Friday, 17 February 2012

मार्निंग वाक या पत्रकारिता के नहीं दलाली के चैंपियन हैं राजनाथ सिंह


काम ऐसे कि सूर्य नाम भी शरमाए और शरम के झोंके से बुझ जाए



कुछ लोग होते हैं जो हेल्थ और वेल्थ एक साथ साधते हैं। राजनाथ सिंह सूर्य उन्हीं में से एक है। वह जो कह रहे हैं कि  उन्हें लोग मार्निंग वाकर जर्नलिस्ट कहते थे । यह सही है। कि वह मार्निंग वाक करते थे, पर कहां करते थे? उसी इलाके में जहां मिनिस्टर और अफ़सर रहते थे। तब के दिनों में लखनऊ में बहुत कम पत्रकार थे जिन्हें दलाली के लिए जाना जाता था। राजनाथ सिंह तब उन दलाल पत्रकारों में शीर्ष पर हुआ करते थे। उन दिनों कांग्रेस की सरकार होती थी। और राजनाथ सिंह आर.एस.एस. के कार्यकर्ता-प्रचारक होने के बावजूद कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों के चरण चांपने के लिए मशहूर थे। और इसी लिए वह माल एवेन्यू और गौतम पल्ली जैसे इलाकों में मार्निंग वाक के लिए निकलते थे। तब जब कि उन के घर से ज़्यादा नज़दीक टहलने की और तमाम जगहें थीं। बेगम हज़रत महल पार्क या एनबीआरआई जैसी जगहें।

वह खुद भी हज़रतगंज जैसी पाश जगह में बसी लारेंस टैरेस कालोनी में रहते थे तब के दिनों। लखनऊ क्लब के ठीक बगल में। लेकिन माल एवेन्यू या गौतम पल्ली में मंत्री और बडे़ सरकारी अफ़सर रहते थे। सो वह उन्हें अपनी दलाली के लिए शिकार के रुप में इस वाक में ही मेल-जोल बढ़ाते थे। एक सज्जन तो वकील थे। राजनाथ सिंह से प्रेरणा ले कर ही वह भी इस इलाके में वाक करने लगे। सरकारी वकील बन गए। और जल्दी ही हाइकोर्ट में जस्टिस भी। ऐसी तमाम कहानियां लखनऊ में वाक को ले कर यत्र-तत्र फैली पड़ी हैं तमाम सफल और सफलतम लोगों के बारे में। अब तो पीएल पुनिया कांग्रेस के सांसद हैं और मायावती के धुर विरोधी। पर एक समय वह मुलायम सिंह के सचिव थे। कांशीराम ने अपना आदमी बना कर मुलायम के सचिवालय में उन्हें बिठाया था। बाद के दिनों में मायावती जब मुख्यमंत्री बनीं तब उन के भी वह सचिव बने। यह गोमती नगर में अंबेडकर पार्क और हाथी वास्तव में उन्हीं के दिमाग की उपज है। सारी योजना उन्हीं की बनाई है। बदनाम मायावती हुईं यह अलग बात है। खैर मार्निंग वाक के चैंपियन अपने पुनिया जी भी हैं। इलाका बदल-बदल कर टहलते हैं। पर उन दिनों वह अपने ड्रीम प्रोजेक्ट अंबेडकर पार्क मार्निंग वाक के लिए आते थे। तब एक अखबार के संपादक ने तो पुनिया की चंपूगिरी में पहले पेज पर टाप बाक्स बना कर एक खबर लिखी थी कि, आगे-आगे पुनिया, पीछे सारी दुनिया!

