख़ुश नुमा चेहरा था उस का और कहां फरवरी ,  2016 की मोहिनी। तीन साल में जेल ने उस की पूरी रौनक ही छीन ली है। तीन साल का समय कम नहीं होता।

कमला पुलिस वाली मेरी तलाशी ले कर महिला बैरक तक पहुंचाने के लिए आई और आते ही बोली , लो तुम्हारा मन नहीं लगा बाहर। छह महीने में फिर यहीं आ गई। अब उस से कौन कहता कि जेल इंसान अपनी मर्जी से नहीं आता-जाता। मैं ने चुप रहना ही बेहतर समझा।


रमेश एक दिन पहले ही चांदनी को बता चुके थे कि हम आने वाले हैं तो पूरी महिला बैरक वेलकम के लिए तैयार खड़ी थी। मायावती सब से पहले आ के गले मिली कि तुम मेरे पास ही रहोगी। मेरी तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करें तो चुपचाप बरामदे में ही बैठ गए। और रजिस्टर में इंट्री करने लगे। मायावती ने मेरा सामान ले कर अपने फट्टे पर रख लिया। जिन के साथ मैं पिछली बार छह महीने साथ रही थी उन से कोई लड़ाई तो हुई नहीं थी लेकिन उन में से कोई वेलकम को आगे भी नहीं बढ़ा तो समझ ही नहीं आ रहा था। खैर मायावती के फट्टे पर शाल रख कर मैं वाशरूम की तरफ बढ़ी तो मोहिनी वाशरूम से आ रही थी उस ने धीमे से कहा आंटी आप की चाय रखी है। बस तभी फ़ैसलाहो गया कि मुझे पुरानी जगह ही रहना है। फिर सब से मिल के बात कर के थोड़ा ठीक लगा। सब की मिली जुली फीलिंग थी। मुझे अपने बीच पा कर ख़ुश भी हो रहे थे और दुखी भी कि आप को फिर इन्हीं चारदीवारी के बीच आना पड़ा। रिया जो कि 2013 के अप्रैल से वहां है , ने हंस कर कह दिया कि आंटी तो तीसरी बार आ गईं और हम एक बार भी बाहर नहीं जा पाए। उम्मीद है इस बार हफ़्ते दस दिन में हम वापस चले जाएंगे। तो हर चीज़को देखने का अलग नजरिया हो गया है। सोचिए जेल भी मुझे ख़ूबसूरत लग रही थी। सुकीर्ति जो कि ए.जी.एम. पंजाब नेशनल बैंक है और घोटाले में आई है उस की बेटी महेंद्रा टेक में नौकरी करती है। उस के आफिस ने सोशल वर्क के तहत महिला बैरक में वृक्षारोपण कराया है तो पेड़ पौधों , फूलों के बीच में बैरक सुंदर लग रही थी और पॉजिटिव भी।


किरन बेदी की एन.जी.ओ. इंडिया विजन जो कि जेल की महिला बैरक के लिए काम करती है। पिछली बार मैं जब यहां थी तभी इन्हों ने काम शुरू किया था। लेकिन इस बार 8 महीने बाद जब यहां पहुंचे तो उन का काम, मेहनत दिख रही थी।


आज सुबह मुस्कान को झाड़ू लगाते देख बड़ी तकलीफ हुई। जब हम पहली बार सितंबर , 2013 में आए थे , तब भी मुस्कान यहीं थी। उस की भाभी जल कर मर गई थी। पूरा परिवार दहेज हत्या में अंदर था। जब हम आए थे उस से पहले ही इन सब की ज़मानतहो गई थी। लेकिन जमानतियों का इंतजाम न होने की वजह से सब अंदर ही थे। इस बार पता चला कि धीमे-धीमे सभी बाहर जा चुके हैं बस यही बची हैं। दो चार महीने में शायद इस का नंबर भी आ जाए। जब आई तो गर्भवती थी अब तो उस का बेटा भी तीन साल का हो गया है। इसी तरह अफसाना भी तभी से अंदर है। उस के घर वाले जमानती ही नहीं भर रहे। औरतों की कितनी दुर्दशा है। घर में रहती हैं तो लगता है घर की धुरी हैं। इन के बिना एक सेकेंड भी घर नहीं चल सकता। और इतने सालों से अंदर है तो इन को सब भूल गए। अपनी अपनी दुनिया में मस्त है सब। कोई मिलने भी नहीं आता है कि जैसे ये कभी उन के परिवार का हिस्सा थी ही नहीं।

