समीक्षा

1. गंधाती, बजबजाती पत्रकारिता को आईना

2. रंग बिरंगे साँप हमारी दिल्ली में, क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में

3. किन्नर समाज की पुरज़ोर पैरवी और शिनाख्त

4. अमरीका की धरती पर भारतीयता की खुशबू में लिपटी कहानियां

5. सहजता का स्पेस

6. कहां जा रही है ददरी मेले वाली लोक संस्कृति?

7. आज की स्त्री की जिजीविषा - अपने लिए अपनों के खिलाफ

8. विद्रोह की दस्तक

9. कभी न समाप्त होने वाले प्रश्नों की पीड़ा 

10. पूर्वांचल के एक लोकप्रिय गायक की जीवन की स्थितियों के समानांतर रची गई दुनिया

11. दूधनाथ के निष्कासन और अखिलेश के ग्रहण के बहाने दलित विमर्श पर कुछ सवाल

12. स्त्री स्वतंत्रता और उस की अस्मिता को सही संदर्भों और अर्थों में पहचानने की एक सशक्त कोशिश

13. पूर्वांचल की नई स्त्री को व्यक्तित्व देती कथा : ‘बांसगांव की मुनमुन’

14. ये हारकर भी जीते हुए लोग हैं

15. ‘अपने-अपने युद्ध’ और पत्रकारों की बिरादरी

16. सेक्स, प्यार और मोरालिटी

17. ''कचहरी तो बेवा का तन देखती है''

18. दयानंद जी के हारमोनियम के सूर्य प्रताप कौन हैं?

19. अनिल यादव, अब ऐतराज भी सुनिए

20. जहां लोकतंत्र दम तोड़ देता है वहां...

21. कु-व्यवस्था तंत्र में फंसे आदमी की छटपटाहट

22. बर्फ होती मुश्किलों में धूप

23. छीजती मानवीय संवदेना को सहेजती ‘मुनमुन’

24. अपने-अपने युद्ध: विसंगतियों का दस्तावेज़

25. स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरती दयानंद पांडेय की कहानियाँ 


26. यह उपन्यास पुरुष-प्रधान समाज को एक धक्का है

 

 27. भ्रष्ट व्यवस्था पर पैनी चोट


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