बाद के दिनों में परिदृष्य बदला। अब पुनिया मायावती के जानी दुश्मन हैं। इस लिए भी कि ताज कारीडोर मामले में यह पुनिया ही थे जो फ़ाइल पर मायावती की दस्तखत करवा कर उन्हें फंसवा गए हैं। जिन्हें बचाने का ठेका लिए सतीश मिश्रा अपनी दुकान लगा बैठे। और वकालत छोड़ ब्राह्मण राजनीति और सो काल्ड सोशल इंजीनियरिंग के पुरोधा बन बैठे। मायावती खिसिया कर कहने लग गईं कि अंबेडकर के पी.ए. ने भी उन्हें धोखा दिया था, मेरे पी. ए. ने भी मुझे धोखा दे दिया। हालां कि पूनिया पी.ए. नहीं प्रमुख सचिव रहे थे उन के। खैर बात टहलने की हो रही थी। बल्कि मार्निंग वाकर जर्नलिस्ट राजनाथ सिंह की। तो जब राजनाथ सिंह हिंदुस्तान समाचार एजेंसी में थे, तब भी वहां बहुत कम तनख्वाह मिलती थी। एजेंसी ही नहीं चलती थी। तो तनख्वाह भी खैर क्या होती? लेकिन वह पूरे दबदबे से रहते थे। और खबरें भी लिखते ही थे। लेकिन दिक्कत यह होती थी कि अगर जब कभी वह कोई एक्सक्लूसिव खबर लिखते भी तो उस की क्रेडिट से वह वंचित हो जाते थे। क्यों कि तब लखनऊ में कायदे से दो ही अखबार हिंदी के थे। एक स्वतंत्र भारत और दूसरा नवजीवन। नवजीवन तब तक लड़खड़ाने की स्थिति में आ गया था। और हिंदुस्तान समाचार एजेंसी की सेवा सिर्फ़ स्वतंत्र भारत में ही थी। स्वतंत्र भारत में एक विशेष प्रतिनिधि थे शिव सिंह सरोज। वह हिंदुस्तान समाचार की एक्सक्लूसिव खबरों को स्वतंत्र भारत में अपनी बाइलाइन बना कर छाप लेते थे। राजनाथ सिंह कसमसा कर रह जाते थे। अंतत: एक बार उन्हों ने शिव सिंह सरोज को अजब ढंग से निपटाया।

इमरजेंसी के दिन थे। जार्ज फर्नांडीज़ डाइनामाइट कांड में वांटेड थे। एक दिन राजनाथ सिंह ने जार्ज की लखनऊ में गिरफ़्तारी की एक डिटेल एक्सक्लूसिव खबर लिखी। और एजेंसी से शाम को जारी कर दी। सरोज जी ने खबर उठाई और अपनी बाइलाइन लगा कर डेस्क पर थमा दी। देर रात राजनाथ सिंह ने वह खबर वापस ले ली यह कह कर कि खबर की पुष्टि नहीं हो पाई है। स्वतंत्र भारत की डेस्क पर बैठे लोग और महान थे। उन्हों ने खबर की रजिस्टर में देखा कि जब कोई खबर हिंदुस्तान सामाचार एजेंसी से गई ही नहीं है तो इस का क्या मतलब? खबर क्या है यह देखने की ज़रुरत भैया लोगों ने समझी नहीं। दूसरे दिन जार्ज की गिरफ़्तारी की खबर बैनर बन कर स्वतंत्र भारत में छप गई। तब जब कि जार्ज न तो लखनऊ आए थे, न उन की कोई गिरफ़्तारी हुई थी। स्वतंत्र भारत और शिव सिंह सरोज की खूब भद पिटी। पर राजनाथ सिंह विजयी मुद्रा में थे। राजनाथ सिंह बाद में भी लोगों को ऐसे ही या वैसे ही निपटाते रहे। १९८९ में जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे तब एक आईपीएस अफ़सर थे राम आसरे प्रसाद। मुलायम के मुंहलगे। मुलायम सिंह ने उन्हें उपकृत करने के लिए एडीजी का पद सृजित किया। उन्हीं दिनों अयोध्या में कार सेवकों का मामला गरमाया था।

मुलायम ने अयोध्या की नाकेबंदी कर कहा कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इसे कार सेवकों को भड़काने वाला बयान माना गया। वह भड़के भी। कार सेवकों ने मस्जिद के गुंबद पर चढ़ कर झंडा फहरा दिया। तोड़-फोड़ की। कार सेवकों पर गोली चली। और तमाम बातें हुईं। दंगे फ़साद हुए। राजनाथ सिंह तब स्वतंत्र भारत के संपादक थे। एक अच्छे खासे अखबार को उन्हों ने अयोध्या प्रसंग में हिंदू अखबार बना दिया। इतना ही नहीं जिन पहले अखबारों में वह काम कर चुके थे, आज और दैनिक जागरण को भी अपने प्रभाव में लिया और उन्हें भी हिंदू बना दिया। लखनऊ से तब छपने वाले अखबारों में एक नवभारत टाइम्स को छोड़ कर सभी अखबार हिंदू अखबार में तब्दील हो गए थे। तो यह राजनाथ सिंह का प्रताप था। कुछ और नहीं। और यह सब कुछ वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कार्यकर्ता होने के नाते कर रहे थे। उन्हों ने दावा किया है कि वह अपने लेखों में विचार के तौर पर चाहे जो लिखते रहे हों पर खबर में हमेशा निष्पक्ष रहे। उन की निष्पक्षता के यों तो कई नमूने हैं पर एक नमूना तो अभी इसी प्रसंग में देखिए। स्वतंत्र भारत में एक खबर खुद लिखी और एक मुस्लिम संवाददाता के नाम से खबर छापी कि अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलवाने का आदेश देने वाले पुलिस अफ़सर से भगवान राम इतने कुपित हुए कि उस पुलिस अफ़सर की आंख बह गई। यह पुलिस अफ़सर थे राम आसरे प्रसाद। एडीजी।