आज एक महिला कमलेश सज़ामें आई। उसे चार साल की सज़ाहुई है। वो एक स्कूल में टीचर है। तीन साल पहले उस की गाड़ी से एक एक्सीडेंट हो गया था। जिस गाड़ी से एक्सीडेंट हुआ था उस का ड्राइवर इस से झगड़ा कर रहा था। गाली गलौज पर उतारू हो गया था। इस ने फ़ोन कर के अपने लड़के को बुला लिया। इस का लड़का आया तो उस ने गुस्से में ड्राइवर पर गोली चला दी। ड्राइवर एट द स्पॉट मर गया। मां बेटे दोनों जेल आ गए। इसे तो ज़मानतमिल गई पर लड़के को नहीं मिली। और आज इसे चार साल की और लड़के को आजीवन कारावास की सज़ाहुई। अब ग़लती किस की कहें। कमलेश की कि उस ने लड़के को बुला लिया। कि बाप की जिसने ये जानते हुए भी कि लड़का गुस्से का इतना तेज है उसे रिवाल्वर दिलाई। या लड़के को कि वो अपनी मां को गाली नहीं सुन सका और गोली चला दी। अब ग़लती चाहे जिस की हो उस लड़के का भविष्य तो चौपट ही हो गया। तीन साल से जेल में है और अभी पता नहीं कितना समय और रहना पड़ेगा। और क्या कमलेश अपने आप को कभी माफ कर सकेगी कि उस की एक नादानी से उस के लड़के की ज़िंदगी ही ख़राब हो गई।

इस बार जाने पर पता चला कि रमा जो वंदना का काम करती थी। और चंदा जो मेरा काम करती थी दोनों को आजीवन कारावास हो गया है। चंदा से मिलने तो उस के घर वाले आते ही रहते हैं। उस के बच्चे भी हैं। पर रमा वो बेचारी तो पति हत्या में है। बच्चा भी नहीं है उस का। ससुराल में कोई नहीं पूछता। चार साल से बेचारी अंदर है। जब अभी तक किसी ने नहीं पूछा तो अब सज़ाहोने के बाद कौन भला पूछेगा। हां उस की सास आई थी सज़ाहोने के बाद। और सहानुभूति दिखाते हुए बोली कि अपने हिस्से का खेत देवर के नाम लिख दो। चार साल से जेल में रह कर रमा भी होशियार हो गई है। बोली बाहर निकलवा दो , फिर लिख देंगे। सास अपना सा मुंह ले कर चली गई। लेकिन ये तो लगता ही है कि कैसे इन लोगों की ज़िंदगी पार होगी।