हुआ यह था कि उन दिनों राम आसरे प्रसाद ने मोतियाबिंद का आपरेशन करवाया था। और आंख पर पट्टी बांध कर घूम रहे थे। उन दिनों राम आसरे प्रसाद का वही जलवा था मुलायम राज में, जो जलवा अभी मायावती राज में बृजलाल का रहा था, चुनाव के पहले तक। और राम आसरे प्रसाद ने राजनाथ की कोई सिफ़ारिश नहीं मानी थी। सो खबरों में उन की आंख बह गई थी। वह बहुत दिनों तक सफाई देते फिरे कि उन की कहीं कोई आंख नहीं बही है। लेकिन खबर को विश्वसनीय बनाने के लिए उन्हों ने एक मुस्लिम संवाददाता के नाम का सहारा लिया। खबरों में उन की निष्प्क्षता के एक और जलवा देखिए। उन दिनों कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। उन के एक सचिव थे नृपेंद्र मिश्र। राजनाथ सिंह की न कल्याण सिंह सुनते थे न नृपेंद्र मिश्र। दलाली ठंडी पड़ी जा रही थी। उन दिनों पुलिस महानिदेशक थे प्रकाश सिंह। किसी काम से राजनाथ सिंह उन के पास बैठे थे। कि तभी उन को एक ट्रिप मिल गई। हुआ यह कि बनारस के एसएसपी को प्रकाश सिंह ने किसी काम से फ़ोन किया तो वह नहीं मिले। तब मोबाइल का ज़माना था नहीं। बाद में प्रकाश सिंह को बताया गया कि एसएसपी तो नृपेंद्र मिश्र के कहे पर किसी अमेरिकी को ले कर भदोही गए हुए हैं। बस क्या था कि राजनाथ के पत्रकार ने दिमाग लगा दिया। वह जानते थे कि सीधे किसी और अखबार में इस तरह की खबर नहीं छप सकती। उर्दू अखबार कौमी आवाज़ में खबर छपवाई कि मुख्यमंत्री के सचिव के सीआईए से संबंध। राजनाथ जानते थे कि एलआईयू उर्दू अखबारों पर कड़ी नज़र रखती है। नज़र पड़ी भी। जांच शुरु हो गई। अब यह खबर उन्हों ने पांचजन्य में प्लांट की। और फिर एक न्यूज़ एजेंसी से खबर जारी करवाई कि संघ के अखबार ने लिखा है कि मुख्यमंत्री का सचिव का संबंध सीआईए से। अब यह खबर बड़ी हो गई। और चर्चा भी ज़बर्दस्त। लेकिन नृपेंद्र मिश्र की गिनती ईमानदार अधिकारियों में होती रही है। सो कोई मामला बना भी नहीं।

वैसे भी उन्हों ने जिस अमरीकी के साथ एसएसपी को भेजा था, वह राजनयिक की पत्नी थी और प्रोटोकाल में भेजा था, केंद्र सरकार के कहने पर भेजा था। मुख्यमंत्री की जानकारी में। वह बीच में कहीं थे भी नहीं। लेकिन जब मामला खुला तब राजनाथ सिंह का नाम सामने आ गया। ऐसे एक नहीं अनेक खबरों की प्लांटिंग, योजना आदि में राजनाथ सिंह का नाम वैसे ही सना पड़ा है जैसे आटे में पानी। हालत तो यह थी कि स्वतंत्र भारत में संपादक उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने बनवाया था। वह भी विज्ञापन के मद में सूचना विभाग से ३६ लाख एडवांस दिला कर। स्वतंत्र भारत के मालिकान जयपुरिया भी एक घाघ थे। उस वक्त राजनाथ सिंह को ३ हज़ार रुपए पर रखा। इस के पहले शिव सिंह सरोज को रिटायर होने के बाद एक हज़ार मानदेय पर रखा था। वीरेंद्र सिंह के इस्तीफ़ा देने के बाद वह एक हज़ार पर ही कार्यवाहक संपादक हो गए। फिर बहुत गिड़गिड़ाने पर दो हज़ार कर दिया गया। तब जब कि स्वतंत्र भारत के कई सहयोगियों की तनख्वाह २७०० रुपए तक थी। पालेकर लागू था। बछावत की दस्तक थी। खैर राजनाथ को तनख्वाह की वैसे भी कुछ बहुत परवाह नहीं थी। शिव सिंह सरोज को भी नहीं थी। क्यों कि दोनों के ही खर्चे वेतन के भरोसे नहीं थे। इसी लिए बछावत कमीशन की ओर से आए मनमोहन सिंह ने जब ज़िला संवाददाताओं को १/३ रिक्मेंड करने की बात की तो राजनाथ ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दे दी। ऐसा पत्रकार विरोधी कार्य राजनाथ ही कर सकते थे। तब ज़िला संवादाताओं को एक पैसा नहीं मिलता था। अब विज्ञापन का कमीशन मिलता है। वेतन अभी भी नहीं।

खैर तब ३ हज़ार रुपए राजनाथ पाते ज़रुर थे। पर इस से ज़्यादा तो वह शराब पर खर्च कर देते थे। ड्राइवर को एक हज़ार रुपए देते थे। और फिर वह आज अखबार से आए थे जहां तनख्वाह वैसे भी बहुत नहीं मिलती थी। एडवांस की परंपरा है वहां। राजनाथ जैसे लोग वैसे भी वेतन के लिए अखबारों में काम नहीं करते। अखबार पर भी कुछ बहुत पकड नहीं थी उन की। अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय राजनीति से भी उन का कुछ लेना देना नहीं था। न खेल या कामर्स या विज्ञान जैसे विषयों से कोई वास्ता। फ़ुटबाल को वह अंगरेजी में साकर नहीं सासर बोलते थे। जिस पर सहयोगी पीठ पीछे खूब मज़ाक उडाते थे। और कहते थे बताओ कि इस संपादक को जब अंगरेजी नहीं आती तो क्यों बोलता है? कोई इसे यह बताने वाला नहीं है कि सासर का मतलब फ़ुटबाल नहीं प्लेट होता है! ऐसे तमाम मसले थे। कान के कच्चे, चमचेबाज़ और महिलाओं के शौकीन तो अमूमन सभी संपादक होते आए हैं, राजनाथ भी थे। पर इन के चमचे भी ऐसे-ऐसे जाहिल थे कि बस पूछिए मत। वीपी सिंह तब के दिनों प्रधानमंत्री थे। अरुण नेहरु, आरिफ़ मुहम्मद खान आदि पांच मंत्रियों ने अचानक इस्तीफ़ा दे दिया। देर रात यह खबर आई। एजेंसी का फ़्लैश जब आया तो एडीशन छोड़ने की तैयारी थी। एक अप्रेंटिश ने शिफ़्ट इंचार्ज से कहा भी कि बहुत ज़रुरी खबर है। पर शिफ़्ट इंचार्ज घर जाने की जल्दी में थे। बोले- यह साले सब रोज ही तो इस्तीफ़ा देते रहते हैं। इस के पहले वीपी सिंह बोम्मई को इस्तीफ़ा देने की नौटंकी बघार चुके थे एक बार। लोग घर चले गए। सभी अखबारों में दूसरे दिन लीड या बैनर खबर थी यह। पर राजनाथ सिंह के संपादकत्व वाले स्वतंत्र भारत में एक लाइन की खबर नहीं थी। वैसे भी राजनाथ सिंह के समय में स्वतंत्र भारत अखबार में यह और ऐसी अराजकता जितनी देखी गई, कभी नहीं देखी गई। सहयोगियों पर भी उन की पकड़ नहीं थी।