पिछली बार मेरे जाने के बाद एक किन्नर आई फरजीन और अभी तक है। किस केस में आई है ये तो नहीं पता लेकिन यहां आते ही उस ने अपना माया जाल फैलाया और एक कलश रख कर पूजा पाठ करना शुरू कर दिया , एक तनहाई ले कर। वहां अखंड ज्योति भी जलती रहती थी और उसे मुर्गे वाली माता का नाम दिया कि इन की पूजा सच्चे मन से करो तो ज़मानतहो जाएगी। कुछ दिन माहौल बनवाने के बाद लोगों से पैसे लेने शुरू किए कि अजमेर शरीफ पर चादर चढ़ाई जाएगी और आप की ज़मानतहो जाएगी। दो एक लोगों की ज़मानतहो भी गई और उस का पब्लिक रिलेशन संभाला अंजना ने। घूम-घूम के सब को कनविंस किया। अच्छा जिस की भी बेल होती थी वो जाते समय मां के चरणों में सौ पचास चढ़ा देता था। कि भगवान दुबारा न आना पड़ा तो उस को अंजना सब के बीच में कहती थी कि इस ने पांच हजार दिए थे तो देखो इस का काम हो गया। जिन लोगों को जेल में साल दो साल हो चुके थे सब ने परेशान हो कर उसे पैसे दिए कि शायद इसी से ही ज़मानतहो जाए। कहते हैं न कि इंसान परेशान हो तो कहीं भी ऊंचे पत्थर को भगवान समझ कर मत्था झुका देता है। तो चांदनी , सुकीर्ति , नीता सब ने दस-दस हजार रुपए उसे दिए चादर चढ़वाने के लिए। ये तो बताया गया और बाक़ीजो मूर्ख बने बताया नहीं किसी ने। फरजीन अपनी ज़मानततक तो करा नहीं पाई। आज भी अंदर ही है। और अब वहां मुर्गे वाली माता पर धूल जमीं रहती है कोई देखने वाला भी नहीं है। और अंजना के जाने के बाद फरजीन ने बताया कि आधा पैसा तो अंजना ले गई। सच है कमजोर क्षणों में अक्लमंद से अक्लमंद इंसान ऐसे ही मूर्ख बन जाता है।
नीता को डेढ़ साल हो गया है। पैरवी करने के लिए पति बाहर है पैसे की कोई कमी नहीं है फिर भी ज़मानतनहीं हो पा रही। और ऐसा कोई हत्या का केस भी नहीं है। प्लाट बेचने में गड़बड़ हुई है। स्थानीय अदालत के स्तर का काम है और सारी ज़मानतयहीं से हो भी रही हैं। बस एक यहां से खारिज हो कर इलाहाबाद हाईकोर्ट चली गई। और हाईकोर्ट में तो जो लिस्टिंग में फंस गई उस का नंबर ही नहीं आता। सुकीर्ति जो बैंक के ऋण घोटाले में है उस ने अगस्त में हाईकोर्ट में ज़मानतलगाई थी , अब 19 फरवरी की तारीख़मिली है। देखें क्या होता है ? आठ महीना हो गया है उसे भी यहां आए हुए। उस की तो बेटी की शादी भी हो गई और वो अंदर ही थी। पेरोल तक नहीं मिल पाई। इन सब कष्टों की भला कोई भरपाई है ? कोई नहीं।



इस बार मुझे चांदनी में बहुत अंतर दिख रहा है। जब हम पहली बार आए थे तभी उसे सज़ाहुई थी और वो अंदर आई थी। तब की चांदनी और आज की चांदनी में बहुत अंतर है। शारीरिक परेशानियां तो अपनी जगह हैं लेकिन मानसिक रूप से भी वह कमजोर होती जा रही है। संवेदनशीलता हद से ज़्यादा बढ़ गई है। नकारात्मक सोच भी बढ़ रही है। कहीं भी कोई दो लोग छुप कर बात करें तो उसे लगता है मूल में वही है। हर छोटी-छोटी बात पर चिंतित हो जाती है। छोड़ो जाने दो। पहले वाला व्यवहार तो ख़त्म ही हो गया है। सही भी है इतना समय जेल में काटने पर तो अच्छे-अच्छे टूट जाते हैं। और उस का तो बाहर भी कोई नहीं। मां-बाप भी इतने बूढ़े हो चुके हैं। कह रही थी कि मेरे अंदर रहते भगवान इतना बुरा न करें कि उन के न रहने की ख़बर भी मुझे यहां मिले। तो मुझे रमेश का याद आ गया। उन के पिता जी ख़त्म हुए तो वो अंदर थे। ज़मानतहो चुकी थी लेकिन परवाना नहीं आ पाया, नहीं तो वो पैरोल के लिए ही भाग दौड़ करते। खैर बाद में तो वो ज़मानतभी कैंसिल हो गई थी। तो जिस दिन उन के पिता जी का दसवां था तो मिस्टर सिंह और विनय के साथ जा कर नाऊ से दाढ़ी बाल बनवा लिए। इन्होंने बताया कि हम दोनों चुपचाप साथ में खड़े थे। जब हमें सुन कर ही इतना बुरा लग रहा था तो इंसान जिस के पिता जी ख़त्म हो गए हों और वो घर वालों से दूर अकेले कैद में दसवें पर अपना बाल बनवा रहा हो तो उसे कैसा लग रहा होगा ? लेकिन इसी का नाम ज़िंदगी है। इन हादसों को मिला कर ही ज़िंदगी बनती है। ये खट्टे मीठे अनुभव हैं।


बैंक के घोटाले में एक साथ जो 15 महिलाएं आई थीं उन्हीं में एक वनिता भी थी जिस की 6 महीने की प्रिगनेंसी थी। इस बार गए तो उस की 5 महीने की लड़की थी। उस का जन्म भी जेल में ही लिखा था। उस का पति भी यहीं जेल में है और हर शनिवार को आधा घंटा ही अपनी बच्ची से मिल पाता है। ये उस की क़िस्मत है कि अपनी बच्ची को बढ़ते हुए भी नहीं देख पा रहा। लेकिन उस की वो बच्ची जेल में तनाव कम करने का काम भी करती है। बच्चों के साथ थोड़ी देर खेल लो उन से बातें कर लो तो मन हल्का हो जाता है। लेकिन उस बच्ची का बचपन तो अपने परिवार से दूर यहीं जेल में बीता जा रहा है।


उन्हीं लोगों में से एक बूढ़ी औरत भी थी रोजी जो कि चल भी नहीं पाती थी। उस के हाथ पैर को लकवा मार गया था। लेकिन उस की बेटी भी उसी केस में साथ थी जेल में। चेतना। वही उन का ध्यान रखती थी। इस बीच में वो इतनी बीमार पड़ी कि अस्पताल में ही मर गई। उन की बेटी भी उन के साथ अस्पताल में नहीं रह पाई। इतने कड़े नियम क़ानून हैं पुलिस वाली ही साथ में थी। उस के घर वालों को बुला कर उस की बॉडी सौंप दी गई। चेतना अपनी मां के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकी। इन सब बातों पर कोई किसी को भला क्या कह कर दिलासा दिलाए ? ये कुछ बातें हैं जो इंसान के बस में हैं फिर भी अपना कोई जोर नहीं। और इंसान बेबसी से देखता रहता है। अब हर कोई संजय दत्त तो नहीं हो सकता।


पिछली बार जब हम रिहा हुए थे तो जो पुलिस वाली हम को छोड़ने बाहर तक आई थी , नैना। पता चला उन का देहांत हो गया है। किडनी फेल हो गई थी। ऊपर से कड़क और अंदर से नर्म मिजाज थी। पहली बार जब हमें हाथ की राड निकलवाने अस्पताल जाना था तो दोनों बार वही मेरे साथ गई थी। बहुत ध्यान रखा था मेरा। अचानक से एक दिन बुखार आया जब टेस्ट हुए सारे तो किडनी की प्राब्लम निकली और डेढ़ महीने में ख़त्म हो गई। जब उन्हों ने मुझे अच्छे से जेल के बाहर बाय किया था तो क्या जानते थे कि ये आखिरी मुलाक़ात है हम लोगों की। अब वो सिर्फ़ दिलों में जिंदा रहेगी।


आज मेरी बेल हो गई। साथ में मिनिस्टर साहब और रमेश सिंह की भी हो गई। आखिरकार कल ये लोग भी जेल से चले जाएंगे। इतने दिन में हम तीसरी बार जेल से जाएंगे। और ये लोग पहली बार निकल पाएंगे। समय-समय की बात है। यही रमेश हैं कि दो बार सुप्रीम कोर्ट से लौट आए और बेल नहीं मिली और आज समय ठीक हुआ तो इसी निचली अदालत से बिना किसी शोर शराबे के, बिना ज़्यादा पैसा खर्च किए चुपचाप बाहर चले जाएंगे। समय बदलना इसे ही कहते हैं। हमें अभी पता नहीं कितनी बार आना जाना है। ये लोग देर से ही पर निश्चिंत हो कर निकले हैं कि बस हो गया। अब यहां नहीं आना है। हम तो ये भी नहीं कह सकते। हर बार निकलने पर धुकधुकी बनी रहती है कि पता नहीं कहीं फिर न आना पड़ जाए।