एक बार नाइट शिफ़्ट में कुछ सहयोगी रवींद्रालय चले गए कवि सम्मेलन का मज़ा लेने। एक संयुक्त समाचार संपादक भी थे उन में। उन को कुछ व्यक्तिगत कारणों से तब एक गनर भी शासन ने दे रखा था। कवि सम्मेलन सुनने के दौरान इन लोगों ने पी पा लिया। इसी दौरान एक दूसरे अखबार के संवाददाता से पहले कहा सुनी हो गई। फिर मार पीट भी। वह संवाददाता उसी रात राजनाथ सिंह के घर जा कर रोया गाया। दूसरे दिन राजनाथ ने उन सहयोगियों के नाम सामूहिक नोटिस अपनी दस्तखत से जारी किया। कि आप लोग ड्यूटी के दौरान रवींद्रालय में देखे गए। और शराब पी कर मार पीट की। संयुक्त समाचार संपादक को यह नागवार गुज़रा। वह राजनाथ से सार्वजनिक रुप से इस बात को ले कर भिड़ गए। और बोले कि मैं या मेरा कोई भी सहयोगी रवींद्रालय कल रात नहीं गया। न शराब पी, न मार पीट की। लेकिन राजनाथ बोले कि मेरे पास पक्की सूचना है कि आप लोगों ने ऐसा किया। तो वह संयुक्त समाचार संपादक बोले तो मेरे पास भी एक सूचना है कि कल रात आप शराब पी कर हज़रतगंज चौराहे पर जांघिया पहन कर बवाल काट रहे थे और ट्रैफ़िक कंट्रोल कर रहे थे। रात दो बजे मैं ने खुद अपनी आंख से यह सब देखा घर जाते समय। उन दिनों एक समाचार संपादक थे स्वतंत्र भारत में जिन को हर बात पर हां-हां कहने की लगभग बीमारी सी थी और उन्हें लोग न्यूज़ एडीटर स्टोर के नाम से जानते थे। क्यों कि उन का वास्ता खबरों से कम पेन, रिफ़िल, साबुन, स्टेपलर, आलपिन आदि से ज़्यादा होता था। अभी राजनाथ सिंह से संयुक्त समाचार संपादक का यह वाकयुद्ध चल ही रहा था कि उक्त समाचार संपादक अचानक उस जगह आए। तो संयुक्त समाचार संपादक ने उन से भी पूछा क्यों मैं सही कह रहा हूं न? वह अपनी आदत के मुताबिक बोल पडे हां-हां, बिलकुल! राजनाथ ने वह नोटिस संयुक्त समाचार संपादक से ले कर फ़ौरन फाडा और अपनी केबिन में चले गए। उन को इतनी समझ नहीं थी कि ऐसी नोटिसें एचआर देता है, संपादक अपनी दस्तखत से नहीं। बाद में उन्हों ने सारा गुस्सा न्यूज़ एडीटर स्टोर पर उतारा।

ऐसे ही एक बार लखनऊ महोत्सव के एक कवि सम्मेलन में वह मंच पर एक और गुंडा संपादक के साथ पी पा कर बैठ गए। जब कि कविता न राजनाथ लिखते थे, न वह गुंडा संपादक। प्रसिद्ध गीतकार संतोषानंद काव्यपाठ कर रहे थे। कि राजनाथ ने अचानक उन की कविता पर टिप्प्णी कर दी। संतोषानंद पीछे मुडे़ और अपनी बैसाखी लहरा कर ललकारा कौन है जो मुझे भाषा सिखा रहा है? सामने आए! मै भी हिंदी का प्रोफ़ेसर हूं। राजनाथ सिंह और उन के संपादक मित्र सर पर पांव ले कर मंच से भागे। अब तो तमाम संपादक जब तब अपनी फ़ोटो अखबार में छापते रहते हैं। पर राजनाथ सिंह ने तो तब के दिनों में जांघिया पहन कर नंगे बदन नहाती हुई अपनी रंगीन फ़ोटो छापने का रिकार्ड बनाया तब स्वतंत्र भारत में। एक बार तो गोमती नगर के इन के घर की पीतल की नेमप्लेट चोरी हो गई तो उस पर एक बड़ी सी स्टोरी करवा कर छापी। स्वतंत्र भारत में और भी कई बेढ़ंगे काम उन्हों ने किए। एक समय पायनियर में बहुत मज़बूत यूनियन हुआ करती थी। लेकिन राजनाथ ने उस में भी अपने चम्‍मचों को भर कर दीमक लगवाई और फिर उसे चाट गए। जयपुरिया के एक मुनीम थे जीके दारुका। जो बाद में जनरल मैनेजर भी हुए। उन की शह पर यह सब राजनाथ ने किया। और तो और एक समय तब तक की सब से लंबी हड़ताल हुई पायनियर में। कोई चौदह दिनों तक हड़ताल चली। पर स्वतंत्र भारत के इस संपादक राजनाथ सिंह ने अपने चम्‍मचों को साथ लिया और नैनीताल चले गए पिकनिक मनाने। हड़ताल खत्म हो गई पर उन की पिकनिक नहीं। आने पर कहने लगे क्या करें लैड स्लाइड में फंस गए थे। खैर, उन्हीं दिनों पायनियर अखबार की १२५वीं जयंती आ गई। वीर बहादुर सिंह के मार्फ़त राजीव गांधी से संपर्क साध कर राजनाथ ने उन को मुख्य अतिथि बनवा दिया। समारोह लखनऊ के बजाय दिल्ली में हुआ। राजीव गांधी की सुविधा के लिए। पर जयपुरिया के लिए यह मौका व्यवसाय में बदलने का था। उन्हों ने बदला भी इसे। और यहीं पायनियर और स्वतंत्र भारत की बरबादी का पहला पत्थर राजनाथ सिंह के हाथों रखा गया। अगला चरण राजीव गांधी के साथ एक विदेशी दौरे में लिखा गया। जयपुरिया बतौर पत्रकार राजीव गांधी के साथ गए। अब जाने के पहले जयपुरिया की पहली समस्या थी कि वहां से वह रिपोर्ट कैसे लिखेंगे?