यहां पर एक कैदी है अब्दुल , आजीवन कारावास में है वो। उसे मेडिकल की थोड़ी बहुत जानकारी थी बाक़ीयहां रह कर उसने धीमे-धीमे सब सीख लिया और कंपाउडर बन गया। अब तो खैर वो डाक्टर से भी बड़ा हो गया है। महिला बैरक का अस्पताल तो वही संभालता है। एक अकेला वही बंदा ऐसा है जो बिना रोक टोक के महिला बैरक आ जा सकता है। बीमार महिलाओं और बच्चे वाली महिला को प्रशासन की तरफ से आधा लीटर दूध की थैली मिलती है और बीमार लोगों को अंडा ब्रेड और फल भी मिलता है। तो जिस पर अब्दुल की नजरें इनायत होती हैं उसे ये सारी चीजें मिलने लगती हैं। जब भी कोई महिला आती है तो पहले ही दिन उस का मुआयना होता है कि कोई बीमारी तो नहीं है। वजन और हाइट नापा जाता है। और ये काम अब्दुल ही करता है। और अगर आने वाली कोई कम उम्र की लड़की हो या सुंदर महिला तो अब्दुल उस के प्रति कोमल व्यवहार शुरू कर देते हैं। और फिर धीरे-धीरे शीशे में उतार कर प्रेम पत्र की शुरुआत करते हैं।

अब ये लड़की के ऊपर है कि प्रेम पत्र का जवाब आता है या लड़की चुप रह जाती है। और अगर सारे खाने सही बैठ गए तो अस्पताल के कमरे में सन्नाटे में थोड़ा बहुत शारीरिक सुख भी पा जाता है। कुछ दिनों बाद लड़की की ज़मानतहो जाती है। क्योंकि वो हवालाती होती है तो चली जाती है और ये तो आजीवन कारावास में है तो आने वाली अगली लड़की पर शुरू हो जाते हैं। ज़्यादातर मुसलमान लड़कियां ही पटाता है। जैसे ही हर दस दिन पर नए सिरे से दूध बंधता है तो जो पुराने लोग अब्दुल के किस्से जानते हैं पहले ही रजिस्टर चेक कर लेते हैं कि किस नई का दूध बंधा। मतलब अब अब्दुल इस को लाइन दे रहा।


कितनी बार उस की शिकायत हो चुकी , लिखित शिकायतें भी जा चुकीं। कुछ दिन के लिए अब्दुल का महिला बैरक आना बंद हो जाता है। लेकिन फिर नए सिरे से शुरू हो जाता है। महिला बैरक तो उस के बिना चलती ही नहीं। जबकि प्राविधान ये है कि आजीवन कारावास वाले पुरुष कैदियों को आगरा की सेंट्रल जेल में रखा जाता है और महिलाओं को लखनऊ जेल में। हर बार जब उस के जाने का हल्ला होता है तो कोई न कोई जुगाड़ लगा कर रुकवा लेता है। इतना आराम और किसी जेल में कहां मिलेगा ? बैरक में नहीं रहना पड़ता। अस्पताल में रहता है। फ़ोन नेट सब इस्तेमाल करता है। जब चाहे पूरी जेल में घूम सकता है। और अस्पताल में तो वो बड़े-बड़े लोग पैसे दे कर रहते हैं जो बैरक में नहीं रहना चाहते तो खाने पीने हर चीज़का सुख बिना पैसे दिए मिल रहा है उसे। तो वो भला कहीं और क्या जाएगा ? सारे सुख संसाधन तो उसे यहीं उपलब्ध हैं। लेकिन लड़कियों का इन जरा-ज़रा सी चीजों पर छूट देना और फायदा लेना , सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए कुछ भी कर जाना देख कर कोफ़्त होती है।


पिछली बार जब हम आए थे तो एक नई पुलिस वाली विनीता मऊ से ट्रांसफर हो कर डासना आई थी। बाक़ीपुलिसवालियां उसे अपने साथ एडजस्ट ही नहीं करती थीं , कि नंबर दो की कमाई में हिस्सा बंट जाएगा। खैर धीरे-धीरे वो यहां एडजस्ट हो गई। उस का पति नोएडा में एक प्राइवेट फर्म में काम करता था। पति पत्नी की आपस में बनती नहीं थी। पति बेटा ले कर आ गया था। यहीं उस का स्कूल में नाम भी लिखा दिया था। मजबूरी में विनीता को भी यहीं आना पड़ा। एक दिन उस का पति से झगड़ा हुआ। पति ने उसे गड़ासे से मारा। और इतनी बुरी तरह मारा कि अपनी तरफ से उ