राजनाथ और पायनियर के संपादक से उन्हों ने दौरे में जा रहे किसी पत्रकार को मैनेज करने के लिए कहा। पायनियर के संपादक ने तो सीधे हाथ खडे़ कर दिए। पर राजनाथ ने हामी भर दी। पर कोई पत्रकार उन के हाथ नहीं आया। तब राजनाथ ने उन्हें सुझाया कि यह दिक्कत वाला काम है। कोई पत्रकार एक तो तैयार नहीं हो रहा। जयपुरिया ने कहा कि पैसे देंगे। राजनाथ ने फिर असफल कोशिश की। अब एक पुराने पत्रकार से उन्हों ने दुखड़ा रोया। तो उस ने आसान रास्ता सुझा दिया। राजनाथ ने जयपुरिया को वही रास्ता सुझा दिया। जयपुरिया से कहा कि  आप लिखने-पढ़ने की चिंता से बेफ़िक्र हो कर राजीव गांधी से रिश्ते ठीक बनाइएगा। रही बात खबर की तो जो एजेंसी की खबर आएगी उसे ही आप का नाम डाल कर छाप दिया जाएगा। जयपुरिया गदगद हो गए। लौटे तो आते ही दो तीन केमिकल फ़ैक्ट्रियों के लाइसेंस पा गए। अब इन फ़ैक्ट्रियों को लगाने के लिए पूंजी चाहिए थी। लोन चाहिए था। पायनियर के बिकने की बात हो गई। थापर ने खरीद लिया। कांग्रेस के ही इशारे पर। कांग्रेस में सीताराम केसरी को साध कर राजनाथ ने थापर के स्वामित्व में भी अपनी संपादकी बरकरार रखी। लेकिन पायनियर के नए बने संपादक को राजनाथ सिंह का सांप्रदायिक और दलाली का रंग-ढंग पसंद नहीं था। विदाई तय हो गई राजनाथ की। पर आखिर में विनोद मेहता की भी नहीं चली। विनोद मेहता सुरेंद्र प्रताप सिंह को स्वतंत्र भारत का संपादक बनवाना चाहते थे। पर केसरी के ही कहे पर बना दिए गए घनश्याम पंकज स्वतंत्र भारत के प्रधान संपादक।

अब इस के बाद राजनाथ क्या करें? इस के पहले उन्हों ने जागरण और नवभारत टाइम्स के लिए हाथ पांव मारना शुरु किया। इन दोनों अखबारों के संपादकों ने इन के खिलाफ़ मुहिम चला दी। राजनाथ सिंह काफी हाऊस सोसाइटी के सचिव थे। और काफी हाऊस को चायनिज़ रेस्टोरेंट खोलने के लिए किसी को बेच दिया था। चार-चार, पांच-पांच कालम की धारावाहिक खबरें छपने लगीं राजनाथ सिंह के खिलाफ़। जागरण में भी और नवभारत टाइम्स में भी। वह अब किसी अखबार के लायक नहीं रहे। भाग कर गए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में अपने आका प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भैया की शरण में। उन्हों ने उत्तर प्रदेश भाजपा में महामंत्री बनवा दिया। बाद में तमाम विरोध के बावजूद राज्यसभा में भी भिजवा दिया राजनाथ को रज्जू भैया ने। नहीं पत्रकारिता में रह कर भाजपा की सेवा करने वाले कई औए भी स्वयंसेवक थे। जैसे वचनेश त्रिपाठी, दीनानाथ मिश्र, अच्युतानंद मिश्र, वीरेश्वर द्विवेदी, पीयूषकांत राय आदि तमाम-तमाम लोग। और सब के सब लाइन में थे, और आकांक्षी भी। पर राजनाथ की गुगली के आगे सभी टापते रह गए थे तब। दीनानाथ मिश्र तो खैर जल्दी ही राज्यसभा पहुंच गए पर बाकी लोगों के हाथ में अब हाथ मलना ही शेष रह गया है। असल में जब राजनाथ सिंह अपनी जवानी के दिनों में आज़मगढ़ में प्रचारक थे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तब रज्जू भैया ही उन के अधिकारी थे। तभी इन के 'व्यक्तिगत संबंध' बन गए रज्जू भैया से। रज्जू भैया जब तक रहे राजनाथ सिंह को कोई दिक्कत नहीं हुई। अब नहीं हैं रज्जू भैया तो राजनाथ सिंह को निर्वासन झेलना पड़ रहा है और वह अपने को वेटिंग में डाल कर फिट रखने की बात करते हुए कह रहे हैं कि क्या पता कब ज़रुरत पड़ जाए? नहीं कभी अखंड प्रताप सिंह और नीरा यादव जैसे महाभ्रष्ट अफ़सरों से यारी गांठने वाले राजनाथ सिंह से अब आदर्श और पत्रकारीय मूल्यों की बात सुन कर अस्सी चूहे खा कर बिल्ली चली हज को वाली बात याद आती है।

हालत यह थी कि जब राजनाथ सिंह भाजपा द्वारा राज्यसभा में भेजे गए तब इन के क्रिया कलाप न तो अटल बिहारी वाजपेयी को पसंद थे, न कल्याण सिंह को, ना राजनाथ सिंह या कलराज मिश्र सरीखों को। कोई भी इन्हें पसंद नहीं करता था, न अब करता है। एक बार तो अपनी उपेक्षा से परेशान इन राजनाथ सिंह को बगावती तेवर अपनाना पड़ा। अटल बिहारी वाजपेयी तक के खिलाफ़ बयान दे डाला। अनुशासनात्मक कार्रवाई की नौबत आ गई। पर अटल जी चतुर खिलाड़ी थे। बात को संभाल लिया। इन के खिलाफ़ कुछ होने नहीं दिया। पर उसी के बाद राजनाथ सिंह का राजनीतिक अवसान हो गया। अटल जी का रिकार्ड ही कुछ ऐसा है कि जो उन से टकराया अपने आप चूर-चूर हो गया। बलराज मधोक से लगायत गोविंदाचार्य, कल्याण सिंह तक एक लंबी फ़ेहरिस्त है। तो इन राजनाथ सिंह की क्या विसात थी? यह तो राजनीति या पत्रकारिता में वैसे भी कहीं नहीं थे। हां, अहंकार में ज़रुर बहुत आगे रहे यह राजनाथ सिंह। संघ की सीनियारिटी में कलराज मिश्र उन राजनाथ सिंह जो मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी से भी सीनियर हैं। पर यह वाले राजनाथ सिंह तो कलराज मिश्र से भी सीनियर हैं। पर वो कहते हैं न कि न घर के रहे, न घाट के वाली बात हो गई इन के साथ। और लगातार। रज्जू भइया की कृपा से जब यह राज्यसभा चले गए और फिर राजनाथ सिंह सूर्य बन कर सूर्य नाम को भी शर्माने लगे, तभी के दिनों की बात है यह। इन की दिली तमन्ना थी हिंदी संस्थान के कार्यकारी उपाध्यक्ष बनने की। कल्याण सिंह ने तो इन्हें लिफ़्ट ही नहीं दी थी। लेकिन जब रामप्रकाश गुप्ता मुख्यमंत्री बने तो उन को समझा कर यह राजनाथ सिंह हिंदी संस्थान के कार्यकारी उपाध्यक्ष बन बैठे। अब इस के पदेन कार्यकारी अध्यक्ष थे विधानसभा अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी। इन से भी राजनाथ सिंह का अहंकार टकरा गया। अब केशरीनाथ त्रिपाठी ठहरे कानून के जानकार। जब बहुत हो गया तो उन्हों ने एक संदेश भेजा कि हैसियत में रहें नहीं, यह पूर्णकालिक पद है। एक जनहित याचिका दायर करवा कर राज्यसभा से भी बाहर करवा दूंगा। पार्टी के आदमी हैं इस लिए सचेत कर दे रहा हूं। दो महीने में ही हिंदी संस्थान से भी बेआबरू हो कर जाना पड़ा इन राजनाथ सिंह को।

एक जगह उन्हों ने कहा है कि स्कूटर बेच कर मकान की रजिस्ट्री करवाई। सफ़ेद झूठ शायद इसी को कहते हैं। एक बजाज की पुरानी स्कूटर कितने में बिक सकती है, और एक आलीशान मकान जिस की कीमत करोड़ों में हो, उस की रजिस्ट्री कितने में हुई होगी, बताने की ज़रुरत नहीं। और फिर कोई एक-दो मकान तो है नहीं राजनाथ सिंह सूर्य के पास। लारेंस टैरेस के सरकारी मकान तक में तो उन्हों ने बरसों से व्यावसायिक कार्यालय खोल रखा है। लगभग दुकान। और धडल्ले से। ठेके पट्टे दिलवाने और ट्रांसफर-पोस्टिंग के अपने पुराने काम को भी उन्हों ने अभी छोड़ा नहीं है, सब कुछ के बावजूद। जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का चोला नहीं छोडा। खैर, इस तरह तमाम बातें भले राजनाथ सिंह के खिलाफ़ जाती हों, पर एक बात ज़रुर उन के पक्ष में जाती है। वह यह कि तमाम पत्रकारों ने दलाली की तो जनखों की तरह की। और कर रहे हैं। लेकिन राजनाथ सिंह ने दलाली भी की तो पूरी दबंगई से की। या और भी जो ऐसे-वैसे काम किए तो पूरी दबंगई से ही किए। यह तो मानना पडे़गा। मैं भी मानता हूं। जाने अब वह मार्निंग वाक कहां करते हैं पर अब लखनऊ में मार्निंग वाक बहुत बदल गया है। कुछ लोग कार ले कर मार्निंग वाक पर निकलते हैं। तो कुछ लोग कमांडो ले कर। कुछ लोग पीए ले कर। एक आईएएस तो अपनी कार में पिछली सीट पर अपनी पीए को लिटा कर गैराज में चले जाते थे। घंटों बाद गैराज से निकलते थे। एक बार मनचलों ने गैराज बाहर से बंद कर दिया। और उन की बीवी को सूचित कर दिया। बड़ी भद पिटी थी उन की तब। और अब तो लोग मार्निंग वाक पर लखनऊ में निकलते हैं और घर के आस पास ही मार दिए जाते हैं। पहले मंडी परिषद के एक चीफ़ इंजीनियर एस के मिश्रा मारे गए थे। एक माफ़िया वीरेंद्र शाही भी सुबह- सुबह मार दिए गए थे ऐसे ही। वह अपनी माशूका के घर रात बिता कर निकले थे। और अब इधर तो एनआरएचएम घोटाले से जुडे दो डाक्टर बारी-बारी मार दिए गए। मार्निंग वाक में ही।

फ़िल्म रंग दे वसंती में भी एक भ्रष्ट मंत्री ऐसे ही मारा गया है। पर वह तो फ़िल्म है। और यह लखनऊ। सचमुच बहुत भयावह हो गया है लखनऊ में मार्निंग वाक पर निकलना। अब लायजनिंग और दलाली करने वालों को, भ्रष्टाचारियों को मार्निंग वाक पर निकलने के पहले एक बार तो हिम्मत करनी ही पड़ती होगी। क्या पता? क्यों कि मैं तो देर सुबह तक सोता रहता हूं। इन सब चीज़ों की ज़रुरत कभी मुझे पड़ी ही नहीं। मतलब वही दलाली, लायजनिंग, भ्रष्टाचार आदि की। यह सब राजनाथ सिंह जैसे लोगों पर छोड़ दिया। इसी लिए मुझे नींद बहुत अच्छी आती है। और सुबह-सुबह तो बहुत ही अच्छी।


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